अध्याय 7भारत की सांस्कृतिक जड़ें

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यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।

! एक बात पहले: यह लेख विचारों के इतिहास के बारे में है — यह नहीं बताता कि कौन-सा दर्शन सही है। वह प्रश्न इस लेख का विषय नहीं है, और उस पाठ्यपुस्तक का भी नहीं जिससे यह निकला है।

एक अजीब-सी शुरुआत

कल्पना कीजिए कि आपको एक किताब सौंपी जाए और कहा जाए — इसे याद कर लीजिए। एक भी शब्द इधर-उधर नहीं होना चाहिए। और फिर अपने बच्चों को सिखा दीजिए, ताकि वे भी वैसा ही याद रखें।

और यह सौ पीढ़ियों तक चलता रहे।

यह असंभव लगता है। पर ठीक यही हुआ — और इसीलिए आज हम भारत के सबसे पुराने ग्रंथों के शब्द ठीक-ठीक जानते हैं, जबकि उन्हें लिखा ही नहीं गया था।

इससे भी अजीब बात यह है कि इसके ठीक पहले वाली कहानी बिलकुल उलटी है।

हड़प्पा के लोगों ने लिखा था। उनकी हज़ारों मुहरों पर चिह्न बने हैं। और आज तक कोई उन्हें पढ़ नहीं सका।

एक सभ्यता ने लिखा और खो गई। दूसरी ने नहीं लिखा और बच गई।

यह कहानी वहीं से शुरू होती है।

पहले, एक वृक्ष

जो पाठ्यपुस्तक इस विषय को पढ़ाती है, वह अपने पहले ही पन्ने पर एक रूपक चुनती है — और फिर अंतिम पन्ने तक उसे निभाती है।

भारतीय संस्कृति एक बहुत पुराने वृक्ष की तरह है। उसकी अनेक जड़ें हैं। वे जड़ें एक साझा तने को पोसती हैं। और उस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं — कला, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, शासन की पद्धतियाँ, यहाँ तक कि युद्ध-कलाएँ।

यह रूपक इस पूरी कहानी का नक़्शा है, और इसे शुरू में ही पकड़ लेना चाहिए। क्योंकि आगे जो कुछ आएगा — वेद, उपनिषद्, बौद्ध मत, जैन मत, चार्वाक, और जनजातीय परंपराएँ — वे अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। वे एक ही वृक्ष के हिस्से हैं, और उनमें से कुछ हिस्से आपस में अदल-बदल भी जाते हैं।

और उस वृक्ष की कुछ जड़ें उसी हड़प्पा सभ्यता तक जाती हैं जिससे यह कहानी शुरू हुई।

वेद — और वह असंभव काम

‘वेद’ शब्द विद् से आया है, जिसका अर्थ है ज्ञान — वही विद् जो ‘विद्या’ में है।

चार वेद हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथों में से एक।

(यह ‘में से एक’ महत्वपूर्ण है। मेसोपोटामिया और मिस्र की कुछ लिखित सामग्री और भी पुरानी है। पाठ्यपुस्तक यह सावधानी बरतती है, और वह सही है।)

इनमें हजारों ऋचाएँ हैं — कविता और गीत के रूप में प्रार्थनाएँ। और उनकी रचना ऋषियों और ऋषिकाओं ने की — कवियों और कवियत्रियों ने। (यह दूसरा शब्द याद रखिए। वह आगे लौटेगा।)

पर वे लिखी नहीं गईं।

तो वे बचीं कैसे

पाठ्यपुस्तक कहती है कि वे “100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण के माध्यम से स्मृतिबद्ध” हुईं और “बिना किसी विशेष परिवर्तन के” आगे बढ़ीं। पर वह यह नहीं बताती कि कैसे।

और उत्तर यह है कि यह केवल याद करना नहीं था — यह एक जाँच-प्रणाली थी।

पाठ को सीधे क्रम में दोहराना काफ़ी नहीं माना गया। उसे अनेक बदले हुए क्रमों में भी दोहराया जाता था — जिन्हें क्रम-पाठ कहते हैं।

मान लीजिए एक पंक्ति के शब्द हैं — अ ब स द। सीधा पाठ होगा: अ ब स द। पर उसे इस तरह भी दोहराया जाता था: अ ब · ब अ · अ ब स · स ब अ · अ ब स … और आगे भी।

अब सोचिए क्या होता है यदि कोई शब्द अपनी जगह से हिल जाए।

वह हर दूसरे क्रम में भी ग़लत हो जाएगा — और तुरंत पकड़ में आ जाएगा। जैसे एक ही चीज़ की दस तस्वीरें, दस अलग कोणों से रख ली गई हों। एक बदल जाए, तो बाक़ी नौ बता देंगी कि गड़बड़ कहाँ हुई।

