अध्याय 10आधारभूत लोकतंत्र — भाग 1: शासन

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यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।

दो सड़कें

पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 151 पर दो चित्र हैं, एक के नीचे एक, और उन दोनों में एक भी शब्द नहीं है।

ऊपर वाले चित्र में एक चौराहा है। लाल-पीली-हरी बत्तियाँ लगी हैं। सड़क पर सफ़ेद पट्टियों की ज़ेब्रा क्रॉसिंग बनी है। कारें और स्कूटर अपनी-अपनी लेन में, संकेतक के सामने रुके हुए हैं। फ़ुटपाथ चौड़े हैं और उन पर लोग चल रहे हैं।

नीचे वाले चित्र में भी एक सड़क है — पर वहाँ सब कुछ एक साथ है। पीली-नीली कारें, बसें, ऑटो, साइकिलें, ठेले, और उन सबके बीच से निकलते हुए पैदल लोग। कोई लेन नहीं है। कोई बत्ती नहीं है। हर वाहन का मुँह अलग दिशा में है।

दोनों चित्र देखकर पहला सवाल यही आता है — इनमें फ़र्क़ क्या है?

और उसका उत्तर सिर्फ़ एक शब्द है: नियम।

जब बहुत से लोग एक साथ रहते हैं

पाठ्यपुस्तक इस अध्याय की शुरुआत एक बहुत सीधी बात से करती है:

“दीर्घकाल से मनुष्य समाज में रहता आ रहा है। जब बहुत से लोग एक साथ रहते हैं, तब असहमति और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में, समाज में व्यवस्था और सद्भाव बनाए रखने के लिए नियम अनिवार्य हो जाते हैं।”

फिर वह नियमों की एक सूची गिनाती है, और वह सूची जान-बूझकर बच्चे के अपने जीवन से है।

घर में नियम हैं। विद्यालय में नियम हैं — और पाठ्यपुस्तक यह जोड़ना नहीं भूलती कि “कुछ विद्यार्थियों के लिए, तो कुछ शिक्षकों के लिए”। परीक्षा के अपने नियम हैं। सड़क पर यातायात के नियम हैं। और नौकरी में नियोक्ता के बनाए नियम हैं।

और फिर, इस सूची के आख़िर में, एक वाक्य आता है जो पढ़ने में मामूली लगता है —

”…जबकि नियोक्ता को भी उन सभी नियमों का पालन करना पड़ता है जो उन्होंने अपने अधीन काम करने वाले लोगों के लिए बनाए हैं।”

इसे धीरे से पढ़िए।

नियम बनाने वाला भी नियम से बँधा होता है।

यही इस पूरे अध्याय का बीज है — और वह इतनी शांति से बोया गया है कि प्राय: दिखता ही नहीं।

तीन शब्द जो एक जैसे लगते हैं

अब पाठ्यपुस्तक तीन परिभाषाएँ देती है, एक ही अनुच्छेद में, एक के बाद एक।

शासन — “निर्णयों को लेने की प्रक्रिया, नियमों के विभिन्न समूहों से सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करना और उनका पालन सुनिश्चित करना।”

सरकार — “उन व्यक्तियों के समूह या तंत्र को कहते हैं जो नियम बनाते और इन नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।”

कानून — “कुछ अधिक महत्वपूर्ण नियमों को कानून कहा जाता है।”

तीनों को एक वाक्य में अलग किया जा सकता है:

शासन एक प्रक्रिया है। सरकार एक तंत्र है। कानून एक अधिक महत्वपूर्ण नियम है।

सरकार शासन करती है। शासन वह काम है जो वह करती है।

और एक वादा

पाठ्यपुस्तक यहाँ एक और बात कहती है, जो आगे बहुत काम आएगी:

“इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि जो नियम और कानून एक बार बन गए, वे सदा के लिए बन गए।”

घर में आप माता-पिता से किसी नियम पर बात कर सकते हैं। विद्यालय में विद्यार्थी संघ या प्रबंधन से बदलाव के लिए कह सकते हैं।

और समाज में?

