Chapter 1राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), अध्याय 1, पृ. 3–25. पुनर्मुद्रण 2026-27.

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0. यह अध्याय किस बारे में है

आज़ादी के साथ ही भारत के सामने यह प्रश्न खड़ा था कि इतनी विविधताओं से भरा देश एक राष्ट्र-राज्य के रूप में टिक भी पाएगा या नहीं। अध्याय का तर्क यह है कि 1947 के बाद के पहले दशक में भारत ने राष्ट्र-निर्माण की तीन चुनौतियों में से पहली — एकता और अखंडता की चुनौती — का सामना तीन मोर्चों पर किया: विभाजन के बाद विस्थापन और पुनर्वास, देसी रजवाड़ों का विलय, और राज्यों का भाषावार पुनर्गठन — और तीनों में सफलता पाई। निष्कर्ष यह है कि भारत ने एकता को विविधता के दमन से नहीं, बल्कि उसकी स्वीकृति से हासिल किया; भाषावार पुनर्गठन से देश टूटा नहीं, उल्टे उसकी एकता और मज़बूत हुई।

1. नए राष्ट्र-राज्य की चुनौतियाँ (पृ. 3–5)

  • सन् 1947 के 14–15 अगस्त की मध्यरात्रि को हिंदुस्तान आज़ाद हुआ (पृ. 3)।
  • स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस रात संविधान सभा के एक विशेष सत्र को संबोधित किया। यह प्रसिद्ध भाषण ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ के नाम से जाना गया (पृ. 3)।
  • आज़ादी की लड़ाई में कई आवाज़ें थीं, पर दो बातों पर सबकी सहमति थी (पृ. 3):
    1. आज़ादी के बाद देश का शासन लोकतांत्रिक सरकार के जरिए चलाया जाएगा;
    2. सरकार सबके भले के लिए काम करेगी, जिसमें गरीबों और कमज़ोरों का खास खयाल रखा जाएगा।
  • राष्ट्र-राज्य के रूप में आज़ाद हिंदुस्तान का जन्म कठिन परिस्थितियों में हुआ। आज़ादी देश के बँटवारे के साथ मिली। सन् 1947 का साल अभूतपूर्व हिंसा और विस्थापन की त्रासदी का साल था (पृ. 3)।

तीन चुनौतियाँ (पृ. 4–5) — अध्याय की रीढ़

क्रमचुनौतीउसका मूल प्रश्नसंविधान/नीति में उत्तर
पहली (तात्कालिक)एकता के सूत्र में बँधे ऐसे भारत को गढ़ना जिसमें भारतीय समाज की सारी विविधताओं के लिए जगह होक्या भारत एक रह पाएगा? क्या क्षेत्रीय-उपक्षेत्रीय पहचान खारिज कर दी जाएगी? क्षेत्रीय अखंडता कैसे हासिल हो?विविधता की स्वीकृति; क्षेत्रीय माँगों को स्थान
दूसरीलोकतंत्र को कायम करनासंविधान होना ही काफ़ी नहीं; लोकतांत्रिक व्यवहार-बरताव चलन में कैसे आएँ?मौलिक अधिकारों की गारंटी; हर नागरिक को मतदान का अधिकार; संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र
तीसरीऐसा विकास जिससे समूचे समाज का भला हो, न कि कुछ एक तबकों काआर्थिक विकास तथा गरीबी के खात्मे के लिए कारगर नीतियाँ कैसे बनें?सबके साथ समानता का बरताव; वंचित तबकों तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा; राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
  • भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था। उस वक्त आमतौर पर यही माना जा रहा था कि इतनी विविधताओं से भरा कोई देश ज्यादा दिनों तक एकजुट नहीं रह सकता (पृ. 4)।
  • इस पहले अध्याय में केवल पहली चुनौती (राष्ट्र-निर्माण/एकता) पर ध्यान है। अगले दो अध्यायों में लोकतंत्र कायम करने और बराबरी-इंसाफ़ पर आधारित आर्थिक-विकास की चुनौतियों पर विचार होगा (पृ. 5)।

‘इस अध्याय में…’ (आरंभिक बॉक्स, पृ. 2)

  • सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय एकता और अखंडता की थी।
  • आज़ादी मिली लेकिन देश का बँटवारा भी हुआ; बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, लोग विस्थापित हुए; इससे धर्मनिरपेक्ष भारत की धारणा पर ही आँच आने लगी थी।
  • देसी रियासतों को भारत संघ में शामिल करने का मसला तुरंत हल करना ज़रूरी था।
  • लोगों की आकांक्षाओं का खयाल रखते हुए देश की अंदरूनी सीमा-रेखाएँ फिर से तय करनी थीं।

चित्र एवं गतिविधि (पृ. 2, 5)

  • आवरण-चित्र (पृ. 2): कलकत्ता, 1947 — दंगा प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के लिए हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग भारत और पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए। चित्र विभाजन की खुशी और त्रासदी, दोनों को एक साथ बयान करता है। (साभार: सुनील जाना)
  • चित्र (पृ. 3): 15 अगस्त, 1947 — लाल किले की प्राचीर से भाषण देते प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू।
  • गतिविधि (पृ. 5): तीन डाक-टिकट, प्रथम गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को जारी। प्रश्न: इन टिकटों के चित्रों से नए गणतंत्र के सामने खड़ी किन चुनौतियों का पता चलता है? यदि आपको 1950 में डिज़ाइन बनाना होता तो आप क्या उकेरते? (अभीष्ट निष्कर्ष: नया गणतंत्र स्वयं को खेती, उद्योग और श्रम के ज़रिए परिभाषित कर रहा था — विकास की तीसरी चुनौती का दृश्य रूप।)

2. विभाजन : विस्थापन और पुनर्वास (पृ. 8–13)

2.1 द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (पृ. 8)

  • 14–15 अगस्त 1947 को एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र — भारत और पाकिस्तान — अस्तित्व में आए।
  • मुस्लिम लीग ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ की बात की थी: भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है; इसी कारण लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश यानी पाकिस्तान की माँग की।
  • कांग्रेस ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ तथा पाकिस्तान की माँग का विरोध किया।
  • सन् 1940 के दशक में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा ब्रिटिश-शासन की भूमिका जैसी बातों का ज़ोर रहा। नतीजतन, पाकिस्तान की माँग मान ली गई।

2.2 विभाजन की प्रक्रिया — और उसकी चार कठिनाइयाँ (पृ. 8–9)

आधार: तय हुआ कि धार्मिक बहुसंख्या को विभाजन का आधार बनाया जाएगा — जिन इलाकों में मुसलमान बहुसंख्यक थे वे ‘पाकिस्तान’, शेष हिस्से ‘भारत’ कहलाएँगे।

