स्रोत:
lhps208.pdf· 23 पृष्ठ · पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 136–156 (+ 2 पृष्ठ पश्च-सामग्री) QR कोड:12122CH09— ! यह मूल रूप से अध्याय 9 था पुनर्मुद्रण: हर पृष्ठ पर “Reprint 2026-27”!! यह पुस्तक का अंतिम अध्याय है और सबसे अधिक अद्यतन अध्याय भी। पाठ 9 नवम्बर 2019 के अयोध्या निर्णय, 2019 के लोकसभा चुनाव और 17वीं लोकसभा तक जाता है।
पृष्ठ 136(p01) — आवरण-पृष्ठ
🖼 मुख्य कार्टून — ‘INDIAN POLITY’ की ऊँची चरखीध्यान
एक रोलर-कोस्टर (ऊँची चरखी) है जिस पर ‘INDIAN POLITY’ लिखा है। उस पर नौ नेता सवार हैं — राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह, एल.के. आडवाणी, चंद्रशेखर, ज्योति बसु, एन.टी. रामाराव, देवीलाल, पी.के. महंत और के. करुणानिधि।
उनके हाथों में तख्तियाँ हैं — VENDETTA EXPRESS · V.P. HATAO! · ???? · MANDAL · RATH YATRA · SADBHAVANA YATRA · ZINDABAD · VIVA MANDAL। नीचे आग की लपटें हैं जिन पर लिखा है — PRICES और RESERVATION।
काला बॉक्स (हाशिये पर): “1990 के दशक में विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़ी अफ़रा-तफ़री मची। इस कार्टून की ही तरह कइयों को यह सब ऊँची चरखी की सवारी जैसा जान पड़ा।”
★शिक्षण-सुझाव: कक्षा की शुरुआत यहीं से कीजिए। नौ चेहरे पहचनवाइए — इनमें से चार अलग-अलग गठबंधनों के मुखिया रहे। यह कार्टून पूरे अध्याय का नक़्शा है।
📦 ‘इस अध्याय में…’ — चार प्रश्न
“इस अध्याय में हम पिछले दो दशकों की भारतीय राजनीति का एक संक्षिप्त जायज़ा लेंगे। इस अवधि में कुछ जटिल किस्म के बदलाव आए… राजनीति के इस नए दौर का पूर्वानुमान कर पाना असंभव था और अब भी इसे समझना बहुत कठिन है।”
- गठबंधन की राजनीति के उदय का हमारे लोकतंत्र पर क्या असर पड़ा है?
- मंडलीकरण क्या है? इसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्वभाव को किन रूपों में बदला है?
- राम जन्मभूमि आंदोलन ने क्या विरासत छोड़ी है?
- नीतिगत मामलों पर एक सर्व-सहमति सी बन गई है — इसका राजनीतिक विकल्पों के चयन के लिहाज़ से क्या असर हुआ है?
★★और फिर एक असाधारण स्वीकारोक्ति: “यह अध्याय इन सवालों के जवाब नहीं देता।… ये सवाल राजनीतिक लिहाज़ से संवेदनशील हैं, लेकिन मात्र इसी कारण से हम इन सवालों को पूछने से बच नहीं सकते। आज़ादी के बाद की भारतीय राजनीति के इतिहास को आखिर पढ़ने का मकसद ही यही है कि हम अपने वर्तमान को समझ सकें।”
पृष्ठ 137(p02) — 1990 का दशक : पाँच बड़े बदलाव
शीर्षक: अध्याय 8 — भारतीय राजनीति : नए बदलाव · QR: 12122CH09
उपशीर्षक: ‘1990 का दशक’
पिछले अध्याय की कड़ी: इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने; कुछ ही दिनों बाद 1984 में लोकसभा चुनाव हुए और कांग्रेस को भारी विजय मिली।
★“1980 के दशक के आखिर के सालों में देश में ऐसे पाँच बड़े बदलाव आए, जिनका हमारी आगे की राजनीति पर गहरा असर पड़ा।”
बदलाव 1 — 1989 में कांग्रेस की हार
- 1984 में 415 सीटें → 1989 में महज 197 सीटें
- 1991 में मध्यावधि चुनाव; कांग्रेस आँकड़ा सुधारते हुए सत्ता में आई
- ★★“1989 में ही उस परिघटना की समाप्ति हो गई थी, जिसे राजनीति विज्ञानी अपनी खास शब्दावली में ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहते हैं।”
- संतुलन: कांग्रेस महत्त्वपूर्ण पार्टी बनी रही और 1989 के बाद भी उसका शासन किसी अन्य पार्टी से ज़्यादा दिनों तक रहा — “लेकिन, दलीय प्रणाली के भीतर जैसी प्रमुखता इसे पहले के दिनों में हासिल थी, वैसी अब न रही।”
🖼 अमूल कार्टून 1ध्यान
“Cong-Less Government! — Amul — The Majority Vote” कैप्शन: कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।
बदलाव 2 — ‘मंडल मुद्दे’ का उदय
- 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नयी सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया
- प्रावधान: केंद्र सरकार की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को आरक्षण
- देश के विभिन्न भागों में मंडल-विरोधी हिंसक प्रदर्शन
- ★“‘मंडल मुद्दा’ … इसने 1989 के बाद की राजनीति में अहम भूमिका निभाई।”
बदलाव 3 — आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव
- ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम अथवा नए आर्थिक सुधार (अगले पृष्ठ पर जारी)
हाशिये का गुब्बारा: “मैं सोचती हूँ — काश! कांग्रेस अपनी पुरानी महिमा को फिर से हासिल कर पाती!”
