Chapter 7क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

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स्रोत: स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, NCERT — अध्याय 7, पृष्ठ 112–135 (24 पृष्ठ) ★★QR कोड: 12122CH08 — यानी मूल पुस्तक में यह अध्याय 8 था; युक्तिकरण में अध्याय 7 (‘जन आंदोलनों का उदय’) हटने से यह अब अध्याय 7 हो गया। पठन-विधि: ! फ़ॉन्ट LEGACY (8/8 अविश्वसनीयता) — 150 dpi पर दृश्य पठन।

⚡ अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी

★★“भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता, लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।” — 【पाठ】 पृ. 132, अध्याय का अंतिम वाक्य

और उसी का पहला रूप पहले पन्ने पर है:

★“पोस्टर से यह बात साफ़ ज़ाहिर है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है।”

शिक्षक के लिए पहली सूचना — यह अध्याय बड़े पैमाने पर अद्यतन हुआ हैध्यान

★★यह पुस्तक-2 का सबसे अधिक बदला हुआ अध्याय है। जम्मू-कश्मीर वाला पूरा खंड 5 अगस्त 2019 तक लाया गया है —

  • अनुच्छेद 370 की चर्चा भूतकाल में है (“विशेष दर्जा दिया गया था”);
  • मानचित्र का शीर्षक है — “केंद्र शासित प्रदेश — जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख”, स्रोत pib.gov.in;
  • पाठ में 2016, 2018 और 5 अगस्त 2019 तक की घटनाएँ दर्ज़ हैं;
  • और “आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी…” (पृ. 130) — यानी कालबोध भी अद्यतन है।

! इसलिए पुरानी गाइड या पुराने नोट्स इस अध्याय के लिए विशेष रूप से भ्रामक होंगे। कक्षा को यह पहले ही बता दीजिए।

पृष्ठ 112 · अध्याय-आरंभ

🖼 आवरण-चित्र — उत्तराखंड आंदोलन का पोस्टरध्यान

एक ही पोस्टर पर एक ही बात सात भाषाओं में लिखी है — हिन्दी, बांग्ला, मराठी, उर्दू, तमिल, पंजाबी (गुरमुखी) और अंग्रेज़ी। हिन्दी पंक्ति: “हमें हर भारतवासी का सहयोग चाहिये — अन्याय, शोषण व दमन के खिलाफ उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए।” अंग्रेज़ी पंक्ति: “WE SEEK SUPPORT OF EVERY INDIAN. AGAINST INJUSTICE, EXPLOITATION AND OPPRESSION FOR THE CREATION OF UTTRAKHAND STATE” (साभार: उत्तराखंड सांस्कृतिक मोर्चा)

🖤 और साथ का काला बॉक्स — इसे कक्षा में सबसे पहले पढ़िए★★

“क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अकसर क्षेत्र विशेष की भाषा में अभिव्यक्त किया जाता है और ये आकांक्षाएँ स्थानीय जनता या शासकों को संबोधित की जाती हैं। यहाँ जो पोस्टर दिखाया गया है, उसे इस संदर्भ में विशेष कहा जाएगा कि उसमें सात भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है। स्पष्ट है कि इन भाषाओं के इस्तेमाल का उद्देश्य तमाम भारतीय नागरिकों तक अपनी बात पहुँचाना है। ★★पोस्टर से यह बात साफ़ ज़ाहिर है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है।”

★★कक्षा से पूछिए: “अगर उत्तराखंड की माँग सिर्फ़ उत्तराखंड के लोगों से थी, तो पोस्टर तमिल और बांग्ला में क्यों छपा?” — उत्तर: क्योंकि माँग करने वाले पूरे देश से संवाद कर रहे थे। यही इस अध्याय का पूरा तर्क है।

‘इस अध्याय में…’(पाठ का अपना परिचय)

“आज़ादी के बाद के पहले दशक में राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया चली। हमने इसके बारे में इस किताब के पहले अध्याय में पढ़ा था। लेकिन राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया एक ही बार में पूरी नहीं हो जाती।” ✓ (अध्याय 1 — सही संदर्भ) ★“लोकतंत्र के रास्ते पर जैसे-जैसे हम बढ़े, वैसे-वैसे अलग-अलग इलाकों के लोगों में स्वायत्तता की भावना पैदा हुई। कभी-कभी स्वायत्तता की आकांक्षा की अभिव्यक्ति भारत के संघीय ढाँचे के हदों को पार करके भी हुई। स्वायत्तता की ऐसी आकांक्षाओं ने कभी-कभार हिंसक रूप लिया और संघर्ष लंबा खिंचा।” ★★“यह नयी चुनौती 1980 के दशक में पूरी ताकत के साथ उभरी थी। …इस दशक को कुछ बड़े संघर्ष और समझौते के दशक के रूप में याद किया जाएगा। इस दशक में असम, पंजाब, मिजोरम और जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया और सरकार को बड़े जतन के साथ समझौते करने पड़े।”

चार प्रश्न जिन पर अध्याय चलेगा:

  1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं और उनसे उपजे तनाव को किन कारणों से बल मिलता है?
  2. भारत सरकार ने ऐसी चुनौतियों और तनावों के प्रति क्या कदम उठाए?
  3. लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन साधने में किस किस्म की कठिनाइयाँ आती हैं?
  4. लोकतंत्र में विविधताओं के बीच एकता कायम करने के लिहाज से हमें क्या सीख मिलती है?

पृष्ठ 113 · क्षेत्र और राष्ट्र

🔷 1980 का दशक — स्वायत्तता की माँग का दशक

“1980 के दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में भी देखा जा सकता है। इस दौर में देश के कई हिस्सों से स्वायत्तता की माँग उठी और इसने संवैधानिक हदों को भी पार किया। इन आंदोलनों में शामिल लोगों ने अपनी माँग के पक्ष में हथियार उठाए; सरकार ने उनको दबाने के लिए जवाबी कार्रवाई की और इस क्रम में राजनीतिक तथा चुनावी प्रक्रिया अवरुद्ध हुई।” ★★“आश्चर्य नहीं कि… केंद्र सरकार को सुलह की बातचीत का रास्ता अख्तियार करना पड़ा अथवा स्वायत्तता के आंदोलन की अगुवाई कर रहे समूहों से समझौते करने पड़े। …बातचीत का लक्ष्य यह रखा गया कि विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए। बहरहाल, समझौते तक पहुँचने की यह यात्रा बड़ी दुर्गम रही और इसमें जब-तब हिंसा के स्वर उभरे।”

★यह अनुच्छेद पूरे अध्याय का ढाँचा है — माँग → हथियार → जवाबी कार्रवाई → बातचीत → समझौता। यही चक्र पंजाब, मिजोरम और असम — तीनों में दोहराया जाएगा।

🔷 भारत सरकार का नज़रिया

“भारत में विभिन्न क्षेत्र और भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का अधिकार होगा। हमने एकता की भावधारा से बँधे एक ऐसे सामाजिक जीवन के निर्माण का निर्णय लिया था, जिसमें इस समाज को आकार देने वाली तमाम संस्कृतियों की विशिष्टता बनी रहे।” ★★“राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि क्षेत्र को नकार दिया जाए। इस अर्थ में भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया।”

और लोकतंत्र का योगदान — चार बिंदु:

#【पाठ】 का कथन
1“भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाया।”
2★“लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता।”
3“विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं की नुमाइंदगी करें।”
4“क्षेत्रीय मुद्दों और समस्याओं पर नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समुचित ध्यान दिया जाएगा और उन्हें इसमें भागीदारी दी जाएगी।”

💬 हाशिये का प्रश्न( अध्याय का सबसे अच्छा चर्चा-प्रश्न)★★

“क्या इसका मतलब यह हुआ कि क्षेत्रवाद सांप्रदायिकता के समान खतरनाक नहीं है? क्या हम यह भी कह सकते हैं कि क्षेत्रवाद अपने आप में खतरनाक नहीं?” साथ का कार्टून: तख्तियाँ लिए भीड़ — “Down with Communalism!”, “Down with Casteism!”, “Down with Regionalism” — और सामने खड़ा लड़का असमंजस में। ★कक्षा से पूछिए: “तीनों तख्तियाँ एक जैसी दिखती हैं। पर क्या तीनों एक जैसी हैं?”

