अध्याय 2एक दल के प्रभुत्व का दौर

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 26–43.

परीक्षा-केंद्रित संक्षेपण। ★सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिंदुओं को दर्शाता है।

उपनिवेश से आज़ाद हुए अधिकतर देशों ने “पहले एकता, लोकतंत्र बाद में” चुनकर लोकतंत्र खो दिया; भारत ने कठिन रास्ता चुना और 17 करोड़ मतदाताओं के साथ चुनाव कराए — फिर भी पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा, पर यह प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ, क्योंकि कांग्रेस स्वयं एक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन थी — इसी को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहते हैं।

1. लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती★

  • उपनिवेश-मुक्त कई देशों के नेताओं का तर्क: “राष्ट्रीय एकता हमारी पहली प्राथमिकता है और लोकतंत्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा।”
  • अलोकतांत्रिक शासन के तीन रूप: (i) थोड़ा-बहुत लोकतंत्र, पर नियंत्रण एक नेता के हाथ; (ii) एक दल का शासन; (iii) सेना ने सत्ता सँभाली।
  • एक बार अलोकतांत्रिक शासन के पाँव जम गए तो उसे बदल पाना मुश्किल होता गया।
  • ★भारत ने कहीं ज्यादा कठिन रास्ता चुना — क्योंकि स्वतंत्रता-संग्राम की गहरी प्रतिबद्धता लोकतंत्र से थी। नेता राजनीति को समस्या नहीं, समस्या के समाधान का उपाय मानते थे।
तिथिघटना
26 नवम्बर 1949संविधान अंगीकृत
24 जनवरी 1950संविधान पर हस्ताक्षर
26 जनवरी 1950संविधान लागू
जनवरी 1950भारत के चुनाव आयोग का गठन; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त

अंबेडकर की चेतावनी (25 नवंबर 1949, संविधान सभा): “राजनीति में नायक-पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और यह रास्ता तानाशाही की तरफ़ जाता है।”

स्मृति-सूत्र: संविधान की तीन तारीखें — 26 नव. 1949 → 24 जन. 1950 → 26 जन. 1950।

2. पहला आम चुनाव★★

कठिनाइयाँ

  • चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन और मतदाता-सूची बनाना।
  • ★मतदाता-सूची के पहले प्रारूप में 40 लाख महिलाओं के नाम छूट गए — उन्हें ‘अलां की बेटी’, ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज किया गया था। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियाँ मानने से इनकार कर दिया।

आँकड़े★★

मात्रामान
कुल मतदाता17 करोड़
चुने जाने थे — विधायक / सांसद3,200 / 489
साक्षर मतदातामात्र 15 फीसदी
प्रशिक्षित अधिकारी-चुनावकर्मी3 लाख से ज्यादा
स्टील की मतपेटियाँतकरीबन 20 लाख
औसतन प्रति सीट उम्मीदवारचार
मतदान करने वालेकुल मतदाताओं में आधे से अधिक

आलोचना और उसका उत्तर★

  • एक हिंदुस्तानी संपादक: “इतिहास का सबसे बड़ा जुआ”।
  • ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका: नेहरू “अपने जीवित रहते ही… पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।”
  • ICS के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे: “लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी…”
  • ★चुनाव दो बार स्थगित हुए; आखिरकार अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 तक हुए। ‘1952 का चुनाव’ इसलिए कहा जाता है कि अधिकांश मतदान 1952 में हुआ। कुल छह महीने लगे।
  • हारने वालों ने भी परिणामों को निष्पक्ष बताया।
  • टाइम्स ऑफ इंडिया: इसने “उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया”।
  • हिंदुस्तान टाइम्स: “भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया।”
  • ★★“1952 का आम चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।” अब यह दलील देना संभव नहीं रहा कि लोकतांत्रिक चुनाव गरीबी अथवा अशिक्षा के माहौल में नहीं कराए जा सकते।

