पाठ्यपुस्तक: NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 44–53 पढ़ने का समय: पहली बार 25 मिनट · दोहराने में 10 मिनट · परीक्षा से पहले 5 मिनट (सिर्फ ★★वाले भाग)
एक नज़र में पूरा अध्याय
अध्याय 1 एकता की चुनौती पर था, अध्याय 2 लोकतंत्र की — यह अध्याय तीसरी चुनौती, आर्थिक विकास पर है।
केंद्रीय दावा: ★★विकास कोई तकनीकी सवाल नहीं, राजनीतिक सवाल है। ‘विकास’ का अर्थ उद्योगपति, शहरी उपभोक्ता और विस्थापित होने वाले आदिवासी के लिए अलग-अलग है — इसलिए “‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती” — और अंतिम निर्णय विशेषज्ञ का नहीं, जन-प्रतिनिधि का होना चाहिए।
फिर अध्याय बताता है कि भारत ने कौन-सा रास्ता चुना: न पूरी तरह पूँजीवादी, न पूरी तरह समाजवादी — बल्कि नियोजन। उसकी संस्था योजना आयोग, उसका औज़ार पंचवर्षीय योजनाएँ, और उसकी दो सबसे बड़ी बहसें — कृषि बनाम उद्योग तथा केंद्रीकृत बनाम विकेंद्रित नियोजन।
पहले एक ज़रूरी चेतावनी — प्रश्न 4 के बारे मेंध्यान
प्रश्नावली का प्रश्न 4 (पृ. 53) चार मेल पूछता है — चरण सिंह, पी.सी. महालनोबिस, बिहार का अकाल और वर्गीज़ कूरियन।
!! इनमें से केवल महालनोबिस का उल्लेख अध्याय के पाठ में है। बाकी तीन और ‘जोनिंग’ — इनमें से कोई भी इस अध्याय में नहीं आता। ये हरित क्रांति और श्वेत क्रांति वाले हटाए गए खंड से हैं।
✓ उत्तर याद कर लीजिए, ढूँढ़िए मत:
| मेल | संबंध |
|---|---|
| (क) चरण सिंह | (iii) किसान |
| (ख) पी.सी. महालनोबिस | (i) औद्योगीकरण |
| (ग) बिहार का अकाल | (ii) जोनिंग |
| (घ) वर्गीज़ कूरियन | (iv) सहकारी डेयरी |
1 · विकास एक राजनीतिक सवाल है — उड़ीसा का उदाहरण (पृ. 45)
पृष्ठभूमि★
- इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ी → उड़ीसा निवेश के लिहाज़ से महत्वपूर्ण जगह बना — वहाँ लौह-अयस्क का विशाल भंडार था और अभी इसका दोहन बाकी था।
- उड़ीसा की राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय-स्तर के इस्पात-निर्माताओं के साथ सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए — पूँजी-निवेश और रोज़गार की उम्मीद में।
- !★पेच: “लौह-अयस्क के ज्यादातर भंडार उड़ीसा के सर्वाधिक अविकसित इलाकों में हैं — खासकर आदिवासी-बहुल जिलों में।”
चार टकराते हित — यह सारणी अध्याय की रीढ़ है★★
| पक्ष | उसका हित / भय |
|---|---|
| राज्य सरकार | पूँजी-निवेश और रोज़गार के अवसर |
| ★आदिवासी | विस्थापन का डर — घर-बार छूटेगा और आजीविका छिन जाएगी |
| पर्यावरणविद | खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होगा |
| केंद्र सरकार | अनुमति न दी गई तो बुरी मिसाल कायम होगी और देश में पूँजी निवेश को बाधा पहुँचेगी |
अध्याय का केंद्रीय प्रश्न और उसका उत्तर★★
प्रश्न: “उड़ीसा में किस तरह के विकास की ज़रूरत है? दरअसल, किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?”
