अध्याय 1राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 3–25.

परीक्षा-केंद्रित संक्षेपण। ★सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिंदुओं को दर्शाता है।

आज़ाद भारत के सामने तीन चुनौतियाँ थीं — एकता, लोकतंत्र और समान विकास; यह अध्याय बताता है कि पहली चुनौती का सामना तीन मोर्चों पर हुआ — विभाजन के बाद पुनर्वास, 565 रजवाड़ों का विलय, और राज्यों का भाषावार पुनर्गठन — और भारत ने एकता विविधता को दबाकर नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करके पाई।

1. तीन चुनौतियाँ★★

क्रमचुनौतीसंविधान/नीति में उत्तर
पहली (तात्कालिक)एकता के सूत्र में बँधे ऐसे भारत को गढ़ना जिसमें सारी विविधताओं के लिए जगह हो — क्षेत्रीय अखंडताविविधता की स्वीकृति; क्षेत्रीय माँगों को स्थान
दूसरीलोकतंत्र को कायम करना — केवल संविधान काफ़ी नहीं, लोकतांत्रिक व्यवहार-बरताव चलन में आएँमौलिक अधिकारों की गारंटी; हर नागरिक को मतदान का अधिकार; संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र
तीसरीऐसा विकास जिससे समूचे समाज का भला हो, न कि कुछ एक तबकों कासमानता का बरताव; वंचित तबकों तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा; राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
  • यह अध्याय केवल पहली चुनौती पर है। दूसरी और तीसरी अगले दो अध्यायों में।
  • आज़ादी: 14–15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि। नेहरू का संविधान सभा के विशेष सत्र में भाषण — ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ / ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’।
  • दो बातों पर सबकी सहमति थी: (1) शासन लोकतांत्रिक सरकार से चलेगा, (2) सरकार सबके भले के लिए काम करेगी, गरीबों और कमज़ोरों का खास खयाल रखेगी।

स्मृति-सूत्र: ए–लो–वि → एकता, लोकतंत्र, विकास। तीनों चुनौतियाँ इसी क्रम में हैं।

2. विभाजन : विस्थापन और पुनर्वास★★

द्वि-राष्ट्र सिद्धांत

  • मुस्लिम लीग का सिद्धांत: भारत एक कौम का नहीं, ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है — इसी आधार पर पाकिस्तान की माँग।
  • कांग्रेस ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत तथा पाकिस्तान की माँग का विरोध किया।
  • 1940 के दशक में कांग्रेस-लीग की प्रतिस्पर्धा और ब्रिटिश-शासन की भूमिका के कारण माँग मान ली गई।

विभाजन की चार कठिनाइयाँ(सबसे संभावित दीर्घ-उत्तर)★★

आधार: धार्मिक बहुसंख्या — मुस्लिम-बहुल इलाके पाकिस्तान, शेष भारत।

#कठिनाईपरिणाम
1कोई एक सटा हुआ मुस्लिम-बहुल इलाका नहीं था; ऐसे दो इलाके थे — एक पश्चिम में, एक पूर्व मेंपश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान, बीच में भारतीय भू-भाग का बड़ा विस्तार
2हर मुस्लिम-बहुल इलाका पाकिस्तान जाने को राजी नहीं था — खान अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गाँधी’), पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़उनकी आवाज़ की अनदेखी की गई; पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया
3पंजाब और बंगाल में बहुत बड़े गैर-मुस्लिम हिस्से थेइन प्रांतों का भी बँटवारा, जिले या उससे निचले प्रशासनिक हलके के आधार पर। 14–15 अगस्त की मध्यरात्रि तक फ़ैसला नहीं हुआ था — आज़ादी के दिन तक लोगों को पता नहीं था कि वे किस देश में हैं। पंजाब और बंगाल का बँटवारा विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ
4‘अल्पसंख्यकों’ की समस्या — सबसे अबूझ कठिनाई। सीमा के दोनों तरफ़ अल्पसंख्यकपाकिस्तान बने इलाकों में लाखों हिंदू और सिख; पंजाब-बंगाल के भारतीय भाग में लाखों मुस्लिम; दिल्ली और आस-पास भी बड़ी मुस्लिम आबादी

चौथी कठिनाई का मर्म: “इन लोगों ने पाया कि हम तो अपने ही घर में विदेशी बन गए।”

