पाठ्यपुस्तक: NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), पृ. 99–112 पढ़ने का समय: पहली बार 30 मिनट · दोहराने में 10 मिनट · परीक्षा से पहले 5 मिनट (सिर्फ ★★वाले भाग) ★यह पुस्तक 1 का अंतिम अध्याय है — अंत में पूरी पुस्तक की एक-पंक्ति सूची भी दी गई है।
एक नज़र में पूरा अध्याय
वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह। चार प्रवाह: विचार, पूँजी, वस्तु, लोग। और सबसे ज़रूरी बात — ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’।
फिर अध्याय तीन बातें बार-बार दोहराता है:
- ★यह बहुआयामी है — राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक।
- ★इसका प्रभाव विषम है — सब पर एक जैसा नहीं।
- ★★हर खंड में दोनों पक्ष हैं — कोई एकतरफा निष्कर्ष नहीं।
क्रम: अवधारणा → कारण → राजनीतिक प्रभाव → आर्थिक प्रभाव → सांस्कृतिक प्रभाव → भारत → प्रतिरोध
पहले एक ज़रूरी सुधारध्यान
पृ. 107 पर लिखा है — “हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।”
!! वह अध्याय — ‘समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व’ — पाठ्यक्रम से पूरी तरह हटा दिया गया है। वह पुस्तक में है ही नहीं। इसलिए वह अवधारणा यहाँ अलग से दी जा रही है:
‘वर्चस्व’ के तीन अर्थ — सैन्य वर्चस्व = बल का असंतुलन · संरचनात्मक वर्चस्व = वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम बनाने की ताकत · ★★सांस्कृतिक वर्चस्व = जब किसी शक्ति के विचार, मूल्य और जीवन-शैली इतने सामान्य लगने लगें कि उनका विकल्प ही सोचा न जा सके। — यही ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ का आधार है।
1 · वैश्वीकरण की अवधारणा (पृ. 100–102)
तीन कहानियाँ — जिनसे अध्याय शुरू होता है★
| कौन | क्या | क्या दिखाती है |
|---|---|---|
| जनार्दन | कॉल-सेंटर; “दफ्तर में घुसने के साथ ही वह जॉन बन जाता है”; छुट्टियाँ अमरीका के कैलेंडर से | सेवाओं का वैश्वीकरण |
| रामधारी | साइकिल “बनी तो चीन में थी लेकिन बिक भारत में रही है”; पहले ‘बार्बी डॉल’ (अमरीका में बनी) | वस्तुओं की आवाजाही |
| सारिका | परिवार में पहली पीढ़ी की शिक्षित; ऐसे अवसर “परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं” | ★जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा |
और पाँच उलटे उदाहरणध्यान
- किसानों की आत्महत्या — “एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महंगे बीज खरीदे थे”
- भारतीय कंपनी ने यूरोपीय कंपनी खरीद ली (मालिक विरोध कर रहे थे)
- खुदरा दुकानदारों का भय — “उनकी रोजी-रोटी जाती रहेगी”
- फिल्म-कहानी की नकल (हॉलीवुड से)
- पश्चिमी परिधान वाली छात्राओं को उग्रवादी संगठन की धमकी
तीन निष्कर्ष — उत्तर में सीधे लिखे जा सकते हैं★★
- “वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता; लोगों पर इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं।”
- “ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो मानते हैं कि वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं।”
- ★★“वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा और ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।”
परिभाषा — तीन हिस्से★★
| हिस्सा | पाठ्यपुस्तक के शब्दों में |
|---|---|
| मूल बात | “एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह।” |
| ★★चार प्रवाह | विचार · पूँजी · वस्तु · लोग |
| ★★सबसे ज़रूरी | “यहाँ सबसे ज़रूरी बात है ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है।” |
दो सूत्र-वाक्य — प्रश्न 1 और 2 के सीधे उत्तर★★
- “वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए।” ! “यह मान लेना ग़लत है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक परिघटना है”; और “यह मान लेना भी भूल होगी कि वैश्वीकरण एकदम सांस्कृतिक परिघटना है।”
- “वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा है — यह कुछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित कर रहा है।” → इसलिए “विशिष्ट संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना… सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज करें।”
2 · वैश्वीकरण के कारण (पृ. 102–103)
