यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।
14 जनवरी
हर साल 14 जनवरी के आस-पास, भारत में लगभग एक ही दिन एक त्योहार मनाया जाता है।
पंजाब में लोग लोहड़ी की आग जलाते हैं। असम में माघ बिहू के भोज लगते हैं। गुजरात में उत्तरायण की पतंगें आसमान भर देती हैं। तमिलनाडु में मिट्टी की हांडी में दूध उबालकर पोंगल मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में खिचड़ी पर्व है, कश्मीर में शिशुर सेंक्रात, बंगाल में पौष साँग क्रान्ति, आंध्र में पेड्डा पंडुगा, कर्नाटक में मकर संक्रमण, केरल की ओर मकर विलांक्कु।
तेरह नाम। तेरह भाषाएँ। तेरह क्षेत्र।
अगर आपको केवल ये नाम दिखाए जाएँ, आप सोचेंगे कि ये तेरह अलग-अलग त्योहार हैं।
पर वे नहीं हैं।
यह एक ही त्योहार है, लगभग एक ही दिन, और एक ही कारण से — फ़सल कट चुकी है।
और यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है
यह किताब ठीक यही करती है — चार बार, चार अलग चीज़ों के साथ। और चारों बार निष्कर्ष एक ही निकलता है।
पर पहले उस प्रश्न पर आइए जिससे यह सब शुरू होता है।
एक अंग्रेज़ की उलझन
एक शताब्दी से भी अधिक पहले, एक इतिहासकार भारत का इतिहास लिखने बैठा — और अटक गया।
उसका नाम विंसेंट स्मिथ था। उसकी समस्या यह थी कि भारत एक चीज़ नहीं था, जिसका इतिहास लिखा जा सके। वह सैकड़ों चीज़ें थीं। उसने लिखा —
“इस अचंभित करने वाली विविधता में भारत का इतिहास किस प्रकार लिखा जा सकता है?”
और फिर उसने स्वयं उत्तर दिया —
”…इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में निहित है कि भारत ‘विविधता में एकता’ प्रदर्शित करता है।”
(और यहाँ एक सुंदर मोड़ है, जो किताब नहीं बताती: स्मिथ ने यह विचार अपने समकालीन, भारतीय इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी से लिया था। अंग्रेज़ ने भारत को समझने के लिए जो चाबी इस्तेमाल की, वह चाबी भी यहीं की बनी थी।)
पहले, विविधता का पैमाना
यह जानने के लिए कि यह उलझन कितनी बड़ी थी, कुछ संख्याएँ देखिए।
20वीं शताब्दी के अंत में, भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण नाम की एक संस्था ने एक असाधारण काम किया। उसने ‘भारत के लोग’ नाम की एक परियोजना शुरू की और देश के हर राज्य में जाकर गिनना शुरू किया कि यहाँ कौन-कौन रहता है।
नतीजा यह निकला —
| क्या | कितने |
|---|---|
| समुदाय | 4,635 |
| भाषाएँ | 325 |
| लिपियाँ | 25 |
(यह काम 2 अक्तूबर 1985 को शुरू हुआ और लगभग सात वर्ष चला। इसमें लगभग 600 विद्वान लगे और 4,581 गाँवों में काम हुआ। यह भारत में अब तक का सबसे बड़ा मानवशास्त्रीय अध्ययन था।)
अब उन दो संख्याओं पर रुकिए — 325 भाषाएँ, पर केवल 25 लिपियाँ।
यह विसंगति नहीं है। यह इस पूरी कहानी की पहली झलक है।
क्योंकि एक ही लिपि अनेक भाषाएँ लिख सकती है। देवनागरी में हिंदी लिखी जाती है, और मराठी भी, और संस्कृत भी, और नेपाली भी। एक लिपि, चार भाषाएँ।
