पाठ्यपुस्तक का पूरा पाठ, पृष्ठ-संदर्भ सहित। यह शिक्षक की फाइल है — पढ़ाने से पहले एक बार पूरी पढ़िए।
PDF वर्गीकरण: LEGACY — 35/35 फॉन्ट 8-बिट एन्कोडेड; 18 पृष्ठ-चित्र दृष्टि से पढ़े गए।
पढ़ाने से पहले — दो अनाथ-संदर्भध्यान
यह अध्याय पहले ‘अध्याय 8’ था — QR कोड 12108CH08। पैटर्न अब छह अध्यायों में पुष्ट:
पुराने अध्याय 1 और अध्याय 3 हटाए गए; 2→1, 4→2, 5→3, 6→4, 7→5, 8→6.
अनाथ-संदर्भ 1 — गलत अध्याय-क्रमांक(पृ. 82)ध्यान
“अध्याय सात में हमने विश्व-राजनीति के दायरे को थोड़ा बढ़ाकर उसमें गरीबी और महामारी जैसे विषय भी शामिल कर लिए हैं।”
! वह अब ‘अध्याय 5 — समकालीन विश्व में सुरक्षा’ है। कक्षा में यह ज़रूर ठीक कीजिए, वरना विद्यार्थी पुस्तक में ‘अध्याय सात’ खोजेंगे और वहाँ वैश्वीकरण पाएँगे।
अनाथ-संदर्भ 2 — गलत पृष्ठ-संख्या(पृ. 82, अराल सागर के चित्र-शीर्षक में)ध्यान
“(अराल सागर की अवस्थिति देखने समझने के लिए पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र को देखें।)”
! पृष्ठ 24 अब अध्याय 2 (सत्ता के समकालीन केन्द्र) का है और उस पर चीन के कार्टून हैं — कोई मानचित्र नहीं। (यह सत्यापित किया गया है।) सोवियत-उत्तर गणराज्यों का मानचित्र अब अध्याय 1 (दो ध्रुवीयता का अंत) में है। विद्यार्थियों को वहीं भेजिए।
अध्याय की संरचना
| क्रम | खंड | पृष्ठ |
|---|---|---|
| — | परिचय | 81 |
| 1 | वैश्विक राजनीति में पर्यावरण की चिंता क्यों? | 82–84 |
| 2 | विश्व की साझी संपदा की सुरक्षा | 84–86 |
| — | बॉक्स — अंटार्कटिका पर किसका स्वामित्व है? | 85 |
| 3 | साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ | 86–87 |
| 4 | साझी संपदा | 87–88 |
| — | बॉक्स — भारत के पावन वन-प्रांत | 88 |
| 5 | पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष | 88–90 |
| 6 | पर्यावरण आंदोलन — एक या अनेक | 90–92 |
| — | बॉक्स — क्या वन निर्जन होते हैं? | 91 |
| 7 | संसाधनों की भू-राजनीति | 92–95 |
| — | बॉक्स — तेल देखो, तेल की धार देखो…!! | 94 |
| 8 | मूलवासी (Indigenous People) और उनके अधिकार | 95–97 |
| — | आओ मिलजुल कर करें | 97 |
| — | प्रश्नावली — प्रश्न 1 से 9 | 98 |
परिचय (पृ. 81)
- “इस अध्याय में विश्व-राजनीति में पर्यावरण और संसाधनों के बढ़ते महत्व की चर्चा की गई है।”
- ★★“1960 के दशक से पर्यावरण के मसले ने जोर पकड़ा।”
- अध्याय की योजना — पाँच हिस्से:
- कुछ महत्वपूर्ण पर्यावरण-आंदोलनों की तुलनात्मक चर्चा
- साझी संपदा और ‘विश्व की साझी विरासत’ जैसी धारणाएँ
- पर्यावरण से जुड़ी हाल की बहसों में भारत ने कौन-सा पक्ष लिया
- संसाधनों की होड़ से जुड़ी वैश्विक राजनीति
- ★“अध्याय का समापन यह बताते हुए किया गया है कि समकालीन विश्व-राजनीति में हाशिए पर खड़ी मूलवासी जनता (Indigenous people) के इन सवालों से क्या सरोकार हैं और वह क्या सोचती है।”
आवरण-चित्र (पृ. 81): ★“1992 के पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरण को विश्व राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल करा दिया। यहाँ दिए गए चित्रों में वर्षा के वन और गरान (मेनग्रोव्स) देखे जा सकते हैं।”
1. वैश्विक राजनीति में पर्यावरण की चिंता क्यों? (पृ. 82–84)
1.1 खंड की शुरुआत — एक ईमानदार स्वीकृति
- “इस पुस्तक में हमने विश्व-राजनीति पर बड़े सीमित अर्थों में चर्चा की है” — युद्ध और संधि, राज्यशक्ति का उत्थान और पतन, सरकारें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन।
- ! अनाथ-संदर्भ: “अध्याय सात में हमने विश्व-राजनीति के दायरे को थोड़ा बढ़ाकर उसमें गरीबी और महामारी जैसे विषय भी शामिल कर लिए हैं।” → वह अब अध्याय 5 है।
- तर्क: “ऐसा करने में कोई मुश्किल भी नहीं क्योंकि हम सब मानते हैं कि गरीबी और महामारी पर अंकुश रखने की जिम्मेदारी सरकार की है। इस अर्थ में ये मुद्दे विश्व-राजनीति के दायरे में ही आते हैं।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 82): ★“जंगल के सवाल पर राजनीति, पानी के सवाल पर राजनीति और वायुमंडल के मसले पर राजनीति! फिर, किस बात में राजनीति नहीं है!”
1.2 पर्यावरण-क्षति की सूची(पाठ में बुलेट-रूप में)★★
| # | क्षेत्र | क्या हो रहा है |
|---|---|---|
| 1 | कृषि-भूमि | “दुनिया भर में कृषि-योग्य भूमि में अब कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो रही”; मौजूदा उपजाऊ जमीन के बड़े हिस्से की उर्वरता कम; चारागाहों के चारे खत्म होने को; मत्स्य-भंडार घट रहा; जलाशयों की जलराशि तेजी से कम और प्रदूषण बढ़ा → खाद्य-उत्पादन में कमी |
| 2 | ★★जल और स्वच्छता | संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानव विकास रिपोर्ट (2016) के अनुसार — विकासशील देशों की 66.3 करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं; दो अरब चालीस करोड़ (2.40 अरब) आबादी साफ-सफाई की सुविधा से वंचित; इस वजह से ★30 लाख से ज्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार |
| 3 | वन और जैव-विविधता | प्राकृतिक वन जलवायु को संतुलित रखते हैं, जलचक्र संतुलित रखते हैं और जैव-विविधता का भंडार हैं — पर कटाई हो रही और लोग विस्थापित हो रहे हैं; जैव-विविधता की हानि का कारण — “उन पर्यावासों का विध्वंस जो जैव-प्रजातियों के मामले में समृद्ध हैं” |
| 4 | ★ओज़ोन परत | “धरती के ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन गैस की मात्रा में लगातार कमी हो रही है। इसे ओज़ोन परत में छेद होना भी कहते हैं।” → पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर बड़ा खतरा |
| 5 | समुद्रतटीय प्रदूषण | “समुद्र का मध्यवर्ती भाग अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ है लेकिन इसका तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित हो रहा है।” और “समुद्रतटीय इलाकों में मनुष्यों की सघन बसाहट जारी है” → “समुद्री पर्यावरण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी” |
चित्र — अराल सागर (पृ. 82): “अराल के आसपास बसे हज़ारों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा क्योंकि पानी के विषाक्त होने से मत्स्य-उद्योग नष्ट हो गया… पानी में नमक की सांद्रता के ज्यादा बढ़ जाने से पैदावार कम हो गई।” ★व्यंग्य: “लोग एक-दूसरे से कहते हैं कि जितने लोग सागर के अध्ययन के लिए आये वे अगर एक-एक बाल्टी पानी भी लाते तो यह सागर भर गया होता।” ! (चित्र-शीर्षक में “पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र” का संदर्भ अब गलत है — ऊपर देखिए।)
1.3 ये मसले ‘राजनीतिक’ क्यों हैं — दो स्तर★★
“आपको लग सकता है कि ये तो नैसर्गिक घटनाएँ हैं और इनका अध्ययन राजनीति विज्ञान की जगह भूगोल वाली कक्षा में किया जाना चाहिए। लेकिन ज़रा फिर से सोचिए।”
पहला स्तर — सरकारें कदम उठाती हैं:
- “अगर विभिन्न देशों की सरकारें कदम उठाती हैं तो इन मसलों की परिणति इस अर्थ में राजनीतिक होगी।”
- ★“इन मसलों में अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती। इस वजह से ये मसले विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।”
दूसरा और गहरा स्तर — यही अध्याय की धुरी है:
★★“कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? इस पर रोक लगाने के उपाय करने की जिम्मेदारी किसकी है? धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है? इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।”
1.4 पर्यावरण की चिंता कब राजनीतिक बनी★
- “पर्यावरण से जुड़े सरोकारों का लंबा इतिहास है लेकिन आर्थिक विकास के कारण पर्यावरण पर होने वाले असर की चिंता ने 1960 के दशक के बाद से राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया।”