पृष्ठ 138(p03) — आर्थिक सुधार और अयोध्या का आरंभ
🖼 अमूल कार्टून 2ध्यान
“Caste no bar · Class no bar · Amul bar bar — Amul Butter: Every Mandal’s Choice” कैप्शन: मंडलीकरण पर एक प्रतिक्रिया
बदलाव 3(जारी) — नए आर्थिक सुधार
- “इनकी शुरुआत राजीव गाँधी की सरकार के समय हुई और 1991 तक ये बदलाव बड़े पैमाने पर प्रकट हुए।”
- ★“आज़ादी के बाद से अब तक भारतीय अर्थव्यवस्था जिस दिशा में चलती आई थी, वह इन नए आर्थिक सुधारों के कारण मूलगामी अर्थों में बदल गई।”
- नयी आर्थिक नीतियों की विभिन्न आंदोलनों और संगठनों की तरफ़ से भरपूर आलोचना हुई
- ★★“बहरहाल इस अवधि में जितनी सरकारें बनीं, सबने नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा।” (यह वाक्य आगे ‘बढ़ती सहमति’ वाले खंड की नींव है)
बदलाव 4 — अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का विवाद
- “अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर पर शताब्दियों से चले आ रहे विधिक एवं राजनीतिक विवाद ने भारत की राजनीति को प्रभावित करना आरम्भ किया जिसने अनेक राजनीतिक परिवर्तनों को जन्म दिया।” (अगले पृष्ठ पर)
🖼 आर.के. लक्ष्मण का कार्टून(साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)ध्यान
बोर्ड पर लिखा है “नई अर्थव्यवस्था का निर्माण कार्य प्रगति पर”। सीढ़ी के डंडों पर लिखा है — IMF · WB ORDERS · FOREIGN CAPITAL · NRI · LOAN। एक व्यक्ति कह रहा है: “जोखिम और परेशानी भरा काम! हाँ, सो तो है! लेकिन एक बार हम वहाँ तक पहुँच गए तो फिर सारी चिंताएँ खत्म! ज़रा यह भी तो सोचो!” सामने बोर्ड है — “खुशहाली की इस नगरी में आपका स्वागत है!” कैप्शन: तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को ‘नयी आर्थिक नीति’ के शुरुआती दौर में दिखाता एक कार्टून।
पृष्ठ 139(p04) — अयोध्या का समाधान और बदलाव 5★★
सबसे महत्वपूर्ण अद्यतन वाक्य★★
“इन परिवर्तनों की परिणति सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के निर्णय (जिसकी घोषणा 9 नवम्बर, 2019) के उपरांत अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के रूप में हुई।”
! शिक्षक ध्यान दें: पाठ्यपुस्तक अयोध्या-प्रकरण को समाधान तक ले जाती है। पुराने संस्करण यहाँ रुक जाते थे। पुरानी गाइड इस अध्याय के लिए भी भ्रामक होंगी।
बदलाव 5 — राजीव गाँधी की हत्या
- मई 1991 में राजीव गाँधी की हत्या; कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में परिवर्तन
- वे चुनाव अभियान के सिलसिले में तमिलनाडु के दौरे पर थे
- लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों ने उनकी हत्या की
- 1991 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी विजयी पार्टी
- कांग्रेस पार्टी ने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री चुना
🖼 विज्ञापनध्यान
“Ishwar, Allah, Tero Naam / Sabko Sanmati de Bhagwan” — कैप्शन: समरसता का संदेश देता एक विज्ञापन
🖼 चार पत्रिका-आवरणध्यान
| आवरण | तिथि |
|---|---|
| Outlook — “SHOULD HE BE SMILING?” | 25 अक्तूबर 1995 |
| Outlook — “CAMPAIGN ‘96” | 1 मई 1996 |
| India Today — “MISSING A LEADER” | 20 अगस्त 2001 |
| India Today — “MANMOHAN’S MINISTERS: The BEST and the WORST” | 25 अक्तूबर 2004 |
कैप्शन: कांग्रेस नेतृत्व कई बार सुर्खियों में छाया रहा
पृष्ठ 140(p05) — गठबंधन का युग
1989 का विशिष्ट अंकगणित★
- कांग्रेस हारी, पर किसी दूसरी पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला
- कांग्रेस अब भी सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत न होने के कारण उसने विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया
- राष्ट्रीय मोर्चा = जनता दल + कुछ अन्य क्षेत्रीय दल
- ★★इसे परस्पर विरुद्ध दो राजनीतिक समूहों — भाजपा और वाम मोर्चे — ने समर्थन दिया
- “इस समर्थन के आधार पर राष्ट्रीय मोर्चे ने एक गठबंधन सरकार बनायी, लेकिन इसमें भाजपा और वाम मोर्चे ने शिरकत नहीं की।”
★शिक्षण-बिंदु: यह बाहर से समर्थन (outside support) का पहला बड़ा उदाहरण है — सत्ता में हिस्सेदारी नहीं, पर सरकार टिकाने की ज़िम्मेदारी।
🖼 कार्टून(साभार: सुधीर तैलंग / एच.टी. बुक ऑफ कार्टून्स)ध्यान
ज्योति बसु और एल.के. आडवाणी एक विशाल पिंजरेनुमा ढाँचे के दोनों सिरों पर बैठे हैं; बीच में वी.पी. सिंह झूल रहे हैं। कैप्शन का हिस्सा: “ये दोनों कह रहे हैं कि हम सरकार को बाहर से समर्थन देंगे।” पूरा कैप्शन: वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को वाम मोर्चा (यहाँ प्रतीक रूप में ज्योति बसु) और भाजपा (यहाँ प्रतीक रूप में एल.के. आडवाणी) ने समर्थन दिया था।
उपशीर्षक: ‘कांग्रेस का पतन’
- कांग्रेस की हार के साथ भारत की दलीय व्यवस्था से उसका दबदबा खत्म हो गया
- 🔗 क्रॉस-रेफ़रेंस: “अध्याय पाँच में कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना की चर्चा की गई थी।” ✓ वैध
- 1960 के दशक के अंतिम सालों में चुनौती → इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रभुत्व फिर कायम किया → नब्बे के दशक में अग्रणी हैसियत को एक बार फिर चुनौती
- ! “बहरहाल इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस की जगह कोई दूसरी पार्टी प्रमुख हो गई।”
पृष्ठ 141(p06) — बहुदलीय युग और गठबंधन की राजनीति
1989 के बाद की नयी बात★★
“1989 के बाद से लोकसभा के चुनावों में कभी भी किसी एक पार्टी को 2014 तक पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बदलाव के साथ केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। यद्यपि, पुनः 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनावों में भा.ज.पा. दल को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ है।”
★★यह वाक्य पूरे अध्याय की धुरी है — इसे शब्दशः बोर्ड पर लिखवाइए।
📦 ‘करके देखें’ बॉक्स
“अपने माता-पिता से 1990 के दशक के बाद से हुई घटनाओं के बारे में पूछें और इस समय की उनकी यादों को कुरेदें। … समूह बनाकर एक साथ बैठिए और अपने माता-पिता द्वारा बतायी गई घटनाओं की एक व्यापक सूची बनाइए। देखिए कि किस घटना का ज़िक्र ज्यादा आया है। फिर, इस अध्याय में जिन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बदलावों का ज़िक्र आया है उनसे तुलना कीजिए। आप इस बात पर चर्चा कर सकते हैं कि कुछ घटनाएँ क्यों कुछ लोगों के लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण थीं, जबकि दूसरों के लिए नहीं।”