#कठिनाईपरिणाम
1ब्रिटिश इंडिया में कोई एक भी सटा हुआ इलाका ऐसा नहीं था जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हों; ऐसे दो इलाके थे — एक पश्चिम में, दूसरा पूर्व मेंपाकिस्तान में दो इलाके शामिल हुए — पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान — और इनके बीच भारतीय भू-भाग का एक बड़ा विस्तार रहा
2मुस्लिम-बहुल हर इलाका पाकिस्तान जाने को राजी नहीं था। खान अब्दुल गफ्फार खान पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता थे; ‘सीमांत गाँधी’ के रूप में प्रसिद्ध; द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़उनकी आवाज़ की अनदेखी की गई और पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत को पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया
3मुस्लिम-बहुल प्रांत पंजाब और बंगाल में अनेक हिस्से बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम आबादी वाले थेइन दोनों प्रांतों में भी बँटवारा धार्मिक बहुसंख्या के आधार पर, जिले या उससे निचले प्रशासनिक हलके को आधार मानकर। 14–15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि तक यह फ़ैसला नहीं हो पाया था — आज़ादी के दिन तक अनेक लोगों को पता नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में। पंजाब और बंगाल का बँटवारा विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ
4‘अल्पसंख्यकों’ की समस्या — विभाजन की सबसे अबूझ कठिनाई। सीमा के दोनों तरफ़ अल्पसंख्यक थेपाकिस्तान बने इलाकों में लाखों की संख्या में हिंदू और सिख; पंजाब-बंगाल के भारतीय भू-भाग में लाखों की संख्या में मुस्लिम आबादी; दिल्ली और आस-पास भी मुसलमानों की बड़ी आबादी
  • चौथी कठिनाई का मर्म: इन लोगों ने पाया कि हम तो अपने ही घर में विदेशी बन गए। जिस जमीन पर वे और उनके पुरखे सदियों से आबाद रहे, उसी जमीन पर वे ‘विदेशी’ बन गए थे (पृ. 9)।
  • हिंसा उन समुदायों के खिलाफ़ शुरू हुई जो अपने-अपने क्षेत्रों में संख्या में कम थे। इस कठिनाई से उबरने के लिए किसी के पास कोई योजना भी नहीं थी। शुरू में माना गया कि हिंसा अस्थाई है, पर वह जल्दी ही नियंत्रण से बाहर हो गई। लोगों को प्रायः कुछ घंटों की सूचना पर अपने घर छोड़ने पड़े (पृ. 9)।

2.3 विभाजन के परिणाम (पृ. 9–11)

  • सन् 1947 में बड़े पैमाने पर आबादी का स्थानांतरण हुआ — आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा; मानव-इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक (पृ. 9)।
  • लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील हो गए (पृ. 10)।
  • अल्पसंख्यक अपने घरों से भाग खड़े हुए और अकसर शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी। कल तक जो अपना वतन था, वहीं की पुलिस अथवा स्थानीय प्रशासन अब रुखाई का बरताव कर रहा था (पृ. 10)।
  • हजारों की तादाद में औरतों को अगवा कर लिया गया; उन्हें जबरन शादी करनी पड़ी और अगवा करने वाले का धर्म भी अपनाना पड़ा। कई मामलों में खुद परिवार के लोगों ने ‘कुल की इज्ज़त’ बचाने के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला। बहुत-से बच्चे माँ-बाप से बिछड़ गए (पृ. 10)।
  • लाखों शरणार्थियों के लिए देश की आज़ादी का मतलब था महीनों और कभी-कभी सालों तक किसी शरणार्थी शिविर में ज़िंदगी काटना (पृ. 10)।
  • भौतिक बँटवारा: वित्तीय संपदा के साथ-साथ टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का बँटवारा हुआ; सरकारी और रेलवे के कर्मचारियों का भी बँटवारा हुआ (पृ. 11)।
  • आँकड़े (पृ. 11): विभाजन के कारण 80 लाख लोगों को घर-बार छोड़कर सीमा-पार जाना पड़ा; विभाजन की हिंसा में तकरीबन पाँच से दस लाख लोगों ने अपनी जान गँवाई।
  • साहित्यिक अभिव्यक्ति: भारत और पाकिस्तान के लेखक, कवि तथा फिल्म-निर्माताओं ने इस मार-काट की नृशंसता का जिक्र किया। इन सबके लिए बँटवारे का मतलब था ‘दिल के दो टुकड़े हो जाना’ (पृ. 10)।

2.4 विभाजन का गहरा प्रश्न — धर्मनिरपेक्षता (पृ. 11, 14)

  • भारत के नेता द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे, लेकिन विभाजन तो धर्म के आधार पर ही हुआ था। प्रश्न: क्या इस वजह से भारत अपने-आप एक हिंदू राष्ट्र बन गया?
  • 1951 के वक्त भारत की कुल आबादी में 10–12 फीसदी मुसलमान थे (विभाजन में बड़ी मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली जाने के बावजूद) — पृ. 11।
  • सवाल यह था कि भारत अपने मुसलमान नागरिकों तथा दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों — सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदियों — के साथ क्या बरताव करे (पृ. 11)।
  • मुस्लिम लीग का गठन मुख्यतः औपनिवेशिक भारत में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए हुआ था; कुछ और संगठन भी थे जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश में लगे थे (पृ. 11)।
  • भारत की कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्ज़ा देने के हामी थे, चाहे नागरिक किसी भी धर्म का हो। नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए। हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे, और उनके इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई (पृ. 14)।

साहित्य, स्रोत और बॉक्स — विभाजन खंड

स्रोतपृ.सार / मुख्य पंक्ति
समाचारपत्र — The Hindustan Times, 19 जुलाई 19474“END OF 200-YEAR-OLD BRITISH RULE IN INDIA”; “Two Dominions Created”
महात्मा गाँधी, 14 अगस्त 1947, कलकत्ता4“कल हम अंग्रेज़ी-राज की गुलामी से आज़ाद हो जाएँगे लेकिन आधी रात को भारत का बँटवारा भी होगा। इसलिए कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन होगा और गम का भी।”
समाचारपत्र — Dawn, कराची, 14 अगस्त 19476जिन्ना की मountbatten दंपति के राजकीय भोज में दी गई श्रद्धांजलि; “Absolute Transfer Of Power Unknown In World History”
कविता — ‘सुब्ह-ए-आज़ादी’, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़6“ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर / वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं” — आज़ादी अधूरी और दागदार लगी
मुहम्मद अली जिन्ना, 11 अगस्त 1947, पाकिस्तान की संविधान सभा में अध्यक्षीय भाषण6“पाकिस्तान में आप आज़ाद हैं… आपके धर्म, आपकी जाति या विश्वास से राज्य को कुछ लेना-देना नहीं है।”
समाचारपत्र — The Times of India, 15 अगस्त 19477“BIRTH OF INDIA’S FREEDOM”; “NATION WAKES TO NEW LIFE”
कविता — ‘वारिस शाह से!’, अमृता प्रीतम7“आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं वारिस शाह! तुम से कह रही हैं”; “चौपाल लाशों से अटा पड़ा है, चनाब लहू से भर गया है”
जवाहरलाल नेहरू, मुख्यमंत्रियों को पत्र, 15 अक्तूबर 19477“हमें अपने अल्पसंख्यकों के साथ सभ्यता और शालीनता के साथ पेश आना है… अगर हम ऐसा करने में कामयाब नहीं होते तो यह एक नासूर बन जाएगा जो पूरी राज-व्यवस्था में ज़हर फैलाएगा”
कहानी — ‘मेहमाननवाजी में कसर’, सआदत हसन मंटो10दंगाइयों ने ट्रेन रोककर गैर-मज़हब के यात्रियों को मार डाला, बाकी को हलवा-फल-दूध दिया; मुखिया की सफ़ाई — विभाजन की हिंसा की विडंबना और नैतिक सुन्नपन
चित्र — नोआखली (अब बांग्लादेश में) की यात्रा पर गाँधी, 194710गाँधी का साम्प्रदायिक हिंसा के केंद्र में जाना
सिने-संसार — ‘गर्म हवा’ (1973)11निर्देशक एम.एस. सथ्यु; पटकथा कैफ़ी आज़मी; अभिनय बलराज साहनी, जलाल आगा, फ़ारूख शेख, गीता सिद्धार्थ। आगरा के जूता-व्यवसायी सलीम मिर्ज़ा विभाजन के बाद अपने ही लोगों के बीच अजनबी बन जाते हैं; व्यवसाय चौपट; पुश्तैनी मकान पर शरणार्थी परिवार का कब्ज़ा; बेटी की मौत; परिवार के कई सदस्य पाकिस्तान चले जाते हैं; बेटा सिकंदर छात्र-आंदोलन में शामिल
खोज-बीन (गतिविधि बॉक्स)14श्वेता के नाना को बँटवारे के वक्त लाहौर से लुधियाना आना पड़ा; माता-पिता मार दिए गए; पड़ोस के मुस्लिम परिवार ने पनाह दी और कई दिनों तक छुपाकर रखा। बॉक्स का निष्कर्ष: यह दोनों समुदायों में धार्मिक आधार पर करुणा और एकजुटता के महत्व को दर्शाता है। कार्य: दादा-दादी या उस पीढ़ी के किसी और से पूछकर कम से कम दो ऐसे वाकये लिखिए

