अध्याय 2महासागर एवं महाद्वीप

पूरा अध्याय19 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6), अध्याय 2

यह पूरा अध्याय यहाँ एक कहानी की तरह, किताब के ही क्रम में, सरल शब्दों में फिर से कहा गया है। उद्धरण-चिह्नों में लिखी पंक्तियाँ किताब की अपनी हैं, उसी वर्तनी में; जहाँ कोई हिसाब या बात हमारी अपनी है, वहाँ हमारा लिखा है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ दिए हैं (2026-27 में छपी किताब), ताकि आप किताब खोलकर साथ-साथ पढ़ सकें। बीच-बीच में रुककर सोचिए आएगा: पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर नीचे दिया उत्तर पढ़िए।


1. अंतरिक्ष से दिखती पृथ्वी

(पृष्ठ 27–28)

अध्याय की शुरुआत जूल्स वर्न (1870) की इन पंक्तियों से होती है: “महासागर ही सब कुछ है। यह पृथ्वी के 7/10 वें भाग पर व्याप्त है।”

फिर किताब दो बड़े सवाल रखती है। इनके उत्तर पूरे अध्याय में धीरे-धीरे मिलेंगे:

  1. “महासागर एवं महाद्वीप क्या हैं? उनके नाम क्या हैं एवं उनका वितरण कैसा है?”
  2. “महासागर एवं महाद्वीप पृथ्वी पर जीवन को, जिसमें मानव जीवन भी सम्मिलित है, किस प्रकार प्रभावित करते हैं?”

चित्र 2.1 अंतरिक्ष से ली गई पृथ्वी की तस्वीर है। उसके बीच में हिंद महासागर है, बाईं ओर अफ्रीका, ऊपर की ओर भारत और एशिया के भाग, दाईं ओर आस्ट्रेलिया और नीचे की ओर अंटार्कटिका।

इस तस्वीर में पृथ्वी नीली क्यों दिखती है? किताब बताती है: “वास्तव में पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है।” और आगे: “इसी कारण अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीली दिखाई देती है। इसलिए आरंभिक अंतरिक्ष यात्रियों ने स्नेहपूर्वक पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ कहकर पुकारा।”

2. महासागर, भूखंड और महाद्वीप

(पृष्ठ 28)

ग्लोब पर नीला रंग जल का है। “ग्लोब पर हम जो सबसे बड़ी जलराशियाँ देखते हैं, उन्हें ‘महासागर’ कहते हैं।”

भूरा रंग भूमि का है: “यह भूमि का रंग है, जो ग्लोब के लगभग एक-चौथाई भाग पर फैला हुआ है।” भूमि के लिए किताब दो शब्द देती है: “भूमि के एक बड़े भाग को ‘भूखंड’ कहते हैं एवं भूमि के एक बड़े निरंतर विस्तार को ‘महाद्वीप’ कहा जाता है।”

महासागर और महाद्वीप केवल नक्शे की चीज़ें नहीं हैं। “पृथ्वी की जलवायु के निर्माण में महासागर एवं महाद्वीप दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।” किताब यह भी कहती है: “हम उनके प्रभाव को अपने इतिहास, संस्कृति एवं अपने दैनिक जीवन पर भी देखते हैं।”

इसका एक उदाहरण इसी पन्ने पर है। “भारतीय नौसेना के प्रतीक चिह्न पर आदर्श वाक्य ‘शं नो वरुण:’ अंकित है, जिसका अर्थ है, “हे वरुण! हमारे लिए कल्याणकारी हों”। यह महासागर, आकाश तथा जल से संबंधित वैदिक देवता वरुण की स्तुति है।”

3. जल और भूमि बराबर नहीं बँटे

(पृष्ठ 29)

चित्र 2.2 में पृथ्वी दो तरह से दिखाई गई है: बाएँ उत्तर ध्रुव के ऊपर से, दाएँ दक्षिण ध्रुव के ऊपर से। दोनों को मिलाकर देखिए। किताब कहती है: “जैसा कि हम देखते हैं, महासागर और महाद्वीप उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में समान रूप से वितरित नहीं हैं।”

उत्तर ध्रुवदक्षिण ध्रुव
चित्र 2.2 — उत्तर ध्रुव (बाएँ) एवं दक्षिण ध्रुव (दाएँ) के ऊपर से दिखता पृथ्वी का मानचित्रकिताब के पृष्ठ 29 के चित्र 2.2 के आधार पर हमारा बनाया चित्र

इस चित्र में नीले रंग से महासागर दिखाए गए हैं, और उनके “छोटे-छोटे विस्तार” भी, जैसे सागर और खाड़ी।

रुककर सोचिए: किस गोलार्ध में अधिक जल है?