पृष्ठ 114 · तनाव के दायरे

जब संतुलन बिगड़ता हैध्यान

“ऐसी व्यवस्था में कभी-कभी तनाव या परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। कभी ऐसा भी हो सकता है कि राष्ट्रीय एकता के सरोकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं और ज़रूरतों पर भारी पड़ें। कभी ऐसा भी हो सकता है कि कोई क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूँद लें।” ★“जो राष्ट्र चाहते हैं कि विविधताओं का सम्मान हो साथ ही राष्ट्र की एकता भी बनी रहे, वहाँ क्षेत्रों की ताकत, उनके अधिकार और अलग अस्तित्व के मामले पर राजनीतिक संघर्ष का होना एक आम बात है।”

🔷 आज़ादी के बाद की चुनौतियाँ

“आपने पहले अध्याय में पढ़ा था कि आज़ादी के तुरंत बाद हमारे देश को विभाजन, विस्थापन, देसी रियासतों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन जैसे कठिन मसलों से जूझना पड़ा।” ✓ (अध्याय 1 — सही संदर्भ) ! “देश और विदेश के अनेक पर्यवेक्षकों का अनुमान था कि भारत एकीकृत राष्ट्र के रूप में ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगा।”

क्षेत्र【पाठ】 का कथन
जम्मू-कश्मीर“यह सिर्फ़ भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष का मामला नहीं था। कश्मीर घाटी के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं का सवाल भी इससे जुड़ा हुआ था।”
पूर्वोत्तर“पहले नगालैंड में और फिर मिजोरम में भारत से अलग होने की माँग करते हुए जोरदार आंदोलन चले।”
दक्षिण भारत“द्रविड़ आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों ने एक समय अलग राष्ट्र की बात उठायी थी।”

भाषा के आधार पर राज्यों की माँग★

“अलगाव के इन आंदोलनों के अतिरिक्त देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग करते हुए जन आंदोलन चले। मौजूदा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे ही आंदोलनों वाले राज्य हैं।” तमिलनाडु में हिंदी-विरोध; और 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से पंजाबी-भाषी लोगों की माँग — “उनकी माँग आखिरकार मान ली गई और 1966 में पंजाब और हरियाणा नाम से राज्य बनाए गए।” ★“बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन हुआ। कहा जा सकता है कि विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।”

पर सब हल नहीं हुआध्यान

“बहरहाल, इन प्रयासों का मतलब यह नहीं था कि हर परेशानी का हमेशा के लिए हल निकल आया। कश्मीर और नगालैंड जैसे कुछ क्षेत्रों में चुनौतियाँ इतनी विकट और जटिल थीं कि राष्ट्र-निर्माण के पहले दौर में इनका समाधान नहीं किया जा सका। इसके अतिरिक्त पंजाब, असम और मिजोरम में नयी चुनौतियाँ उभरीं।” ★★“ऐसे मामलों में मिली सफलता या विफलता सिर्फ़ अतीत के अध्ययन के लिए एक जरूरी प्रस्थान-बिंदु नहीं बल्कि भारत के भविष्य को समझने के लिए भी एक ज़रूरी सबक है।”

💬 हाशिये का प्रश्न

! “खतरे की बात हमेशा सीमांत के राज्यों के संदर्भ में ही क्यों उठाई जाती है? क्या इस सबके पीछे विदेशी हाथ ही होता है?” ★यह प्रश्न कक्षा में ज़रूर उठाइए — यह विद्यार्थी को सिखाता है कि हर क्षेत्रीय माँग को ‘बाहरी साज़िश’ मान लेना आसान, पर गलत रास्ता है।

पृष्ठ 115 · जम्मू एवं कश्मीर — परिचय और जड़ें

पहला ही वाक्य — ध्यान से पढ़िएध्यान★★

“जैसा कि आपने गत वर्ष पढ़ा है, जम्मू और कश्मीर को अनुच्छेद 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया गया था।” ✓ (कक्षा 11 — सही संदर्भ) ★★‘दिया गया था’ — भूतकाल। यह पूरा खंड 2019 के बाद की स्थिति से लिखा गया है।

“परंतु इसके बावजूद भी जम्मू और कश्मीर को हिंसा, सीमा पार का आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता झेलनी पड़ी… इसके परिणाम स्वरूप कई लोग भी मारे गए, जिनमें निर्दोष नागरिक, सुरक्षाकर्मी और उग्रवादी शामिल थे। इसके अलावा, कश्मीर घाटी से बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का पलायन भी हुआ।”

🗺 मानचित्र —“केंद्र शासित प्रदेश — जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख”ध्यान

अंकित ज़िले: मुजफ़राबाद · कुपवाड़ा · बांदीपुरा · बारामूला · गंदेरबल · श्रीनगर · बडगाम · पुलवामा · शोपियाँ · अनंतनाग · पुंछ · कुलगाँव · जम्मू · किश्तवाड़ · राजौरी · रियासी · रामबन · डोडा · मीरपुर · उधमपुर · साम्बा · कठुआ · करगिल · लेह (लद्दाख) स्रोत: ★https://pib.gov.in

तीन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र★

क्षेत्र【पाठ】 का विवरण
जम्मू“छोटी पहाड़ियाँ और मैदानी भाग हैं। इसमें मुख्य रूप से हिन्दू रहते हैं। मुसलमान, सिख और अन्य मतों के लोग भी रहते हैं।”
कश्मीर“मुख्य रूप से कश्मीर घाटी है। यहाँ रहने वाले अधिकांश कश्मीरी मुसलमान हैं और शेष हिन्दू, सिख, बौद्ध तथा अन्य हैं।”
लद्दाख“मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र है। इसकी जनसंख्या बहुत कम है, जिसमें लगभग बराबर संख्या में बौद्ध और मुसलमान हैं।”

🔷 समस्या की जड़ें

क्रम【पाठ】 का विवरण
1947 से पहले“जम्मू और कश्मीर (जे एंड के) एक राजसी रियासत थी। इसके शासक, महाराजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान में शामिल होना नहीं चाहते थे, बल्कि अपनी रियासत के लिए स्वतंत्र दर्जा चाहते थे।”
पाकिस्तान का दावा“कश्मीर क्षेत्र पाकिस्तान का ‘हिस्सा’ है, क्योंकि रियासत की अधिकांश आबादी मुसलमान थी।”
★★पर लोगों का नज़रिया“उस रियासत के लोगों ने इसे इस तरह नहीं देखा — उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। ★क्षेत्रीय अभिलाषा का यह मुद्दा ‘कश्मीरियत’ कहलाता है।”
नेशनल कॉन्फ्रेंस“शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में चलाया गया लोकप्रिय आंदोलन महाराजा से छुटकारा पाना चाहता था। साथ ही पाकिस्तान में शामिल होने के विरुद्ध था।” ★“नेशनल कॉन्फ्रेंस एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और इसका काँग्रेस के साथ लंबे समय से संबंध था। शेख अब्दुल्ला नेहरू सहित कुछ राष्ट्रवादी नेताओं के व्यक्तिगत मित्र थे।”
★अक्तूबर 1947“पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए अपनी तरफ से कबायली घुसपैठिए भेजे। इसने महाराजा को भारतीय सैनिक सहायता लेने के लिए बाध्य किया। भारत ने सैनिक सहायता दी और… परंतु यह तभी हुआ जब महाराजा ने भारत सरकार के साथ विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।”

पृष्ठ 116–117 · द्रविड़ आंदोलन( यह खंड J&K के बीच में आता है — भ्रमित मत होइए)★

द्रविड़ आंदोलन — नारा और महत्व★★

नारा: “‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’” — “यह द्रविड़ आंदोलन के एक बेहद लोकप्रिय नारे का हिंदी रूपांतर है।” ★★“यह आंदोलन भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर आंदोलन था। भारतीय राजनीति में यह आंदोलन क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति था।”

और सबसे महत्वपूर्ण बात — यह प्रश्न 8 का सीधा उत्तर है★★

“हालाँकि आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, पर ★★आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। नेतृत्व ने अपनी माँग आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया।”

मदविवरण
नेतृत्वतमिल समाज सुधारक ई.वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’
संगठन★‘द्रविड़ कड़गम’ — “ब्राह्मणों के वर्चस्व का विरोध करता था तथा उत्तरी भारत के राजनीतिक, आर्थिक और साँस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव की प्रतिष्ठा पर जोर देता था”
! सीमा“प्रारंभ में… समग्र दक्षिण भारतीय संदर्भ में अपनी बात रखता था लेकिन अन्य दक्षिणी राज्यों से समर्थन न मिलने के कारण यह आंदोलन धीरे-धीरे तमिलनाडु तक ही सिमट कर रह गया।”
विभाजन“द्रविड़ कड़गम दो धड़ों में बंट गया और आंदोलन की समूची राजनीतिक विरासत द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पाले में केंद्रित हो गई।”

डीएमके की तीन-सूत्री माँगें(1953–54)★

#माँग
1“कल्लाकुडी नामक रेलवे स्टेशन का नया नाम — डालमियापुरम — निरस्त किया जाए और स्टेशन का मूल नाम बहाल किया जाए।” ★“संगठन की यह माँग उत्तर भारतीय आर्थिक प्रतीकों के प्रति उसके विरोध को प्रकट करती थी।”
2“स्कूली पाठ्यक्रम में तमिल संस्कृति के इतिहास को ज्यादा महत्त्व दिया जाए।”
3“राज्य सरकार के शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम को लेकर थी। संगठन के अनुसार यह नीति समाज में ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती थी।”

★“डीएमके हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा देने के भी खिलाफ़ थी। 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन की सफलता ने डीएमके को जनता के बीच और भी लोकप्रिय बना दिया।” 1967 की जीत: “डीएमके को 1967 के विधानसभा चुनावों में बड़ी सफलता हाथ लगी। तब से लेकर आज तक तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ दलों का वर्चस्व कायम है।”

आगे का विभाजन और आज★

“डीएमके के संस्थापक सी. अन्नादुरै की मृत्यु के बाद दल में दोफाड़ हो गया। …दूसरा दल खुद को आल इंडिया अन्ना द्रमुक कहने लगा। तमिलनाडु की राजनीति में ये दोनों दल चार दशकों से दबदबा बनाए हुए हैं। ★इनमें से एक न एक दल 1996 से केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा रहा है।” 1990 के दशक के अन्य दल: एमडीएमके (मरुमलर्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) · पीएमके (पट्टाली मक्कल कच्ची) · डीएमडीके (देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कड़गम)

★★और अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यहीं है: “एक समय क्षेत्रीय राजनीति को भारतीय राष्ट्र के लिए खतरा माना जाता था। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है।”

📦 बॉक्स:ई.वी. रामास्वामी नायकर (1879–1973)