यानी विविधता के भीतर पहले से ही कुछ साझा है — अक्षर।
(और उसी सर्वेक्षण का एक और निष्कर्ष, जो किताब नहीं देती: लगभग 65 प्रतिशत समुदाय द्विभाषी पाए गए। हर तीन में से लगभग दो समुदाय एक से ज़्यादा भाषा बोलते हैं। लोग अलग भाषाएँ बोलते हैं — और साथ ही एक-दूसरे की भाषा भी जानते हैं।)
उदाहरण एक — आपकी रसोई
अब पहला उदाहरण, और यह सबसे नज़दीक का है।
भारत में आप हजारों तरह के व्यंजन खा सकते हैं। हर राज्य का अपना स्वाद, हर घर की अपनी विधि। यह विविधता किसी से छिपी नहीं है।
पर अब देखिए कि वे सब किससे बनते हैं।
चावल। जौ। गेहूँ। बाजरा। ज्वार। रागी। और दालें।
यही सात-आठ चीज़ें, लगभग पूरे भारत में। इसीलिए इन्हें ‘मुख्य अनाज’ कहा जाता है — क्योंकि ये अधिकांश भारतीयों का प्रमुख भोजन हैं।
और मसाले? हल्दी, जीरा, इलायची, अदरक — ये भी लगभग हर रसोई में हैं।
तो पाठ्यपुस्तक एक वाक्य लिखती है, और वह वाक्य पूरी किताब की चाबी है:
“इस तरह हम देखते हैं कि कैसे एक ही प्रकार की सामग्री (एकता) से विभिन्न प्रकार के (विविधता) अनगिनत व्यंजन और पकवान बनाए जा सकते हैं।”
यह वाक्य याद रखिए। अगले तीन उदाहरण इसी साँचे में ढले हैं।
(और एक छोटी बात, जो एक नक़्शे में छिपी है। किताब में भारत का एक मानचित्र है जिस पर अलग-अलग क्षेत्रों के अनाज लिखे हैं। उस पर चावल चार बार आता है — पर हर बार अलग नाम से: बासमती, सोना मसूरी, पोन्नी, कोलम। एक अनाज, चार नाम। नक़्शे पर ही पूरी किताब लिखी है।)
उदाहरण दो — एक कपड़ा जो सिला नहीं गया
अब दूसरा उदाहरण, और यह पहले से भी अच्छा है।
साड़ी — “भारत के अधिकांश भागों में पहना जाने वाला और विभिन्न प्रकार के सूत या धागे से बना एक लंबा परिधान।”
उसके सैकड़ों रूप हैं। कपास की, रेशम की, और अब कृत्रिम धागे की भी। बनारसी, कांजीवरम, पैठनी, पाटन पटोला, मूगा, मैसूर — ये तो केवल रेशमी वालों के कुछ नाम हैं। सूती के और भी हैं।
डिजाइन कहीं बुनाई में ही बना होता है, कहीं बुनने के बाद छापा जाता है। रंग अनगिनत। और बाँधने के तरीके इतने कि हर क्षेत्र का अपना है — और नए तरीके आज भी खोजे जा रहे हैं।
और यह बहुत पुरानी चीज़ है। आज के बिहार में, वैशाली नाम की जगह पर, कुछ शताब्दी सा.सं.पू. के एक पत्थर पर साड़ी पहने एक स्त्री की आकृति उकेरी हुई मिलती है।
पर असली बात यह है
साड़ी एक बिना सिला वस्त्र है।
यह एक तकनीकी विवरण लगता है। असल में यह पूरी कहानी है।
क्योंकि जो कपड़ा सिला नहीं गया, वह किसी एक आकार में बँधा नहीं है। और इसीलिए —
पाठ्यपुस्तक में छह तस्वीरें हैं, दक्षिण भारत से। उनमें साड़ी का इस्तेमाल हो रहा है —
एक पेड़ की डाल से बँधे एक झूले के रूप में, जिसमें बच्चा सो रहा है। पानी में मछली पकड़ने के जाल के रूप में। अनाज ओसाने में। सिर पर घड़ा रखने की गद्दी के रूप में। बारिश से बचने के लिए, सिर के ऊपर तानकर। और ज़मीन पर बिछाकर, लेटने के लिए।
अब सोचिए — क्या यह सब एक सिली हुई कमीज़ से किया जा सकता है?