“इसमें नया क्या है?”★
- “अगर इन चार तरह के प्रवाहों की ही बात है तो फिर वैश्वीकरण मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है।”
- ★★नयी बात: “नयी बात है इन प्रवाहों की गति और इनके प्रसार का धरातल। ये दोनों बातें मौजूदा वैश्वीकरण को अनूठा बनाती हैं।”
प्रौद्योगिकी — ‘अपरिहार्य कारण’(प्रश्न 3 और 7)★★
- “हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं, फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।”
- तीन आविष्कार: ★टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप — “इन्होंने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।”
- ★★ऐतिहासिक समानांतर — यह उदाहरण उत्तर में ज़रूर लिखिए:
“शुरू-शुरू में जब छपाई (मुद्रण) की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तरह आज हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि प्रौद्योगिकी का प्रभाव हमारे सोचने के तरीके पर पड़ेगा।”
पर तकनीक अकेली काफी नहींध्यान
- “संचार-साधनों की तरक्की और उनकी उपलब्धता मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में आया हो — ऐसी बात नहीं।”
- ★★“यहाँ ज़रूरी बात यह है कि विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं।”
- उदाहरण: “बर्ड फ्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते।”
और एक असमानता जो आगे काम आएगी★
“विश्व के विभिन्न भागों के बीच पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में ज्यादा तेज और व्यापक होगी।”
3 · राजनीतिक प्रभाव (पृ. 103–104) —प्रश्न 8 का पूरा उत्तर★★
“राज्य की संप्रभुता की परंपरागत धारणा पर वैश्वीकरण का असर कैसे होता है? …हमें कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा।”
पहला पहलू — क्षमता में कमीध्यान
- “वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत में कमी आती है।”
- ★★“पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है।”
- “राज्य अब कुछेक मुख्य कामों तक ही सीमित — कानून और व्यवस्था तथा नागरिकों की सुरक्षा।”
- ★★“लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।”
- ★“बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं… इससे सरकारों के अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता में कमी आती है।”
दूसरा पहलू — पर प्रधानता को चुनौती नहीं★★
- “वैश्वीकरण से हमेशा राज्य की ताकत में कमी आती हो — ऐसी बात नहीं।”
- ★★“राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है।”
- “राज्य कानून और व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनिवार्य कार्यों को पूरा कर रहे हैं और बहुत सोच-समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मर्जी हो।”
- ★“राज्य अभी भी महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।”
तीसरा पहलू — बल्कि ताकत बढ़ी भी है★★
- “वस्तुत: कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है।”
- “अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। …उनकी क्षमता बढ़ी है; कम नहीं हुई।”
- ★★“नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं।”
★★यही इस खंड का असली पाठ है — पाठ्यपुस्तक एकतरफा निष्कर्ष नहीं देती। राज्य कमज़ोर भी हुआ, बना भी रहा, और मज़बूत भी हुआ। उत्तर में तीनों लिखिए।
4 · आर्थिक प्रभाव (पृ. 104–106)★★
परिभाषा और सही कसौटी
- “जैसे ही आर्थिक वैश्वीकरण का उल्लेख होता है, हमारा ध्यान IMF और WTO जैसी संस्थाओं पर जाता है।” ! “हालाँकि वैश्वीकरण को इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए।”
- ★★सही कसौटी: “हमें इससे होने वाले आर्थिक फायदों के बँटवारे के अर्थ में सोचना चाहिए — किसे वैश्वीकरण से सबसे ज्यादा फायदा हुआ और किसे सबसे कम। यह भी देखने की ज़रूरत है कि किसने नुकसान उठाया।”
- ! “कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं।”
चार प्रवाहों की असली स्थिति★★
| प्रवाह | स्थिति |
|---|---|
| वस्तु | व्यापार बढ़ा; आयात पर प्रतिबंध कम हुए |
| पूँजी | आवाजाही पर कम प्रतिबंध — “धनी देश के निवेशकर्ता… विकासशील देशों में निवेश कर सकते हैं जहाँ उन्हें ज्यादा मुनाफा होगा” |