उत्तर (किताब से): अध्याय के अंत में किताब लिखती है: “दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में उत्तरी गोलार्ध में स्थल भाग अधिक है।” हमारा निष्कर्ष: इसलिए जल दक्षिणी गोलार्ध में अधिक है।

4. खारा जल और अलवणीय जल

(पृष्ठ 30–31)

पृष्ठ 30 पर “समुद्री जीवन” के कई छायाचित्र हैं, जैसे प्रवाल भित्ति, शार्क, डॉल्फिन, स्पर्म ह्वेल, शैवाल, एंपरर पेंग्विन और समुद्री टर्टल। उन्हें ध्यान से देखिए; आगे इसी जीवन की बात आएगी।

इतना जल है, तो क्या सारा हमारे काम का है? नहीं। “पृथ्वी पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग महासागरों में है, परंतु यह जल लवणीय (खारा) है एवं मानव सहित बहुत से स्थलीय जीवों के उपभोग के लिए अनुपयोगी है।”

पीने लायक़ जल बहुत थोड़ा है: “दूसरी ओर अलवणीय जल (पेय जल) का पृथ्वी के जल संसाधनों में अत्यल्प हिस्सा है। यह हिमनद (ग्लेशियर), नदियों, झीलों, वायुमंडल एवं भूमिगत जल के रूप में व्याप्त है।”

रुककर सोचिए: किताब पूछती है: “जब पृथ्वी पर जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, फिर भी ‘जल की कमी’ अथवा ‘जल संकट’ की इतनी चर्चा क्यों सुनाई देती है?”

उत्तर (हमारा, किताब की बातों से): ज़्यादातर जल महासागरों का खारा जल है, जो पीने के काम नहीं आता। पीने लायक़ अलवणीय जल पृथ्वी के जल का “अत्यल्प हिस्सा” ही है।

किताब यह भी पूछती है: “जल संरक्षण के कौन-कौन से उपायों से आप अवगत हैं?” इसका उत्तर आपके अपने आस-पास से आएगा।

5. पाँच महासागर, पर जल एक

(पृष्ठ 31–32)

चित्र 2.3 में पाँच महासागर दिखते हैं: प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, आर्कटिक महासागर और दक्षिणी (अथवा अंटार्कटिका) महासागर।

प्रशांतमहासागरप्रशांतमहासागरअटलांटिकमहासागरहिंदमहासागरआर्कटिक महासागरदक्षिणी महासागरउत्तरीअमेरिकादक्षिणीअमेरिकायूरोपएशियाअफ्रीकाआस्ट्रेलियाअंटार्कटिका
चित्र 2.3 — पाँच महासागरों, उनकी पारंपरिक सीमाओं और महाद्वीपों को प्रदर्शित करता हुआ विश्व का मानचित्रकिताब के पृष्ठ 32 के चित्र 2.3 के आधार पर हमारा बनाया चित्र · भूमि: Natural Earth

अब इस अध्याय की सबसे ध्यान देने वाली बात। नक्शे पर महासागरों के बीच रेखाएँ खिंची हैं, पर किताब साफ़ कहती है: “हमने यहाँ पाँच महासागरों के नाम बताए हैं, जैसा कि मानचित्र से यह स्पष्ट है कि ये वास्तव में अलग-अलग नहीं हैं। महासागरों का यह सीमांकन प्रचलन से अधिक कुछ नहीं हैं, क्योंकि प्राकृतिक जगत ऐसी किन्हीं भी सीमाओं का पालन नहीं करता है।”