नहीं। कमीज़ कमीज़ ही रहेगी।
(विदेशी यात्री सदियों से इसी बात पर चकित होते रहे — किताब कहती है कि वे इसकी “सादगी, सुलभता और पहनने के विविध तरीकों” को देखकर अभिभूत हुए।)
और फिर, इतने रूपों और इतने उपयोगों के बाद, किताब एक वाक्य में सब समेट देती है:
”…लेकिन अंततोगत्वा यह एक ही प्रकार का परिधान — ‘साड़ी’ है।”
और यहाँ एक ऐसी बात, जो शायद आप नहीं जानते
साड़ी वाले पन्ने पर एक छोटा-सा बॉक्स है, और उसमें भारत के इतिहास की एक बहुत बड़ी बात लिखी है।
“बहुत लंबे समय तक भारत, विश्व में सर्वाधिक महीन सूत का उत्पादन करता रहा…”
यह कपड़ा यूरोप तक जाता था। और 17वीं शताब्दी में एक चीज़ ने वहाँ तहलका मचा दिया — ‘छींट’, यानी सूती कपड़े पर छपा हुआ डिजाइन।
वह इतना लोकप्रिय हुआ कि यूरोपीय कपड़ों की कीमतें गिर गईं।
और फिर जो हुआ, वह सोचने लायक है।
“अंतत: अपने स्वयं के उत्पादों के संरक्षण के लिए इंग्लैंड और फ्रांस को भारत से ‘छींट’ के आयात पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेना पड़ा।”
(तिथियाँ, जो किताब नहीं देती: फ़्रांस ने 1686 में — और वहाँ प्रतिबंध केवल आयात पर नहीं था, उसे पहनने और किसी भी काम में लाने पर भी था; वह 73 साल चला। इंग्लैंड ने 1700 और 1721 में — कैलिको अधिनियमों से।
और सबसे दिलचस्प बात: इंग्लैंड में यह माँग सरकार की नहीं थी। वहाँ के अपने बुनकरों, कातने वालों, रँगरेज़ों, चरवाहों और किसानों ने अपने सांसदों के ज़रिए संसद से यह रोक माँगी — क्योंकि वे भारतीय कपड़े से मुक़ाबला नहीं कर पा रहे थे।)
यानी भारत का बुना हुआ कपड़ा इतना अच्छा और इतना सस्ता था कि दो यूरोपीय देशों को उसे रोकने के लिए क़ानून बनाने पड़े।
किसी हुनर की इससे बड़ी तारीफ़ शायद ही हो सकती है।
उदाहरण तीन — वह त्योहार जिससे हमने शुरू किया
अब उस 14 जनवरी पर लौटिए।
किताब कहती है — “आपने देखा होगा कि कुछ त्योहार एक ही समय पर पूरे भारत में मनाए जाते हैं, हालाँकि उनके नाम अलग-अलग होते हैं।”
और वह मकर संक्रांति चुनती है — क्योंकि वह भारत के विभिन्न भागों में फसलों की कटाई का सूचक है।
तेरह नाम, एक नक़्शे पर।
पर अब उन नामों को दोबारा पढ़िए, ध्यान से:
मकर संक्रांत · मकर संक्रांति · मकर संक्रमण · मकर विलांक्कु · शिशुर सेंक्रात · पौष साँग क्रान्ति
देखा?
