शिक्षक हेतु मास्टर नोट्स — कक्षा 12, राजनीति विज्ञान
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! इस अध्याय के बारे में एक ज़रूरी सूचना
प्रश्नावली का प्रश्न 4 (पृ. 53) चार मेल पूछता है — चरण सिंह, पी.सी. महालनोबिस, बिहार का अकाल और वर्गीज़ कूरियन। इनमें से केवल महालनोबिस का उल्लेख अध्याय (पृ. 44–53) में है। चरण सिंह, बिहार का अकाल, वर्गीज़ कूरियन और ‘जोनिंग’ — इनमें से कोई भी इस अध्याय के पाठ में नहीं आता। विवरण और अनुशंसित उत्तर
10-Verification-Log.md§2.1 में। पढ़ाने से पहले वह पढ़ लीजिए।
0. यह अध्याय किस बारे में है
अध्याय 1 एकता की चुनौती पर था, अध्याय 2 लोकतंत्र की — यह अध्याय तीसरी चुनौती, आर्थिक विकास पर है। इसका केंद्रीय दावा यह है कि विकास कोई तकनीकी सवाल नहीं, राजनीतिक सवाल है। ‘विकास’ का अर्थ उद्योगपति, शहरी उपभोक्ता और विस्थापित होने वाले आदिवासी के लिए अलग-अलग है, इसलिए “‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती”, और अंतिम निर्णय विशेषज्ञ का नहीं, जन-प्रतिनिधि का होना चाहिए।
इसके बाद अध्याय बताता है कि आज़ादी के बाद भारत ने कौन-सा रास्ता चुना: न पूरी तरह पूँजीवादी, न पूरी तरह समाजवादी — बल्कि नियोजन (planning), जिसमें राज्य विकास का खाका बनाता है। उस चुनाव की संस्था योजना आयोग थी, उसका औज़ार पंचवर्षीय योजनाएँ, और उसकी दो सबसे बड़ी बहसें — कृषि बनाम उद्योग तथा केंद्रीकृत बनाम विकेंद्रित नियोजन।
1. राजनीतिक फ़ैसले और विकास — उड़ीसा का उदाहरण (पृ. 45)
पाठ्यपुस्तक अध्याय की शुरुआत सिद्धांत से नहीं, एक जीवित विवाद से करती है।
- इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ी तो निवेश के लिहाज़ से उड़ीसा एक महत्वपूर्ण जगह के रूप में उभरा — वहाँ लौह-अयस्क का विशाल भंडार था और अभी इसका दोहन बाकी था।
- उड़ीसा की राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय-स्तर के इस्पात-निर्माताओं के साथ सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए — सोच यह थी कि इससे पूँजी-निवेश और रोज़गार दोनों आएँगे।
- ★पेच यह है: लौह-अयस्क के ज्यादातर भंडार उड़ीसा के सर्वाधिक अविकसित इलाकों में हैं — खासकर आदिवासी-बहुल जिलों में।
टकराते हुए हित (यह तालिका अध्याय की रीढ़ है)
| पक्ष | उसका हित / भय |
|---|---|
| राज्य सरकार | पूँजी-निवेश और रोज़गार के अवसर |
| आदिवासी | विस्थापन का डर — घर-बार छूटेगा और आजीविका छिन जाएगी |
| पर्यावरणविद | खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होगा |
| केंद्र सरकार | अनुमति न दी गई तो बुरी मिसाल कायम होगी और देश में पूँजी निवेश को बाधा पहुँचेगी |
- अध्याय का प्रश्न: “उड़ीसा में किस तरह के विकास की ज़रूरत है? दरअसल, किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?”
