पाठ्यपुस्तक: NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), पृ. 81–98 पढ़ने का समय: पहली बार 35 मिनट · दोहराने में 12 मिनट · परीक्षा से पहले 5 मिनट (सिर्फ ★★वाले भाग)
पर्यावरण भूगोल का नहीं, राजनीति का विषय है — क्योंकि “इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।”
इसके बाद अध्याय आठ पड़ावों से गुजरता है —
नुकसान की सूची → 1992 का पृथ्वी सम्मेलन और उत्तर-दक्षिण की खाई → वैश्विक संपदा (चार) → ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ → साझी संपदा और देवस्थान → भारत का पक्ष → पर्यावरण आंदोलन → संसाधनों की भू-राजनीति और मूलवासी
पहले दो सुधार याद रखिएध्यान
- ! पृ. 82 पर लिखा है “अध्याय सात में हमने…” — वह अब अध्याय 5 (समकालीन विश्व में सुरक्षा) है।
- ! पृ. 82 पर लिखा है “पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र” — पृष्ठ 24 पर अब चीन के कार्टून हैं; अराल सागर वाला क्षेत्र अध्याय 1 में है।
✓ पर पृ. 97 का यह संदर्भ सही है — “अगले अध्याय में वैश्वीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन की चर्चा की गई है।”
1 · पर्यावरण ‘राजनीति’ कैसे बना? (पृ. 82–84)
नुकसान की पाँच कोटियाँ★
| # | क्षेत्र | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1 | कृषि-भूमि | “कृषि-योग्य भूमि में अब कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो रही”; उर्वरता घट रही; चारागाह और मत्स्य-भंडार घट रहे → खाद्य-उत्पादन में कमी |
| 2 | ★★जल और स्वच्छता | UN मानव विकास रिपोर्ट (2016): 66.3 करोड़ को स्वच्छ जल नहीं; 2 अरब 40 करोड़ साफ-सफाई से वंचित; 30 लाख+ बच्चे हर साल मृत |
| 3 | वन और जैव-विविधता | वन जलवायु और जलचक्र को संतुलित रखते हैं — पर कटाई जारी, लोग विस्थापित; जैव-विविधता की हानि का कारण “पर्यावासों का विध्वंस” |
| 4 | ★ओज़ोन | “धरती के ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन गैस की मात्रा में लगातार कमी” = ओज़ोन परत में छेद |
| 5 | समुद्रतट | मध्यवर्ती भाग अब भी स्वच्छ, पर तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित; बसाहट बढ़ रही |
ये मसले राजनीतिक क्यों — दो स्तर★★
- व्यावहारिक स्तर — सरकारें कदम उठाती हैं; और “अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती।”
- ★★गहरा स्तर — “कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? रोक की जिम्मेदारी किसकी है? संसाधनों पर किसका कितना हक है? इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।”
तीन पड़ाव — कैसे यह राजनीतिक बना★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1960 का दशक | “पर्यावरण पर होने वाले असर की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया।” |
| ★1972 | ‘क्लब ऑव रोम’ (विद्वत् समूह) ने ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ प्रकाशित की — “बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का अंदेशा” |
| — | UNEP (संयुक्त राष्ट्रसंघ पर्यावरण कार्यक्रम) सहित संगठनों ने सम्मेलन कराए → “तभी से पर्यावरण वैश्विक राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण मसला बन गया।” |
2 · पृथ्वी सम्मेलन 1992 (पृ. 83–84)
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब, कहाँ | ★1992, रियो डी जनेरियो (ब्राज़ील) |
| किसका | संयुक्त राष्ट्रसंघ का — पर्यावरण और विकास पर केंद्रित |
| ★★कौन शामिल | 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय निगम |
| ★पृष्ठभूमि | बर्टलैंड रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ (1987) — “आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे” |
उत्तर बनाम दक्षिण★★
| पक्ष | मुख्य चिंता |
|---|---|
| उत्तरी गोलार्द्ध (धनी, विकसित) | “ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि” |
| दक्षिणी गोलार्द्ध (गरीब, विकासशील) | “आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने” की चिंता |
रियो के परिणाम(प्रश्न 4)★
- “जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।”
- ★“‘अजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाए गए।”