★यह अध्याय का सबसे अच्छा गृहकार्य है — कक्षा में अवश्य कराइए।
उपशीर्षक: ‘गठबंधन की राजनीति’
- नब्बे का दशक कुछ ताकतवर पार्टियों और आंदोलनों के उभार का साक्षी रहा
- इन्होंने दलित तथा पिछड़े वर्ग (OBC) की नुमाइंदगी की; अनेक ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं की भी दावेदारी की
- 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार — राष्ट्रीय मोर्चा (1989) के ही समान, क्योंकि इसमें भी जनता दल और कई क्षेत्रीय पार्टियाँ शामिल थीं
1989 बनाम 1996 — ‘छुईमुई’ समीकरण★★
| 1989 | 1996 | |
|---|---|---|
| सरकार | राष्ट्रीय मोर्चा | संयुक्त मोर्चा |
| समर्थन | भाजपा + वाम मोर्चा | कांग्रेस + वाम मोर्चा |
| उद्देश्य | कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना | भाजपा को सत्ता से बाहर रखना |
★“इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।”
भाजपा का उभार
- 1991 तथा 1996 के चुनावों में स्थिति लगातार मज़बूत की
- 1996 में सबसे बड़ी पार्टी; सरकार बनाने का न्यौता मिला
- ! लेकिन अधिकांश दल भाजपा की नीतियों के खिलाफ़ थे — लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी
- आखिरकार भाजपा ने एक गठबंधन बनाया — राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग / NDA)
पृष्ठ 142(p07) — राजग और ‘11 सरकारें’
राजग की दो सरकारें
- मई 1998 से जून 1999 तक सत्ता में
- अक्तूबर 1999 में दोबारा सत्ता हासिल
- दोनों में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री
- ★“1999 की राजग सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया।”
🖼 कार्टून(साभार: अजित नैनन / इंडिया टुडे)ध्यान
बाईं ओर ‘1971’ — अकेली इंदिरा गाँधी। दाईं ओर ‘1999’ — एक के ऊपर एक चढ़े हुए दस-बारह नेता। बीच में लिखा है:
“1999 — वक्त-वक्त की बात: ‘ज़्यादा दिन नहीं हुए, बस चंद सालों पहले वह भी एक वक्त था जब राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से होती थी और उसका खात्मा भी कांग्रेस पर होता था…’”
कैप्शन: एक पार्टी के प्रभुत्व के दौर से लेकर बहुदलीय गठबंधन प्रणाली तक के सफ़र पर एक कार्टूनिस्ट की नज़र
‘11 सरकारें’ वाला अनुच्छेद★★
“इस तरह 1989 के चुनावों से भारत में गठबंधन की राजनीति के एक लंबे दौर की शुरुआत हुई। इसके बाद से केंद्र में 11 सरकारें बनीं। ये सभी या तो गठबंधन की सरकारें थीं अथवा दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें थीं जो इन सरकारों में शामिल नहीं हुए।”
“इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी।”
यह किन-किन पर लागू होता है: 1989 राष्ट्रीय मोर्चा · 1996 और 1997 संयुक्त मोर्चा · 1998 और 1999 राजग · 2004 और 2009 संप्रग ! “हालांकि, 2014 में यह प्रवृत्ति बदल गयी है।”
समापन-विचार
“माना जा सकता है कि गठबंधन सरकारों का युग लंबे समय से जारी कुछ प्रवृत्तियों की परिणति है। पिछले कुछ दशकों से भारतीय समाज में गुपचुप बदलाव आ रहे थे और इन बदलावों ने जिन प्रवृत्तियों को जन्म दिया, वे भारतीय राजनीति को गठबंधन की सरकारों के युग की तरफ़ ले आयीं।”
पृष्ठ 143(p08) — ‘केंद्रीय सरकार 1989 के बाद’(परीक्षा की सबसे बड़ी सारणी)★★★
| अवधि | गठबंधन / सरकार में शामिल दल | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|
| दिसंबर 1989 – नवंबर 1990 | राष्ट्रीय मोर्चा; वाम मोर्चा और भाजपा का समर्थन | वी.पी. सिंह |
| नवंबर 1990 – जून 1991 | राष्ट्रीय मोर्चा का एक तबका समाजवादी जनता पार्टी के नेतृत्व में; कांग्रेस का समर्थन | चंद्रशेखर |
| जून 1991 – मई 1996 | कांग्रेस; एआईएडीएमके तथा कुछ अन्य दलों का समर्थन | पी.वी. नरसिम्हा राव |
| मई 1996 – जून 1996 | भाजपा: अल्पमत सरकार | अटल बिहारी वाजपेयी |
| जून 1996 – अप्रैल 1997 | कांग्रेस के समर्थन पर संयुक्त मोर्चा की सरकार | एच.डी. देवगौड़ा |
| अप्रैल 1997 – मार्च 1998 | कांग्रेस के समर्थन पर संयुक्त मोर्चा की सरकार | इंद्रकुमार गुजराल |
| मार्च 1998 – अक्तूबर 1999 | भाजपा-नीत राजग गठबंधन | अटल बिहारी वाजपेयी |
| अक्तूबर 1999 – मई 2004 | भाजपा-नीत राजग गठबंधन | अटल बिहारी वाजपेयी |
| मई 2004 – मई 2014 | कांग्रेस-नीत संप्रग गठबंधन | मनमोहन सिंह |
| मई 2014 के बाद | भाजपा-नीत राजग गठबंधन | नरेंद्र मोदी |
पृष्ठ पर दी गई कड़ी: http://pmindia.gov.in/hi
पृष्ठ पर नोट: “यहाँ कुछ खाली स्थान छोड़ दिए गए हैं। इनमें आप किसी सरकार की मुख्य नीतियों, कामकाज और
उन पर उठे विवाद की कुछ सूचनाएँ लिख सकते हैं।”
★★यह सारणी हर विद्यार्थी की कॉपी में उतरनी चाहिए। इसी से ‘गठबंधन का युग’ समझ आता है।
पृष्ठ 144(p09) — अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिक उदय
🔗 तीन क्रॉस-रेफ़रेंस — तीनों वैध ✓
| पृष्ठ का वाक्य | लक्ष्य अध्याय | स्थिति |
|---|---|---|
| “दूसरे अध्याय में हमने पढ़ा था कि शुरुआती सालों में कांग्रेस खुद में ही एक गठबंधननुमा पार्टी थी… इस परिघटना को ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहा गया।” | अध्याय 2 | ✓ वैध |
| “पाँचवें अध्याय में… 1960 के दशक से विभिन्न समूह कांग्रेस पार्टी से अलग होने लगे… 1977 के बाद के सालों में कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।” | अध्याय 5 | ✓ वैध |
| “छठे अध्याय में हम यह देख चुके हैं कि पिछड़ी जातियों के अनेक तबके कांग्रेस से दूर जा रहे थे।” | अध्याय 6 | ✓ वैध |
★निष्कर्ष: पुस्तक 2 में शून्य अनाथ संदर्भ — यह प्रवृत्ति अध्याय 3 से 8 तक बनी रही।
🗨 दो गुब्बारे — कक्षा-चर्चा के बीजध्यान
पहला: “चलो मान लिया कि भारत जैसे देश में लोकतांत्रिक राजनीति का तकाज़ा ही गठबंधन बनाना है। लेकिन क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि हमारे देश में हमेशा से गठबंधन बनते चले आ रहे हैं? अथवा, राष्ट्रीय स्तर के दल एक बार फिर अपना बुलंद मुकाम हासिल करके दिखाएँगे?”