नाम भी पूरी तरह अलग नहीं हैं। उनमें से कई में ‘मकर’ है, या ‘संक्रांति’ का कोई रूप — संक्रांत, संक्रमण, सेंक्रात, क्रान्ति।
यानी एकता केवल तारीख़ में नहीं है। वह नामों के भीतर भी बैठी है।
(और एक बात, जो यह समझाती है कि किताब ने यही त्योहार क्यों चुना: अधिकांश भारतीय त्योहार चंद्रमा से तय होते हैं — इसीलिए दीपावली और होली की अंग्रेज़ी तारीख़ हर साल बदलती है। मकर संक्रांति सूर्य से तय होती है — और इसीलिए वह लगभग हमेशा 14 या 15 जनवरी को ही पड़ती है।
अगर किताब कोई चाँद वाला त्योहार चुनती, तो ‘एक ही दिन’ वाली बात इतनी साफ़ न दिखती।)
उदाहरण चार — एक कहानी जो पूरे देश में घूम गई
और अब आख़िरी उदाहरण, जो सबसे बड़ा है।
पहले एक छोटी किताब की बात।
पंचतंत्र — जानवरों के ज़रिए कही गई कहानियाँ, जो असल में जीवन जीने का हुनर सिखाती हैं। इसका मूल संस्कृत पाठ लगभग 2,200 वर्ष पुराना है।
और अब देखिए वह कहाँ-कहाँ पहुँचा: लगभग हर भारतीय भाषा में। और भारत से बाहर — दक्षिण-पूर्वी एशिया, अरब देश, यूरोप।
अनुमान है कि उसके 50 से अधिक भाषाओं में 200 से अधिक रूपांतरण हैं।
(वह यूरोप पहुँचा कैसे? एक लंबी शृंखला से, जो किताब नहीं देती: लगभग 550 सा.सं. में फ़ारसी शासक ख़ुसरो अनुशिरवाँ के आदेश पर उनके चिकित्सक बरज़ोई ने उसे संस्कृत से पहलवी में अनुवाद किया। फिर सिरियाई। फिर 8वीं शताब्दी में अरबी। फिर 11वीं शताब्दी के अंत में यूनानी। फिर हिब्रू, और वहाँ से पश्चिमी यूरोप।
हर भाषा में नाम बदला, पात्र बदले, कुछ कहानियाँ जुड़ीं और कुछ छूटीं — पर वह वही संग्रह बना रहा।)
किताब इसे एक वाक्य में कहती है:
“यह प्रदर्शित करता है कि ‘एक’ कहानियों का संग्रह किस प्रकार ‘अनेक’ में परिवर्तित हो गया।”
और फिर दो बड़ी कहानियाँ
रामायण और महाभारत। मूल संस्करण में लगभग 7,000 पृष्ठ। दोनों में नायक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए लड़ते हैं।
और इनके भीतर छोटी-छोटी कहानियाँ भरी हैं — जो नैतिक मूल्यों पर हैं और, किताब के शब्दों में, “लगातार प्रश्न पूछती हैं कि क्या सत्य और क्या असत्य।”
दो हज़ार साल से इनका अनुवाद और रूपांतरण होता आ रहा है। पर असली बात अनुवाद नहीं है।
असली बात यह है —
“कुछ वर्ष पूर्व एक विद्वान ने केवल तमिलनाडु में किए गए अपने सर्वेक्षण में लोक कथाओं के रूप में महाभारत के 100 से अधिक स्वरूपों को पाया।”
केवल एक राज्य में। सौ से ज़्यादा।
और किताब पाठक से पूछती है: “अब आप अनुमान लगाइए कि पूरे भारत में इन लोक कथाओं की कितनी संख्या होगी!”
और जो लोग इन कहानियों में अपने को ढूँढ़ लाए
भील, गोंड, मुंडा — और पूर्वोत्तर तथा हिमालय की अधिकांश जनजातियाँ — इनके अपने संस्करण हैं।
और ये कहीं लिखे नहीं गए। किताब साफ़ कहती है: “ये जनजातीय रूपांतरण मौखिक रूप से प्रसारित हुए।”
इनके साथ किंवदंतियाँ भी फैलीं — कि पांडव यहाँ से गुज़रे थे, कि द्रौपदी यहाँ आई थीं, कभी-कभी कि दुर्योधन यहाँ था।
तमिलनाडु के नीलगिरि के जंगलों में एक नक्काशीदार पत्थर है, जिस पर पाँच पांडव उकेरे हैं। इरूला जनजाति ने उसे एक मंदिर में सुरक्षित रखा है — इस बात की याद में कि पांडव इस क्षेत्र से गुज़रे थे।
और फिर वह वाक्य