- ★★‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति — “आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे।”
- ! “लेकिन इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं।”
दो आलोचनाएँ(उत्तर में ज़रूर लिखिए — यह अंक बढ़ाती हैं)ध्यान
- “समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा।”
- ★“कुछ आलोचकों का कहना है कि ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर है।”
3 · विश्व की साझी संपदा (पृ. 84–86)
दो परिभाषाएँ — इन्हें मिलाइए मत(प्रश्न 5)★★
| पद | परिभाषा |
|---|---|
| साझी संपदा | “जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है।” उदाहरण — संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ, नदी |
| ★★वैश्विक संपदा / ‘मानवता की साझी विरासत’ | “विश्व के कुछ हिस्से… किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है।” |
★★चार वैश्विक संपदाएँ — यह सूची रट लीजिए: पृथ्वी का वायुमंडल · अंटार्कटिका · समुद्री सतह · बाहरी अंतरिक्ष
तीन समझौते★
| समझौता | वर्ष |
|---|---|
| अंटार्कटिका संधि | 1959 |
| मॉन्ट्रियल न्यायाचार (प्रोटोकॉल) | 1987 |
| अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार | 1991 |
मूल कठिनाईध्यान
- “‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है।”
- ★“पारिस्थितिकी से जुड़े हर मसले के साथ एक बड़ी समस्या यह जुड़ी है कि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं।”
- ★इसी संदर्भ में — “1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छेद की खोज एक आँख खोल देने वाली घटना है।”
- ★★बाहरी अंतरिक्ष में भी वही असमानता — “जो दोहन-कार्य हो रहे हैं उनके फायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।”
अंटार्कटिका — बॉक्स के मुख्य तथ्य★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| क्षेत्रफल | 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किमी |
| विश्व के निर्जन क्षेत्र का हिस्सा | 26% |
| ★स्थलीय हिम | 90% |
| ★धरती का स्वच्छ जल | 70% |
| समुद्र में अतिरिक्त विस्तार | 3 करोड़ 60 लाख वर्ग किमी |
- ★क्रिल मछली — “समुद्री आहार शृंखला की धुरी”
- ★अंदरूनी हिमानी परत — “ग्रीन हाऊस गैस के जमाव का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत”; लाखों बरस पहले के वायुमंडलीय तापमान का पता
- ★★दो दावे: ब्रिटेन, अर्जेन्टीना, चिले, नार्वे, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड ने संप्रभु अधिकार का दावा किया; अन्य अधिकांश देशों ने कहा यह विश्व की साझी संपदा है
- ! “1959 के बाद गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित” — फिर भी कुछ हिस्से तेल के रिसाव से गुणवत्ता खो रहे हैं
4 · साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (पृ. 86–87)★★
दो रवैये
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| उत्तर | “पर्यावरण के संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो” |
| ★★दक्षिण | “पारिस्थितिकी को नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है” → “उन्हें भरपाई की जिम्मेदारी भी ज्यादा उठानी चाहिए”; और “विकासशील देशों पर वे प्रतिबंध न लगें जो विकसित देशों पर लगाये जाते हैं” |
- ★★“सन् 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस तर्क को मान लिया गया और इसे ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कहा गया।”
रियो-घोषणापत्र का उद्धरण(प्रश्न 6 का उत्तर)★★
“धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए विभिन्न देश विश्व-बंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे। पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होंगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।”
UNFCCC → क्योटो की कड़ी★
| वर्ष | क्या |
|---|---|
| ★1992 | UNFCCC (यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) — सिद्धांतों की रूपरेखा। देश “अपनी क्षमता के अनुरूप, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर” प्रयास करेंगे |
| ★1997 | क्योटो प्रोटोकॉल (जापान के क्योटो में) — “औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित” |
- ★गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन
- दो स्वीकृतियाँ: “ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा हिस्सा विकसित देशों का है”; और “विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है।”
- ★★परिणाम: “इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो-प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।”
5 · साझी संपदा और देवस्थान (पृ. 87–88)
- ★“साझी संपदा का अर्थ होता है ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो।”
- “समूह के हर सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होंगे और समान उत्तरदायित्व निभाने होंगे।”
- !★★चार कारण जिनसे यह सिमट रही है: “निजीकरण, गहनतर खेती, आबादी की वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट” → “पूरी दुनिया में साझी संपदा का आकार घट रहा है, उसकी गुणवत्ता और गरीबों को उसकी उपलब्धता कम हो रही है।”
पावन वन-प्रांत (‘देवस्थान’)★
| राज्य | नाम |
|---|---|
| राजस्थान | वानी, केंकड़ी, ओरान |
| झारखंड | जहेरा थान, सरना |
| मेघालय | लिंगदोह |
| केरल | काव |
| उत्तराखंड | थान, देवभूमि |
| महाराष्ट्र | देव रहतिस |
- “इस प्रथा में वनों के कुछ हिस्सों को काटा नहीं जाता। इन स्थानों पर देवता अथवा किसी पुण्यात्मा का वास माना जाता है।”
- ★“‘देवस्थान’ को हम ऐसी व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं जिसके अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।”
- ★इससे जैव-विविधता, पारिस्थितिकी-संरक्षण और सांस्कृतिक वैविध्य — तीनों कायम रहते हैं।
- ★★कुंजी-वाक्य: “संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखने की प्रतिबद्धता कायम रखी।”
- ! आज की कठिन समस्या: “कानूनी स्वामित्व राज्य का हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में। इन दोनों के नीतिगत मानक अलग-अलग हैं।”
6 · पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष (पृ. 88–90)★★
6.1 भारत और क्योटो
- ★★“भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।”
- छूट क्यों: “औद्योगीकरण के दौर में ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में इनका कुछ ख़ास योगदान नहीं था।”
- ! आलोचकों का तर्क: “भारत और चीन भी जल्दी ही ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों की भाँति अगली कतार में नज़र आयेंगे।”
6.2 ‘ऐतिहासिक उत्तरदायित्व’ का तर्क★★
- “भारत पर्यावरण से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मसलों में ज्यादातर ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का तर्क रखता है।”
- ★“ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज्यादातर विकसित देशों की है।”
- ★★“‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’”
- जून 2005, ग्रुप-8 की बैठक — भारत ने ध्यान दिलाया कि “विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है।”
- ! भारत किसके खिलाफ है: तेजी से औद्योगिक होते देशों (ब्राजील, चीन, भारत) पर बाध्यता — “यह बात इस नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध है।”
6.3 वह आँकड़ा जो सारा तर्क सिद्ध करता है★★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| विश्व का औसत (सन् 2000) | 3.8 टन प्रति व्यक्ति |
| ★भारत (2000 तक) | 0.9 टन |
| ★भारत (2030 का अनुमान) | 1.6 टन |
★★“2030 तक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बढ़ने के बावजूद विश्व के (सन् 2000 के) औसत के आधे से भी कम होगा।”
6.4 भारत के सात कदम(प्रश्न 9 का उत्तर)★
- नेशनल ऑटो-फ्यूल पॉलिसी — वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य
- ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2001 — ऊर्जा के कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी
- बिजली अधिनियम, 2003 — नवीकरणीय (Renewable) ऊर्जा को बढ़ावा
- प्राकृतिक गैस का आयात और स्वच्छ कोयले पर आधारित प्रौद्योगिकी
- बायोडीजल राष्ट्रीय मिशन — 2011-12 तक बायोडीजल; 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि
- ★★“भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते को अनुमोदित किया।”
- “पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है।”