दूसरा: “मुझे इसकी चिंता नहीं है कि सरकार किसी एक पार्टी की है या गठबंधन की। मसला तो यह है कि कोई सरकार काम कौन-से कर रही है। क्या गठबंधन सरकार में ज्यादा समझौते करने पड़ते हैं? क्या गठबंधन सरकार साहसी और कल्पनाशील नीतियाँ नहीं अपना सकती?”
‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ — परिभाषा
- OBC = ‘अदर बैकवर्ड क्लासेज़’ — विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि
- ★यह अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति से अलग एक कोटि है, जिसमें शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना की जाती है
- इन्हें ‘पिछड़ा वर्ग’ भी कहा जाता है
राजनीतिक पृष्ठभूमि
- पिछड़ी जातियों के तबके कांग्रेस से दूर जा रहे थे → गैर-कांग्रेसी दलों के लिए जगह पैदा हुई
- ★“गैर-कांग्रेसी दलों के राजनीतिक अभ्युदय की अभिव्यक्ति 1977 की जनता पार्टी की सरकार के रूप में हुई।”
- जनता पार्टी के घटक — भारतीय क्रांतिदल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी — का ग्रामीण इलाकों के अन्य पिछड़े वर्ग में ताकतवर जनाधार था
पृष्ठ 145(p10) — ‘मंडल’ का लागू होना
- 1980 के दशक में OBC के बीच लोकप्रिय राजनीतिक समूहों को जनता दल ने एकजुट किया
- राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का फ़ैसला किया
- ★“इससे अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप देने में मदद मिली।”
- नौकरी में आरक्षण पर तीखे वाद-विवाद → “‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ अपनी पहचान को लेकर ज्यादा सजग हुआ”
- नयी पार्टियाँ आगे आयीं जिन्होंने रोज़गार और शिक्षा में बेहतर अवसर की माँग की
- ★★इन दलों का तर्क: “भारतीय समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा है। इसे देखते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग का शासन में समुचित प्रतिनिधित्व और सत्ता में समुचित मौजूदगी तय करना लोकतांत्रिक कदम होगा।”
🖼 समाचार-कतरनों का कोलाजध्यान
THE HINDUSTAN TIMES — “BJP withdraws support to NF Govt” · “Advani is arrested in Samastipur” · “VP tells President he won’t resign” · “Society … on caste lines” (M.K. Dhar) THE HINDU — “Buses burnt, trains stopped — Bandh brings life in Delhi to halt” अन्य — “Storm over additional quota”
कैप्शन: मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने पर राजनीतिक माहौल सरगर्म हो उठा। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए।
पृष्ठ 146(p11) — मंडल आयोग(पूरा बॉक्स)★★
पृष्ठभूमि
- दक्षिण के राज्यों में कम-से-कम 1960 के दशक से OBC आरक्षण चला आ रहा था
- ! “बहरहाल, यह नीति उत्तर भारत के राज्यों में लागू नहीं थी।”
- 1977–79 की जनता पार्टी की सरकार के समय उत्तर भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत आवाज़ उठी
- ★बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इस दिशा में अग्रणी थे; उनकी सरकार ने बिहार में ‘ओबीसी’ आरक्षण की एक नयी नीति लागू की
आयोग का गठन
- केंद्र सरकार ने 1978 में एक आयोग बैठाया
- ज़िम्मा: पिछड़ा वर्ग की स्थिति सुधारने के उपाय बताना
- ★“आज़ादी के बाद से यह दूसरा अवसर था, जब सरकार ने ऐसा आयोग नियुक्त किया। इसी कारण आधिकारिक रूप से इस आयोग को ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’ कहा गया।”
- अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर इसे ‘मंडल कमीशन’ कहा जाता है
📦 बी.पी. मंडल (1918–1982)
- 1967–1970 तथा 1977–1979 में बिहार से सांसद चुने गए
- दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्षता की
- इस आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफ़ारिश की
- बिहार के समाजवादी नेता
- ★1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे
- 1977 में जनता पार्टी में शामिल हुए
- (पृष्ठ पर ₹3.00 का डाक-टिकट भी दिखाया गया है)
आयोग का काम और सिफ़ारिशें
- गठन का उद्देश्य: शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना और पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताना
- ★आयोग ने 1980 में अपनी सिफ़ारिशें पेश कीं — “इस वक्त तक जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी”
- मशविरा: “पिछड़ा वर्ग को पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए, क्योंकि अनुसूचित जातियों से इतर ऐसी अनेक जातियाँ हैं, जिन्हें वर्ण व्यवस्था में ‘नीच’ समझा जाता है।”
- सर्वेक्षण: इन जातियों की शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी
- ★★सिफ़ारिश: शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित
- ★“मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए कई और समाधान सुझाए जिनमें भूमि-सुधार भी एक था।” (यह बात प्रायः भुला दी जाती है — परीक्षा में मूल्यवान)
लागू होना और न्यायालय
- 1990 के अगस्त में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने सिफ़ारिशों में से एक को लागू करने का फ़ैसला किया — केंद्रीय सरकार और उसके उपक्रमों की नौकरियों में OBC आरक्षण
- उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध
- सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती — प्रकरण ‘इंदिरा साहनी केस’ के नाम से प्रसिद्ध
- 1992 के नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय को सही ठहराते हुए फ़ैसला सुनाया
- ★★“बहरहाल अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मसले पर देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों में सहमति थी।” (यह ‘बढ़ती सहमति’ वाले खंड की दूसरी बात से सीधे जुड़ता है)
पृष्ठ 147(p12) — राजनीतिक परिणाम : दलित राजनीति
- 1980 के दशक में दलित जातियों के राजनीतिक संगठनों का भी उभार
- ★1978 में ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज़ कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन) का गठन
- ! “यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण-सा ट्रेड यूनियन नहीं था।”
- इसने ‘बहुजन’ — यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों — की राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त तरफ़दारी की
- परवर्ती विकास: ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ → इससे बहुजन समाज पार्टी का उदय
- अगुआई कांशीराम ने की
बसपा का उभार
- शुरुआती दौर में छोटी पार्टी; पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं का समर्थन
- ★1989 और 1991 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में सफलता
- ★★“आज़ाद भारत में यह पहला मौका था, जब कोई राजनीतिक दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता हासिल कर पाया था।”
बसपा का आधार
- कांशीराम के नेतृत्व में बसपा ने संगठन की बुनियाद व्यवहार केंद्रित नीतियों पर रखी
- तर्क: बहुजन देश की आबादी में सबसे ज्यादा हैं और संख्या के लिहाज़ से एक मजबूत राजनीतिक ताकत का रूप ले सकते हैं — “बसपा के आत्मविश्वास को इस तथ्य से बड़ा बल मिला था”
- बसपा उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत बनी और एक से ज्यादा दफे सरकार बनायी
- अब इसने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपना जनाधार बढ़ाना शुरू किया है
- ★“भारत के कई हिस्सों में दलित राजनीति और अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने स्वतंत्र रूप धारण किया है और इन दोनों के बीच अक्सर प्रतिस्पर्धा भी चलती है।”
📦 कांशीराम (1934–2006)
- बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक
- सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफ़ा
- बामसेफ → डीएस-4 → अंततः 1984 में बसपा की स्थापना
- कुशाग्र रणनीतिकार
- ★“आप राजनीतिक सत्ता को सामाजिक समानता का आधार मानते थे”
- उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति के संगठनकर्ता
🗨 दो गुब्बारेध्यान
पहला: “क्या इससे पिछड़े और दलित समुदायों के सभी नेताओं को लाभ होगा या इन समूहों के भीतर मौजूद कुछ ताकतवर जातियाँ और परिवार ही सारे फ़ायदे अपनी मुट्ठी में कर लेंगे?” दूसरा: “असल मुद्दा नेताओं का नहीं, जनता का है! क्या इस बदलाव से सचमुच के वंचितों के लिए बेहतर नीतियाँ बनेंगी और उन पर कारगर तरीके से अमल होगा या फिर यह सारा कुछ एक राजनीतिक खेल मात्र बनकर रह जाएगा?”
