Chapter 2एक दल के प्रभुत्व का दौर

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), अध्याय 2, पृ. 26–43. पुनर्मुद्रण 2026-27.

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0. यह अध्याय किस बारे में है

अध्याय 1 राष्ट्र-निर्माण (एकता) की चुनौती पर था; यह अध्याय दूसरी चुनौती — लोकतंत्र स्थापित करने — पर है। तर्क दो हिस्सों में चलता है। पहला: उपनिवेश से आज़ाद हुए अधिकतर देशों ने “पहले एकता, लोकतंत्र बाद में” का रास्ता चुना और अलोकतांत्रिक हो गए — भारत ने कहीं ज्यादा कठिन रास्ता चुना और 17 करोड़ मतदाताओं के साथ, जिनमें 15% साक्षर थे, सार्वभौम मताधिकार पर चुनाव कराए। दूसरा: इसके बावजूद पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का असाधारण प्रभुत्व रहा — पर यह प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर नहीं, लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ, और इसका कारण यह था कि कांग्रेस स्वयं एक गठबंधन थी — सामाजिक भी और विचारधारात्मक भी। इसी व्यवस्था को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है, जिसमें कांग्रेस ने शासक-दल और विपक्ष, दोनों की भूमिका निभाई।

1. लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती (पृ. 27)

  • तुलनात्मक पृष्ठभूमि: उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए कई देशों के नेताओं ने तय किया कि अभी लोकतंत्र नहीं अपनाया जा सकता — तर्क यह कि “राष्ट्रीय एकता हमारी पहली प्राथमिकता है और लोकतंत्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा।”
  • अलोकतांत्रिक शासन के तीन रूप: (i) थोड़ा-बहुत लोकतंत्र, पर प्रभावी नियंत्रण एक नेता के हाथ; (ii) एक दल का शासन; (iii) सीधे-सीधे सेना ने सत्ता की बागडोर सँभाली।
  • इनकी शुरुआत इस वायदे से हुई कि जल्दी ही लोकतंत्र कायम कर दिया जाएगा — पर एक बार अलोकतांत्रिक शासन के पाँव जम गए तो उसे बदल पाना मुश्किल होता गया।
  • भारत ने कहीं ज्यादा कठिन रास्ता चुना। कारण: स्वतंत्रता-संग्राम की गहरी प्रतिबद्धता लोकतंत्र से थी। हमारे नेता राजनीति को समस्या के रूप में नहीं देखते थे; वे राजनीति को समस्या के समाधान का उपाय मानते थे।
  • संविधान का कालक्रम: 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत → 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षर → 26 जनवरी 1950 से अमल में आया।
  • ★भारत के चुनाव आयोग का गठन 1950 के जनवरी में हुआ। सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।
  • उम्मीद थी कि पहला आम चुनाव 1950 में ही हो जाएगा।

उद्धरण — डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान सभा में भाषण, 25 नवंबर 1949

“हिंदुस्तान की राजनीति में नायक-पूजा जितनी बड़ी भूमिका अदा करती है, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी देश की राजनीति में मौजूद नायक-पूजा के भाव से नहीं की जा सकती… लेकिन राजनीति में नायक-पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और यह रास्ता तानाशाही की तरफ़ जाता है…”

कार्टून-संवाद (पृ. 27)

“हमारे लोकतंत्र में ही ऐसी कौन-सी खूबी है? आखिर देर-सबेर हर देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना ही लिया है। है न?”

2. पहला आम चुनाव — तैयारी और उसका पैमाना (पृ. 28–30)

2.1 चुनाव आयोग के सामने कठिनाइयाँ (पृ. 28)

  • चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन और मतदाता-सूची बनाना — दोनों में बहुत समय लगा।
  • ★मतदाता-सूचियों के पहले प्रारूप में 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए थे — उन्हें ‘अलां की बेटी’, ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज किया गया था। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया और तय किया कि संभव हो तो पुनरावलोकन किया जाए और ऐसी प्रविष्टियाँ हटाई जाएँ।
  • यह “अपने आप में हिमालय की चढ़ाई जैसा दुष्कर काम था। इतने बड़े पैमाने का ऐसा काम दुनिया में अब तक नहीं हुआ था।”

2.2 पहले आम चुनाव के आँकड़े★

मात्रामान
कुल मतदाता17 करोड़
चुने जाने थे — विधायक3,200
चुने जाने थे — लोकसभा सांसद489
मतदाताओं में साक्षरमात्र 15 फीसदी
प्रशिक्षित अधिकारी और चुनावकर्मी3 लाख से ज्यादा
मतपेटियों के लिए स्टील के बक्सेतकरीबन 20 लाख
  • साक्षरता इतनी कम होने के कारण चुनाव आयोग को मतदान की विशेष पद्धति के बारे में सोचना पड़ा।
  • उस समय तक लोकतंत्र सिर्फ धनी देशों में ही कायम था, और यूरोप के बहुतेरे देशों में महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला था।

2.3 आलोचना — और उसका उत्तर (पृ. 30)

  • एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे “इतिहास का सबसे बड़ा जुआ” करार दिया।
  • ‘आर्गनाइजर’ नामक पत्रिका ने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू “अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।”
  • इंडियन सिविल सर्विस के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे का दावा — “आने वाला वक्त और अब से कहीं ज्यादा जानकार दौर बड़े विस्मय से लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी देखेगा।”
  • ★चुनावों को दो बार स्थगित करना पड़ा; आखिरकार 1951 के अक्तूबर से 1952 के फरवरी तक चुनाव हुए। इसे अमूमन ‘1952 का चुनाव’ ही कहा जाता है क्योंकि देश के अधिकांश हिस्सों में मतदान 1952 में ही हुआ।
  • चुनाव अभियान, मतदान और मतगणना में कुल छह महीने लगे।
  • औसतन हर सीट के लिए चार उम्मीदवार मैदान में थे; कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने वोट डाला।
  • हारने वाले उम्मीदवारों ने भी परिणामों को निष्पक्ष बताया।
  • टाइम्स ऑफ इंडिया — इन चुनावों ने “उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया है जो सार्वभौम मताधिकार की इस शुरुआत को इस देश के लिए जोखिम का सौदा मान रहे थे।”
  • हिंदुस्तान टाइम्स — “यह बात हर जगह मानी जा रही है कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया।”
  • ★निष्कर्ष: “1952 का आम चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। अब यह दलील दे पाना संभव नहीं रहा कि लोकतांत्रिक चुनाव गरीबी अथवा अशिक्षा के माहौल में नहीं कराए जा सकते।”