6.5 दो और बातें
- ! 1997 का पुनरावलोकन — निष्कर्ष: “विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।”
- ★क्षेत्रीय पहल: “‘दक्षेस’ (SAARC) में शामिल देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें ताकि इस क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो सके।”
7 · पर्यावरण आंदोलन — एक या अनेक (पृ. 90–92)
- ★“कुछ महत्त्वपूर्ण पेशकदमियाँ सरकारों की तरफ से नहीं बल्कि… कार्यकर्ताओं ने की हैं।”
- ★“आज पूरे विश्व में पर्यावरण आंदोलन सबसे ज्यादा जीवंत, विविधतापूर्ण तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं।”
- ★★“सामाजिक चेतना के दायरे में ही राजनीतिक कार्रवाई के नये रूप जन्म लेते हैं या उन्हें खोजा जाता है।”
- ★“मौजूदा पर्यावरण आंदोलनों की एक मुख्य विशेषता उनकी विविधता है।”
(क) वन-आंदोलन★
- कहाँ: मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ्रीका और भारत
- ! “तीन दशकों से सक्रियता का दौर जारी है। इसके बावजूद तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों में वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी है। पिछले दशक में विश्व के विशालतम वनों का विनाश बढ़ा है।”
बॉक्स — ‘क्या वन निर्जन होते हैं?’★★
| उत्तरी देश | दक्षिणी देश | |
|---|---|---|
| वन क्या हैं | “जनविहीन”; “निर्जन प्रांत” | ★“दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं” |
| मनुष्य कहाँ | ! “यह दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता” | ★★“लोग वनों में भी रहते हैं” |
| पर्यावरण किससे बचे | “बाग-बगीचे या अभयारण्य में तब्दील कर मनुष्यों से बचाया जाना चाहिए” | मनुष्य समस्या नहीं |
| कहाँ हावी | ऑस्ट्रेलिया, स्कैंडिनेविया, उत्तरी अमरीका, न्यूजीलैंड | — |
- पर दक्षिण में भी अभियान हैं: फिलीपीन्स — ‘हरित-संगठनों’ का गरुड़-अभियान; भारत — ‘बंगाल-टाइगर’; अफ्रीका — हाथीदाँत के व्यापार के विरुद्ध; ब्राजील और इंडोनेशिया के जंगलों में संघर्ष। ★कई की शुरुआत और वित्तीय मदद WWF ने की।
(ख) खनिज-उद्योग विरोधी आंदोलन★
- ★“खनिज-उद्योग पृथ्वी पर मौजूद सबसे ताकतवर उद्योगों में एक है।”
- पाँच नुकसान: संसाधनों का दोहन · रसायनों का भरपूर उपयोग · भूमि और जलमार्गों का प्रदूषण · स्थानीय वनस्पतियों का विनाश · जन-समुदायों का विस्थापन
- ★फिलीपीन्स — ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के विरुद्ध अभियान
- ★★विडंबना: “इस कंपनी का विरोध खुद इसके स्वदेश यानी ऑस्ट्रेलिया में हुआ” — कारण: परमाण्विक शक्ति की मुख़ालफत और आस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों की पैरोकारी
(ग) बाँध-विरोधी आंदोलन★★
- ★“अब बाँध-विरोधी आंदोलन को नदियों को बचाने के आंदोलनों के रूप में देखने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है” — क्योंकि इनमें “नदियों और नदी-घाटियों के ज्यादा टिकाऊ तथा न्यायसंगत प्रबंधन” की बात उठती है।
- ★★विश्व का पहला: “1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन दक्षिणी गोलार्द्ध में चला। आस्ट्रेलिया में चला यह आंदोलन फ्रैंकलिन नदी तथा इसके परिवर्ती वन को बचाने का आंदोलन था।”
- आज की होड़: “तुर्की से लेकर थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका तक तथा इंडोनेशिया से लेकर चीन तक बड़े बाँधों को बनाने की होड़ लगी है।”
- ★★भारत: “भारत में बाँध-विरोधी और नदी हितैषी कुछ अग्रणी आंदोलन चल रहे हैं। इन आंदोलनों में नर्मदा आंदोलन सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।” और “भारत के ये आंदोलन एक अर्थ में समानधर्मी हैं क्योंकि ये अहिंसा पर आधारित हैं।”
8 · संसाधनों की भू-राजनीति (पृ. 92–95)
परिभाषा★★
“‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’ — ‘संसाधनों की भू-राजनीति’ इन्हीं सवालों से जूझती है।”
- “यूरोपीय ताकतों के विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साधन और मकसद संसाधन रहे हैं।”
- “संसाधनों से जुड़ी भू-राजनीति को पश्चिमी दुनिया ने ज्यादातर व्यापारिक संबंध, युद्ध तथा ताकत के संदर्भ में सोचा।”
ऐतिहासिक क्रम★
| काल | संसाधन |
|---|---|
| 17वीं सदी से | ★इमारती लकड़ी — “समुद्री नौवहन स्वयं इमारती लकड़ियों पर आधारित था” |
