मरुशाला के बारे में
मिलिए हमारे गोडावण से
हमारा लोगो भी गोडावण है और हमारा शुभंकर भी। गोडावण यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, राजस्थान का राज्य पक्षी। पहले देखिए कि लोगो और शुभंकर का हर हिस्सा क्या कहता है, फिर असली गोडावण की सच्ची कहानी पढ़िए।
कक्षा की स्क्रीन के लिए। तीर वाली कुंजियों या बटन से आगे-पीछे जाइए।

भाग 1 · लोगो
लोगो चार चीज़ों से मिलकर बना है
गोल निशान को ध्यान से देखिए। इसमें एक पक्षी है, एक किताब है, सर्किट के छोटे बिंदु हैं और सूरज है।
पक्षी - +
किताब - +
सर्किट - +
सूरज - =
हमारा निशान
हर हिस्सा क्या कहता है
अपने चित्र को हम ऐसे पढ़ते हैं।
पक्षी
गोडावण, राजस्थान का राज्य पक्षी। सिर ऊपर है, नज़र आगे की ओर।
किताब
पढ़ाई। यहाँ सब कुछ एनसीईआरटी की किताब से शुरू होता है।
सर्किट
तकनीक। हमारी पंक्ति यही कहती है: “शिक्षा के लिए एआई | सबके लिए एआई”।
सूरज
रेगिस्तान का सूरज। जिधर चोंच है, उधर घेरा खुला छोड़ा गया है।
मरु + शाला = मरुशाला
मरु यानी रेगिस्तान। शाला यानी विद्यालय। मरुशाला यानी रेगिस्तान की शाला।
हमारे रंग शुभंकर से आए हैं
इस वेबसाइट का हर रंग शुभंकर की तस्वीर से ही चुना गया है।
- स्कार्फ़ का मोरपंखी#006a68बटन और लिंक
- किताबों का पीला#f6b042सिर्फ़ तारों और “बन रहा है” वाले बैज के लिए
- गर्दन का क्रीम#fffaf2पूरा पेज
- पंखों का भूरा#24160fजो अक्षर आप पढ़ते हैं
एक लोगो, तीन रूप
पूरे रंगों वाला
हल्की पृष्ठभूमि पर, जैसे हर पेज के सबसे ऊपर।
गहरी पृष्ठभूमि के लिए
भूरा रंग सफ़ेद हो जाता है, ताकि नाम साफ़ दिखे। हर पेज के सबसे नीचे यही लगा है।
गोल आइकन
ब्राउज़र के टैब में और फ़ोन की होम स्क्रीन पर।
लोगो के तीन नियम
✕ गलत
इसे खींचकर लंबा या चौड़ा मत कीजिए।
✕ गलत
इसके रंग मत बदलिए।
✕ गलत
✓ सही
गहरी पृष्ठभूमि पर गहरी पृष्ठभूमि वाला रूप ही लगाइए।
भाग 2 · शुभंकर
हमारा शुभंकर कौन है?
एक कार्टून गोडावण, जो आपके साथ पढ़ता है। यह किताबें लेकर चलता है, मोरपंखी स्कार्फ़ पहनता है, और जहाँ कुछ सीखने को हो, वहाँ आ जाता है।
यह नाम जीआईबी (GIB) से आया है। सरकारी रिकॉर्ड में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को छोटे में जीआईबी ही लिखा जाता है।

शुभंकर को ध्यान से देखिए
चित्र का हर हिस्सा कुछ कहता है।
123456- 1काली कलगी। इसके वैज्ञानिक नाम ‘निग्रिसेप्स’ का मतलब है ‘काले सिर वाला’।
- 2पिक्सल: स्क्रीन पर भी पढ़ाई।
- 3मोरपंखी स्कार्फ़: हमारा रंग।
- 4किताबों का ढेर।
- 5पंख: असली गोडावण भारी है, फिर भी उड़ सकता है।
- 6लंबी टाँगें, घास के मैदान में चलने के लिए।
चार चेहरे, चार काम
हर चेहरे का अपना काम है।

बोलता हुआ: सुझाव

सोचता हुआ: अभ्यास प्रश्न

उत्सुक: क्या आप जानते हैं?