“कानूनों और नियमों में नागरिक भी अपनी बात रख सकते हैं। हम जानेंगे कि ऐसा किस प्रकार होता है।”

यह एक वादा है। इसे याद रखिए — हम इस पर लौटेंगे।

मनी ऑर्डर, और उसके बाद जो हुआ

अब पाठ्यपुस्तक कुछ अजीब-सा करती है। वह अचानक तीस साल पीछे चली जाती है।

“भारत में 30 वर्ष पहले तक जिन लोगों को अपने से दूर बैठे संबंधियों को पैसे भेजने होते थे, वे डाकघर की पंक्ति में लगकर फॉर्म भरकर मनी ऑर्डर भिजवाते थे; अथवा यदि उन्हें किसी व्यवसाय के लिए भुगतान करना होता, तो वे पहले बैंक की पंक्ति में लगकर डिमांड ड्राफ्ट बनवाते और फिर उसे डाक द्वारा भिजवाते थे।”

और फिर वह यह जोड़ती है —

“आपने शायद इन शब्दों को कभी न भी सुना हो, क्योंकि आज हमारे पास तुरंत पैसे भेजने के लिए डिजिटल संसाधन भी उपलब्ध हैं।”

यह वाक्य सचमुच सही है। आज के अधिकांश बच्चों ने ‘मनी ऑर्डर’ शब्द कभी नहीं सुना।

पर पाठ्यपुस्तक यह सब क्यों बता रही है?

क्योंकि अगला वाक्य यह है —

“डिजिटल तकनीक ने विशेष प्रकार के अपराधियों को भी जन्म दिया है जो अपने स्थान पर बैठे-बैठे डिजिटल माध्यमों से लोगों की धनराशि चुराने के तरीके ढूँढ़ते हैं।”

तकनीक बदली। और उसके साथ एक नई तरह की चोरी आ गई — जिसे साइबर क्राइम कहते हैं।

एक कहानी, तीन काम

अब ध्यान से देखिए कि इस एक छोटी-सी कहानी में क्या-क्या हुआ।

पहला — “ऐसी आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए अनेक सरकारों ने नए कानून बनाए हैं।”

दूसरा — ऐसे कुछ अपराधियों को गिरफ़्तार भी किया गया। और पाठ्यपुस्तक बाद में जोड़ती है कि इस उदाहरण में साइबर पुलिस ऐसी ही एक एजेंसी है।

तीसरा — ”…एवं न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया है। सामान्यत: उन्हें आर्थिक दंड के साथ-साथ जेल की सजा भी दी जाती है।”

तीन काम हुए। और तीनों अलग-अलग लोगों ने किए।

पहला काम — कानून बनाना — विधायिका का है। दूसरा — कानून लागू करना — कार्यपालिका का। तीसरा — यह तय करना कि कानून टूटा या नहीं — न्यायपालिका का।

पाठ्यपुस्तक ने परिभाषाएँ बाद में दीं, कहानी पहले। और यह क्रम बहुत सोचा-समझा है।

एक अंग जो बाक़ी दोनों को देखता है

तीनों परिभाषाओं में से सबसे पहली सबसे ज़्यादा याद की जाती है और सबसे कम पूरी:

विधायिका “वह अंग है जो नए कानून बनाती है और कभी-कभी पुराने कानूनों में संशोधन तथा वर्तमान कानून को निरस्त भी करती है।”

तीन काम हैं, एक नहीं। और यह उसी बात से जुड़ा है जो पहले कही गई थी — कि कानून सदा के लिए नहीं बनते।

दूसरी परिभाषा — कार्यपालिका — सीधी है। वह कानूनों को लागू करती है, और उसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, मंत्रीगण, और वे एजेंसियाँ आती हैं जिनका काम कानून लागू करवाना है।

