अध्याय 3स्थलरूप एवं जीवन

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NCERT — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, अध्याय 3, पृ. 41–58

⛔ यह छात्र-सामग्री नहीं है।

यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है और न उसका विकल्प। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में — जिज्ञासु पाठक, प्रतियोगी परीक्षा की ओर जाने वाले विद्यार्थी और शिक्षक के लिए, जो पूरी कहानी एक साथ देखना चाहते हैं।

परीक्षा पाठ्यपुस्तक से बनती है। यहाँ की कोई बात उत्तर-पुस्तिका में नहीं जाती।

1. एक सवाल जो नक़्शे में नहीं दिखता

नक़्शा देखिए तो पृथ्वी की सतह रंगों में बँटी दिखती है — भूरा, हरा, नारंगी। पर नक़्शा एक बात नहीं बताता: वहाँ खड़े होकर देखने पर क्या दिखेगा?

एक ही देश के भीतर, कुछ सौ किलोमीटर चलकर, ज़मीन पूरी तरह बदल जाती है। कहीं वह आपके ऊपर उठ जाती है और साँस लेना कठिन कर देती है। कहीं वह क्षितिज तक सपाट फैली रहती है। कहीं वह ऊँची है पर ऊपर से मेज़ की तरह चपटी।

और — यही असली बात है — जहाँ ज़मीन बदलती है, वहाँ लोगों का जीवन भी बदल जाता है। वे अलग अनाज उगाते हैं, अलग घर बनाते हैं, अलग काम करते हैं, अलग गीत गाते हैं।

यह अध्याय उसी एक बात के इर्द-गिर्द है: ज़मीन का आकार और उस पर का जीवन एक ही कहानी के दो हिस्से हैं।

2. तीन आकार, और उनके नाम

ज़मीन जितनी विविध दिखती है, उसे मोटे तौर पर तीन रूपों में बाँटा जा सकता है।

पर्वत आस-पास की भूमि से काफ़ी ऊँचे उठे होते हैं। उनका आधार चौड़ा होता है, ढलान खड़ी, और शिखर सँकरे। बहुत ऊँचे पर्वतों की चोटियाँ स्थायी रूप से हिम से ढँकी रहती हैं, क्योंकि वहाँ इतनी ठंड है कि हिम कभी पिघलती ही नहीं।

पठार भी उठे हुए होते हैं, पर ऊपर से चपटे। उन्हें एक ऊँची मेज़ समझिए — किनारे खड़े, ऊपर समतल। ऊँचाई कुछ सौ मीटर से लेकर कई हज़ार मीटर तक हो सकती है।

मैदान फैले हुए और सपाट होते हैं — कहीं-कहीं हल्के लहरदार। न ऊँची पहाड़ियाँ, न गहरी घाटियाँ। सामान्यत: वे समुद्र तल से तीन सौ मीटर से ऊपर नहीं उठते।

एक चौथा भी है, जिसे तीन की सूची अक्सर छोड़ देती है — मरुस्थल। वह ऊँचाई से नहीं, पानी की कमी से पहचाना जाता है। यही कारण है कि गोबी ठंडा मरुस्थल है और कुछ वैज्ञानिक अंटार्कटिका को भी मरुस्थल मानते हैं। मरुस्थल का अर्थ गर्म रेत नहीं, सूखी ज़मीन है।

3. ये आकार बने कैसे — दो अलग-अलग कहानियाँ

यहाँ एक बात ध्यान देने लायक है: पर्वत और मैदान बिलकुल उलटी प्रक्रियाओं से बनते हैं।

पर्वत — ज़मीन के ऊपर उठने से

पृथ्वी की ऊपरी परत बड़े-बड़े टुकड़ों में बँटी है जो बहुत धीरे-धीरे खिसकते रहते हैं। जहाँ दो टुकड़े आपस में टकराते हैं, वहाँ बीच की ज़मीन दबकर मुड़ जाती है और ऊपर उठ जाती है — जैसे मेज़पोश को दोनों ओर से दबाने पर बीच में सिलवटें बन जाती हैं।

हिमालय इसी तरह बना, और वह टक्कर आज भी चल रही है — इसीलिए हिमालय आज भी ऊँचा हो रहा है।

पर साथ-साथ एक दूसरी प्रक्रिया भी चलती है: अपरदन। हवा, पानी और बर्फ़ पहाड़ों को लगातार घिसते रहते हैं। जो पर्वत नए हैं, उनकी चोटियाँ नुकीली हैं — घिसने का समय नहीं मिला। जो पुराने हैं, वे गोल हो चुके हैं।

