अध्याय 6भारतीय सभ्यता का प्रारंभ

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यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।

एक अजीब-सी शुरुआत

अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं को हम उनके शब्दों से जानते हैं।

मिस्र ने अपने मंदिरों की दीवारों पर लिख छोड़ा कि उनके राजा कौन थे और उन्होंने क्या किया। मेसोपोटामिया ने मिट्टी की पट्टियों पर अपने क़र्ज़ के हिसाब, अपनी कविताएँ और अपने राजाओं की सूचियाँ छोड़ीं। यहाँ तक कि उनके स्कूल के बच्चों की अभ्यास-पट्टियाँ भी मिली हैं।

भारत की पहली सभ्यता ने भी लिखा — और हम उसका एक अक्षर नहीं पढ़ सकते।

उनकी हज़ारों मुहरों पर चिह्न बने हैं। वे चिह्न स्पष्ट हैं, दोहराए जाते हैं, किसी व्यवस्था का पालन करते हैं। वह लेखन है, इसमें संदेह नहीं। पर आज तक कोई नहीं जानता कि उनका अर्थ क्या है।

इसलिए यह उन सभी चीज़ों की कहानी है जो हम उन लोगों के बारे में जानते हैं, बिना यह जाने कि उन्होंने अपने बारे में क्या कहा।

और आश्चर्य यह है कि हम बहुत कुछ जानते हैं।

पहले, ज़मीन

आज के पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत में एक विशाल मैदान फैला है, जिसे सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियाँ — झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज — सींचती हैं। नदी ने सदियों तक गाद बिछाई, और मिट्टी उपजाऊ बनती चली गई।

इस मैदान के पूर्व में एक और नदी बहती थी — सरस्वती। वह हिमालय की तलहटी से निकलकर आज के हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों से होकर जाती थी। आज उसका जो बचा है, उसे भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हाकरा कहते हैं — और वह अब केवल बरसात में बहती है।

यह नदी इस कहानी के आरंभ में भी है और अंत में भी। सबसे पुराने ग्रंथ ऋग्वेद में उसका वर्णन है — एक देवी के रूप में भी, और पर्वत से समुद्र तक बहने वाली एक नदी के रूप में भी। और बाद के ग्रंथ उसके सूखने की, अंतत: लुप्त हो जाने की बात करते हैं।

इन दो नदियों के बीच की ज़मीन पर वह हुआ, जो इस उपमहाद्वीप में पहले कभी नहीं हुआ था।

गाँव, जो नगर बन गए

यह अचानक नहीं हुआ। यह दो छलाँगों में हुआ, और दोनों की तारीख़ें हमें पता हैं।

पहली छलाँग — 3500 सा.सं.पू. के आस-पास। इस पूरे क्षेत्र में गाँव नगरों में बदलने लगे। खेती इतनी अच्छी होने लगी कि अन्न बच जाता था, और जहाँ अन्न बचता है वहाँ कुछ लोग खेती छोड़कर कुछ और कर सकते हैं — बर्तन बना सकते हैं, मनके घिस सकते हैं, ईंटें पका सकते हैं।

दूसरी छलाँग — लगभग 2600 सा.सं.पू.। और इस बार का कारण अलग था: व्यापार। जैसे-जैसे सामान का लेन-देन बढ़ा, नगर महानगरों में बदल गए।

इसी को ‘भारत का पहला नगरीकरण’ कहा जाता है।

अगले सात सौ वर्षों तक — लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू. — यह सभ्यता अपने चरम पर रही। उस समय मेसोपोटामिया की सभ्यता को लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष हो चुके थे, और मिस्र के पिरामिड बन चुके थे। यह उन्हीं की समकालीन थी, और उन्हीं जितनी बड़ी।

नगर कैसे बने

यहाँ पहली बात जो चौंकाती है वह यह नहीं कि नगर बड़े थे। वह यह है कि वे योजना बनाकर बने थे।

सड़कें चौड़ी थीं और आम तौर पर चारों दिशाओं की ओर जाती थीं — यानी किसी ने पहले नक़्शा सोचा, फिर मकान बने। अधिकांश नगरों के चारों ओर किलेबंदी थी। नगर के दो हिस्से मिलते हैं — एक ऊँचाई पर, जिसे ‘ऊपरी नगर’ कहते हैं और जहाँ शायद शासक-वर्ग रहता था, और एक ‘निचला नगर’, जहाँ बाक़ी लोग।