यह स्मृति नहीं थी। यह इंजीनियरिंग थी।

और 2008 में यूनेस्को ने इसी को मान्यता दी — ‘मानवीयता के मौखिक और अमूर्त विरासत की अनुपम कोटि’ के रूप में। ध्यान दीजिए कि मान्यता वेदों की विषयवस्तु को नहीं मिली — उस विधि को मिली जिससे वे बचे रहे।

(और एक छोटी-सी बात: यह मान्यता वास्तव में नवंबर 2003 में घोषित हुई थी; 2008 में उसे यूनेस्को की नई ‘प्रतिनिधि सूची’ में शामिल किया गया। दोनों तिथियाँ सही हैं, बस अलग-अलग चरणों की हैं।)

और वे कब रचे गए

यह किसी को ठीक-ठीक नहीं पता, और पाठ्यपुस्तक यह खुलकर कहती है — “यह कहना कठिन है…” विशेषज्ञों ने पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के बीच का प्रस्ताव किया है।

यह एक बहुत लंबी अवधि है, और इसकी वजह है। मुख्यधारा की विद्वत्-सहमति ऋग्वेद को लगभग 1500–1200 सा.सं.पू. में रखती है — यानी उस सीमा के दूसरे सिरे पर। (दिलचस्प बात यह है कि पाठ्यपुस्तक की अपनी समय-रेखा भी 1500 सा.सं.पू. से ही शुरू होती है।)

पर यहाँ जो बात दर्ज करने लायक है, वह तिथि नहीं — भाषा है। पुस्तक ने “कहना कठिन है” और “प्रस्ताव किया है” लिखा। उसने एक तारीख़ नहीं दी, एक अवधि दी। यह आदत आगे बार-बार दिखेगी।

एक पंक्ति, जिस पर बहुत कुछ टिका है

वैदिक ऋचाएँ अनेक देवों को संबोधित करती हैं — इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषा। बहुत सारे नाम।

और फिर एक ऋचा आती है जो कहती है:

एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति… “परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।”

यह पंक्ति इस पूरी कहानी में तीन बार लौटेगी, इसलिए इसे ठीक से समझ लेना ज़रूरी है।

वह यह नहीं कह रही कि “ब्रह्मांड की शक्तियाँ एक हैं।” वह कह रही है कि सत्य एक है, और नाम अनेक। अंतर सूक्ष्म है, पर वही सब कुछ है।

और इसी काल के एक अन्य मंत्र में — ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में — यह आता है:

“साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें, एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें… एक हो हमारा उद्देश्य, एक हो हमारा हृदय…”

वे लोग कौन थे

वे ‘जन’ थे — लोगों के बड़े समूह। ऋग्वेद में ऐसे तीस से अधिक जनों की सूची है: भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश।

और उनमें से एक नाम पर रुकिए — भरत।

यही वह जन है जिससे आगे चलकर ‘भारतवर्ष’ बना, और फिर ‘भारत’। कोई राजा नहीं — एक जन। (यह इस कहानी में तीसरी बार लौटने वाला धागा है। धैर्य रखिए।)

इन जनों का शासन कैसे चलता था, यह हम बहुत कम जानते हैं। वेदों में तीन शब्द मिलते हैं — राजा, सभा, समिति। और सभा तथा समिति, दोनों सामूहिकता को इंगित करते हैं।

उनके पास काम भी थे, और उनकी सूची पढ़ने लायक है: किसान, बुनकर, कुम्हार, शिल्पकार, बढ़ई, आरोग्यकर्ता, नर्तक-नर्तकी, नाई, पुजारी। एक जीता-जागता समाज, न कि केवल यज्ञ करते लोग।


अब कहानी अपने सबसे दिलचस्प मोड़ पर आती है।

समय के साथ अनुष्ठान बढ़ते और जटिल होते चले गए। और उसी दौर में कुछ ग्रंथ रचे गए जिन्हें उपनिषद् कहते हैं। वे वैदिक संकल्पनाओं पर टिके थे, पर उनमें कुछ नई चीज़ें थीं — पुनर्जन्म (बार-बार जन्म लेना) और कर्म (हमारे कर्म और कर्म-फल)।

और एक विचार, जिसे वेदांत कहते हैं: सब कुछ — मानव जीवन, प्रकृति, ब्रह्मांड — एक ही दैवी तत्व है। उसका नाम ब्रह्म है; कभी-कभी केवल ‘तत्’।