मतदान के बदलते तरीके★

दौरतरीका
पहला आम चुनावहर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी (उस पर उसका चुनाव-चिह्न); मतदाता को खाली मतपत्र
शुरुआती दो चुनावों के बादमतपत्र पर सब उम्मीदवारों के नाम + चिह्न; मुहर लगानी होती थी — यह अगले चालीस साल चला
1990 के दशक के अंतईवीएम का इस्तेमाल शुरू
2004पूरे देश में ईवीएम

3. पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व★★

परिणाम

चुनाववर्षकुल सीटेंकांग्रेस
पहला1952489364
दूसरा1957494371
तीसरा1962494361
  • ★1952 में CPI दूसरे नंबर पर — 16 सीट।
  • त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस ने अधिकतर सीटें जीतीं — और आखिरकार इन तीन में भी कांग्रेस की सरकार बनी।
  • नेहरू पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने।
  • ★कांग्रेस ने जितनी सीटें जीतीं उसका दशांश भी कोई विपक्षी पार्टी नहीं जीत सकी।

कांग्रेस की बढ़त के कारण★

  1. स्वाधीनता संग्राम की विरासत — राष्ट्रीय आंदोलन की वारिस।
  2. एकमात्र पार्टी जिसका संगठन पूरे देश में था, नेटवर्क स्थानीय स्तर तक।
  3. नेहरू — सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता; पूरे देश का दौरा।
  4. ★‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा — अनेक पार्टियाँ स्वतंत्रता के आस-पास या बाद में बनीं।

चुनाव-प्रणाली का योगदान★★

दलवोट (1952)सीट (1952)
कांग्रेस45 प्रतिशत74 फीसदी
सोशलिस्ट पार्टी10 प्रतिशत3 प्रतिशत भी नहीं
  • कारण — ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ (FPTP)। थोड़े ज्यादा वोट पर कहीं ज्यादा सीटें।
  • सभी गैर-कांग्रेसी वोट जोड़ दें तो कांग्रेस से ज्यादा होते — पर वे कई पार्टियों में बँट गए।

केरल में कम्युनिस्टों की जीत★★

  • 1957 के मार्च के विधानसभा चुनाव: कम्युनिस्ट पार्टी को 126 में से 60 सीटें + 5 स्वतंत्र उम्मीदवारों का समर्थन।
  • राज्यपाल ने ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया।
  • ★★“दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी।”
  • कांग्रेस ने ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ा।
  • ★1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केरल की सरकार बर्खास्त कर दी — यह संविधान-प्रदत्त आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में बार-बार उद्धृत हुआ।

4. कांग्रेस के प्रभुत्व की प्रकृति★★

भारत का प्रभुत्व दूसरों से अलग क्यों

कहाँकैसे कायम हुआ
चीन, क्यूबा, सीरियासंविधान में ही सिर्फ एक पार्टी को अनुमति
म्यांमार, बेलारूस, इरीट्रियाकानूनी और सैन्य उपायों से
मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, ताईवानकुछ साल पहले तक एक-दलीय प्रभुत्व वाले
★भारतलोकतांत्रिक स्थितियों में — मुक्त और निष्पक्ष चुनाव में होड़ के बावजूद
  • बाकी मुल्कों में प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ — यही निर्णायक फ़र्क है।
  • सबसे नज़दीकी तुलना: दक्षिण अफ्रीका — रंगभेद के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का ऐसा ही दबदबा।

कांग्रेस = दो गठबंधन★★

  • जन्म 1885 में — तब नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का हित-समूह भर; 20वीं सदी में जनआंदोलन का रूप।
  • शुरू में अँग्रेज़ीदाँ, अगड़ी जाति, ऊँचला मध्यवर्ग, शहरी अभिजन; सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से सामाजिक आधार बढ़ा।
  • ★सामाजिक गठबंधन — किसान और उद्योगपति, शहर और गाँव, मज़दूर और मालिक, सब वर्ग और जाति। “आज़ादी के समय तक कांग्रेस एक सतरंगे सामाजिक गठबंधन की शक्ल अख़्तियार कर चुकी थी।”
  • ★विचारधारात्मक गठबंधन — क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यमार्गी — सबका समावेश।
  • “कांग्रेस एक मंच की तरह थी” — आज़ादी से पहले अनेक संगठनों और पार्टियों को उसमें रहने की इजाज़त थी।