‘पेरियार’ के नाम से प्रसिद्ध · ऊनीश्वरवाद के प्रबल समर्थक · जाति-विरोधी आंदोलन एवं द्रविड़ अस्मिता के उद्भावक · राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में · ★आत्मसम्मान आंदोलन के जनक (1925) · ब्राह्मण विरोधी आंदोलन का नेतृत्व · जस्टिस पार्टी के कार्यकर्ता और द्रविड़ कड़गम की स्थापना · हिंदी और उत्तर भारतीय वर्चस्व का विरोध · “‘उत्तर भारतीय लोग एवं ब्राह्मण द्रविड़ों से अलग आर्य हैं’ इस मत का प्रतिपादन किया।”

📰 समाचारपत्र-कतरन(पृ. 117)

The Times of India: “HINDI PROTAGONISTS ALLEGE BID TO REVERSE POLICY” (नई दिल्ली, 2 दिसंबर) — “A STORM broke out in the Lok Sabha today during question hour…”; शिक्षा मंत्री एम.सी. छागला का उल्लेख। 📷 चित्र-शीर्षक: “तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन, 1965”

पृष्ठ 118 · कश्मीर का विलय और शुरुआती विवाद

📰 समाचारपत्र

The Hindustan Times (New Delhi, Tuesday, October 28, 1947): ★★“KASHMIR ACCEDES TO INDIA” · “PLEBISCITE SOON ON RULER’S DECISION” · “SHEIKH ABDULLA TO FORM INTERIM GOVT.” · “UNION TROOPS RUSHED FOR PROTECTION OF STATE”

संयुक्त राष्ट्र और तीन चरणों वाली प्रक्रिया★★

“परंतु चूँकि पाकिस्तान ने राज्य के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण जारी रखा, इसलिए मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाया गया, जिसने दिनांक 21 अप्रैल, 1948 के अपने प्रस्ताव में मामले को निपटाने के लिए एक तीन चरणों वाली प्रक्रिया की अनुशंसा की।”

चरणविवरण
पहला“पाकिस्तान को अपने वे सारे नागरिक वापस बुलाने थे, जो कश्मीर में घुस गए थे।”
दूसरा“भारत को धीरे-धीरे अपनी फौज कम करनी थी ताकि कानून व्यवस्था बनी रहे।”
तीसरा“एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से जनमत संग्रह कराया जाना था।”
! परिणाम“परंतु, इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी।”

मार्च 1948★

“इसी बीच मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री बन गए जबकि भारत अनुच्छेद 370 के अंतर्गत उसे अस्थाई स्वायत्तता देने के लिए सहमत हो गया। ★उस समय राज्य में सरकार का मुखिया प्रधानमंत्री कहलाता था।”

📦 बॉक्स:शेख मोहम्मद अब्दुल्ला (1905–1982)

जम्मू एवं कश्मीर के नेता · जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता एवं धर्मनिरपेक्षता के समर्थक · राजशाही के खिलाफ़ जन आंदोलन का नेतृत्व · धर्मनिरपेक्षता के आधार पर पाकिस्तान का विरोध · नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता · ★भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री (1947) · ! भारत सरकार द्वारा बर्खास्तगी और कारावास (1953–1964) · पुनः कारावास (1965–1968) · ★1974 में इंदिरा गाँधी के साथ समझौता, राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आरूढ़।

🔷 बाहरी और आंतरिक झगड़े

“बाहर से पाकिस्तान ने सदा दावा किया कि कश्मीर घाटी पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए।” (पृ. 119 पर जारी) “परिणामस्वरूप राज्य का एक हिस्सा पाकिस्तानी नियंत्रण में आ गया। हालाँकि यह पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पी.ओ.जे.के.) भारतीय क्षेत्र है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।”

पृष्ठ 119 · अनुच्छेद 370 पर दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ

“आपने गत वर्ष ‘भारत का संविधान : सिद्धान्त और व्यवहार’ में अनुच्छेदों 370 और 371 के अंतर्गत विशेष प्रावधानों के बारे में पढ़ा है।” ✓ (कक्षा 11 — सही संदर्भ) ★★“इस विशेष दर्जे ने दो विपरीत प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया।”

यह सारणी बोर्ड पर उतरवाइए — यह प्रश्न 6 का पूरा ढाँचा है★★

पक्षतर्क
जम्मू-कश्मीर के बाहर के लोगों का एक वर्ग“अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त राज्य का विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता है। …अनुच्छेद 370 को रद्द कर देना चाहिए और जम्मू और कश्मीर को भारत के किसी भी अन्य राज्य की तरह माना जाना चाहिए।”
दूसरा वर्ग — अधिकांश कश्मीरी“अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है।”

और कश्मीरियों की तीन शिकायतें:

#शिकायत
1★“कबायली हमले से उत्पन्न परिस्थिति के सामान्य होने पर विलय मामला राज्य के लोगों को विचार करने के लिए देने का वायदा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। इससे ‘जनमत-संग्रह’ की माँग उठी।”
2★“अनुच्छेद 370 द्वारा दिया गया विशेष संघीय दर्जा व्यावहारिक रूप से कम कर दिया गया है। इससे स्वायत्तता को बहाल करने या ‘अधिक राज्य स्वायत्तता’ की माँग उठी।”
3“जिस प्रकार का लोकतन्त्र शेष भारत में है, वैसा जम्मू और कश्मीर राज्य में लागू नहीं किया गया है।”

🎬 सिने-संसार:रोज़ा

पहलूविवरण
वर्ष1992
निर्देशक और पटकथामणिरत्नम्
अभिनय (हिंदी)मधु, अरविन्द स्वामी, पंकज कपूर, जनगराज
कथानक“इस तमिल फ़िल्म में एक नवोढ़ा पत्नी के दुख और साहस की कहानी बयान की गयी है। रोज़ा के पति का उग्रवादी अपहरण कर लेते हैं। वह खुफ़िया संदेशों को पढ़ने में माहिर है। उसे कश्मीर में तैनात किया गया है… अपहरणकर्ताओं की माँग है कि रोज़ा के पति ऋषि को तभी छोड़ा जाएगा जब जेल में बंद उनके सरगना को छोड़ दिया जाए।”
★महत्व“रोज़ा का संसार ढहने लगता है। वह अधिकारियों और राजनेताओं के दरवाज़े खटखटाते हुए दर-दर भटकती है। यह फ़िल्म भारत-पाकिस्तान विवाद की पृष्ठभूमि में बनी थी इस वजह से लोगों में यह बड़ी लोकप्रिय हुई।”

🔷 1948 से राजनीति(पृ. 119 के अंत से)

“प्रधानमंत्री बनने के बाद, शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार और अन्य नीतियाँ शुरू कीं जिनसे सामान्य जन को लाभ पहुँचा। ! परंतु कश्मीर के दर्जे पर उनकी स्थिति के विषय में उनके और केंद्र सरकार के बीच मतभेद बढ़ता गया।”

पृष्ठ 120 · 1953 से 1982 तक

बर्खास्तगी और उसके बादध्यान★★

वर्षघटना
! 1953“उन्हें 1953 में पदच्युत कर दिया गया और कई वर्षों तक कैद रखा गया।”
!“उनके बाद आए नेतृत्व को उतना लोकप्रिय समर्थन नहीं मिला और वह राज्य में शासन चला पाए जिसका मुख्य कारण केंद्र का समर्थन था। ! विभिन्न चुनावों में अनाचार और हेरफेर संबंधी गंभीर आरोप थे।”
1953–1974“कांग्रेस पार्टी ने राज्य की नीतियों पर प्रभाव डाला। नेशनल कॉन्फ्रेंस (शेख अब्दुल्ला रहित) का एक धड़ा कांग्रेस के सक्रिय समर्थन के साथ कुछ समय तक सत्ता में रहा परंतु बाद में यह काँग्रेस में मिल गया। इस प्रकार काँग्रेस को राज्य पर सीधा नियंत्रण प्राप्त हुआ।”
★1965“जम्मू और कश्मीर के संविधान के प्रावधान में एक परिवर्तन किया गया, जिसके अंतर्गत राज्य के प्रधानमंत्री का पदनाम बदलकर मुख्यमंत्री कर दिया गया। इसके अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के गुलाम मोहम्मद सादिक राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।”
★★1974“इंदिरा गाँधी का शेख अब्दुल्ला के साथ एक समझौता हुआ और वे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस को पुनर्जीवित किया जिसने 1977 के विधान सभा चुनाव में बहुमत से जीत हासिल की।”
1982“शेख अब्दुल्ला का 1982 में निधन हो गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व उनके पुत्र फारूक अब्दुल्ला के पास चला गया, जो मुख्यमंत्री बने।”
!“परंतु जल्द ही उन्हें राज्यपाल द्वारा पदच्युत कर दिया गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग हुआ एक गुट एक अल्प अवधि के लिए सत्ता में आया।”

📰 समाचारपत्र

The Times of India (Bombay, Monday, August 10, 1953): ★★“SHEIKH ABDULLAH ARRESTED” · “CHARGES OF CORRUPTION AND MALADMINISTRATION” · “Bakshi Ghulam Mohammed Sworn In As Prime Minister” · “POLICE OPEN FIRE ON VIOLENT DEMONSTRATORS”

पृष्ठ 121 · सशस्त्र विद्रोह और उसके बाद

केंद्र के हस्तक्षेप का असरध्यान

“केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से फारूक अब्दुल्ला की सरकार को पदच्युत करने पर कश्मीर में नाराजगी की भावना पैदा हुई। ★इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुल्ला में हुए समझौते के बाद कश्मीरियों में लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जो विश्वास उत्पन्न हुआ था, उसे धक्का लगा।” “यह भावना कि केन्द्र राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है, पुष्ट हुई जब 1986 में नेशनल कांफ्रेंस केंद्र में शासक दल काँग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करने को राजी हो गई।”