- ★★‘क्लब ऑव रोम’ — “वैश्विक मामलों से सरोकार रखने वाले एक विद्वत् समूह ‘क्लब ऑव रोम’ ने 1972 में ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की। यह पुस्तक दुनिया की बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के अंदेशे को बड़ी खूबी से बताती है।”
- ★UNEP — “संयुक्त राष्ट्रसंघ पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं पर सम्मेलन कराये और इस विषय पर अध्ययन को बढ़ावा देना शुरू किया।”
- “तभी से पर्यावरण वैश्विक राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण मसला बन गया।”
1.5 पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit), 1992★★
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कब और कहाँ | ★1992, रियो डी जनेरियो (ब्राज़ील) |
| किसका | संयुक्त राष्ट्रसंघ का — पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर केंद्रित |
| ★★कौन शामिल | 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय निगम |
| महत्त्व | “वैश्विक राजनीति के दायरे में पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला।” |
- ★पृष्ठभूमि — बर्टलैंड रिपोर्ट: “इस सम्मेलन से पाँच साल पहले (1987) ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ शीर्षक बर्टलैंड रिपोर्ट छपी थी। रिपोर्ट में चेताया गया था कि आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे। विश्व के दक्षिणी हिस्से में औद्योगिक विकास की माँग ज्यादा प्रबल है और रिपोर्ट में इसी हवाले से चेतावनी दी गई थी।”
1.6 रियो में उत्तर-दक्षिण का विभाजन खुलकर सामने आया★★
“रियो-सम्मेलन में यह बात खुलकर सामने आयी कि विश्व के धनी और विकसित देश यानी उत्तरी गोलार्द्ध तथा गरीब और विकासशील देश यानी दक्षिणी गोलार्द्ध पर्यावरण के अलग-अलग अजेंडे के पैरोकार हैं।”
| पक्ष | मुख्य चिंता |
|---|---|
| ★उत्तरी देश | “ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वर्मिंग)” |
| ★दक्षिणी देश | “आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज्यादा चिंतित थे” |
1.7 रियो के परिणाम(प्रश्न 4 का उत्तर)★
- “जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।”
- ★“इसमें ‘अजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाए गए।”
- ★★‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति — “सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। इसे ‘टिकाऊ विकास’ का तरीका कहा गया।”
- ! “लेकिन इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं।”
! दो आलोचनाएँ जो पाठ स्वयं दर्ज़ करता है:
- “समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा।”
- ★“कुछ आलोचकों का कहना है कि ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर है।”
कार्टून (पृ. 84): “अगर आप इस ग्रह को बचाना चाहते हैं तो अपने हाथ उठाएँ…” — बड़ा टोप पहने धनी आदमी हाथ उठाता है पर उंगलियाँ क्रॉस किए हुए (यानी झूठा वादा); पास में एक छोटा, दुबला आदमी सीधा हाथ उठाए हुए। प्रश्न: “क्या पृथ्वी की सुरक्षा को लेकर धनी और गरीब देशों के नज़रिए में अंतर है?”
2. विश्व की साझी संपदा की सुरक्षा (पृ. 84–86)
2.1 ‘साझी संपदा’ की परिभाषा★★
- ★“साझी संपदा उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है।”
- ★उदाहरण: “संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ या नदी”
2.2 ‘वैश्विक संपदा’ / ‘मानवता की साझी विरासत’(प्रश्न 5 का उत्तर)★★
★★“विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। इन्हें ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ कहा जाता है।”
★★इसमें चार शामिल हैं — “पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष।”
2.3 सुरक्षा में कठिनाईध्यान
- ★“‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है।”
- ★महत्वपूर्ण समझौते:
| समझौता | वर्ष |
|---|---|
| ★अंटार्कटिका संधि | 1959 |
| ★मॉन्ट्रियल न्यायाचार (प्रोटोकॉल) | 1987 |
| ★अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार | 1991 |
- ! मूल कठिनाई: “पारिस्थितिकी से जुड़े हर मसले के साथ एक बड़ी समस्या यह जुड़ी है कि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं। ऐसे में एक सर्व-सामान्य पर्यावरणीय अजेंडा पर सहमति कायम करना मुश्किल होता है।”
- ★“इस अर्थ में 1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छेद की खोज एक आँख खोल देने वाली घटना है।”
2.4 बाहरी अंतरिक्ष — वही उत्तर-दक्षिण असमानता★
- “वैश्विक संपदा के रूप में बाहरी अंतरिक्ष के इतिहास से भी पता चलता है कि इस क्षेत्र के प्रबंधन पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों के बीच मौजूद असमानता का असर पड़ा है।”
- ★“धरती के वायुमंडल और समुद्री सतह के समान यहाँ भी महत्वपूर्ण मसला प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास का है।”
- ★★“यह एक जरूरी बात है क्योंकि बाहरी अंतरिक्ष में जो दोहन-कार्य हो रहे हैं उनके फायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।”
बॉक्स — अंटार्कटिका पर किसका स्वामित्व है? (पृ. 85)★
भौगोलिक तथ्य
| मान | विवरण |
|---|---|
| क्षेत्रफल | ★1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर |
| ★विश्व के निर्जन क्षेत्र का हिस्सा | 26 प्रतिशत |
| ★★स्थलीय हिम | 90 प्रतिशत इसी महादेश में |
| ★★धरती का स्वच्छ जल | 70 प्रतिशत इसी महादेश में |
| समुद्र में अतिरिक्त विस्तार | 3 करोड़ 60 लाख वर्ग किलोमीटर |
पारिस्थितिकी
- “सीमित स्थलीय जीवन वाले इस महादेश का समुद्री पारिस्थितिकी-तंत्र अत्यंत उर्वर है” — पादप (सूक्ष्म शैवाल, कवक और लाइकेन), समुद्री स्तनधारी जीव, मत्स्य तथा कठिन वातावरण में जीवनयापन के लिए अनुकूलित पक्षी।
- ★“इसमें क्रिल मछली भी शामिल है जो समुद्री आहार शृंखला की धुरी है और जिस पर दूसरे जानवरों का आहार निर्भर है।”
- ★★“अंटार्कटिक प्रदेश विश्व की जलवायु को संतुलित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस महादेश की अंदरूनी हिमानी परत ग्रीन हाऊस गैस के जमाव का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत है। साथ ही, इससे लाखों बरस पहले के वायुमंडलीय तापमान का पता किया जा सकता है।”
स्वामित्व के दो दावे★★
| दावा | कौन |
|---|---|
| ★संप्रभु अधिकार का वैधानिक दावा | ब्रिटेन, अर्जेन्टीना, चिले, नार्वे, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड |
| ★“यह विश्व की साझी संपदा है और किसी भी देश के क्षेत्राधिकार में शामिल नहीं” | अन्य अधिकांश देश |
- “इस मतभेद के रहते अंटार्कटिका के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के नियम बने और अपनाये गए। ये नियम कल्पनाशील और दूरगामी प्रभाव वाले हैं।”
- ★“1959 के बाद इस इलाके में गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित रही हैं।” ! “लेकिन इतनी कम गतिविधियों के बावजूद इस क्षेत्र के कुछ हिस्से अवशिष्ट पदार्थ जैसे तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 85): ★“बहुत जल्दी ही हमें सुनने को मिलेगा कि चंद्रमा का पर्यावरण भी नष्ट हो गया है।”
3. साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (पृ. 86–87)★★
3.1 दो रवैये
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| ★उत्तर के विकसित देश | “पर्यावरण के मसले पर उसी रूप में चर्चा करना चाहते हैं जिस दशा में पर्यावरण आज मौजूद है” — यानी “पर्यावरण के संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो” |
