पर्यावरण, संसाधन और विश्व-राजनीति : एक स्वयंपूर्ण, अद्यतन और परीक्षा-योग्य विवेचन
यह अध्याय NCERT के अध्याय 6 का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं। उद्देश्य: पाठ्यपुस्तक के ढाँचे को लेकर उसे 2026 के तथ्यों, संधियों, संस्थाओं और विवादों से भर देना — ताकि विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा के साथ-साथ UPSC, राज्य PCS, CUET, SSC और NDA/CDS के लिए भी तैयार हो सके।
★प्रत्येक गैर-स्पष्ट तथ्य वेब-सत्यापित और स्रोत-चिह्नित है: ◆ = प्राथमिक स्रोत (संधि-पाठ, UN/UNEP/PIB आधिकारिक दस्तावेज़) ◇ = द्वितीयक स्रोत (शोध-संस्थान, प्रामाणिक समाचार) · 【पाठ】 = NCERT पाठ्यपुस्तक पूरी स्रोत-सूची अंत में। अद्यतन: अगस्त 2026।
विषय-सूची
| भाग | शीर्षक |
|---|---|
| I | वह वाक्य जो पूरा अध्याय है |
| II | पर्यावरण-कूटनीति के पाँच युग (1972–2026) |
| III | ‘वैश्विक संपदा’ — चार क्षेत्र, चार कानूनी व्यवस्थाएँ |
| IV | ★BBNJ — 17 जनवरी 2026, और चौथी संपदा को मिला उसका कानून |
| V | CBDR की जीवन-कथा : रियो से बेलेम तक |
| VI | ★मॉन्ट्रियल बनाम क्योटो : एक सफल और एक अटकी संधि की तुलना |
| VII | भारत का पक्ष — तर्क, आँकड़े, उपलब्धि और आलोचना |
| VIII | ‘साझी संपदा की त्रासदी’ का भारतीय उत्तर |
| IX | पर्यावरण आंदोलन — भारत की अहिंसक परंपरा |
| X | संसाधनों की भू-राजनीति : तेल, पानी और अब दुर्लभ मृदा |
| XI | मूलवासी — 1982 से UNDRIP और वन अधिकार अधिनियम तक |
| XII | दस विवाद जिन पर परीक्षा में राय माँगी जाती है |
| XIII | त्वरित तथ्य-पट्टिका |
| XIV | स्रोत-सूची |
भाग I — वह वाक्य जो पूरा अध्याय है
1.1 प्रश्न जो भूगोल से राजनीति की ओर ले जाता है
पाठ्यपुस्तक अपने पाठक की आपत्ति स्वयं उठाती है 【पाठ】—
“आपको लग सकता है कि ये तो नैसर्गिक घटनाएँ हैं और इनका अध्ययन राजनीति विज्ञान की जगह भूगोल वाली कक्षा में किया जाना चाहिए। लेकिन ज़रा फिर से सोचिए।”
और फिर वह उत्तर देती है — दो स्तरों पर:
पहला स्तर (व्यावहारिक): “इन मसलों में अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती। इस वजह से ये मसले विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।”
दूसरा स्तर (गहरा):
★★“कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? इस पर रोक लगाने के उपाय करने की जिम्मेदारी किसकी है? धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है? इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।” 【पाठ】
1.2 यही वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है★
इस एक वाक्य से अध्याय के हर खंड का उत्तर निकलता है —
| खंड | ताकत का सवाल कैसे काम करता है |
|---|---|
| पृथ्वी सम्मेलन | उत्तर का अजेंडा (ओज़ोन, तापवृद्धि) बनाम दक्षिण का अजेंडा (विकास) — और मंच पर किसकी बात ज्यादा चली |
| वैश्विक संपदा | अंटार्कटिका पर सात ताकतवर देशों ने दावा किया, बाकी ने कहा ‘यह सबकी है’ |
| CBDR | किसने ज्यादा बिगाड़ा = किसके पास ज्यादा ताकत रही |
| वन-आंदोलन | उत्तर की ‘निर्जन वन’ की धारणा दक्षिण पर थोपी गई |
| तेल | खपत उत्तर में, भंडार दक्षिण-पश्चिम एशिया में — और सेना किसकी तैनात रही |
| मूलवासी | सबसे कम ताकत, सबसे बड़ी कीमत |
भाग II — पर्यावरण-कूटनीति के पाँच युग (1972–2026)
| युग | काल | विशेषता | मुख्य पड़ाव |
|---|---|---|---|
| 1. जागरण | 1962–1972 | विज्ञान चेताता है, राजनीति सुनने लगती है | स्टॉकहोम सम्मेलन 1972 → UNEP; ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ 1972 【पाठ】 |
| 2. संस्थागत निर्माण | 1972–1992 | क्षेत्र-विशिष्ट संधियाँ बनती हैं | वियना 1985 → मॉन्ट्रियल 1987 (ओज़ोन); बर्टलैंड रिपोर्ट 1987 【पाठ】 |
| 3. रियो-युग | 1992–2000 | व्यापक ढाँचे और CBDR का जन्म | पृथ्वी सम्मेलन 1992 (170 देश); UNFCCC · CBD · UNCCD; क्योटो 1997 【पाठ】 |
| 4. अमल का संकट | 2000–2015 | लक्ष्य हैं, अमल नहीं; अमरीका बाहर, कनाडा बाहर | जोहानसबर्ग 2002 · रियो+20 (2012); भारत का अनुमोदन 2002 【पाठ】 |
| 5. सार्वभौमिक पर स्वैच्छिक | 2015–2026 | सबका दायित्व, पर अपने-अपने लक्ष्य | पेरिस 2015 · भारत का अनुमोदन 2 अक्तूबर 2016 【पाठ】 · कुनमिंग-मॉन्ट्रियल 2022 · ★COP30 बेलेम 2025 · ★★BBNJ लागू 17 जनवरी 2026 |
2.1 स्टॉकहोम 1972 — वह पड़ाव जिसका उल्लेख पाठ्यपुस्तक नहीं करती★
पाठ्यपुस्तक कहती है कि “1960 के दशक के बाद से” पर्यावरण की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया 【पाठ】 — पर वह यह नहीं बताती कि वह चरित्र कहाँ बना।
उत्तर है — स्टॉकहोम, 1972; मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन।
- ★यह पर्यावरण पर पहला वैश्विक सम्मेलन था।