1.1 राजनीतिक टकराव (पृ. 45)
- “इन सवालों के जवाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता।” ऐसे फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे के हितों की तुलना में तौला जाता है; साथ ही मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के हितों को भी।
- किसी भी लोकतंत्र में ऐसे फ़ैसले जनता द्वारा लिए जाने चाहिए, या कम-से-कम इन पर जन-प्रतिनिधियों की स्वीकृति ज़रूरी है।
- ★★“खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए। जन-प्रतिनिधि जनता की भावनाओं को समझते हैं और जन-प्रतिनिधियों को ही ऐसे फ़ैसले लेने चाहिए।” — यही अध्याय का शीर्षक-वाक्य है।
समाचार-बॉक्स — पोस्को प्लांट (पृ. 45)
शीर्षक: “पोस्को प्लांट : उड़ीसा के ग्रामीण विरोध पर उतारू”
- भुवनेश्वर — जगतसिंह जिले में प्रस्तावित पोस्को-इंडिया इस्पात संयंत्र से विस्थापन का शिकार हुए लोगों ने कोरियाई कंपनी के दफ्तर के सामने विरोध प्रदर्शन किया।
- माँग: एक साल पहले कंपनी और उड़ीसा सरकार के बीच जिस सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे, उसे रद्द किया जाए।
- धिंकिया, नुआगाँव और गढ़कुजंगा ग्राम पंचायत के एक सौ से भी ज्यादा स्त्री-पुरुषों ने कंपनी के दफ्तर में घुसने की कोशिश की; पुलिस ने रोक दिया।
- नारा: “हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर कंपनी को इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”
- आयोजन: राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति।
- साभार: ‘द हिंदू’, 23 जून, 2006.
2. वामपंथ और दक्षिणपंथ (बॉक्स, पृ. 46)★★
| पद | अर्थ |
|---|---|
| वामपंथ (Left) | उन लोगों की तरफ़ संकेत जो अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में हैं और मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन को प्राथमिकता देते हैं |
| दक्षिणपंथ (Right) | उन लोगों को इंगित करता है जो मानते हैं कि खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था के ज़रिए ही प्रगति हो सकती है — यानी सरकार को अर्थव्यवस्था में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए |
- ये पद बताते हैं कि कोई दल सामाजिक बदलाव को लेकर कौन-सा पक्ष लेगा और आर्थिक पुनर्वितरण में राज्य की भूमिका के बारे में उसकी क्या राय होगी।
- बॉक्स का प्रश्न: “क्या आप बता सकते हैं कि 1960 के दशक में कौन-से राजनीतिक दल वामपंथी और कौन-से दक्षिणपंथी थे? आप इस दौर की कांग्रेस पार्टी को किस तरफ़ रखेंगे?” (अध्याय 2 से कड़ी: CPI और सोशलिस्ट = वामपंथ; स्वतंत्र पार्टी = दक्षिणपंथ; कांग्रेस = मध्यमार्गी, पर 1955 के बाद वाम की ओर झुकी।)
3. सहमति और मतभेद (पृ. 46)
जिस पर लगभग सभी सहमत थे:
- भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय — दोनों ही हैं।
- इस मामले को व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; सरकार को प्रमुख भूमिका निभानी थी।
जिन पर मतभेद थे (तीन प्रश्न):
- क्या कोई ऐसा केंद्रीय संगठन ज़रूरी है जो पूरे देश के लिए योजना बनाए?
- क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए?
- अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि के आड़े आता हो तो सामाजिक-न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा?
“इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।” इसी कारण भारत की राजनीति के इतिहास को जानने के लिए हमें विकास के कथाक्रम को पढ़ना ज़रूरी है।
4. विकास की धारणाएँ (पृ. 46–47)
- ‘विकास’ के अर्थ अलग-अलग तबकों के लिए अलग-अलग — इस्पात-संयंत्र की योजना बना रहे उद्योगपति, इस्पात के शहरी उपभोक्ता, और प्रस्तावित इलाके में रह रहे आदिवासी — तीनों के लिए।
- ★इसी कारण ‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती।
- आज़ादी के बाद के पहले दशक की धारणा: “‘विकास’ का अर्थ था ज्यादा-से-ज्यादा आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था, पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना।”
- आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था।
- माना जाता था कि जिस तरह पश्चिमी मुल्कों में आधुनिकीकरण के कारण पुरानी सामाजिक संरचना टूटी और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय हुआ, उसी तरह बाकी देशों में भी होगा।
- इसी धारणा के कारण देशों को विकसित, विकासशील अथवा अविकसित बताया जाता था।
- कार्टून-संवाद (पृ. 47): “क्या आप यह कह रहे हैं कि ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?”