- “इन सवालों के जवाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता।”
- ऐसे फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे के हितों की तुलना में तौला जाता है — साथ ही मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के हितों को भी।
- “किसी भी लोकतंत्र में ऐसे फ़ैसले जनता द्वारा लिए जाने चाहिए, या कम-से-कम इन पर जन-प्रतिनिधियों की स्वीकृति ज़रूरी है।”
★★यही अध्याय का शीर्षक-वाक्य है — इसे रट लीजिए: “खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए। जन-प्रतिनिधि जनता की भावनाओं को समझते हैं और जन-प्रतिनिधियों को ही ऐसे फ़ैसले लेने चाहिए।”
समाचार-बॉक्स — पोस्को प्लांट(द हिंदू, 23 जून 2006)★
- शीर्षक: “पोस्को प्लांट : उड़ीसा के ग्रामीण विरोध पर उतारू”
- जगतसिंह जिले में प्रस्तावित पोस्को-इंडिया इस्पात संयंत्र से विस्थापन का शिकार हुए लोगों ने कोरियाई कंपनी के दफ्तर के सामने प्रदर्शन किया।
- माँग: सहमति-पत्र रद्द किया जाए।
- धिंकिया, नुआगाँव और गढ़कुजंगा ग्राम पंचायत के एक सौ से भी ज्यादा स्त्री-पुरुष; पुलिस ने रोक दिया।
- ★नारा: “हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर कंपनी को इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”
- आयोजक: राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति।
2 · वामपंथ और दक्षिणपंथ (पृ. 46)★★
| पद | अर्थ |
|---|---|
| ★वामपंथ (Left) | उन लोगों की तरफ़ संकेत जो अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में हैं और मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन को प्राथमिकता देते हैं |
| ★दक्षिणपंथ (Right) | उन लोगों को इंगित करता है जो मानते हैं कि खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था के ज़रिए ही प्रगति हो सकती है — सरकार को अर्थव्यवस्था में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए |
- ये पद बताते हैं कि कोई दल सामाजिक बदलाव को लेकर कौन-सा पक्ष लेगा और आर्थिक पुनर्वितरण में राज्य की भूमिका के बारे में उसकी क्या राय होगी।
- ★अध्याय 2 से कड़ी: CPI और सोशलिस्ट पार्टी = वामपंथ · स्वतंत्र पार्टी = दक्षिणपंथ · कांग्रेस = मध्यमार्गी, पर 1955 के बाद वाम की ओर झुकी।
3 · सहमति और मतभेद (पृ. 46)
जिस पर लगभग सभी सहमत थे — दो बातें★
- “भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय — दोनों ही हैं।”
- “इस मामले को व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; सरकार को प्रमुख भूमिका निभानी थी।”
जिन पर मतभेद थे — तीन प्रश्न★★
- “क्या कोई ऐसा केंद्रीय संगठन ज़रूरी है जो पूरे देश के लिए योजना बनाए?”
- “क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए?”
- “अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि के आड़े आता हो तो सामाजिक-न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा?”
★“इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।” — इसीलिए “भारत की राजनीति के इतिहास को जानने के लिए हमें विकास के कथाक्रम को पढ़ना ज़रूरी है।”
4 · विकास की धारणाएँ और दो मॉडल (पृ. 46–47)
‘विकास’ का अर्थ सबके लिए अलग★
- इस्पात-संयंत्र की योजना बना रहे उद्योगपति, इस्पात के शहरी उपभोक्ता, और प्रस्तावित इलाके में रह रहे आदिवासी — तीनों के लिए अलग।
- ★★“इसी कारण ‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती।”
पहले दशक की धारणा★
- “‘विकास’ का अर्थ था ज्यादा-से-ज्यादा आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था, पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना।”
- आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था।
- माना जाता था कि जिस तरह पश्चिमी मुल्कों में आधुनिकीकरण से पुरानी सामाजिक संरचना टूटी और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय हुआ, उसी तरह बाकी देशों में भी होगा।
- इसी धारणा के कारण देशों को विकसित, विकासशील अथवा अविकसित बताया जाता था।
- कार्टून-संवाद (पृ. 47): “क्या आप यह कह रहे हैं कि ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?”
विकास के दो मॉडल★★
| मॉडल | कहाँ अपनाया गया |
|---|---|
| पहला — उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल | यूरोप के अधिकतर हिस्सों और संयुक्त राज्य अमरीका में |
| दूसरा — समाजवादी मॉडल | सोवियत संघ ने |
- ★★“उस वक्त हिंदुस्तान में बहुत-से लोग विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे।” — ऐसे लोगों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ही नहीं बल्कि सोशलिस्ट पार्टी और खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे।
- ★“अमरीकी तर्ज़ के पूँजीवादी विकास के पैरोकार बहुत कम थे।”
आज़ादी के आंदोलन के दौरान ही तीन बातें तय हो गई थीं★
- “आज़ाद भारत की सरकार के आर्थिक सरोकार अंग्रेजी हुकूमत के आर्थिक सरोकारों से एकदम अलग होंगे।”
- “सरकार संकुचित व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए काम नहीं करेगी।”
- “गरीबी मिटाने और सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण के काम का मुख्य जिम्मा सरकार का होगा।”
! पर मुख्य बहस बची रही: “कुछ औद्योगीकरण को उचित रास्ता मानते थे तो कुछ की नज़र में कृषि का विकास करना और ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करना सर्वाधिक ज़रूरी था।”
5 · योजना आयोग (पृ. 48)★★
तीन बातें जो हर परीक्षा में काम आती हैं
- !★★“योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है।” — पिछले साल की किताब ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ में इसका कहीं ज़िक्र नहीं है।
- ★स्थापना — मार्च 1950 में, भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के जरिए की।
- ★★“यह आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता है और इसकी सिफ़ारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती हैं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंज़ूर करे।”
★और प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने।
प्रस्ताव में उद्धृत तीन नीति-निर्देशक तत्व★
| उपबंध | |
|---|---|
| (क) | “स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो।” |
| (ख) | “समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो।” |
| (ग) | “अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह नहीं किया जाएगा कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो।” |
- ★कार्टून (पृ. 48, साभार: नैनन): बादल पर बैठे योजनाकार — “बड़े खुशकिस्मत हैं ये लोग कि हम जैसे लोग इनके लिए विकास योजना बना रहे हैं” — और नीचे गाँव की वास्तविकता। ★★यह केंद्रीकृत नियोजन की सबसे तीखी आलोचना है।
- पात्र-प्रश्न: “क्या योजना आयोग ने इन उद्देश्यों पर अमल किया है?”