| ★★दक्षिण के विकासशील देश | “विश्व में पारिस्थितिकी को नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है। यदि विकसित देशों ने पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुँचाया है तो उन्हें इस नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी भी ज्यादा उठानी चाहिए।” और “विकासशील देश अभी औद्योगीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और ज़रूरी है कि उन पर वे प्रतिबंध न लगें जो विकसित देशों पर लगाये जाते हैं।” |
- ★निष्कर्ष: “इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के निर्माण, प्रयोग और व्याख्या में विकासशील देशों की विशिष्ट ज़रूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।”
- ★★“सन् 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस तर्क को मान लिया गया और इसे ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कहा गया।”
3.2 रियो-घोषणापत्र का उद्धरण(प्रश्न 6 का उत्तर यहीं है)★★
“धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए विभिन्न देश विश्व-बंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे। पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होंगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।”
3.3 UNFCCC-1992★
- पूरा नाम: यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC), 1992 — “जलवायु के परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्रसंघ के नियमाचार”
- ★इसमें भी कहा गया: “इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयास करेंगे।”
- ★★दो स्वीकृतियाँ:
- “ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा हिस्सा विकसित देशों का है।”
- “विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है।”
- ★★इसका परिणाम: “इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो-प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।”
3.4 क्योटो प्रोटोकॉल★
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| क्या है | “एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है। इसके अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।” |
| ★कौन-सी गैसें | कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन |
| क्यों | “इनकी वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) में कोई-न-कोई भूमिका ज़रूर है” |
| तापवृद्धि क्या है | “विश्व का तापमान बढ़ता है और धरती के जीवन के लिए यह बात बड़ी प्रलयंकारी साबित होगी” |
| ★★कब और कहाँ | “जापान के क्योटो में 1997 में इस प्रोटोकॉल पर सहमति बनी।” |
| ★सिद्धांतों की रूपरेखा | “1992 में इस समझौते के लिए कुछ सिद्धांत तय किए गए थे और सिद्धांत की इस रूपरेखा यानी UNFCCC पर सहमति जताते हुए हस्ताक्षर हुए थे। क्योटो प्रोटोकॉल पर इन्हीं सिद्धांतों के आलोक में सहमति बनी।” |
साइड-टिप्पणी (पृ. 87): ★“यह जायज सिद्धांत है! हमारे देश में जारी आरक्षण की नीति की तरह! है न?”
कक्षा के लिए: यह टिप्पणी ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ को घरेलू अनुभव से जोड़ती है — समानता का अर्थ हमेशा ‘एक-सा व्यवहार’ नहीं होता। इसे कक्षा में ज़रूर उठाइए।
4. साझी संपदा (पृ. 87–88)
4.1 परिभाषा★
- ★★“साझी संपदा का अर्थ होता है ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो।”
- ★मूल तर्क: “ऐसे संसाधन की प्रकृति, उपयोग के स्तर और रख-रखाव के संदर्भ में समूह के हर सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होंगे और समान उत्तरदायित्व निभाने होंगे।”
- ★भारतीय उदाहरण: “सदियों के चलन और आपसी समझदारी से भारत के ग्रामीण समुदायों ने साझी संपदा के संदर्भ में अपने सदस्यों के अधिकार और दायित्व तय किए हैं।”
4.2 साझी संपदा क्यों सिमट रही हैध्यान
★★“निजीकरण, गहनतर खेती, आबादी की वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट समेत कई कारणों से पूरी दुनिया में साझी संपदा का आकार घट रहा है, उसकी गुणवत्ता और गरीबों को उसकी उपलब्धता कम हो रही है।”
4.3 पावन वन-प्रांत का उदाहरण★
- “राजकीय स्वामित्व वाली वन्यभूमि में पावन माने जाने वाले वन-प्रांत के वास्तविक प्रबंधन की पुरानी व्यवस्था साझी संपदा के रख-रखाव और उपभोग का ठीक-ठीक उदाहरण है।”
- ★“दक्षिण भारत के वन-प्रदेशों में विद्यमान पावन वन-प्रांतों का प्रबंधन परंपरानुसार ग्रामीण समुदाय करता आ रहा है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 88): “लोग कहते हैं कि लातिनी अमरीका में एक नदी बेच दी गई। साझी संपदा कैसे बेची जा सकती है?”
बॉक्स — भारत के पावन वन-प्रांत (पृ. 88)★
- “बहुत से पुराने समाजों में धार्मिक कारणों से प्रकृति की रक्षा करने का चलन है। भारत में विद्यमान ‘पावन वन-प्रांत’ इस चलन के सुंदर उदाहरण हैं।”
- “इस प्रथा में वनों के कुछ हिस्सों को काटा नहीं जाता। इन स्थानों पर देवता अथवा किसी पुण्यात्मा का वास माना जाता है। इन्हें ही ‘पावन वन-प्रांत’ या ‘देवस्थान’ कहा जाता है।”
देशव्यापी नाम — याद रखने योग्य★★
| राज्य | स्थानीय नाम |
|---|---|
| राजस्थान | वानी, केंकड़ी और ओरान |
| झारखंड | जहेरा थान और सरना |
| मेघालय | लिंगदोह |
| केरल | काव |
| उत्तराखंड | थान या देवभूमि |
| महाराष्ट्र | देव रहतिस |
| ”…आदि सैकड़ों नामों से जाना जाता है।” |
- ★“‘देवस्थान’ को हम ऐसी व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं जिसके अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।”
- ★“कुछ अनुसंधानकर्त्ताओं का विश्वास है कि ‘देवस्थान’ की मान्यता से जैव-विविधता और पारिस्थितिकी-संरक्षण में ही नहीं सांस्कृतिक वैविध्य को भी कायम रखने में मदद मिल सकती है।”
- ★★सबसे महत्वपूर्ण वाक्य: “संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखने की प्रतिबद्धता कायम रखी।”
- ! दो समस्याएँ:
- “हाल के सालों में मनुष्यों की बसाहट के विस्तार ने धीरे-धीरे ऐसे ‘देवस्थानों’ पर अपना कब्ज़ा कर लिया है।” और “नयी राष्ट्रीय वन-नीतियों के आने के साथ कई जगहों पर इन परंपरागत वनों की पहचान मंद पड़ने लगी है।”
- ★★कानूनी-व्यावहारिक द्वंद्व: “एक कठिन समस्या तब आती है जब ऐसे स्थान का कानूनी स्वामित्व एक के पास हो और व्यावहारिक नियंत्रण किसी दूसरे के हाथ में — यानी कानूनी स्वामित्व राज्य का हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में। इन दोनों के नीतिगत मानक अलग-अलग हैं और ‘देवस्थान’ के उपयोग के उद्देश्यों में भी इनके बीच कोई मेल नहीं।”
5. पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष (पृ. 88–90)★★
5.1 भारत और क्योटो
- ★★“भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।”
- ★“भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से छूट दी गई है क्योंकि औद्योगीकरण के दौर में ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में इनका कुछ ख़ास योगदान नहीं था। औद्योगीकरण के दौर को मौजूदा वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु-परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है।”
- ! आलोचकों का तर्क: “अन्य विकासशील देशों सहित भारत और चीन भी जल्दी ही ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों की भाँति अगली कतार में नज़र आयेंगे।”
5.2 ग्रुप-8 की बैठक, जून 2005★
- “2005 के जून में ग्रुप-8 के देशों की बैठक हुई। इसमें भारत ने ध्यान दिलाया कि विकासशील देशों में ग्रीन हाऊस गैसों की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है।”
- ★★भारत का विचार: “साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत के अनुरूप भारत का विचार है कि उत्सर्जन-दर में कमी करने की सबसे ज्यादा जिम्मेवारी विकसित देशों की है क्योंकि इन देशों ने एक लंबी अवधि तक बहुत ज्यादा उत्सर्जन किया है।”