★ये दोनों गुब्बारे ‘क्रीमी लेयर’ की बहस को कक्षा में लाने का सबसे अच्छा रास्ता हैं।
पृष्ठ 148(p13) — सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र★★
!! यह अध्याय का सबसे अधिक पुनर्लिखित खंड है। शिक्षक इसे पूरा पढ़कर ही कक्षा में जाएँ।
भाजपा का उदय
- 🔗 “हमने छठे अध्याय में पढ़ा था कि आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी के साथ विलय हो गया था।” ✓ वैध क्रॉस-रेफ़रेंस
- जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद पूर्ववर्ती जनसंघ के समर्थकों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बनाई
- आरंभ में भाजपा ने जनसंघ की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक पटल अपनाया
- विचारधारा: गांधीवादी समाजवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- ! 1984 के चुनावों में भाजपा को बहुत सफलता नहीं मिली
- 1986 के बाद इस दल ने राष्ट्रवाद पर अपनी विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल देना प्रारम्भ किया
- “भाजपा ने राजनीतिक लामबन्दी के लिए हिन्दुत्व की राजनीति को भी अपनाया।”
‘हिन्दुत्व’ की परिभाषा — शब्दशः★
“हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया था। इसका मूल आशय यह था कि एक भारतीय होने के लिए आवश्यक है कि वह भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे। हिंदुत्व के विश्वासियों का तर्क है कि एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण एक संगठित राष्ट्रीय संस्कृति के आधार पर संभव है। वे यह भी मानते हैं कि भारत के सन्दर्भ में हिन्दुत्व, यह आधार प्रदान कर सकता है।”
1986 की दो घटनाएँ★
घटना 1 — शाहबानो वाद (1985)
- एक 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता के लिए वाद किया
- सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया
- पुरातन पंथी मुसलमानों ने इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना
- कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया
- ! “सरकार के इस कार्य का अनेक महिला संगठनों, अनेक मुस्लिम समूहों तथा अधिकांश बुद्धिजीवियों ने विरोध किया।”
- भाजपा ने इसे “अल्पसंख्यक समुदाय को दी गयी अनावश्यक छूट और उसका तुष्टिकरण” बताकर आलोचना की
घटना 2 — अयोध्या विषय(अगले पृष्ठ पर विस्तार)
- “देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था जिसमें विभिन्न हितधारकों के भिन्न दृष्टिकोण थे”
- श्री राम के जन्मस्थान, जो कि पवित्रतम धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है, के स्वामित्व से संबंधित विवाद
- ★“1528 से प्रारम्भ होकर 500 वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में अनेक संघर्ष लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित हैं।”
- “1528 में श्री राम के जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित किया गया, परन्तु ढाँचे के आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू…” (अगले पृष्ठ पर जारी)
📦 ‘क्या आप जानते हैं?’
“28 नवंबर 1858 की एक बहुत ही रोचक घटना है, जब निहंग सिखों ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा बलपूर्वक निकाले जाने से पहले, जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण कर लिया तथा पूजन और हवन किया।”
पृष्ठ 149(p14) — अयोध्या का विधिक समाधान★★
विवाद की समय-रेखा(पाठ्यपुस्तक के अनुसार)
- “ढाँचे के आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू प्रतीकों तथा अवशेषों को प्रत्यक्ष देखा जा सकता था। अतः अयोध्या राम जन्मभूमि विषय प्राचीन सभ्यता में राष्ट्रीय गौरव से जुड़ गया।”
- कालान्तर में यह एक लम्बे विधिक विवाद में परिणत हो गया
- ★न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ होने के कारण 1949 में ढाँचे को सील कर दिया गया
- ★1986 में फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के एक निर्णय से महत्वपूर्ण मोड़ — ढाँचे का ताला खोल दिया गया और लोगों को वहाँ पूजा की अनुमति दे दी गई
- यह विवाद अनेक दशकों से चल रहा था क्योंकि यह माना जाता था कि श्री राम के जन्मस्थान पर एक मन्दिर को ध्वस्त कर तीन-गुम्बद ढाँचा बनाया गया था
- मन्दिर का शिलान्यास हुआ किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा
- हिन्दू समुदाय ने इसे अपनी चिन्ताओं की उपेक्षा समझा; मुस्लिम समाज ढाँचे पर अधिकार के आश्वासन की माँग करता रहा
- स्वामित्व के अधिकार को लेकर तनाव बढ़ा → अनगिनत विवाद और विधिक संघर्ष
- ★“दोनों समुदाय दीर्घकाल से लम्बित इस विषय का समुचित समाधान चाहते थे।”
- ! “1992 में ढांचे के ध्वंस के बाद कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है।”
उपशीर्षक: ‘विधिक कार्यवाही से मैत्रीपूर्ण स्वीकृति’★★
“यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी समाज में विवाद होते ही हैं। परन्तु एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में इन विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है।”
- अनेक लोकतान्त्रिक और विधिक प्रक्रियाओं के ज़रिये — न्यायालय में सुनवाईयां, मध्यस्थता के प्रयास तथा जन आन्दोलन — अन्ततः