(यह ब्रह्मा देव से भिन्न है। पाठ्यपुस्तक यह कोष्ठक में स्पष्ट करती है, और अकारण नहीं।)

और वही ब्रह्म हर जीव के भीतर भी है — उसे आत्मन् कहा गया। इसका अर्थ यह हुआ कि इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा है और परस्पर निर्भर है।

दो वाक्य इसे सबसे सीधे कहते हैं:

अहम् ब्रह्मास्मि — “मैं ब्रह्म हूँ।” तत् त्वम् असि — “वह ब्रह्म आप ही हैं।”

पर उपनिषदों की असली ताक़त इन वाक्यों में नहीं है। वह उनकी कहानियों में है।

तीन लोग जिन्होंने रुकने से इनकार किया

पाठ्यपुस्तक तीन कथाएँ एक साथ रखती है, और उनसे पहले यह लिख देती है:

“उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।”

यह वाक्य कथाओं से पहले है। यह संयोग नहीं है।

पहली — एक बच्चा जो उत्तर नहीं दे सका

श्वेतकेतु बारह वर्ष गुरुकुल में बिताकर लौटा। उसके पिता उद्दालक आरुणि ने देखा कि वह अपने ज्ञान के कारण अहंकारी हो गया है।

तो पिता ने उससे प्रश्न पूछे। और वह उत्तर नहीं दे सका।

फिर उद्दालक ने उसे दो चीज़ें दिखाईं।

पहली — बरगद के फल का एक बीज। उसे खोलिए, तो भीतर कुछ नहीं दिखता। खाली। पर उसी खाली दिखने वाली चीज़ में पूरा बरगद का वृक्ष छिपा है।

दूसरी — एक ही मिट्टी। उससे कितने अलग-अलग बर्तन बन सकते हैं। अलग-अलग दिखते हैं, पर बने एक ही चीज़ से हैं।

पहला उदाहरण कहता है: जो दिखाई नहीं देता, वह फिर भी है। दूसरा कहता है: जो अलग-अलग दिखता है, वह एक ही से बना है।

और फिर उद्दालक ने कहा —

“सभी में यही सूक्ष्म तत्व व्याप्त है… तुम वही हो, श्वेतकेतु।”

यह वही तत् त्वम् असि है — मंत्र, कहानी बनकर।

दूसरी — एक बच्चा जिसने पीछा नहीं छोड़ा

नचिकेता के पिता यज्ञ में अपनी सारी संपत्ति दान कर रहे थे। बच्चे ने पूछा — “और मुझे? आप मुझे किस देवता को अर्पित करेंगे?”

उसने बार-बार यही पूछा।

पिता झुँझला गए और बोले — “मैं तुम्हें यम को अर्पित करता हूँ।” मृत्यु के देवता को।

और नचिकेता सचमुच चल पड़ा।

लंबी प्रतीक्षा के बाद वह यम से मिला। उसका एक ही प्रश्न था: “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”

यम ने पहले उत्तर टालना चाहा।

पर नचिकेता ने निरंतर आग्रह किया। और अंतत: यम प्रसन्न हुए और उसे आत्मा के बारे में बताया — जो सभी जीवों में है, जिसका न जन्म होता है, न मृत्यु। जो अमर है।

फिर वह लौटा, और उसके पिता ने उल्लासपूर्वक उसका स्वागत किया।

तीसरी — एक स्त्री जिसे मना किया गया

राजा जनक ने एक शास्त्रार्थ की घोषणा की — विजेता को पुरस्कार।

याज्ञवल्क्य नाम के एक सुप्रसिद्ध ऋषि आए और एक-एक करके अनेक विद्वानों को हरा दिया।

फिर गार्गी ने प्रश्न पूछना शुरू किया। वे एक ऋषिका थीं — वही शब्द जो शुरू में ऋचाओं की रचनाकारों के लिए आया था।

उन्होंने विश्व के स्वरूप पर प्रश्न पूछे। फिर ब्रह्म के स्वरूप पर।

और तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें आगे प्रश्न पूछने से मना किया।

“हालाँकि कुछ समय बाद गार्गी ने पुन: प्रश्न पूछा…”

और तभी उन्हें उत्तर मिला — कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों और बाक़ी सब चीज़ों का निर्माण करता है।


इन तीनों में क्या समान है

तीनों में कोई प्रश्न पूछ रहा है। और तीनों में वह कोई बड़ा, स्थापित विद्वान नहीं है।