1987 का चुनाव — निर्णायक मोड़ध्यान★★

“यह वो वातावरण था जिसमें 1987 के विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए। सरकारी परिणामों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस–काँग्रेस गठबंधन की भारी जीत दर्शाई और फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री के रूप में वापस लौटे। !★★परंतु यह व्यापक रूप से माना जा रहा था कि परिणामों में लोकप्रिय चयन की झलक नहीं है, और सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई थी।” “1980 के दशक के प्रारम्भ से ही राज्य में अकुशल प्रशासन के विरुद्ध एक व्यापक नाराजगी चल रही थी। यह नाराजगी और अधिक बढ़ गई क्योंकि… केंद्र के आदेश पर राज्य द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ कमजोर की जा रही हैं। ! इससे कश्मीर में राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ जो उग्रवाद के उठने से गहरा गया।”

1989 से 2002ध्यान

वर्षघटना
! 1989“राज्य, एक पृथक कश्मीरी राष्ट्र बनाने को लेकर एक उग्रवादी आंदोलन के कब्जे में आ गया। इन विद्रोहियों को पाकिस्तान से नैतिक, आर्थिक और फौजी समर्थन मिला।”
! 1990 से“जम्मू और कश्मीर ने विद्रोहियों के हाथों और सेना की कार्रवाई से असाधारण हिंसा को झेला।” राज्य कई वर्षों तक राष्ट्रपति शासन और सशस्त्र सेनाओं के नियंत्रण में रहा।
1996“राज्य में 1996 में ही जाकर विधानसभा चुनाव हुए जिसमें फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू और कश्मीर के लिए क्षेत्रीय स्वायत्ता की माँग के साथ सत्ता में आई।”
2002“नेशनल कॉन्फ्रेंस बहुमत प्राप्त करने में विफल रही और इसके स्थान पर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और काँग्रेस की मिली-जुली सरकार आ गई।”

🔷 2002 और इससे आगे

वर्षघटना
2002–2008“गठबंधन के समझौते के अनुसार मुफ़्ती मोहम्मद पहले तीन वर्ष सरकार के मुखिया रहे, जिनके बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के गुलामनबी आज़ाद मुखिया बने जो जुलाई, 2008 में लागू राष्ट्रपति शासन के कारण अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।”
2008–09“अगला चुनाव नवंबर-दिसंबर 2008 में हुआ। एक और मिली-जुली सरकार (नेशनल कॉन्फ्रेंस और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस से बनी) 2009 में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सत्ता में आई।”
★2014“राज्य में फिर चुनाव हुए, जिसमें पिछले 25 वर्षों में सबसे अधिक मतदान होना रिकार्ड किया गया। परिणाम स्वरूप पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में बीजेपी के साथ एक मिली-जुली सरकार सत्ता में आई।”
★अप्रैल 2016“मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद, उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती अप्रैल, 2016 में राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी।”

पृष्ठ 122 · 5 अगस्त 2019, और पंजाब की शुरुआत★★

अध्याय का सबसे नया अंशध्यान★★

तिथिघटना
! महबूबा मुफ्ती का कार्यकाल“बाहरी और भीतरी तनाव बढ़ाने वाली बड़ी आतंकवादी घटनाएँ हुईं।”
! जून 2018“बीजेपी द्वारा मुफ्ती सरकार को दिया गया समर्थन वापस लेने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।”
★★5 अगस्त 2019“जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर दिया गया और राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेश — जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख — बना दिए गए।”

और पाठ का निष्कर्ष★

“जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख भारत में बहुलवादी समाज के जीते-जागते उदाहरण हैं। वहाँ न केवल सभी प्रकार (धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई, जातीय और जनजातीय) की विविधताएँ हैं बल्कि वहाँ विविध प्रकार की राजनीतिक और विकास की आकांक्षाएँ हैं, जिन्हें नवीनतम अधिनियम द्वारा प्राप्त करने की इच्छा की गई है।”

💬 हाशिये का प्रश्न( बहुत महत्वपूर्ण)★★

“पर यह सारी बात तो सरकार, अधिकारियों, नेताओं और आतंकवादियों के बारे में है। जम्मू एवं कश्मीर जनता के बारे में कोई कुछ क्यों नहीं कहता? लोकतंत्र में तो जनता की इच्छा को महत्त्व दिया जाना चाहिए। क्यों मैं ठीक कह रही हूँ न?”

पृष्ठ 122–123 · पंजाब

🔷 पृष्ठभूमि

“1980 के दशक में पंजाब में भी बड़े बदलाव आए। इस प्रांत की सामाजिक बुनावट विभाजन के समय पहली बार बदली थी। बाद में इसके कुछ हिस्सों से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश नामक राज्य बनाए गए।” ★“हालाँकि 1950 के दशक में देश के शेष हिस्से को भाषायी आधार पर पुनर्गठित किया गया था लेकिन पंजाब को 1966 तक इंतज़ार करना पड़ा। इस साल पंजाबी-भाषी प्रांत का निर्माण हुआ।” अकाली दल: “सिखों की राजनीतिक शाखा के रूप में 1920 के दशक में अकाली दल का गठन हुआ था। अकाली दल ने ‘पंजाबी सूबा’ के गठन का आंदोलन चलाया। पंजाबी-भाषी सूबे में सिख बहुसंख्यक हो गए।”

राजनीतिक संदर्भ — अकालियों की तीन कठिनाइयाँध्यान

“पंजाब सूबे के पुनर्गठन के बाद अकाली दल ने यहाँ 1967 और इसके बाद 1977 में सरकार बनायी। दोनों ही मौके पर गठबंधन सरकार बनी।”

#कठिनाई
1“उनकी सरकार को केंद्र ने कार्यकाल पूरा करने से पहले बर्खास्त कर दिया था।”
2“अकाली दल को पंजाब के हिंदुओं के बीच कुछ खास समर्थन हासिल नहीं था।”
3★“सिख समुदाय भी दूसरे धार्मिक समुदायों की तरह जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था। काँग्रेस को दलितों के बीच — चाहे वे सिख हों या हिंदू — अकालियों से कहीं ज्यादा समर्थन प्राप्त था।”

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, 1973★★

“इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर 1970 के दशक में अकालियों के एक तबके ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठायी। 1973 में, आनंदपुर साहिब में हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ।”

#प्रस्ताव की बातें
1“आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात उठायी गई थी।”
2“प्रस्ताव की माँगों में केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की बात भी शामिल थी।”
3★“इस प्रस्ताव में सिख ‘कौम’ (नेशन या समुदाय) की आकांक्षाओं पर ज़ोर देते हुए सिखों के ‘बोलबाला’ (प्रभुत्व या वर्चस्व) का ऐलान किया गया।”
4★“यह प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है।”

! “आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का सिख जन-समुदाय पर बड़ा कम असर पड़ा। कुछ साल बाद जब 1980 में अकाली दल की सरकार बर्खास्त हो गई तो अकाली दल ने पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों के बीच पानी के बँटवारे के मुद्दे पर एक आंदोलन चलाया। ! धार्मिक नेताओं के एक तबके ने स्वायत्त सिख पहचान की बात उठायी।”

📦 बॉक्स:मास्टर तारा सिंह (1885–1967)

प्रमुख सिख धार्मिक एवं राजनीतिक नेता · शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के शुरुआती नेताओं में से एक · अकाली आंदोलन के नेता · स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक लेकिन सिर्फ़ मुस्लिमों के साथ समझौते की कांग्रेस नीति के विरोधी · ★स्वतंत्रता के बाद अलग पंजाब राज्य के निर्माण के समर्थक।

पृष्ठ 123–125 · हिंसा का चक्र, और शांति की ओर

हिंसा का चक्रध्यान★★

“जल्दी ही आंदोलन का नेतृत्व नरमपंथी अकालियों के हाथ से निकलकर चरमपंथी तत्त्वों के हाथ में चला गया और आंदोलन ने सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। उग्रवादियों ने अमृतसर स्थित सिखों के तीर्थ स्वर्णमंदिर में अपना मुख्यालय बनाया और स्वर्णमंदिर एक हथियारबंद किले में तब्दील हो गया।”

तिथिघटना
!★★जून 1984“भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया। यह स्वर्णमंदिर में की गई सैन्य कार्रवाई का कूट नाम था।”
! परिणाम“सरकार ने उग्रवादियों को तो सफ़लतापूर्वक मार भगाया लेकिन सैन्य कार्रवाई से ऐतिहासिक स्वर्णमंदिर को क्षति भी पहुँची। इससे सिखों की भावनाओं को गहरी चोट लगी। भारत और भारत से बाहर बसे अधिकतर सिखों ने सैन्य-अभियान को अपने धर्म-विश्वास पर हमला माना। इन बातों से उग्रवादी और चरमपंथी समूहों को और बल मिला।”
!★★31 अक्तूबर 1984“प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की… उन्हीं के अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। ये अंगरक्षक सिख थे और ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेना चाहते थे।”

1984 की हिंसा — यह अंश ध्यान से पढ़ाइएध्यान★★

“एक तरफ पूरा देश इस घटना से शोक-संतप्त था तो दूसरी तरफ दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में सिख समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी। यह हिंसा कई हफ्तों तक जारी रही। दो हज़ार से ज्यादा की तादाद में सिख, दिल्ली में मारे गए। देश की राजधानी दिल्ली इस हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी। कानपुर, बोकारो और चास जैसे देश के कई जगहों पर सैकड़ों सिख मारे गए। कई सिख-परिवारों में कोई भी पुरुष न बचा। इन परिवारों को गहरा भावनात्मक आघात पहुँचा और आर्थिक हानि उठानी पड़ी।” ! “सिखों को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि सरकार ने स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बड़ी देर से कदम उठाए। साथ ही, हिंसा करने वाले लोगों को कारगर तरीके से दंड भी नहीं दिया गया।” ★“प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में अपने भाषण के दौरान इस रक्तपात पर अफसोस जताया और सिख-विरोधी हिंसा के लिए देश से माफी माँगी।”