🔄 आगे की बात — नीति आयोग
- “भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर एक नई संस्था, नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की।”
- ★“यह संस्था 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई।”
6 · नियोजन और ‘बॉम्बे प्लान’ (पृ. 49)★★
सब इस पर सहमत थे
“विकास का काम निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता और सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह विकास का एक खाका अथवा योजना तैयार करे।”
वैश्विक पृष्ठभूमि — 1940 और 1950 के दशक में हवा किधर बह रही थी★
- “यूरोप ‘महामंदी’ का शिकार होकर कुछ सबक सीख चुका था।”
- “जापान और जर्मनी ने युद्ध की विभीषिका झेलने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था फिर खड़ी कर ली थी।”
- “सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी।”
‘बॉम्बे प्लान’ — वह मोड़ जो चौंकाता है★★
पहले सामान्य धारणा: “निजी निवेशक — उद्योगपति और बड़े व्यापारिक उद्यमी — नियोजन के पक्ष में नहीं होते; वे एक खुली अर्थव्यवस्था चाहते हैं जहाँ पूँजी के बहाव पर सरकार का कोई अंकुश न हो।”
★★फिर पलटाव: “लेकिन, भारत में ऐसा नहीं हुआ। 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ। इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है।”
- मंशा: सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए।
- ★★निष्कर्ष: “इस तरह चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले।”
7 · पंचवर्षीय योजनाएँ (पृ. 49–50)
- ★“सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी पंचवर्षीय योजनाओं का विकल्प चुना।”
- विचार: सरकार एक दस्तावेज़ तैयार करेगी जिसमें अगले पाँच सालों के लिए उसकी आमदनी और खर्च की योजना होगी।
बजट का दो हिस्सों में बँटवारा★
| हिस्सा | क्या |
|---|---|
| गैरयोजना-व्यय | सालाना आधार पर दैनंदिन मदों पर खर्च |
| योजना-व्यय | योजना में तय की गई प्राथमिकताओं के अनुसार पाँच साल की अवधि में खर्च |
फ़ायदा: “सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की एक बड़ी तसवीर होती थी और वह अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि के हस्तक्षेप कर सकती थी।”
योजनाओं का कालक्रम★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1951 | प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी; इसी साल नवंबर में वास्तविक दस्तावेज़ भी |
| 1956 | दूसरी पंचवर्षीय योजना — नियोजन को लेकर गहमागहमी अपने चरम पर |
| 1961 | तीसरी पंचवर्षीय योजना — यह माहौल तब तक जारी रहा |
| ! 1966 | चौथी योजना चालू होनी थी — पर “नियोजन का नयापन मंद पड़ गया था और भारत गहन आर्थिक संकट की चपेट में आ चुका था”; सरकार ने योजना को थोड़ी देर का विराम दिया |
- प्रथम योजना के दस्तावेज़ों पर बुद्धिजीवी, पत्रकार, सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी, उद्योगपति, किसान और राजनेता — सबने व्यापक बहस-मुबाहिसा चलाया।
- ★★“हालाँकि इन योजनाओं की प्राथमिकताओं और प्रक्रिया को लेकर अनेक आलोचनाएँ सामने आईं लेकिन यह बात सच है कि इस वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।”
- समाचारपत्र (पृ. 49): The Hindustan Times — “FIVE-YEAR PLAN PRESENTED TO PARLIAMENT — Rs 2,069 CRORES OUTLAY FOR VARIOUS PROJECTS”
- ★कार्टून (पृ. 50, सुधीर दर): “NEVER-SAY-DIE..” — एक पोल-वॉल्ट खिलाड़ी ‘CENTRALISED PLANNING’ नामक बाँस लेकर ‘VILLAGE REALITY’ नामक ऊँचे बार को पार करने की कोशिश कर रहा है।
8 · प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–56)★★
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| अवधि | 1951–1956 |
| लक्ष्य | “देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की कोशिश” |
| ★विशेषज्ञ | के.एन. राज — दलील: “अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा।” |