2.5 महात्मा गाँधी की शहादत (बॉक्स, पृ. 12–13)

  • गाँधी ने 15 अगस्त 1947 के दिन आज़ादी के किसी भी जश्न में भाग नहीं लिया। वे कोलकाता के उन इलाकों में डेरा डाले हुए थे जहाँ भयंकर दंगे हुए थे।
  • उनका दिल टूट चुका था कि ‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ के जिन सिद्धांतों के लिए वे आजीवन काम करते रहे, वे ही इस कठिन घड़ी में लोगों को एकसूत्र में पिरो सकने में नाकामयाब हो गए।
  • कोलकाता में उनकी मौजूदगी से हालात सुधरे; आज़ादी का जश्न लोगों ने सांप्रदायिक सद्भाव के जज़्बे से मनाया। पर दंगे फिर भड़के और गाँधीजी अमन कायम करने के लिए ‘उपवास’ पर बैठ गए।
  • अगले महीने गाँधीजी दिल्ली पहुँचे। वे चाहते थे कि मुसलमानों को भारत में गरिमापूर्ण जीवन मिले और बराबर का नागरिक माना जाए। उन्हें लग रहा था कि भारत सरकार पाकिस्तान के प्रति अपनी वित्तीय वचनबद्धताओं को पूरा नहीं कर रही है।
  • 1948 की जनवरी में उन्होंने एक बार फिर ‘उपवास’ रखना शुरू किया — यह उनका अंतिम ‘उपवास’ साबित हुआ। दिल्ली में भी उसका जादुई असर हुआ: सांप्रदायिक तनाव और हिंसा में कमी आई, दिल्ली और आस-पास के मुसलमान सुरक्षित अपने घरों में लौटे, और भारत की सरकार पाकिस्तान को उसका देय चुकाने पर राजी हो गई।
  • हिंदू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के अतिवादी अपनी स्थिति के लिए गाँधीजी पर दोष मढ़ रहे थे। इसके बावजूद गाँधीजी ने सशस्त्र सुरक्षा हासिल करने से मना कर दिया और प्रार्थना-सभा में हर किसी से मिलना जारी रखा।
  • 30 जनवरी 1948 के दिन एक हिंदू अतिवादी नाथूराम विनायक गोडसे ने संध्याकालीन प्रार्थना के समय गाँधीजी पर तीन गोलियाँ चलाईं और उन्हें तत्क्षण मार दिया।
  • द गैज़ट ऑफ़ इंडिया (असाधारण), दिल्ली, 4 फरवरी 1948 (पृ. 13): अधिसूचना सं. F.2(17)/48-R&J — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऐक्ट 1908 (XIV of 1908) की धारा 16 के तहत गैरकानूनी घोषित किया गया। हस्ताक्षर: J. P. Ray, गृह सचिव।
  • पृ. 13 पर देश-भर के समाचारपत्रों का कोलाज: The Times of India (“MAHATMA GANDHI ASSASSINATED AT DELHI”), The Bombay Chronicle, The Statesman, National Herald, Amrita Bazar Patrika, आनंद बाज़ार पत्रिका, नवजीवन, केसरी, प्रभात, संध्याकाळ, गुजरात समाचार, नूतन गुजरात।

3. रजवाड़ों का विलय (पृ. 14–18)

3.1 पृष्ठभूमि (पृ. 14)

  • ब्रिटिश इंडिया दो हिस्सों में था: (क) ब्रिटिश प्रभुत्व वाले भारतीय प्रांत — इन पर अंग्रेजी सरकार का सीधा नियंत्रण; (ख) देसी रजवाड़े — इन पर राजाओं का शासन।
  • राजाओं ने ब्रिटिश-राज की अधीनता (सर्वोच्च सत्ता) स्वीकार कर रखी थी और इसके अंतर्गत वे अपने राज्य के घरेलू मामलों का शासन चलाते थे।
  • अंग्रेजी प्रभुत्व वाले भारतीय साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े कायम थे; प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी न किसी रजवाड़े की प्रजा था।

3.2 समस्या (पृ. 14, 16)

  • आज़ादी के तुरंत पहले अंग्रेजी-शासन ने घोषणा की कि ब्रिटिश-प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश-अधीनता से आज़ाद हो जाएँगे — यानी सभी रजवाड़े (संख्या 565) ब्रिटिश-राज की समाप्ति के साथ ही कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे।
  • अंग्रेजी-राज का नज़रिया: रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें।
  • यह फ़ैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था; फ़ैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था। इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था।
  • समस्या ने जल्दी ही तेवर दिखाए (पृ. 16):
    • सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य को आज़ाद रखने की घोषणा की;
    • अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने ऐसी ही घोषणा की;
    • भोपाल के नवाब जैसे कुछ शासक संविधान-सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे।
  • साफ़ हो गया कि हिंदुस्तान कई छोटे-छोटे देशों की शक्ल में बँट जाने वाला है। लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय जान पड़ रहा था। अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक रीति से चलता था और शासक अपनी प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे।

3.3 सरकार का नज़रिया (पृ. 16)

  • अंतरिम सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं।
  • रजवाड़ों के शासकों को मनाने-समझाने में सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अधिकतर रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। इसके लिए बड़ी चतुराई और युक्तिपूर्ण पहलकदमी की ज़रूरत थी।
  • पैमाने की मिसाल: आज के उड़ीसा में तब 26 और छत्तीसगढ़ में 15 छोटे-छोटे रजवाड़े थे; सौराष्ट्र में 14 बड़े और 119 छोटे रजवाड़े और अन्य अनेक प्रशासनिक तंत्र थे।
  • देसी रजवाड़ों की चर्चा से तीन बातें सामने आती हैं (परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला बिंदु):
    1. अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।
    2. भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ। यह रुख विभिन्नताओं को सम्मान देने और विभिन्न क्षेत्रों की माँगों को संतुष्ट करने के लिए अपनाया गया था।
    3. विभाजन की पृष्ठभूमि में विभिन्न इलाकों के सीमांकन के सवाल पर खींचतान ज़ोर पकड़ रही थी, और ऐसे में देश की क्षेत्रीय अखंडता-एकता का सवाल सबसे ज्यादा अहम हो उठा था।
  • शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए लगभग सभी रजवाड़े, जिनकी सीमाएँ आज़ाद हिंदुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गए।
  • अधिकतर शासकों ने विलय के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए; इसे ‘इंस्टूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत हैं।
  • कठिन मामले: जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर। इस अध्याय में हैदराबाद और मणिपुर; कश्मीर के विलय के बारे में अध्याय 8 में।