और फिर वह बात आती है जो सबसे अधिक विचारणीय है।

नगरों में छोटे घर भी थे और बड़े घर भी — यह स्वाभाविक है। पर बड़े और छोटे, दोनों के निर्माण की गुणवत्ता एक जैसी मिलती है। ईंटें वैसी ही, चिनाई वैसी ही। बड़े घर में ज़्यादा कमरे हैं, पर वह बेहतर बना हुआ नहीं है।

पुरातत्वविद् बी.बी. लाल ने इसी को देखकर लिखा था कि यह “एक सम्यक रूप से संतुलित समुदाय” था, “जहाँ धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है”, और यह कि हड़प्पा के सामाजिक परिदृश्य में “शोषण नहीं, बल्कि आपसी सामंजस्य दिखाई देता है।”

यह अपने समय में असामान्य था। मिस्र में राजा के लिए पहाड़ जितना मक़बरा बनता था और मज़दूर कच्ची झोपड़ी में रहता था। यहाँ ऐसा कुछ नहीं मिलता — कोई पिरामिड नहीं, कोई विशाल राजमहल नहीं, कोई भव्य मक़बरा नहीं।

और पानी

यदि इस सभ्यता की एक ही चीज़ याद रखनी हो, तो वह पानी है।

हर घर में अपना स्नानागार था। यह पाँच हज़ार साल पहले की बात है। और इस्तेमाल हुआ पानी बहकर कहीं भी नहीं जाता था — वह सड़कों के नीचे बनी ढँकी नालियों में जाता था। पूरे नगर के नीचे जल-निकास का एक जाल बिछा था।

मोहनजो-दड़ो में लोग ईंटों से बने कुओं से पानी निकालते थे। उन कुओं की ईंटें नुकीली, शंक्वाकार बनाई गई थीं ताकि गोल दीवार बने और वह अपने ही दबाव से टिकी रहे। वे कुएँ आज भी खड़े हैं।

और वहीं मोहनजो-दड़ो में वह चीज़ है जिसे ‘महास्नानागार’ कहते हैं — 12 × 7 मीटर का एक पक्का कुंड, जिसकी ईंटों पर प्राकृतिक बिटुमेन की जल-रोधक परत चढ़ी है, ताकि पानी रिसे नहीं। उसके चारों ओर छोटे कमरे हैं, एक कमरे के भीतर कुआँ है, और एक कोने में नाली है जिससे पानी खाली किया जाता था।

यह किसलिए बना था, यह आज तक तय नहीं हुआ है। हम इस पर लौटेंगे।

पर पानी की सबसे प्रभावशाली कहानी धौलावीरा की है।

धौलावीरा गुजरात में, कच्छ के रन में है — एक बहुत शुष्क जगह, जहाँ पानी कम है और नमक ज़्यादा। वहाँ बसना एक कठिन निर्णय था। और उन्होंने वह निर्णय लेकर, पहले पानी की व्यवस्था बनाई।

उन्होंने कम से कम छह विशाल जलाशय बनाए — कुछ पत्थरों से चिनकर, कुछ सीधे चट्टान काटकर। सबसे बड़ा 73 मीटर लंबा है, यानी एक साधारण कक्षा से लगभग दस गुना। और इनमें से अधिकांश को भूमिगत नालियों से जोड़ा गया था — ताकि पानी सिर्फ़ इकट्ठा न हो, बल्कि जहाँ चाहिए वहाँ पहुँचे भी।

यह एक दिन की योजना नहीं है। यह पीढ़ियों की सोच है।

वे क्या खाते थे

उन्होंने जौ और गेहूँ उगाया। दालें और तरह-तरह की सब्ज़ियाँ भी। मोटे अनाज और बाजरा। और कभी-कभी धान।

और उन्होंने कपास उगाई — पूरे यूरेशिया में सबसे पहले। उससे उन्होंने कपड़ा बुना।

उन्होंने खेती के औज़ार बनाए, हल भी। और हमें यह कैसे पता? क्योंकि हरियाणा के बनावली में मिट्टी का बना हल का एक छोटा-सा प्रतिरूप मिला है — शायद किसी बच्चे का खिलौना, शायद किसी की भेंट। एक खिलौने ने हमें बता दिया कि उनके पास हल था।

उन्होंने पशु पाले और मछली पकड़ी — यह हमें खुदाई में मिली हड्डियों और मत्स्य जीवाश्मों से पता चला।