4.1 विकास के दो मॉडल (पृ. 47)★★
| मॉडल | कहाँ अपनाया गया |
|---|---|
| पहला — उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल | यूरोप के अधिकतर हिस्सों और संयुक्त राज्य अमरीका में |
| दूसरा — समाजवादी मॉडल | सोवियत संघ ने |
- ★“उस वक्त हिंदुस्तान में बहुत-से लोग विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे।” ऐसे लोगों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ही नहीं बल्कि सोशलिस्ट पार्टी और खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे।
- ★“अमरीकी तर्ज़ के पूँजीवादी विकास के पैरोकार बहुत कम थे।”
- आज़ादी के आंदोलन के दौरान ही सहमति बन गई थी:
- आज़ाद भारत की सरकार के आर्थिक सरोकार अंग्रेजी हुकूमत के आर्थिक सरोकारों से एकदम अलग होंगे;
- सरकार संकुचित व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए काम नहीं करेगी;
- गरीबी मिटाने और सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण के काम का मुख्य जिम्मा सरकार का होगा।
- मुख्य बहस: “कुछ औद्योगीकरण को उचित रास्ता मानते थे तो कुछ की नज़र में कृषि का विकास करना और ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करना सर्वाधिक ज़रूरी था।”
- चित्र (पृ. 47): योजना आयोग के सदस्यों को संबोधित करते हुए नेहरू (साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)।
5. योजना आयोग (पृ. 48)★★
- ★“योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है।” पिछले साल की किताब ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ में इसका कहीं ज़िक्र नहीं है।
- ★स्थापना: मार्च 1950 में, भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के जरिए की।
- ★यह आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता है और इसकी सिफ़ारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती हैं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंज़ूर करे।
- प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने (पृ. 49)।
प्रस्ताव में उद्धृत नीति-निर्देशक तत्व (पृ. 48)
प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान ने नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए हैं और राज्य के लिए नीति-निर्देशक तत्वों का उल्लेख किया है; राज्य अपनी नीतियाँ इस तरह बनाएगा कि —
| उपबंध | |
|---|---|
| (क) | स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो। |
| (ख) | समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो। |
| (ग) | अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह नहीं किया जाएगा कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो। |
- कार्टून (पृ. 48, साभार: नैनन): बादल पर बैठे योजनाकार — “बड़े खुशकिस्मत हैं ये लोग कि हम जैसे लोग इनके लिए विकास योजना बना रहे हैं” — नीचे गाँव की वास्तविकता। यह कार्टून केंद्रीकृत नियोजन की सबसे तीखी आलोचना है।
- पात्र-प्रश्न: “क्या योजना आयोग ने इन उद्देश्यों पर अमल किया है?”
बॉक्स — कुछ आगे की… नीति आयोग (पृ. 48) 🔄
- भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर एक नई संस्था, नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की।
- यह संस्था 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई।
- उद्देश्य और संरचना के लिए वेबसाइट http://niti.gov.in देखने को कहा गया है।
6. नियोजन (पृ. 49)
- मतभेदों के बावजूद एक बिंदु पर सभी सहमत थे: “विकास का काम निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता और सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह विकास का एक खाका अथवा योजना तैयार करे।”
- वैश्विक पृष्ठभूमि — नियोजन के पक्ष में हवा क्यों बह रही थी (1940 और 1950 के दशक):
- यूरोप ‘महामंदी’ का शिकार होकर कुछ सबक सीख चुका था;
- जापान और जर्मनी ने युद्ध की विभीषिका झेलने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था फिर खड़ी कर ली थी;
- सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी।
6.1 ‘बॉम्बे प्लान’ — वह मोड़ जो चौंकाता है (पृ. 49)★★