उसी ‘भारत के लोग’ परियोजना के निर्देशक, मानवविज्ञानी के.एस. सिंह ने महाभारत के बारे में कहा —
“लोककथाओं के अनुसार इस देश में शायद ही ऐसा कोई स्थान हो जहाँ महानायक पांडव न गए हों।”
और यही बात रामायण के बारे में भी कही जा सकती है।
इसका अर्थ सोचिए। कश्मीर से तमिलनाडु तक, हज़ारों जगहों पर लोग कहते हैं कि “वे यहाँ से गुज़रे थे।”
एक कहानी ने पूरे देश को अपने भीतर जगह दे दी। और हर जगह ने उस कहानी में अपने को जोड़ लिया।
किताब का निष्कर्ष:
“सदियों से, किसी अन्य साहित्य की अपेक्षा इन दो महाकाव्यों ने भारत एवं एशिया के विभिन्न भागों के मध्य एक सांस्कृतिक सूत्र के गहन तंत्र को विकसित किया।”
चारों को एक साथ रखिए
| एक | अनेक | |
|---|---|---|
| भोजन | एक ही सामग्री | हजारों व्यंजन |
| साड़ी | एक ही परिधान, बिना सिला | सैकड़ों रूप, छह अन्य उपयोग |
| त्योहार | एक ही दिन, एक ही कारण | तेरह नाम |
| महाकाव्य | एक कथा | सौ से अधिक लोक स्वरूप — केवल एक राज्य में |
चारों की बनावट एक ही है। और यही उत्तर है उस अंग्रेज़ इतिहासकार की उलझन का।
पर एक ग़लतफ़हमी से बचिए
यहाँ रुककर एक बात साफ़ कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह सबसे आसानी से ग़लत समझी जाती है।
यह किताब यह नहीं कह रही कि भारत में सब एक जैसे हैं।
वह इसके ठीक उलट कह रही है। वह शुरू ही होती है विविधता से — अलग भूदृश्य, अलग परिधान, अलग भोजन, 325 भाषाएँ, 4,635 समुदाय, तेरह नाम।
वह विविधता को मिटाने की बात नहीं कर रही। वह कह रही है कि विविधता ही ताक़त है।
किताब की अंतिम पंक्ति यही है:
“अंत में हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय संस्कृति विविधता को संपन्नता के रूप में प्रचारित करती है, किंतु साथ ही विविधता को पोषित करने वाली अंतर्निहित एकता को भी दृष्टि से ओझल नहीं होने देती।”
और उसका सार, और भी सीधे शब्दों में:
“भारतीय एकता, विविधता का उत्सव मनाती है — क्योंकि विविधता विभाजित नहीं, अपितु समृद्ध करती है।”
एक प्रश्न पूछकर देखिए: अगर पूरे भारत में एक ही त्योहार, एक ही नाम से, एक ही तरीक़े से मनाया जाता — तो क्या वह बेहतर होता?
तेरह नामों में तेरह भाषाएँ हैं, तेरह रसोइयाँ हैं, तेरह तरह के गीत हैं। एक नाम में एक होता।
और आख़िर में, एक आदमी जिसने यह ख़ुद देखा
आज़ादी से पहले, जवाहरलाल नेहरू ने भारत के कई हिस्सों की यात्रा की। बाद में उन्होंने जो लिखा, वह इस पूरी बात का सबसे अच्छा गवाह है —
“हर जगह मुझे एक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मिली, जिसने उनके जीवन पर प्रभावशाली असर डाला। …भारत के महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत और अन्य प्राचीन पुस्तकें, लोकप्रिय अनुवादों और व्याख्याओं में जनता के बीच व्यापक रूप से जानी जाती थीं। उनमें उपस्थित प्रत्येक लोकप्रिय घटना, कहानी और नैतिकता की बातें जनमानस के अंतर्मन पर अंकित थीं जो कि उसे सार्थक एवं समृद्ध बनाती थीं। निरक्षर ग्रामीणों को भी सैकड़ों श्लोक कंठस्थ थे…”
दो बातें इसमें हैं, और दोनों बड़ी हैं।
पहली — “हर जगह।” वे जहाँ भी गए, उन्हें वही साझा पृष्ठभूमि मिली।
दूसरी — “निरक्षर ग्रामीणों को भी सैकड़ों श्लोक कंठस्थ थे।”
यानी यह साझा सूत्र स्कूलों से नहीं आया था। किताबों से नहीं आया था। वह सुनने और सुनाने से आया था — पीढ़ी दर पीढ़ी, बिना लिखे।