पर सबसे मज़ेदार बात बर्तनों से आई।

पुरातत्वविदों ने उनके खाना पकाने के मिट्टी के बर्तनों की रासायनिक जाँच की — यह देखने के लिए कि बर्तन की दीवारों में क्या सोख लिया गया है। कुछ अपेक्षित निकला: दूध के उत्पाद।

और कुछ अनपेक्षित: हल्दी। अदरक। केले।

यानी उस रसोई की गंध, जो आज हमारे घरों में आती है, चार हज़ार साल पुरानी है।

दुनिया के साथ लेन-देन

अब उस सवाल पर आइए जिसने नगरों को महानगर बनाया।

हड़प्पावासी अपने नगरों के बीच तो व्यापार करते ही थे, वे भारत के बाहर की सभ्यताओं के साथ भी व्यापार करते थे। और इसके प्रमाण भारत में नहीं — भारत के बाहर मिलते हैं। यही उन्हें इतना पक्का बनाता है।

सूसा में, जो आज ईरान में है, खुदाई में कार्नेलियन के मनके मिले — वह लाल पत्थर, जो अधिकतर गुजरात में मिलता है। ओमान के तट पर हाथी दाँत का एक कंघा मिला, लगभग सात सेंटीमीटर का — हड़प्पा का बना हुआ।

कोई सामान अपने-आप हज़ारों किलोमीटर नहीं चलता। कोई उसे ले गया था।

वे क्या भेजते थे? आभूषण, लकड़ी, रोज़मर्रा की चीज़ें, शायद सोना और कपास, कुछ खाने की चीज़ें।

और बदले में क्या आता था? यह हमें नहीं पता। शायद तांबा — क्योंकि उनके पास तांबा बहुत नहीं था और वे उसका ख़ूब इस्तेमाल करते थे। पर यह अनुमान है, प्रमाण नहीं।

(इसका एक कारण भी है: तांबे जैसी धातु पिघलाकर बार-बार इस्तेमाल हो जाती है। जो चीज़ दोबारा गला दी जाए, वह ज़मीन में मिलती नहीं।)

वे कारीगर

उनका सबसे प्रिय आभूषण कार्नेलियन के मनके थे। पर पत्थर से मनका बनाना आसान है — उसमें छेद करना कठिन है। पत्थर सख़्त होता है और महीन छेद करते ही टूट जाता है। हड़प्पा के कारीगरों ने उसकी तकनीक विकसित की, ताकि धागा डाला जा सके।

उन्होंने शंख से चूड़ियाँ बनाईं। शंख का खोल सख़्त होता है — उसे काटकर, गोल घिसकर, बिना तोड़े चूड़ी बना लेना परिष्कृत तकनीक माँगता है।

और उन्होंने तांबे में टिन मिलाकर कांस्य बनाया, जो तांबे से कहीं अधिक कठोर होता है — और उससे औज़ार और बर्तन ढाले।

और मुहरें

जब हज़ारों किलोमीटर दूर सामान भेजा जाता है, तो एक समस्या खड़ी होती है: किसका माल कौन-सा है?

इसका हल उन्होंने मुहरों से निकाला। खुदाई में हज़ारों छोटी मुहरें मिली हैं — कुछ सेंटीमीटर की, स्टीऐटाइट नामक मुलायम पत्थर की, जिसे गरम करके कठोर बना लिया जाता था। उन पर जानवरों की आकृतियाँ हैं — एक सींग वाला पशु, बैल, सींग वाला बाघ।

और उन पर लेखन के चिह्न भी हैं।

यहीं हम वहाँ लौटते हैं जहाँ से शुरू किया था।

समुद्र

एक बात और, जो आसानी से छूट जाती है।

व्यापार का बहुत-सा हिस्सा ज़मीन से और नदियों से हुआ। पर दूर के ठिकानों के लिए उन्होंने समुद्र का रास्ता लिया। गुजरात और सिंध के तटों पर उनकी कई बस्तियाँ मिलती हैं।

गुजरात की एक छोटी-सी बस्ती लोथल में एक विशाल संरचना मिली है — 217 मीटर लंबी और 36 मीटर चौड़ी। फ़ुटबॉल के दो मैदानों से ज़्यादा लंबी। एक छोटी बस्ती में इतनी बड़ी चीज़ — यही उसे इतना दिलचस्प बनाता है।

माना जाता है कि यह एक बंदरगाह था, जहाँ नावें आती-जाती थीं। (इस पर बहस भी हुई है — कुछ विद्वानों ने इसे सिंचाई का जलाशय कहा। पर उस संरचना की मिट्टी में समुद्री सूक्ष्म जीवाश्म, नमक और जिप्सम मिले, जिससे लगता है कि उसमें कभी समुद्र का पानी भरा था।)