अवतरण —न्यायमूर्ति नानावती जाँच आयोग, रिपोर्ट, खंड-I, 2005ध्यान

“इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि 31-10-84 को या तो बैठकें हुईं अथवा हमलावरों से संपर्क साधा गया और उनसे सिखों को जान से मारने तथा उनके घरों और दुकानों को लूटने के लिए कहा गया। बड़े व्यवस्थित तरीके से हमले हुए और हमलावरों को पुलिस का भी ज्यादा भय नहीं था। इससे जान पड़ता है मानो इन्हें आश्वासन दिया गया हो कि इन कामों को अंजाम देते समय या उसके बाद भी इन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।”

अवतरण —प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, 11 अगस्त 2005, राज्यसभा★★

“सिख समुदाय से ही नहीं पूरे भारत राष्ट्र से माफी माँगने में मुझे कोई संकोच नहीं क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह राष्ट्र की अवधारणा तथा संविधान के लिखे का नकार था। इसलिए, मैं यहाँ किसी झूठी प्रतिष्ठा को लेकर नहीं खड़ा हूँ। अपनी सरकार की तरफ़ से, इस देश की समूची जनता की तरफ़ से मैं अपना सिर शर्म से झुकाता हूँ कि ऐसा हादसा पेश आया। लेकिन, माननीय, राष्ट्र के जीवन में ऐसी घड़ियाँ आती हैं। अतीत हमारे साथ होता है। हम अतीत को दोबारा नहीं लिख सकते। लेकिन, मनुष्य के रूप में हमारे पास वह इच्छाशक्ति और क्षमता है कि हम अपने लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।”

★★इन दोनों अवतरणों को साथ पढ़ाइए — एक जाँच आयोग का निष्कर्ष, दूसरा राष्ट्र की क्षमा-याचना। कक्षा से कुछ मत पुछवाइए; बस पढ़कर एक क्षण मौन रहिए। यही सही शिक्षण है।

शांति की ओर — राजीव गाँधी–लोंगोवाल समझौता★

“1984 के चुनावों के बाद सत्ता में आने पर नए प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत की शुरुआत की। अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ 1985 के जुलाई में एक समझौता हुआ। इस समझौते को राजीव गाँधी लोंगोवाल समझौता अथवा पंजाब समझौता कहा जाता है।”

#समझौते के प्रावधान
1★“चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा”
2“पंजाब तथा हरियाणा के बीच सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी”
3★“पंजाब-हरियाणा-राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे के बारे में फ़ैसला करने के लिए एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) बैठाया जाएगा”
4“सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई”
5“पंजाब से विशेष सुरक्षा बल अधिनियम को वापस लेने की बात पर भी सहमति हुई”

पर अमन आसानी से नहीं आयाध्यान

“बहरहाल, पंजाब में न तो अमन आसानी से कायम हुआ और न ही समझौते के तत्काल बाद। हिंसा का चक्र लगभग एक दशक तक चलता रहा। ! उग्रवादी हिंसा और इस हिंसा को दबाने के लिए की गई कार्रवाइयों में मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ। साथ ही, पुलिस की ओर से भी ज्यादती हुई।” “राजनीतिक रूप से देखें तो घटनाओं के इस चक्र में अकाली दल बिखर गया। केंद्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा… ! 1992 में पंजाब में चुनाव हुए तो महज 24 फीसदी मतदाता वोट डालने के लिए आए।” ★“1990 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में पंजाब में शांति बहाल हुई। 1997 में अकाली दल (बादल) और भाजपा के गठबंधन को बड़ी विजय मिली। उग्रवाद के खात्मे के बाद के दौर में यह पंजाब का पहला चुनाव था। राज्य में एक बार फिर आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के सवाल प्रमुख हो उठे। हालाँकि धार्मिक पहचान यहाँ की जनता के लिए लगातार प्रमुख बनी हुई है लेकिन राजनीति अब धर्मनिरपेक्षता की राह पर चल पड़ी है।”

📦 बॉक्स:संत हरचंद सिंह लोंगोवाल (1932–1985)

सिखों के धार्मिक एवं राजनीतिक नेता · छठे दशक के दौरान राजनीतिक जीवन की शुरुआत अकाली नेता के रूप में · ★1980 में अकाली दल के अध्यक्ष · अकालियों की प्रमुख माँगों को लेकर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से समझौता · ! अज्ञात सिख युवक द्वारा हत्या।

📰 समाचारपत्र-कतरनें

नईदुनिया: “स्वर्ण मंदिर पर सेना का कब्जा : भिंडराँवाले का पता नहीं … ५६ सैनिकों सहित ३२५ मरे, अकाल तख्त को क्षति” The Times of India (BOMBAY: THURSDAY, JUNE 7, 1984): “SURRENDER AT GOLDEN TEMPLE — 58 armymen and 250 terrorists killed”; “No damage caused to Harmandir Sahib” Hindustan Times: “ARMY CONTROLS TEMPLE — 250 terrorists and 59 jawans killed” The Times of India (Special Edition, October 31, 1984): ★“INDIRA GANDHI SHOT AT — CONDITION CRITICAL” 📷 (साभार: रघुराय) “इंदिरा गांधी की हत्या के विषय पर बने एक दीवार-चित्र को यहाँ महिलाएँ देख रही हैं।”

पृष्ठ 125–126 · पूर्वोत्तर — परिचय

पूर्वोत्तर की बुनियादी जानकारी(यह सारणी परीक्षा में आती है)★★

मद【पाठ】 का कथन
राज्यों की संख्या“क्षेत्र में आठ राज्य हैं”
★‘सात बहनें’“अरुणाचल प्रदेश, असम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय, जो पहले उत्तर-पूर्व क्षेत्र का गठन करते थे, उन्हें अक्सर ‘सात बहनें’ कहा जाता है।”
★‘भाई’“सिक्किम, जिसे सूची में जोड़ा गया है, को उन सात राज्यों का ‘भाई’ कहा जाता है।”
जनसंख्या“इस क्षेत्र में देश की कुल 4 फीसदी आबादी निवास करती है। लेकिन भारत के कुल क्षेत्रफल में पूर्वोत्तर के हिस्से को देखते हुए यह आबादी दोगुनी कही जाएगी।”
★★भूगोल“22 किलोमीटर लंबी एक पतली-सी राहदारी इस इलाके को शेष भारत से जोड़ती है अन्यथा इस क्षेत्र की सीमाएँ चीन, म्यांमार और बांग्लादेश से लगती हैं और यह इलाका भारत के लिए एक तरह से दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार है।”

पुनर्गठन का कालक्रम★

वर्षघटना
पहले“त्रिपुरा, मणिपुर और मेघालय का खासी पहाड़ी क्षेत्र, पहले अलग-अलग रियासत थे। आज़ादी के बाद भारत संघ में इनका विलय हुआ।”
1963“नगालैंड को राज्य बनाया गया”
1972“मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय राज्य बने”
1987“मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्ज़ा दिया गया”

अलग-थलग पड़ने का असरध्यान

“1947 के भारत-विभाजन से पूर्वोत्तर के इलाके भारत के शेष भागों से एकदम अलग-थलग पड़ गए और इसका अर्थव्यवस्था पर इससे दुष्प्रभाव पड़ा। …यहाँ की राजनीति भी अपने ही दायरे में सीमित रही। इसके साथ-साथ पड़ोसी राज्यों और देशों से आने वाले शरणार्थियों के कारण इलाके की जनसंख्या की संरचना में बड़ा बदलाव आया।” ★“पूर्वोत्तर और भारत के शेष भागों के बीच संचार-व्यवस्था बड़ी लचर है। इससे भी पूर्वोत्तर की राजनीति का स्वभाव ज्यादा संवेदनशील रहा।”

तीन मुद्दे — यह अध्याय के इस खंड का ढाँचा है★★

“पूर्वोत्तर के राज्यों में राजनीति पर तीन मुद्दे हावी हैं:” | # | मुद्दा | कब | |---|---|---| | 1 | ★स्वायत्तता की माँग | “इस पर 1970 के दशक में कुछ शुरुआती पहल की गई थी” | | 2 | ★अलगाव के आंदोलन | “इससे शेष दो मुद्दों ने 1980 के दशक में नाटकीय मोड़ लिया” | | 3 | ★‘बाहरी’ लोगों का विरोध | (वही) |

🗺 मानचित्र —पूर्वोत्तर भारतध्यान

अंकित: सिक्किम (गंगटोक) · अरुणाचल प्रदेश (ईटानगर) · असम (दिसपुर) · नागालैंड (कोहिमा) · मणिपुर (इंफाल) · मेघालय (शिलांग) · त्रिपुरा (अगरतला) · मिजोरम (आइजोल) · चीन · भूटान · बांग्लादेश · म्यांमार · पश्चिम बंगाल · बंगाल की खाड़ी ! पाठ की नोट: “यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है… प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।”

पृष्ठ 126–127 · स्वायत्तता की माँग

“आजादी के वक्त मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़ दें तो यह पूरा इलाका असम कहलाता था। ★गैर-असमी लोगों को जब लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस इलाके से राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठी।”