यानी ये रेखाएँ प्रकृति ने नहीं खींचीं; ये लोगों के चलन से मानी गई हैं। जल इन रेखाओं को नहीं मानता, और इसका फ़ायदा समुद्री जीवन को मिलता है: “उदाहरणतया समुद्री जल विभिन्न महासागरों में बहता रहता है जो विविधतापूर्ण समुद्री जीवन को समृद्ध करने में सहायक है।”

यह जीवन कैसा है? “समुद्री वनस्पति जगत में छोटे पौधे एवं सभी समुद्री शैवाल (Algae and Seaweeds) सम्मिलित हैं। समुद्री प्राणि जगत में हजारों प्रजातियों की रंगीन मछलियाँ, डॉल्फिन, ह्वेल और अनगिनत रहस्यमयी गहरे समुद्री जीव शामिल हैं।” और “सूर्य की रोशनी वाली सतह से लेकर अंधेरी गहराइयों तक समुद्र के प्रत्येक क्षेत्र में जीवन के विविध रूप पाए जाते हैं।”

किताब के हाशिये में तीन शब्दों के अर्थ हैं: वनस्पति जगत यानी “किसी विशेष क्षेत्र अथवा कालखंड में पाए जाने वाले पेड़-पौधे”; प्राणि जगत यानी “किसी विशेष क्षेत्र अथवा कालखंड में पाए जाने वाले जीव-जंतु”; और समुद्री यानी “महासागरों एवं सागरों में पाए जाने वाले अथवा उससे संबंधित”।

अब आकार। “मानचित्र में देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रशांत महासागर सबसे बड़ा है। दूसरा सबसे बड़ा महासागर अटलांटिक है। हिंद महासागर तीसरे स्थान पर है, जबकि दक्षिणी महासागर चौथे स्थान पर है। सबसे छोटा महासागर आर्कटिक है।”

रुककर सोचिए: क्या सभी महासागर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, या उनके बीच कोई विभाजन है?

उत्तर (किताब से): “ये वास्तव में अलग-अलग नहीं हैं।” अध्याय के अंत में भी: “महासागर आपस में जुड़े हुए हैं।”

6. भारत के दोनों ओर हिंद महासागर

(पृष्ठ 33)

अब हिंद महासागर को ध्यान से देखिए। “जैसा कि महासागरों के मानचित्र से स्पष्ट है कि हिंद महासागर का विस्तार उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व में आस्ट्रेलिया एवं दक्षिण में दक्षिणी महासागर तक है।”

भारत के पश्चिम में इसका एक भाग अरब सागर है और पूर्व में दूसरा भाग बंगाल की खाड़ी। चित्र 2.4 में भारत का मानचित्र है, जिसमें ये दोनों दिखाए गए हैं, और साथ में भारत के दो प्रमुख द्वीप समूह भी: अरब सागर में लक्षद्वीप द्वीप समूह और बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।

7. महासागर और आपदाएँ

(पृष्ठ 33–34)

चित्र 2.1 को फिर से देखिए। पूरी पृथ्वी पर कुछ सफ़ेद आकृतियाँ दिखती हैं।

रुककर सोचिए: ये सफ़ेद आकृतियाँ क्या हैं?

उत्तर (किताब से): “वे बादलों के विशाल समूह हैं। ये बादल महाद्वीपों में वर्षा लाते हैं।”

भारत के लिए यह बहुत बड़ी बात है: “भारत में होने वाली अपेक्षित मानसूनी वर्षा महासागरों से उत्पन्न होती है। इस वर्षा के अभाव में हमारी कृषि और पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।”

पर महासागर केवल वर्षा ही नहीं देते, तूफ़ान भी देते हैं: बहुत ज़्यादा वर्षा वाली विनाशकारी घटनाएँ, या “अति प्रचंड हवाएँ जैसे कि चक्रवात”। ये दुनिया के तटीय क्षेत्रों में दूर-दूर तक क्षति पहुँचाते हैं।

दूसरी आपदा है सुनामी। “एक अन्य प्राकृतिक आपदा सुनामी भी समुद्र में उत्पन्न होती है। यह विशाल और शक्तिशाली तरंगें होती हैं जो महासागर तल में तीव्र भूकंप अथवा ज्वालामुखी के फटने के कारण आती हैं। सुनामी हजारों किलोमीटर तक जाकर तटीय क्षेत्रों को डुबा सकती है जिससे व्यापक स्तर पर हानि होती है।”