बॉक्स — मतदान के बदलते तरीके (पृ. 29)

दौरतरीका
पहला आम चुनावहर मतदान केंद्र में प्रत्येक उम्मीदवार के लिए एक अलग मतपेटी, जिस पर उसका चुनाव-चिह्न; मतदाता को खाली मतपत्र मिलता, जिसे वह अपने पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालता
शुरुआती दो चुनावों के बादमतपत्र पर हर उम्मीदवार का नाम और चुनाव-चिह्न; मतदाता को अपने पसंद के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यह तरीका अगले चालीस सालों तक अमल में रहा
1990 के दशक के अंतचुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल शुरू किया
2004पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल चालू हो गया
  • पंजाब के एक पीठासीन पदाधिकारी का ब्योरा: मतपेटी के भीतर और बाहर संबद्ध उम्मीदवार का चुनाव-चिह्न अंकित करना; बाहर एक तरफ़ नाम उर्दू, हिंदी और पंजाबी में; चुनाव-क्षेत्र, चुनाव-केंद्र और मतदान-केंद्र की संख्या भी; यह सब चुनाव की नियत तारीख से ठीक एक दिन पहले; कुल छह लोगों ने पाँच घंटे लगातार काम किया; “इस काम में मेरी दो बेटियाँ भी लगी हुई थीं। यह सारा काम मेरे घर पर ही हुआ।”
  • चित्र: लोकसभा के तीसरे आम चुनाव से तेरहवें आम चुनाव तक इस्तेमाल किए गए बैलट पेपर का नमूना।

खोज-बीन गतिविधि (पृ. 29)

परिवार और पड़ोस के बुज़ुर्गों से पूछिए — (i) क्या किसी ने पहले या दूसरे आम चुनाव में भाग लिया था? किसे वोट दिया और क्यों? (ii) क्या कोई ऐसा है जिसने तीनों तरीकों से मतदान किया हो? कौन-सा सबसे ज्यादा पसंद आया? (iii) उस दौर और आज के चुनावों में क्या-क्या फ़र्क नज़र आते हैं?

कार्टून-संवाद (पृ. 28)

“यह एक सही फ़ैसला था। लेकिन ऐसे लोगों का क्या किया जाए जो अभी भी औरतों को किसी की पत्नी के रूप में देखने के आदी हैं। इस तरह के व्यवहार से लगता है, मानो एक स्त्री का कोई नाम ही न हो।”

3. पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व (पृ. 30–32)

3.1 कांग्रेस की बढ़त के कारण

  • स्वाधीनता संग्राम की विरासत — कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन के वारिस के रूप में देखा गया।
  • तब के दिनों में यही एकमात्र पार्टी थी जिसका संगठन पूरे देश में था; संगठन का नेटवर्क स्थानीय स्तर तक पहुँच चुका था।
  • जवाहरलाल नेहरू — भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता; उन्होंने चुनाव अभियान की अगुआई की और पूरे देश का दौरा किया।
  • आज़ादी के आंदोलन के अनेक अग्रणी नेता अब कांग्रेस के उम्मीदवार थे।
  • अनेक पार्टियों का गठन स्वतंत्रता के समय के आस-पास अथवा उसके बाद हुआ — कांग्रेस को ★‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा मिला।
  • “कांग्रेस हाल-फिलहाल तक आजादी के आंदोलन की अगुआ रही थी और उसकी प्रकृति सबको समेटकर मेलजोल के साथ चलने की थी।”

3.2 तीनों चुनावों के परिणाम★

चुनाववर्षलोकसभा सीटेंकांग्रेस को मिलीं
पहला आम चुनाव1952489364
दूसरा आम चुनाव1957494371
तीसरा आम चुनाव1962494361
  • ★पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही — कुल 16 सीट।
  • विधानसभा चुनावों में भी बड़ी जीत। त्रावणकोर-कोचीन (आज के केरल का एक हिस्सा), मद्रास और उड़ीसा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस ने अधिकतर सीटों पर जीत दर्ज की — और आखिरकार इन तीन राज्यों में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी।
  • जवाहरलाल नेहरू पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने।
  • दूसरे और तीसरे चुनाव में भी कांग्रेस को तीन-चौथाई सीटें मिलीं। ★कांग्रेस ने जितनी सीटें जीतीं उसका दशांश भी कोई विपक्षी पार्टी नहीं जीत सकी।
  • विधानसभा चुनावों में कहीं-कहीं कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला — सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण केरल (1957)।

3.3 चुनाव-प्रणाली का योगदान★★

  • ★1952 में कांग्रेस को कुल वोटों में से मात्र 45 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन 74 फीसदी सीटें मिलीं।
  • ★सोशलिस्ट पार्टी वोट हासिल करने के लिहाज़ से दूसरे नंबर पर रही — कुल 10 प्रतिशत वोट, पर 3 प्रतिशत सीटें भी नहीं जीत पायी।
  • कारण — ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ (First Past The Post) प्रणाली। यदि कोई पार्टी बाकियों की अपेक्षा थोड़े ज्यादा वोट हासिल करती है तो उसे दूसरी पार्टियों को प्राप्त वोटों के अनुपात की तुलना में कहीं ज्यादा सीटें मिलती हैं।
  • सभी गैर-कांग्रेसी उम्मीदवारों के वोट जोड़ दें तो वे कांग्रेस को हासिल कुल वोट से कहीं ज्यादा होंगे — पर गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बँट गए।

मानचित्र — कांग्रेस का प्रभुत्व, 1952–1967 (पृ. 31)

  • संकेत: 1952–1967 के दौरान कांग्रेस शासित राज्य · केरल — डेमोक्रेटिक लेफ्ट फ्रंट 1957–1959 · जम्मू और कश्मीर — नेशनल कॉन्फ्रेंस।
  • दलों के संक्षेप: भाराकाँ = इंडियन नेशनल कांग्रेस · नि. = निर्दलीय · सीपीआई = कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया · एसपी/सोपा = सोशलिस्ट पार्टी · किमप्रपा = किसान मज़दूर प्रजा पार्टी · स्वतंत्र = स्वतंत्र पार्टी · प्रसोपा = प्रजा सोशलिस्ट पार्टी · हिंदू महा. = अखिल भारतीय हिन्दू महासभा · जनसंघ = अखिल भारतीय भारतीय जनसंघ · झापा = झारखंड पार्टी · एससीएफ = शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन · डीएमके = द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम · गप = गणतंत्र परिषद · पीडीएफ = पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट।
  • गतिविधि: क्या आप उन जगहों को पहचान सकते हैं जहाँ कांग्रेस बहुत मज़बूत थी? किन प्रांतों में दूसरी पार्टियों को ज्यादातर सीटें मिलीं?
  • समाचारपत्र (पृ. 32): “Congress Voted Back To Power At Centre — 266 SEATS ANNEXED SO FAR OUT OF 500”; “Reds’ Success In Kerala — Working Majority Achieved”।