यही भारत के दो पर्वतों का अंतर है। हिमालय नया है — ऊँचा और नुकीला। अरावली बहुत पुरानी है — छोटी और गोल। अरावली कभी हिमालय जैसी रही होगी; करोड़ों वर्ष के अपरदन ने उसे घिस दिया। और करोड़ों वर्ष बाद हिमालय भी वैसा ही दिखेगा।

पठार भी इसी उठने की प्रक्रिया से बनते हैं — या फिर लावा के परत-दर-परत जमने से, जैसे भारत का दक्कन का पठार।

मैदान — ज़मीन के जमा होने से

मैदान की कहानी उलटी है। वे उठकर नहीं, भरकर बनते हैं।

पर्वतों से नदियाँ निकलती हैं। उतरते समय वे रास्ते की चट्टानें घिसती हैं और अपने साथ रेत, पत्थर के कण और महीन गाद बहा लाती हैं। इन सबका साझा नाम है — तलछट।

जब नदी पहाड़ों से उतरकर समतल में पहुँचती है, उसका बहाव धीमा पड़ जाता है, और वह अपना बोझ वहीं छोड़ देती है। बाढ़ आती है तो वह तलछट दूर-दूर तक बिछ जाता है। यह हज़ारों वर्ष चलता रहता है, और धीरे-धीरे एक विशाल सपाट, गहरी, उपजाऊ ज़मीन बन जाती है।

तो पर्वत और मैदान अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं — एक ही प्रक्रिया के दो सिरे हैं। पहाड़ों से जो घिसकर निकलता है, वही मैदान बनाता है। गंगा का मैदान असल में हिमालय का ही बहकर आया हुआ हिस्सा है।

यह इस पूरे विषय का सबसे सुंदर विचार है, और पाठ्यपुस्तक इसे कहती नहीं — दोनों तथ्य वह अलग-अलग पन्नों पर रख देती है।

4. और अब असली सवाल — इससे जीवन कैसे बदलता है

अब ध्यान दीजिए कि हर आकार अपने साथ एक आर्थिक नियति लेकर आता है।

पर्वतों पर

ज़मीन ढलान वाली और ऊबड़-खाबड़ है, इसलिए बड़े खेत बन ही नहीं सकते। नियमित खेती केवल घाटियों में हो पाती है। ढलानों पर लोग एक चतुर उपाय निकालते हैं — ढलान को काटकर सीढ़ियाँ बना देते हैं, ताकि हर सीढ़ी पर एक छोटा समतल खेत बन जाए। भारत में इसे वेदिका कृषि कहते हैं, और यह दुनिया के हर पहाड़ी इलाक़े में किसी न किसी रूप में मिलती है।

पर जहाँ खेती इतनी सीमित हो, वहाँ लोग दूसरे रास्ते खोजते हैं: पशुपालन — जानवर ढलान पर चल सकते हैं, हल नहीं चल सकता। और आधुनिक समय में पर्यटन — क्योंकि पहाड़ की जो चीज़ खेती के लिए बाधा है (ऊँचाई, ढलान, ठंड), वही देखने आने वालों के लिए आकर्षण है।

पठारों पर

पठार की मिट्टी अक्सर पतली और चट्टानी होती है, इसलिए वह खेती के लिए उतनी अच्छी नहीं। पर इसी चट्टान में एक दूसरा ख़ज़ाना है — खनिज। दुनिया की सबसे बड़ी खानें पठारों पर हैं। भारत में छोटा नागपुर का पठार लोहे, कोयले और मैंगनीज के लिए जाना जाता है; अफ्रीका का पूर्वी पठार सोने और हीरे के लिए।

इसका एक अपवाद है, और वह महत्वपूर्ण है: जो पठार लावा से बने हैं, उनकी मिट्टी काली और उपजाऊ होती है। भारत का दक्कन का पठार ऐसा ही है — और इसीलिए वहाँ कपास इतनी अच्छी होती है।

पठारों की एक और पहचान है जल प्रपात। जहाँ नदी पठार के किनारे से नीचे गिरती है, वहाँ ऊँचाई अचानक बदलती है और पानी छलाँग लगा देता है।

मैदानों में

यहाँ मिट्टी गहरी और उपजाऊ है, ज़मीन समतल है, पानी पास है। इसलिए मैदान खेती के लिए बने हुए हैं — और इसीलिए दुनिया की अधिकांश आबादी मैदानों में रहती है।