- सामान्य धारणा यह है कि निजी निवेशक — उद्योगपति और बड़े व्यापारिक उद्यमी — नियोजन के पक्ष में नहीं होते; वे एक खुली अर्थव्यवस्था चाहते हैं जहाँ पूँजी के बहाव पर सरकार का कोई अंकुश न हो।
- ★“लेकिन, भारत में ऐसा नहीं हुआ। 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ। इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है।”
- ‘बॉम्बे प्लान’ की मंशा: सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए।
- ★निष्कर्ष: “इस तरह चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले।”
- भारत के आज़ाद होते ही योजना आयोग अस्तित्व में आया। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने। भारत विकास के लिए कौन-सा रास्ता और रणनीति अपनाएगा — यह फ़ैसला करने में इस संस्था ने केंद्रीय और सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई।
7. शुरुआती कदम — पंचवर्षीय योजनाएँ (पृ. 49–50)
- ★“सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी पंचवर्षीय योजनाओं का विकल्प चुना।”
- विचार: भारत सरकार एक दस्तावेज़ तैयार करेगी जिसमें अगले पाँच सालों के लिए उसकी आमदनी और खर्च की योजना होगी।
- ★बजट दो हिस्सों में बाँटा गया:
| हिस्सा | क्या |
|---|---|
| गैरयोजना-व्यय | सालाना आधार पर दैनंदिन मदों पर खर्च |
| योजना-व्यय | योजना में तय की गई प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए पाँच साल की अवधि में खर्च |
- फ़ायदा: “सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की एक बड़ी तसवीर होती थी और वह अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि के हस्तक्षेप कर सकती थी।”
7.1 योजनाओं का कालक्रम (पृ. 50)★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1951 | प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी; इसी साल नवंबर में वास्तविक दस्तावेज़ भी जारी |
| 1956 | दूसरी पंचवर्षीय योजना — नियोजन को लेकर गहमागहमी अपने चरम पर |
| 1961 | तीसरी पंचवर्षीय योजना — यह माहौल तब तक जारी रहा |
| 1966 | चौथी पंचवर्षीय योजना चालू होनी थी — लेकिन नियोजन का नयापन मंद पड़ गया था और भारत गहन आर्थिक संकट की चपेट में आ चुका था; सरकार ने पंचवर्षीय योजना को थोड़ी देर का विराम देने का फ़ैसला किया |
- प्रथम योजना के दस्तावेज़ों पर बुद्धिजीवी, पत्रकार, सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी, उद्योगपति, किसान और राजनेता — सबने व्यापक बहस-मुबाहिसा चलाया।
- ★“हालाँकि इन योजनाओं की प्राथमिकताओं और प्रक्रिया को लेकर अनेक आलोचनाएँ सामने आईं लेकिन यह बात सच है कि इस वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।”
- समाचारपत्र (पृ. 49): The Hindustan Times — “FIVE-YEAR PLAN PRESENTED TO PARLIAMENT — Rs 2,069 CRORES OUTLAY FOR VARIOUS PROJECTS — Blue-print For Increasing National Wealth”।
- कार्टून (पृ. 50, साभार: सुधीर दर / कुसमानोग्राफ़ी एवं योजना आयोग): “NEVER-SAY-DIE..” — एक पोल-वॉल्ट खिलाड़ी ‘CENTRALISED PLANNING’ नामक बाँस लेकर दौड़ रहा है और ‘VILLAGE REALITY’ नामक ऊँचे बार को पार करने की कोशिश कर रहा है। केंद्रीकृत नियोजन और गाँव की हक़ीक़त के फ़ासले पर तीखा व्यंग्य।
- चित्र (पृ. 50): प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप (THE FIRST FIVE YEAR PLAN, Planning Commission)।
- चित्र (पृ. 51): दसवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज़ (2002–2007)।
8. प्रथम पंचवर्षीय योजना (पृ. 51)★★
- ★अवधि: 1951–1956. कोशिश: देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की।
- ★योजना को तैयार करने में जुटे विशेषज्ञों में एक के.एन. राज थे। इस युवा अर्थशास्त्री की दलील थी कि अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा।
- ★ज़ोर कृषि-क्षेत्र पर था। इसी योजना के अंतर्गत बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया। विभाजन के कारण कृषि-क्षेत्र को गहरी मार लगी थी और इस क्षेत्र पर तुरंत ध्यान देना ज़रूरी था।
- भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आबंटित की गई।