बॉक्स — केरल में कम्युनिस्टों की जीत (पृ. 33)★

  • ★1957 के मार्च के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को केरल विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा सीटें मिलीं — कुल 126 में से 60, और पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन प्राप्त था।
  • राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया।
  • ★★“दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी।”
  • सत्ता से बेदखल होने पर कांग्रेस ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ़ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया। कम्युनिस्टों का कहना था कि इस संघर्ष की अगुआई निहित स्वार्थ और धार्मिक संगठन कर रहे हैं।
  • ★1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया। यह फ़ैसला बड़ा विवादास्पद साबित हुआ और संविधान-प्रदत्त आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में बार-बार उद्धृत हुआ।
  • चित्र: अगस्त 1959 में अपने मंत्रालय को बर्खास्त किए जाने के बाद त्रिवेंद्रम में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन का नेतृत्व करते ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद।
  • समाचारपत्र: The Hindu, मद्रास, 31 जुलाई 1959 — “PRESIDENT’S RULE IN KERALA — CABINET ADVISES ACTION UNDER ARTICLE 356”।

4. कांग्रेस के प्रभुत्व की प्रकृति (पृ. 35–40)

4.1 भारत का प्रभुत्व दूसरों से अलग क्यों (पृ. 35)★★

कहाँप्रभुत्व कैसे कायम हुआ
चीन, क्यूबा, सीरियासंविधान में ही सिर्फ एक पार्टी को देश के शासन की अनुमति
म्यांमार, बेलारूस, इरीट्रियाकानूनी और सैन्य उपायों के चलते
मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, ताईवानकुछ साल पहले तक एक पार्टी के प्रभुत्व वाले देश थे
भारत★लोकतांत्रिक स्थितियों में — अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में एक-दूसरे से होड़ की, और तब भी कांग्रेस एक के बाद एक चुनाव जीतती गई
  • बाकी मुल्कों में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ — यही निर्णायक फ़र्क है।
  • सबसे नज़दीकी तुलना: दक्षिण अफ्रीका — रंगभेद की समाप्ति के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का भी ऐसा ही दबदबा कायम हुआ। “भारत का उदाहरण बहुत कुछ दक्षिण अफ्रीका से मिलता-जुलता है।”

4.2 कांग्रेस एक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन के रूप में (पृ. 36)★★

  • कांग्रेस का जन्म 1885 में — उस वक्त नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का एक हित-समूह भर थी।
  • 20वीं सदी में इसने जनआंदोलन का रूप ले लिया → जनव्यापी राजनीतिक पार्टी बनी और राजनीतिक-व्यवस्था में इसका दबदबा कायम हुआ।
  • शुरू-शुरू में अँग्रेज़ीदाँ, अगड़ी जाति, ऊँचले मध्यवर्ग और शहरी अभिजन का बोलबाला था; सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से इसका सामाजिक आधार बढ़ा।
  • सामाजिक गठबंधन: किसान और उद्योगपति, शहर के बाशिंदे और गाँव के निवासी, मज़दूर और मालिक, तथा मध्य, निम्न और उच्च वर्ग तथा जाति — सबको जगह मिली। नेतृवर्ग भी विस्तृत हुआ; खेती-किसानी की बुनियाद वाले तथा गाँव-गिरान की तरफ़ रुझान रखने वाले नेता भी उभरे।
  • ★“आज़ादी के समय तक कांग्रेस एक सतरंगे सामाजिक गठबंधन की शक्ल अख़्तियार कर चुकी थी”, और वर्ग, जाति, धर्म, भाषा तथा अन्य हितों के आधार पर इस सामाजिक गठबंधन से भारत की विविधता की नुमाइंदगी हो रही थी।
  • ★विचारधारात्मक गठबंधन भी: कांग्रेस ने अपने अंदर क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गियों को समाहित किया।
  • “कांग्रेस एक मंच की तरह थी, जिस पर अनेक समूह, हित और राजनीतिक दल तक आ जुटते थे और राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेते थे।” आज़ादी से पहले अनेक संगठनों और पार्टियों को कांग्रेस में रहने की इजाज़त थी — हालाँकि इनके अपने-अपने संविधान थे और सांगठनिक ढाँचा भी अलग था।
  • इनमें से कुछ (मसलन कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी) बाद में कांग्रेस से अलग हो गए और विपक्षी दल बने।
  • “किसी खास पद्धति, कार्यक्रम या नीति को लेकर मौजूद मतभेदों को कांग्रेस पार्टी सुलझा भले न पाए लेकिन उन्हें अपने आप में मिलाए रखती थी और एक आम सहमति कायम कर ले जाती थी।”