परिणाम★

  • स्थानांतरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा — मानव-इतिहास के सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक।
  • लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील।
  • अल्पसंख्यकों को शरणार्थी शिविरों में पनाह; कल तक जो अपना वतन था, वहीं का प्रशासन रुखाई का बरताव करने लगा।
  • हजारों औरतों का अपहरण, जबरन विवाह और धर्म-परिवर्तन; कई जगह परिवार वालों ने ‘कुल की इज्ज़त’ के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला; बहुत-से बच्चे माँ-बाप से बिछड़ गए।
  • भौतिक बँटवारा: टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक; सरकारी और रेलवे कर्मचारियों का भी।
  • आँकड़े: 80 लाख विस्थापित; पाँच से दस लाख मृत।

धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न★★

  • विभाजन धर्म के आधार पर हुआ — तो क्या भारत अपने-आप हिंदू राष्ट्र बन गया? नहीं।
  • 1951 में भारत की कुल आबादी में 10–12 फीसदी मुसलमान थे।
  • अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक: सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी।
  • भारत की कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्ज़ा देने के हामी थे। नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए। नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे और इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।

महात्मा गाँधी की शहादत★

  • 15 अगस्त 1947 को किसी जश्न में भाग नहीं लिया; कोलकाता के दंगाग्रस्त इलाकों में रहे।
  • कोलकाता में उनकी मौजूदगी से हालात सुधरे — आज़ादी का जश्न सांप्रदायिक सद्भाव के जज़्बे से मनाया गया।
  • दंगे फिर भड़के → ‘उपवास’। फिर दिल्ली → जनवरी 1948 में अंतिम ‘उपवास’ → तनाव घटा, मुसलमान अपने घरों में लौटे, और भारत सरकार पाकिस्तान को उसका देय चुकाने पर राजी हो गई।
  • दोनों समुदायों के अतिवादी उन पर दोष मढ़ रहे थे; उन्होंने सशस्त्र सुरक्षा लेने से मना कर दिया।
  • 30 जनवरी 1948 — नाथूराम विनायक गोडसे ने संध्याकालीन प्रार्थना के समय तीन गोलियाँ चलाईं।
  • 4 फरवरी 1948 — गैज़ट अधिसूचना से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध।

स्मृति-सूत्र (चार कठिनाइयाँ): दो-ना-प-अ → दो इलाके, नाराज़ सीमाप्रांत, पंजाब-बंगाल, अल्पसंख्यक।

3. रजवाड़ों का विलय★★

समस्या

  • ब्रिटिश इंडिया के दो हिस्से: ब्रिटिश प्रभुत्व वाले प्रांत (सीधा नियंत्रण) और देसी रजवाड़े (राजाओं का शासन, ब्रिटिश-राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार)।
  • साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े; प्रत्येक चार भारतीयों में से एक रजवाड़े की प्रजा।
  • आज़ादी के तुरंत पहले घोषणा: सभी रजवाड़े (संख्या 565) ब्रिटिश-राज की समाप्ति के साथ कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे — वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में जाएँ, या स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें।
  • यह फ़ैसला प्रजा को नहीं, राजाओं को करना था → अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा।
  • सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने स्वतंत्रता की घोषणा की; अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने; भोपाल के नवाब संविधान-सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे।
  • अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक था और शासक प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार नहीं थे।

सरकार का नज़रिया★★

  • अंतरिम सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में जाने को स्वतंत्र थीं।
  • रजवाड़ों के शासकों को मनाने-समझाने में सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
  • पैमाना: आज के उड़ीसा में 26, छत्तीसगढ़ में 15 छोटे रजवाड़े; सौराष्ट्र में 14 बड़े और 119 छोटे।
  • तीन बातें सामने आती हैं ★★(सीधा 3-अंकीय प्रश्न):
    1. अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।
    2. भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने को तैयार थी — जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ।
    3. विभाजन की पृष्ठभूमि में सीमांकन पर खींचतान थी, इसलिए क्षेत्रीय अखंडता-एकता का सवाल सबसे अहम था।
  • शांतिपूर्ण बातचीत से लगभग सभी रजवाड़े 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गए।
  • विलय का सहमति-पत्र = ‘इंस्टूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’।
  • कठिन मामले: जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर। (कश्मीर — अध्याय 8)