किताब एक सच्ची घटना बताती है: “26 दिसंबर 2004 के दिन, हिंद महासागर के आस-पास भारत और अन्य 13 देश प्रचंड सुनामी से प्रभावित हुए। यह सुनामी इंडोनेशिया में आए भूकंप के कारण आई थी। इस आपदा में दो लाख से अधिक लोगों की जान गई।” भारत में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, तमिलनाडु और केरल के तटीय क्षेत्र इससे बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए, और जान-माल की बहुत क्षति हुई।

क्या इससे बचाव हो सकता है? “इस प्रकार की सुनामी कभी-कभी आती है, किंतु यह अत्यंत विध्वंसकारी होती है। हालाँकि तट से टकराने से पहले इसका अनुमान लगाया जा सकता है।” बहुत से देश पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए मिल-जुलकर काम कर रहे हैं। भारत समेत बहुत से देश हिंद महासागर सुनामी चेतावनी प्रणाली में सहयोग कर रहे हैं। “इससे जान-माल की रक्षा करने के उपायों में सहायता मिलती है।”

ऐसी घटनाओं के लिए किताब एक शब्द देती है, आपदा प्रबंधन: “जिन घटनाओं के कारण जान और माल की क्षति होती है, उन्हें आपदा प्रबंधन के अंतर्गत नियंत्रित किया जाता है।” और “भारत में सभी प्रकार की आपदाओं का सामना करने के लिए ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ है”।

8. महाद्वीप कितने हैं?

(पृष्ठ 34–35)

चित्र 2.3 में महाद्वीप गिनिए। कितने हुए? किताब कहती है: “इसका उत्तर इतना सरल नहीं है क्योंकि इनकी गिनती कई प्रकार से की जा सकती है। यह हमारी रुचि पर निर्भर करता है कि हम चार से सात के बीच किसी भी संख्या की सूची बना सकते हैं!”

किताब इसके तीन कारण देती है:

  • उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका सामान्यत: दो महाद्वीप गिने जाते हैं, पर देखा जाए तो दोनों एक ही भूखंड हैं, इसलिए इन्हें एक भी समझा जा सकता है।
  • यूरोप और एशिया सामान्यत: दो महाद्वीप माने जाते हैं, जबकि मानचित्र में साफ़ दिखता है कि ये एक ही भूखंड हैं। “ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से यूरोप का विकास एशिया के विकास से बहुत भिन्न प्रकार से हुआ है”, इसलिए इन्हें दो महाद्वीप माना जा सकता है। पर भूगर्भशास्त्री सामान्यत: इन्हें एक ही महाद्वीप मानते हैं, जिसका नाम यूरेशिया है।
  • अफ्रीका और यूरेशिया को “सामान्यत: दो महाद्वीप समझा जाता है और कभी-कभी एक भी समझा जाता है।”

किताब की तालिका “महाद्वीपों की गिनती” चारों तरीक़े एक साथ दिखाती है:

गिनतीमहाद्वीप
चार महाद्वीपअफ्रीका-यूरेशिया, अमेरिका, अंटार्कटिका, आस्ट्रेलिया
पाँच महाद्वीपअफ्रीका, अमेरिका, अंटार्कटिका, आस्ट्रेलिया, यूरेशिया
छह महाद्वीपअफ्रीका, अंटार्कटिका, आस्ट्रेलिया, यूरेशिया, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका
सात महाद्वीपअफ्रीका, अंटार्कटिका, आस्ट्रेलिया, एशिया, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, यूरोप

तो आख़िर कौन-सी गिनती चलती है? “व्यावहारिक रूप से सात महाद्वीपों की अंतिम सूची को ही व्यापक रूप से अपनाया और प्रयोग में लाया जाता है।”

हमारा निष्कर्ष: महासागरों की सीमाओं की तरह महाद्वीपों की गिनती भी प्रकृति ने तय नहीं की। किताब के शब्दों में, यह “हमारी रुचि पर निर्भर करता है”; फिर भी व्यवहार में सात वाली सूची ही सबसे ज़्यादा चलती है।