दो बच्चे और एक स्त्री।

और दो में — नचिकेता और गार्गी — उत्तर तभी मिला जब उन्होंने रुकना अस्वीकार किया। यम ने टाला; गार्गी को मना किया गया। दोनों ने फिर पूछा।

यही उन कथाओं का विषय है, और पाठ्यपुस्तक ने वह पहले ही बता दिया था।

और फिर कोई वेदों से आगे चला गया

प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में कुछ ऐसे दर्शन उभरे जिन्होंने वेदों की प्रभुता को स्वीकार नहीं किया और अपनी अलग पद्धति बनाई।

उनमें से एक बौद्ध मत है।

एक राजकुमार जो बाहर निकला

लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले, लुंबिनी में — जो आज नेपाल में है — सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ।

(उनकी तिथि पर विद्वान असहमत हैं, और पाठ्यपुस्तक यह स्वयं कहती है। वह 560 सा.सं.पू. को अनुमानित मानती है, और तुरंत जोड़ देती है कि इससे कहानी नहीं बदलती। यह एक बहुत परिपक्व वाक्य है।)

वे राजमहल के सुरक्षित वातावरण में बड़े हुए। और उन्तीस वर्ष की आयु में उन्होंने रथ पर बैठकर नगर घूमने की इच्छा की।

उस दिन उन्होंने अपने जीवन में पहली बार तीन चीज़ें देखीं — एक वृद्ध, एक रोगी, और एक शव।

और एक चौथी — एक संन्यासी, जो प्रसन्न और शांत लग रहा था।

इन्हीं चार दृश्यों के बाद उन्होंने राजसी जीवन, अपनी पत्नी और बेटे को त्यागने का विचार किया।

फिर वे पैदल चले, अन्य संन्यासियों और विद्वानों से मिले, और मानव जीवन में दुखों के मूल कारण को खोजा।

बोधगया में — जो आज बिहार में है — एक पीपल के वृक्ष के नीचे, कई दिनों के ध्यान के बाद उन्हें ज्ञान मिला।

उन्होंने क्या पाया

कि मानवीय कष्ट के दो स्रोत हैं — ‘अविद्या’ और ‘मोह’। अज्ञान, और वह लगाव जो आदत या भावना से बन जाता है।

और तब वे ‘बुद्ध’ कहलाए — ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ व्यक्ति।

उनके उपदेशों के केंद्र में अहिंसा है — जिसका मूल अर्थ है चोट न पहुँचाना, नुकसान न पहुँचाना। और आंतरिक अनुशासन।

उन्होंने संघ बनाया — भिक्षुओं, और आगे चलकर भिक्षुणियों का समुदाय।

उनके दो कथन इस पूरे लेख में सबसे अधिक याद रखने लायक हैं:

“जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं। परंतु वह व्यक्ति शुद्ध है जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं।”

“युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”

लगभग उसी समय, वहीं पास में

एक और राजकुमार ने घर छोड़ा।

वर्धमान का जन्म छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में, वैशाली के समीप हुआ — वह भी आज के बिहार में।

(यह भी एक पारंपरिक तिथि है, और उस पर भी विद्वानों में मतभेद है — यद्यपि पाठ्यपुस्तक यहाँ वह सावधानी नहीं दोहराती जो उसने बुद्ध के लिए बरती थी।)

उन्होंने तीस वर्ष की आयु में घर त्यागा, संन्यासी जीवन का अनुशासन अपनाया, और बारह वर्ष बाद ‘अनंत’ ज्ञान प्राप्त किया। तब वे ‘महावीर’ — ‘महानायक’ कहलाए।

और अब उस शब्द पर ध्यान दीजिए जिससे ‘जैन’ बना।

‘जिन’ का अर्थ है ‘विजेता’। पर किस पर विजय?

“इसका अर्थ किसी क्षेत्र या शत्रुओं पर विजय पाने से नहीं है, बल्कि अविद्या और मोह पर विजय पाने से है, ताकि ज्ञान प्राप्त किया जा सके।”

ये ठीक वही दो शब्द हैं जो बुद्ध के लिए आए थे।

यह संयोग नहीं है। यह वृक्ष का तना है, जो दिखने लगा है।

जैन मत के तीन विचार

अहिंसा — और महावीर का कथन इसे बहुत विस्तार से कहता है: “सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए।”

अनेकांतवाद — ‘केवल एक’ पक्ष या दृष्टिकोण नहीं। सत्य के अनेक पक्ष हैं, और उसे किसी एक कथन से पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता।

अपरिग्रह — ‘असंग्रह’। पार्थिव वस्तुओं से दूरी, और केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना।