गुट (Faction) — कमज़ोरी नहीं, ताकत★★

  • गठबंधनी स्वभाव के दो फायदे:
    1. जो भी आए, गठबंधन उसे शामिल कर लेता है → अतिवाद से बचना, सुलह-समझौता और सर्व-समावेश। इससे विपक्ष कठिनाई में पड़ा — उसकी बात को कांग्रेस के कार्यक्रम में तुरंत जगह मिल जाती थी।
    2. अंदरूनी मतभेदों के प्रति सहनशीलता → नाखुश समूह भी पार्टी में ही बना रहता था, बाहर जाकर नई पार्टी बनाने के बजाय भीतर के किसी दूसरे गुट से लड़ना बेहतर समझता था।
  • गुट बनने के पीछे विचारधारा भी थी और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा भी।
  • ★“अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी बनने की बजाय उसकी ताकत साबित हुई।”
  • दूसरी पार्टियाँ हाशिए पर रहकर, कांग्रेस के किसी गुट को प्रभावित करके ही नीतियों पर असर डाल पाती थीं।
  • गुटों की प्रणाली शासक-दल के भीतर संतुलन साधने का औजार थी।
  • ★★“कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका निभायी और विपक्ष की भी। इसी कारण इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।”

5. विपक्षी पार्टियों का उद्भव★

  • इस दौर में विपक्षी पार्टियाँ थीं — “बहुदलीय लोकतंत्र वाले अन्य अनेक देशों की तुलना में उस वक्त भी भारत में बहुविध और जीवन्त विपक्षी पार्टियाँ थीं।”
  • कई पार्टियाँ 1952 के चुनावों से कहीं पहले बन चुकी थीं।
  • ★“आज की लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी न किसी विपक्षी पार्टी में खोजी जा सकती हैं।”
  • इन्हें कहने भर को प्रतिनिधित्व मिला, फिर भी चार निर्णायक भूमिकाएँ:
    1. सुचिन्तित आलोचना — “इस आलोचना में सिद्धांतों का बल होता था।”
    2. शासक-दल पर अंकुश; कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन बदला।
    3. लोकतांत्रिक विकल्प की संभावना जीवित रखी → व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका।
    4. ऐसे नेता तैयार किए जिन्होंने आगे देश की तस्वीर संवारी।

पारस्परिक सम्मान का दौर★

  • अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे।
  • नेहरू ने जयप्रकाश नारायण को सरकार में आने का न्यौता दिया।
  • यह भाव दलगत प्रतिस्पर्धा तेज होने के बाद लगातार कम होता गया।

प्रभुत्व का अंत

  • ★“सत्ता पाने की लालसा रखने वाले हर व्यक्ति और हर हित-समूह को अपने अंदर समाहित करने की कांग्रेस की क्षमता जैसे-जैसे घटी, वैसे-वैसे दूसरे राजनीतिक दलों को महत्त्व मिलना शुरू हुआ। इस तरह कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा।”