- ★★इसी से UNEP का जन्म हुआ — जिसे पाठ्यपुस्तक नाम से गिनाती है।
- ★★भारत के लिए विशेष महत्त्व: इंदिरा गांधी एकमात्र विदेशी शासनाध्यक्ष थीं जिन्होंने सम्मेलन को संबोधित किया। उनका मूल तर्क वही था जो आज भी भारत का पक्ष है — गरीबी और पर्यावरण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
★★इसे उत्तर में लिखना बहुत प्रभावी होता है: “पाठ्यपुस्तक ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ को 1992 का सिद्धांत बताती है, पर उसका बीज 1972 में स्टॉकहोम में ही पड़ चुका था — जब भारत ने कहा कि विकासशील देशों के लिए पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।”
भाग III — ‘वैश्विक संपदा’ : चार क्षेत्र, चार कानूनी व्यवस्थाएँ
पाठ्यपुस्तक चारों को एक साथ गिनाती है 【पाठ】 — पर हर एक का कानूनी ढाँचा और उसकी समस्या अलग है।
| वैश्विक संपदा | मुख्य कानूनी ढाँचा | कानूनी सिद्धांत | ! मुख्य समस्या |
|---|---|---|---|
| ★पृथ्वी का वायुमंडल | वियना 1985 · मॉन्ट्रियल 1987 · UNFCCC 1992 · पेरिस 2015 | “मानवजाति की साझी चिंता” | ★ओज़ोन पर सफलता, जलवायु पर अटकाव — वही ढाँचा, अलग नतीजे (भाग VI देखिए) |
| ★अंटार्कटिका | अंटार्कटिका संधि 1959 · मैड्रिड न्यायाचार 1991 | ★★“शांति और विज्ञान को समर्पित प्राकृतिक संरक्षित क्षेत्र” | ! संप्रभुता-दावे समाप्त नहीं, केवल ‘जमे’ (frozen) हैं |
| ★समुद्री सतह | UNCLOS 1982 (भाग XI) · ★★BBNJ 2023 (लागू 17 जनवरी 2026) | ★★“मानवजाति की साझी विरासत” (गहरे समुद्री तल के लिए) | गहरे-समुद्री खनन पर विवाद |
| ★बाहरी अंतरिक्ष | बाह्य अंतरिक्ष संधि 1967 · चंद्रमा समझौता 1979 | 1967 — “सम्पूर्ण मानवजाति का क्षेत्र” | !! 1967 की संधि में लाभ-बँटवारे का कोई प्रावधान नहीं; चंद्रमा समझौते में कोई बड़ी अंतरिक्ष-शक्ति पक्षकार नहीं |
3.1 दो कानूनी पदों का सूक्ष्म भेद — जो पाठ्यपुस्तक की एक पंक्ति समझा देता है★★
| पद | अर्थ | कहाँ |
|---|---|---|
| “सम्पूर्ण मानवजाति का क्षेत्र” | सबकी पहुँच, कोई राष्ट्रीय संप्रभुता नहीं — पर लाभ बाँटने की बाध्यता नहीं | बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 |
| ★★“मानवजाति की साझी विरासत” | + लाभ का न्यायसंगत बँटवारा + भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण + अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन | UNCLOS का गहरा समुद्री तल; चंद्रमा समझौता 1979 |
★★अब पाठ्यपुस्तक की यह पंक्ति पढ़िए 【पाठ】 — “बाहरी अंतरिक्ष में जो दोहन-कार्य हो रहे हैं उनके फायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।” यह वाक्य ठीक उसी कानूनी खाई की ओर इशारा कर रहा है — 1967 की संधि लाभ-बँटवारे पर चुप है। यदि उत्तर में यह जोड़ दिया जाए तो वह विश्लेषण बन जाता है, केवल विवरण नहीं।
3.2 अंटार्कटिका संधि (1959) — पाँच प्रावधान★
- ★केवल शांतिपूर्ण उपयोग — सैन्य ठिकाने, युद्धाभ्यास और हथियार-परीक्षण निषिद्ध
- ★वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता और निष्कर्षों का आदान-प्रदान
- ★★संप्रभुता-दावे ‘जमे’ रहेंगे — न नया दावा, न पुराने का विस्तार
- परमाणु विस्फोट और रेडियोधर्मी कचरे का निपटान पूर्णत: निषिद्ध
- निरीक्षण की खुली व्यवस्था
- हस्ताक्षर 1 दिसंबर 1959; लागू 23 जून 1961; 12 मूल हस्ताक्षरकर्ता।
- ★मैड्रिड न्यायाचार (1991) — जिसे पाठ्यपुस्तक ‘अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार’ कहती है 【पाठ】 — ने अंटार्कटिका को ★★“शांति और विज्ञान को समर्पित प्राकृतिक संरक्षित क्षेत्र” घोषित किया और खनिज-संसाधन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया।
भारत की भूमिका — यह पाठ्यपुस्तक में नहीं है★★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1981 | भारत का पहला अंटार्कटिक अभियान |
| ★1983 | भारत संधि में शामिल और उसी वर्ष परामर्शदाता पक्ष (Consultative Party) — यानी निर्णय-प्रक्रिया में मत का अधिकार |
| केंद्र | दक्षिण गंगोत्री (1983, अब निष्क्रिय) · मैत्री (1988) · भारती (2012) |
| संस्था | राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR), गोवा |
| ★कानून | भारतीय अंटार्कटिक अधिनियम, 2022 |
★पाठ्यपुस्तक पूछती है — “अंटार्कटिका पर किसका स्वामित्व है?” 【पाठ】 भारत ने उस बहस में स्पष्ट पक्ष लिया — उसने दावा नहीं किया, अनुसंधान-केंद्र बनाए। यानी भारत उन देशों में है जो इसे ‘विश्व की साझी संपदा’ मानते हैं।
भाग IV — BBNJ : 17 जनवरी 2026, और चौथी संपदा को मिला उसका कानून★★
यह पाठ्यपुस्तक के बाद की सबसे बड़ी घटना है और सीधे ‘वैश्विक संपदा’ खंड से जुड़ती है। ◇