खुश: सही जवाब
हर जगह के लिए एक मुद्रा
वेबसाइट के हर हिस्से की अपनी मुद्रा है, जो वहाँ के काम से मेल खाती है।

पढ़ता हुआ: होम पेज

किताबों के साथ: नोट्स

कक्षा में: शिक्षकों के पेज

किताब बाँटता हुआ: अभिभावकों के पेज

आगे बढ़ता हुआ: करियर

कंप्यूटर के साथ: एआई का इस्तेमाल

नक्शे के साथ: “पेज नहीं मिला” वाला पेज

पंख फैलाए: यह पेज और कुछ अध्याय
शुभंकर के तीन नियम
एक स्क्रीन पर एक ही शुभंकर।
लोगो वाले पक्षी के पास कभी नहीं।
सूरज जैसे गोले पर, कभी डिब्बे में नहीं।
भाग 3 · असली गोडावण
परिचय पत्र
दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक, और सबसे दुर्लभ पक्षियों में से भी एक।
- नाम
- गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड)
- वैज्ञानिक नाम
- Ardeotis nigriceps
- दूसरे नाम
- सोन चिरैया, घोराड, माळढोक
- राज्य पक्षी
- राजस्थान का
- स्थिति
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त (आईयूसीएन, 2018)
- कानूनी सुरक्षा
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I
- वज़न
- नर 10–15 किलो · मादा 5–10 किलो
- घर
- घास के मैदान, ज़्यादातर थार रेगिस्तान में, लगभग सिर्फ़ भारत में
- भोजन
- पौधे, फल, फसलें, कीड़े (टिड्डे, भृंग, चींटियाँ, दीमक) और सरीसृप
- उम्र
- लगभग 28 साल तक (अनुमान)
गोडावण का दिन और उसका परिवार
चूज़ों को माँ अकेले पालती है।
साल में सिर्फ़ एक बार घोंसला बनता है।
मादा लगभग 3 साल की उम्र में और नर लगभग 4 साल में पहली बार प्रजनन करते हैं।
यह धीरे बढ़ता है और कम बच्चे देता है, इसलिए एक भी पक्षी का जाना भारी नुकसान है।
कितने बचे हैं?
भारत में गोडावण, अलग-अलग सालों के अनुमान
- 1969लगभग 1,260
- 1978745
- 2000लगभग 600
- लगभग 2011250
- 2019लगभग 150 या कम
ये गिनतियाँ अलग-अलग तरीकों से हुई थीं, इसलिए इन्हें मोटा अनुमान मानिए। स्रोत: सीएमएस को भारत का प्रस्ताव, 2019।
जुलाई 2026 में अख़बारों में थार के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान का नया अनुमान (130 ± 21) छपा। हमें इसकी आधिकारिक रिपोर्ट नहीं मिली, इसलिए इसे चार्ट में नहीं रखा है।
मार्च 2022 में सरकार ने संसद को बताया कि भारत में लगभग 150 गोडावण बचे हैं, इनमें से लगभग 128 राजस्थान में। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के अध्ययनों पर आधारित था।
कभी 11 राज्यों में था। 2022 तक सिर्फ़ 5 में।
- राजस्थान
- गुजरात
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
गुजरात के कच्छ में जंगल में सिर्फ़ तीन मादाएँ बची हैं (मार्च 2026)।
इनके अलावा, सम और रामदेवरा के प्रजनन केंद्रों में 97 पक्षी हैं (अक्टूबर 2026)।
इसे किन चीज़ों से खतरा है?
- 1नीचे उड़ता है
- 2भारी शरीर
- 3पतले तार दूर से नहीं दिखते
बिजली के तार
यह भारी है और नीचे उड़ता है, इसलिए दूर से न दिखने वाले तारों से टकरा जाता है।
घटते घास के मैदान
घास के मैदानों को अक्सर “बंजर ज़मीन” मानकर दूसरे कामों में ले लिया जाता है।
अंडों और चूज़ों पर हमला
आवारा कुत्ते और सूअर, और लोमड़ी, नेवले और बिल्लियाँ घोंसलों और चूज़ों पर हमला करते हैं।