और जैन मत में सभी जीवों की — मनुष्यों से लेकर अदृश्य जीवों तक — आपसी संबद्धता और आपसी निर्भरता पर ज़ोर है, “क्योंकि ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते।”

अब उस वाक्य को उपनिषदों वाले वाक्य के साथ रखकर पढ़िए: “इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।”

दो अलग दर्शन। लगभग एक ही वाक्य।

और अहिंसा का असली विस्तार

यहाँ पाठ्यपुस्तक एक बात कहती है जो आसानी से छूट जाती है:

“बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है। इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना।”

और फिर वह जोड़ती है — “कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं।”

यह बुद्ध के दूसरे कथन का ही विस्तार है — “स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”

दो कहानियाँ, दो परंपराओं से

जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं, और वे बहुत सरल तरीक़े से बड़ी बातें कहती हैं।

एक में, बुद्ध वानरों के राजा थे। उनके वृक्ष का एक पका फल नदी में गिरा, बहकर राजमहल पहुँचा, और राजा उसके स्वाद पर मोहित होकर वह वृक्ष ढुँढ़वाने निकला। वृक्ष मिला — और सैनिकों ने वानरों पर हमला किया।

वानरों को बचाने का एक ही रास्ता था: नदी पार करा देना। पर वे अपने-आप नहीं कर पा रहे थे।

तो वानर-राज ने दूसरे किनारे का एक पेड़ पकड़ा और अपने शरीर को पुल बना दिया।

सब पार हो गए। और वे घायल होकर मर गए।

राजा ने यह दूर से देखा। और वह अपनी प्रजा के प्रति अपनी भूमिका पर सोचने लगा।


दूसरी कहानी जैन परंपरा से है, और उसका नायक एक चोर है।

रोहिनेय इतना कुशल था कि कोई उसे पकड़ नहीं पाता था। एक बार रास्ते में, अकस्मात, उसने महावीर के उपदेश के कुछ वाक्य सुन लिए।

आगे चलकर वह पकड़ा गया। उसने कहा कि वह एक साधारण किसान है। एक मंत्री ने चतुराई से जाल बिछाया — पर महावीर के वही चंद वाक्य याद रखते हुए रोहिनेय योजना समझ गया और बच निकला।

और फिर उसे पछतावा हुआ।

वह महावीर के पास गया। अपने अपराध स्वीकार किए। चुराया हुआ धन लौटाया। क्षमा माँगी। और भिक्षु बन गया।

“यह कहानी सम्यक कर्म और सम्यक विचारों के महत्व को दर्शाती है और यह भी बताती है कि हर व्यक्ति को जीवन में दूसरा अवसर मिलना चाहिए।”

पर ध्यान दीजिए — दूसरा अवसर मिला ज़रूर, पर उसने उसे कमाया भी। धन लौटाकर, अपराध मानकर।

एक पहाड़, तीन परंपराएँ

महाराष्ट्र में एलोरा नाम की जगह है। वहाँ छठवीं से दसवीं शताब्दी सा.सं. के बीच पहाड़ों को काटकर गुफाएँ बनाई गईं।

कुछ गुफाएँ हिंदू दर्शन से हैं। कुछ बौद्ध। कुछ जैन।

एक ही पहाड़। सदियों तक चलता निर्माण। तीनों परंपराएँ, आस-पास।

(कुल चौंतीस गुफाएँ हैं — बारह बौद्ध, सत्रह हिंदू, पाँच जैन — और वे भौगोलिक क्रम में भी बँटी हैं, दक्षिण से उत्तर की ओर।)

यह उस ‘साझे तने’ का सबसे ठोस प्रमाण है — और वह प्रमाण किसी ग्रंथ में नहीं, पत्थर में बना हुआ है।

उन्हीं गुफाओं में उन भिक्षुओं के नाम भी मिले हैं जो वहाँ रहते थे और पत्थर के बिस्तरों पर सोते थे।

और एक दर्शन जो बाक़ी सबसे उलट था

उस समय और भी अनेक मत चल रहे थे। उनमें से एक था चार्वाक, जिसे कभी-कभी लोकायत भी कहते हैं।

उसका कहना था कि यह भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है — और इसलिए मृत्यु के बाद जीवन असंभव है।

यह बाक़ी लगभग हर बात से उलट है। पुनर्जन्म नहीं, कर्म-फल नहीं, आत्मा नहीं।

“ऐसा प्रतीत होता है कि इस दर्शन को अधिक लोकप्रियता नहीं मिली और समय के साथ यह विलुप्त हो गया।”