- ★भूमि-सुधार: योजना में माना गया कि देश में भूमि के वितरण का जो ढर्रा मौजूद है उससे कृषि के विकास को सबसे बड़ी बाधा पहुँचती है। इसलिए भूमि-सुधार पर ज़ोर दिया गया और उसे देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया।
8.1 बचत की समस्या (पृ. 51)
- योजनाकारों का बुनियादी लक्ष्य: राष्ट्रीय आय के स्तर को ऊँचा करना। यह तभी संभव था जब लोगों की बचत उनके खर्चे से ज्यादा हो।
- 1950 के दशक में खर्च का स्तर भी बहुत नीचे था — इसे और कम नहीं किया जा सकता था। योजनाकारों ने बचत को बढ़ावा देने की कोशिश की, पर यह भी कठिन था क्योंकि रोज़गार के काबिल जितने लोग थे उनकी तुलना में देश का मौजूदा पूँजी-भंडार कम था।
- ★“नियोजन की प्रक्रिया में लोगों की बचत तीसरी पंचवर्षीय योजना तक बढ़ी। लेकिन, यह बचत उम्मीद के अनुरूप नहीं थी… बाद के दिनों में यानी 1960 के दशक से लेकर 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक बचत की मात्रा में लगातार कमी आई।”
9. औद्योगीकरण की तेज़ रफ़्तार — दूसरी योजना (पृ. 51–52)★★
- ★दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर ज़ोर दिया गया।
- ★पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक टोली ने यह योजना तैयार की थी।
- ★तुलना: “पहली योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी।”
- संरक्षण की नीति: सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया। इससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली।
- चूँकि इस अवधि में बचत और निवेश दोनों ही बढ़ रहे थे, इसलिए बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार जैसे उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किया जा सका।
- ★“औद्योगीकरण पर दिए गए इस ज़ोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया।”
9.1 समस्याएँ भी थीं (पृ. 51–52)★
- भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज से पिछड़ा हुआ था और विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में उसे अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी।
- उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज्यादा आकर्षित किया — ऐसे में खाद्यान्न-संकट की आशंका अलग से सता रही थी।
- “भारत के योजनाकारों को उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई।”
- तीसरी पंचवर्षीय योजना दूसरी योजना से कुछ खास अलग नहीं थी।
9.2 आलोचनाएँ (पृ. 52)★
- आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि इस समय से योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी होती नज़र आती है।
- कुछ अन्य लोगों का मानना था कि कृषि की जगह उद्योग को प्राथमिकता देकर गलती की गई।
- कुछ ऐसे भी लोग थे जो चाहते थे कि भारी उद्योगों की जगह कृषि-आधारित उद्योगों पर ज़ोर दिया जाए।
9.3 आबंटन का तुलनात्मक आँकड़ा (स्तंभ-चित्र, पृ. 52)★★
शीर्षक: पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना में आबंटन (प्रतिशत में)
| विकास का मद | पहली योजना | दूसरी योजना |
|---|---|---|
| कृषि और सामुदायिक विकास | 15.1 | 11.8 |
| सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण | 17 | 10.1 |
| उद्योग और खनन | 7.6 | 18.5 |
| परिवहन और संचार | 23.6 | 28.9 |
| ऊर्जा | 11.1 | 8.9 |
| सामाजिक सेवाएँ (शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि) | 22.6 | 19.7 |
| अन्य | 3 | 2.1 |
★यह तालिका पूरे अध्याय का सबसे अच्छा प्रमाण है। प्राथमिकता का पलटाव साफ़ दिखता है — कृषि 15.1 → 11.8, सिंचाई 17 → 10.1, जबकि उद्योग और खनन 7.6 → 18.5 (लगभग ढाई गुना)। यही “कृषि से उद्योग की ओर” वाला मोड़ है, आँकड़ों में।
जीवनी — पी.सी. महालनोबिस (1893–1972), पृ. 51
अंतरराष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद; ★भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) के संस्थापक; ★दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार; तीव्र औद्योगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक।
10. विकेंद्रित नियोजन — ‘केरल मॉडल’ (बॉक्स, पृ. 52)★