6. तीन प्रमुख विपक्षी दल — तुलना तालिका★★

सोशलिस्ट पार्टीभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)भारतीय जनसंघ
जड़ेंकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, 1934 (कांग्रेस के भीतर)1920 के दशक के साम्यवादी समूह; बोल्शेविक क्रांति से प्रेरितRSS और हिंदू महासभा
अलग कब हुए / गठन★1948 — कांग्रेस ने दोहरी सदस्यता समाप्त की★1941 दिसंबर — नाज़ी जर्मनी के विरुद्ध ब्रिटेन को समर्थन देने के फ़ैसले पर★1951
संस्थापक/प्रमुखजयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया, एस.एम. जोशीए.के. गोपालन, एस.ए. डांगे, ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, पी.सी. जोशी, अजय घोष, पी. सुंदरैया★श्यामा प्रसाद मुखर्जी (संस्थापक-अध्यक्ष), दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक
विचारधारालोकतांत्रिक समाजवाद — कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों से अलग1947 की आज़ादी सच्ची आज़ादी नहीं; तेलंगाना में हिंसक विद्रोह★‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’
मोड़★1955 — कांग्रेस ने ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ का लक्ष्य घोषित किया → विकल्प बनना मुश्किल★1951 — हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ा, चुनाव में भाग लिया1964 — चीन के आण्विक-परीक्षण के बाद भारत के आण्विक हथियार की पैरोकारी
1952 का प्रदर्शनवोट में दूसरा (10%), पर 3% सीटें भी नहीं★सीट में दूसरा — 16 सीटें★3 सीटें (1957 में 4)
समर्थन-क्षेत्रअधिकतर राज्यों में मौजूदगी, छिटपुट सफलताआंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, केरलराजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के शहरी इलाके
आगे क्या बनासमाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू), जनता दल (एस)★1964 में टूट (चीन–सोवियत मतभेद) → CPI(M); दोनों आज भी कायम★भारतीय जनता पार्टी

स्वतंत्र पार्टी — पाठ्यपुस्तक में केवल मानचित्र की संकेत-सूची (पृ. 31) और प्रश्नावली (पृ. 42) में। प्रश्न 1(ग) के अनुसार “राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था” इसका निर्देशक सिद्धांत था; प्रश्न 2 में इसे मीनू मसानी से जोड़ा गया है।

याद रखने योग्य आँकड़े★★

विवरणमान
संविधान अंगीकृत / हस्ताक्षर / लागू26 नव. 1949 / 24 जन. 1950 / 26 जन. 1950
चुनाव आयोग का गठनजनवरी 1950; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त
मतदाता-सूची से छूटे महिलाओं के नाम40 लाख
कुल मतदाता17 करोड़
चुने जाने थे — विधायक / सांसद3,200 / 489
साक्षर मतदाता15 फीसदी
प्रशिक्षित चुनावकर्मी3 लाख से ज्यादा
मतपेटियाँ20 लाख स्टील के बक्से
पहला आम चुनावअक्तूबर 1951 – फरवरी 1952; छह महीने
औसतन प्रति सीट उम्मीदवारचार
1952 — कुल सीट / कांग्रेस489 / 364
1957 — कुल सीट / कांग्रेस494 / 371
1962 — कुल सीट / कांग्रेस494 / 361
1952 में CPI16 सीट (दूसरा स्थान)
कांग्रेस, 195245% वोट → 74% सीट
सोशलिस्ट पार्टी, 195210% वोट → 3% से कम सीट
केरल 1957126 में से 60 + 5 निर्दलीय
केरल सरकार बर्खास्त1959, अनुच्छेद 356
कांग्रेस का जन्म1885
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी / सोशलिस्ट पार्टी1934 / 1948
‘समाजवादी बनावट वाला समाज’1955
CPI कांग्रेस से अलग / चुनावी रास्ता / टूट1941 दिसं. / 1951 / 1964
जनसंघ का गठन1951
जनसंघ की सीटें — 1952 / 19573 / 4
चीन का आण्विक-परीक्षण1964
पूरे देश में EVM2004