3.4 हैदराबाद (पृ. 17–18)

  • हैदराबाद की रियासत बहुत बड़ी थी और चारों तरफ़ से हिंदुस्तानी इलाके से घिरी थी। पुराने हैदराबाद के कुछ हिस्से आज के महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में और बाकी आंध्रप्रदेश में हैं।
  • शासक को ‘निज़ाम’ कहा जाता था और वह दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में शुमार किया जाता था।
  • निज़ाम चाहता था कि हैदराबाद को आज़ाद रियासत का दर्जा मिले। सन् 1947 के नवंबर में उसने भारत के साथ यथास्थिति बहाल रखने का एक समझौता किया — यह समझौता एक साल के लिए था।
  • निज़ाम के शासन के खिलाफ़ जन-आंदोलन:
    • तेलंगाना इलाके के किसान निज़ाम के दमनकारी शासन से खासतौर पर दुखी थे और उठ खड़े हुए;
    • महिलाएँ निज़ाम के शासन में सबसे ज्यादा जुल्म का शिकार हुई थीं और बड़ी संख्या में आंदोलन से जुड़ीं;
    • हैदराबाद शहर इस आंदोलन का गढ़ बन गया;
    • कम्युनिस्ट और हैदराबाद कांग्रेस इस आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थे।
  • निज़ाम ने लोगों के खिलाफ़ एक अर्द्ध-सैनिक बल रवाना किया — इसे रज़ाकार कहा जाता था। रज़ाकार अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी थे; उन्होंने गैर-मुसलमानों को खासतौर पर निशाना बनाया, लूटपाट मचाई और हत्या तथा बलात्कार पर उतारू हो गए।
  • 1948 के सितंबर में भारतीय सेना, निज़ाम के सैनिकों पर काबू पाने के लिए हैदराबाद आ पहुँची। कुछ रोज तक रुक-रुक कर लड़ाई चली और इसके बाद निज़ाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। निज़ाम के आत्मसमर्पण के साथ ही हैदराबाद का भारत में विलय हो गया।

3.5 मणिपुर (पृ. 18)

  • आज़ादी के चंद रोज पहले मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत सरकार के साथ विलय के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी एवज में उन्हें आश्वासन दिया गया था कि मणिपुर की आंतरिक स्वायत्तता बरकरार रहेगी।
  • जनमत के दबाव में महाराजा ने 1948 के जून में चुनाव करवाया, और इस चुनाव के फलस्वरूप मणिपुर की रियासत में संवैधानिक राजतंत्र कायम हुआ।
  • मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए।
  • मणिपुर की विधानसभा में भारत में विलय के सवाल पर गहरे मतभेद थे: मणिपुर की कांग्रेस विलय चाहती थी, जबकि दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ इसके खिलाफ थीं।
  • भारत सरकार ने महाराजा को राजी किया कि वे भारतीय संघ में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर कर दें; 1949 के सितंबर में भारत सरकार को इसमें सफलता मिली।

बॉक्स, उद्धरण और कार्टून — रजवाड़ा खंड

स्रोतपृ.सार
सरदार पटेल, रियासतों के शासकों को एक पत्र में (1947)16“हम भारत के इतिहास के एक यादगार मुकाम पर खड़े हैं… अगर हमने सहयोग नहीं किया… तो अराजकता और अव्यवस्था हम में से सबको… घेर लेगी और हमें बर्बादी की तरफ़ ले जाएगी…”
जीवनी बॉक्स — सरदार वल्लभभाई पटेल (1875–1950)17आज़ादी के आंदोलन के नेता; कांग्रेस के नेता; महात्मा गाँधी के अनुयायी; स्वतंत्र भारत के उप-प्रधानमंत्री और प्रथम गृहमंत्री; देसी रियासतों को भारत संघ में मिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका; मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक, प्रांतीय संविधान आदि से संबंधित संविधान सभा की महत्त्वपूर्ण समितियों के सदस्य
चित्र — हैदराबाद के निज़ाम के साथ सरदार पटेल17विलय की वार्ता का दृश्य
मानचित्र — ‘भारत: विभाजन के पहले और बाद’15संकेत-चिह्न: ब्रिटिश भारत, रियासतें/रजवाड़े, स्वतंत्र भारत की बाहरी सीमाएँ। दिखाता है कि रजवाड़े देश-भर में बिखरे थे, कोई सटा हुआ भू-भाग नहीं। नोट: यह किसी पैमाने पर बना मानचित्र नहीं है; इसकी सीमा-रेखा प्रामाणिक न मानी जाए
कार्टून — आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ़ इंडिया18पटेल राजा से: “ना, ना! उठिए मत महाराज! मुझे बस ये दे दीजिए। इसी से काम हो जाएगा।” — पटेल जो डिब्बा माँग रहे हैं उस पर लिखा है ‘विदेशी मामले, प्रतिरक्षा, संचार’; सिंहासन के नीचे दबा व्यक्ति ‘रियासत की जनता’। कार्टून रजवाड़ों की जनता और शासकों के आपसी संबंध पर, और पटेल की विलय-रणनीति पर टिप्पणी है
कार्टून-संवाद (पात्र)14, 18“पहले जिसे ‘पूर्वी’ बंगाल कहा जाता था वही आज का बांग्लादेश है…”; “उन सैकड़ों राजा-रानी… का क्या हुआ होगा? आम नागरिक बनने के बाद उनका जीवन कैसा रहा होगा?”
कार्टून-संवाद (पात्र)15“क्या जर्मनी की तरह हम लोग भारत और पाकिस्तान के बँटवारे को खत्म नहीं कर सकते? मैं तो अमृतसर में नाश्ता और लाहौर में लंच करना चाहता हूँ!” / “क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम एक-दूसरे को स्वतंत्र राष्ट्र मानकर रहना और सम्मान करना सीख जाएँ?”