यह भारत की पहली गहरी समुद्री गतिविधि थी। जो देश आगे चलकर सदियों तक हिंद महासागर में व्यापार करेगा, उसकी शुरुआत यहाँ है।

उनकी चीज़ें

पुरातत्व की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह इमारतें देता है, लोग नहीं। पर कभी-कभी कोई छोटी चीज़ मिल जाती है और अचानक लोग दिख जाते हैं।

धौलावीरा से एक कांस्य का दर्पण मिला है। किसी ने उसमें अपना चेहरा देखा होगा।

वहीं से भार तौलने के पत्थर मिले हैं। ये देखने में सबसे उबाऊ चीज़ हैं और अर्थ में सबसे भारी — क्योंकि वे सब एक ही नाप के हैं। यानी किसी ने तय किया था कि एक तोला कितना होगा, और सबने वह माना। यह एक अनदेखे प्रशासन का सबसे पक्का निशान है।

वहीं से 25 सेंटीमीटर के एक पत्थर पर उकेरा हुआ खेल-बोर्ड मिला है। और राजस्थान के करनपुरा से मिट्टी की एक सीटी, लगभग चार सेंटीमीटर की।

कोई बच्चा उस सीटी को बजाता था।

फिर वे चीज़ें हैं जिन्हें समझना कठिन है। स्वास्तिक बनी एक मुहर। ऊँचे स्थान पर बैठे, शक्तिशाली पशुओं से घिरे एक त्रिमुखी आकृति की मुहर। नमस्ते की मुद्रा में बैठी पकी मिट्टी की एक मूर्ति।

और मोहनजो-दड़ो की वह छोटी कांस्य प्रतिमा — केवल 10.8 सेंटीमीटर ऊँची — जिसे दुनिया ‘नर्तकी’ कहती है। एक हाथ कमर पर, ठुड्डी उठी हुई, और एक पूरी बाँह चूड़ियों से ढँकी हुई।

वैसी ही चूड़ियाँ, जैसी आज भी गुजरात और राजस्थान में पहनी जाती हैं।

और उन्हीं में एक और मूर्ति है, जिसे लोग ‘पुरोहित राजा’ कहते हैं।

पर यहाँ रुकिए। वह नाम किसी ने बाद में दिया। मूर्ति पर ऐसा कुछ नहीं है जो बताए कि वह पुरोहित थी, या राजा, या कोई और। हम नहीं जानते कि वह किसकी है। यह नाम एक अनुमान है जो इतना दोहराया गया कि तथ्य जैसा लगने लगा।

फिर वह ख़त्म हो गई

लगभग 1900 सा.सं.पू. के आस-पास, इन सबके बावजूद, यह सब बिखरने लगा।

नगर एक के बाद एक खाली होते गए। जो लोग रहे, वे बदले हुए हालात में गाँव के ढंग पर लौट गए। और ऐसा लगता है कि जो भी सरकार या प्रशासन पहले था, वह अब नहीं रहा। लोग सैकड़ों छोटी-छोटी बस्तियों में बिखर गए।

क्यों?

बहुत समय तक यह सोचा जाता रहा कि किसी ने हमला किया होगा। यह एक आसान कहानी थी — नगर बने, कोई आया, नगर उजड़ गए।

पर वह कहानी प्रमाणों पर टिकती नहीं। किसी नगर के जलाए जाने का निशान नहीं मिलता, घेरे जाने का नहीं मिलता। और उनकी कला में युद्ध का कोई दृश्य नहीं है — न विजयी राजा, न बंदी, न सेना। (इसकी तुलना मिस्र और मेसोपोटामिया से कीजिए, जहाँ ऐसे दृश्यों की भरमार है।)

आज दो कारणों पर सहमति है, और दोनों हमला नहीं हैं। दोनों मौसम और पानी हैं।

पहला — जलवायु। लगभग 2200 सा.सं.पू. से एक बड़ा जलवायु परिवर्तन आया, जिसने पूरी दुनिया को छुआ: वर्षा घटी, सूखा बढ़ा। खेती कठिन हो गई, और नगरों तक जाने वाला अनाज कम पड़ने लगा। (यह अकेले भारत की बात नहीं थी — उसी दौर में मेसोपोटामिया का अक्कादी साम्राज्य और मिस्र का पुरातन साम्राज्य भी संकट में आए। एक ही मौसम ने तीनों को छुआ।)