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से परे क्षेत्रों की समुद्री जैव-विविधता पर समझौता (BBNJ) — लोकप्रिय नाम ‘हाई सीज़ संधि’ |
| अपनाई गई | 19 जून 2023; हस्ताक्षर के लिए सितंबर 2023 से खुली |
| ★60वाँ अनुसमर्थन | 19 सितंबर 2025 |
| ★★लागू हुई | 17 जनवरी 2026 |
| किस क्षेत्र पर | ★तटीय देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (200 समुद्री मील) से परे का समुद्र — यानी महासागरों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा, जो अब तक लगभग बिना नियम के था |
| चार स्तंभ | (1) समुद्री आनुवंशिक संसाधन और लाभ-बँटवारा (2) समुद्री संरक्षित क्षेत्र (3) पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (4) क्षमता-निर्माण और प्रौद्योगिकी-हस्तांतरण |
| ! भारत | भारत ने घरेलू ढाँचा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है; अनुमोदन अभी शेष है |
★★यही वह वाक्य है जो उत्तर में लिखा जाना चाहिए: “पाठ्यपुस्तक कहती है — ‘वैश्विक संपदा की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है।’ 【पाठ】 BBNJ संधि उसी टेढ़ी खीर का ताज़ा उदाहरण भी है और उसका उत्तर भी — लगभग दो दशक की वार्ता के बाद, चारों वैश्विक संपदाओं में से एक (समुद्री सतह) को अंततः अपना कानूनी ढाँचा मिल गया।”
और साथ में यह भी जोड़िए — BBNJ में ‘लाभ-बँटवारे’ का प्रावधान है, जो 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि में नहीं था। यानी अंतर्राष्ट्रीय कानून ने पाठ्यपुस्तक की उस आलोचना से सीखा है।
भाग V — CBDR की जीवन-कथा : रियो से बेलेम तक
5.1 जन्म — रियो, 1992★★
पाठ्यपुस्तक का उद्धरण 【पाठ】—
“पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होंगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए… विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।”
5.2 तीन रूप — जिनमें यह सिद्धांत बदलता गया★
| चरण | रूप | अर्थ |
|---|---|---|
| ★क्योटो (1997) | कठोर विभाजन | परिशिष्ट-I देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य; बाकी को छूट। 【पाठ】 “चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो-प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।” |
| ★★पेरिस (2015) | लचीला विभाजन | “CBDR-RC, राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में” — सबका NDC, पर महत्वाकांक्षा और सहायता में भेद |
| ★★बेलेम (2025) | वित्त पर केंद्रित | बहस अब “किसे लक्ष्य मिले” से हटकर “कौन पैसा दे” पर आ गई है |
5.3 COP30, बेलेम — नवीनतम स्थिति ◇★★
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कब और कहाँ | 10–21 नवंबर 2025, बेलेम (ब्राज़ील) — अमेज़न के द्वार पर हुआ पहला COP |
| कौन | 195 पक्षकारों ने ‘बेलेम पैकेज’ अपनाया — ★सर्वसम्मति से 29 निर्णय |
| मुख्य दस्तावेज़ | ★‘मुतिराओ’ पाठ (Mutirão — ‘साझा सामूहिक श्रम’) — शमन, वित्त और व्यापार-बाधाएँ एक साथ |
| ★★उपलब्धि | 2035 तक अनुकूलन-वित्त तीन गुना; ‘बाकू से बेलेम रोडमैप’ — विकासशील देशों के लिए 2035 तक कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष; और 300 अरब डॉलर के मूल लक्ष्य पर दबाव जारी |
| !! सबसे बड़ी नाकामी | 80 से अधिक देशों के समर्थन के बावजूद जीवाश्म ईंधन से बाहर निकलने का औपचारिक ‘रोडमैप’ अंतिम पाठ में शामिल नहीं हो सका — ब्राज़ीली अध्यक्षता उसे COP-प्रक्रिया से बाहर आगे बढ़ाएगी |
| अन्य | 30+ देशों ने ‘बेलेम स्वास्थ्य कार्य-योजना’ का समर्थन किया; प्रगति की रिपोर्टिंग COP33 (2028) के वैश्विक स्टॉकटेक में |
★★और यह तुलना उत्तर में बहुत काम आती है: पाठ्यपुस्तक 1992 के बारे में लिखती है 【पाठ】— “सम्मेलन में सहमति बनी… लेकिन इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं”; और “समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा।” COP30 का जीवाश्म-ईंधन रोडमैप ठीक उसी वाक्य का 2025 वाला संस्करण है — सिद्धांत पर सहमति, अमल पर नहीं। तैंतीस साल बाद भी बाधा वही है।
भाग VI — मॉन्ट्रियल बनाम क्योटो : एक सफल और एक अटकी संधि★
यह तुलना पूरे अध्याय की सबसे मूल्यवान अंतर्दृष्टि है और UPSC मुख्य परीक्षा में सीधे काम आती है।
6.1 मॉन्ट्रियल न्यायाचार — सफलता का लेखा ◆
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कब | 16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षर; 1 जनवरी 1989 को लागू (इसीलिए 16 सितंबर = विश्व ओज़ोन दिवस) |
| ★★उपलब्धि | “क्षति पहुँचाने वाले रसायनों का 98% (क्षमता के हिसाब से) चरणबद्ध रूप से समाप्त; ओज़ोन परत में सुधार के पहले संकेत।” |
| ★सार्वभौमिकता | ★★इतिहास की पहली संधि जिसे सार्वभौम अनुसमर्थन मिला |