पहले हुआ शिकार
शिकार और अंडे उठा ले जाने से 1969 तक इनकी संख्या घटकर लगभग 1,260 रह गई थी।
इसे बचाने की कोशिश: प्रजनन कार्यक्रम
अंडों को सुरक्षित सेया जाता है, चूज़े पाले जाते हैं, और अब पक्षी वापस जंगल में छोड़े जाने लगे हैं।
केंद्रों में, अक्टूबर 2026
97 पक्षी: 40 जंगल में दिए अंडों से निकले, 57 केंद्रों में ही जन्मे। 86 प्रजनन के लिए रहेंगे। 11 को जंगल में छोड़ने के लिए चुना गया है, जिनमें से 2 को 4 अक्टूबर को छोड़ा गया।
केंद्रों में जन्मे चूज़े: 2025 में 24, 2026 में 29।
जंपस्टार्ट: केंद्र में दिया गया अंडा जंगल के घोंसले में रख दिया जाता है, और जंगल की मादा उसे सेती है। इस तरह राजस्थान में छह और गुजरात में दो चूज़े निकले हैं।
- 2013
राजस्थान ने “प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड” शुरू किया। वन विभाग के अनुसार ऐसा करने वाला यह पहला राज्य था।
- 2016
इस पक्षी के घर और प्रजनन के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम को ₹33.85 करोड़ के साथ मंज़ूरी मिली।
- जून 2019
जैसलमेर के सम में एक अस्थायी प्रजनन केंद्र खुला। जंगल से लाए गए अंडे यहाँ सेए जाते हैं।
- मार्च 2022
सम में 16 चूज़े पल रहे हैं।
- अगस्त 2022
रामदेवरा में स्थायी केंद्र काम करने लगा।
- मार्च 2023
सम में वहीं पले पक्षियों के दिए अंडे से एक चूज़ा निकला। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार दुनिया में यह पहली बार था, जब गोडावण ने केंद्र में रहते हुए प्रजनन किया।
- 2024
गोडावण और खरमोर के लिए पाँच साल की योजना को ₹77.05 करोड़ मंज़ूर हुए।
- मार्च 2026
कार्यक्रम का एक अंडा सड़क से 770 किलोमीटर चलकर गुजरात के कच्छ पहुँचा और जंगल की एक मादा के घोंसले में रखा गया। 26 मार्च को चूज़ा निकला: दस साल में गुजरात का पहला गोडावण चूज़ा।
- जून 2026
इस मौसम में अब तक 26 चूज़े, इनमें से 18 कृत्रिम गर्भाधान से।
- 3 अक्टूबर 2026
रामदेवरा में एक बहुत बड़ा उड़ान-बाड़ा (रीवाइल्डिंग एवियरी) खुला: 160 मीटर लंबा, 64 मीटर चौड़ा और 14 मीटर ऊँचा। केंद्रों में पले पक्षी यहाँ उड़ने के लिए अपनी मांसपेशियाँ मज़बूत करते हैं।
- 4 अक्टूबर 2026
कार्यक्रम के दो नर गोडावण डेज़र्ट नेशनल पार्क में सम के पास जंगल में छोड़े गए।
बिजली के तार और सुप्रीम कोर्ट
गोडावण के इलाके में बिजली के तारों पर सुप्रीम कोर्ट में 2019 से दिसंबर 2025 तक एक मामला चला।
- अप्रैल 2021
कोर्ट का आदेश: गोडावण के इलाके में मौजूदा तारों पर तुरंत बर्ड डायवर्टर लगाइए, और जहाँ हो सके, एक साल में तार ज़मीन के नीचे कीजिए।
- मार्च 2024
कोर्ट ने 2021 की रोक (लगभग 99,000 वर्ग किलोमीटर में ऊपर से जाने वाले तारों पर) हटाई, इस शर्त पर कि एक विशेषज्ञ समिति नियम तय करेगी। समिति ने सितंबर 2024 में राजस्थान की रिपोर्ट दी।
- 19 दिसंबर 2025
कोर्ट ने अंतिम निर्देश देकर मामला निपटा दिया। गोडावण के लिए प्राथमिक क्षेत्र: राजस्थान में 14,013 और गुजरात में 740 वर्ग किलोमीटर।
प्राथमिक क्षेत्रों के अंदर
- ऊपर से जाने वाली नई बिजली लाइनें नहीं, सिवाय एक तय बिजली गलियारे के। 11 केवी और उससे छोटी लाइनों को छूट है।