5.3 ‘ऐतिहासिक उत्तरदायित्व’ का तर्क★★
- “संयुक्त राष्ट्रसंघ के जलवायु-परिवर्तन से संबंधित बुनियादी नियमाचार UNFCCC के अनुरूप भारत पर्यावरण से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मसलों में ज्यादातर ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का तर्क रखता है।”
- ★“इस तर्क के अनुसार ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज्यादातर विकसित देशों की है।”
- ★★“इसमें जोर देकर कहा गया है कि ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’”
- ! भारत किसके खिलाफ है: “हाल में UNFCCC के अंतर्गत चर्चा चली कि तेजी से औद्योगिक होते देश (जैसे ब्राजील, चीन और भारत) नियमाचार की बाध्यताओं का पालन करते हुए ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करें। भारत इस बात के खिलाफ है। उसका मानना है कि यह बात इस नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध है। भारत पर इस तरह की बाध्यता आयद करना अनुचित भी है।”
5.4 भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन — वह आँकड़ा जो सारा तर्क सिद्ध करता है★★
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| ★विश्व का औसत (सन् 2000) | 3.8 टन प्रति व्यक्ति |
| ★भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (2000 तक) | 0.9 टन |
| ★भारत का अनुमान (2030 तक) | 1.6 टन प्रति व्यक्ति |
| ★★निष्कर्ष | “2030 तक कार्बन का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बढ़ने के बावजूद विश्व के (सन् 2000) के औसत के आधे से भी कम होगा।” |
5.5 भारत के ठोस कदम(प्रश्न 9 का उत्तर यहीं से बनता है)★
| कदम | विवरण |
|---|---|
| ★नेशनल ऑटो-फ्यूल पॉलिसी | “वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य कर दिया है” |
| ★ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2001 | “ऊर्जा के ज्यादा कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी” |
| ★बिजली अधिनियम, 2003 | “नवीकरणीय (Renewable) ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा” |
| स्वच्छ ईंधन | “प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाने की तरफ रुझान” |
| ★बायोडीजल राष्ट्रीय मिशन | “2011-12 तक बायोडीजल तैयार होने लगेगा और इसमें 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल होगा” |
| ★★पेरिस जलवायु समझौता | “भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते को अनुमोदित किया।” |
| ★नवीकरणीय ऊर्जा | “पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है।” |
★“इससे पता चलता है कि भारत पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से ठोस कदम उठा रहा है।”
5.6 1997 का पुनरावलोकन और दक्षेस★
- “भारत ने पृथ्वी-सम्मेलन (रियो) के समझौतों के क्रियान्वयन का एक पुनरावलोकन 1997 में किया।”
- ! मुख्य निष्कर्ष: “विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा पर्यावरण के संदर्भ में बेहतर साबित होने वाली प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।”
- ★भारत की माँग: “विकसित देश विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के लिए तुरंत उपाय करें ताकि विकासशील देश ‘फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज’ की मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकें।”
- ★★क्षेत्रीय पहल: “भारत का यह भी मानना है कि ‘दक्षेस’ (SAARC) में शामिल देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें ताकि इस क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो सके।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 89): ★“मैं समझ गया! पहले उन लोगों ने धरती को बर्बाद किया और अब धरती को चौपट करने की हमारी बारी है। क्या यही है हमारा पक्ष?” — ! यह टिप्पणी भारत के तर्क की सबसे तीखी आलोचना है। कक्षा में इसे ज़रूर उठाइए और दोनों पक्ष रखिए।
पोस्टर (पृ. 89) — ‘पानी में तूफान – जनता परेशान’ (गोबर टाइम्स के पोस्टर पर आधारित) भारत के मानचित्र पर राज्यवार नदियाँ · प्रमुख समुदाय · खतरे —
| राज्य | नदियाँ / समुदाय / खतरे |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड | गंगा, यमुना, गोमती · मल्लाह, धीवर, केवट · औद्योगिक प्रदूषण, बाँध और गैरज़रूरी जल-दोहन |
| मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ | चंबल, बेतवा, नर्मदा · गोरिया, कर्णप्लस, पंखिया · औद्योगिक प्रदूषण, अधिक मत्स्यन |
| बिहार और झारखंड | गंगा, कोसी, सुवर्णरेखा · मल्लाह, मुसाह, केवट, कहँवत · औद्योगिक प्रदूषण, बाँध, नगर निकास |
| असम | ब्रह्मपुत्र · कोईबोर्तों, मेमल, नामशूद्र · कीटनाशक भराव, अधिक मत्स्यन |
| पश्चिमी बंगाल | हुगली, दामोदर · गौर, कर्नाटक, मलो, जालमलो, धुन्या · औद्योगिक प्रदूषण, नगरीय निकास |
| गुजरात | नर्मदा · मंगोल, वली, मछुआरा · औद्योगिक प्रदूषण, बाँध |
| उड़ीसा | मेहंदी · जलिया, कैबार्तो, माझी, कांदरा · औद्योगिक प्रदूषण, बाँध, अधिमत्स्यन |
| आंध्र प्रदेश | गोदावरी, कृष्णा · अंगीकुला क्षत्रिय, बलीजा-वादा पट्टपू, जलारी · औद्योगिक, घरेलू कचरा |
| तमिलनाडु | भवानी, कावेरी, नोयल · भारतर, पटनवन, पर्वतराजकुलम · औद्योगिक प्रदूषण |
| केरल | धीरवा, भरारत, मोंगावीरा, वालन · बोइस मोगयार, चोलननायकन · घरेलू जल निकास, भूजल का अति दोहन |
| तटीय पर्यावरण से जुड़े मुद्दे: मछली और समुद्री जीवन का अतिशय दोहन · मछली और प्रान की बढ़ती माँग से | |
| मेनग्रोव को नुकसान · समुद्र तटों पर **औद्योगिक प्रदूषण; भारी मात्रा में प्रदूषित जल को बिना शोधन के | |
| समुद्र में डालना** · अत्यधिक मशीनीकरण |
6. पर्यावरण आंदोलन — एक या अनेक (पृ. 90–92)
6.1 आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण हैं★★
- “इन चुनौतियों के मद्देनज़र कुछ महत्त्वपूर्ण पेशकदमियाँ सरकारों की तरफ से नहीं बल्कि विश्व के विभिन्न भागों में सक्रिय पर्यावरण के प्रति सचेत कार्यकर्ताओं ने की हैं।”
- ★“आज पूरे विश्व में पर्यावरण आंदोलन सबसे ज्यादा जीवंत, विविधतापूर्ण तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं।”
- ★★“सामाजिक चेतना के दायरे में ही राजनीतिक कार्रवाई के नये रूप जन्म लेते हैं या उन्हें खोजा जाता है। इन आंदोलनों से नए विचार निकलते हैं। इन आंदोलनों ने हमें दृष्टि दी है कि वैयक्तिक और सामूहिक जीवन के लिए आगे के दिनों में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।”
- ★“मौजूदा पर्यावरण आंदोलनों की एक मुख्य विशेषता उनकी विविधता है।”
6.2 (क) वन-आंदोलन★
- कहाँ: ★“दक्षिणी देशों मसलन मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ्रीका और भारत के वन-आंदोलनों पर बहुत दबाव है।”
- ! “तीन दशकों से पर्यावरण को लेकर सक्रियता का दौर जारी है। इसके बावजूद तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों में वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी है। पिछले दशक में विश्व के विशालतम वनों का विनाश बढ़ा है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 91): “चिपको आंदोलन के बारे में और जानकारी जुटाएं।”
6.3 (ख) खनिज-उद्योग के विरुद्ध आंदोलन★
- ★“खनिज-उद्योग पृथ्वी पर मौजूद सबसे ताकतवर उद्योगों में एक है।”
- “वैश्विक अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध के अनेक देशों की अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुल चुकी है।”
- ★★खनिज-उद्योग के पाँच नुकसान:
- “धरती के भीतर मौजूद संसाधनों को बाहर निकालता है”