- ★★“9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5–0 के निर्णय के फलस्वरूप अयोध्या विवाद का समाधान हो गया।”
- “इस निर्णय ने इस विवाद से सम्बन्धित विभिन्न हित धारकों के विरोधाभासी हितों का सामंजस्यपूर्ण समाधान किया।”
निर्णय के दो आदेश
- श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को विवादित स्थल राम मन्दिर निर्माण के लिए आवंटित
- संबंधित सरकार को सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को एक मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटित करने का आदेश
पाठ्यपुस्तक का मूल्यांकन★
“इस प्रकार से हमारे जैसे विविधतापूर्ण समाज में लोकतन्त्र संविधान की समावेशी भावना के अनुरूप संघर्ष के समाधान का मार्ग खोलता है। यह विषय पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे साक्ष्यों के आधार पर विधि की उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सुलझाया गया। समाज में व्यापक रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उत्सवपूर्वक लिया गया। यह एक उदाहरण है जिसमें एक संवेदनशील विषय पर सर्वसम्मति का निर्माण किया गया, यह भारत के सभ्यतागत स्वभाव में निहित लोकतान्त्रिक प्रकृति की परिपक्वता को प्रदर्शित करता है।”
! शिक्षक-निर्देश: यह पाठ्यपुस्तक का अपना मूल्यांकन है। इसे पाठ्यपुस्तक के शब्दों में पढ़ाइए और अपनी राजनीतिक टिप्पणी न जोड़िए।
पृष्ठ 150(p15) — सर्वोच्च न्यायालय के अवतरण + पहला आरेख★★
अवतरण 1(निर्णय का पृष्ठ 920)
”…संविधान के हृदय में कानून के शासन द्वारा कायम और लागू की गई समानता के प्रति प्रतिबद्धता है। हमारे संविधान के तहत, दैवीय उत्पत्ति की तलाश करने वाले सभी धर्मों, विश्वासों और पंथों के नागरिक कानून के अधीन हैं और कानून के समक्ष समान हैं। इस न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को न केवल संविधान और उसके मूल्यों को बनाए रखने का काम सौंपा गया है, बल्कि उन्हें बनाए रखने की शपथ भी दिलाई गई है। संविधान एक धर्म और दूसरे धर्म की आस्था और विश्वास के बीच अंतर नहीं करता है। सभी प्रकार के विश्वास, पूजा और प्रार्थना समान हैं…”
अवतरण 2(निर्णय का पृष्ठ 1045)
“इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया है… कि मस्जिद के निर्माण से पहले और उसके बाद से हिंदुओं की आस्था और विश्वास हमेशा यही रहा है कि भगवान राम का जन्मस्थान ही वह स्थान है जहां बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया है, जो कि ऊपर चर्चा किये गये दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्यों से साबित होता है।”
दोनों का स्रोत-लिंक (पाठ्यपुस्तक में दिया गया):
https://main.sci.gov.in/supremecourt/2010/36350/36350_2010_1_1502_18205_Judgement_09-Nov-2019.pdf
★पहला अवतरण धर्मनिरपेक्षता की कक्षा के लिए सोने जैसा है। इसे बोर्ड पर लिखवाइए।
आरेख 1 — ‘कांग्रेस और भाजपा की चुनावी जीत-हार : बदलता परिदृश्य’(सीटें)★★★
| वर्ष | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|
| 1984 | 2 | 415 |
| 1989 | 85 | 197 |
| 1991 | 120 | 232 |
| 1996 | 160 | 140 |
| 1998 | 182 | 141 |
| 1999 | 182 | 114 |
| 2004 | 138 | 145 |
| 2009 | 116 | 206 |
| 2014 | 282 | 44 |
| 2019 | 303 | 52 |
★★यह पूरे अध्याय की सबसे शक्तिशाली सारणी है। 1984 में 2 बनाम 415; 2019 में 303 बनाम 52 — पैंतीस साल में पूरा पलटाव।
पृष्ठ 151(p16) — आरेख 2 और लोकसभा चुनाव 2004–2019
आरेख 2 — ‘वोट में हिस्सा’(प्रतिशत में वोट की हिस्सेदारी)★★
| वर्ष | कांग्रेस | भाजपा |
|---|---|---|
| 1984 | 48.1 | 7.4 |
| 1989 | 39.5 | 11.4 |
| 1991 | 36.4 | 20.1 |
| 1996 | 28.8 | 20.3 |
| 1998 | (अंकित नहीं — रेखा ~26 पर) | 25.6 |
| 1999 | 28.3 | 23.8 |
| 2004 | 26.5 | 22.2 |
| 2009 | 28.6 | 18.8 |
| 2014 | 19.5 | 31.3 |
| 2019 | 19.5 | 37.4 |
! ध्यान दें: 1998 पर दोनों रेखाएँ लगभग मिल जाती हैं और आरेख में वहाँ केवल एक अंक — 25.6 — छपा है, जो भाजपा की रेखा का शिखर है। कांग्रेस का 1998 वाला बिंदु आलेखित तो है, पर अंकित नहीं। ★कक्षा में यही सबसे रोचक बिंदु है — 1998 वह वर्ष है जब दोनों दलों का वोट-हिस्सा बराबर हो गया।
पाठ्यपुस्तक के तीन विश्लेषण-बिंदु
- “गौर कीजिए कि अधिकतर इस अवधि में भाजपा और कांग्रेस कठिन प्रतिस्पर्धा में लगे हुए थे। 1984 के चुनावों से तुलना करने पर आप इन पार्टियों की चुनावी सफलता में क्या अंतर पाते हैं?”
- ★★“आप देखेंगे कि 1989 के चुनाव के बाद से, 1996, 2004 और 2009 को छोड़कर ज्यादातर समय दोनों पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को मिले वोटों का योग 50 फीसदी से ज्यादा रहा है।”
- “आइए, दूसरे अध्याय की बातों को याद करें। आपने इस अध्याय में दो-पार्टी तंत्रों के बारे में पढ़ा था।… मौजूदा दलों में ऐसे कौन-कौन-से दल हैं, जो न तो दलों के कांग्रेस परिवार में थे और न ही जनता पार्टी परिवार में? … क्या आप ऐसी पार्टियों की सूची बना सकते हैं, जो दोनों में से किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं?”