तो पाठ्यपुस्तक ने उसे बताया ही क्यों? वह स्वयं कारण देती है:

“ताकि यह दर्शाया जा सके कि यहाँ बौद्धिक या आध्यात्मिक विश्वास प्रथाओं में व्यापक विविधता थी और लोग अपने अनुसार इन्हें चुनने के लिए स्वतंत्र थे।”

(और एक बात, जो अपने आप में सोचने लायक है: चार्वाक का कोई मूल ग्रंथ आज बचा नहीं है। हम उसे लगभग पूरी तरह उसके विरोधियों के लेखन से जानते हैं — जिन्होंने उसका खंडन करने के लिए उसे उद्धृत किया। क्या किसी विचार को केवल उसके विरोधियों से जानकर हम उसे ठीक-ठीक जान पाते हैं?)

तना

अब वह जगह आती है जहाँ रूपक बंद होता है।

“यद्यपि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ थीं, तथापि उनमें कुछ समान संकल्पनाएँ भी थीं, जैसे — धर्म, कर्म, पुनर्जन्म, दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज…

वास्तव में यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी।”

जड़ें, तना, शाखाएँ। और अब तीनों अपनी जगह पर हैं।

पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती

अब तक जो कुछ आया, वह ग्रंथों में लिखा है।

पर भारत में एक दूसरी, उतनी ही समृद्ध परंपरा रही है — जो लिखी नहीं गई।

मौखिक परंपरा — “उन उपदेशों और प्रथाओं के बारे में ज्ञान जो नित्य अभ्यास के द्वारा आगे संचारित हुआ, न कि लिखित शास्त्रों के द्वारा।”

(और पाठ्यपुस्तक तुरंत जोड़ती है: “वेदों के संदर्भ में यह लागू होता है।” — कहानी अपनी शुरुआत पर लौट रही है।)

इनमें लोक प्रथाएँ हैं, जो आम लोगों के बीच चलती हैं। और जनजातीय परंपराएँ, जो जनजातियों में।

और अब वह धागा, जो तीसरी बार लौटता है

जनजाति क्या है? मानव वैज्ञानिक कहते हैं — वे परिवारों या वंशों के समूह जो एक साझी उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा रखते हैं, समुदाय में रहते हैं, जिनका एक मुखिया होता है, और जिनके पास निजी संपत्ति नहीं होती।

पर फिर पाठ्यपुस्तक एक ऐसी बात कहती है जो पूरी कहानी बदल देती है:

“यह जानना रुचिकर है कि प्राचीन भारत में जनजाति के लिए कोई शब्द नहीं था — जनजातियाँ केवल अलग-अलग जन थीं जो एक विशेष परिवेश में रहती थीं, जैसे कि वन या पहाड़।”

जन।

वही शब्द जो ऋग्वेद में तीस से अधिक समूहों के लिए आया था। वही शब्द जिससे ‘भरत’ निकला, और ‘भरत’ से ‘भारत’।

पाठ्यपुस्तक कह रही है कि ये कोई अलग श्रेणी के लोग नहीं थे। वे भी जन ही थे — बस एक अलग परिवेश में रहते थे।

(आज की भाषा ‘जनजाति’ है, और वह संविधान से आई है। 2011 में भारत में 705 जनजातियाँ थीं, लगभग 10.4 करोड़ लोग — ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की कुल जनसंख्या से अधिक।)

और यह भी दर्ज होना चाहिए: उन्नीसवीं शताब्दी में जनजातियों का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञानिकों ने उन्हें प्राय: ‘आदिम’ या ‘हीन’ बताया था। गहन अध्ययन के बाद उन पक्षपातपूर्ण विचारों को अधिकांशत: नकार दिया गया है।

दोनों दिशाओं में

और अब इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात।

लोक और जनजातीय परंपराओं तथा प्रमुख विचारधाराओं के बीच लगातार संपर्क रहा है — और वह संपर्क एकतरफ़ा नहीं था।

एक दिशा: परंपरा के अनुसार, पुरी के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे। देवी माताओं के अनेक रूपों के बारे में भी यही कहा जा सकता है।

दूसरी दिशा: कुछ जनजातियों ने हिंदू देवों को बहुत पहले अपना लिया, और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं — “भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर तमिलनाडु तक।”

यह इतनी सहजता से क्यों हो सका? क्योंकि लोक, जनजातीय और हिंदू विश्वास में अनेक समान संकल्पनाएँ थीं। तीनों में पर्वतों, नदियों, पेड़ों, पौधों, जंतुओं और कुछ पत्थरों को पवित्र माना गया — क्योंकि इन सबमें चेतना है।