4.3 गुटों में तालमेल और सहनशीलता (पृ. 38, 40)★★

  • गठबंधनी स्वभाव ने कांग्रेस को असाधारण ताकत दी:
    1. “जो भी आए, गठबंधन उसे अपने में शामिल कर लेता है।” इस कारण गठबंधन को अतिवादी रुख अपनाने से बचना होता है और हर मसले पर संतुलन साधकर चलना पड़ता है। सुलह-समझौते के रास्ते पर चलना और सर्व-समावेशी होना गठबंधन की विशेषता होती है। ★इस रणनीति की वजह से विपक्ष कठिनाई में पड़ा — विपक्ष कोई बात कहना चाहे तो कांग्रेस की विचारधारा और कार्यक्रम में उसे तुरंत जगह मिल जाती थी।
    2. गठबंधनी स्वभाव → अंदरूनी मतभेदों को लेकर सहनशीलता; विभिन्न समूहों और नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं की भी उसमें समाई हो जाती है।
  • इसी कारण, अगर कोई समूह पार्टी के रुख से अथवा सत्ता में प्राप्त अपने हिस्से से नाखुश हो तब भी वह पार्टी में ही बना रहता था — पार्टी छोड़कर विपक्ष की भूमिका अपनाने की जगह पार्टी में मौजूद किसी दूसरे समूह से लड़ने को बेहतर समझता था।
  • पार्टी के अंदर मौजूद विभिन्न समूह ‘गुट’ (faction) कहे जाते हैं। कुछ गुट विचारधारात्मक सरोकारों से बने थे, लेकिन अकसर गुटों के बनने के पीछे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा तथा प्रतिस्पर्धा की भावना भी काम करती थी।
  • ★“अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी बनने की बजाय उसकी ताकत साबित हुई।” चूँकि पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों की आपसी होड़ के लिए गुंजाइश थी, इसलिए विभिन्न हित और विचारधाराओं की नुमाइंदगी कर रहे नेता कांग्रेस के भीतर ही बने रहे; पार्टी से बाहर निकलकर नई पार्टी बनाने को उन्होंने बेहतर नहीं समझा।
  • कांग्रेस की अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ विभिन्न गुटों को मिलाकर बनी थीं; कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आती थी।
  • दूसरी पार्टियाँ मुख्यतः कांग्रेस के इस या उस गुट को प्रभावित करने की कोशिश करती थीं — यानी वे हाशिए पर रहकर ही, अप्रत्यक्ष रीति से नीतियों और फ़ैसलों को प्रभावित कर पाती थीं। वे सत्ता के वास्तविक इस्तेमाल से कोसों दूर थीं; शासक दल का कोई विकल्प नहीं था।
  • “गुटों की मौजूदगी की यह प्रणाली शासक-दल के भीतर संतुलन साधने के एक औजार की तरह काम करती थी।”
  • ★★निष्कर्ष: “इस अर्थ में देखें तो चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका निभायी और विपक्ष की भी। इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।”

कार्टून-संवाद

  • (पृ. 36) “पहले हमने एक ही पार्टी के भीतर गठबंधन देखा और अब पार्टियों के बीच गठबंधन होता देख रहे हैं। क्या इसका मतलब यह हुआ कि गठबंधन सरकार 1952 से ही चल रही है?”
  • (पृ. 40) “मैं गुटबंदी को एक तरह का रोग समझती थी और मानती थी कि इसे दूर किया जाना चाहिए। यहाँ कही गई बातों से तो ऐसा लगता है, जैसे कि गुटबाजी बहुत अच्छी बात है।”

5. विपक्षी पार्टियों का उद्भव (पृ. 40–42)

5.1 विपक्ष की मौजूदगी और उसकी भूमिका★

  • “ऐसा नहीं था कि इस दौर में भारत में विपक्षी पार्टियाँ नहीं थीं।” “बहुदलीय लोकतंत्र वाले अन्य अनेक देशों की तुलना में उस वक्त भी भारत में बहुविध और जीवन्त विपक्षी पार्टियाँ थीं।”
  • इनमें से कई पार्टियाँ 1952 के आम चुनावों से कहीं पहले बन चुकी थीं; कुछ ने ‘साठ’ और ‘सत्तर’ के दशक में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
  • ★“आज की लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी न किसी विपक्षी पार्टी में खोजी जा सकती हैं।”
  • 1950 के दशक में इन सभी दलों को लोकसभा अथवा विधानसभा में कहने भर को प्रतिनिधित्व मिल पाया — फिर भी इनकी मौजूदगी ने शासन-व्यवस्था के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभायी:
    1. इन दलों ने कांग्रेस की नीतियों और व्यवहारों की सुचिन्तित आलोचना की — “इस आलोचना में सिद्धांतों का बल होता था।”
    2. शासक-दल पर अंकुश रखा; बहुधा इन दलों के कारण कांग्रेस पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन बदला।
    3. लोकतांत्रिक राजनीतिक विकल्प की संभावना को जीवित रखा — “ऐसा करके इन दलों ने व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका।”
    4. ऐसे नेता तैयार किए जिन्होंने आगे के समय में देश की तस्वीर संवारने में अहम भूमिका निभायी।

5.2 पारस्परिक सम्मान का दौर (पृ. 41)★

  • “शुरुआती सालों में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं के बीच पारस्परिक सम्मान का गहरा भाव था।”
  • स्वतंत्रता की उद्घोषणा के बाद अंतरिम सरकार ने देश का शासन सँभाला; इसके मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे।
  • नेहरू अकसर सोशलिस्ट पार्टी के प्रति अपने प्यार का इजहार करते थे; उन्होंने जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सरकार में शामिल होने का न्यौता दिया।
  • “अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से इस किस्म का निजी रिश्ता और उसके प्रति सम्मान का भाव दलगत प्रतिस्पर्धा के तेज होने के बाद लगातार कम होता गया।”
  • नेहरू का उद्धरण — कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर टंडन की जीत के बाद राजाजी को लिखे गए एक पत्र में: “कांग्रेस के सदस्य टंडन के निर्वाचन को सरकार या कांग्रेस में मेरी मौजूदगी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण समझते हैं, फिर… कांग्रेस और सरकार के भीतर मैं पूरी तरह अप्रासांगिक हो चुका हूँ।”

5.3 प्रभुत्व का अंत (पृ. 42)

  • राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र समावेशी था और उसकी अगुआई कांग्रेस ने की थी; इसी कारण विभिन्न समूह, वर्ग और हितों के लोग कांग्रेस की तरफ़ आकर्षित हुए। सामाजिक और विचारधारात्मक रूप से कांग्रेस एक व्यापक गठबंधन के रूप में उभरी।
  • ★“सत्ता पाने की लालसा रखने वाले हर व्यक्ति और हर हित-समूह को अपने अंदर समाहित करने की कांग्रेस की क्षमता जैसे-जैसे घटी, वैसे-वैसे दूसरे राजनीतिक दलों को महत्त्व मिलना शुरू हुआ। इस तरह कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा।”