दूसरा — सरस्वती। उस नदी का मध्य भाग सूख गया। और वहाँ बसे नगर — कालीबंगा और बनावली — अचानक छोड़ दिए गए।

नदी वहीं है जहाँ यह कहानी शुरू हुई थी।

और पाठ्यपुस्तक यहाँ एक ऐसी बात जोड़ती है जो कम पुस्तकें करती हैं: “इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे।” वह अपने ही निष्कर्ष को अंतिम नहीं कहती।

पर वह एक और बात कहती है, जो शायद अधिक महत्वपूर्ण है: ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं।

चार हज़ार साल पहले भी, अंतत:, बात बारिश की थी।

पर वह ख़त्म नहीं हुई

यहाँ इस कहानी का असली अंत है, और वह वैसा नहीं है जैसा लगता है।

नगर चले गए। लोग नहीं गए। और उनका बनाया-सीखा हुआ भी नहीं गया।

खेती की तकनीक रही। बर्तन बनाने का ढंग रहा। मनके, चूड़ियाँ, धातु का काम — सब आगे बढ़ा। यह सब भारतीय सभ्यता के अगले चरण में चला गया, और वहाँ से आगे।

और कुछ चीज़ें तो सीधे यहाँ तक आ पहुँचीं।

वह पूरी बाँह ढँकने वाली चूड़ियाँ — गुजरात और राजस्थान में आज भी। नमस्ते की मुद्रा — पकी मिट्टी की उस मूर्ति में, और आज हर दरवाज़े पर। हल — बनावली के उस खिलौने में, और आज भी खेतों में। हल्दी और अदरक — उन बर्तनों की दीवारों में, और आज हर रसोई में।

और लोथल में मिला वह पात्र, जिस पर एक प्यासे कौए की कहानी चित्रित है — जो घड़े में चोंच नहीं पहुँचा पाता, और फिर एक चतुर तरीक़ा निकालता है।

वह कहानी आज भी सुनाई जाती है। चार हज़ार साल से लगातार।

और वह लेखन

तो अंत में उसी पर लौटते हैं जहाँ से शुरू किया था।

उनकी लिपि आज तक नहीं पढ़ी जा सकी, और इसके तीन ठोस कारण हैं।

कोई द्विभाषी लेख नहीं मिला। मिस्र की चित्रलिपि इसलिए खुली क्योंकि रोज़ेटा पत्थर मिला, जिस पर वही बात दो ज्ञात भाषाओं में भी लिखी थी। सिंधु लिपि के लिए ऐसा पत्थर आज तक नहीं मिला।

लेख बहुत छोटे हैं। मुहरों पर औसतन पाँच के आस-पास चिह्न। कोई लंबा लेख नहीं, कोई पुस्तक नहीं, कोई शिलालेख नहीं।

और हमें यह भी नहीं पता कि भाषा कौन-सी थी। लिपि एक चीज़ है, भाषा दूसरी — और भाषा जाने बिना चिह्नों का अर्थ निकालना और कठिन हो जाता है।

इसलिए हम इन लोगों के बारे में लगभग सब कुछ जानते हैं, सिवाय उसके जो वे ख़ुद कहना चाहते थे।

हम जानते हैं कि वे रोज़ नहाते थे। कि उन्होंने अपनी नालियाँ सड़क के नीचे डालीं। कि उन्होंने अमीर और ग़रीब के मकान एक ही गुणवत्ता से बनाए। कि उन्होंने रेगिस्तान में जलाशय काटे। कि वे ईरान और ओमान तक व्यापार करते थे। कि उनके बच्चों के पास सीटियाँ थीं और बड़ों के पास खेल-बोर्ड। कि उनकी रसोई में हल्दी थी।

पर उनका एक भी नाम हम नहीं जानते।

कोई राजा नहीं, कोई कवि नहीं, कोई कारीगर नहीं जिसने वह मनका घिसा हो। कोई सूची नहीं, कोई वंशावली नहीं, कोई शिलालेख नहीं जो कहे “मैंने यह बनवाया।”

और शायद यही इस सभ्यता की सबसे अलग बात है।

मिस्र और मेसोपोटामिया ने बहुत जगह अपने राजाओं के नाम छोड़े। हड़प्पा ने अपने नगर छोड़े, अपनी नालियाँ छोड़ीं, अपने जलाशय छोड़े, और अपने बच्चों की सीटियाँ छोड़ीं — पर एक भी नाम नहीं।