| ★किगाली संशोधन (2016) | HFC की 80%+ कटौती अगले 30 वर्षों में; 2050 तक 80 अरब मीट्रिक टन CO₂-समतुल्य की बचत का अनुमान; 1 नवंबर 2024 तक 160 पक्षकारों ने अनुसमर्थन किया; भारत ने सितंबर 2021 में |
6.2 तीन कारण जिनसे मॉन्ट्रियल सफल हुआ — और जलवायु नहीं★★
| कारण | ओज़ोन | जलवायु |
|---|---|---|
| 1. समस्या का दायरा | ★कुछ ही रसायन, कुछ ही उद्योग | ! पूरी अर्थव्यवस्था — ऊर्जा, परिवहन, कृषि, उद्योग |
| 2. विकल्प | ★CFC के स्थानापन्न तकनीकी रूप से तैयार थे | ! जीवाश्म ईंधन का विकल्प महँगा और असमान रूप से उपलब्ध |
| 3. लागत-बँटवारा | ★★‘बहुपक्षीय कोष’ बना — विकसित देशों ने विकासशील देशों को संक्रमण की लागत दी | ! जलवायु-वित्त पर 30 साल से विवाद — यही COP30 का भी केंद्रीय मुद्दा रहा |
★★और गति देखिए: 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन छेद की खोज हुई 【पाठ】 “एक आँख खोल देने वाली घटना” — और केवल दो वर्ष बाद, 1987 में, बाध्यकारी संधि बन गई। जलवायु में — 1992 में ढाँचा, 1997 में प्रोटोकॉल, 2015 में समझौता, और 2025 तक भी जीवाश्म ईंधन पर रोडमैप नहीं। यही अंतर बताता है कि पाठ्यपुस्तक ‘टेढ़ी खीर’ क्यों कहती है — और यह भी कि खीर कब मीठी बनती है।
भाग VII — भारत का पक्ष : तर्क, आँकड़े, उपलब्धि और आलोचना
7.1 भारत के तर्क के तीन स्तंभ 【पाठ】★
- ★★ऐतिहासिक उत्तरदायित्व — “ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज्यादातर विकसित देशों की है।”
- ★★प्रति व्यक्ति मानक — “विकासशील देशों में ग्रीन हाऊस गैसों की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है।” (ग्रुप-8 बैठक, जून 2005)
- ★विकास की प्राथमिकता — “‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’”
7.2 आँकड़ा जो तर्क का दिल है 【पाठ】★★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| विश्व औसत (सन् 2000) | 3.8 टन प्रति व्यक्ति |
| भारत (2000 तक) | 0.9 टन |
| भारत (2030 का अनुमान) | 1.6 टन |
★“2030 तक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बढ़ने के बावजूद विश्व के (सन् 2000 के) औसत के आधे से भी कम होगा।”
! पर एक बारीकी उत्तर में ज़रूर जोड़िए: कुल उत्सर्जन में भारत आज विश्व के सबसे बड़े उत्सर्जकों में है — यह प्रति व्यक्ति आँकड़े के साथ-साथ सच है। भारत का तर्क कुल पर नहीं, प्रति व्यक्ति और ऐतिहासिक हिस्से पर टिका है — यह भेद स्पष्ट करना उत्तर को परिपक्व बनाता है।
7.3 प्रतिबद्धता और उपलब्धि (2026 तक) ◇★★
| प्रतिबद्धता | स्थिति |
|---|---|
| 2030 तक उत्सर्जन-तीव्रता 2005 के स्तर से ~45% कम | प्रगति पर |
| ★★2030 तक स्थापित विद्युत-क्षमता का ~50% गैर-जीवाश्म से | ★★जुलाई 2025 में हासिल — लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले |
| 2030 तक 2.5–3 अरब टन CO₂-समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक | प्रगति पर |
| ★2070 तक नेट ज़ीरो | COP26 (2021) में घोषित; ‘पंचामृत’ संकल्प |
| 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता (2030) | ★अक्तूबर 2025 तक कुल क्षमता 505 GW पार; गैर-जीवाश्म ~259 GW |
| 2025 में जोड़ी गई नवीकरणीय क्षमता | ~50 GW; निवेश ~22 अरब डॉलर |
| वैश्विक रैंक | ★नवीकरणीय स्थापित क्षमता में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर ◆ |
7.4 भारत की वैश्विक पहलें(पाठ्यपुस्तक के बाद की)★
| पहल | विवरण |
|---|---|
| ★★अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) | भारत-फ्रांस की संयुक्त पहल, COP21 (2015); मुख्यालय गुरुग्राम — ★भारत में मुख्यालय वाला पहला बड़ा अंतर्राष्ट्रीय संगठन |
| ★CDRI | आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन, 2019 |
| ★राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, 2023 | हरित हाइड्रोजन का उत्पादन और निर्यात-केंद्र बनने का लक्ष्य |
| ★LiFE | ‘पर्यावरण के लिए जीवन-शैली’ — व्यक्तिगत उपभोग-व्यवहार पर केंद्रित वैश्विक अपील |
| NAPCC, 2008 | आठ राष्ट्रीय मिशन — सौर, ऊर्जा-दक्षता, टिकाऊ आवास, जल, हिमालयी पारिस्थितिकी, हरित भारत, टिकाऊ कृषि, रणनीतिक ज्ञान |
7.5 और आलोचना — जो पाठ्यपुस्तक स्वयं दर्ज़ करती हैध्यान
| आलोचना | स्रोत |
|---|---|
| “भारत और चीन भी जल्दी ही ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों की भाँति अगली कतार में नज़र आयेंगे।” | 【पाठ】 (पृ. 88–89) |
| ! साइड-टिप्पणी: “पहले उन लोगों ने धरती को बर्बाद किया और अब धरती को चौपट करने की हमारी बारी है। क्या यही है हमारा पक्ष?” | 【पाठ】 (पृ. 89) |
| ! वित्त और प्रौद्योगिकी पर: “विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।” | 【पाठ】 (1997 का पुनरावलोकन) |