4. राज्यों का पुनर्गठन (पृ. 19–23)

4.1 चुनौती की प्रकृति (पृ. 19)

  • बँटवारे और देसी रियासतों के विलय के साथ ही राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का अंत नहीं हुआ। भारतीय प्रांतों की आंतरिक सीमाओं को तय करने की चुनौती अभी सामने थी।
  • यह महज प्रशासनिक विभाजन का मामला न था। चुनौती यह थी कि सीमाएँ इस तरह तय हों कि देश की भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता की झलक मिले, साथ ही राष्ट्रीय एकता भी खंडित न हो।
  • औपनिवेशिक शासन में प्रांतों की सीमाएँ प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से तय हुई थीं, या ब्रिटिश सरकार ने जितने क्षेत्र को जीत लिया हो उतना क्षेत्र एक अलग प्रांत मान लिया जाता था; सीमा इस बात से भी तय होती थी कि किसी रजवाड़े के अंतर्गत कितना इलाका शामिल है।
  • हमारी राष्ट्रीय सरकार ने ऐसे सीमांकन को बनावटी मानकर खारिज कर दिया और भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का वायदा किया।

4.2 कांग्रेस की पुरानी प्रतिबद्धता और आज़ादी के बाद का पलटाव (पृ. 19)

  • सन् 1920 में कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन हुआ था। इसके बाद से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह सिद्धांत मान लिया था कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा। अनेक प्रांतीय कांग्रेस-समितियाँ भाषाई इलाके के आधार पर बनी थीं और ये समितियाँ ब्रिटिश इंडिया के प्रशासनिक विभाजन को अपने कामकाज में नहीं बरतती थीं।
  • आज़ादी और बँटवारे के बाद स्थितियाँ बदलीं। नेताओं को चिंता हुई कि भाषा के आधार पर प्रांत बनाने से अव्यवस्था फैल सकती है तथा देश के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है; यह भी लगा कि इससे दूसरी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटक सकता है। केंद्रीय नेतृत्व ने इस मसले को स्थगित करने का फ़ैसला किया। (रजवाड़ों का मसला अभी हल नहीं हुआ था; बँटवारे की यादें अभी ताज़ा थीं।)

4.3 आंध्र आंदोलन और पोट्टी श्रीरामुलु (पृ. 19)

  • पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विरोध भड़क उठा। पुराने मद्रास प्रांत में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश शामिल थे; कुछ हिस्से मौजूदा केरल एवं कर्नाटक में भी हैं।
  • विशाल आंध्र आंदोलन (आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने के लिए चलाया गया आंदोलन) ने माँग की कि मद्रास प्रांत के तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके नया राज्य आंध्र प्रदेश बनाया जाए। तेलुगु-भाषी क्षेत्र की लगभग सारी राजनीतिक शक्तियाँ मद्रास प्रांत के भाषाई पुनर्गठन के पक्ष में थीं।
  • केंद्र सरकार ‘हाँ-ना’ की दुविधा में थी और उसकी इस मनोदशा से आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा।
  • कांग्रेस के नेता और दिग्गज गाँधीवादी पोट्टी श्रीरामुलु अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ गए। 56 दिनों की भूख-हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
  • इससे बड़ी अव्यवस्था फैली; आंध्र प्रदेश में जगह-जगह हिंसक घटनाएँ हुईं; लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल आए; पुलिस फायरिंग में अनेक लोग घायल हुए या मारे गए; मद्रास में अनेक विधायकों ने विरोध जताते हुए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया।
  • आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा की।

4.4 राज्य पुनर्गठन आयोग और 1956 का अधिनियम (पृ. 21)

  • आंध्र के गठन के साथ ही देश के दूसरे हिस्सों में भी भाषाई आधार पर राज्यों को गठित करने का संघर्ष चल पड़ा।
  • इन संघर्षों से बाध्य होकर केंद्र सरकार ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया।
  • आयोग का काम: राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना।
  • आयोग की प्रमुख सिफ़ारिश: इसने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए।
  • इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ। इस अधिनियम के आधार पर 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बनाए गए।

4.5 भाषावार पुनर्गठन का आकलन — अध्याय का निष्कर्ष (पृ. 22–23)

  • आशंका क्या थी: आज़ादी के बाद के शुरुआती सालों में बड़ी चिंता यह थी कि अलग राज्य बनाने की माँग से देश की एकता पर आँच आएगी; कि नए भाषाई राज्यों में अलगाववाद की भावना पनपेगी और नव-निर्मित भारतीय राष्ट्र पर दबाव बढ़ेगा।
  • नेतृत्व ने मन क्यों बदला: जनता के दबाव में आखिरकार नेतृत्व ने भाषा के आधार पर पुनर्गठन का मन बनाया। उम्मीद थी कि अगर हर इलाके के क्षेत्रीय और भाषाई दावे को मान लिया गया तो बँटवारे और अलगाववाद के खतरे में कमी आएगी। इसके अलावा क्षेत्रीय माँगों को मानना और भाषा के आधार पर नए राज्यों का गठन एक लोकतांत्रिक कदम के रूप में भी देखा गया।
  • वास्तव में क्या हुआ (पाँच परिणाम):
    1. भाषाई राज्यों और उनके लिए चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला;
    2. राजनीति और सत्ता में भागीदारी का रास्ता अब एक छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके के लिए ही नहीं, बाकियों के लिए भी खुल चुका था;
    3. भाषावार पुनर्गठन से राज्यों के सीमांकन के लिए एक समरूप आधार मिला;
    4. बहुतों की आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा; इसके विपरीत देश की एकता और ज्यादा मज़बूत हुई;
    5. सबसे बड़ी बात यह कि भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली।
  • लोकतंत्र का वृहत्तर अर्थ (अध्याय का अंतिम तर्क): “भारत ने लोकतंत्र अपनाया” का मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि लोकतांत्रिक संविधान पर अमल होता है या चुनाव करवाए जाते हैं। लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना; साथ ही यह मानकर चलना कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी। आगे के दिनों में अधिकतर राजनीति इसी दायरे में चली।

‘कुछ आगे की… नए राज्यों का निर्माण’ (बॉक्स, पृ. 23)

वर्षघटना
1956द्विभाषी राज्य बंबई का प्रयोग — इसमें गुजराती और मराठी भाषा बोलने वाले लोग थे
1960एक जन-आंदोलन के बाद महाराष्ट्र और गुजरात राज्य बनाए गए
1963नगालैंड राज्य बना (पंजाब से भी पहले)
1966पंजाबी-भाषी इलाके को पंजाब राज्य का दर्ज़ा; वृहत्तर पंजाब से अलग करके हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। (पंजाबी-भाषी लोगों की माँग बाकी राज्यों की तरह 1956 में नहीं मानी गई थी — दस साल बाद मानी गई।)
1972पूर्वोत्तर में बड़ा पुनर्गठन: असम से अलग करके मेघालय; इसी साल मणिपुर और त्रिपुरा भी अलग राज्य बने
1987मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश वजूद में आए
2000छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड — ये भाषा के नहीं, बल्कि अलग क्षेत्रीय संस्कृति अथवा विकास के मामले में क्षेत्रीय असंतुलन के सवाल उठाकर बने
2 जून 2014तेलंगाना एक नए राज्य के रूप में जुड़ा
  • यह कथा अभी समाप्त नहीं हुई है: देश के अनेक इलाकों में छोटे-छोटे अलग राज्य बनाने की माँग को लेकर आंदोलन चल रहे हैं — महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में।
  • महत्वपूर्ण चेतावनी: भाषावार पुनर्गठन के सिद्धांत को मान लेने का अर्थ यह नहीं था कि सभी राज्य तत्काल भाषाई राज्य में तब्दील हो गए; और बाद के वर्षों में सिर्फ़ भाषा को आधार बनाया गया हो, ऐसी बात नहीं।