हम उन्हें उनके कामों से जानते हैं, उनके दावों से नहीं।

जो सत्यापित नहीं हो सका

यह खंड इस लेख का हिस्सा है, परिशिष्ट नहीं। नीचे वे बातें हैं जो ऊपर कही गईं, पर जिनकी स्वतंत्र पुष्टि तक नहीं पहुँचा जा सका — या जिन पर विद्वान असहमत हैं।

1. सरस्वती कब तक बारहमासी नदी थी। यह ऊपर एक बहती नदी के रूप में आई है, जैसा पाठ्यपुस्तक कहती है। पर इस पर वास्तविक वैज्ञानिक असहमति है। कुछ भू-रासायनिक अध्ययन कहते हैं कि घग्गर-हाकरा तंत्र हड़प्पावासियों के वहाँ बसने से पहले ही वर्षा-पोषित हो चुका था — यमुना और सतलुज उससे बहुत पहले हट चुके थे। कुछ अन्य अध्ययन हड़प्पाई हृदय-क्षेत्र में एक बारहमासी नदी के पक्ष में हैं। नदी का क्षीण होना प्रमाणित है; समय विवादित है।

2. “उन्होंने कभी कोई सेना या हथियार नहीं रखे।” पाठ्यपुस्तक यही कहती है, और ऊपर उसका सार भी दिया गया है। पर यह दावा विद्वानों में विवादित है। हड़प्पा में कुल्हाड़ियाँ, भाले और गोफन के पत्थर मिले हैं, और किलेबंदी तो पुस्तक स्वयं बताती है। जो वास्तव में प्रमाणित है, वह यह है कि संगठित युद्ध और कला में महिमामंडित योद्धा-वर्ग का कोई चिह्न नहीं मिलता — यह उससे कम मज़बूत, पर कहीं अधिक सुरक्षित कथन है।

3. हल्दी, अदरक और केले के अवशेष। अवशेष-विश्लेषण की पद्धति स्थापित है, और भारतीय हड़प्पाई स्थलों पर ऐसे अध्ययन हुए भी हैं। पर इन तीन विशिष्ट वस्तुओं का मूल शोध-संदर्भ इस जाँच में नहीं मिला।

4. ओमान का कंघा और सूसा के मनके। हड़प्पा–ओमान और हड़प्पा–सूसा व्यापार सुस्थापित है, और सूसा में हड़प्पाई कार्नेलियन मनके मिलना भी। पर इस विशिष्ट कंघे का, और मनकों के गुजरात-स्रोत तक के संबंध का, प्रकाशित संदर्भ नहीं मिला।

5. ‘प्यासा कौआ’। लोथल के पात्र पर एक कौआ और एक पात्र चित्रित है — यह प्रमाणित है। पर यह कि वह वही कहानी है जो आज सुनाई जाती है, एक व्याख्या है, तथ्य नहीं। पाठ्यपुस्तक भी इसे विद्यार्थियों से “कहानी पूरी कीजिए” के रूप में ही पूछती है।

6. मेसोपोटामिया की तिथि। ऊपर “लगभग 6,000 वर्ष पहले” लिया गया है, जो पाठ्यपुस्तक के मुख्य पाठ का आँकड़ा है। उसी पुस्तक की समय-रेखा में वही तीर 3500 सा.सं.पू. पर पड़ता है। दोनों तिथियाँ विद्वत्-परंपरा में प्रचलित हैं — व्यापक आरंभ और नगरीय चरण — पर पुस्तक यह अंतर स्पष्ट नहीं करती।

7. मोहनजो-दड़ो के 700 कुएँ। यह संख्या ऊपर नहीं दोहराई गई, और इसका कारण है: वह गिनती नहीं, अनुमान है। पुरातत्वविद् माइकल यान्सेन ने खुदे हुए हिस्सों में मिले कुओं के घनत्व से पूरे नगर का अनुमान लगाया। मोहनजो-दड़ो आज तक पूरा खोदा नहीं गया है।

इनमें से कोई बात ‘ग़लत’ नहीं है। ये सब पुरातत्व की प्रचलित जानकारी के अनुरूप हैं। ‘असत्यापित’ का अर्थ केवल इतना है कि मूल शोध-संदर्भ तक इस जाँच में पहुँचा नहीं जा सका, या यह कि विद्वान स्वयं असहमत हैं।

और यह लेख उस अध्याय की भावना का ही अनुसरण करता है जिससे यह निकला है — जो पाँच अलग-अलग जगहों पर खुलकर कहता है कि उसे नहीं पता।