| ★★मुख्य ज़ोर | कृषि-क्षेत्र पर — बाँध और सिंचाई में निवेश (विभाजन से कृषि को गहरी मार लगी थी) |
| बड़ी परियोजना | भाखड़ा-नांगल |
| ★भूमि-सुधार | “देश में भूमि के वितरण का जो ढर्रा मौजूद है उससे कृषि के विकास को सबसे बड़ी बाधा पहुँचती है” → इसे “देश के विकास की बुनियादी चीज़” माना गया |
बचत की समस्या★
- “योजनाकारों का बुनियादी लक्ष्य राष्ट्रीय आय के स्तर को ऊँचा करना था। यह तभी संभव था जब लोगों की बचत उनके खर्चे से ज्यादा हो।”
- ! पर 1950 के दशक में खर्च का स्तर भी बहुत नीचे था — इसे और कम नहीं किया जा सकता था। और “रोज़गार के काबिल जितने लोग थे उनकी तुलना में देश का मौजूदा पूँजी-भंडार कम था।”
- ★“बचत तीसरी पंचवर्षीय योजना तक बढ़ी। लेकिन, यह बचत उम्मीद के अनुरूप नहीं थी… 1960 के दशक से लेकर 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक बचत की मात्रा में लगातार कमी आई।”
9 · दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956)★★
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| ★★मुख्य ज़ोर | “दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर ज़ोर दिया गया।” |
| ★किसने बनाई | “पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक टोली ने।” |
| ★★तुलना | “पहली योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी।” |
| संरक्षण | “सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया” — निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों को मदद |
| सार्वजनिक क्षेत्र | बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार — क्योंकि बचत और निवेश दोनों बढ़ रहे थे |
| ★परिणाम | “औद्योगीकरण पर दिए गए इस ज़ोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया।” |
चार समस्याएँध्यान
- “भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज से पिछड़ा हुआ था” — विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी।
- “उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज्यादा आकर्षित किया” — खाद्यान्न-संकट की आशंका अलग से।
- ★“भारत के योजनाकारों को उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई।”
- “तीसरी पंचवर्षीय योजना दूसरी योजना से कुछ खास अलग नहीं थी।”
तीन आलोचनाएँध्यान
- “आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि इस समय से योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी होती नज़र आती है।”
- “कुछ अन्य लोगों का मानना था कि कृषि की जगह उद्योग को प्राथमिकता देकर गलती की गई।”
- “कुछ ऐसे भी लोग थे जो चाहते थे कि भारी उद्योगों की जगह कृषि-आधारित उद्योगों पर ज़ोर दिया जाए।”
आबंटन की सारणी (पृ. 52) — यह पूरे अध्याय का सबसे अच्छा प्रमाण है★★
| विकास का मद | पहली योजना | दूसरी योजना |
|---|---|---|
| ★कृषि और सामुदायिक विकास | 15.1 | 11.8 |
| ★सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण | 17 | 10.1 |
| ★★उद्योग और खनन | 7.6 | 18.5 |
| परिवहन और संचार | 23.6 | 28.9 |
| ऊर्जा | 11.1 | 8.9 |
| सामाजिक सेवाएँ | 22.6 | 19.7 |
| अन्य | 3 | 2.1 |
★★प्राथमिकता का पलटाव आँकड़ों में साफ़ दिखता है — कृषि 15.1 → 11.8, सिंचाई 17 → 10.1, जबकि उद्योग और खनन 7.6 → 18.5 (लगभग ढाई गुना)। यही “कृषि से उद्योग की ओर” वाला मोड़ है।
जीवनी — पी.सी. महालनोबिस (1893–1972)★
अंतरराष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद · ★भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) के संस्थापक · ★★दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार · तीव्र औद्योगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक।
10 · विकेंद्रित नियोजन — ‘केरल मॉडल’ (पृ. 52)★
- ★“ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो। ऐसा भी नहीं है कि नियोजन का मतलब हमेशा उद्योगों और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से ही लगाया जाए।”
