पाठ्यपुस्तक: स्वतंत्र भारत में राजनीति, पृष्ठ 112–135 (24 पृष्ठ — पुस्तक का सबसे लंबा अध्याय) !! यह अध्याय 5 अगस्त 2019 तक अद्यतन है। अनुच्छेद 370 की चर्चा भूतकाल में है।
🧭 एक नज़र में — अध्याय का ढाँचा
| खंड | पृष्ठ | केंद्रीय बात |
|---|---|---|
| क्षेत्र और राष्ट्र | 112–114 | क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं |
| जम्मू-कश्मीर | 115, 118–122 | तीन क्षेत्र, ‘कश्मीरियत’, अनुच्छेद 370, 5 अगस्त 2019 |
| द्रविड़ आंदोलन | 116–117 | ★सबसे ताकतवर आंदोलन — पर हथियार कभी नहीं |
| पंजाब | 122–125 | आनंदपुर साहिब 1973 → हिंसा → समझौता 1985 |
| पूर्वोत्तर | 125–129 | तीन मुद्दे; मिज़ोरम बनाम नगालैंड |
| सिक्किम और गोवा | 130–131 | जनमत से हल हुए दो प्रश्न |
| निष्कर्ष | 132–135 | पाँच सबक |
1 · क्षेत्र और राष्ट्र
अध्याय की नींव — चार बातें★
- राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि क्षेत्र को नकार दिया जाए।
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं।
- क्षेत्रीय मुद्दों का उठना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति है।
- इन्हें दबाने के बजाय लोकतांत्रिक बातचीत से सुलझाना बेहतर है।
★★“भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया।”
1980 के दशक का चक्र
माँग → हथियार → सरकारी जवाबी कार्रवाई → राजनीतिक प्रक्रिया अवरुद्ध → बातचीत → समझौता
- चारों जगह यही चक्र दोहराया गया: असम, पंजाब, मिज़ोरम, जम्मू-कश्मीर
- ★लक्ष्य रहा — “विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए”
पहले पन्ने का पोस्टर
- उत्तराखंड आंदोलन का पोस्टर, एक ही माँग सात भाषाओं में
- संदेश: आंदोलन पूरे देश से बात कर रहा था, देश के खिलाफ़ नहीं
- ★काला बॉक्स: “क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है।”
2 · तमिलनाडु — द्रविड़ आंदोलन
सबसे महत्वपूर्ण वाक्य (शब्दशः याद कीजिए)★★
“हालाँकि आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, पर आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। नेतृत्व ने सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया।”
आंदोलन का दर्जा
- भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर आंदोलन
- क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति
- नारा — ‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’
पेरियार ई. वी. रामास्वामी नायकर
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| आंदोलन | आत्मसम्मान आंदोलन, 1925 |
| दल | जस्टिस पार्टी से जुड़ाव; बाद में द्रविड़ कड़गम |
| विरोध | ब्राह्मणवाद · हिंदी थोपा जाना · उत्तर भारतीय वर्चस्व |
डीएमके की तीन-सूत्री माँगें(1953–54)
- कल्लाकुडी का नाम डालमियापुरम रखने का विरोध
- तमिल संस्कृति के इतिहास को पाठ्यक्रम में जगह
- शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम हटाने की माँग
आगे की राह
- 1965 — हिंदी-विरोधी आंदोलन → व्यापक जन-समर्थन
- 1967 — डीएमके सत्ता में; तब से सत्ता द्रविड़ दलों के पास
- अन्नादुरै की मृत्यु के बाद दोफाड़ → AIADMK
- 1990 के दशक में एमडीएमके, पीएमके, डीएमडीके
- ★1996 से केंद्र के हर सत्तारूढ़ गठबंधन में इनमें से कोई एक दल रहा है
★★निष्कर्ष: “तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है।”
3 · जम्मू और कश्मीर
तीन क्षेत्र — यह सारणी परीक्षा में सीधे आती है★
| क्षेत्र | सामाजिक बुनावट |
|---|---|
| जम्मू | हिंदू, मुसलमान और सिख — मिली-जुली आबादी; अलग-अलग भाषाएँ |