और तीसरी — न्यायपालिका — के दो हिस्से हैं।

पहला हिस्सा सब जानते हैं: वह तय करती है कि किसी ने कानून तोड़ा या नहीं, और यदि तोड़ा तो क्या कार्रवाई या क्या दंड हो।

दूसरा हिस्सा लगभग हमेशा जल्दी में पढ़ लिया जाता है:

“कभी-कभी यह इस बात की भी जाँच करती है कि क्या कार्यपालिका द्वारा लिया गया कोई निर्णय ठीक है या नहीं; अथवा विधायिका द्वारा पारित किया गया कोई कानून भली-भाँति परखा गया है और सभी के हित में है या नहीं।”

पढ़िए कि यहाँ क्या कहा गया है।

न्यायपालिका सिर्फ़ नागरिकों को नहीं परखती। वह सरकार के बाक़ी दो अंगों को भी परखती है।

और यहीं वह बीज अंकुरित होता है जो बहुत पहले, नियोक्ता वाले वाक्य में, बोया गया था — नियम बनाने वाला भी नियम से बँधा होता है।

एक पहिया

पाठ्यपुस्तक अब इस व्यवस्था को नाम देती है।

“सुशासन के किसी भी तंत्र में इन तीनों अंगों को निश्चित रूप से पृथक रखा जाता है, जबकि ये तीनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और कार्य भी एक साथ करते हैं। यह विभाजन ‘शक्तियों का पृथक्करण’ कहलाता है।”

पहली बार पढ़ने पर यह वाक्य अपने आप से उलझता हुआ लगता है — ‘पृथक रखे जाते हैं’, पर ‘कार्य एक साथ करते हैं’?

पर यह उलझन नहीं है। यही पूरी बात है।

‘पृथक’ का अर्थ है — अलग-अलग काम। ‘पृथक’ का अर्थ यह नहीं है — एक-दूसरे से कटे हुए।

एक ही टीम में गेंदबाज़, बल्लेबाज़ और विकेटकीपर होते हैं। काम तीनों के अलग हैं। पर टीम एक ही है।

और फिर पाठ्यपुस्तक उद्देश्य बताती है —

“इसका उद्देश्य पूरी प्रणाली को नियंत्रित करना एवं संतुलन बनाए रखना है, अर्थात सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंग के कार्यों की निगरानी कर सकता है तथा यदि कोई अंग अपनी अपेक्षित भूमिका से परे जाकर कार्य कर रहा है, तो उसे नियंत्रित कर पुन: संतुलन स्थापित कर सकता है।”

पृष्ठ 154 पर इसका एक चित्र है — चित्र 10.3।

वह एक पहिया है। बीच में एक गोले में लिखा है: शासन। उसके चारों ओर तीन रंगीन खंड हैं — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका।

और तीनों के बीच पीले तीर बने हैं — दोनों दिशाओं में।

तीर एक तरफ़ नहीं हैं। क्योंकि कोई अंग दूसरों से ऊपर नहीं है।

और अगले पन्ने पर पाठ्यपुस्तक एक प्रश्न पूछ लेती है, जिसका उत्तर वह नहीं देती:

“क्या आप किसी ऐसी स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जहाँ शासन के तीनों अंगों की शक्तियाँ किसी एक ही समूह के नियंत्रण में आ जाएँ? ऐसे में किस प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न होगी?”