यह कोई नई बात नहीं है। मानव इतिहास की आरंभिक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के किनारे ही पनपीं — मिस्र में नील के, मेसोपोटामिया में दजला-फ़रात के, और भारत में सिंधु व गंगा के। हज़ारों साल बाद भी वही तर्क काम कर रहा है: भारत की एक-चौथाई से अधिक आबादी अकेले गंगा के मैदान में रहती है।

समतल ज़मीन का एक और लाभ है जिसे लोग भूल जाते हैं — नदी में नाव चलाना आसान हो जाता है। सड़कों और रेलों से पहले, नदियाँ ही रास्ते थीं। भारत के बहुत से पुराने नगर इसी कारण नदी के किनारे बसे हैं।

5. जहाँ हर लाभ अपनी क़ीमत लेकर आता है

अब कहानी का वह मोड़, जो इसे केवल भूगोल से कुछ अधिक बनाता है।

हर स्थलरूप जो अवसर देता है, वही उसकी चुनौती भी बन जाता है।

पहाड़ों में: वही ढलान जो सुंदर दृश्य बनाती है, बारिश में भूस्खलन बन जाती है — चट्टान का बड़ा टुकड़ा टूटकर गिर पड़ना। वही बर्फ़ जो पर्यटक खींचती है, पिघलना शुरू होते ही हिमस्खलन बन सकती है। और वही पर्यटन जो कमाई देता है, भीड़ बनकर पहाड़ के पर्यावरण पर बोझ डाल देता है।

ध्यान दीजिए कि इनमें से एक चुनौती प्रकृति की नहीं, हमारी बनाई हुई है। बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, बर्फ़बारी, ठंड — ये पहाड़ के अपने हैं। बेक़ाबू भीड़ हमारी देन है। यही अंतर उस पूरे पन्ने का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।

मैदानों में: वही सिंचाई जिसने पैदावार बढ़ाई, ज़मीन के नीचे का पानी खींचती चली गई। नहरें बनीं, पंप लगे, फ़सल बढ़ी — और भूजल का स्तर गिरता चला गया। आज उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह खेती के भविष्य पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है। साथ में बढ़ती आबादी और प्रदूषण।

दोनों उदाहरणों का ढाँचा एक ही है: “इससे लाभ हुआ, किंतु इसी से यह समस्या भी आई।”

6. और फिर भी लोग वहीं रहते हैं

तो एक सवाल बचता है: जब पहाड़ों पर भूस्खलन है, बर्फ़ है, ठंड है, खेती की जगह नहीं है — तो लोग वहाँ रहते ही क्यों हैं?

वही सवाल मरुस्थल के बारे में और भी तीखा है। पानी नहीं, छाया नहीं, खेती लगभग असंभव। फिर भी थार में गाँव हैं, और उन गाँवों में लोक गीत हैं, कहानियाँ हैं, त्योहार हैं — एक पूरी समृद्ध संस्कृति, उस ज़मीन पर जिसे बाहर से देखने पर “खाली” कह दिया जाता है।

इसका उत्तर दो शब्दों में है।

अनुकूलन — स्थिति के अनुसार ख़ुद को ढाल लेना। ढलान पर सीढ़ीदार खेत बना लेना। जहाँ हल नहीं चलता, वहाँ भेड़-बकरी पाल लेना। जहाँ पानी नहीं, वहाँ पानी सँभालकर रखना सीख लेना।

लचीलापन — कठिनाई के सामने टूट न जाना, बल्कि उसके हिसाब से बदल जाना।

मनुष्य ने हर तरह की ज़मीन पर अपना घर बना लिया है — बर्फ़ीली चोटियों पर, चट्टानी पठारों पर, बाढ़ वाले मैदानों में, और रेत के समुद्र में। यही इस पूरे विषय का निचोड़ है, और यही कारण है कि यह भूगोल का नहीं, मनुष्य का अध्याय है।

7. एक और नज़र — जिसमें भूगोल और संस्कृति अलग नहीं

अंत में एक बात, जो अक्सर छूट जाती है।

हम सोचते हैं कि “ज़मीन का अध्ययन” और “संस्कृति का अध्ययन” दो अलग विषय हैं। प्राचीन तमिल कवि ऐसा नहीं सोचते थे।

संगम काल के तमिल साहित्य में देश को पाँच तिणै में बाँटा गया — पाँच दृश्यभूमियाँ, और हर एक के साथ जुड़ा एक जीवन-ढंग, एक व्यवसाय, यहाँ तक कि एक मनोदशा। पहाड़ों का अपना, जंगलों-चरागाहों का अपना, उपजाऊ खेतों का अपना, समुद्र-तट का अपना, और सूखे प्रदेश का अपना।