6. प्रमुख विपक्षी दल — पाठ्यपुस्तक के बॉक्स

6.1 सोशलिस्ट पार्टी (एसपी) — बॉक्स, पृ. 34

  • जड़ें: कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन खुद कांग्रेस के भीतर 1934 में युवा नेताओं की एक टोली ने किया; ये नेता कांग्रेस को ज्यादा-से-ज्यादा परिवर्तनकामी और समतावादी बनाना चाहते थे।
  • ★1948 में कांग्रेस ने अपने संविधान में बदलाव किया ताकि कांग्रेस के सदस्य दोहरी सदस्यता न धारण कर सकें — इस वजह से कांग्रेस के समाजवादियों को मजबूरन 1948 में अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनानी पड़ी।
  • चुनावी प्रदर्शन: “सोशलिस्ट पार्टी चुनावों में कुछ खास कामयाबी हासिल नहीं कर सकी।” मौजूदगी अधिकतर राज्यों में थी, पर छिटपुट सफलता ही मिली।
  • विचारधारा: लोकतांत्रिक समाजवाद — इसी आधार पर वे कांग्रेस तथा साम्यवादी (कम्युनिस्ट) दोनों से अलग थे। आलोचना: कांग्रेस पूँजीपतियों और जमींदारों का पक्ष ले रही है और मज़दूरों-किसानों की उपेक्षा कर रही है।
  • ★1955 की दुविधा: कांग्रेस ने घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य समाजवादी बनावट वाले समाज की रचना है — ऐसे में समाजवादियों के लिए खुद को कांग्रेस का कारगर विकल्प बनाकर पेश करना मुश्किल हो गया। राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ समाजवादियों ने कांग्रेस से दूरी बढ़ायी और उसकी आलोचना की; अशोक मेहता जैसे कुछ अन्य ने हल्के-फुल्के सहयोग की तरफ़दारी की।
  • टूट और मेल से बने दल: किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी।
  • प्रमुख नेता: जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया, एस.एम. जोशी।
  • ★आज के उत्तराधिकारी: समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), जनता दल (सेक्युलर)।
  • जीवनी — आचार्य नरेन्द्र देव (1889–1956): स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक; आज़ादी के आंदोलन के दौरान कई बार जेल गए; किसान आंदोलन में सक्रिय; बौद्ध धर्म के विद्वान; आज़ादी के बाद पहले सोशलिस्ट पार्टी का और बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व।
  • चित्र: सोशलिस्ट पार्टी का पोस्टर — “FORWARD TO A MASS PARTY”।

6.2 कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) — बॉक्स, पृ. 37

  • 1920 के दशक के शुरुआती सालों में भारत के विभिन्न हिस्सों में साम्यवादी-समूह (कम्युनिस्ट ग्रुप) उभरे; ये रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित थे।
  • 1935 से साम्यवादियों ने मुख्यतया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दायरे में रहकर काम किया।
  • ★कांग्रेस से साम्यवादी 1941 के दिसंबर में अलग हुए — इस समय उन्होंने नाजी जर्मनी के खिलाफ लड़ रहे ब्रिटेन को समर्थन देने का फ़ैसला किया।
  • दूसरी गैर-कांग्रेसी पार्टियों के विपरीत CPI के पास आज़ादी के समय एक सुचारू पार्टी मशीनरी और समर्पित कॉडर मौजूद थे।
  • मुख्य सवाल: “आखिर जो आज़ादी देश को हासिल हुई है उसकी प्रकृति कैसी है? क्या हिंदुस्तान सचमुच आज़ाद हुआ है या यह आज़ादी झूठी है?” — पार्टी का विचार था कि 1947 में सत्ता का जो हस्तांतरण हुआ वह सच्ची आज़ादी नहीं थी, और इस विचार के साथ पार्टी ने तेलंगाना में हिंसक विद्रोह को बढ़ावा दिया।
  • साम्यवादी अपनी बात के पक्ष में जनता का समर्थन हासिल नहीं कर सके और सशस्त्र सेनाओं द्वारा दबा दिए गए।
  • ★1951 में साम्यवादी पार्टी ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ दिया और आने वाले आम चुनावों में भाग लेने का फ़ैसला किया।
  • ★पहले आम चुनाव में 16 सीटें — सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। समर्थन ज्यादातर आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में मिला।
  • प्रमुख नेता: ए.के. गोपालन, एस.ए. डांगे, ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, पी.सी. जोशी, अजय घोष और पी. सुंदरैया।
  • ★1964 में बड़ी टूट — चीन और सोवियत संघ के बीच वैचारिक अंतर आने के बाद। सोवियत संघ की विचारधारा को ठीक मानने वाले CPI में रहे; इसके विरोध में राय रखने वालों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) नाम से अलग दल बनाया। ये दोनों दल आज तक कायम हैं।
  • जीवनी — ए.के. गोपालन (1904–1977): केरल के कम्युनिस्ट नेता; राजनीतिक जीवन का आरंभ कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में; 1939 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल; 1964 के विभाजन के बाद सीपीआई (मार्क्सवादी) में शामिल; सांसद के रूप में विशेष ख्याति; 1952 से सांसद।

6.3 भारतीय जनसंघ (बीजेएस) — बॉक्स, पृ. 39

  • ★गठन 1951 में; श्यामा प्रसाद मुखर्जी संस्थापक-अध्यक्ष।
  • जड़ें: आज़ादी के पहले के समय से सक्रिय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदू महासभा में।
  • ★विचारधारा: ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’ — मानना था कि देश भारतीय संस्कृति और परंपरा के आधार पर आधुनिक, प्रगतिशील और ताकतवर बन सकता है।
  • अन्य नीतिगत रुख:
    • भारत और पाकिस्तान को एक करके ‘अखंड भारत’ बनाने की बात कही;
    • अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को राजभाषा बनाने के आंदोलन में यह पार्टी सबसे आगे थी;
    • धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियायत देने की बात का विरोध किया;
    • ★चीन ने 1964 में अपना आण्विक-परीक्षण किया → इसके बाद से जनसंघ ने लगातार पैरोकारी की कि भारत भी अपने आण्विक हथियार तैयार करे।
  • चुनावी प्रदर्शन: “1950 के दशक में जनसंघ चुनावी राजनीति के हाशिए पर रहा।” ★1952 के चुनाव में लोकसभा की 3 सीटें; 1957 के आम चुनावों में 4 सीटें।
  • समर्थन: शुरुआती सालों में हिंदी-भाषी राज्यों — राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश — के शहरी इलाकों में।
  • नेता: श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और बलराज मधोक।
  • ★“भारतीय जनता पार्टी की जड़ें इसी जनसंघ में हैं।”
  • जीवनी — दीन दयाल उपाध्याय (1916–1968): 1942 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता; भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य; जनसंघ में पहले महासचिव फिर अध्यक्ष; ★‘समग्र मानवतावाद’ सिद्धांत के प्रणेता।
  • चित्र: Manifesto & Programme of the Bharatiya Jana Sangh — भारतीय प्रतिनिधि सभा के बंगलौर अधिवेशन, दिसंबर 1958 में अंगीकृत।