★★संतुलित निष्कर्ष — यही सबसे ऊँचे अंक दिलाता है: “भारत का तर्क आँकड़ों पर मज़बूत है (0.9 बनाम 3.8) और नैतिक रूप से न्यायसंगत भी। और उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि भारत केवल माँग नहीं कर रहा — वह स्वयं भी कर रहा है। 2025 में 50% गैर-जीवाश्म क्षमता लक्ष्य से पाँच साल पहले हासिल करना उस तर्क को नैतिक बल देता है। पर पाठ्यपुस्तक की साइड-टिप्पणी की चेतावनी भी वाजिब है — ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का तर्क वर्तमान उत्तरदायित्व से छूट नहीं बन सकता।”
भाग VIII — ‘साझी संपदा की त्रासदी’ का भारतीय उत्तर
8.1 हार्डिन का तर्क (1968)ध्यान
गैरेट हार्डिन ने कहा कि साझा चारागाह अनिवार्यत: नष्ट हो जाएगा — क्योंकि एक और पशु चराना हर चरवाहे के लिए व्यक्तिगत रूप से लाभदायक है, जबकि नुकसान सबमें बँट जाता है। उनका निष्कर्ष: समाधान या तो निजीकरण है या राज्य-नियंत्रण।
8.2 ऑस्ट्रोम का खंडन★★
एलिनॉर ऑस्ट्रोम ने दुनिया भर के सैकड़ों वास्तविक उदाहरणों का अध्ययन करके दिखाया कि समुदाय स्वयं टिकाऊ नियम बना और निभा सकते हैं, बशर्ते: स्पष्ट सीमाएँ · स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नियम · उपयोगकर्ताओं की भागीदारी · निगरानी · क्रमिक दंड · सस्ता विवाद-समाधान · और राज्य द्वारा संगठित होने के अधिकार की मान्यता। ★इस काम के लिए उन्हें 2009 में अर्थशास्त्र का नोबेल स्मृति पुरस्कार मिला।
8.3 और पाठ्यपुस्तक बिना नाम लिए ऑस्ट्रोम का पक्ष लेती है★★
पाठ्यपुस्तक लिखती है 【पाठ】—
- “सदियों के चलन और आपसी समझदारी से भारत के ग्रामीण समुदायों ने साझी संपदा के संदर्भ में अपने सदस्यों के अधिकार और दायित्व तय किए हैं।”
- “‘देवस्थान’ को हम ऐसी व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं जिसके अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।”
- ★★“संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखने की प्रतिबद्धता कायम रखी।”
★★यानी अध्याय का पक्ष स्पष्ट है — साझी संपदा का तीसरा रास्ता है: न निजीकरण, न राज्य-नियंत्रण, बल्कि सामुदायिक प्रबंधन।
! और वही अध्याय यह भी बताता है कि यह रास्ता कहाँ टूटता है 【पाठ】 — “कानूनी स्वामित्व राज्य का हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में। इन दोनों के नीतिगत मानक अलग-अलग हैं।” यह ठीक ऑस्ट्रोम की अंतिम शर्त का उल्लंघन है — ‘राज्य द्वारा संगठित होने के अधिकार की मान्यता’। और यही वह खाई है जिसे भारत के वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने पाटने की कोशिश की। (भाग XI देखिए)
भाग IX — पर्यावरण आंदोलन : भारत की अहिंसक परंपरा
पाठ्यपुस्तक कहती है 【पाठ】— “भारत में बाँध विरोधी तथा पर्यावरण-बचाव के अन्य आंदोलन एक अर्थ में समानधर्मी हैं क्योंकि ये अहिंसा पर आधारित हैं।” — यह कथन इन उदाहरणों से सिद्ध होता है:
| आंदोलन | कब और कहाँ | नेतृत्व | परिणाम |
|---|---|---|---|
| ★★चिपको | 1973, चमोली (उत्तराखंड) | सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी | ★पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाना — विश्व-प्रसिद्ध अहिंसक प्रतिरोध |
| ★साइलेंट वैली | 1970 का दशक, केरल | KSSP और नागरिक समाज | ★सफल — परियोजना रद्द; 1984 में राष्ट्रीय उद्यान |
| अप्पिको | 1983, कर्नाटक | पांडुरंग हेगड़े | चिपको का दक्षिण भारतीय रूप (‘अप्पिको’ = ‘गले लगाना’) |
| ★★नर्मदा बचाओ आंदोलन | 1985 से | मेधा पाटकर, बाबा आम्टे | विस्थापन और पुनर्वास को राष्ट्रीय बहस बनाया |
| टिहरी बाँध विरोध | 1980–90 का दशक | सुंदरलाल बहुगुणा | बाँध बना, पर पुनर्वास-मानक बदले |
| ★★नियमगिरि | 2000 का दशक, ओडिशा | डोंगरिया कोंध जनजाति | ★2013 में ग्राम सभाओं ने खनन अस्वीकार किया |
★★यह पैटर्न आकस्मिक नहीं है। भारतीय पर्यावरण-आंदोलन की जड़ें गांधीवादी परंपरा में हैं — और यही उन्हें वैश्विक पर्यावरण-आंदोलन में एक विशिष्ट पहचान देता है। पाठ्यपुस्तक यही रेखांकित करती है, और उत्तर में इसे स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए।
भाग X — संसाधनों की भू-राजनीति : तेल, पानी और अब दुर्लभ मृदा
10.1 तेल — पाठ्यपुस्तक के आँकड़े 【पाठ】★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| खाड़ी का विश्व तेल-उत्पादन में हिस्सा | 30 प्रतिशत |
| ★ज्ञात तेल-भंडार में हिस्सा | 64 प्रतिशत — “यही एकलौता क्षेत्र है जो माँग बढ़ने पर पूर्ति कर सकता है” |
| ★सऊदी अरब | कुल भंडार का एक चौथाई; विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक |
| ★इराक | ज्ञात भंडार में दूसरा; भंडार 112 अरब बैरल से ज्यादा का अनुमान |
| परिवहन-ऊर्जा में पेट्रोलियम | 95 फीसदी |