क्रमघटना
संगठन“इन लोगों ने ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ का गठन किया जो 1960 में कहीं ज्यादा व्यापक ‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ में तब्दील हो गया।”
माँग“असम से अलग एक जनजातीय राज्य बनाया जाए”
★परिणाम“आखिरकार एक जनजातीय राज्य की जगह असम को काटकर कई जनजातीय राज्य बने। केंद्र सरकार ने अलग-थलग वक्त पर असम को बाँटकर मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश बनाया। त्रिपुरा और मणिपुर को भी राज्य का दर्जा दिया गया।”
1972“तक पूर्वोत्तर का पुनर्गठन पूरा हो चुका था।”

पर माँग खत्म नहीं हुईध्यान

“स्वायत्तता की माँग खत्म न हुई। उदाहरण के लिए, असम के बोडो, करबी और दिमसा जैसे समुदायों ने अपने लिए अलग राज्य की माँग की। …! कई दफ़ा ऐसा भी हुआ कि एक ही इलाके पर एक से ज्यादा समुदायों ने अपनी दावेदारी जतायी। छोटे-छोटे और निरंतर लघुतर होते राज्य बनाते चले जाना संभव नहीं था।” ★“इस वजह से संघीय राज्यव्यवस्था के कुछ और प्रावधानों का उपयोग करके स्वायत्तता की माँग को संतुष्ट करने की कोशिश की गई और इन समुदायों को असम में ही रखा गया। करबी और दिमसा समुदायों को जिला-परिषद् के अंतर्गत स्वायत्तता दी गई जबकि बोडो जनजाति को हाल ही में स्वायत्त परिषद् का दर्जा दिया गया है।”

💬 हाशिये का प्रश्न( बहुत मार्मिक)★

“मेरी दोस्त चोन कहती है कि दिल्ली के लोग यूरोप के नक्शे के बारे में ज्यादा जानते हैं और अपने देश के पूर्वोत्तर के हिस्से के बारे में कम। अपने सहपाठियों को देखकर तो यही लगता है कि उसकी बात एक हद तक सही है।” ★★यह प्रश्न कक्षा में ज़रूर पढ़िए — और फिर मानचित्र पर आठों राज्य और उनकी राजधानियाँ पूछ लीजिए।

पृष्ठ 127–128 · अलगाववादी आंदोलन

“स्वायत्तता की माँगों से निपटना आसान था क्योंकि संविधान में विभिन्नताओं का समाहार संघ में करने के लिए प्रावधान पहले से मौजूद थे। ! लेकिन जब कुछ समूहों ने अलग देश बनाने की माँग की और वह भी किसी क्षणिक आवेश में नहीं बल्कि सिद्धांतगत तैयारी के साथ, तो इस माँग से निपटना मुश्किल हो गया।” ★★“देश के नेतृत्व को पूर्वोत्तर के दो राज्यों में अलगाववादी माँग का लंबे समय तक सामना करना पड़ा। इन दो मामलों की आपसी तुलना हमें लोकतांत्रिक राजनीति के कुछ सबक सिखाती है।”

मिजोरम — सफलता की कहानी★★

क्रमघटना
शुरुआत“आज़ादी के बाद मिजो पर्वतीय क्षेत्र को असम के भीतर ही एक स्वायत्त जिला बना दिया गया था। कुछ मिजो लोगों का मानना था कि वे कभी भी ‘ब्रिटिश इंडिया’ के अंग नहीं रहे इसलिए भारत संघ से उनका कोई नाता नहीं है।”
★★1959“मिजो पर्वतीय इलाके में भारी अकाल पड़ा। ! असम की सरकार इस अकाल में समुचित प्रबंध करने में नाकाम रही। इसी के बाद अलगाववादी आंदोलन को जनसमर्थन मिलना शुरू हुआ।”
—“मिजो लोगों ने गुस्से में आकर लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट बनाया।”
! 1966“मिजो नेशनल फ्रंट ने आज़ादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया।”
!“भारतीय सेना और मिजो विद्रोहियों के बीच दो दशक तक चली लड़ाई की शुरुआत हुई। मिजो नेशनल फ्रंट ने गुरिल्ला युद्ध किया। उसे पाकिस्तान की सरकार ने समर्थन दिया था और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में मिजो विद्रोहियों ने अपने ठिकाने बनाए।”
!“भारतीय सेना ने… जवाबी कार्रवाई की। इसमें आम जनता को भी कष्ट उठाने पड़े। एक दफ़े तो वायुसेना तक का इस्तेमाल किया गया। सेना के इन कदमों से स्थानीय लोगों में क्रोध और अलगाव की भावना और तेज़ हुई।”
★★1986“दो दशकों तक चले बगावत में हर पक्ष को हानि उठानी पड़ी। इसी बात को भाँपकर दोनों पक्षों के नेतृत्व ने समझदारी से काम लिया। पाकिस्तान में निर्वासित जीवन जी रहे लालडेंगा भारत आए और उन्होंने भारत सरकार के साथ बातचीत शुरू की। राजीव गाँधी ने इस बातचीत को एक सकारात्मक समाधान तक पहुँचाया। 1986 में राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच एक शांति समझौता हुआ।”
★समझौते की शर्तें“मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और उसे कुछ विशेष अधिकार दिए गए। मिजो नेशनल फ्रंट अलगाववादी संघर्ष की राह छोड़ने पर राजी हो गया। लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।”
★★परिणाम“यह समझौता मिजोरम के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। आज मिजोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है और उसने कला, साहित्य तथा विकास की दिशा में अच्छी प्रगति की है।”

नगालैंड — अभी अनसुलझी कहानीध्यान

“नगालैंड की कहानी भी मिजोरम की तरह है लेकिन नगालैंड का अलगावादी आंदोलन ज्यादा पुराना है और अभी इसका मिजोरम की तरह खुशगवार हल नहीं निकल पाया है। ★अंगमी जापू फ़िजो के नेतृत्व में नगा लोगों के एक तबके ने 1951 में अपने को भारत से आज़ाद घोषित कर दिया था। फ़िजो ने बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकराए। हिंसक विद्रोह के एक दौर के बाद नगा लोगों के एक तबके ने भारत सरकार के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए लेकिन अन्य विद्रोहियों ने इस समझौते को नहीं माना। नगालैंड की समस्या का समाधान होना अब भी बाकी है।”

★★मिजोरम और नगालैंड की तुलना बोर्ड पर लिखवाइए — यही प्रश्न 8 की कुंजी है: मिजोरम = बातचीत → समझौता → शांति। नगालैंड = बातचीत के प्रस्ताव ठुकराए गए → समस्या अनसुलझी।

📦 बॉक्स:लालडेंगा (1937–1990)

मिजो नेशनल फ्रंट के संस्थापक और नेता · ★1959 के अकाल के बाद विद्रोही बन गए · भारत के खिलाफ़ दो दशक तक सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व · ★1986 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ सुलह और एक समझौते पर हस्ताक्षर किए · नव-निर्मित मिजोरम के मुख्यमंत्री बने।

📰 दस्तावेज़ और कतरनें

The Times of India (LUCKNOW: THURSDAY, JUNE 26, 1986): ★“Cong-MNF accord signed — Laldenga to head coalition govt” 📄 मिजो नेशनल फ्रंट का युद्ध विराम आदेश (CEASE FIRE ORDER) — “The Government of India and Mizo National Front have agreed to enter into dialogue to solve the political problem of Mizoram within the framework of the Constitution of India… The cease fire shall be effective from the 31st July 1986. This suspends all military operation orders including Quit Mizoram Order.” — हस्ताक्षर: (Laldenga), PRESIDENT, MIZO NATIONAL FRONT 🖼️ डाक टिकट: ‘मिजोरम समझौता’ (3.00)

पृष्ठ 128–129 · बाहरी लोगों के खिलाफ़ आंदोलन

समस्या की प्रकृतिध्यान

“पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर आप्रवासी आए हैं। इससे एक खास समस्या पैदा हुई है। स्थानीय जनता इन्हें ‘बाहरी’ समझती है और ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ़ उसके मन में गुस्सा है। …भारत के दूसरे राज्यों अथवा किसी अन्य देश से आए लोगों को यहाँ की जनता रोजगार के अवसरों और राजनीतिक सत्ता के एतबार से एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती है। स्थानीय लोग बाहर से आए लोगों के बारे में मानते हैं कि ये लोग यहाँ की जमीन हथिया रहे हैं।”

असम आंदोलन(1979–1985)★★

“1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन बाहरी लोगों के खिलाफ़ चले आंदोलनों का सबसे अच्छा उदाहरण है।”