व्यक्ति और उनकी पहचान

नामपहचान
सुकुमार सेनपहले चुनाव आयुक्त
जवाहरलाल नेहरूसबसे करिश्माई नेता; पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री
डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891–1956)संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष; इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के संस्थापक; शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन; रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के योजनाकार; ★हिंदू कोड बिल पर 1951 में इस्तीफा; ★1956 में बौद्ध धर्म अपनाया
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888–1958)मूल नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद; इस्लाम के विद्वान; विभाजन के विरोधी; ★पहले मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री
राजकुमारी अमृतकौर (1889–1964)कपूरथला के राजपरिवार में जन्म; ★पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री, 1957 तक
रफी अहमद किदवई (1894–1954)उत्तर प्रदेश से कांग्रेस नेता; ★पहले मंत्रिमंडल में संचार मंत्री; खाद्य एवं कृषि मंत्री (1952–54)
श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901–1953)हिंदू महासभा के नेता; ★भारतीय जनसंघ के संस्थापक; ★पाकिस्तान नीति पर मतभेद के कारण 1950 में इस्तीफा; कश्मीर को स्वायत्तता देने के खिलाफ़; हिरासत में मौत
आचार्य नरेन्द्र देव (1889–1956)कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक; बौद्ध धर्म के विद्वान; किसान आंदोलन में सक्रिय
ए.के. गोपालन (1904–1977)केरल के कम्युनिस्ट नेता; 1939 में पार्टी में शामिल; 1964 के बाद CPI(M) में; 1952 से सांसद
दीनदयाल उपाध्याय (1916–1968)1942 से RSS के पूर्णकालिक कार्यकर्ता; जनसंघ के संस्थापक सदस्य, महासचिव फिर अध्यक्ष; ★‘समग्र मानवतावाद’ के प्रणेता
ई.एम.एस. नम्बूदरीपादकेरल में दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री
राममनोहर लोहिया / अशोक मेहता1955 के बाद कांग्रेस से दूरी / हल्का-फुल्का सहयोग
रजनी कोठारीप्रश्न 5 के अवतरण के लेखक — पटेल की ‘अनुशासित पार्टी’ वाली धारणा की आलोचना

अंतिम क्षण के जालध्यान

  1. ★1952 में दूसरा स्थान — सीट में CPI (16), वोट में सोशलिस्ट पार्टी (10%)। दोनों अलग हैं।
  2. ★45% वोट → 74% सीट। उलटा मत लिखिए।
  3. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934) कांग्रेस के भीतर; सोशलिस्ट पार्टी (1948) अलग होकर।
  4. CPI कांग्रेस से 1941 में अलग हुई; चुनाव में भाग लेने का फ़ैसला 1951 में। दो अलग तिथियाँ।
  5. CPI की 1964 की टूट का कारण चीन–सोवियत वैचारिक मतभेद — कोई आंतरिक भारतीय मुद्दा नहीं।
  6. जनसंघ 1952 में 3 और 1957 में 4 सीटें — “हाशिए पर”।
  7. केरल 1957 = दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार (भारत की नहीं, दुनिया की)।
  8. अनुच्छेद 356 का प्रयोग 1959 में; कांग्रेस का ‘मुक्ति संघर्ष’ उससे पहले।
  9. भारत का एक-दलीय प्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में; चीन/क्यूबा/सीरिया में संविधान द्वारा।
  10. अंबेडकर का इस्तीफ़ा (1951) — हिंदू कोड बिल; मुखर्जी का (1950) — पाकिस्तान नीति।
  11. गुटबाजी कमज़ोरी नहीं, ताकत — पाठ्यपुस्तक का स्पष्ट कथन।
  12. ‘1952 का चुनाव’ असल में अक्तूबर 1951 में शुरू हुआ।
  13. चुनाव आयोग जनवरी 1950 में बना, पर पहला चुनाव 1951–52 में।

पाठ्यपुस्तक में मुद्रित उत्तर

इस अध्याय में कोई उत्तर-कुंजी और कोई सारांश खंड मुद्रित नहीं है। उत्तर 05-Question-Bank.md में हैं — शिक्षक द्वारा तैयार, पाठ्यपुस्तक के नहीं।