हैदराबाद बनाम मणिपुर★★

हैदराबादमणिपुर
शासकनिज़ाम — दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में शुमारमहाराजा बोधचंद्र सिंह
स्थितिरियासत बहुत बड़ी, चारों तरफ़ से हिंदुस्तानी इलाके से घिरी; हिस्से आज के महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश मेंपूर्वोत्तर
पहला कदमनवंबर 1947 — यथास्थिति समझौता, एक साल के लिएआज़ादी के चंद रोज पहले सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर, आंतरिक स्वायत्तता के आश्वासन पर
जन-दबावतेलंगाना के किसान निज़ाम के दमनकारी शासन से दुखी; महिलाएँ सबसे ज्यादा जुल्म का शिकार, बड़ी संख्या में आंदोलन में; हैदराबाद शहर आंदोलन का गढ़; कम्युनिस्ट और हैदराबाद कांग्रेस अग्रिम पंक्ति मेंजनमत के दबाव में जून 1948 में चुनाव → संवैधानिक राजतंत्र
दमननिज़ाम ने अर्द्ध-सैनिक बल रज़ाकार भेजा — अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी; गैर-मुसलमानों को निशाना, लूटपाट, हत्या और बलात्कार—
निर्णायक क्षणसितंबर 1948 — भारतीय सेना पहुँची; कुछ रोज़ लड़ाई; निज़ाम का आत्मसमर्पण → विलयविधानसभा में गहरे मतभेद (कांग्रेस विलय के पक्ष में, अन्य दल विरुद्ध); भारत सरकार ने महाराजा को राजी किया → सितंबर 1949 में सफलता
विधिसैन्य कार्रवाईवार्ता

★मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए।

4. राज्यों का पुनर्गठन★★

चुनौती

  • बँटवारे और विलय के साथ राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का अंत नहीं हुआ — आंतरिक सीमाएँ तय करनी थीं।
  • यह महज प्रशासनिक विभाजन का मामला न था: सीमाएँ ऐसी हों कि भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता की झलक मिले, साथ ही राष्ट्रीय एकता भी खंडित न हो।
  • औपनिवेशिक सीमाएँ प्रशासनिक सुविधा या जीते गए क्षेत्र के आधार पर बनी थीं — राष्ट्रीय सरकार ने ऐसे सीमांकन को बनावटी मानकर खारिज कर दिया।

कांग्रेस की प्रतिबद्धता और पलटाव

  • सन् 1920 के नागपुर अधिवेशन के बाद से कांग्रेस ने यह सिद्धांत मान लिया था कि पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा; अनेक प्रांतीय कांग्रेस-समितियाँ भाषाई आधार पर बनी थीं।
  • आज़ादी के बाद नेतृत्व डर गया — भाषावार प्रांतों से अव्यवस्था और देश के टूटने का खतरा, और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटकने की आशंका → मसला स्थगित।
  • ! गाँधी (जनवरी 1948) भी भाषावार गठन के पक्ष में नहीं थे — उनका तर्क था कि इससे क्षेत्रीय भाषाओं का ज़ोर बढ़ेगा और हिंदुस्तानी को शिक्षा का माध्यम बनाने का अर्थ न रह जाएगा।

आंध्र आंदोलन★★

  • पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विरोध। पुराने मद्रास प्रांत में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश थे; कुछ हिस्से केरल और कर्नाटक में भी।
  • विशाल आंध्र आंदोलन — मद्रास प्रांत के तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके आंध्र प्रदेश बनाने की माँग।
  • केंद्र सरकार ‘हाँ-ना’ की दुविधा में थी और इसी से आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा।
  • पोट्टी श्रीरामुलु — कांग्रेस नेता और दिग्गज गाँधीवादी — अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठे; 56 दिनों की भूख-हड़ताल के बाद मृत्यु।
  • परिणाम: बड़ी अव्यवस्था, हिंसक घटनाएँ, पुलिस फायरिंग में अनेक घायल या मृत, मद्रास में अनेक विधायकों के इस्तीफे → दिसंबर 1952 में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश की घोषणा की।