पहलूविवरण
आशंका“असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बसी हुई है। …यदि इन विदेशी लोगों को पहचानकर उन्हें अपने देश नहीं भेजा गया तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी।”
★आर्थिक मसला“असम में तेल, चाय और कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद व्यापक गरीबी थी। यहाँ की जनता ने माना कि असम के प्राकृतिक संसाधन बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है।”
★★संगठन“1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स् यूनियन (आसू—AASU) ने विदेशियों के विरोध में एक आंदोलन चलाया। ★‘आसू’ एक छात्र-संगठन था और इसका जुड़ाव किसी भी राजनीतिक दल से नहीं था।”
★माँग“1951 के बाद जितने भी लोग असम में आकर बसे हैं उन्हें असम से बाहर भेजा जाए।”
विरोध का दायरा“‘आसू’ का आंदोलन अवैध आप्रवासी, बंगाली और अन्य लोगों के दबदबे तथा मतदाता सूची में लाखों आप्रवासियों के नाम दर्ज कर लेने के खिलाफ़ था।”
! हिंसा“आंदोलन के दौरान हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हुईं। बहुत-से लोगों को जान गंवानी पड़ी और धन-संपत्ति का नुकसान हुआ। …रेलगाड़ियों की आवाजाही तथा बिहार स्थित बरौनी तेलशोधक कारखाने को तेल-आपूर्ति रोकने की भी कोशिश की गई।”
★★1985 का असम समझौता“छह साल की सतत अस्थिरता के बाद राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘आसू’ के नेताओं से बातचीत शुरू की। …1985 में एक समझौता हुआ। समझौते के अंतर्गत तय किया गया कि जो लोग बांग्लादेश-युद्ध के दौरान अथवा उसके बाद के सालों में असम आए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और उन्हें वापस भेजा जाएगा।”
★नयी पार्टी“‘आसू’ और असम गण संग्राम परिषद् ने साथ मिलकर अपने को एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी के रूप में संगठित किया। इस पार्टी का नाम ‘असम गण परिषद्’ रखा गया। असम गण परिषद् 1985 में इस वायदे के साथ सत्ता में आई थी कि विदेशी लोगों की समस्या को सुलझा लिया जाएगा और एक ‘स्वर्णिम असम’ का निर्माण किया जाएगा।”
! पर“असम-समझौते से शांति कायम हुई और प्रदेश की राजनीति का चेहरा भी बदला लेकिन ‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया। ‘बाहरी’ का मसला अब भी असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की राजनीति में एक जीवंत मसला है।”
! त्रिपुरा“यह समस्या त्रिपुरा में ज्यादा गंभीर है क्योंकि यहाँ के मूल निवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं।”
! मिजोरम/अरुणाचल”…के लोगों में भी इसी भय के कारण चकमा शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है।”

📦 बॉक्स:अंगमी जापू फिजो (1904–1990)

नगालैंड की आज़ादी के आंदोलन के नेता · नगा नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष · ★भारत सरकार के खिलाफ़ सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत की · ‘भूमिगत’ हुए · पाकिस्तान में शरण ली · जीवन के अंतिम तीन दशक ब्रिटेन में गुजारे।

💬 हाशिये का प्रश्न( अध्याय का सबसे गहरा प्रश्न)★★

“मुझे यह ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ का मामला कभी समझ में नहीं आता। कोई आदमी कहीं पहले चला गया हो तो वही दूसरों को ‘बाहरी’ समझने लगता है।”

पृष्ठ 130–131 · समाहार और राष्ट्रीय अखंडता

75 वर्ष बाद की स्थिति★

“इन मामलों से पता चलता है कि आजादी के पचहत्तर साल बाद भी राष्ट्रीय अखंडता के कुछ मसलों का समाधान पूरी तरह से नहीं हो पाया है। हमने देखा कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लगातार एक न एक रूप में उभरती रहीं। कभी कहीं से अलग राज्य बनाने की माँग उठी तो कहीं आर्थिक विकास का मसला उठा। कहीं-कहीं से अलगाववाद के स्वर उभरे।” ★“1980 के बाद के दौर में भारत की राजनीति इन तनावों के घेरे में रही और समाज के विभिन्न तबको की माँगों में पटरी बैठा पाने की लोकतांत्रिक राजनीति की क्षमता की परीक्षा हुई।”

📦 बॉक्स:सिक्किम का विलय( यह बॉक्स परीक्षा में आता है)★

मदविवरण
आज़ादी के समय“सिक्किम को भारत की ‘शरणागति’ प्राप्त थी। इसका मतलब यह कि तब सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था लेकिन वह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था।”
व्यवस्था“सिक्किम की रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथों में थी।”
! समस्या“यह व्यवस्था कारगर साबित नहीं हो पायी क्योंकि सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके।”
★जनसंख्या“सिक्किम की आबादी में एक बड़ा हिस्सा नेपालियों का था। नेपाली मूल की जनता के मन में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेपचा-भूटिया के एक छोटे-से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है।”
★1974“सिक्किम विधानसभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव 1974 में हुआ और इसमें सिक्किम कांग्रेस को भारी विजय मिली।”
★★अप्रैल 1975“सिक्किम विधानसभा ने पहले भारत के ‘सह-प्रान्त’ बनने की कोशिश की और इसके बाद 1975 के अप्रैल में एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में भारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गई थी।”
★★“इस प्रस्ताव के तुरंत बाद सिक्किम में जनमत-संग्रह कराया गया और… जनता ने विधानसभा के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। भारत सरकार ने… तत्काल मान लिया और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया।”
!“चोग्याल ने इस फैसले को नहीं माना और उसके समर्थकों ने भारत सरकार पर साजिश रचने तथा बल-प्रयोग करने का आरोप लगाया।”
★निष्कर्ष“बहरहाल, भारत संघ में सिक्किम के विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका!”

📦 बॉक्स:काजी लैंदुप दोरजी खांगसरपा (1904)

सिक्किम के लोकतंत्र बहाली आंदोलन के नेता · सिक्किम प्रजामंडल एवं सिक्किम राज्य कांग्रेस के संस्थापक · 1962 में सिक्किम नेशनल कांग्रेस की स्थापना · ★चुनावों में विजय के उपरांत सिक्किम के भारत में विलय के समर्थक · एकीकरण के बाद सिक्किम कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय।

पृष्ठ 131–132 · अध्याय के पाँच सबक★★

“हम इन उदाहरणों से क्या सबक सीख सकते हैं?”

#सबक【पाठ】 का कथन
★★1क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं“क्षेत्रीय मुद्दे की अभिव्यक्ति कोई असामान्य अथवा लोकतांत्रिक राजनीति के व्याकरण से बाहर की घटना नहीं है। ★ग्रेट ब्रिटेन जैसे छोटे देश में भी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ उभरी हैं। स्पेन में बास्क लोगों और श्रीलंका में तमिलों ने अलगाववादी माँग की। …अत: भारत को क्षेत्रीय आकांक्षाओं से निपटने की तैयारी लगातार रखनी होगी।”
★★2दबाने की जगह बातचीत“क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है। …★मिजोरम के उदाहरण से पता चलता है कि राजनीतिक सुलह के जरिए अलगाववाद की समस्या से बड़े कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।”
★★3सत्ता की साझेदारी“सिर्फ लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना ही काफ़ी नहीं है। इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केंद्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना भी जरूरी है। ★क्षेत्रों को मिलाकर ही पूरा देश बनता है। …यदि राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों को वजन नहीं दिया गया तो उनमें अन्याय और अलगाव का बोध पनपेगा।”
★4आर्थिक असमानता“आर्थिक विकास के एतबार से विभिन्न इलाकों के बीच असमानता हुई तो पिछड़े क्षेत्रों को लगेगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। …अगर कुछ राज्य गरीब रहें और बाकी तेजी से प्रगति करें तो क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा। साथ ही, अंतर्प्रान्तीय अथवा अंतर्क्षेत्रीय आप्रवास में भी बढ़ोत्तरी होगी।”
★★5संविधान-निर्माताओं की दूरदृष्टि“भारत ने जो संघीय प्रणाली अपनायी है वह बहुत लचीली है। अगर अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं तो जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए हैं।” ! “हालांकि, जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधानों वाले अनुच्छेद 370 को अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया।” ★“संविधान की छठी अनुसूची में विभिन्न जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियमों को संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता दी गई है। पूर्वोत्तर की कुछ जटिल राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने में ये प्रावधान बड़े निर्णायक साबित हुए।”

अध्याय का अंतिम अनुच्छेद★★

“भारत का संवैधानिक ढाँचा ज्यादा लचीला और सर्वसमावेशी है। जिस तरह की चुनौतियाँ भारत में पेश आयीं वैसी कुछ दूसरे देशों में भी आयी लेकिन भारत का संवैधानिक ढाँचा अन्य देशों के मुकाबले भारत को विशिष्ट बनाता है। ★★क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला। भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता, लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।”

📦 बॉक्स:राजीव गाँधी (1944–1991)

1984 से 1989 के बीच भारत के प्रधानमंत्री · इंदिरा गाँधी के पुत्र · 1980 के बाद राजनीति में सक्रिय · ★★पंजाब के आतंकवादियों, मिजो-विद्रोहियों तथा असम में छात्र संघ से समझौता · खुली अर्थव्यवस्था एवं कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के हिमायती · सिंहली-तमिल समस्या को सुलझाने के लिए भारतीय शांति सेना को श्रीलंका की सरकार के अनुरोध पर श्रीलंका भेजा · ! संदिग्ध एलटीटीई आत्मघाती द्वारा हत्या।

★★राजीव गाँधी का बॉक्स इस अध्याय की धुरी है — तीनों बड़े समझौते उन्हीं के काल में हुए: पंजाब (जुलाई 1985), मिजोरम (1986) और असम (1985)। इसे बोर्ड पर लिखवाइए।