उपशीर्षक: ‘लोकसभा चुनाव (2004–2019)’
- 2004 के चुनावों में कांग्रेस भी पूरे ज़ोर के साथ गठबंधन में शामिल हुई
- राजग की हार हुई और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार बनी; नेतृत्व कांग्रेस ने किया; वाम मोर्चा ने समर्थन दिया
- 2004 के चुनावों में एक हद तक कांग्रेस का पुनरुत्थान भी हुआ — 1991 के बाद पहली बार सीटें बढ़ीं
- ! “2004 के चुनावों में राजग और संप्रग को मिले कुल वोटों का अंतर बड़ा कम था।”
- ★“इस तरह दलीय प्रणाली सत्तर के दशक की तुलना में एकदम ही बदल गई है।”
पृष्ठ 152(p17) — 2008 से 2019 और ‘बढ़ती सहमति’
संप्रग-2 और उसके बाद
- भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर जुलाई 2008 में वाम दलों ने समर्थन वापस लिया — ★फिर भी संप्रग सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया
- 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव; परिणाम कांग्रेस के पक्ष में
- ★कांग्रेस की सीटें 2004 में 145 से बढ़कर 2009 में 206
- डॉ. मनमोहन सिंह ने दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली
2014 — मोड़
- ★सितंबर 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी (तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री) को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया
- 2014 में 16वें लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत; अपने दम पर 282 सीटें
- ★★“30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी बन गई।”
- ★“अपने स्वयं के एकल दल के बहुमत के बावजूद, भाजपा ने अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ राजग सरकार बनाने का विकल्प चुना।”
2019
- “वर्ष 2014, भारतीय राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था।” राजग सरकार ने सामाजिक क्षेत्र, विदेश नीति और आर्थिक नीति में तेज़ी से निर्णय लिए
- 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से 303 सीटों के साथ विजयी हुई
- ★★“जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है तब भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।”
- “इस तरह दलीय प्रणाली सत्तर के दशक की तुलना में एकदम ही बदल गई है।”
उपशीर्षक: ‘बढ़ती सहमति’ — चार बातें★★
“अनेक महत्त्वपूर्ण मसलों पर अधिकतर दलों के बीच एक व्यापक सहमति है। कड़े मुकाबले और बहुत-से संघर्षों के बावजूद अधिकतर दलों के बीच एक सहमति उभरती सी जान पड़ रही है। इस सहमति में चार बातें हैं।”
1 · नयी आर्थिक नीति पर सहमति
“कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ़ हैं, लेकिन ज्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं। अधिकतर दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत, विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।”
2 · पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति
“आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं। राजनीतिक दल यह भी सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं कि ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी मिले।”
3 · देश के शासन में प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति
★“प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद अब लगातार कम होता जा रहा है।… प्रांतीय दल केंद्रीय सरकार में साझीदार बन रहे हैं और इन दलों ने पिछले बीस सालों में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”
4 ·(अगले पृष्ठ पर)
पृष्ठ 153(p18) — सहमति की चौथी बात + 2004 का मानचित्र
🗺 मानचित्र — ‘लोकसभा चुनाव परिणाम 2004’ध्यान
रंग-संकेत: राजग (गुलाबी) · संप्रग (पीला) · वाम दल (लाल) · अन्य (नीला) स्रोत: भारत का चुनाव आयोग नोट: यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है। इसमें दिखाई गई भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।
सहमति की चौथी बात★★
“चौथा, विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर ज़ोर और विचारधारागत सहमति के बगैर राजनीतिक गठजोड़: गठबंधन की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर ज़ोर दे रहे हैं, जो मिसाल के लिए अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई, जो पाँच साल तक चली।”
★यह चौथी बात ही प्रश्न 4 का पूरा उत्तर है।
पृष्ठ 154(p19) — निष्कर्ष और 17वीं लोकसभा
समापन-अनुच्छेद
- “ये सभी महत्त्वपूर्ण बदलाव हैं और आगामी राजनीति इन्हीं बदलावों के दायरे में आकार लेगी।”
- “भारत की राजनीति के इस अध्ययन की शुरुआत में हमने चर्चा की थी कि कांग्रेस किस तरह एक प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरी। इस स्थिति से चलकर अब हम एक ऐसे पड़ाव पर पहुँचे हैं, जहाँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तेज़ है लेकिन इस प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच मुख्य राजनीतिक दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है।”
- ★जन आंदोलनों की भूमिका: “अगर राजनीतिक दल इस सहमति के दायरे में सक्रिय हैं, तो जन आंदोलन और संगठन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीकों की पहचान कर रहे हैं। गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले जन आंदोलनों के ज़रिए राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने आ रहे हैं। ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं।”
- “इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं।”
- ★★अंतिम वाक्य: “हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी और यह राजनीति इस अध्याय में वर्णित कुछ चीज़ों के मंथन के बीच आकार ग्रहण करेगी।”
📦 चर्चा-बॉक्स
“जैसा कि आप जानते हैं भारत की आजादी के आसपास कई अन्य देश भी आजाद हुए और लोकतंत्र को अपनाया। हालाँकि, भारत सामाजिक समानता और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने में एक महान भूमिका निभाते हुए एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा, लेकिन उनमें से कुछ देशों में ऐसा नहीं हुआ है। उन कारकों के बारे में आपस में चर्चा करें जिन्होंने भारत में लोकतंत्र को पनपने में सक्षम बनाया है।”
★यह पूरी पुस्तक का समापन-प्रश्न है — कक्षा में इसी पर चर्चा से अध्याय बंद कीजिए।
आरेख 3 — ‘17वीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति’(पाई-चार्ट)★★
| दल | सीटें | हिस्सा |
|---|---|---|
| भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) | 303 | 56% |
| इंडियन नेशनल कांग्रेस | 52 | 10% |
| द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डी.एम.के) | 24 | 4% |
| शिवसेना | 18 | 3% |
| जनता दल यूनाईटेड (जद-यू) | 16 | 3% |
| बीजू जनता दल (बीजेडी) | 12 | 2% |
| बहुजन समाज पार्टी (बसपा) | 10 | 2% |
| अन्य पार्टियाँ | 108 | 20% |
स्रोत: http://loksabha.nic.in
पृष्ठ 155(p20) — प्रश्नावली(10 में से 8 प्रश्न)
प्र.1 — कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें: (क) मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करना (ख) जनता दल का गठन (ग) राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (घ) इंदिरा गाँधी की हत्या (ङ) राजग सरकार का गठन (च) संप्रग सरकार का गठन
★सही क्रम: (घ) 1984 → (ख) 1988 → (क) 1990 → (ङ) 1998 → (च) 2004 → (ग) 2019
प्र.2 — मेल करें:
(क) सर्वानुमति की राजनीति → (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति (ख) जाति आधारित दल → (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार (ग) पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय → (i) शाहबानो मामला (घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत → (iii) गठबंधन सरकार
प्र.3 — 1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे क्या रहे हैं? प्र.4 — “गठबंधन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते हैं।” — पक्ष या विपक्ष में तर्क प्र.5 — आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा के विकास-क्रम का उल्लेख प्र.6 — कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर समाप्त, फिर भी उसका असर कायम — क्या आप सहमत हैं? प्र.7 — दो-दलीय बनाम बहुदलीय व्यवस्था पर लेख (पिछले तीस सालों के अनुभव के आधार पर) प्र.8 — जोया हसन का अवतरण और तीन उप-प्रश्न
जोया हसन का अवतरण: “भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस-प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की नयी प्रवृत्ति का भी ज़ोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की समाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे। राजव्यवस्था के सामने एक महत्त्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगत व्यवस्था खड़ी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है, जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें…”
उप-प्रश्न: (क) दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सूची · (ख) विभिन्न हितों का समाहार और एकजुटता क्यों ज़रूरी · (ग) अयोध्या विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?