| दोनों विश्वयुद्ध | ★तेल — “सामरिक संसाधनों, खासकर तेल की निर्बाध आपूर्ति का महत्त्व उजागर” |
| शीतयुद्ध | चार कदम (नीचे) |
शीतयुद्ध में विकसित देशों के चार कदम★★
- “संसाधन-दोहन के इलाकों तथा समुद्री परिवहन-मार्गों के इर्द-गिर्द सेना की तैनाती”
- “महत्त्वपूर्ण संसाधनों का भंडारण”
- ! “संसाधनों के उत्पादक देशों में मनपसंद सरकारों की बहाली”
- “बहुराष्ट्रीय निगमों और अपने हितसाधक अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को समर्थन देना”
- कारण: “संसाधनों तक पहुँच अबाध बनी रहे क्योंकि सोवियत संघ इसे खतरे में डाल सकता था”; और “खाड़ी के तेल तथा दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के खनिज पर विकसित देशों का नियंत्रण बरकरार रहे।”
- ★★“बहरहाल, वैश्विक रणनीति में तेल लगातार सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है।”
तेल — चार आँकड़े★★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| खाड़ी-क्षेत्र का विश्व तेल-उत्पादन में हिस्सा | 30 प्रतिशत |
| ★इस क्षेत्र में विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का हिस्सा | 64 प्रतिशत — “यही एकलौता क्षेत्र है जो माँग बढ़ने पर पूर्ति कर सकता है” |
| ★सऊदी अरब | कुल भंडार का एक चौथाई; विश्व का सबसे बड़ा तेल-उत्पादक |
| ★इराक | ज्ञात भंडार में दूसरा; “भंडार 112 अरब बैरल से कहीं ज्यादा हो सकता है” |
- ★“पेट्रोलियम का इतिहास युद्ध और संघर्षों का भी इतिहास है।”
- ! विरोधाभास: “अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत में इस तेल की खपत होती है — लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूरी पर हैं।”
- ★बॉक्स: “परिवहन के लिए जितनी ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है उसका 95 फीसदी पेट्रोलियम से ही पूरा होता है।”
पानी और ‘जलयुद्ध’★★
- “विश्व के हर हिस्से में स्वच्छ जल समान मात्रा में मौजूद नहीं है।”
- ★★“संभावना है कि साझे जल-संसाधन को लेकर पैदा मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों… इसी को इंगित करने के लिए विश्व-राजनीति के कुछ विद्वानों ने ‘जलयुद्ध’ शब्द गढ़ा है।”
- ★मतभेद का ढाँचा: “जलधारा के उद्गम से दूर बसा हुआ देश उद्गम के नजदीक बसे हुए देश द्वारा इस पर बाँध बनाने, अत्यधिक सिंचाई करने या इसे प्रदूषित करने पर आपत्ति जताता है।”
- ★दो उदाहरण:
- “1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जार्डन के बीच हुआ संघर्ष” — जॉर्डन और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोशिश
- “फिलहाल तुर्की, सीरिया और इराक के बीच फरात नदी पर बाँध के निर्माण को लेकर एक-दूसरे से ठनी हुई है।”
9 · मूलवासी और उनके अधिकार (पृ. 95–97)
UN की परिभाषा (1982)★★
“इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे। फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से उस देश में आये और इन लोगों को अधीन बना लिया।”
- ★“किसी देश के ‘मूलवासी’ आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से ज्यादा अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रिवाज तथा अपने ख़ास सामाजिक, आर्थिक ढर्रे पर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं।”
- ★“मूलवासियों का सवाल पर्यावरण, संसाधन और राजनीति को एक साथ जोड़ देता है।”
आँकड़े★★
| स्थान | संख्या |
|---|---|
| विश्व भर में (भारत सहित) | ★लगभग 30 करोड़ |
| फिलीपीन्स — कोरडिलेरा | 20 लाख |
| चिले — मापुशे | 10 लाख |
| बांग्लादेश — चटगांव पर्वतीय क्षेत्र | 6 लाख |
| उत्तर अमरीका | 35 लाख |
| पनामा नहर के पूरब — कुना | 50 हज़ार |
| उत्तरी सोवियत | 10 लाख |
माँग और विश्वदृष्टि★
- “इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए।”
- ★★“विश्वभर के मूलनिवासी यह जुमला इस्तेमाल करते हैं कि हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’।”
- ★“जमीन और उस पर आधारित जीवन-प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्टि आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है।”
- ★★मूल तर्क: “भूमि की हानि का अर्थ है, आर्थिक-संसाधनों के एक आधार की हानि… उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?”