- इस मॉडल में ज़ोर: ★शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन पर।
और उसका विरोधाभास — यही सबसे दिलचस्प बात है★★
| केरल में यह कम है | फिर भी यह बेहतर है |
|---|---|
| प्रति व्यक्ति आय अपेक्षाकृत कम | ★साक्षरता शत-प्रतिशत |
| औद्योगिक-आधार तुलनात्मक रूप से कमज़ोर | आयु-प्रत्याशा बढ़ी |
| — | शिशु मृत्यु-दर, मातृ मृत्यु-दर और जन्म-दर कम |
| — | लोगों को कहीं ज्यादा चिकित्सा-सुविधा |
- ★“1987 से 1991 के बीच सरकार ने ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ नाम से अभियान चलाया।” — इसमें विज्ञान और पर्यावरण के मामले में शत-प्रतिशत साक्षरता का अभियान शामिल था।
- “इन अभियानों की रूपरेखा इस तरह बनाई गई थी कि लोगों को स्वयंसेवी नागरिक संगठनों के माध्यम से विकास की गतिविधियों में सीधे शामिल किया जा सके।”
- “केरल में यह प्रयास भी किए गए कि लोग पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं को तैयार करने में शामिल हों।”
जीवनी — जे.सी. कुमारप्पा (1892–1960)★
★असली नाम — जे.सी. कॉर्नेलियस · अर्थशास्त्री एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट; इंग्लैंड एवं अमेरिका में शिक्षा · ★महात्मा गाँधी के अनुयायी; गाँधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश · ★★‘इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस’ के लेखक; योजना आयोग के सदस्य।
अंतिम पन्ना — परीक्षा से 5 मिनट पहले
छह वाक्य जो रट लीजिए★★
- “खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए।”
- “‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती।”
- “योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है” — यह सलाहकार है।
- “1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ… इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है।” — और “चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले।”
- “पहली योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी।”
- “ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो।” (केरल मॉडल)
दस भ्रम जो हर साल होते हैं★
| ! भ्रम | ✓ सही |
|---|---|
| योजना आयोग एक संवैधानिक निकाय है | !! नहीं — मार्च 1950 में सरकार के प्रस्ताव से बना; सलाहकार भूमिका |
| योजना आयोग और नीति आयोग एक ही हैं | योजना आयोग मार्च 1950; नीति आयोग 1 जनवरी 2015 |
| ‘बॉम्बे प्लान’ सरकार ने बनाया | ! नहीं — 1944 में उद्योगपतियों के एक तबके ने |
| ‘बॉम्बे प्लान’ नियोजन के विरुद्ध था | ! नहीं — उसने नियोजन का पुरज़ोर समर्थन किया |
| पहली योजना उद्योग पर केंद्रित थी | ! नहीं — पहली कृषि पर; दूसरी उद्योग पर |
| के.एन. राज ने दूसरी योजना बनाई | ! नहीं — के.एन. राज पहली योजना से जुड़े; महालनोबिस दूसरी से |
| कृषि 18.5 प्रतिशत थी | ! नहीं — 18.5 दूसरी योजना में उद्योग और खनन का हिस्सा है |
| चौथी योजना 1966 में शुरू हुई | ! नहीं — शुरू होनी थी, पर आर्थिक संकट के कारण स्थगित |
| केरल मॉडल में प्रति व्यक्ति आय ऊँची है | ! नहीं — आय कम, पर मानव-विकास सूचकांक बेहतर |
| कुमारप्पा का असली नाम कुमारप्पा था | ! नहीं — जे.सी. कॉर्नेलियस |
एक पंक्ति में हर खंड★
- उड़ीसा → चार टकराते हित; और “अंतिम निर्णय राजनीतिक होना चाहिए।”
- वाम-दक्षिण → राज्य नियंत्रण बनाम बाज़ार।
- सहमति-मतभेद → संवृद्धि + न्याय पर सहमति; केंद्रीय नियोजन, सरकारी उद्योग और न्याय की सीमा पर मतभेद।
- दो मॉडल → भारत सोवियत मॉडल से प्रभावित, पर उसकी नकल नहीं।
- योजना आयोग → मार्च 1950, प्रस्ताव से, सलाहकार, PM अध्यक्ष।
- बॉम्बे प्लान → 1944, उद्योगपतियों का — यानी नियोजन पर सर्वसम्मति।
- पहली योजना → कृषि, सिंचाई, भूमि-सुधार; के.एन. राज; धीरज।
- दूसरी योजना → भारी उद्योग; महालनोबिस; रफ़्तार; 7.6 → 18.5।
- केरल मॉडल → विकेंद्रित; आय कम, पर साक्षरता शत-प्रतिशत।