पृष्ठ 156(p21) — ‘खुद करें-खुद सीखें’ + संसद की दलीय स्थिति★★
📦 ‘खुद करें-खुद सीखें’
- ★“इस अध्याय में 2004 के चुनाव (14वीं लोकसभा) तक भारतीय राजनीति की प्रमुख घटनाओं को शामिल किया गया है। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2009 में आयोजित किए गए, जिसके दौरान कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की जीत हुई। 2014 तथा 2019 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग विजेता बन कर उभरी। 17वीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति पृष्ठ 154 पर दर्शाई गई है।”
- 17वीं लोकसभा के सदस्यों का विस्तृत अध्ययन:
http://loksabha.nic.in - भारत निर्वाचन आयोग:
http://eci.nic.in— 2009 (15वीं) और 2019 (17वीं) के प्रदर्शन की तुलना कीजिए - 2004 के बाद से भारत में प्रमुख राजनीतिक घटनाओं का एक घटनाक्रम तैयार करें
सारणी — ‘सन् 2004 से संसद में दलीय स्थिति’★★★
| # | पार्टी | 2004 | 2009 | 2014 | 2019 |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | आम आदमी पार्टी | – | – | 4 | 1 |
| 2 | ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम | 0 | 9 | 37 | 1 |
| 3 | बहुजन समाज पार्टी | 19 | 21 | – | 10 |
| 4 | भारतीय जनता पार्टी | 138 | 116 | 282 | 303 |
| 5 | बीजू जनता दल | 11 | 14 | 20 | 12 |
| 6 | कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया—मार्क्सवादी | 43 | 16 | 9 | 3 |
| 7 | कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया | 10 | 4 | 1 | 2 |
| 8 | द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम | 16 | 18 | – | 24 |
| 9 | इंडियन नेशनल कांग्रेस | 145 | 206 | 44 | 52 |
| 10 | जनता दल—यूनाइटेड | 8 | 20 | 2 | 16 |
| 11 | जनता दल—सेक्यूलर | 3 | 3 | 2 | 1 |
| 12 | लोक जनशक्ति पार्टी | 4 | – | 6 | 6 |
| 13 | नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी | 9 | 9 | 6 | 5 |
| 14 | राष्ट्रीय जनता दल | 24 | 4 | 4 | – |
| 15 | राष्ट्रीय लोकदल | 3 | 5 | 1 | – |
| 16 | समाजवादी पार्टी | 36 | 23 | 5 | 5 |
| 17 | शिरोमणि अकाली दल | 8 | 4 | 4 | 2 |
| 18 | शिवसेना | 12 | 11 | 18 | 18 |
| 19 | अन्य | 54 | 60 | 98 | 82 |
| कुल | 543 | 543 | 543 | 543 |
पाद-टिप्पणी: संसद सदस्यों की कुल संख्या – 543 (राज्यों से 530 और केंद्रशासित प्रदेशों से 13)
★कक्षा में देखने लायक चार पंक्तियाँ: AIADMK (0 → 9 → 37 → 1) · वाम दल (43+10 → 3+2) · बसपा (19 → 21 → 0 → 10) · ‘अन्य’ (54 → 98)
पृष्ठ(p22, p23) — पश्च-सामग्री(अध्याय का भाग नहीं)
| पृष्ठ | सामग्री |
|---|---|
| p22 | केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा / Integrity Pledge — छह प्रतिज्ञाएँ; www.cvc.nic.in |
| p23 | भारत निर्वाचन आयोग का पोस्टर — “जानियें कैसे दें अपना वोट — ई.वी.एम. और वीवीपैट का उपयोग करते हुए”; चार चरण; पर्ची 7 सेकेण्ड के लिए दिखाई देगी; https://eci.nic.in |
★p23 का पोस्टर कक्षा में उपयोगी है — विद्यार्थी अगले वर्ष मतदाता बनेंगे। मतदान की प्रक्रिया समझाने का तैयार साधन।
📋 अध्याय की समेकित समय-रेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1978 | मंडल आयोग का गठन (दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग) · बामसेफ का गठन |
| 1980 | मंडल आयोग की सिफ़ारिशें · भारतीय जनता पार्टी का गठन |
| 1984 | इंदिरा गाँधी की हत्या · कांग्रेस को 415 सीटें, भाजपा को 2 · बसपा की स्थापना |
| 1985 | शाहबानो वाद का निर्णय |
| 1986 | मुस्लिम महिला अधिनियम · फैजाबाद जिला न्यायालय का निर्णय — ताला खुला · भाजपा का राष्ट्रवाद पर बल |
| 1989 | कांग्रेस 197 पर · राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, वी.पी. सिंह |
| 1990 | मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू (अगस्त) · चंद्रशेखर सरकार (नवंबर) |
| 1991 | राजीव गाँधी की हत्या (मई) · नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री · नयी आर्थिक नीति |
| 1992 | इंदिरा साहनी केस का निर्णय (नवंबर) · ढाँचे का ध्वंस |
| 1996 | भाजपा सबसे बड़ी पार्टी · वाजपेयी की 13 दिन की सरकार · संयुक्त मोर्चा, देवगौड़ा |
| 1997 | इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री |
| 1998 | राजग सरकार · दोनों दलों का वोट-हिस्सा लगभग बराबर |
| 1999 | दूसरी राजग सरकार — पूरा कार्यकाल |
| 2004 | संप्रग सरकार, मनमोहन सिंह |
| 2008 | परमाणु समझौते पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया (जुलाई) |
| 2009 | संप्रग-2 · कांग्रेस 206 |
| 2013 | नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित (सितंबर) |
| 2014 | भाजपा को 282 — 30 साल बाद पहला एकल बहुमत |
| 2019 | भाजपा को 303 · ★9 नवम्बर — अयोध्या पर उच्चतम न्यायालय का 5–0 निर्णय |
✓ पठन-सत्यापन
- सभी 23 पृष्ठ 150 dpi पर पढ़े गए
- QR
12122CH09से पुष्टि — यह पुराना अध्याय 9 है - तीनों बड़े आरेख अंक-दर-अंक उतारे गए (सीटें · वोट-हिस्सा · 17वीं लोकसभा)
- 2004–2019 की पूरी दलीय सारणी उतारी गई
- ‘केंद्रीय सरकार 1989 के बाद’ की पूरी सारणी उतारी गई
- चारों क्रॉस-रेफ़रेंस (अध्याय 2, 5, 6 और ‘पिछला अध्याय’) जाँचे — सभी वैध, शून्य अनाथ संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय के दोनों अवतरण और उनके पृष्ठ-क्रमांक (920, 1045) दर्ज
- अद्यतन-प्रमाण दर्ज — 9 नवम्बर 2019, 2019 का चुनाव, 17वीं लोकसभा, Reprint 2026-27