- नई पवन चक्कियाँ नहीं।
- 2 मेगावाट से बड़े नए सोलर पार्क नहीं, और पुराने सोलर पार्कों का विस्तार भी नहीं।
राजस्थान के लिए आदेश, दो साल के भीतर (दिसंबर 2027 तक)
- 33 केवी की 80 किलोमीटर लाइन ज़मीन के नीचे, काम तुरंत शुरू।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान ने जिन 250 किलोमीटर लाइनों को सबसे अहम बताया, वे ज़मीन के नीचे।
- कुछ बड़ी लाइनें (66 केवी और ऊपर) नए रास्ते से।
बर्ड डायवर्टर
तारों पर लटकाए जाने वाले निशान, ताकि पक्षी तार देख सकें। इलाके की आधी से ज़्यादा लाइनों पर ये पहले से लगे हैं। कोर्ट ने और लगाने का आदेश नहीं दिया: पहले वैज्ञानिक जाँच करने को कहा और फ़ैसला अधिकारियों पर छोड़ा।
आदेश होना और काम पूरा होना एक बात नहीं है। 5 अक्टूबर 2026 तक हमें कोई सरकारी आँकड़ा नहीं मिला कि इसमें से कितना काम पूरा हुआ है।
यह कहाँ रहता है?
राजस्थान: थार
ज़्यादातर गोडावण यहीं रहते हैं, जैसलमेर और बाड़मेर के डेज़र्ट नेशनल पार्क में और उसके आसपास। पार्क 3,162 वर्ग किलोमीटर में फैला है और 1980 में बना था। इसके अंदर लगभग 200 वर्ग किलोमीटर घास के मैदान बाड़ से घेरे गए हैं: यही इसके अंडे देने की सबसे अच्छी जगह है।
राजस्थान: प्रजनन केंद्र
सम और रामदेवरा, दोनों जैसलमेर ज़िले में।
गुजरात: कच्छ
जंगल में सिर्फ़ तीन मादाएँ बची थीं (मार्च 2026)। जंपस्टार्ट वाला चूज़ा यहीं निकला।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश
हर राज्य में 10 से कम (मार्च 2022 में संसद को बताया गया)।
आप क्या कर सकते हैं?
चार छोटे काम, जो मदद करते हैं।
दूर रहिए, शांत रहिए। अंडों या चूज़ों के पास कभी मत जाइए।
घास का मैदान बंजर ज़मीन नहीं है। घर पर भी यह बात बताइए।
कोई घायल या मरा हुआ पक्षी दिखे? वन विभाग को बताइए।
तीन दोस्तों को गोडावण की कहानी सुनाइए।
ये बातें कहाँ से ली गई हैं
इस पेज की हर बात 5 अक्टूबर 2026 को नीचे दिए स्रोतों से मिलाकर जाँची गई है। आँकड़े बदलते रहते हैं, इसलिए तारीख ज़रूर देखिए।
- राजस्थान वन विभाग: प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड
- पीआईबी, 14 मार्च 2022: गोडावण की सुरक्षा (संसद में दिया गया उत्तर)
- पीआईबी, 27 मार्च 2023: गोडावण संरक्षण योजना
- पीआईबी, 12 दिसंबर 2024: गोडावण के संरक्षण की स्थिति (संसद में दिया गया उत्तर)
- पीआईबी, 28 मार्च 2026: दस साल बाद गुजरात में गोडावण का चूज़ा
- पीआईबी, 14 जून 2026: केंद्रों में 94 पक्षी
- पीआईबी, 3 अक्टूबर 2026: उड़ान-बाड़ा और पक्षियों को छोड़ने की शुरुआत
- पीआईबी, 4 अक्टूबर 2026: डेज़र्ट नेशनल पार्क में दो नर छोड़े गए
- भारतीय वन्यजीव संस्थान: गोडावण रिपोर्ट, 2020
- भारतीय वन्यजीव संस्थान: बस्टर्ड रिकवरी प्रोग्राम की वार्षिक रिपोर्ट, 2023
- गोडावण को सीएमएस में शामिल करने का भारत का प्रस्ताव, 2019 (कॉप-13 दस्तावेज़ 27.1.4)
- सुप्रीम कोर्ट: 19 अप्रैल 2021 का आदेश
- सुप्रीम कोर्ट: 21 मार्च 2024 का फ़ैसला (2024 INSC 280)
- सुप्रीम कोर्ट: 19 दिसंबर 2025 का फ़ैसला (2025 INSC 1472)
- इनक्रेडिबल इंडिया (पर्यटन मंत्रालय): डेज़र्ट नेशनल पार्क