भारत में★★
- “भारत में ‘मूलवासी’ के लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द प्रयोग किया जाता है। ये कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं।”
- “अधिकांश आदिवासी जनता अपने जीवन-यापन के लिए खेती पर निर्भर है।” ! “ब्रितानी औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद से जनजातीय समुदायों का सामना बाहरी लोगों से हुआ।”
- ★★अध्याय का सबसे तीखा निष्कर्ष: “राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से इनको संवैधानिक सुरक्षा हासिल है लेकिन देश के विकास का इन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिल सका। …ऐसी परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह समुदाय सबसे बड़ा है। दरअसल इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”
अंतर्राष्ट्रीय आवाज़★
- “1970 के दशक में विश्व के विभिन्न भागों के मूलवासियों के नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा।”
- ★★“1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले इस परिषद् को परामर्शदायी परिषद् का दर्ज़ा दिया गया।” और 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों को भी यह दर्ज़ा।
अंतिम पन्ना — परीक्षा से 5 मिनट पहले
छह वाक्य जो रट लीजिए★★
- “इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।”
- “पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होंगी।”
- “आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। इसे ‘टिकाऊ विकास’ का तरीका कहा गया।”
- “संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखने की प्रतिबद्धता कायम रखी।”
- “‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’ — ‘संसाधनों की भू-राजनीति’ इन्हीं सवालों से जूझती है।”
- “उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?”
नौ भ्रम जो हर साल होते हैं★
| ! भ्रम | ✓ सही |
|---|---|
| साझी संपदा = वैश्विक संपदा | साझी संपदा = समुदाय की (चारागाह, कुआँ); वैश्विक संपदा = संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर (चार) |
| क्योटो 1992 में हुआ | 1992 = पृथ्वी सम्मेलन और UNFCCC; 1997 = क्योटो प्रोटोकॉल |
| भारत ने 1997 में हस्ताक्षर किए | भारत ने 2002 में हस्ताक्षर और अनुमोदन किया |
| पेरिस समझौते का अनुमोदन 2015 में | भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को अनुमोदित किया |
| पृथ्वी सम्मेलन में 190 देश थे | 170 देश |
| अंटार्कटिका संधि 1991 की है | अंटार्कटिका संधि 1959; पर्यावरणीय न्यायाचार 1991 |
| खाड़ी में विश्व के 64% तेल का उत्पादन होता है | उत्पादन 30%; ज्ञात भंडार 64% |
| पहला बाँध-विरोधी आंदोलन भारत में हुआ | विश्व का पहला ऑस्ट्रेलिया में — फ्रैंकलिन नदी; भारत का सबसे प्रसिद्ध नर्मदा आंदोलन |
| मूलवासी भारत की जनसंख्या का 30% हैं | भारत में 8 प्रतिशत; विश्व भर में कुल लगभग 30 करोड़ |
एक पंक्ति में हर खंड★
- राजनीति क्यों → “जवाब इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।”
- पृथ्वी सम्मेलन → 1992, रियो, 170 देश; अजेंडा-21 और टिकाऊ विकास; पर उत्तर-दक्षिण की खाई बनी रही।
- वैश्विक संपदा → वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह, बाहरी अंतरिक्ष।
- साझी परंतु अलग-अलग → योगदान अलग-अलग है, इसलिए जिम्मेदारी भी।
- साझी संपदा → समान अधिकार + समान उत्तरदायित्व; देवस्थान इसका जीवंत उदाहरण।
- भारत → ऐतिहासिक उत्तरदायित्व; 0.9 टन बनाम 3.8 टन; क्योटो 2002, पेरिस 2016।
- आंदोलन → वन, खनिज, बाँध — और उनकी विविधता ही उनकी ताकत है।
- भू-राजनीति → तेल (30% उत्पादन, 64% भंडार) और पानी (‘जलयुद्ध’)।
- मूलवासी → 30 करोड़ विश्व में, 8% भारत में — और “विकास की सबसे बड़ी कीमत” इन्हीं ने चुकायी।