आयोग और अधिनियम(प्रश्न 8 — सटीक उत्तर याद कीजिए)★★

1953राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन
आयोग का कामराज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना
प्रमुख सिफ़ारिशराज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास
परिणाम14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश

भाषावार पुनर्गठन का परिणाम★★

  • आशंका: अलग राज्य की माँग से एकता पर आँच आएगी, अलगाववाद पनपेगा।
  • नेतृत्व ने जनता के दबाव में मन बदला; उम्मीद थी कि क्षेत्रीय-भाषाई दावे मान लेने से बँटवारे और अलगाववाद के खतरे में कमी आएगी; इसे लोकतांत्रिक कदम के रूप में भी देखा गया।
  • वास्तव में क्या हुआ (पाँच परिणाम):
    1. भाषाई राज्यों और उनके आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूप से बदला;
    2. सत्ता में भागीदारी का रास्ता छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके से आगे, बाकियों के लिए भी खुला;
    3. सीमांकन के लिए एक समरूप आधार मिला;
    4. देश टूटा नहीं — एकता और ज्यादा मज़बूत हुई;
    5. सबसे बड़ी बात: विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली।
  • ★★अध्याय का अंतिम तर्क: लोकतंत्र चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और स्वीकार करना, और यह मानकर चलना कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं। भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी।

नए राज्यों का निर्माण — तिथि-क्रम★

वर्षराज्यआधार
1956द्विभाषी बंबई का प्रयोग (गुजराती + मराठी)भाषा
1960महाराष्ट्र और गुजरात (जन-आंदोलन के बाद)भाषा
1963नगालैंड—
1966पंजाब (पंजाबी-भाषी) + हरियाणा और हिमाचल प्रदेशभाषा
1972मेघालय (असम से), मणिपुर, त्रिपुरापूर्वोत्तर पुनर्गठन
1987मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश—
2000छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड! भाषा नहीं — अलग क्षेत्रीय संस्कृति / विकास का असंतुलन
2 जून 2014तेलंगाना—
  • कथा अभी समाप्त नहीं: विदर्भ (महाराष्ट्र), हरित प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश), और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में अलग राज्य के आंदोलन चल रहे हैं।

स्मृति-सूत्र (राज्य-वर्ष): 60-63-66-72-87-2000-2014 — “महा-गुज, नगा, पंजाब-तीन, पूर्वोत्तर-तीन, मिज़ो-अरु, तीन-2000, तेलंगाना”।

याद रखने योग्य आँकड़े★★

विवरणमान
आज़ादी14–15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि
विभाजन से विस्थापित80 लाख
विभाजन की हिंसा में मृतपाँच से दस लाख
1951 में मुस्लिम आबादी10–12 फीसदी
गाँधी की हत्या30 जनवरी 1948 — तीन गोलियाँ
गाँधी का अंतिम उपवासजनवरी 1948
RSS पर प्रतिबंध की अधिसूचना4 फरवरी 1948
रजवाड़ों की संख्या565
साम्राज्य में रजवाड़ों का हिस्साएक-तिहाई; प्रत्येक चार भारतीयों में से एक प्रजा
उड़ीसा / छत्तीसगढ़ के रजवाड़े26 / 15
सौराष्ट्र के रजवाड़े14 बड़े और 119 छोटे
हैदराबाद का यथास्थिति समझौतानवंबर 1947, एक साल के लिए
हैदराबाद में सेना / विलयसितंबर 1948
मणिपुर में चुनावजून 1948
मणिपुर का विलय-समझौतासितंबर 1949
कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन1920
श्रीरामुलु की भूख-हड़ताल56 दिन
आंध्र प्रदेश की घोषणादिसंबर 1952
राज्य पुनर्गठन आयोग1953
राज्य पुनर्गठन अधिनियम1956 → 14 राज्य + 6 केंद्र-शासित प्रदेश
प्रथम गणतंत्र दिवस (डाक-टिकट)26 जनवरी 1950