- “रसायनों का भरपूर उपयोग करता है”
- “भूमि और जलमार्गों को प्रदूषित करता है”
- “स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है”
- ★“इसके कारण जन-समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है”
- ★उदाहरण — फिलीपीन्स: “कई समूहों और संगठनों ने एक साथ मिलकर एक ऑस्ट्रेलियाई बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के खिलाफ अभियान चलाया।”
- ★★“इस कंपनी का विरोध खुद इसके स्वदेश यानी ऑस्ट्रेलिया में हुआ। इस विरोध के पीछे परमाण्विक शक्ति की मुख़ालफत की भावनाएँ काम कर रही हैं। ऑस्ट्रेलिया में इस कंपनी का विरोध आस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों की पैरोकारी के कारण भी किया जा रहा है।”
चित्र (पृ. 92): “बांग्लादेश के उत्तर-पूर्वी जिले दिनाजपुर के शहर फुलवाड़ी में एक पूरा-का-पूरा समुदाय कोयला खनन परियोजना के विरोध में उठ खड़ा हुआ। इस चित्र में अनेक महिलायें प्रस्तावित कोयला परियोजना के विरोध में नारे लगा रही हैं।”
6.4 (ग) बाँध-विरोधी आंदोलन★★
- ★“अब बाँध-विरोधी आंदोलन को नदियों को बचाने के आंदोलनों के रूप में देखने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है क्योंकि ऐसे आंदोलन में नदियों और नदी-घाटियों के ज्यादा टिकाऊ तथा न्यायसंगत प्रबंधन की बात उठायी जाती है।”
- ★★विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन: “1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन दक्षिणी गोलार्द्ध में चला। आस्ट्रेलिया में चला यह आंदोलन फ्रैंकलिन नदी तथा इसके परिवर्ती वन को बचाने का आंदोलन था। यह वन और विजनपन की पैरोकारी करने वाला आंदोलन था ही, बाँध-विरोधी आंदोलन भी था।”
- ★आज की होड़: “फिलहाल दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में तुर्की से लेकर थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका तक तथा इंडोनेशिया से लेकर चीन तक बड़े बाँधों को बनाने की होड़ लगी है।”
- ★★भारत: “भारत में बाँध-विरोधी और नदी हितैषी कुछ अग्रणी आंदोलन चल रहे हैं। इन आंदोलनों में नर्मदा आंदोलन सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।”
- ★★और यह पंक्ति ज़रूर याद रखिए: “यह बात ध्यान देने की है कि भारत में बाँध विरोधी तथा पर्यावरण-बचाव के अन्य आंदोलन एक अर्थ में समानधर्मी हैं क्योंकि ये अहिंसा पर आधारित हैं।”
बॉक्स — क्या वन निर्जन होते हैं? (पृ. 91)★★
★★“दक्षिणी देशों के वन-आंदोलन उत्तरी देशों के वन-आंदोलनों से एक खास अर्थ में भिन्न हैं। दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं जबकि उत्तरी गोलार्द्ध के देशों के वन जनविहीन हैं या कहें कि इन देशों में वन को निर्जन प्रांत के रूप में देखा जाता है।”
| पक्ष | मान्यता |
|---|---|
| ★उत्तरी दृष्टिकोण | “वनभूमि को निर्जन भूमि का दर्जा दिया गया है यानी ऐसी जगह जहाँ लोग नहीं रहते-बसते।” ! “यह दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता।” — पर्यावरण “एक ऐसी चीज जिसे बाग-बगीचे या अभयारण्य में तब्दील कर मनुष्यों से बचाया जाना चाहिए” |
| ★★दक्षिणी दृष्टिकोण | “दक्षिणी देशों में पर्यावरण के अधिकांश मसले इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोग वनों में भी रहते हैं।” |
- ★‘विजनपन’ (wilderness) का दृष्टिकोण कहाँ हावी है: “ऑस्ट्रेलिया, स्कैंडिनेविया, उत्तरी अमरीका और न्यूजीलैंड” — “अधिकांश यूरोपीय देशों के विपरीत इन इलाकों में ‘अविकसित निर्जन वन-क्षेत्र’ अपेक्षाकृत ज्यादा हैं।”
- ★पर दक्षिण में भी विजनपन के अभियान हैं:
- फिलीपीन्स — ‘हरित-संगठनों’ (Green Organisations) ने गरुड़ तथा अन्य शिकारी पक्षियों को विलुप्त होने से बचाने की मुहिम
- भारत — ‘बंगाल-टाइगर’ को बचाने की मुहिम, “क्योंकि इनकी संख्या लुप्त होने की हद तक कम हो चली थी”
- अफ्रीका — हाथीदाँत के व्यापार और हाथियों को निर्दयतापूर्वक मारने के विरुद्ध लंबा अभियान
- ब्राजील और इंडोनेशिया के जंगलों में विजनपन के प्रसिद्ध संघर्ष
- ★“इन सभी अभियानों का ध्यान किसी ख़ास प्रजाति को बचाने पर रहा है, साथ ही इनका जोर निर्जन वन-पर्यावासों को संरक्षण देने पर है।”
- ! “विजनपन से जुड़े अनेक मसलों को हाल के दिनों में जैव-विविधता के मसलों का रूप दिया गया है क्योंकि दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में विजनपन की अवधारणा को स्वीकृति मिलना कठिन है।”
- ★“इनमें से अनेक अभियानों की शुरुआत और वित्तीय मदद वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) जैसे संगठनों ने की। ऐसे प्रयासों में स्थानीय लोगों की मदद भी ली गई।”
कार्टून (पृ. 91): मोटे-तगड़े लोग एक बिजली के खंभे के पास लगे नन्हे-से पौधे को पानी दे रहे हैं। प्रश्न: “क्या आप पर्यावरणविदों के प्रयास से सहमत हैं? पर्यावरणविदों को यहाँ जिस रूप में चित्रित किया गया है क्या आपको वह सही लगता है?”
7. संसाधनों की भू-राजनीति (पृ. 92–95)★★
7.1 परिभाषा
★★“‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’ — ‘संसाधनों की भू-राजनीति’ इन्हीं सवालों से जूझती है।”
- ★“यूरोपीय ताकतों के विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साधन और मकसद संसाधन रहे हैं। संसाधनों को लेकर राज्यों के बीच तनातनी हुई है।”
- ★“संसाधनों से जुड़ी भू-राजनीति को पश्चिमी दुनिया ने ज्यादातर व्यापारिक संबंध, युद्ध तथा ताकत के संदर्भ में सोचा।”
7.2 ऐतिहासिक क्रम★
| काल | संसाधन और उसका महत्त्व |
|---|---|
| ★17वीं सदी से | “समुद्री नौवहन स्वयं इमारती लकड़ियों पर आधारित था, इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकड़ियों की आपूर्ति 17वीं सदी से बाद के समय में प्रमुख यूरोपीय शक्तियों की प्राथमिकताओं में रही।” |
| ★दोनों विश्वयुद्ध | “सामरिक संसाधनों, खासकर तेल की निर्बाध आपूर्ति का महत्त्व बहुत अच्छी तरह उजागर हो गया।” |
| ★★शीतयुद्ध | उत्तरी गोलार्द्ध के विकसित देशों ने चार कदम उठाए (नीचे देखिए) |
7.3 शीतयुद्ध में विकसित देशों के चार कदम★★
- “संसाधन-दोहन के इलाकों तथा समुद्री परिवहन-मार्गों के इर्द-गिर्द सेना की तैनाती”
- “महत्त्वपूर्ण संसाधनों का भंडारण”
- ! “संसाधनों के उत्पादक देशों में मनपसंद सरकारों की बहाली”
- “बहुराष्ट्रीय निगमों और अपने हितसाधक अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को समर्थन देना”
- ★कारण: “पश्चिमी देशों के राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय सरोकार यह था कि संसाधनों तक पहुँच अबाध रूप से बनी रहे क्योंकि सोवियत संघ इसे खतरे में डाल सकता था।”
- ★“एक बड़ी चिंता यह भी थी कि खाड़ी के देशों में मौजूद तेल तथा दक्षिणी और पश्चिमी एशिया के देशों में मौजूद खनिज पर विकसित देशों का नियंत्रण बरकरार रहे।”
- शीतयुद्ध के बाद: “सरकारों की मौजूदा चिंता सुरक्षित आपूर्ति को बनाए रखने की है। अनेक खनिज़, ख़ासकर रेडियोधर्मी खनिजों से जुड़े व्यावसायिक फ़ैसलों को लेकर भी सरकारों को चिंता सताती है।”
- ★★“बहरहाल, वैश्विक रणनीति में तेल लगातार सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है।”
7.4 तेल — आँकड़े जो हर परीक्षा में आते हैं★★
- “बीसवीं सदी के अधिकांश समय में विश्व की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर रही।”
- ★“तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्ज़ा जमाने के लिए राजनीतिक संघर्ष छिड़ता है। पेट्रोलियम का इतिहास युद्ध और संघर्षों का भी इतिहास है।”
- “यह बात पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में सबसे स्पष्ट रूप से नज़र आती है।”
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| ★★पश्चिम एशिया, ख़ासकर खाड़ी-क्षेत्र का विश्व के कुल तेल-उत्पादन में हिस्सा | 30 प्रतिशत |