यह वर्गीकरण भूगोल का भी है और साहित्य का भी। यह मानता है कि जिस ज़मीन पर आप रहते हैं, वह तय करती है कि आप क्या करेंगे, क्या गाएँगे, किस देवता को पूजेंगे — और यही बात इस पूरे अध्याय में हम अलग-अलग रूपों में देखते आए हैं।

भारतीय परंपरा में इसके और उदाहरण हैं। अथर्ववेद का भूमि सूक्त पृथ्वी को माता कहता है और उसकी ऊँचाइयों, ढलानों और समतल भूमि की स्तुति करता है। कालिदास हिमालय को पर्वतों का राजा और पृथ्वी को नापने का मापदंड कहते हैं। दुनिया-भर के समुदाय पर्वतों को पवित्र मानते हैं — एवरेस्ट को तिब्बती जगत जननी कहकर पूजते हैं, कैलाश को चार अलग-अलग परंपराएँ पवित्र मानती हैं। और भारत में नदियों के संगम पर मेले लगते हैं।

ज़मीन केवल वह चीज़ नहीं जिस पर हम खड़े हैं। वह वह चीज़ है जिसने हमें बनाया।

8. पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में

पृथ्वी की सतह मुख्यत: तीन रूप लेती है — पर्वत, जो प्लेटों के टकराने से ऊपर उठते हैं और अपरदन से धीरे-धीरे घिसते हैं; पठार, जो उठे हुए पर ऊपर से चपटे होते हैं और अपने भीतर खनिजों का ख़ज़ाना रखते हैं; और मैदान, जो पर्वतों से घिसकर आए तलछट के जमा होने से बनते हैं और इसीलिए सबसे उपजाऊ होते हैं। एक चौथा रूप मरुस्थल है, जिसकी पहचान ऊँचाई नहीं, पानी की कमी है। हर रूप वहाँ के जीवन को तय करता है — पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती, पशुपालन और पर्यटन; पठारों पर खनन; मैदानों में खेती और घनी आबादी। और हर रूप अपने अवसर के साथ एक चुनौती भी लाता है — पहाड़ों में भूस्खलन और भीड़ का दबाव, मैदानों में गिरता भूजल। फिर भी मनुष्य हर जगह बस गया है, क्योंकि वह अनुकूलन करता है और उसमें लचीलापन है — और जिस ज़मीन पर वह बसता है, वह उसकी संस्कृति में उतर जाती है।

9. जो इस अध्याय में सत्यापित नहीं हो सका

यह भाग जान-बूझकर रखा गया है। जो नहीं पता, उसे “नहीं पता” कहना ही ईमानदार लेखन है।

  1. पर्वत, पठार और मैदान की कोई सर्वमान्य संख्यात्मक सीमा नहीं है। ऊपर जो “तीन सौ मीटर” मैदानों के लिए कहा गया है, वह एक सामान्य परिपाटी है, नियम नहीं; अलग-अलग देश अलग सीमाएँ मानते हैं।
  2. हिमालय के उठने की दर पर स्रोत भिन्न-भिन्न मान देते हैं, और उसमें से अपरदन कितना काट लेता है, यह भी क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलता है। इसीलिए ऊपर कोई संख्या नहीं दी गई।
  3. भूजल की गिरावट का परिमाण उपग्रह-आधारित अध्ययनों से नापा जाता है, पर अनुमान आपस में मेल नहीं खाते और कुछ बाद के अध्ययनों ने पहले के अनुमानों को अधिक बताया है। इसलिए यहाँ केवल प्रवृत्ति दर्ज है, कोई आँकड़ा नहीं।
  4. दक्कन के ज्वालामुखी उद्गार और डायनासोर के विलुप्त होने के बीच कारण-संबंध पर वैज्ञानिकों में अब भी बहस है। ऊपर केवल इतना कहा गया है कि दोनों एक ही कालखंड की घटनाएँ हैं — इससे आगे कोई दावा नहीं।
  5. तिणै के पाँचों नामों की सटीक अर्थ-छाया अनुवाद-दर-अनुवाद बदलती है, और उनसे जुड़े देवता व मनोभाव अलग-अलग संगम ग्रंथों में एक जैसे नहीं हैं। ऊपर केवल दृश्यभूमि और व्यवसाय का संबंध लिया गया है, जो सभी विवरणों में साझा है।