जिन्हें अक्षर नहीं आते थे, उन्हें सैकड़ों श्लोक याद थे।
तो अंत में
तेरह नाम, एक त्योहार। सैकड़ों रूप, एक साड़ी। सौ कहानियाँ — एक ही राज्य में — और वह भी एक ही महाभारत की। हजारों व्यंजन, कुछ मुट्ठी भर अनाज।
बाहर से देखिए तो अनेक। भीतर से देखिए तो एक।
यही ‘एक में अनेक’ है।
जो सत्यापित नहीं हो सका
यह खंड इस लेख का हिस्सा है, परिशिष्ट नहीं। नीचे वे बातें हैं जो ऊपर कही गईं, पर जिनकी स्वतंत्र पुष्टि तक नहीं पहुँचा जा सका — या जिन पर विद्वान असहमत हैं।
1. पंचतंत्र की आयु। ऊपर पाठ्यपुस्तक का “लगभग 2,200 वर्ष” लिया गया है, जो लगभग 200 सा.सं.पू. को इंगित करता है। पर मुख्यधारा की विद्वत्-सहमति इसे लगभग 300 सा.सं. में रखती है — यानी लगभग 1,700 वर्ष। 2,200 वाला मत योहानेस हर्टेल का है। मूल पाठ आज उपलब्ध नहीं है, इसलिए तिथि स्वयं अनुमान है — और इसीलिए मतभेद है।
2. “केवल तमिलनाडु में महाभारत के 100 से अधिक लोक स्वरूप।” पाठ्यपुस्तक स्वयं उस विद्वान का नाम नहीं देती। महाभारत के तमिल लोक-रूपों की समृद्धि सुस्थापित है, पर इस विशिष्ट सर्वेक्षण और इस संख्या का प्रकाशित संदर्भ नहीं मिला।
3. वैशाली की साड़ी वाली उकेरी आकृति। वैशाली से मौर्य-शुंग कालीन मूर्तिशिल्प मिलना सुस्थापित है, और “कुछ शताब्दी सा.सं.पू.” उस परास में उचित है। पर इस विशिष्ट कृति का प्रकाशित संदर्भ नहीं मिला।
4. नीलगिरि का ‘पंच पांडव’ पत्थर। नीलगिरि में इरूला जनजाति और उनकी परंपराएँ सुस्थापित हैं। पर इस विशिष्ट पत्थर और मंदिर का प्रकाशित संदर्भ नहीं मिला।
5. के.एस. सिंह का उद्धरण। सिंह की भूमिका और ‘भारत के लोग’ परियोजना पूर्णत: पुष्ट हैं। पर इस विशिष्ट वाक्य का मूल संदर्भ इस जाँच में नहीं मिला।
6. ‘25 लिपियाँ’। परियोजना का एक पूरा खंड — People of India, Vol. 9: Languages and Scripts — इसी विषय पर है, अत: स्रोत स्पष्ट है। पर 325 भाषाओं जितनी व्यापक स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली। (समुदायों की संख्या पर भी एक वैकल्पिक आँकड़ा मिलता है — 4,694 — जो संभवत: क्षेत्र-कार्य के किसी चरण का है।)
7. महाकाव्यों का “लगभग 7,000 पृष्ठ”। यह एक स्थूल अनुमान है, जो संस्करण और मुद्रण पर निर्भर करता है। कोई निश्चित संख्या नहीं हो सकती।
8. मेवाड़ के चित्र का वर्तमान स्थान। ऊपर पाठ्यपुस्तक का कैप्शन दोहराया नहीं गया, और इसका कारण है: इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी का संग्रह 1982 में ब्रिटिश लाइब्रेरी में मिला दिया गया। अत: वह नाम ऐतिहासिक रूप से सही है, पर आज वह पांडुलिपि ब्रिटिश लाइब्रेरी में है। (चित्रकार साहिबदीन, स्थान मेवाड़, वर्ष 1652 — तीनों पूर्णत: पुष्ट हैं।)
इनमें से कोई बात ‘ग़लत’ नहीं है। ‘असत्यापित’ का अर्थ केवल इतना है कि मूल शोध-संदर्भ तक इस जाँच में पहुँचा नहीं जा सका, या यह कि विद्वान स्वयं असहमत हैं।
और यह भी दर्ज होना चाहिए कि इस अध्याय के अधिकांश दावे असामान्य रूप से पुष्ट निकले — 4,635 · 325 · 200+ रूपांतरण · 50+ भाषाएँ · 1652 · साहिबदीन · और छींट की पूरी कहानी, तिथियों सहित। यह उन विषयों में से है जहाँ संख्याओं पर भरोसा किया जा सकता है।