- “ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो। ऐसा भी नहीं है कि नियोजन का मतलब हमेशा उद्योगों और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से ही लगाया जाए।”
- केरल में विकास और नियोजन के लिए जो रास्ता चुना गया उसे ‘केरल मॉडल’ कहा जाता है।
- इस मॉडल में ज़ोर: शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन पर।
- ★विरोधाभास: केरल में प्रति व्यक्ति आय अपेक्षाकृत कम है और औद्योगिक-आधार भी तुलनात्मक रूप से
कमज़ोर रहा है — इसके बावजूद:
- साक्षरता शत-प्रतिशत है;
- आयु प्रत्याशा बढ़ी है;
- शिशु मृत्यु-दर, मातृ मृत्यु-दर और जन्म-दर कम हैं;
- लोगों को कहीं ज्यादा चिकित्सा-सुविधा मुहैया है।
- ★1987 से 1991 के बीच सरकार ने ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ नाम से अभियान चलाया। इसके अंतर्गत विकास के अभियान चले — जिसमें विज्ञान और पर्यावरण के मामले में शत-प्रतिशत साक्षरता का अभियान शामिल है।
- इन अभियानों की रूपरेखा इस तरह बनाई गई थी कि लोगों को स्वयंसेवी नागरिक संगठनों के माध्यम से विकास की गतिविधियों में सीधे शामिल किया जा सके।
- केरल में यह प्रयास भी किए गए कि लोग पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं को तैयार करने में शामिल हों।
जीवनी — जे.सी. कुमारप्पा (1892–1960), पृ. 52
★असली नाम जे.सी. कॉर्नेलियस; अर्थशास्त्री एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट; इंग्लैंड एवं अमेरिका में शिक्षा; महात्मा गाँधी के अनुयायी; गाँधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश; ★‘इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस’ के लेखक; योजना आयोग के सदस्य के रूप में योजना प्रक्रिया में हिस्सेदारी।
सारांश (पाठ्यपुस्तक में मुद्रित नहीं)
इस अध्याय में भी कोई मुद्रित ‘सारांश’ खंड नहीं है और कोई उत्तर-कुंजी नहीं दी गई है।
| कड़ी | सार |
|---|---|
| मूल दावा | विकास तकनीकी नहीं, राजनीतिक सवाल है — अंतिम निर्णय जन-प्रतिनिधि का |
| उदाहरण | उड़ीसा/पोस्को — राज्य सरकार, आदिवासी, पर्यावरणविद, केंद्र — चार टकराते हित |
| सहमति | विकास = संवृद्धि + सामाजिक न्याय; सरकार की प्रमुख भूमिका |
| मतभेद | केंद्रीय नियोजन? सरकारी उद्योग? न्याय बनाम संवृद्धि? |
| दो मॉडल | उदारवादी-पूँजीवादी बनाम समाजवादी — भारत सोवियत मॉडल से प्रभावित पर उसकी नकल नहीं |
| संस्था | योजना आयोग, मार्च 1950, प्रस्ताव से — संविधान से नहीं; सलाहकार; PM अध्यक्ष |
| आम सहमति का प्रमाण | ★बॉम्बे प्लान, 1944 — उद्योगपति भी नियोजन चाहते थे |
| पहली योजना (1951–56) | कृषि, सिंचाई, बाँध, भूमि-सुधार; के.एन. राज — ‘धीमी’ चाल |
| दूसरी योजना (1956) | भारी उद्योग; महालनोबिस; आयात-शुल्क से संरक्षण |
| आँकड़ों में मोड़ | कृषि 15.1→11.8; उद्योग 7.6→18.5 |
| विकल्प | केरल मॉडल — विकेंद्रित, मानव-विकास केंद्रित |
| आगे | नीति आयोग, 1 जनवरी 2015 |
1. ‘बॉम्बे प्लान’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-सा बयान सही नहीं है। (क) यह भारत के आर्थिक भविष्य का एक ब्लू-प्रिंट था। (ख) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था। (ग) इसकी रचना कुछ अग्रणी उद्योगपतियों ने की थी। (घ) इसमें नियोजन के विचार का पुरज़ोर समर्थन किया गया था।
2. भारत ने शुरुआती दौर में विकास की जो नीति अपनाई उसमें निम्नलिखित में से कौन-सा विचार शामिल नहीं था? (क) नियोजन (ख) उदारीकरण (ग) सहकारी खेती (घ) आत्मनिर्भरता
3. भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का विचार-ग्रहण किया गया था: (क) बॉम्बे प्लान से (ख) सोवियत खेमे के देशों के अनुभवों से (ग) समाज के बारे में गाँधीवादी विचार से (घ) किसान संगठनों की माँगों से विकल्प: (क) सिर्फ़ ख और घ (ख) सिर्फ़ क और ख (ग) सिर्फ़ घ और ग (घ) उपर्युक्त सभी
4. निम्नलिखित का मेल करें:
| (क) | चरण सिंह | (i) | औद्योगीकरण |
| (ख) | पी.सी. महालनोबिस | (ii) | जोनिंग |
| (ग) | बिहार का अकाल | (iii) | किसान |
| (घ) | वर्गीज़ कूरियन | (iv) | सहकारी डेयरी |
! इस प्रश्न के तीन पद अध्याय के पाठ में नहीं आते। देखिए
10-Verification-Log.md§2.1.