6.4 स्वतंत्र पार्टी — पुष्टि योग्यध्यान

पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र पार्टी का उल्लेख मानचित्र की संकेत-सूची (पृ. 31) में करती है, और प्रश्नावली (पृ. 42) में दो बार — प्रश्न 1(ग) के विकल्पों के अनुसार “राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था” इसका एक निर्देशक सिद्धांत था, और प्रश्न 2 में इसे मीनू मसानी से जोड़ा गया है।

! इस हिंदी पुनर्मुद्रण के 18 पृष्ठों में स्वतंत्र पार्टी का अपना विवरण-बॉक्स नहीं मिला, जबकि सोशलिस्ट पार्टी (पृ. 34), CPI (पृ. 37) और जनसंघ (पृ. 39) के बॉक्स मौजूद हैं। पढ़ाने से पहले पृ. 42 दोबारा देख लीजिए। यह 10-Verification-Log.md में दर्ज है।

7. जीवनी-बॉक्स — अन्य

व्यक्तिपृ.विवरण
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888–1958)30मूल नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद; इस्लाम के विद्वान; स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के नेता; हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतिपादक; विभाजन के विरोधी; संविधान सभा के सदस्य; ★स्वतंत्र भारत में बने पहले मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री
राजकुमारी अमृतकौर (1889–1964)32गाँधीवादी स्वतंत्रता सेनानी; कपूरथला के राजपरिवार में जन्म; विरासत में माता से ईसाई धर्म मिला; संविधान सभा की सदस्य; ★स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री; 1957 तक इसी पद पर रहीं
बाबा साहब भीमराव रामजी अंबेडकर (1891–1956)35जाति विरोधी आंदोलन के नेता और दलितों को न्याय दिलाने के संघर्ष के अगुआ; विद्वान और बुद्धिजीवी; इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के संस्थापक; बाद में शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की स्थापना; रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के गठन के योजनाकार; दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वायसराय की काउंसिल में सदस्य; ★संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष; आज़ादी के बाद नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; ★हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर अपनी असहमति दर्ज कराते हुए 1951 में इस्तीफा; ★1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया
रफी अहमद किदवई (1894–1954)36उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के नेता; प्रांतीय सरकार (1937) में मंत्री; 1946 में दोबारा मंत्री; ★स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में संचार मंत्री; खाद्य एवं कृषि मंत्री (1952–54)
श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901–1953)42हिंदू महासभा के नेता; ★भारतीय जनसंघ के संस्थापक; स्वतंत्रता के बाद नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; ★पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर अपने मतभेदों के चलते 1950 में इस्तीफा; संविधान सभा के सदस्य; लोकसभा सदस्य; ★कश्मीर को स्वायत्तता देने के खिलाफ़; कश्मीर नीति पर जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार; हिरासत में मौत

8. चित्र, कार्टून और स्रोत — सूची

सामग्रीपृ.विवरण
कार्टून — शंकर (आवरण)26संग्रह ‘डॉन्ट स्पेयर मी शंकर’ के मुखपृष्ठ से लिया गया। मूल कार्टून भारत की चीन नीति पर बनाया गया था, लेकिन यहाँ यह एक-दलीय प्रभुत्व के समय कांग्रेस द्वारा निभाई जा रही सत्ता पक्ष और विपक्ष की दोहरी भूमिका और दोहरी नीति को दर्शाता है
कार्टून — शंकर, 20 मई 1951281951 में कांग्रेस द्वारा पार्टी उम्मीदवार चुनने के लिए बनाई गई चुनाव समिति (“ELECTION COMMITTEE”) पर कार्टूनिस्ट का नज़रिया। समिति में नेहरू के अलावा मोरारजी देसाई, रफ़ी अहमद किदवई, डॉ. बी.सी. रॉय, कामराज नाडार, राजगोपालाचारी, जगजीवन राम, मौलाना आज़ाद, डी.पी. मिश्रा, पी.डी. टंडन और गोविन्द बल्लभ पंत दिखाई दे रहे हैं
मतपत्र का नमूना / EVM का चित्र29तीसरे से तेरहवें आम चुनाव तक का बैलट पेपर; और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन
मानचित्र — कांग्रेस का प्रभुत्व 1952–196731तीनों आम चुनावों के दलवार सीट-आँकड़ों के स्तंभ-चित्र सहित
समाचारपत्र32“Congress Voted Back To Power At Centre — 266 SEATS ANNEXED SO FAR OUT OF 500”; “Reds’ Success In Kerala — Working Majority Achieved”
समाचारपत्र — The Hindu, 31 जुलाई 195933“PRESIDENT’S RULE IN KERALA — CABINET ADVISES ACTION UNDER ARTICLE 356”
चित्र33अगस्त 1959 में मंत्रालय बर्खास्त होने के बाद त्रिवेंद्रम में प्रदर्शन का नेतृत्व करते ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद
सिने-संसार — ‘सिंहासन’ (1981)38मराठी फ़िल्म, अरुण साधु के दो उपन्यासों — ‘सिंहासन’ तथा ‘मुंबई दिनांक’ — पर आधारित। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए होने वाली रस्साकशी को दर्शाती है; कहानी को पत्रकार दिघु टिप्पणी बयान करता है, जो मौन सूत्रधार के रूप में आता है। वित्तमंत्री विश्वास राव दभाड़े सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री को अपदस्थ करने की तिकड़म में लगा है; दोनों ही मज़दूर नेता डि’कोस्टा को अपनी तरफ़ करना चाहते हैं। फ़िल्म सत्तारूढ़ दल के भीतर चलने वाले सत्ता संघर्ष और उसमें विपक्षी दल की भूमिका को बयान करती है। वर्ष 1981; निर्देशक जब्बार पटेल; पटकथा विजय तेंदुलकर; अभिनय नीलू फुले, अरुण सरनाईक, डॉ. श्रीराम लागू, सतीश दुबाशी, दत्ता भट्ट, मधुकर तोरड़मल, माधव वाटवे, मोहन अगाशे
कार्टून — ‘रस्साकसी’ (TUG OF WAR RESUMED), 29 अगस्त 195440सरकार और विपक्षी दलों की ताकत की तुलना। पेड़ पर नेहरू और उनके कैबिनेट सहयोगी बैठे हैं; पेड़ के नीचे विपक्षी नेता — ए.के. गोपालन, आचार्य कृपलानी, एन.सी. चटर्जी, श्रीकांत नायर और सरदार हुकुम सिंह — पेड़ को गिराने की कोशिश कर रहे हैं
चित्र — नेहरू मंत्रिमंडल, 194841चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के गवर्नर-जनरल के पद की शपथ ग्रहण के बाद। बैठे (बाएँ से दाएँ): रफी अहमद किदवई, बलदेव सिंह, मौलाना आज़ाद, प्रधानमंत्री नेहरू, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजकुमारी अमृत कौर, जॉन मथाई और जगजीवन राम। खड़े (बाएँ से दाएँ): श्री गाडगिल, श्री नियोगी, डॉ. अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गोपालास्वामी आयंगर और जयरामदास दौलतराम