★और वह विरोधाभास: “अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत में इस तेल की खपत होती है — लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूरी पर हैं।” — यही ‘संसाधनों की भू-राजनीति’ की पूरी परिभाषा है।
10.2 21वीं सदी की नयी सूची★★
| संसाधन | क्यों रणनीतिक | भू-राजनीतिक तथ्य |
|---|---|---|
| ★★दुर्लभ मृदा तत्व | पवन-टरबाइन, EV मोटरें, रक्षा-इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन — ★इनके बिना हरित संक्रमण असंभव | ! चीन का वैश्विक प्रसंस्करण पर भारी प्रभुत्व |
| ★★लीथियम, कोबाल्ट, निकल | बैटरी | ★‘लीथियम त्रिकोण’ — चिली, अर्जेंटीना, बोलीविया; कोबाल्ट का बड़ा हिस्सा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य से |
| ताँबा | विद्युतीकरण | चिले, पेरू |
| यूरेनियम | परमाणु ऊर्जा | कज़ाख़स्तान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया |
★भारत की प्रतिक्रिया: महत्वपूर्ण खनिज मिशन (30 खनिजों की अधिसूचित सूची); KABIL (विदेशों में खनिज-संपत्तियों के लिए तीन PSU की संयुक्त कंपनी); खान और खनिज अधिनियम में 2023 का संशोधन।
★★कक्षा और उत्तर के लिए यह वाक्य बहुत कारगर है: “पाठ्यपुस्तक का कार्टून ‘इसे कहते हैं नव-उपनिवेशवाद’ 【पाठ】 तेल के बारे में था। 21वीं सदी में वही तर्क दुर्लभ मृदा और लीथियम पर लागू हो रहा है — और विडंबना यह है कि इस बार होड़ ‘हरित संक्रमण’ के नाम पर है।”
10.3 जल — भारत के भीतर बनाम बाहर★★
पाठ्यपुस्तक की साइड-टिप्पणी पूछती है 【पाठ】— “हमारे देश में भी पानी को लेकर बड़े झगड़े-टंटे चल रहे हैं। ये संघर्ष उनसे किस तरह अलग हैं?” — उत्तर यह है:
| भारत के भीतर | अंतर्राष्ट्रीय | |
|---|---|---|
| उदाहरण | कावेरी · कृष्णा · रावी-ब्यास · महानदी | इज़रायल-सीरिया-जार्डन (जॉर्डन और यारमुक) · तुर्की-सीरिया-इराक (फरात) 【पाठ】 |
| समाधान-तंत्र | ★अनुच्छेद 262 · अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 · अधिकरण और उच्चतम न्यायालय | ! कोई अनिवार्य तंत्र नहीं — संधि हो तो ठीक, नहीं तो कुछ नहीं |
| ऊपरी सत्ता | ★संविधान और संघीय सरकार | ! कोई नहीं |
| परिणाम | विवाद लंबे चलते हैं, पर युद्ध नहीं होता | ★‘जलयुद्ध’ की आशंका |
★★यही अंतर है — और यह अध्याय 5 के ‘अराजकता’ वाले तर्क से सीधे जुड़ता है: “किसी देश के भीतर हिंसा के ख़तरों से निपटने के लिए एक जानी-पहचानी व्यवस्था होती है — इसे सरकार कहते हैं। लेकिन विश्व-राजनीति में ऐसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं जो सबके ऊपर हो।” (अध्याय 5) दोनों अध्यायों को जोड़ने का यह सबसे अच्छा बिंदु है — और परीक्षा में यह जोड़ बहुत प्रभावी होता है।
★भारत के सीमापार जल-समझौते: सिंधु जल संधि (1960, पाकिस्तान) · गंगा जल बँटवारा संधि (1996, बांग्लादेश) · महाकाली संधि (1996, नेपाल) · कोसी और गंडक समझौते (नेपाल)
भाग XI — मूलवासी : 1982 से UNDRIP और वन अधिकार अधिनियम तक
11.1 पाठ्यपुस्तक कहाँ रुकती है★
पाठ्यपुस्तक 1982 की UN परिभाषा और 1975 की वर्ल्ड काउंसिल पर रुक जाती है 【पाठ】 — और अपने सबसे तीखे वाक्य के साथ समाप्त होती है:
★★“राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से इनको संवैधानिक सुरक्षा हासिल है लेकिन देश के विकास का इन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिल सका है… ऐसी परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह समुदाय सबसे बड़ा है। दरअसल इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”
11.2 आगे क्या हुआ — UNDRIP, 2007 ◆★★
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कब | ★13 सितंबर 2007, संयुक्त राष्ट्र महासभा |
| ★मतदान | 144 पक्ष में · 4 विरुद्ध (ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, अमरीका) · 11 अनुपस्थित |
| क्या | “मूलवासी लोगों के अस्तित्व, गरिमा और कल्याण के लिए न्यूनतम मानकों का सार्वभौम ढाँचा” |
| मुख्य अधिकार | आत्म-निर्णय · अपनी संस्थाओं, संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखना · भूमि, भूक्षेत्र और संसाधनों पर अधिकार · निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी |
| ★★केंद्रीय सिद्धांत | ‘स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति’ (FPIC) — उनकी भूमि पर कोई परियोजना उनकी सहमति के बिना नहीं |
| ! कानूनी दर्ज़ा | यह घोषणा है, संधि नहीं — कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं |
| बाध्यकारी विकल्प | ILO अभिसमय 169 (1989) — ! भारत उसका पक्षकार नहीं |
! भारत की स्थिति: भारत ने UNDRIP के पक्ष में मत दिया, पर उसकी आधिकारिक स्थिति यह रही है कि स्वतंत्रता के बाद भारत में सभी नागरिक ‘मूलवासी’ हैं और जनजातीय अधिकारों का संरक्षण संविधान तथा घरेलू कानूनों से होता है। यह बारीकी उत्तर में लिखने योग्य है।