| कश्मीर | कश्मीरी बोलने वाले मुसलमानों का बहुमत; एक छोटी हिंदू आबादी |
| लद्दाख | पहाड़ी, कम आबादी; बौद्ध और मुसलमान लगभग बराबर |
1947 और ‘कश्मीरियत’
- महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र दर्जा चाहते थे — भारत या पाकिस्तान, किसी में नहीं
- पाकिस्तान का दावा — मुस्लिम-बहुल होने के नाते
- ★पर कश्मीरी जनता का नज़रिया अलग था —
“उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यह मुद्दा ‘कश्मीरियत’ कहलाता है।”
- अक्तूबर 1947 — पाकिस्तान की शह पर कबायली घुसपैठ → महाराजा ने मदद माँगी → विलय प्रपत्र
21 अप्रैल 1948 — यूएन प्रस्ताव के तीन चरण
- पाकिस्तान अपने नागरिकों को वापस बुलाए
- भारत अपनी फ़ौज न्यूनतम स्तर तक घटाए
- जनमत संग्रह कराया जाए
! “इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी।”
अनुच्छेद 370 पर दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ
| कौन | क्या कहा |
|---|---|
| भारत के बाकी हिस्सों का एक वर्ग | विशेष दर्जा पूर्ण एकीकरण में बाधा है; 370 हटना चाहिए |
| अधिकांश कश्मीरी | 370 पर्याप्त नहीं; वादा की गई स्वायत्तता नहीं मिली |
कश्मीरियों की तीन शिकायतें★
- जनमत संग्रह का वादा कभी पूरा नहीं हुआ
- अनुच्छेद 370 की स्वायत्तता व्यवहार में घटती चली गई
- लोकतंत्र वैसा नहीं फल-फूल सका जैसा देश के बाक़ी हिस्सों में
समय-रेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| मार्च 1948 | शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने |
| 1953 | ! शेख अब्दुल्ला पद से हटाए गए और गिरफ़्तार |
| 1965 | पदनाम बदले; गुलाम मोहम्मद सादिक पहले मुख्यमंत्री |
| 1974 | इंदिरा गाँधी–शेख अब्दुल्ला समझौता; शेख फिर मुख्यमंत्री |
| 1982 | शेख का निधन; फ़ारूक़ अब्दुल्ला उत्तराधिकारी |
| 1986 | नेशनल कांफ्रेंस–कांग्रेस गठबंधन |
| 1987 | !! धाँधली के आरोपों वाला चुनाव — निर्णायक मोड़ |
| 1989 | उग्रवाद की शुरुआत |
| 1996 | चुनाव; फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार; स्वायत्तता का प्रस्ताव |
| 2002 | निष्पक्ष चुनाव; पीडीपी–कांग्रेस सरकार |
| 2008 | राष्ट्रपति शासन |
| 2009 | उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री |
| 2014 | रिकॉर्ड मतदान; पीडीपी–भाजपा सरकार |
| अप्रैल 2016 | महबूबा मुफ़्ती — राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री |
| जून 2018 | गठबंधन टूटा; राष्ट्रपति शासन |
| 5 अगस्त 2019 | ★★जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 — अनुच्छेद 370 समाप्त; दो केंद्र शासित प्रदेश |
🗺️ पाठ्यपुस्तक का मानचित्र: “केंद्र शासित प्रदेश : जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख” — स्रोत pib.gov.in
4 · पंजाब
पृष्ठभूमि
- विभाजन का सबसे गहरा असर पंजाब पर
- 1966 — हरियाणा अलग; पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल को; बचा पंजाबी-भाषी प्रांत
- अकाली दल — 1920 के दशक में गठित; ‘पंजाबी सूबा’ आंदोलन
अकालियों की तीन कठिनाइयाँ★
- सरकार बनने पर भी समय से पहले बर्खास्त कर दी गई
- राज्य के हिंदुओं में समर्थन नहीं जुटा
- ★सिख समुदाय भी जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था — दलितों में कांग्रेस को ज़्यादा समर्थन
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, 1973 — चार बातें★★
- क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग
- केंद्र-राज्य संबंधों की पुनर्परिभाषा