सारांश (पाठ्यपुस्तक में मुद्रित नहीं)

! इस अध्याय में भी कोई मुद्रित ‘सारांश’ खंड नहीं है और कोई उत्तर-कुंजी नहीं दी गई है।

कड़ीसार
चुनौतीउपनिवेश-मुक्त देशों ने “पहले एकता” चुनकर लोकतंत्र खोया; भारत ने कहीं ज्यादा कठिन रास्ता चुना
प्रयोग17 करोड़ मतदाता, 15% साक्षर, 489 सीटें → 1952 का चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर
परिणामकांग्रेस को तीनों चुनावों में तीन-चौथाई सीटें (364 / 371 / 361)
कारणस्वाधीनता-संग्राम की विरासत + ‘अव्वल और एकलौता’ + FPTP प्रणाली (45% वोट → 74% सीट)
प्रकृतिप्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में — चीन/क्यूबा/सीरिया से मौलिक रूप से भिन्न
तंत्रकांग्रेस स्वयं सामाजिक + विचारधारात्मक गठबंधन; गुट संतुलन का औजार → ‘कांग्रेस-प्रणाली’
विपक्षकमज़ोर पर जीवन्त; लोकतांत्रिक चरित्र बनाए रखने में निर्णायक
अंतसमाहित करने की क्षमता घटी → प्रभुत्व सिर्फ़ एक दौर का रहा

1. सही विकल्प को चुनकर खाली जगह को भरें: (क) 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ ———— के लिए भी चुनाव कराए गए थे। (भारत के राष्ट्रपति पद / राज्य विधानसभा / राज्यसभा / प्रधानमंत्री) (ख) ———— लोकसभा के पहले आम चुनाव में 16 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही। (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी / भारतीय जनसंघ / भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी / भारतीय जनता पार्टी) (ग) ———— स्वतंत्र पार्टी का एक निर्देशक सिद्धांत था। (कामगार तबके का हित / रियासतों का बचाव / राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था / संघ के भीतर राज्यों की स्वायत्तता)

2. यहाँ दो सूचियाँ दी गई हैं। पहले में नेताओं के नाम दर्ज हैं और दूसरे में दलों के। दोनों सूचियों में मेल बैठाएँ:

नेतादल
(क)एस.ए. डांगे(i)भारतीय जनसंघ
(ख)श्यामा प्रसाद मुखर्जी(ii)स्वतंत्र पार्टी
(ग)मीनू मसानी(iii)प्रजा सोशलिस्ट पार्टी
(घ)अशोक मेहता(iv)भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

3. एकल पार्टी के प्रभुत्व के बारे में यहाँ चार बयान लिखे गए हैं। प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगाएँ: (क) विकल्प के रूप में किसी मजबूत राजनीतिक दल का अभाव एकल पार्टी-प्रभुत्व का कारण था। (ख) जनमत की कमजोरी के कारण एक पार्टी का प्रभुत्व कायम हुआ। (ग) एकल पार्टी-प्रभुत्व का संबंध राष्ट्र के औपनिवेशिक अतीत से है। (घ) एकल पार्टी-प्रभुत्व से देश में लोकतांत्रिक आदर्शों के अभाव की झलक मिलती है।

4. भारत का एक राजनीतिक नक्शा लीजिए (जिसमें राज्यों की सीमाएँ दिखाई गई हों) और उसमें निम्नलिखित को चिह्नित कीजिए: (क) ऐसे दो राज्य जहाँ 1952–67 के दौरान कांग्रेस सत्ता में नहीं थी। (ख) दो ऐसे राज्य जहाँ इस पूरी अवधि में कांग्रेस सत्ता में रही।

5. निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए: “कांग्रेस के संगठनकर्ता पटेल कांग्रेस को दूसरे राजनीतिक समूह से निसंग रखकर उसे एक सर्वांगसम तथा अनुशासित राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव छोड़े और अनुशासित कॉडर से युक्त एक सगुंफित पार्टी के रूप में उभरे। ‘यथार्थवादी’ होने के कारण पटेल व्यापकता की जगह अनुशासन को ज्यादा तरजीह देते थे। अगर “आंदोलन को चलाते चले जाने” के बारे में गाँधी के ख्याल हद से ज्यादा रोमानी थे तो कांग्रेस को किसी एक विचारधारा पर चलने वाली अनुशासित तथा धुरंधर राजनीतिक पार्टी के रूप में बदलने की पटेल की धारणा भी उसी तरह कांग्रेस की उस समन्वयवादी भूमिका को पकड़ पाने में चूक गई जिसे कांग्रेस को आने वाले दशकों में निभाना था।” — रजनी कोठारी (क) लेखक क्यों सोच रहा है कि कांग्रेस को एक सर्वांगसम तथा अनुशासित पार्टी नहीं होना चाहिए? (ख) शुरुआती सालों में कांग्रेस द्वारा निभाई गई समन्वयवादी भूमिका के कुछ उदाहरण दीजिए।

खुद करें-खुद समझें (पृ. 43)

1952 के बाद से अब तक आपके राज्य में जितने चुनाव हुए और सरकारें बनी हैं, उनका एक चार्ट तैयार करें। शीर्षक: चुनाव का वर्ष, जीतने वाले दल का नाम, शासक दल/दलों के नाम, मुख्यमंत्री का नाम।

उत्तर देखिए

उत्तर-कुंजी: पाठ्यपुस्तक में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है। उत्तर 05-Question-Bank.md में शिक्षक द्वारा तैयार किए गए हैं।