तमिलनाडु के नीलगिरि में टोडा जनजाति के लिए उस पर्वत के तीस से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास हैं — और वे इतने पवित्र माने जाते हैं कि टोडा लोग अपनी अंगुली से उनकी ओर संकेत तक नहीं करते।

अरुणाचल प्रदेश की अनेक जनजातियाँ डोनीपोलो की पूजा करती हैं — सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप, जिन्हें आगे चलकर परमात्मा माना गया। मध्य भारत में खंडोबा। पूर्वी भारत में मुंडा और संथाल जनजातियाँ सिंगबोंगा की — “जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं और जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया है।”

और यहाँ पाठ्यपुस्तक एक वाक्य लिखती है जो पूरी कहानी को उसकी शुरुआत से जोड़ देता है:

“देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है।”

अनेक नाम। एक सत्य।

वही ऋचा, जो हज़ारों वर्ष पहले कही गई थी — एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।

और अंत में, एक समाजशास्त्री

भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते इस पूरी बात को एक पैराग्राफ़ में समेट देते हैं:

“भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाली हजारों जातियाँ और जनजातियाँ इतिहास के आरंभिक समय तथा उससे भी पहले से आपस में एक-दूसरे की धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं को प्रभावित करती रही हैं। जनजातीय धर्मों पर हुए हिंदू दर्शन के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, किंतु यह भी सत्य है कि न केवल इसके निर्माण के चरण में, बल्कि इसके पूरे विकास-क्रम में हिंदू दर्शन जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ है।”

उनके वाक्य की बनावट ही उनका तर्क है। पहली दिशा — “व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है”, यानी इस पर बहस नहीं। दूसरी दिशा — “किंतु यह भी सत्य है…” — यही वह बात है जिसे वे रेखांकित कर रहे हैं।

और वे यह भी जोड़ते हैं कि यह प्रभाव केवल शुरुआत में नहीं था, “पूरे विकास-क्रम में” चलता रहा।

इस लंबे संपर्क का परिणाम, पाठ्यपुस्तक के शब्दों में — “आपसी समृद्धि।”

वटवृक्ष

और अब वह चित्र, जो अंतिम पन्ने पर है।

वटवृक्ष — अपनी गहरी जड़ों, विशाल तने और चारों दिशाओं में फैली शाखाओं के साथ। वह एकड़ों में फैल जाता है और सदियों जीवित रहता है। वह अनेक वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देता है।

और फिर वह वाक्य आता है जिस पर यह पूरा लेख टिका है:

”…और अपनी उन शाखाओं को, जो तने से जुड़ी होती हैं, को नई जड़ें बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।”

वटवृक्ष की शाखाएँ नीचे लटकती हैं, ज़मीन छूती हैं, और स्वयं जड़ें बन जाती हैं। फिर वे नए तने बनते हैं, और वृक्ष आगे फैलता चला जाता है।

शाखा और जड़ का भेद मिट जाता है।

यही इस पूरी कहानी का सार है।

वेद जड़ें थीं। उपनिषद्, बौद्ध मत, जैन मत शाखाएँ। पर वे शाखाएँ ज़मीन तक पहुँचकर स्वयं जड़ें बन गईं — और लोक व जनजातीय परंपराओं ने भी वही किया, दूसरी दिशा से।

कोई भी हिस्सा केवल दे नहीं रहा था। हर हिस्सा ले भी रहा था।

और वह जो शुरू में कहा गया था

यह कहानी एक असंभव-सी बात से शुरू हुई थी — कि कोई ग्रंथ बिना लिखे दो सौ पीढ़ियों तक बच सकता है।

और वह बचा, क्योंकि उसे सँभालने की एक विधि बनाई गई थी।

पर इस पूरी कहानी में जो सबसे अधिक दोहराया गया, वह याद रखना नहीं था। वह प्रश्न पूछना था।

एक बच्चा जो अपने पिता के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका, और तब जाकर कुछ सीखा। एक बच्चा जो मृत्यु के देवता तक चला गया और वहाँ भी टाले जाने पर रुका नहीं। एक स्त्री जिसे मना किया गया, और जिसने फिर भी पूछा — और तभी उत्तर मिला।

और एक राजकुमार जो केवल इसलिए महल से बाहर निकला क्योंकि उसने पूछा कि बाहर क्या है।

इस पूरी कहानी में हर बड़ा विचार किसी के प्रश्न पूछने से आया। और उन प्रश्न पूछने वालों में एक स्त्री थी और दो बच्चे।