- सिख ‘कौम’ की आकांक्षाएँ और ‘बोलबाला’
- ★“यह प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है।”
विवादास्पद क्यों? — सरकार ने इसे अलगाववादी दस्तावेज़ माना; कुछ ने पृथक सिख राष्ट्र की माँग पढ़ा; ! इसकी सीमित लोकप्रियता ही एक कारण थी कि इसे अलग-अलग तरीक़ों से पढ़ा गया।
हिंसा का दौर
- नेतृत्व नरमपंथियों से चरमपंथियों के हाथ में
- स्वर्णमंदिर हथियारबंद लोगों का मुख्यालय बना
- जून 1984 — ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’
- 31 अक्तूबर 1984 — इंदिरा गाँधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या
- इसके बाद सिख-विरोधी हिंसा; दिल्ली में दो हज़ार से ज़्यादा मारे गए
दो अवतरण याद रखिए:
- नानावती आयोग (2005): “अब समय आ गया है कि हम इन दुखद घटनाओं के अध्याय को बंद करें।”
- मनमोहन सिंह (11 अगस्त 2005, लोकसभा): “मैं सिख समुदाय से ही नहीं, पूरे भारतीय राष्ट्र से माफ़ी माँगता हूँ, क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीयता की उस अवधारणा का निषेध था जो हमारे संविधान में दर्ज है।”
राजीव गाँधी–लोंगोवाल समझौता, जुलाई 1985 — पाँच प्रावधान★
- चंडीगढ़ पंजाब को
- हिंदी-भाषी क्षेत्रों के निर्धारण के लिए अलग आयोग
- नदी-जल विवाद के लिए न्यायाधिकरण
- हिंसा-पीड़ितों को मुआवज़ा और पुनर्वास
- अलगाववादियों से निपटने के विशेष प्रावधान
! पर: हिंसा वर्षों जारी रही; लंबा राष्ट्रपति शासन; 1992 में मात्र 24% मतदान; 1997 में अकाली दल (बादल)–भाजपा गठबंधन की जीत के बाद सामान्य राजनीति लौटी।
5 · पूर्वोत्तर
भूगोल
- आठ राज्य: असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम
- ‘सात बहनें’ + सिक्किम ‘भाई’
- देश की मात्र 4 फ़ीसदी आबादी
- शेष भारत से जुड़ाव केवल 22 किलोमीटर की राहदारी से
- ★“भारत के लिए एक तरह से दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार”
पुनर्गठन
| वर्ष | राज्य |
|---|---|
| 1963 | नगालैंड |
| 1972 | मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय |
| 1987 | मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश |
तीन मुद्दे★★
(क) स्वायत्तता की माँग
- ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन → 1960 ऑल पार्टी हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस → कई जनजातीय राज्य
- असम में करबी और दिमसा को जिला परिषद्; बोडो को स्वायत्त परिषद्
- ★“छोटे-छोटे और निरंतर लघुतर होते राज्य बनाते चले जाना संभव नहीं था।”
(ख) अलगाव के आंदोलन
| मिज़ोरम | नगालैंड | |
|---|---|---|
| चिंगारी | 1959 का अकाल और असम सरकार की उदासीनता | 1951 — फ़िजो के नेतृत्व में स्वतंत्रता की घोषणा |
| नेता / संगठन | लालडेंगा, मिज़ो नेशनल फ्रंट | अंगामी ज़ापू फ़िजो |
| संघर्ष | 1966 से दो दशक सशस्त्र अभियान | सशस्त्र संघर्ष; ! बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकराए |
| नतीजा | 1986 राजीव–लालडेंगा समझौता → पूर्ण राज्य | 1963 में राज्य बना, पर संघर्ष जारी |
| आज | ★“पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य” | ! “समाधान होना अब भी बाकी है” |
(ग) ‘बाहरी’ लोगों का विरोध — असम आंदोलन(1979–1985)
- नेतृत्व: आसू (AASU) — एक छात्र संगठन
- माँग: 1951 के बाद आए विदेशियों की पहचान और निष्कासन
- दो कारण साथ-साथ — ★यह प्रश्न 7 का पूरा उत्तर है:
| सांस्कृतिक | आर्थिक |
|---|---|
| असमिया पहचान और भाषा पर संकट का भय | तेल, चाय, कोयला — फिर भी राज्य ग़रीब |
| जनसंख्या-संतुलन बदलने का डर | संसाधन बाहर जाते हैं, लाभ नहीं मिलता |