मानचित्र, कार्टून और गतिविधियाँ — पुनर्गठन खंड

स्रोतपृ.सार
महात्मा गाँधी, जनवरी 194819”…यदि प्रांतों का गठन भाषावार हुआ तो क्षेत्रीय भाषाओं का ज़ोर बढ़ेगा। हिंदुस्तानी को सभी प्रांतों में शिक्षा का माध्यम बनाने का कोई अर्थ न रह जाएगा और अंग्रेज़ी को इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना तो और भी व्यर्थ है।” (ध्यान दें: यह भाषावार गठन के विरुद्ध तर्क है — कांग्रेस की 1920 वाली प्रतिबद्धता के बावजूद)
मानचित्र — ‘राज्यों के पुनर्गठन के बाद भारत का प्रशासनिक मानचित्र—1961’201961 की स्थिति; मैसूर, मद्रास, उत्तर-पूर्व फ्रंटियर एजेंसी, नागा हिल्स त्यूंसंग क्षेत्र, गोवा दमन और दीव, पांडिचेरी जैसे तत्कालीन नाम दिखते हैं
मानचित्र-गतिविधि201. स्वतंत्र राज्य बनने से पहले ये किन मूल राज्यों के अंग थे? (क) गुजरात (ख) हरियाणा (ग) मेघालय (घ) छत्तीसगढ़ 2. देश के विभाजन से प्रभावित दो राज्यों के नाम 3. दो ऐसे राज्य जो पहले संघ-शासित राज्य थे
कार्टून — शंकर, ‘स्ट्रगल फॉर सरवाइवल’ (26 जुलाई 1953)21MAHA GUJERAT, SAMYUKTA KARNATAKA, VISALA ANDHRA, BRIHAN MAHARASHTRA — चारों तरफ़ से खींचते भाषाई दावे और बीच में असहाय आम आदमी। उस दौर का माहौल जब भाषाई आधार पर राज्य गठन की माँग ज़ोर पकड़ रही थी
कार्टून — शंकर, ‘कोक्सिंग द जेनी’ (5 फरवरी, 1956)22राज्य पुनर्गठन आयोग की भाषाई विवाद को सुलझाने की क्षमता पर सवाल उठाया गया है
चित्र — Report of the States Reorganisation Commission, 1955 का आवरण22आयोग की रिपोर्ट
जीवनी बॉक्स — पोट्टी श्रीरामुलु (1901–1952)21गाँधीवादी कार्यकर्ता; नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी; वैयक्तिक सत्याग्रह में भी भागीदारी; 1946 में इस माँग को लेकर उपवास पर बैठे कि मद्रास प्रांत के मंदिर दलितों के लिए खोल दिए जाएँ; आंध्र नाम से अलग राज्य बनाने की माँग को लेकर 19 अक्तूबर 1952 से आमरण अनशन; 15 दिसम्बर 1952 को अनशन के दौरान मृत्यु
कार्टून-संवाद (पात्र)21“है न दिलचस्प बात? नेहरू और बाकी नेता बड़े लोकप्रिय थे तो भी भाषाई राज्य की माँग को लेकर लोग उनकी इच्छा के विरुद्ध आंदोलन करने से नहीं हिचकिचाए।”
कार्टून-संवाद (पात्र)23“संयुक्त राज्य अमरीका की जनसंख्या अपने देश के मुकाबले एक-चौथाई है लेकिन वहाँ 50 राज्य हैं। भारत में 100 से भी ज्यादा राज्य क्यों नहीं हो सकते?”

सारांश (पाठ्यपुस्तक में मुद्रित नहीं)

ध्यान दें: इस अध्याय में कोई मुद्रित ‘सारांश’ या ‘निष्कर्ष’ खंड नहीं है और कोई उत्तर-कुंजी भी नहीं दी गई है। अध्याय पृ. 23 पर ‘कुछ आगे की…’ बॉक्स के साथ समाप्त होता है, फिर पृ. 24–25 पर प्रश्नावली है। नीचे दिया सार शिक्षक द्वारा तैयार किया गया है, पाठ्यपुस्तक का अपना नहीं।

अध्याय की धुरी: राष्ट्र-निर्माण की तीन चुनौतियाँ → पहली चुनौती (एकता-अखंडता) के तीन मोर्चे → तीनों का परिणाम।

मोर्चासंकटसमाधानपरिणाम
विभाजनधर्म के आधार पर बँटवारा; 80 लाख विस्थापित; 5–10 लाख मृतधर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श संविधान मेंभारत हिंदू राष्ट्र नहीं बना; सभी नागरिक समान
रजवाड़े565 रजवाड़े कानूनी तौर पर आज़ाद; बिखराव का खतरापटेल की भूमिका; ‘इंस्टूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’; लचीला रुखअखंड भारत; कुछ को स्वायत्तता
पुनर्गठनऔपनिवेशिक सीमाएँ बनावटी; भाषाई माँगें1953 आयोग → 1956 अधिनियम → 14 राज्य + 6 केंद्र-शासित प्रदेशदेश टूटा नहीं, एकता मज़बूत हुई; विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति

1. भारत-विभाजन के बारे में निम्नलिखित कौन-सा कथन गलत है? (क) भारत-विभाजन “द्वि-राष्ट्र सिद्धांत” का परिणाम था। (ख) धर्म के आधार पर दो प्रांतों–पंजाब और बंगाल–का बँटवारा हुआ। (ग) पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में संगति नहीं थी। (घ) विभाजन की योजना में यह बात भी शामिल थी कि दोनों देशों के बीच आबादी की अदला-बदली होगी।

2. निम्नलिखित सिद्धांतों के साथ उचित उदाहरणों का मेल करें:

सिद्धांतउदाहरण
(क)धर्म के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण1.पाकिस्तान और बांग्लादेश
(ख)विभिन्न भाषाओं के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण2.भारत और पाकिस्तान
(ग)भौगोलिक आधार पर किसी देश के क्षेत्रों का सीमांकन3.झारखंड और छत्तीसगढ़
(घ)किसी देश के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक आधार पर क्षेत्रों का सीमांकन4.हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड

3. भारत का कोई समकालीन राजनीतिक नक्शा लीजिए (जिसमें राज्यों की सीमाएँ दिखाई गई हों) और नीचे लिखी रियासतों के स्थान चिह्नित कीजिए — (क) जूनागढ़ (ख) मणिपुर (ग) मैसूर (घ) ग्वालियर

4. नीचे दो तरह की राय लिखी गई है: विस्मय: रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने से इन रियासतों की प्रजा तक लोकतंत्र का विस्तार हुआ। इंद्रप्रीत: यह बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। इसमें बलप्रयोग भी हुआ था जबकि लोकतंत्र में आम सहमति से काम लिया जाता है। देशी रियासतों के विलय और ऊपर के मशविरे के आलोक में इस घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है?

5. नीचे 1947 के अगस्त के कुछ बयान दिए गए हैं जो अपनी प्रकृति में अत्यंत भिन्न हैं: “आज आपने अपने सर पर काँटों का ताज पहना है। सत्ता का आसन एक बुरी चीज़ है। इस आसन पर आपको बड़ा सचेत रहना होगा… आपको और ज्यादा विनम्र और धैर्यवान बनना होगा… अब लगातार आपकी परीक्षा ली जाएगी।” —मोहनदास करमचंद गाँधी ”…भारत आज़ादी की जिंदगी के लिए जागेगा… हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाएँगे… आज दुर्भाग्य के एक दौर का खात्मा होगा और हिंदुस्तान अपने को फिर से पा लेगा… आज हम जो जश्न मना रहे हैं वह एक कदम भर है, संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं…” —जवाहरलाल नेहरू इन दो बयानों से राष्ट्र-निर्माण का जो एजेंडा ध्वनित होता है उसे लिखिए। आपको कौन-सा एजेंडा जँच रहा है और क्यों?

6. भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए नेहरू ने किन तर्कों का इस्तेमाल किया। क्या आपको लगता है कि ये केवल भावनात्मक और नैतिक तर्क हैं अथवा इनमें कोई तर्क युक्तिपरक भी है?

7. आज़ादी के समय देश के पूर्वी और पश्चिमी इलाकों में राष्ट्र-निर्माण की चुनौती के लिहाज़ से दो मुख्य अंतर क्या थे?

8. राज्य पुनर्गठन आयोग का काम क्या था? इसकी प्रमुख सिफारिश क्या थी?

9. कहा जाता है कि राष्ट्र एक व्यापक अर्थ में ‘कल्पित समुदाय’ होता है और सर्वसामान्य विश्वास, इतिहास, राजनीतिक आकांक्षा और कल्पनाओं से एकसूत्र में बँधा होता है। उन विशेषताओं की पहचान करें जिनके आधार पर भारत एक राष्ट्र है।

10. नीचे लिखे अवतरण को पढ़िए और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए — “राष्ट्र-निर्माण के इतिहास के लिहाज से सिर्फ़ सोवियत संघ में हुए प्रयोगों की तुलना भारत से की जा सकती है। सोवियत संघ में भी विभिन्न और परस्पर अलग-अलग जातीय समूह, धर्म, भाषाई समुदाय और सामाजिक वर्गों के बीच एकता का भाव कायम करना पड़ा। जिस पैमाने पर यह काम हुआ, चाहे भौगोलिक पैमाने के लिहाज़ से देखें या जनसंख्यागत वैविध्य के लिहाज़ से, वह अपनेआप में बहुत व्यापक कहा जाएगा। दोनों ही जगह राज्य को जिस कच्ची सामग्री से राष्ट्र-निर्माण की शुरुआत करनी थी वह समान रूप से दुष्कर थी। लोग धर्म के आधार पर बँटे हुए और कर्ज़ तथा बीमारी से दबे हुए थे।” —रामचंद्र गुहा (क) यहाँ लेखक ने भारत और सोवियत संघ के बीच जिन समानताओं का उल्लेख किया है, उनकी एक सूची बनाइए। इनमें से प्रत्येक के लिए भारत से एक उदाहरण दीजिए। (ख) लेखक ने यहाँ भारत और सोवियत संघ में चली राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रियाओं के बीच की असमानता का उल्लेख नहीं किया है। क्या आप दो असमानताएँ बता सकते हैं? (ग) अगर पीछे मुड़कर देखें तो आप क्या पाते हैं? राष्ट्र-निर्माण के इन दो प्रयोगों में किसने बेहतर काम किया और क्यों?

खुद करें-खुद समझें (पृ. 25)

  1. किसी भारतीय अथवा पाकिस्तानी/बांग्लादेशी कथाकार की लिखी कोई कहानी या उपन्यास पढ़ें जिसमें बँटवारे का जिक्र आया हो। सीमा के इस तरफ़ के लोगों और सीमा के उस तरफ़ के लोगों के अनुभव कैसे एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं?
  2. ‘खोजबीन’ शीर्षक के अंतर्गत इस अध्याय में सुझाई गई तमाम कथाओं को एकत्र करें। एक वॉलपेपर तैयार करें और इसमें मिलते-जुलते अनुभवों वाले स्थल को रेखांकित करें। साथ ही, किसी अनूठे अनुभव को भी इसमें स्थान दें।
उत्तर देखिए

उत्तर-कुंजी: पाठ्यपुस्तक में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है। प्रश्न 1 और 2 के अतिरिक्त सभी प्रश्न वर्णनात्मक/मत-आधारित हैं। (प्रश्न-बैंक में दिए उत्तर शिक्षक द्वारा तैयार हैं — देखें 05-Question-Bank.md।)

चित्र, मानचित्र और कार्टून — सूची

संदर्भपृ.विषय-वस्तु
चित्र2कलकत्ता, 1947 — हिंदू-मुस्लिम लोग ट्रकों पर भारत और पाकिस्तान के झंडे लिए (साभार: सुनील जाना)
चित्र315 अगस्त 1947 — लाल किले से नेहरू का भाषण (साभार: पी.आई.बी.)
समाचारपत्र4, 6, 7Hindustan Times (19.7.1947), Dawn (14.8.1947), Times of India (15.8.1947)
डाक-टिकट5प्रथम गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 1950 — तीन टिकट (12, 4 और 2 आने)
चित्र9शरणार्थियों से भरी एक ट्रेन, 1947 (साभार: पी.आई.बी.)
चित्र10नोआखली की यात्रा पर गाँधी, 1947 (साभार: नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी)
फ़िल्म-स्थिर11‘गर्म हवा’ (1973) — बलराज साहनी
समाचारपत्र कोलाज + गैज़ट13गाँधी-हत्या की खबरें; Gazette of India, 4 फरवरी 1948 — RSS पर प्रतिबंध
मानचित्र15भारत: विभाजन के पहले और बाद
चित्र17हैदराबाद के निज़ाम के साथ सरदार पटेल (साभार: पत्र सूचना कार्यालय)
डाक-टिकट17सरदार वल्लभभाई पटेल (0.15)
कार्टून18आर.के. लक्ष्मण — पटेल और महाराज
मानचित्र20राज्यों के पुनर्गठन के बाद भारत का प्रशासनिक मानचित्र—1961
कार्टून21शंकर — ‘स्ट्रगल फॉर सरवाइवल’ (26 जुलाई 1953)
डाक-टिकट21पोट्टी श्रीरामुलु (₹3.00)
कार्टून22शंकर — ‘कोक्सिंग द जेनी’ (5 फरवरी 1956)
पुस्तक-आवरण22Report of the States Reorganisation Commission, 1955