| ★★इस क्षेत्र में विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का हिस्सा | 64 प्रतिशत — “इस कारण यही एकलौता क्षेत्र है जो तेल की माँग में ख़ास बढ़ोत्तरी होने पर उसकी पूर्ति कर सकता है” |
| ★सऊदी अरब | “विश्व के कुल तेल-भंडार का एक चौथाई हिस्सा”; “विश्व में सबसे बड़ा तेल-उत्पादक देश” |
| ★इराक | “ज्ञात तेल-भंडार सऊदी अरब के बाद दूसरे नंबर पर”; “इराक के एक बड़े हिस्से में तेल-भंडारों की मौजूदगी को लेकर खोज-बीन अभी नहीं हुई है। संभावना है कि इराक का तेल-भंडार 112 अरब बैरल से कहीं ज्यादा हो।” |
| ★खपत कहाँ | “संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत” — ! “लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूरी पर हैं।” |
कार्टून (पृ. 93) — ‘जाएँ तो जाएँ कहाँ’ (एंडी सिंगर): “इसे कहते हैं नव-उपनिवेशवाद”
दो सैनिक खंडहरों के बीच खड़े हैं और एक स्थानीय व्यक्ति से कह रहे हैं — “हमने तुम्हारे देश को मटियामेट कर दिया है। अब उसके पुनर्निर्माण का खर्चा दो।” “हम भुगतान के रूप में पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन स्वीकार करते हैं।”
7.5 पानी — ‘जलयुद्ध’★★
- ★“विश्व-राजनीति के लिए पानी एक और महत्त्वपूर्ण संसाधन है। विश्व के कुछ भागों में साफ पानी की कमी हो रही है। साथ ही, विश्व के हर हिस्से में स्वच्छ जल समान मात्रा में मौजूद नहीं है।”
- ★★“इस कारण, संभावना है कि साझे जल-संसाधन को लेकर पैदा मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों।”
- ★★“इस जीवनदायी संसाधन को लेकर हिंसक संघर्ष होने की संभावना है और इसी को इंगित करने के लिए विश्व-राजनीति के कुछ विद्वानों ने ‘जलयुद्ध’ शब्द गढ़ा है।”
- ★प्रचलित मतभेद का ढाँचा: “जलधारा के उद्गम से दूर बसा हुआ देश उद्गम के नजदीक बसे हुए देश द्वारा इस पर बाँध बनाने, इसके माध्यम से अत्यधिक सिंचाई करने या इसे प्रदूषित करने पर आपत्ति जताता है क्योंकि ऐसे कामों से दूर बसे हुए देश को मिलने वाले पानी की मात्रा कम होगी या उसकी गुणवत्ता घटेगी।”
- ★दो उदाहरण:
- “1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जार्डन के बीच हुआ संघर्ष। इनमें से प्रत्येक देश ने जॉर्डन और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोशिश की थी।”
- “फिलहाल तुर्की, सीरिया और इराक के बीच फरात नदी पर बाँध के निर्माण को लेकर एक-दूसरे से ठनी हुई है।”
- “बहुत से देशों के बीच नदियों का साझा है और उनके बीच सैन्य-संघर्ष होते रहते हैं।”
कार्टून (पृ. 95): एक H₂O लिखी बोतल जिसके भीतर पृथ्वी है और नीचे थोड़ा-सा पानी बचा है। “पृथ्वी पर पानी का विस्तार ज्यादा और भूमि का विस्तार कम है। फिर भी, कार्टूनिस्ट ने ज़मीन को पानी की अपेक्षा ज्यादा बड़े हिस्से में दिखाने का फैसला किया है। यह कार्टून किस तरह पानी की कमी को चित्रित करता है?”
साइड-टिप्पणी (पृ. 95): “हमारे देश में भी पानी को लेकर बड़े झगड़े-टंटे चल रहे हैं। ये संघर्ष उनसे किस तरह अलग हैं?”
बॉक्स — तेल देखो, तेल की धार देखो…!! (पृ. 94)
- ★“हमारे जीवन में पेट्रोलियम पर आधारित उत्पादों की कड़ी अंतहीन है। टूथपेस्ट, पेसमेकर, पेंट, स्याही…”
- ★★“दुनिया को परिवहन के लिए जितनी ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है उसका ९५ (95) फीसदी पेट्रोलियम से ही पूरा होता है। पूरी औद्योगिक दुनिया पेट्रोलियम के बूते टिकी है। हम इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते।”
- “हालाँकि जमीन के नीचे अभी अरबों बैरल तेल हमारे इस्तेमाल के इंतजार में पड़ा है फिर भी देशों के बीच विवाद है।”
चार व्यंग्य-पात्र — कक्षा में यह बॉक्स ज़रूर पढ़ाइए★
| पात्र | कौन | क्या कहता है |
|---|---|---|
| शेख पैट्रो डॉलर-उल्ला | ‘काला सोना मुल्क’ के सुल्तान | “मैं खुशहाल और मालदार हूँ… अगर उनकी फ़ौज मेरे मुल्क में गश्त कर रही है तो करे, मुझे क्या?” ! “बिग ऑयल कहते हैं कि उनके राष्ट्रपति आज़ादी और जम्हूरियत को बड़ा कीमती मानते हैं इसीलिए मैंने भी अपने मुल्क में आजादी और जम्हूरियत को सात तालों के भीतर बंद करके रखा है।” |
| जनाब बिग ऑयल | बिग ऑयल एंड संस के सीईओ | ! “मैं बाजार की आज़ादी का हामी हूँ। मतलब यह कि दूर के देशों में तेल के कुएँ खोदने की आज़ादी; धरती की आबो-हवा को मटियामेट करने की आज़ादी और ऐसे कठपुतले तानाशाहों की ताजपोशी की आज़ादी जो अपनी ही जनता पर कोड़े फटकारे।” |
| श्री एवं श्रीमती बड़बोले | उपभोक्ता दंपति | “हमारे गैराज में एक शानदार चीज नुमाया है… हमें जल्दी-जल्दी पहुँचना है। ऊपर वाला सबका भला करे। तो चलो हुर्र…” |
| जनाब ग़लत-निशानची | सशस्त्र समूह | ! “ऐसी ही मिसाइल और बंदूकें उन्होंने हमें रूसी भालुओं से लड़ने के लिए दी थीं… हमें नहीं पता था कि ये लोग तेल के पीछे पड़े हैं… मजा यह है कि तख़्तापलट को उसके ही खेल में जब मात देनी होती है तो उनके दिए गोले-बारूद और मिसाइल हमारे लिए बड़े काम के साबित होते हैं।” |
★★कक्षा के लिए: यह बॉक्स तेल की भू-राजनीति के चारों पक्षों को एक साथ दिखाता है — उत्पादक शासक, बहुराष्ट्रीय निगम, उपभोक्ता और सशस्त्र समूह। यह पूरे खंड 7 का सबसे अच्छा सारांश है।
8. मूलवासी (Indigenous People) और उनके अधिकार (पृ. 95–97)★★
8.1 यह विषय यहाँ क्यों है★
“मूलवासियों का सवाल पर्यावरण, संसाधन और राजनीति को एक साथ जोड़ देता है।”
8.2 संयुक्त राष्ट्रसंघ की परिभाषा (1982)★★
★★“संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1982 में इनकी एक शुरुआती परिभाषा दी। इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे। फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से उस देश में आये और इन लोगों को अधीन बना लिया।”
- ★“किसी देश के ‘मूलवासी’ आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से ज्यादा अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रिवाज तथा अपने ख़ास सामाजिक, आर्थिक ढर्रे पर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं।”
8.3 आँकड़े — याद रखने योग्य★★
| स्थान | संख्या |
|---|---|
| ★★विश्व भर में (भारत सहित) | लगभग 30 करोड़ |
| फिलीपीन्स — कोरडिलेरा क्षेत्र | 20 लाख |
| चिले — मापुशे | 10 लाख |
| बांग्लादेश — चटगांव पर्वतीय क्षेत्र | 6 लाख आदिवासी |
| उत्तर अमरीकी मूलवासी | 35 लाख |
| पनामा नहर के पूरब — कुना | 50 हज़ार |
| उत्तरी सोवियत | 10 लाख |
8.4 मूलवासी कहाँ रहते हैं★
- “मध्य और दक्षिण अमरीका, अफ्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया तथा भारत” — “जहाँ इन्हें आदिवासी या जनजाति कहा जाता है”
- ★“ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत ओसियाना क्षेत्र के बहुत से द्वीपीय देशों में हजारों सालों से पॉलिनेशिया, मैलनेशिया और माइक्रोनेशिया वंश के मूलवासी रहते हैं।”
8.5 माँग और विश्वदृष्टि★★
- ★“सरकारों से इनकी माँग है कि इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए।”
- ★★“अपने मूल वासस्थान पर हक की दावेदारी में विश्वभर के मूलनिवासी यह जुमला इस्तेमाल करते हैं कि हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’।”
- ★“भौगोलिक रूप से चाहे मूलवासी अलग-अलग जगहों पर कायम हैं लेकिन जमीन और उस पर आधारित विभिन्न जीवन-प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्टि आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है।”
- ★★सबसे मार्मिक वाक्य: “भूमि की हानि का अर्थ है, आर्थिक-संसाधनों के एक आधार की हानि और यह मूलवासियों के जीवन के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?”