| विचार | “विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही” — इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाएँ |
| !★★लोग | “जिस सीमा तक वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ सकी है।” |
★★कारण — और यह वाक्य उत्तर में ज़रूर लिखिए: “विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक विकसित देशों में आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।”
एक ही नीति, अलग-अलग परिणामध्यान
- “हर जगह एक समान नीति अपना लेने का मतलब यह नहीं होता कि हर जगह परिणाम भी समान होंगे।”
- “यहाँ भी हमें सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने के बजाय संदर्भ-विशेष पर ध्यान देना होगा।”
तीनों पक्ष — यह सारणी रट लीजिए★★
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| ! आलोचक | “आबादी के एक बड़े छोटे तबके को फायदा होगा जबकि नौकरी और जन-कल्याण के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जाएँगे।” → माँग: ★‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ |
| !! तीखे आलोचक | “‘सामाजिक सुरक्षा-कवच’ की बात अव्यावहारिक है और इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा”; और ★“कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ कहा है।” |
| ✓ समर्थक | “इससे समृद्धि बढ़ती है और ‘खुलेपन’ के कारण ज्यादा से ज्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है”; “आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं।” |
| ⚖️ मध्यमार्गी | ★★“वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।” |
और इस पर सब सहमत हैं★
“बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ्तार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।”
5 · सांस्कृतिक प्रभाव (पृ. 106–108)★★
यह हमें कहाँ छूता है
- “वैश्वीकरण के परिणाम सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक दायरों में ही नज़र नहीं आते; हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं।”
- ★★“हम जो कुछ खाते-पीते-पहनते हैं अथवा सोचते हैं — सब पर इसका असर नज़र आता है। हम जिन बातों को अपनी पसंद कहते हैं वे बातें भी वैश्वीकरण के असर में तय होती हैं।”
सांस्कृतिक समरूपता — और उसकी सबसे ज़रूरी बारीकीध्यान
- “इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी। …वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है।”
- ★★पर ध्यान दीजिए: “सांस्कृतिक समरूपता का यह अर्थ नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है। विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।”
- ★तर्क: “बर्गर अथवा नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है।”
- ★★“जो यह तर्क देते हैं वे अक्सर दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं। …विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं।”
- ! खतरा किसके लिए: “चूँकि इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे खत्म होती है इसलिए यह केवल गरीब देशों के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए खतरनाक है।”
और अब पाठ्यपुस्तक पलटती है★★
“इसके साथ-साथ यह मान लेना एक भूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं।”
- ★“संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती। हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करते रहती है।”
- “कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है तो कभी इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।”
दो उदाहरण जो कभी नहीं भूलते★★
- “बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है इसलिए बर्गर से वस्तुत: कोई खतरा नहीं है। इससे हुआ मात्र इतना है कि हमारे भोजन की पसंद में एक चीज़ और शामिल हो गई है।”
- ★★“नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है… मज़ेदार बात तो यह है कि इस अनूठे पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।”
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण(प्रश्न 10 का उत्तर)★★
“सांस्कृतिक समरुपता वैश्वीकरण का एक पहलू है तो वैश्वीकरण से इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है। वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।”
! पर संतुलन के साथ: “इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में उनकी ताकत का सवाल गौण है, परंतु इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफा नहीं होता।”
बॉक्स — ‘उफ! फिर से एक हिंदुस्तानी’(पृ. 108)★
- “कॉल-सेन्टर में काम करना अपने आप में आँख खोल देने वाला साबित हो सकता है… एक औसत अमरीकी हमारी अपेक्षा से कहीं ज्यादा जीवंत और ईमानदार होता है…”
- ! “‘कॉल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, यह जानकर फोन करने वाले का लहजा कभी-कभी नफ़रत से भर उठता है”; “अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो…”
- ★★""आह री किस्मत! फिर एक हिन्दुस्तानी! प्लीज किसी अमरीकी से बात कराइए…!"" — (स्रोत: 10 जनवरी 2005, ‘द हिंदू’, रंजीता उर्स)
6 · भारत और वैश्वीकरण (पृ. 108–109)
| चरण | क्या हुआ |
|---|---|
| इतिहास | “पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है।” |
| ! औपनिवेशिक दौर | “ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था।” |
| ★आज़ादी के बाद — ‘संरक्षणवाद’ | “दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए”; “दूसरों देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों को बनाना सीख सकें।” |
| ! संरक्षणवाद की कीमत | “कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई तो कुछ ज़रूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया गया”; “आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।” |
| ★★1991 | “वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई।” — व्यापार और विदेशी निवेश पर बाधाएँ हटीं |
और वह कसौटी जो पूरे अध्याय का नैतिक निष्कर्ष है★★
“यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है, क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।”
7 · वैश्वीकरण का प्रतिरोध (पृ. 109–111)
दो तरह के आलोचक★★
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| वामपंथी | “मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूंजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज्यादा ग़रीब बनाती है।” और “राज्य के कमजोर होने से गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।” |
| दक्षिणपंथी | राजनीतिक — राज्य के कमजोर होने की चिंता; “कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ का दौर फिर कायम हो” · सांस्कृतिक — “परंपरागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो देंगे।” |
दो बारीकियाँ जो उत्तर को ऊपर उठा देती हैं★★
- “वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटवर्क में भागीदारी करते हैं और अपने से मिलती-जुलती सोच रखने वाले दूसरे देशों के लोगों से गठजोड़ करते हैं।”
- ★★“वैश्वीकरण-विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।” — यानी विरोध ‘वैश्वीकरण’ का नहीं, ‘नव-उदारवादी वैश्वीकरण’ का है।
प्रतिरोध के पड़ाव★
| वर्ष | क्या |
|---|---|
| 1999 | सिएट्ल में WTO की मंत्री-स्तरीय बैठक; बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन। तर्क — “उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।” |
| ★★2001 | वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) की पहली बैठक — ब्राजील के पोर्तो अलेग्रे में |
| ★2004 | चौथी बैठक — मुंबई में |
| फरवरी 2024 | बैठक — नेपाल में |
- WSF में कौन: ★“मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता” — जो नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।
भारत में प्रतिरोध — दोनों तरफ से★
- वामपंथी: “आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से उठी हैं तो इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से भी।”; “औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।”
- ★★“कुछ वनस्पतियाँ मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फर्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध हुआ।”
- दक्षिणपंथी: विरोध “केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों से लेकर वैलेन्टाईन-डे मनाने तथा स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि तक।”