एक मज़ेदार उदाहरण: ओलंपिक के पाँच छल्ले। “ये छल्ले विश्व-भर से खिलाड़ियों के एकत्र होने का प्रतीक हैं।” इन्हें “पाँच बसे हुए महाद्वीपों” के लिए चुना गया था: अफ्रीका, अमेरिका, एशिया, आस्ट्रेलिया और यूरोप।

9. वर्गों में महाद्वीप

(पृष्ठ 35–36)

पृष्ठ 36 पर एक आरेख है, जिसमें सात महाद्वीप छोटे-छोटे वर्गों से बने हैं। किताब बताती है: “यह उनके वास्तविक आकार को नहीं, अपितु सापेक्षिक आकार को दर्शाता है।” यानी वर्ग असली क्षेत्रफल नहीं बताते; वे केवल यह दिखाते हैं कि कौन-सा महाद्वीप दूसरे से कितना बड़ा या छोटा है।

उत्तरी अमेरिकादक्षिणीअमेरिकायूरोपएशियाअफ्रीकाआस्ट्रेलियाअंटार्कटिका
सात महाद्वीपों का सापेक्षिक आकार, वर्गों में (वास्तविक आकार नहीं)किताब के पृष्ठ 36 के आरेख के आधार पर हमारा बनाया चित्र

रुककर सोचिए: किताब कहती है: “वर्गों की संख्या को गिनिए और सबसे बड़े एवं सबसे छोटे महाद्वीप का नाम बताइए।” पहले खुद गिनिए।

उत्तर (हमारा, किताब उत्तर नहीं देती): हमारी गिनती: एशिया 51, अफ्रीका 30, उत्तरी अमेरिका 21, दक्षिणी अमेरिका 18, अंटार्कटिका 13, यूरोप 11, आस्ट्रेलिया 8 वर्ग। सबसे बड़ा एशिया, सबसे छोटा आस्ट्रेलिया। अपनी गिनती इससे मिलाइए।

किताब यह भी कहती है: “आरेख में यूरोप और एशिया को एक ही रंग से भरिए और उसे यूरेशिया नाम दीजिए। उसके आकार की तुलना दक्षिणी अमेरिका से कीजिए।” यह आप अपनी कॉपी में करके देखिए।

10. द्वीप, और अंटार्कटिका में भारत

(पृष्ठ 36–37)

चित्र 2.2 और 2.3 को ध्यान से देखिए: महाद्वीपों में सारी भूमि नहीं आती। भूमि के कुछ छोटे-छोटे भाग छूट जाते हैं। “चारों ओर जल से घिरे हुए भूखंड को द्वीप कहा जाता है।”

पर महाद्वीप भी तो चारों ओर जल से घिरे हैं! किताब इसका उत्तर देती है: “महाद्वीप भी चारों ओर जल से घिरे होते हैं, किंतु आकार में बड़े होने के कारण उन्हें द्वीप नहीं कहा जाता है।” और “इस ग्रह पर विभिन्न आकार के लाखों द्वीप हैं।”

किताब तीन बातें और बताती है:

  • “विश्व का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड है (ग्लोब अथवा मानचित्र पर उसे ढूँढ़िए)।” उसका आकार समझने के लिए भारत के सबसे बड़े 10 राज्यों का क्षेत्रफल जोड़ना होगा।
  • “भारत में 1,300 से अधिक द्वीप हैं।” इनमें मुख्य रूप से दो द्वीप समूह हैं: बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और अरब सागर में लक्षद्वीप द्वीप समूह।
  • अंटार्कटिका ऐसा महाद्वीप है, “जहाँ की जलवायु बहुत अधिक ठंडी और कठोर है”। 1981 से भारतीय अंटार्कटिका कार्यक्रम के अंतर्गत वहाँ अन्वेषण हो रहा है। “1983 में भारत ने अंटार्कटिका में ‘दक्षिण गंगोत्री’ नामक पहला वैज्ञानिक बेस स्टेशन स्थापित किया था। बाद में दो और बेस स्टेशन स्थापित किए गए।” भारतीय वैज्ञानिकों के लगभग 40 दलों ने वहाँ ख़ासकर जलवायु और पर्यावरण के विकास पर शोध कार्य किए हैं। वैज्ञानिकों के आवास में एक पुस्तकालय और डाकघर भी है।