शब्दावली

पदइस अध्याय में प्रयुक्त अर्थ
राष्ट्र-निर्माणविविधताओं से भरे समाज को एक राष्ट्र-राज्य के रूप में गढ़ने की प्रक्रिया
द्वि-राष्ट्र सिद्धांतमुस्लिम लीग का यह मत कि भारत ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है, एक का नहीं
विभाजन14–15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश इंडिया का ‘भारत’ और ‘पाकिस्तान’ के रूप में बँटवारा
धार्मिक बहुसंख्या का आधारविभाजन का सिद्धांत — मुस्लिम-बहुल इलाके पाकिस्तान, शेष भारत
विस्थापनआबादी का आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा स्थानांतरण
शरणार्थी शिविरविस्थापितों के अस्थाई पड़ाव, जहाँ लाखों को महीनों-सालों रहना पड़ा
धर्मनिरपेक्ष राज्यवह आदर्श जिसमें नागरिकता की कसौटी धर्म नहीं है और हर नागरिक का दर्ज़ा बराबर है
रजवाड़ा / देसी रियासतवह राज्य जिस पर राजा का शासन था और जिसने ब्रिटिश-राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी
सर्वोच्च सत्ता (पैरामाउंटसी)ब्रिटिश-राज की वह अधीनता जिसे रजवाड़ों ने स्वीकार किया था
इंस्टूमेंट ऑफ़ एक्सेशनविलय का सहमति-पत्र; इस पर हस्ताक्षर का अर्थ — रजवाड़ा भारतीय संघ का अंग बनने को सहमत है
माउंटबेटन योजनावह योजना जिसके तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं
निज़ामहैदराबाद के शासक की उपाधि
रज़ाकारनिज़ाम द्वारा जनता के विरुद्ध रवाना किया गया अर्द्ध-सैनिक बल; अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी
यथास्थिति समझौतानिज़ाम और भारत के बीच नवंबर 1947 का, एक साल के लिए किया गया समझौता
संवैधानिक राजतंत्रमणिपुर में 1948 के चुनाव के फलस्वरूप कायम शासन-रूप
सार्वभौम वयस्क मताधिकारवह सिद्धांत जिसे अपनाकर मणिपुर में भारत के किसी भी भाग से पहले चुनाव हुए
राज्यों का पुनर्गठनभाषाई-सांस्कृतिक बहुलता के आधार पर देश की आंतरिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण
विशाल आंध्र आंदोलनआंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने के लिए चलाया गया आंदोलन
राज्य पुनर्गठन आयोग1953 में गठित; काम — राज्यों के सीमांकन पर गौर करना
कल्पित समुदायप्रश्न 9 का पद — राष्ट्र, जो सर्वसामान्य विश्वास, इतिहास, राजनीतिक आकांक्षा और कल्पनाओं से एकसूत्र में बँधा होता है

मुख्य आँकड़े और तिथियाँ

मानसंदर्भपृ.
14–15 अगस्त 1947 (मध्यरात्रि)भारत की आज़ादी; दो राष्ट्र अस्तित्व में आए3, 8
11 अगस्त 1947जिन्ना का पाकिस्तान की संविधान सभा में अध्यक्षीय भाषण6
14 अगस्त 1947गाँधी का कलकत्ता वाला कथन4
15 अक्तूबर 1947नेहरू का मुख्यमंत्रियों को पत्र7
80 लाखविभाजन के कारण सीमा-पार जाने को मजबूर लोग11
पाँच से दस लाखविभाजन की हिंसा में मारे गए लोग11
10–12 फीसदी1951 में भारत की कुल आबादी में मुसलमानों का हिस्सा11
30 जनवरी 1948महात्मा गाँधी की हत्या (नाथूराम विनायक गोडसे; तीन गोलियाँ)12
जनवरी 1948गाँधी का अंतिम ‘उपवास’12
4 फरवरी 1948गैज़ट अधिसूचना — RSS पर प्रतिबंध13
565रजवाड़ों की संख्या14
एक-तिहाईभारतीय साम्राज्य का वह हिस्सा जिसमें रजवाड़े कायम थे14
प्रत्येक चार में से एकभारतीय जो किसी रजवाड़े की प्रजा था14
26 / 15आज के उड़ीसा में / छत्तीसगढ़ में तब के छोटे रजवाड़े16
14 बड़े और 119 छोटेसौराष्ट्र के रजवाड़े16
नवंबर 1947हैदराबाद का यथास्थिति समझौता (एक साल के लिए)17
सितंबर 1948भारतीय सेना हैदराबाद पहुँची; निज़ाम का आत्मसमर्पण18
जून 1948मणिपुर में चुनाव; संवैधानिक राजतंत्र18
सितंबर 1949मणिपुर के विलय-समझौते पर सफलता18
1920कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन — भाषाई पुनर्गठन का सिद्धांत स्वीकार19
56 दिनपोट्टी श्रीरामुलु की भूख-हड़ताल की अवधि (मुख्य पाठ)19
19 अक्तूबर 1952 → 15 दिसम्बर 1952श्रीरामुलु का आमरण अनशन → मृत्यु (जीवनी बॉक्स)21
दिसंबर 1952प्रधानमंत्री द्वारा आंध्र प्रदेश की घोषणा19
1953राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन21
1955आयोग की रिपोर्ट22
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम → 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश21
26 जनवरी 1950प्रथम गणतंत्र दिवस (डाक-टिकट)5
1960 / 1963 / 1966 / 1972 / 1987 / 2000 / 2 जून 2014महाराष्ट्र-गुजरात / नगालैंड / पंजाब-हरियाणा-हिमाचल / मेघालय-मणिपुर-त्रिपुरा / मिजोरम-अरुणाचल / छत्तीसगढ़-उत्तराखंड-झारखंड / तेलंगाना23

भ्रमित करने वाले युग्म (Common Traps)

युग्मभेद
विभाजन का आधार बनाम पुनर्गठन का आधारविभाजन धर्म के आधार पर (बाहरी सीमा); पुनर्गठन भाषा के आधार पर (आंतरिक सीमा)
राज्य पुनर्गठन आयोग (1953) बनाम राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1956)आयोग सिफ़ारिश करता है; अधिनियम लागू करता है। 14 राज्य + 6 केंद्र-शासित प्रदेश अधिनियम से बने, आयोग से नहीं
80 लाख बनाम 5–10 लाख80 लाख = विस्थापित; 5–10 लाख = मारे गए
आंध्र प्रदेश की घोषणा (दिसंबर 1952) बनाम आयोग का गठन (1953)आंध्र की घोषणा पहले हुई; आयोग उसके बाद, बाकी राज्यों के दबाव में बना
हैदराबाद बनाम मणिपुरहैदराबाद — सैन्य कार्रवाई (सितंबर 1948), निज़ाम का आत्मसमर्पण। मणिपुर — सहमति-पत्र और वार्ता (सितंबर 1949), कोई सेना नहीं
मणिपुर का पहला सहमति-पत्र बनाम अंतिम विलयआज़ादी के चंद रोज पहले महाराजा ने सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए (आंतरिक स्वायत्तता के आश्वासन पर); विलय-समझौता सितंबर 1949 में हुआ
खान अब्दुल गफ्फार खान की स्थितिवे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ़ थे, फिर भी उनकी आवाज़ की अनदेखी करके पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत पाकिस्तान में मान लिया गया
1920 नागपुर अधिवेशन बनाम आज़ादी के बाद का रुखकांग्रेस ने 1920 से ही भाषाई पुनर्गठन का सिद्धांत माना था; आज़ादी के बाद उसी नेतृत्व ने मसला स्थगित किया
गाँधी का भाषाई राज्यों पर मतगाँधी भाषावार गठन के पक्ष में नहीं थे (जनवरी 1948) — छात्र प्रायः उल्टा मान लेते हैं
2000 में बने राज्यों का आधारछत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड भाषा के आधार पर नहीं, अलग क्षेत्रीय संस्कृति/विकास के असंतुलन के आधार पर बने
नगालैंड का वर्ष1963 — पंजाब (1966) और मेघालय (1972) से पहले
पूर्वी बंगाल बनाम पश्चिम बंगाल‘पूर्वी बंगाल’ → पूर्वी पाकिस्तान → आज का बांग्लादेश; इसी कारण भारत वाले बंगाल को ‘पश्चिम’ बंगाल कहा जाता है
त्रावणकोर बनाम हैदराबाद (स्वतंत्रता की घोषणा)सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने घोषणा की; अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने
‘गर्म हवा’ का पात्रसलीम मिर्ज़ा — आगरा का जूता व्यवसायी; बेटा सिकंदर