5. आज़ादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद क्या थे? क्या इन मतभेदों को सुलझा लिया गया?
6. पहली पंचवर्षीय योजना का किस चीज़ पर सबसे ज्यादा ज़ोर था? दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली से किन अर्थों में अलग थी?
7. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें: “आज़ादी के बाद के आरंभिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी के भीतर दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ पनपीं। एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी कार्यकारिणी ने राज्य के स्वामित्व का समाजवादी सिद्धांत अपनाया, उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों के संकेंद्रण को रोकने के लिए अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का नियंत्रण और नियमन किया। दूसरी तरफ कांग्रेस की राष्ट्रीय सरकार ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ अपनाईं और उसके बढ़ावे के लिए विशेष कदम उठाए। इसे उत्पादन में अधिकतम वृद्धि की अकेली कसौटी पर जायज़ ठहराया गया।” — फ्रैंकिन फ्रैंकल (क) यहाँ लेखक किस अंतर्विरोध की चर्चा कर रहा है? ऐसे अंतर्विरोध के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे? (ख) अगर लेखक की बात सही है तो फिर बताएँ कि कांग्रेस इस नीति पर क्यों चल रही थी? क्या इसका संबंध विपक्षी दलों की प्रकृति से था? (ग) क्या कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और इसके प्रांतीय नेताओं के बीच भी कोई अंतर्विरोध था?
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शब्दावली
| पद | अंग्रेज़ी | अध्याय में प्रयुक्त अर्थ |
|---|---|---|
| नियोजन | Planning | सरकार द्वारा विकास का खाका अथवा योजना तैयार करना |
| योजना आयोग | Planning Commission | मार्च 1950 में सरकार के प्रस्ताव से बनी सलाहकार संस्था; संविधान द्वारा स्थापित नहीं |
| नीति आयोग | NITI Aayog | राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था; योजना आयोग के स्थान पर, 1 जनवरी 2015 |
| पंचवर्षीय योजना | Five Year Plan | अगले पाँच सालों की आमदनी और खर्च की योजना |
| गैरयोजना-व्यय | Non-plan expenditure | सालाना आधार पर दैनंदिन मदों पर खर्च |
| योजना-व्यय | Plan expenditure | योजना की प्राथमिकताओं के अनुसार पाँच साल में खर्च |
| बॉम्बे प्लान | Bombay Plan | 1944 में उद्योगपतियों के एक तबके द्वारा तैयार नियोजित अर्थव्यवस्था का संयुक्त प्रस्ताव |
| वामपंथ | Left | अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में; मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन को प्राथमिकता |
| दक्षिणपंथ | Right | खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था; सरकार का गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं |
| उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल | Liberal-capitalist model | यूरोप और अमरीका का विकास-मॉडल |
| समाजवादी मॉडल | Socialist model | सोवियत संघ का विकास-मॉडल |
| आधुनिकीकरण | Modernisation | संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था |
| भूमि-सुधार | Land reforms | प्रथम योजना में देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया |
| सार्वजनिक क्षेत्र | Public sector | बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी, संचार — दूसरी योजना में इसी में विकसित |
| केरल मॉडल | Kerala model | विकेंद्रित नियोजन — शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, खाद्य-वितरण, गरीबी-उन्मूलन पर ज़ोर |
| नव लोकतांत्रिक पहल | New Democratic Initiative | केरल में 1987–1991 के बीच चला अभियान |
| इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस | Economy of Permanence | जे.सी. कुमारप्पा की पुस्तक |
मुख्य आँकड़े और तिथियाँ
| मान | संदर्भ | पृ. |
|---|---|---|
| 1944 | बॉम्बे प्लान | 49 |
| मार्च 1950 | योजना आयोग की स्थापना (सरकार के प्रस्ताव से) | 48 |
| 1951 | प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप; नवंबर 1951 में वास्तविक दस्तावेज़ | 50 |
| 1951–1956 | प्रथम पंचवर्षीय योजना | 51 |
| Rs 2,069 करोड़ | प्रथम योजना का परिव्यय (समाचारपत्र-शीर्षक) | 49 |
| 1956 | दूसरी पंचवर्षीय योजना | 50 |
| 1961 | तीसरी पंचवर्षीय योजना | 50 |
| 1966 | चौथी योजना चालू होनी थी — स्थगित, आर्थिक संकट | 50 |
| 15.1 → 11.8 | कृषि और सामुदायिक विकास — पहली → दूसरी योजना | 52 |
| 17 → 10.1 | सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण | 52 |
| 7.6 → 18.5 | उद्योग और खनन | 52 |
| 23.6 → 28.9 | परिवहन और संचार | 52 |
| 11.1 → 8.9 | ऊर्जा | 52 |
| 22.6 → 19.7 | सामाजिक सेवाएँ | 52 |
| 1931 | भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना (महालनोबिस) | 51 |
| 1987–1991 | केरल का ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ अभियान | 52 |
| 2002–2007 | दसवीं पंचवर्षीय योजना (चित्र) | 51 |
| 1 जनवरी 2015 | नीति आयोग अस्तित्व में आया | 48 |
| 23 जून 2006 | पोस्को समाचार की तिथि (‘द हिंदू’) | 45 |
भ्रमित करने वाले युग्म
| युग्म | भेद |
|---|---|
| योजना आयोग बनाम नीति आयोग | योजना आयोग मार्च 1950, प्रस्ताव से; नीति आयोग 1 जनवरी 2015 |
| योजना आयोग — संवैधानिक निकाय? | ★नहीं — “संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों की तरह नहीं”; सलाहकार भूमिका |
| गैरयोजना-व्यय बनाम योजना-व्यय | पहला सालाना, दैनंदिन; दूसरा पाँच साल, प्राथमिकताओं के अनुसार |
| पहली बनाम दूसरी योजना | पहली — कृषि, सिंचाई, धीरज (के.एन. राज); दूसरी — भारी उद्योग, तेज़ गति (महालनोबिस) |
| के.एन. राज बनाम पी.सी. महालनोबिस | राज — पहली योजना, ‘धीमी चाल’; महालनोबिस — दूसरी योजना, तीव्र औद्योगीकरण |
| बॉम्बे प्लान किसने बनाया | ★उद्योगपतियों ने — सरकार या वामपंथियों ने नहीं। यही इसका चौंकाने वाला पक्ष है |
| वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ | वाम = राज्य नियंत्रण; दक्षिण = बाज़ार और खुली प्रतिस्पर्धा |
| कृषि 15.1 बनाम उद्योग 18.5 | 15.1 पहली योजना में कृषि; 18.5 दूसरी योजना में उद्योग — मत गड्डमड्ड कीजिए |
| केरल मॉडल का विरोधाभास | प्रति व्यक्ति आय कम और औद्योगिक आधार कमज़ोर, फिर भी शत-प्रतिशत साक्षरता और बेहतर स्वास्थ्य-सूचकांक |
| जे.सी. कुमारप्पा का असली नाम | जे.सी. कॉर्नेलियस |
| महालनोबिस — संस्था और वर्ष | भारतीय सांख्यिकी संस्थान, 1931 |
| चौथी योजना | 1966 में चालू होनी थी, पर स्थगित — शुरू नहीं हुई |