11.3 भारत का घरेलू ढाँचा★★
| उपकरण | क्या |
|---|---|
| अनुच्छेद 342 | अनुसूचित जनजातियों की अधिसूचना |
| ★पाँचवीं अनुसूची | अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन |
| ★छठी अनुसूची | असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम — स्वायत्त जिला परिषदें |
| ★PESA अधिनियम, 1996 | ★★ग्राम सभा को भूमि, लघु वन-उपज और जल पर निर्णायक अधिकार |
| ★★वन अधिकार अधिनियम, 2006 | अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम — ★इसकी प्रस्तावना स्वयं “ऐतिहासिक अन्याय” शब्द का प्रयोग करती है। व्यक्तिगत वन-भूमि अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार — दोनों |
★★नियमगिरि (2013) — जहाँ यह ढाँचा जीवंत हुआ: ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन के प्रस्ताव पर उच्चतम न्यायालय के आदेश से प्रभावित ग्राम सभाओं से पूछा गया — और सभी ने खनन अस्वीकार कर दिया। डोंगरिया कोंध समुदाय के लिए वह पहाड़ देवता (नियम राजा) है।
★इसे भारत में ‘पर्यावरणीय जनमत-संग्रह’ का पहला उदाहरण माना जाता है — और यहीं UNDRIP का FPIC सिद्धांत भारतीय कानून के माध्यम से व्यवहार में आया।
और यह पाठ्यपुस्तक के दो वाक्यों को एक साथ जीवंत करता है 【पाठ】 — “संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा…” और “उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?”
भाग XII — दस विवाद जिन पर परीक्षा में राय माँगी जाती है
| # | विवाद | पक्ष | विपक्ष |
|---|---|---|---|
| 1 | क्या ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ आज भी न्यायसंगत है? | ऐतिहासिक उत्सर्जन विकसित देशों का; भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन आज भी बहुत कम | ! कुल उत्सर्जन में विकासशील देशों का हिस्सा अब बड़ा है — 【पाठ】 “जल्दी ही… अगली कतार में नज़र आयेंगे” |
| 2 | क्या ‘टिकाऊ विकास’ व्यवहार्य है या विरोधाभास? | भारत ने 50% गैर-जीवाश्म क्षमता लक्ष्य से पहले हासिल की | ! 【पाठ】 “समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा” |
| 3 | क्या अंटार्कटिका पर संप्रभुता-दावे वैध हैं? | सात देशों के ऐतिहासिक और भौगोलिक आधार | ★अधिकांश देश और भारत — यह “विश्व की साझी संपदा” है |
| 4 | क्या पर्यावरण-संरक्षण विकास में बाधा है? | विकासशील देशों की “पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास” | ★नवीकरणीय ऊर्जा ने दिखाया कि दोनों साथ चल सकते हैं |
| 5 | वन ‘निर्जन’ हैं या वहाँ लोग रहते हैं? | उत्तरी ‘विजनपन’ दृष्टिकोण — प्रकृति को मनुष्य से बचाओ | ★★【पाठ】 “लोग वनों में भी रहते हैं” — और उन्हीं ने वनों को बचाया है |
| 6 | क्या साझी संपदा का निजीकरण समाधान है? | हार्डिन का तर्क — ‘त्रासदी’ अवश्यंभावी | ★★ऑस्ट्रोम और ‘देवस्थान’ — सामुदायिक प्रबंधन तीसरा रास्ता है |
| 7 | क्या बड़े बाँध विकास हैं या विनाश? | बिजली, सिंचाई, बाढ़-नियंत्रण | ! विस्थापन — 【पाठ】 “इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है” |
| 8 | क्या मूलवासियों को ‘वीटो’ मिलना चाहिए? | FPIC और वन अधिकार अधिनियम; नियमगिरि इसका प्रमाण | ! राष्ट्रीय हित और परियोजना-व्यवहार्यता का प्रश्न |
| 9 | क्या ‘जलयुद्ध’ की आशंका अतिशयोक्ति है? | 【पाठ】 “21वीं सदी में फसाद की जड़”; इज़रायल-जार्डन और फरात के उदाहरण | ! ऐतिहासिक रूप से जल-संधियाँ युद्धों से अधिक टिकाऊ रही हैं (सिंधु जल संधि इसका उदाहरण) |
| 10 | क्या दुर्लभ मृदा की होड़ ‘हरित नव-उपनिवेशवाद’ है? | ! खनन का बोझ फिर दक्षिण पर, लाभ उत्तर को | जलवायु-संकट के लिए यह संक्रमण अनिवार्य है |
भाग XIII — त्वरित तथ्य-पट्टिका
पाठ्यपुस्तक के आँकड़े(परीक्षा में यही लिखिए)
| मान | संदर्भ |
|---|---|
| 1960 का दशक | पर्यावरण की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया |
| 1972 · 1987 · 1992 · 1997 · 2002 · 2016 | लिमिट्स टू ग्रोथ · बर्टलैंड · पृथ्वी सम्मेलन+UNFCCC · क्योटो · भारत का अनुमोदन · भारत का पेरिस-अनुमोदन (2 अक्तूबर) |
| 170 देश | पृथ्वी सम्मेलन में भागीदारी |
| चार वैश्विक संपदाएँ | वायुमंडल · अंटार्कटिका · समुद्री सतह · बाहरी अंतरिक्ष |
| 1959 · 1987 · 1991 | अंटार्कटिका संधि · मॉन्ट्रियल · अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार |
| 26% · 90% · 70% | अंटार्कटिका — निर्जन क्षेत्र · स्थलीय हिम · स्वच्छ जल |
| 3.8 · 0.9 · 1.6 टन | विश्व औसत (2000) · भारत (2000) · भारत (2030) |
| 66.3 करोड़ · 2.40 अरब · 30 लाख | UN मानव विकास रिपोर्ट 2016 |
| 30% · 64% · एक चौथाई · 112 अरब बैरल | खाड़ी का उत्पादन · भंडार · सऊदी अरब · इराक |