और अध्याय का पोस्टर लौटकर देखिए(पृ. 99)ध्यान
नारा: ★“एक और दुनिया मुमकिन है” — पर उसी पोस्टर के लाल पैनल में मुंबई प्रतिरोध 2004 WSF की ही तीखी आलोचना करता है: “अलोकतांत्रिक तौर-तरीके”, “साम्राज्यवादी देशों और बड़े व्यापार के धन पर निर्भरता” और ! “एन.जी.ओ. साम्राज्यवाद के दलाल हैं।”
★★सबक: वैश्वीकरण-विरोध भी एकजुट नहीं है — उसके भीतर भी उतनी ही बहस है।
अंतिम पन्ना — परीक्षा से 5 मिनट पहले
आठ वाक्य जो रट लीजिए★★
- “एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह।” (विचार, पूँजी, वस्तु, लोग)
- “सबसे ज़रूरी बात है ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है।”
- “वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है।” और “वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा है।”
- “प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।” — और “जब छपाई की तकनीक आयी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी।”
- “नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं।” (तीसरा राजनीतिक पहलू)
- “कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ कहा है।”
- “वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।”
- “अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो।”
नौ भ्रम जो हर साल होते हैं★
| ! भ्रम | ✓ सही |
|---|---|
| वैश्वीकरण और पश्चिमीकरण समान हैं | समान नहीं — (प्रश्न 1 का विकल्प ग गलत है) |
| वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई | ! 1991 भारत के आर्थिक सुधारों का वर्ष है; वैश्वीकरण “मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है” |
| वैश्वीकरण केवल आर्थिक परिघटना है | ★“बहुआयामी” — राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक |
| सब पर प्रभाव एक जैसा है | ★“प्रभाव बड़ा विषम रहा है” |
| ‘सांस्कृतिक समरूपता’ पैरोकारों का तर्क है | !! यह आलोचकों का तर्क है — (प्रश्न 5 का जाल) |
| वैश्वीकरण से राज्य केवल कमज़ोर हुआ | ★तीन पहलू — क्षमता में कमी, प्रधानता बरकरार, और ताकत में इजाफा |
| लोगों का प्रवाह भी उतना ही बढ़ा | ! नहीं — वीजा-नीति ने रोका |
| सब विरोधी वैश्वीकरण के ही विरोधी हैं | ★“वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं” — एक खास कार्यक्रम के विरोधी |
| WSF की पहली बैठक मुंबई में हुई | ! पहली 2001, पोर्तो अलेग्रे (ब्राजील); मुंबई में चौथी, 2004 में |
एक पंक्ति में हर खंड★
- अवधारणा → प्रवाह + विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव; बहुआयामी; प्रभाव विषम।
- कारण → प्रौद्योगिकी अपरिहार्य, पर अकेली काफी नहीं — जुड़ाव की चेतना भी चाहिए।
- राजनीतिक → क्षमता घटी · प्रधानता बरकरार · ताकत बढ़ी — तीनों एक साथ।
- आर्थिक → वस्तु, पूँजी और विचार बहे; लोग नहीं — वीजा-नीति।
- सांस्कृतिक → समरूपता और वैभिन्नीकरण — दोनों; बर्गर से खतरा नहीं, जीन्स पर कुर्ता चलता है।
- भारत → निर्यातक-आयातक → संरक्षणवाद → 1991; कसौटी “फायदों में सबका साझा”।
- प्रतिरोध → वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों; सिएट्ल 1999; WSF 2001/2004/2024।
बोनस — पूरी पुस्तक एक नज़र में(यह अंतिम अध्याय है)★
| अध्याय | एक पंक्ति में |
|---|---|
| 1. दो ध्रुवीयता का अंत | सोवियत संघ का विघटन और एक-ध्रुवीय विश्व का उदय |
| 2. सत्ता के समकालीन केन्द्र | यूरोपीय संघ, आसियान और चीन — नये शक्ति-केंद्र |
| 3. समकालीन दक्षिण एशिया | पड़ोस की राजनीति और सार्क |
| 4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन | “संयुक्त राष्ट्रसंघ के बिना दुनिया और बदहाल होगी” |
| 5. समकालीन विश्व में सुरक्षा | “सुरक्षा किसकी?” — राज्य की या जनता की |
| 6. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | “जवाब इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है” |
| 7. वैश्वीकरण | “विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव” — और उसका विषम प्रभाव |
★★पूरी पुस्तक एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है — शीतयुद्ध के बाद दुनिया में ताकत कहाँ चली गई? पहले चार अध्याय बताते हैं कहाँ; अगले तीन बताते हैं कि उसका असर आम आदमी पर क्या पड़ा।