शब्दावली

पदअंग्रेज़ीअध्याय में प्रयुक्त अर्थ
एक दल का प्रभुत्वOne-party dominanceवह स्थिति जिसमें मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के बावजूद एक ही दल लगातार जीतता रहे
कांग्रेस-प्रणालीCongress systemवह व्यवस्था जिसमें कांग्रेस ने शासक-दल और विपक्ष, दोनों की भूमिका निभायी
गुटFactionपार्टी के अंदर मौजूद विभिन्न समूह
सामाजिक गठबंधनSocial coalitionवर्ग, जाति, धर्म, भाषा और अन्य हितों के समूहों का वह मेल जो कांग्रेस के भीतर था
विचारधारात्मक गठबंधनIdeological coalitionक्रांतिकारी–शांतिवादी, वामपंथी–दक्षिणपंथी, गरमपंथी–नरमपंथी सबका एक दल में समावेश
सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीतFirst Past The Postवह चुनाव-प्रणाली जिससे कांग्रेस को वोट-अनुपात से कहीं अधिक सीटें मिलीं
सार्वभौम मताधिकारUniversal franchiseहर वयस्क नागरिक को मत का अधिकार
दोहरी सदस्यताDual membershipकांग्रेस और किसी अन्य दल, दोनों की सदस्यता — 1948 में कांग्रेस ने इसे समाप्त किया
लोकतांत्रिक समाजवादDemocratic socialismसोशलिस्ट पार्टी की विचारधारा, जो उसे कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों से अलग करती थी
समाजवादी बनावट वाला समाजSocialistic pattern of society1955 में कांग्रेस द्वारा घोषित लक्ष्य
मुक्ति संघर्षLiberation struggleकेरल की निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार के विरुद्ध कांग्रेस द्वारा छेड़ा गया आंदोलन
अनुच्छेद 356Article 356वह उपबंध जिसके अंतर्गत 1959 में केरल की सरकार बर्खास्त हुई
समग्र मानवतावादIntegral humanismदीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत
नायक-पूजाHero-worshipअंबेडकर की चेतावनी का विषय — “सीधे पतन की ओर… तानाशाही की तरफ़”
अखंड भारतAkhand Bharatजनसंघ की वह माँग कि भारत और पाकिस्तान को एक किया जाए

मुख्य आँकड़े

मानसंदर्भपृ.
26 नवम्बर 1949 / 24 जनवरी 1950 / 26 जनवरी 1950संविधान अंगीकृत / हस्ताक्षर / लागू27
जनवरी 1950भारत के चुनाव आयोग का गठन27
सुकुमार सेनपहले चुनाव आयुक्त27
40 लाखमतदाता-सूची से छूटे महिलाओं के नाम28
17 करोड़कुल मतदाता28
3,200 / 489चुने जाने वाले विधायक / लोकसभा सांसद28
15 फीसदीसाक्षर मतदाता28
3 लाख से ज्यादाप्रशिक्षित अधिकारी और चुनावकर्मी28
20 लाखस्टील की मतपेटियाँ29
2004पूरे देश में EVM का इस्तेमाल29
अक्तूबर 1951 – फरवरी 1952पहला आम चुनाव; कुल छह महीने लगे30
चारऔसतन प्रति सीट उम्मीदवार30
489 / 3641952 — कुल लोकसभा सीटें / कांग्रेस30, 31
494 / 3711957 — कुल लोकसभा सीटें / कांग्रेस31
494 / 3611962 — कुल लोकसभा सीटें / कांग्रेस31
161952 में CPI की सीटें (दूसरा स्थान)30, 32
45% वोट → 74% सीटकांग्रेस, 195232
10% वोट → 3% से कम सीटसोशलिस्ट पार्टी, 195232
126 में से 60 + 5 निर्दलीयकेरल 1957, कम्युनिस्ट पार्टी33
1959अनुच्छेद 356 से केरल सरकार बर्खास्त33
1885कांग्रेस का जन्म36
1934 / 1948कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन / अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनी34
1955कांग्रेस का ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ का लक्ष्य34
1941 दिसंबरसाम्यवादी कांग्रेस से अलग हुए37
1951 / 1964CPI ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ा / CPI(M) बनी37
1951भारतीय जनसंघ का गठन39
3 / 4जनसंघ की लोकसभा सीटें — 1952 / 195739
1964चीन का आण्विक-परीक्षण39
1981फ़िल्म ‘सिंहासन’38

भ्रमित करने वाले युग्म

युग्मभेद
1952 में दूसरा स्थान — सीट बनाम वोटसीट में CPI (16 सीट); वोट में सोशलिस्ट पार्टी (10%) — दोनों अलग हैं
45% बनाम 74%45% वोट, 74% सीट — उलटा मत लिखिए
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934) बनाम सोशलिस्ट पार्टी (1948)पहली कांग्रेस के भीतर बनी; दूसरी दोहरी सदस्यता समाप्त होने पर अलग होकर बनी
CPI का कांग्रेस से अलग होना (1941) बनाम चुनाव में भाग लेने का फ़ैसला (1951)दो अलग तिथियाँ, दो अलग कारण
CPI के 1964 विभाजन का कारणचीन–सोवियत वैचारिक अंतर — भारत का कोई आंतरिक मुद्दा नहीं
जनसंघ की सीटें — 3 (1952), 4 (1957)बहुत कम; “1950 के दशक में जनसंघ चुनावी राजनीति के हाशिए पर रहा”
केरल 1957 — ‘दुनिया में पहली’लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार
अनुच्छेद 356 का प्रयोग — 1959केरल में; कांग्रेस का ‘मुक्ति संघर्ष’ उससे पहले चला
भारत बनाम चीन/क्यूबा का एक-दलीय प्रभुत्वभारत में लोकतांत्रिक स्थितियों में; वहाँ संविधान द्वारा ही एक दल को अनुमति
अंबेडकर का 1951 का इस्तीफ़ा बनाम मुखर्जी का 1950 का इस्तीफ़ाअंबेडकर — हिंदू कोड बिल; मुखर्जी — पाकिस्तान नीति
गुटबाजी = कमज़ोरी?पाठ्यपुस्तक के अनुसार यह ताकत साबित हुई
चुनाव आयोग का गठन (जनवरी 1950) बनाम पहला चुनाव (1951–52)गठन पहले, चुनाव लगभग दो साल बाद
1952 का चुनाव कब हुआवास्तव में अक्तूबर 1951 – फरवरी 1952; ‘1952 का चुनाव’ इसलिए कहा जाता है कि अधिकांश मतदान 1952 में हुआ