सोचिए — एक ही आदमी नियम बनाए, स्वयं खेले, और स्वयं ही अंपायर हो जाए।

और अब एक पिरामिड

यहाँ अध्याय एक ऐसा मोड़ लेता है जहाँ बहुत से पाठक फिसल जाते हैं।

क्योंकि अब पाठ्यपुस्तक फिर ‘तीन’ गिनाती है — पर ये बिल्कुल अलग तीन हैं।

“भारत सहित अनेक देशों में यह तीन स्तरों पर कार्य करती है — स्थानीय स्तर, राज्य या प्रादेशिक स्तर और राष्ट्रीय स्तर। प्रत्येक स्तर भिन्न विषयों पर कार्य करता है।”

पहले तीन अंग थे। अब तीन स्तर हैं।

और ये एक ही चीज़ नहीं हैं।

अंग बताते हैं कि कौन क्या करता है। स्तर बताते हैं कि कौन कहाँ तक।

और सबसे ज़रूरी बात — तीनों अंग तीनों स्तरों पर होते हैं।

पाठ्यपुस्तक ने दोनों के लिए अलग-अलग चित्र दिए हैं, और वह संयोग नहीं है। तीन अंग एक पहिया हैं — गोल, बराबर, कोई ऊपर नहीं। तीन स्तर एक पिरामिड हैं — नीचे स्थानीय, बीच में राज्य, ऊपर केंद्र।

बल्ब, और फिर बाढ़

स्तरों को समझाने के लिए पाठ्यपुस्तक दो उदाहरण देती है, और दोनों बहुत अच्छे हैं।

पहला घर का है।

घर का बल्ब नहीं जल रहा। पहले आप बल्ब, स्विच और फ्यूज़ जाँचेंगे। अगर वे ठीक हैं, तो बिजली मिस्त्री को बुलाएँगे। और अगर पता चले कि समस्या घर पर नहीं है, तो बिजली विभाग जाकर शिकायत दर्ज कराएँगे।

“यहाँ भी समस्या के समाधान के तीन स्तर हैं।”

दूसरा उदाहरण बड़ा है।

मान लीजिए कुछ दिनों तक भारी वर्षा के कारण एक ज़िले के किसी क्षेत्र में बाढ़ आ गई।

अगर वह ज़्यादा भीषण नहीं है — तो स्थानीय प्राधिकारी उसे संभाल लेते हैं।

अगर वह अनेक नगरों और बहुत से गाँवों को प्रभावित करती है — तो राज्य सरकार आगे आती है और बचाव दल भेजती है।

और अगर वह भयानक रूप ले लेती है और विशाल क्षेत्र को प्रभावित करती है — तो केंद्र सरकार आगे आती है और राहत सामग्री और सेना भेजती है।

दोनों उदाहरणों में एक ही सिद्धांत है, और वह बहुत सुंदर है:

ऊपर का स्तर तभी आता है जब नीचे का स्तर सँभाल न सके।

एक तालिका, और उसमें छिपा एक शब्द

पृष्ठ 157 पूरा एक तालिका है — चित्र 10.5 — और वह इस अध्याय का सबसे भरा हुआ पन्ना है।

वह बताती है कि न्यायपालिका अखिल भारत स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय है और राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय। कि विधायिका राष्ट्रीय स्तर पर दो सदन है — लोकसभा और राज्य सभा — और राज्य स्तर पर विधान सभा, जबकि कुछ राज्यों में उसके साथ विधान परिषद भी होती है।

और कि कार्यपालिका में — और यह सबसे ज़्यादा उलटता है —

राष्ट्रपति औपचारिक प्रमुख हैं, और तीनों सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर। प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख हैं। राज्य में राज्यपाल औपचारिक प्रधान हैं, और मुख्यमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख।

फिर दो लंबी सूचियाँ हैं — केंद्र सरकार के कार्य और राज्य सरकार के कार्य।

केंद्र की सूची में हैं: रक्षा, विदेशी मामले, परमाणु ऊर्जा, संचार, मुद्रा, अंतर्राज्यीय वाणिज्य, शिक्षा, और राष्ट्रीय नीतियों का प्रतिपादन।

राज्य की सूची में हैं: पुलिस और कानून व्यवस्था, केंद्र के कानूनों का कार्यान्वयन, जन-स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सिंचाई, और स्थानीय सरकार।