| मताधिकार और भूमि पर असर | बेरोज़गारी और पिछड़ापन |
असम समझौता, 1985 — तीन कट-ऑफ़★
| कब आए | क्या मिला |
|---|---|
| 1951–1961 | पूर्ण नागरिकता और मताधिकार |
| 1961–1971 | नागरिकता, पर मताधिकार नहीं |
| 1971 के बाद | वापस भेजा जाएगा |
- आसू ने असम गण परिषद् बनाई; 1985 में सत्ता में आई; नारा ‘स्वर्णिम असम’
- ! “‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया।”
★हाशिये का प्रश्न: “कोई आदमी कहीं पहले चला गया हो तो वही दूसरों को ‘बाहरी’ समझने लगता है।”
6 · सिक्किम और गोवा
सिक्किम
- ‘शरणागत’ (protectorate) — रक्षा और विदेश-नीति भारत के पास, आंतरिक शासन चोग्याल के पास
- नेपाली मूल के लोग बहुसंख्यक, पर सत्ता में हिस्सेदारी नहीं
- 1974 — पहला चुनाव, सिक्किम कांग्रेस की भारी जीत
- अप्रैल 1975 — विधानसभा का विलय-प्रस्ताव; जनमत-संग्रह में समर्थन
- सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य
- ★“विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका!”
गोवा
- पुर्तगाली शासन 1947 के बाद भी जारी
- दिसंबर 1961 — भारतीय सेना की दो दिन की कार्रवाई; गोवा, दमन और दीव भारत में
- फिर बहस: महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (महाराष्ट्र में विलय) बनाम यूनाइटेड गोवन्स पार्टी (अलग पहचान)
- ★जनवरी 1967 — जनमत सर्वेक्षण; लोगों ने अलग बने रहने का फ़ैसला दिया
- 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा
7 · पाँच सबक★★
| # | सबक | मुख्य उदाहरण |
|---|---|---|
| 1 | क्षेत्रीय आकांक्षाएँ वैश्विक परिघटना हैं | स्कॉटलैंड, वेल्स · बास्क · श्रीलंकाई तमिल |
| 2 | दमन नहीं, बातचीत | मिज़ोरम |
| 3 | सत्ता की साझेदारी ज़रूरी — “क्षेत्रों को मिलाकर ही पूरा देश बनता है” | गठबंधन की राजनीति |
| 4 | आर्थिक असमानता को गंभीरता से लीजिए | असम |
| 5 | संविधान का लचीलापन — छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371; ! अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त | पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर |
अध्याय का अंतिम वाक्य
★★“क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला। भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता, लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।”
📌 राजीव गाँधी के तीन समझौते — एक ही मेज़ पर
| समझौता | वर्ष | किसके साथ | नतीजा |
|---|---|---|---|
| पंजाब | जुलाई 1985 | हरचंद सिंह लोंगोवाल | शांति में वर्षों लगे |
| असम | 1985 | आसू | असम गण परिषद् सत्ता में |
| मिज़ोरम | 1986 | लालडेंगा | ★सबसे सफल |
📌 अंतिम-मिनट की जाँच-सूची
- सात भाषाओं वाला पोस्टर और उसका निष्कर्ष
- भारत सरकार के नज़रिये की चार बातें
- ★★“आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी”
- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख की सामाजिक बुनावट
- ‘कश्मीरियत’ की परिभाषा
- यूएन प्रस्ताव के तीन चरण (21 अप्रैल 1948)
- 370 पर दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ + कश्मीरियों की तीन शिकायतें
- 5 अगस्त 2019 — पुनर्गठन अधिनियम
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की चार बातें
- पंजाब समझौते के पाँच प्रावधान
- पूर्वोत्तर के तीन मुद्दे
- मिज़ोरम बनाम नगालैंड की तुलना
- असम समझौते की तीन कट-ऑफ़ तिथियाँ
- सिक्किम 22वाँ राज्य; गोवा 1967 का जनमत सर्वेक्षण, 1987 में राज्य
- ★★पाँचों सबक और अंतिम वाक्य