जो सत्यापित नहीं हो सका

यह खंड इस लेख का हिस्सा है, परिशिष्ट नहीं। नीचे वे बातें हैं जो ऊपर कही गईं, पर जिनकी स्वतंत्र पुष्टि तक नहीं पहुँचा जा सका — या जिन पर विद्वान असहमत हैं।

1. ऋग्वेद की रचना-तिथि। ऊपर वही सीमा दी गई है जो पाठ्यपुस्तक देती है — पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. पर मुख्यधारा की विद्वत्-सहमति ऋग्वेद को लगभग 1500–1200 सा.सं.पू. में रखती है, यानी उस सीमा के केवल एक सिरे पर। यह सहमति भाषिक, खगोलीय और पुरातात्विक — तीन स्वतंत्र विधियों के मिलने से बनी है। (पाठ्यपुस्तक की अपनी समय-रेखा भी 1500 सा.सं.पू. से ही शुरू होती है।)

2. महावीर की जन्म-तिथि। ऊपर छठी शताब्दी सा.सं.पू. का आरंभ लिखा है, जो पारंपरिक तिथि (599 सा.सं.पू.; दिगंबर परंपरा में 582) से मेल खाती है। पर अनेक विद्वान मानते हैं कि यह लगभग सौ वर्ष अधिक प्राचीन है, और उन्हें 540 या 490 सा.सं.पू. के आस-पास रखते हैं। महावीर की ऐतिहासिकता पर कोई विवाद नहीं है — केवल तिथि पर है।

3. यूनेस्को की तिथि। ऊपर 2008 दिया गया है, जो पाठ्यपुस्तक का आँकड़ा है और यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में दर्ज वर्ष भी। पर मूल घोषणा नवंबर 2003 में हुई थी; 2008 में उन 90 घोषित ‘उत्कृष्ट कृतियों’ को नई सूची में शामिल किया गया।

4. क्रम-पाठ का विवरण। ऊपर जटा-पाठ/घन-पाठ जैसी विधियों का सिद्धांत सरल भाषा में दिया गया है। यह परंपरा सुस्थापित है, पर पाठ्यपुस्तक इनका नाम नहीं लेती — वह केवल “गहन प्रशिक्षण” कहती है। ऊपर दिया गया उदाहरण समझाने के लिए बनाया गया है, किसी ग्रंथ से उद्धृत नहीं।

5. “लगभग 1800 वर्ष पुरानी पत्थर की कृति” और वानर-राज कथा वाली कृति (मध्यप्रदेश)। दोनों तिथियाँ और शैलियाँ उचित परास में हैं, और जातक-दृश्यों का साँची व भरहुत में अंकन सुस्थापित है — पर इन विशिष्ट कृतियों के प्रकाशित संदर्भ नहीं मिले।

6. “ऋग्वेद में 30 से अधिक जनों की सूची” और “नीलगिरि के 30 से अधिक शिखर।” जनों के नाम और टोडा परंपरा में शिखरों की पवित्रता — दोनों सुस्थापित हैं। पर इन दोनों ‘तीस से अधिक’ की सटीक गणना का मानक संदर्भ नहीं मिला।

7. जगन्नाथ की जनजातीय उत्पत्ति। ऊपर यह “परंपरा के अनुसार” ही कहा गया है — क्योंकि पाठ्यपुस्तक स्वयं यही सावधानी बरतती है। यह व्यापक रूप से चर्चित है, पर ऐतिहासिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।

8. चार्वाक के मूल ग्रंथों का अभाव। यह सुस्थापित है कि उसका कोई मूल ग्रंथ नहीं बचा और उसे मुख्यत: विरोधियों के उद्धरणों से जाना जाता है। पर यह पाठ्यपुस्तक में नहीं है — वह केवल इतना कहती है कि यह दर्शन “विलुप्त हो गया।”

इनमें से कोई बात ‘ग़लत’ नहीं है। ‘असत्यापित’ का अर्थ केवल इतना है कि मूल शोध-संदर्भ तक इस जाँच में पहुँचा नहीं जा सका, या यह कि विद्वान स्वयं असहमत हैं।

और यह लेख उसी पाठ्यपुस्तक की भावना का अनुसरण करता है जिससे यह निकला है — जो बार-बार कहती है “यह कहना कठिन है”, “विद्वानों में सर्वसम्मति नहीं है”, “परंपरा के अनुसार”, और “ऐसा प्रतीत होता है।”

एक ऐसी कहानी में जहाँ आस्था और इतिहास पास-पास चलते हैं, यह हिचकिचाहट कमज़ोरी नहीं — सबसे भरोसेमंद हिस्सा है।