व्यक्ति और संस्थाएँ

नामयोगदान
जवाहरलाल नेहरूप्रथम प्रधानमंत्री; ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ (14–15 अगस्त 1947); मुख्यमंत्रियों को पत्र (15 अक्तूबर 1947) — अल्पसंख्यकों के साथ सभ्यता और शालीनता का बरताव
सरदार वल्लभभाई पटेल (1875–1950)उप-प्रधानमंत्री और प्रथम गृहमंत्री; रजवाड़ों के विलय में ऐतिहासिक भूमिका; संविधान सभा की महत्त्वपूर्ण समितियों के सदस्य
महात्मा गाँधीकलकत्ता और दिल्ली में उपवास; 30 जनवरी 1948 को हत्या; जनवरी 1948 में भाषावार प्रांतों पर आपत्ति
मुहम्मद अली जिन्ना11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में अध्यक्षीय भाषण
खान अब्दुल गफ्फार खान‘सीमांत गाँधी’; पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता; द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के विरोधी
नाथूराम विनायक गोडसेगाँधी का हत्यारा
महाराजा बोधचंद्र सिंहमणिपुर के शासक; सहमति-पत्र; जून 1948 का चुनाव
पोट्टी श्रीरामुलु (1901–1952)गाँधीवादी; नमक सत्याग्रह के लिए नौकरी छोड़ी; 1946 में मंदिर-प्रवेश के लिए उपवास; आंध्र के लिए 19 अक्तूबर 1952 से आमरण अनशन, 15 दिसम्बर 1952 को मृत्यु
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911–1984)‘सुब्ह-ए-आज़ादी’; सियालकोट में जन्म; विभाजन के बाद पाकिस्तान में
अमृता प्रीतम (1919–2005)‘वारिस शाह से!’; साहित्य अकादमी, पद्मश्री, ज्ञानपीठ; ‘नागमणि’ का संपादन
सआदत हसन मंटो‘मेहमाननवाजी में कसर’ — विभाजन की हिंसा की विडंबना
एम.एस. सथ्यु‘गर्म हवा’ (1973) के निर्देशक; पटकथा कैफ़ी आज़मी; अभिनय बलराज साहनी
रामचंद्र गुहाप्रश्न 10 का अवतरण — भारत और सोवियत संघ की तुलना
राज्य पुनर्गठन आयोग (1953)सीमांकन पर विचार; रिपोर्ट 1955

अंतिम क्षण के जालध्यान

  1. 80 लाख बनाम 5–10 लाख — 80 लाख विस्थापित, 5–10 लाख मृत। सबसे आम गलती।
  2. आयोग (1953) बनाम अधिनियम (1956) — आयोग सिफ़ारिश करता है; 14 राज्य + 6 केंद्र-शासित प्रदेश अधिनियम से बने।
  3. आंध्र पहले, आयोग बाद में — घोषणा दिसंबर 1952, आयोग 1953। आंध्र ने आयोग को जन्म दिया।
  4. गाँधी भाषावार राज्यों के पक्ष में नहीं थे — छात्र प्रायः उल्टा मान लेते हैं।
  5. विभाजन का आधार = धर्म; पुनर्गठन का आधार = भाषा। एक बाहरी सीमा, दूसरी आंतरिक।
  6. हैदराबाद = सेना (सितंबर 1948); मणिपुर = वार्ता (सितंबर 1949)। मणिपुर में सेना नहीं गई।
  7. 2000 के तीन राज्य भाषा से नहीं बने — क्षेत्रीय संस्कृति/विकास के असंतुलन से।
  8. नगालैंड 1963 — पंजाब (1966) और मेघालय (1972) से पहले।
  9. पहले त्रावणकोर, अगले दिन हैदराबाद ने स्वतंत्रता की घोषणा की।
  10. पूर्वी बंगाल → पूर्वी पाकिस्तान → बांग्लादेश। इसी कारण भारत वाला बंगाल ‘पश्चिम’ बंगाल है।
  11. मणिपुर = सार्वभौम वयस्क मताधिकार से चुनाव कराने वाला भारत का पहला भाग (जून 1948)।
  12. मणिपुर और त्रिपुरा 1972 से पहले संघ-शासित थे — पृ. 20 की मानचित्र-गतिविधि का उत्तर।

पाठ्यपुस्तक में मुद्रित उत्तर

इस अध्याय में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है, और कोई सारांश खंड भी नहीं है। प्रश्न 1 और 2 तथ्यात्मक हैं; शेष वर्णनात्मक/मत-आधारित। उत्तर 05-Question-Bank.md में हैं — वे शिक्षक द्वारा तैयार किए गए हैं, पाठ्यपुस्तक के नहीं।