दोनों सूचियाँ ध्यान से पढ़िए।

एक शब्द दोनों में है — शिक्षा।

यह छपाई की भूल नहीं है। कुछ विषयों पर केंद्र और राज्य, दोनों काम करते हैं। और पाठ्यपुस्तक उसी खाने में यह भी लिख देती है — “यह विस्तृत सूची नहीं है”।

‘औपचारिक’ का मतलब क्या होता है

तालिका के हाशिये में पाठ्यपुस्तक एक शब्द समझाती है:

“हमारे यहाँ राष्ट्रपति और राज्यपाल वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख नहीं होते हैं। विशेष परिस्थितियों में उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, पर वे सामान्यत: केंद्र या राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।”

पढ़ने पर लगता है कि राष्ट्रपति का पद केवल एक औपचारिकता है।

और ठीक अगला पन्ना उलटते ही, पूरे पृष्ठ पर, एक चेहरा है।

एक पन्ने का उत्तर

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म 1931 में तमिलनाडु के रामेश्वरम में, एक सामान्य परिवार में हुआ।

वे एक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम, मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु क्षमताओं के विकास में उनकी भूमिका के कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन’ कहा जाता है।

और 2002 से 2007 तक वे भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे।

पाठ्यपुस्तक कहती है कि सर्वोच्च प्रतिष्ठित पद पर रहते हुए भी वे अच्छी शिक्षा और नई खोज के प्रति अपनी गहरी रुचि के कारण जनमानस से, विशेषकर युवाओं से, बहुत गहराई से जुड़े हुए थे।

और फिर वह एक वाक्य लिखती है, जो इस पूरे पन्ने का कारण है:

“डॉ. कलाम ने यह दिखाया कि भले ही राष्ट्रपति के रूप में उनकी स्थिति सांकेतिक है, फिर भी वे असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।”

पिछले पन्ने पर पाठ्यपुस्तक ने कहा था कि राष्ट्रपति असली कार्यपालिका प्रमुख नहीं होते।

और इस पन्ने पर वह दिखा देती है कि ‘औपचारिक’ का मतलब ‘प्रभावहीन’ नहीं होता।

वह इस जोड़ को कहीं समझाती नहीं। वह बस दोनों पन्ने आमने-सामने रख देती है।

और उनके छह विचारों में से जो सबसे प्रसिद्ध है, वह यह है —

“यदि आप असफल होते हैं, तो भी हार नहीं मानिए। एफ.ए.आई.एल. का अर्थ है — ‘फर्स्ट एटेम्प्ट इन लर्निंग’, यानी सीखने की दिशा में पहला प्रयास। अंत, अंत (द एंड) नहीं है। वास्तव में ई.एन.डी. का अर्थ है — ‘एफर्ट नेवर डाइज़’, अर्थात प्रयास कभी निरर्थक नहीं होते हैं। यदि आपको उत्तर में ‘ना’ (एन.ओ.) मिलता है, तो इसका अर्थ है — ‘नेक्स्ट अपॉरचुनिटी’, अर्थात अगले अवसर के लिए तैयार रहें। अत: सकारात्मक रहें।”

लोगों का शासन

अब अध्याय अपने आख़िरी हिस्से में आता है, और वहाँ वह शब्द खोलता है जो उसके शीर्षक में है।

‘डेमोक्रेसी’ ग्रीक भाषा के दो शब्दों से बना है — ‘डेमोस’, जिसका अर्थ है ‘लोग’, और ‘क्रेटोस’, जिसका अर्थ है ‘शासन प्रणाली या तंत्र या शक्ति’।

तो शाब्दिक अर्थ हुआ — लोक-शासन। लोगों का शासन।

और यहीं पाठ्यपुस्तक एक बहुत अच्छा प्रश्न पूछ लेती है:

“परंतु क्या सभी लोग एक साथ शासन कर सकते हैं? स्पष्ट है कि यह संभव नहीं है।”

और उसका उत्तर वह किसी दूर की मिसाल से नहीं, बल्कि उसी कक्षा से देती है जिसमें यह किताब पढ़ी जा रही है।

मान लीजिए कक्षा की कोई बात प्रधानाचार्य तक ले जानी है।

“इस स्थिति में क्या पूरी कक्षा प्रधानाचार्य के पास जाएगी? स्पष्ट है कि यह व्यावहारिक नहीं होगा।”

इसलिए कक्षा एक मॉनीटर या एक प्रतिनिधि चुनती है।

“यही सिद्धांत राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू होता है।”

चुनावों के माध्यम से लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। राज्य के स्तर पर उन्हें विधायक कहा जाता है, और राष्ट्र के स्तर पर सांसद।

और वे वहाँ करते क्या हैं?

“ये सभी चयनित सदस्य विधान सभा/लोक सभा में कानूनों पर चर्चा करते हैं। समस्याओं और समाधानों पर विचार-विमर्श करते हैं। मतभेद की स्थिति में एक-दूसरे से संवाद और तर्क-वितर्क द्वारा समस्या का हल करने का प्रयास करते हैं।”

आख़िरी वाक्य पर रुकिए।

लोकतंत्र मतभेद को मिटाता नहीं। वह उसे बातचीत में बदल देता है।

सत्तानवे करोड़

पाठ्यपुस्तक अब एक आँकड़ा देती है।

“2024 के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो लगभग 97 करोड़ मतदाताओं के साथ भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी है। भारत में कानून के अनुसार 18 वर्ष से ऊपर की आयु के सभी भारतीय नागरिकों को चुनावों में मतदान करने का अधिकार है।”

सत्तानवे करोड़ लोग। एक ही देश में।

और उनमें से हर एक के पास वही एक वोट है।

पिकनिक

और फिर, अंत से ठीक पहले, पाठ्यपुस्तक एक और छोटा-सा उदाहरण देती है — और वह इस पूरे अध्याय का सबसे प्यारा हिस्सा है।

कक्षा पिकनिक पर जाने की योजना बना रही है। दो जगहें हैं — ‘क’ और ‘ख’।

कक्षा दोनों के लाभ-हानि पर बात करती है — कितनी दूर हैं, पहुँचने में कितना समय लगेगा, कितना खर्च होगा, वहाँ मूलभूत सुविधाएँ हैं या नहीं।

पर सबकी सहमति नहीं बनती।

तब शिक्षक कहते हैं — मतदान कर लेते हैं। जो ‘क’ चाहते हैं, हाथ उठाएँ। अब जो ‘ख’ चाहते हैं।

“जिस विकल्प के लिए सबसे ज्यादा विद्यार्थियों ने हाथ उठाए, उस विकल्प या स्थान को पिकनिक पर जाने के लिए चुन लिया जाता है।”

“यह प्रक्रिया मतदान (वोटिंग) कहलाती है। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उदाहरण है, जहाँ स्थान निश्चित करने में प्रत्येक विद्यार्थी की राय ली गई।”

बस इतना।

एक पिकनिक, कुछ उठे हुए हाथ — और लोकतंत्र का एक पूरा प्रकार समझा दिया गया।

और वह वादा, जो अब पूरा होता है

अध्याय अपनी आख़िरी परिभाषा देता है — और वह उसके शीर्षक की व्याख्या है।

“आधारभूत/धरातलीय लोकतंत्र उस तंत्र की ओर इशारा करता है, जिसमें सामान्य नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित और सुनिश्चित किया जाता है, जैसे कि पृष्ठ 155 पर चित्र 10.4 में दिखाए गए पिरामिड का आधार है। इस प्रकार के तंत्र में नागरिक स्वयं को प्रभावित करने वाले निर्णयों पर अपनी बात रख सकते हैं।”