| 95 फीसदी | परिवहन-ऊर्जा जो पेट्रोलियम से आती है |
| 30 करोड़ · 8% | विश्व में मूलवासी · भारत में अनुसूचित जनजाति |
| 1982 · 1975 | UN की परिभाषा · वर्ल्ड काउंसिल का गठन |
2026 के अद्यतन आँकड़े(प्रतियोगी परीक्षा और कक्षा-चर्चा के लिए)
| मान | संदर्भ |
|---|---|
| ★★10–21 नवंबर 2025 · 195 पक्षकार · 29 निर्णय | COP30, बेलेम — ‘बेलेम पैकेज’ |
| ★1.3 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष (2035 तक) | ‘बाकू से बेलेम रोडमैप’ |
| ! जीवाश्म-ईंधन रोडमैप शामिल नहीं हुआ | COP30 की सबसे बड़ी नाकामी |
| ★★17 जनवरी 2026 | BBNJ ‘हाई सीज़ संधि’ लागू (60वाँ अनुसमर्थन 19 सितंबर 2025) |
| ★98% · सार्वभौम अनुसमर्थन | मॉन्ट्रियल न्यायाचार की उपलब्धि |
| 160 पक्षकार (1 नवंबर 2024) · भारत सितंबर 2021 | किगाली संशोधन |
| ★★जुलाई 2025 · 505 GW · ~259 GW | भारत ने 50% गैर-जीवाश्म क्षमता लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले हासिल की |
| ★~50 GW · ~22 अरब डॉलर (2025) | भारत में जोड़ी गई नवीकरणीय क्षमता और निवेश |
| ★तीसरा स्थान | नवीकरणीय स्थापित क्षमता में भारत का वैश्विक रैंक |
| ★★13 सितंबर 2007 · 144–4–11 | UNDRIP और उसका मतदान-परिणाम |
| ★2006 · 1996 · 2013 | वन अधिकार अधिनियम · PESA · नियमगिरि का ग्राम सभा निर्णय |
| 2070 · 500 GW | भारत का नेट-ज़ीरो और गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य |
दस वाक्य जो उत्तर में सीधे लिखे जा सकते हैं
- “इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।”
- “पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है।” (CBDR)
- “आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे।” (टिकाऊ विकास)
- “‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है।”
- “संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी…” (देवस्थान)
- “‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’ — संसाधनों की भू-राजनीति इन्हीं सवालों से जूझती है।”
- “दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं।” / “लोग वनों में भी रहते हैं।”
- “भारत में बाँध विरोधी तथा पर्यावरण-बचाव के अन्य आंदोलन… अहिंसा पर आधारित हैं।”
- “उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?”
- “इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”
भाग XIV — स्रोत-सूची
प्राथमिक स्रोत ◆
- NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), अध्याय 6, पृ. 81–98 【पाठ】
- UNEP — About Montreal Protocol — unep.org
- Ozone Secretariat — Decision XXXVI/21: Status of ratification of the Kigali Amendment — ozone.unep.org
- UN DISD — United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples — social.desa.un.org
- OHCHR — UN Declaration on the Rights of Indigenous Peoples — ohchr.org
- UN — COP30 closes with agreement to step up support for developing countries — un.org
- COP30 Brazil — COP30 approves Belém Package — cop30.br
- IOC-UNESCO — BBNJ Agreement Successfully Ratified — ioc.unesco.org
- PIB, भारत सरकार — India Ranks Third Globally in Renewable Energy Installed Capacity — pib.gov.in
द्वितीयक स्रोत ◇ 10. Carbon Brief — COP30: Key outcomes agreed at the UN climate talks in Belém — carbonbrief.org 11. World Resources Institute — COP30: Outcomes, Disappointments and What’s Next — wri.org 12. IISD — COP30 Outcome: What it means and what’s next — iisd.org 13. High Seas Alliance — Historic High Seas Treaty enters into force (16 जनवरी 2026) — highseasalliance.org 14. Down To Earth — BBNJ treaty receives 60 ratifications, will enter into force in January 2026 — downtoearth.org.in 15. Enerdata — India hits 500 GW in installed power, over 50% from non-fossil sources — enerdata.net 16. SolarQuarter — India Crosses 505 GW Installed Power Capacity with Non-Fossil Fuels Exceeding 50% — solarquarter.com 17. Bhatt & Joshi Associates — Tribal Rights in India: Article 244 and FRA 2006 Framework — bhattandjoshiassociates.com
! अंतिम नोट — विद्यार्थी के लिए: बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का आँकड़ा और उसकी भाषा ही लिखिए। यह स्वतंत्र अध्याय समझ गहरी करने, कक्षा-चर्चा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए है। जहाँ पाठ्यपुस्तक और 2026 के आँकड़े भिन्न हैं, वहाँ दोनों साथ-साथ दिए गए हैं — यही सही तरीका है, क्योंकि पाठ्यपुस्तक गलत नहीं है; वह अपने समय का सच्चा चित्र है।