11. महासागर और जीवन

(पृष्ठ 37)

“महासागर और महाद्वीप पर्यावरण के अत्यावश्यक भाग हैं। भले ही हम ध्यान न दें, पर ये हमारे जीवन के अधिकांश पक्षों को प्रभावित करते हैं।”

वर्षा: महासागरों से महाद्वीपों पर वर्षा होती है; “यह पृथ्वी के जलचक्र का भाग है जिसे आप आगे विज्ञान में पढ़ेंगे।” किताब साफ़ कहती है: “महासागरों के बिना वर्षा नहीं होगी तो पृथ्वी मरुस्थल बन जाएगी।”

साँस: “दुनिया-भर की आधी ऑक्सीजन महासागर का वनस्पति जगत उत्पन्न करता है। इसीलिए इन्हें ‘पृथ्वी के फेफड़े’ कहा जाता है।”

“इस प्रकार महासागर जलवायु को नियंत्रित और पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।”

लोग और महासागर: आरंभिक काल से ही लोगों ने एक जगह से दूसरी जगह जाने, हर तरह के सामान के व्यापार, सैनिक अभियानों और भोजन के लिए मछली पकड़ने के लिए महासागरों और सागरों की यात्रा की है। “महासागरों ने पूरी दुनिया के तटीय क्षेत्रों पर रहने वाले लोगों की संस्कृति को भी पोषित किया है।” इन संस्कृतियों की किंवदंतियों और कहानियों में समुद्र, समुद्री देवताओं और देवियों, समुद्री दैत्यों और समुद्र के कोषों की बातें मिलती हैं।

रुककर सोचिए: महासागरों को ‘पृथ्वी के फेफड़े’ क्यों कहते हैं?

उत्तर (किताब से): “दुनिया-भर की आधी ऑक्सीजन महासागर का वनस्पति जगत उत्पन्न करता है।”

12. महासागर को बचाना, हम सबका काम

(पृष्ठ 38)

संयुक्त राष्ट्र ने 8 जून को विश्व महासागर दिवस घोषित किया है, “हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में महासागर की महत्वपूर्ण भूमिका को याद रखने के लिए”। कारण यह है कि महासागर भोजन और औषधि के प्रमुख स्रोत हैं, और हमारे ग्रह के फेफड़े की तरह काम करते हैं।

पर महासागर ख़तरे में हैं। “वैज्ञानिक अध्ययनों से यह पता चलता है कि मानव की बढ़ती सामुद्रिक गतिविधियों ने महासागरों को प्रदूषित किया है। हम प्रतिवर्ष लाखों टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंकते हैं, जो समुद्री जीव-जंतुओं का जीवन संकट में डालता है।” इसके अलावा, “समुद्रों में आवश्यकता से अधिक मछली पकड़ना भी समुद्री जीवन के पतन का एक और कारण है।”

इसलिए किताब कहती है: “हम सभी का सामूहिक दायित्व है कि पृथ्वी और मानवता के भविष्य के लिए महासागरों को बचाने का प्रयास करें।”

13. पूरा अध्याय तीन बातों में

(पृष्ठ 38)

अध्याय के अंत में “आगे बढ़ने से पहले…” में किताब पूरा अध्याय तीन बातों में समेटती है:

  1. “पृथ्वी की सतह पर विस्तृत जलाशयों को ‘महासागर’ और विशाल भूखंडों को ‘महाद्वीप’ कहा जाता है। महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। महाद्वीपों को विभिन्न प्रकार से गिना जा सकता है, किंतु सामान्यत: इन्हें सात महाद्वीपों के रूप में गिना जाता है।”
  2. “दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में उत्तरी गोलार्ध में स्थल भाग अधिक है।”
  3. “महासागर सभी प्रकार के समुद्री जीवन को पोषित करते हैं और विश्व की जलवायु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत्यधिक मानवीय गतिविधियों के कारण इन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और इन्हें सामूहिक रूप से संरक्षित करने की आवश्यकता है।”

अब अध्याय के अंत में दिए किताब के प्रश्न खुद हल कीजिए।