8.6 भारत में मूलवासी★★
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| ★शब्द | “‘मूलवासी’ के लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द प्रयोग किया जाता है।” |
| ★★संख्या | “ये कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं।” |
| जीविका | “अपवादस्वरूप कुछेक घुमन्तू जनजातियों को छोड़ दें तो भारत की अधिकांश आदिवासी जनता अपने जीवन-यापन के लिए खेती पर निर्भर हैं।” |
| परंपरा | “सदियों से ये लोग बेधड़क जितनी बन पड़े उतनी जमीन पर खेती करते आ रहे थे।” |
| ! मोड़ | “लेकिन, ब्रितानी औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद से जनजातीय समुदायों का सामना बाहरी लोगों से हुआ।” |
★★और अध्याय का सबसे तीखा निष्कर्ष: “हालाँकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से इनको संवैधानिक सुरक्षा हासिल है लेकिन देश के विकास का इन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिल सका है। आजादी के बाद से विकास की बहुत सी परियोजनाएँ चलीं और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। ऐसी परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह समुदाय सबसे बड़ा है। दरअसल इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”
8.7 अंतर्राष्ट्रीय संगठन★
- “मूलवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक उपेक्षित रहे हैं। हाल के दिनों में इस सवाल पर ध्यान दिया जाने लगा है।”
- ★“1970 के दशक में विश्व के विभिन्न भागों के मूलवासियों के नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा। इससे इनके साझे अनुभवों और सरोकारों को एक शक्ल मिली।”
- ★★“1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले इस परिषद् को परामर्शदायी परिषद् का दर्ज़ा दिया गया। इसके अतिरिक्त आदिवासियों के सरोकारों से संबद्ध 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों को भी यह दर्ज़ा दिया गया है।”
- ✓ आगे का संकेत (यह सही है): “अगले अध्याय में वैश्वीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन की चर्चा की गई है। इनमें अनेक आंदोलनों ने मूलवासियों के अधिकारों पर जोर दिया है।” → अगला अध्याय 7 = वैश्वीकरण। ✓ यह संदर्भ अनाथ नहीं है।
साइड-टिप्पणी (पृ. 96): ★“आदिवासी जनता और उनके आंदोलनों के बारे में कुछ ज्यादा बातें क्यों नहीं सुनायी पड़तीं? क्या मीडिया का उनसे कोई मनमुटाव है?”
कार्टून (पृ. 96) — ‘एक चम्मच पर्यावरण भी!’ शहरी इलाके के एक आदमी को चम्मच से हरियाली खिलाई जा रही है। “क्या आपको यह नजरिया जँचता है जिसमें एक शहरी इलाके के आदमी को प्रकृतिखोर और लालची दिखाया गया है?”
आओ मिलजुल कर करें (पृ. 97)
चरण:
- “हर छात्र से कहें कि अपने रोज़मर्रा के इस्तेमाल की दस वस्तुओं की सूची बनाए।” (कलम/कागज/इरेजर/ कंप्यूटर/पानी आदि)
- “छात्रों से कहें कि वे इन वस्तुओं के निर्माण में प्रयुक्त प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा का आकलन करें।” — पानी हो तो “प्रति गैलन पानी की पंपिंग और परिशोधन में लगी बिजली की मात्रा की गणना करें।”
अध्यापकों के लिए:
- “हर छात्र द्वारा बतायी गई संख्या को एकत्र कर लें फिर इसे जोड़ दें ताकि पता लगे कि उक्त कक्षा के छात्रों द्वारा संसाधनों की कितनी मात्रा का उपयोग हुआ।”
- “इसी विद्यालय की बाकी कक्षाओं से इस अभ्यास को जोड़ें, फिर देश के सभी विद्यालयों के लिए इसका आकलन करें। देश के स्तर पर जो आंकड़ा आए उसका इस्तेमाल दूसरे देशों के स्कूल में उपभोग किए जा रहे संसाधनों की मात्रा से तुलना करने में भी हो सकता है।” (देशों का चयन करते समय ध्यान रखें कि वे विकसित/विकासशील/अविकसित देशों में से हों)
- “छात्रों से कहें कि वे उस मात्रा का अनुमान लगाएँ जिसका हम उपभोग कर रहे हैं। उनसे भविष्य में किए जाने वाले उपभोग की मात्रा का अनुमान लगाने को कहें।”
1. पर्यावरण के प्रति बढ़ते सरोकारों का क्या कारण है? निम्नलिखित में सबसे बेहतर विकल्प चुनें। (क) विकसित देश प्रकृति की रक्षा को लेकर चिंतित हैं। (ख) पर्यावरण की सुरक्षा मूलवासी लोगों और प्राकृतिक पर्यावासों के लिए ज़रूरी है। (ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान ख़तरे की हद तक पहुँच गया है। (घ) इनमें से कोई नहीं।
2. निम्नलिखित कथनों में प्रत्येक के आगे सही या ग़लत का चिह्न लगायें। ये कथन पृथ्वी-सम्मेलन के बारे में हैं — (क) इसमें 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भाग लिया। (ख) यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्त्वावधान में हुआ। (ग) वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों ने पहली बार राजनीतिक धरातल पर ठोस आकार ग्रहण किया। (घ) यह महासम्मेलनी बैठक थी।
3. ‘विश्व की साझी विरासत’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-से कथन सही हैं? (क) धरती का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष को ‘विश्व की साझी विरासत’ माना जाता है। (ख) ‘विश्व की साझी विरासत’ किसी राज्य के संप्रभु क्षेत्राधिकार में नहीं आते। (ग) ‘विश्व की साझी विरासत’ के प्रबंधन के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच मतभेद है। (घ) उत्तरी गोलार्द्ध के देश ‘विश्व की साझी विरासत’ को बचाने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से कहीं ज्यादा चिंतित हैं।
4. रियो सम्मेलन के क्या परिणाम हुए?
5. ‘विश्व की साझी विरासत’ का क्या अर्थ है? इसका दोहन और प्रदूषण कैसे होता है?
6. ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ से क्या अभिप्राय है? हम इस विचार को कैसे लागू कर सकते हैं?
7. वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार क्यों बन गए हैं?