अब उस वादे को याद कीजिए, जो बहुत पहले, पृष्ठ 151 पर किया गया था।

“कानूनों और नियमों में नागरिक भी अपनी बात रख सकते हैं। हम जानेंगे कि ऐसा किस प्रकार होता है।”

वादा पृष्ठ 151 पर था। उत्तर पृष्ठ 160 पर है।

अध्याय जहाँ से शुरू हुआ था, वहीं आकर पूरा होता है।

दो चित्र, और उनके चारों ओर एक घेरा

अध्याय चार वाक्यों पर समाप्त होता है।

“सरकार और शासन के बिना कोई भी देश नहीं चल सकता।”

“आधुनिक सरकार के तीन अंग हैं — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — जिन्हें एक साथ कार्य करने की आवश्यकता होती है।”

“भारत सरकार तीन स्तरों पर कार्य करती है — संघीय अथवा राष्ट्रीय स्तर, राज्य स्तर और स्थानीय स्तर।”

और चौथा —

“लोकतंत्र इस प्रणाली की पूरी रूपरेखा है। यह राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तर पर चयनित प्रतिनिधियों के माध्यम से कार्य करती है।”

‘पूरी रूपरेखा’ — यही तीन शब्द इस पूरे अध्याय को बाँध देते हैं।

एक पहिया है — तीन अंग, जो बताते हैं कि कौन क्या करता है। एक पिरामिड है — तीन स्तर, जो बताते हैं कि कौन कहाँ तक।

और इन दोनों के चारों ओर जो घेरा खिंचा है, उसका नाम लोकतंत्र है।

और उस पिरामिड का सबसे नीचे वाला हिस्सा — वही जिसे अध्याय ने ‘आधार’ कहा — अगले दो अध्यायों का विषय है।

जो सत्यापित नहीं हो सका

यह खंड जान-बूझकर है। जो जाँचा नहीं जा सका, उसे छिपाना नहीं चाहिए।

  1. ! पाठ्यपुस्तक का चौथा अभ्यास-प्रश्न “2019 की कोविड महामारी के दौरान लगा लॉकडाउन” कहता है। भारत में देशव्यापी लॉकडाउन 25 मार्च 2020 से लगा था, और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 11 मार्च 2020 को महामारी घोषित किया था। (रोग का नाम ‘कोविड-19’ है क्योंकि वह 2019 के अंत में पहचाना गया था — शायद यहीं से यह भ्रम आया।)
  2. महाभारत के श्लोक का सटीक संदर्भ नहीं मिला। दूसरा आधा — ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ — मनुस्मृति 8.15 और महाभारत (अनुशासन पर्व) दोनों में प्रमाणित है; पर पूरी पंक्ति ‘राजानां धर्मगोप्तारं…’ के साथ कोई निश्चित पर्व-अध्याय-श्लोक संदर्भ नहीं मिला।
  3. रिगोबर्टा मेन्चु तुम के कथन में एक कड़ी अनुवाद में नहीं आई — मूल में “विकास लोकतंत्र के बिना नहीं” भी है। और ‘fairness’ को ‘समानता’ कहना एक व्याख्यात्मक चुनाव है।
  4. “भारत में 30 वर्ष पहले तक” — यह पाठ्यपुस्तक का अनुमानित कालसूचक है, कोई तिथि नहीं।
  5. चित्र 10.2 के दस चित्रों की कोई आधिकारिक सूची पाठ्यपुस्तक में नहीं है — वह उन्हें गतिविधि के रूप में छोड़ती है। ऊपर जो पहचान दी गई, वह चित्रों को देखकर बनी व्याख्या है।
  6. ‘शिक्षा’ दोनों सूचियों में क्यों है — इसका संवैधानिक कारण पाठ्यपुस्तक ने नहीं दिया। वह केवल जोड़ती है कि “यह विस्तृत सूची नहीं है”।