पृष्ठ 133 · 📦 बॉक्स — गोवा की मुक्ति

मदविवरण
पृष्ठभूमि“1947 में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का खात्मा हो गया था लेकिन पुर्तगाल ने गोवा, दमन और दीव से अपना शासन हटाने से इनकार कर दिया। यह क्षेत्र सोलहवीं सदी से ही औपनिवेशिक शासन में था।”
! पुर्तगाली शासन“पुर्तगाल ने यहाँ की जनता का दमन किया। उसने यहाँ के लोगों को नागरिकों अधिकारों से वंचित रखा और बलात् धर्म-परिवर्तन कराया।”
आंदोलन“गोवा में आज़ादी के लिए एक मजबूत जन आंदोलन चला। इस आंदोलन को महाराष्ट्र के समाजवादी सत्याग्रहियों ने बल प्रदान किया।”
★★दिसंबर 1961“भारत सरकार ने गोवा में अपनी सेना भेजी। दो दिन की कार्रवाई में भारतीय सेना ने गोवा को मुक्त करा लिया। गोवा, दमन और दीव संघशासित प्रदेश।”
! नयी समस्या“महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेतृत्व में एक तबके ने माँग रखी कि गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए क्योंकि यह मराठी-भाषी क्षेत्र है।”
★दूसरा पक्ष“बहुत-से गोवावासी गोवानी पहचान और संस्कृति की स्वतंत्र अहमियत बनाए रखना चाहते थे। कोंकणी भाषा के लिए भी इनके मन में आग्रह था। इस तबके का नेतृत्व यूनाइटेड गोअन पार्टी (यूजीपी) ने किया।”
★★जनवरी 1967“केंद्र सरकार ने गोवा में एक विशेष जनमत सर्वेक्षण कराया। …अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। इस तरह गोवा संघशासित प्रदेश बना रहा।”
★1987“अंततः 1987 में गोवा भारत संघ का एक राज्य बना।”

📰 समाचारपत्र और कार्टून

The Times of India (BOMBAY: WEDNESDAY, DECEMBER 20, 1961): ★★“GOA BACK WITH THE MOTHERLAND” · “INDIAN FLAG OVER PANJIM PROCLAIMS LIBERATION FROM COLONIAL TERROR” · “Choudhuri Accepts Surrender Of Portuguese: G.-G. Has Fled” — ‘ऑपरेशन विजय’ का उल्लेख। 🎨 कार्टून (आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया, 21 अप्रैल 1954): बंदर सोफ़े पर बैठे हैं; एक व्यक्ति कह रहा है — “I ADMIT YEARS BACK YOU WERE LIVING HAPPILY RIGHT HERE WHEN THIS WAS ALL A COLONIAL JUNGLE… BUT WE’VE CLEARED IT NOW AND BUILT A DECENT HOUSE! SO YOU MUST QUIT!”; पास में ‘QUIT GOA’ और ‘QUIT PONDICHERRY’ के परचे।

पृष्ठ 134–135 · प्रश्नावली(NCERT के 10 प्रश्न)

1. निम्नलिखित में मेल करें: अ — क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति: (क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य का निर्माण · (ख) भाषायी पहचान और केंद्र के साथ तनाव · (ग) क्षेत्रीय असंतुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण · (ख) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी माँग ब — राज्य:

  1. iनगालैंड/मिजोरम ·
  2. iiझारखंड/छत्तीसगढ़ ·
  3. iiiपंजाब ·
  4. ivतमिलनाडु

2. पूर्वोत्तर के लोगों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है — बाहरी लोगों के खिलाफ़ आंदोलन, ज्यादा स्वायत्तता की माँग के आंदोलन और अलग देश बनाने की माँग। पूर्वोत्तर के मानचित्र पर इन तीनों के लिए अलग-अलग रंग भरिए और दिखाइए कि किस राज्य में कौन-सी प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल है।

3. पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे? क्या ये प्रावधान पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच तनाव बढ़ाने के कारण बन सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

4. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने के क्या कारण थे?

5. जम्मू-कश्मीर की अंदरुनी विभिन्नताओं की व्याख्या कीजिए और बताइए कि इन विभिन्नताओं के कारण इस राज्य में किस तरह अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया है।

6. कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष क्या हैं? इनमें कौन-सा पक्ष आपको समुचित जान पड़ता है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।

7. असम आंदोलन सांस्कृतिक अभिमान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।

8. हर क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर इस तथ्य की व्याख्या कीजिए।

9. भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय मांगों से ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क दीजिए।

10. अवतरण — संजीब बरुआ:

“हजारिका का एक गीत…एकता की विजय पर है; पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इस गीत में एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है… मेघालय अपने रास्ते गई… अरुणाचल भी अलग हुई और मिजोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह दूसरी बेटी से ब्याह रचाने को खड़ा है… इस गीत का अंत असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमों को भी अपने साथ एकजुट रखने की बात कही गई है… करबी और मिजिंग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं।”

(क) लेखक यहाँ किस एकता की बात कह रहा है? (ख) पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के कुछ राज्य क्यों बनाए गए? (ग) क्या आपको लगता है कि भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर एकता की यही बात लागू हो सकती है? क्यों?

⚡ पूरे अध्याय का कालक्रम — एक पृष्ठ पर

तिथिघटना
16वीं सदी सेगोवा, दमन और दीव पर पुर्तगाली शासन
1920 का दशकअकाली दल का गठन
1925पेरियार का आत्मसम्मान आंदोलन
★अक्तूबर 1947कबायली घुसपैठ; महाराजा हरि सिंह का विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर
★21 अप्रैल 1948संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रस्ताव — तीन चरणों वाली प्रक्रिया
★मार्च 1948शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री; अनुच्छेद 370 पर सहमति
! 1951अंगमी जापू फिजो ने नगा क्षेत्र को भारत से आज़ाद घोषित किया
! 1953शेख अब्दुल्ला पदच्युत और कैद (1953–1964)
1953–54डीएमके की तीन-सूत्री माँगें
★1959मिजो पर्वतीय इलाके में भारी अकाल → अलगाववादी आंदोलन को जनसमर्थन
1960‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’
! दिसंबर 1961‘ऑपरेशन विजय’ — दो दिन में गोवा की मुक्ति
1963नगालैंड राज्य बना
! 1965तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन; J&K में ‘प्रधानमंत्री’ का पदनाम बदलकर ‘मुख्यमंत्री’; गुलाम मोहम्मद सादिक पहले मुख्यमंत्री
! 1966मिजो नेशनल फ्रंट का सशस्त्र अभियान; और पंजाबी-भाषी प्रांत का निर्माण (पंजाब और हरियाणा)
★जनवरी 1967गोवा में विशेष जनमत सर्वेक्षण — महाराष्ट्र से अलग रहने का फ़ैसला
1967डीएमके की बड़ी चुनावी सफलता; अकाली दल की पहली सरकार
1972मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय राज्य बने; पूर्वोत्तर का पुनर्गठन पूरा
★1973आनंदपुर साहिब प्रस्ताव
★1974इंदिरा गाँधी–शेख अब्दुल्ला समझौता; सिक्किम विधानसभा का पहला लोकतांत्रिक चुनाव
★★अप्रैल 1975सिक्किम विधानसभा का विलय-प्रस्ताव; जनमत-संग्रह; सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य
1977नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीत; अकाली दल की दूसरी सरकार
★★1979–1985असम आंदोलन (आसू)
! 1980अकाली सरकार बर्खास्त; पानी के बँटवारे पर आंदोलन
1982शेख अब्दुल्ला का निधन; फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री
!★★जून 1984‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’
!★★31 अक्तूबर 1984इंदिरा गाँधी की हत्या; उसके बाद सिख-विरोधी हिंसा — दिल्ली में दो हज़ार से ज्यादा सिख मारे गए
★★जुलाई 1985राजीव गाँधी–लोंगोवाल समझौता (पंजाब समझौता)
★★1985असम समझौता; असम गण परिषद् सत्ता में
★★1986राजीव गाँधी–लालडेंगा शांति समझौता; मिजोरम को पूर्ण राज्य; लालडेंगा मुख्यमंत्री
1987मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्य बने; गोवा राज्य बना
! 1987J&K का विवादित विधानसभा चुनाव
! 1989J&K में उग्रवादी आंदोलन
! 1992पंजाब के चुनाव में मात्र 24 फीसदी मतदान
1996J&K में विधानसभा चुनाव; नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता में
★1997अकाली दल (बादल)–भाजपा गठबंधन की बड़ी विजय
2002J&K में पीडीपी–काँग्रेस सरकार
★2005नानावती आयोग की रिपोर्ट; 11 अगस्त को मनमोहन सिंह की क्षमा-याचना
2008–09जुलाई 2008 राष्ट्रपति शासन; 2009 में उमर अब्दुल्ला
★201425 वर्षों में सर्वाधिक मतदान; पीडीपी–बीजेपी सरकार
★अप्रैल 2016महबूबा मुफ्ती — राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री
! जून 2018बीजेपी का समर्थन वापस; राष्ट्रपति शासन
★★5 अगस्त 2019जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 — अनुच्छेद 370 समाप्त; दो केंद्र शासित प्रदेश

✓ इस अध्याय की जाँच-सूची

कसौटीपरिणाम
पढ़े गए पृष्ठ✓ 24 / 24 (150 dpi दृश्य पठन)
अंतर-अध्याय संदर्भ✓ 4 में से 4 सही — अध्याय 1 ×2 (पृ. 112, 114), कक्षा 11 ×2 (पृ. 115, 119)
★★अनाथ संदर्भ (orphan)✓ शून्य
★★अद्यतन-स्थिति★यह पुस्तक-2 का सबसे अधिक अद्यतन अध्याय है — J&K खंड 5 अगस्त 2019 तक; मानचित्र pib.gov.in से; “पचहत्तर साल”
स्पष्ट तथ्यात्मक त्रुटि✓ कोई नहीं मिली
कार्टून / दृश्य-सामग्री✓ 18 दर्ज़
जीवनी-बॉक्स✓ 7 (पेरियार, शेख अब्दुल्ला, मास्टर तारा सिंह, लोंगोवाल, लालडेंगा, फिजो, काजी लैंदुप दोरजी, राजीव गाँधी — कुल 8)
विशेष बॉक्स✓ 2 (सिक्किम का विलय; गोवा की मुक्ति)
NCERT प्रश्न✓ 10 / 10 दर्ज़