8. पृथ्वी को बचाने के लिए ज़रूरी है कि विभिन्न देश सुलह और सहकार की नीति अपनाएँ। पर्यावरण के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच जारी वार्ताओं की रोशनी में इस कथन की पुष्टि करें।
9. विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती वैश्विक पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुँचाए बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह कैसे हो सकता है? कुछ उदाहरणों के साथ समझाएँ।
उत्तर देखिए
उत्तर-कुंजी: पाठ्यपुस्तक में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है और कोई सारांश खंड भी नहीं है। उत्तर
05-Question-Bank.mdमें शिक्षक द्वारा तैयार हैं।
शब्दावली
| पद | अंग्रेज़ी | अध्याय में प्रयुक्त अर्थ |
|---|---|---|
| ★साझी संपदा | Common property resources | “जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है”; “ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो” |
| ★★वैश्विक संपदा / मानवता की साझी विरासत | Global commons / Common heritage of mankind | “किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर”; चार — पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष |
| ★★साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ | Common but differentiated responsibilities | “पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है” — इसलिए जिम्मेदारी भी अलग-अलग; 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकृत |
| ★टिकाऊ विकास | Sustainable development | “आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे” |
| ★पृथ्वी सम्मेलन | Earth Summit | 1992, रियो डी जनेरियो; 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन और अनेक बहुराष्ट्रीय निगम |
| ★अजेंडा-21 | Agenda 21 | रियो में सुझाए गए “विकास के कुछ तौर-तरीके”; ! आलोचना — “झुकाव पर्यावरण संरक्षण के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर” |
| ★बर्टलैंड रिपोर्ट | Brundtland Report | ‘अवर कॉमन फ्यूचर’, 1987 — “आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे” |
| ★क्लब ऑव रोम / लिमिट्स टू ग्रोथ | Club of Rome / Limits to Growth | विद्वत् समूह; 1972 की पुस्तक — “बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का अंदेशा” |
| UNEP | UN Environment Programme | संयुक्त राष्ट्रसंघ पर्यावरण कार्यक्रम |
| ★UNFCCC | UN Framework Convention on Climate Change | 1992 — जलवायु-परिवर्तन का बुनियादी नियमाचार |
| ★क्योटो प्रोटोकॉल | Kyoto Protocol | 1997, जापान के क्योटो में — औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों में कटौती के लक्ष्य; ★भारत ने 2002 में हस्ताक्षर और अनुमोदन किया |
| ★ग्रीन हाऊस गैसें | Greenhouse gases | कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन |
| ★ओज़ोन परत में छेद | Ozone hole | “धरती के ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन गैस की मात्रा में लगातार कमी”; 1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर खोज |
| ★ऐतिहासिक उत्तरदायित्व | Historical responsibility | “ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज्यादातर विकसित देशों की है” — भारत का मुख्य तर्क |
| ★पावन वन-प्रांत / देवस्थान | Sacred groves | “वनों के कुछ हिस्सों को काटा नहीं जाता”; समुदाय-आधारित संसाधन-प्रबंधन |
| ★विजनपन | Wilderness | निर्जन, अछूता प्रकृति-क्षेत्र; उत्तरी देशों का दृष्टिकोण जो “मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता” |
| ★★संसाधनों की भू-राजनीति | Geopolitics of resources | “किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है” |
| ★जलयुद्ध | Water wars | “साझे जल-संसाधन को लेकर पैदा मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों” |
| ★★मूलवासी | Indigenous people | UN की 1982 की परिभाषा — “ऐसे लोगों का वंशज जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे” और जिन्हें बाहर से आए लोगों ने अधीन बना लिया |
| अनुसूचित जनजाति / आदिवासी | Scheduled Tribes | भारत में मूलवासियों के लिए प्रयुक्त शब्द; कुल जनसंख्या का 8 प्रतिशत |
| ★वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल | World Council of Indigenous Peoples | 1975 में गठन; UN में परामर्शदायी दर्ज़ा |
| ★नर्मदा आंदोलन | Narmada movement | भारत का सबसे प्रसिद्ध बाँध-विरोधी आंदोलन |
| WWF | World Wildlife Fund | विजनपन-अभियानों को शुरुआत और वित्तीय मदद |
मुख्य तिथियाँ और आँकड़े
| मान | संदर्भ |
|---|---|
| ★1960 का दशक | पर्यावरण की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया |
| ★1972 | ‘क्लब ऑव रोम’ — ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ |
| ★1987 | बर्टलैंड रिपोर्ट — ‘अवर कॉमन फ्यूचर’; मॉन्ट्रियल न्यायाचार |
| ★★1992 | पृथ्वी सम्मेलन, रियो — 170 देश; UNFCCC; ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ स्वीकृत |
| ★1997 | क्योटो प्रोटोकॉल (जापान); भारत का रियो-पुनरावलोकन |
| ★★2002 | भारत ने क्योटो पर हस्ताक्षर और अनुमोदन किया |
| ★★2 अक्तूबर 2016 | भारत ने पेरिस जलवायु समझौते को अनुमोदित किया |
| ★1959 · 1987 · 1991 | अंटार्कटिका संधि · मॉन्ट्रियल न्यायाचार · अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार |
| ★2016 | UN मानव विकास रिपोर्ट — 66.3 करोड़ को स्वच्छ जल नहीं; 2.40 अरब साफ-सफाई से वंचित; 30 लाख+ बच्चे प्रतिवर्ष मृत |
| ★1 करोड़ 40 लाख वर्ग किमी · 26% · 90% · 70% | अंटार्कटिका — क्षेत्रफल · निर्जन क्षेत्र · स्थलीय हिम · स्वच्छ जल |
| ★3.8 टन · 0.9 टन · 1.6 टन | विश्व औसत (2000) · भारत (2000) · भारत (2030 अनुमान) |
| ★2001 · 2003 · 2011-12 | ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम · बिजली अधिनियम · बायोडीजल मिशन का लक्ष्य |
| 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर | बायोडीजल मिशन के लिए प्रस्तावित भूमि |
| ★जून 2005 | ग्रुप-8 की बैठक — भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का तर्क |
| ★1980 का दशक | विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन — ऑस्ट्रेलिया, फ्रैंकलिन नदी; अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन छेद की खोज |
| ★★30% · 64% · एक चौथाई · 112 अरब बैरल | खाड़ी का तेल-उत्पादन · ज्ञात भंडार · सऊदी अरब का हिस्सा · इराक का अनुमान |
| ★95 फीसदी | परिवहन की ऊर्जा-ज़रूरत जो पेट्रोलियम से पूरी होती है |
| ★1950-60 का दशक | इज़रायल, सीरिया, जार्डन का जल-संघर्ष (जॉर्डन और यारमुक नदी) |
| ★★30 करोड़ · 8 प्रतिशत | विश्व में मूलवासी · भारत में अनुसूचित जनजाति |
| ★1982 · 1975 · 1970 का दशक · 10 संगठन | UN की परिभाषा · वर्ल्ड काउंसिल का गठन · नेताओं का संपर्क · परामर्शदायी दर्ज़ा पाए अन्य संगठन |
भ्रमित करने वाले युग्मध्यान
| युग्म | भेद |
|---|---|
| ★★साझी संपदा बनाम वैश्विक संपदा | साझी संपदा = किसी समुदाय की (चारागाह, कुआँ, नदी); वैश्विक संपदा = किसी देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर (वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह, बाहरी अंतरिक्ष) |
| ★★1992 बनाम 1997 | 1992 = पृथ्वी सम्मेलन और UNFCCC; 1997 = क्योटो प्रोटोकॉल |
| ★1997 बनाम 2002 | क्योटो प्रोटोकॉल का वर्ष बनाम भारत के हस्ताक्षर/अनुमोदन का वर्ष |
| ★UNFCCC बनाम क्योटो प्रोटोकॉल | UNFCCC = सिद्धांतों की रूपरेखा (1992); क्योटो = उन्हीं सिद्धांतों के आलोक में बना बाध्यकारी समझौता (1997) |
| ★बर्टलैंड रिपोर्ट बनाम लिमिट्स टू ग्रोथ | ‘अवर कॉमन फ्यूचर’, 1987, टिकाऊ विकास बनाम ‘क्लब ऑव रोम’, 1972, संसाधनों का विनाश |
| ★अंटार्कटिका संधि बनाम अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार | 1959 बनाम 1991 |
| ★★उत्तरी बनाम दक्षिणी अजेंडा | उत्तर — ओज़ोन छेद और वैश्विक तापवृद्धि; दक्षिण — आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन का रिश्ता |
| ★उत्तरी बनाम दक्षिणी वन-आंदोलन | उत्तर — वन ‘निर्जन प्रांत’, मनुष्य प्रकृति का हिस्सा नहीं; दक्षिण — “लोग वनों में भी रहते हैं” |
| ★30% बनाम 64% | खाड़ी का तेल-उत्पादन में हिस्सा बनाम ज्ञात तेल-भंडार में हिस्सा |
| ★सऊदी अरब बनाम इराक | सऊदी — कुल भंडार का एक चौथाई और सबसे बड़ा उत्पादक; इराक — ज्ञात भंडार में दूसरा; 112 अरब बैरल से ज्यादा का अनुमान |
| ! मूलवासी बनाम आप्रवासी | मूलवासी = “अनंत काल से रहते चले आ रहे”; अध्याय 5 का आप्रवासी = अपनी मर्जी से स्वदेश छोड़ने वाला |
| ★30 करोड़ बनाम 8 प्रतिशत | विश्व में मूलवासियों की कुल संख्या बनाम भारत की जनसंख्या में अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा |