Chapter 4भारत के विदेश संबंध

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स्रोत: स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, NCERT — अध्याय 4, पृष्ठ 54–71 (18 पृष्ठ) QR कोड: 12122CH04 — ★यानी युक्तिकरण के बाद भी यह अध्याय 4 ही रहा; क्रमांक नहीं बदला। पठन-विधि: ! फ़ॉन्ट LEGACY है (8/8 अविश्वसनीयता) — इसलिए 150 dpi पर दृश्य पठन; पाठ-निष्कर्षण नहीं।

⚡ अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी

★★“आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है।” — जवाहरलाल नेहरू, संविधान सभा की बहस में, मार्च 1949 (पृ. 55)

पूरा अध्याय इसी वाक्य की तीन कड़ियों में खुलता है: आज़ादी → विदेश नीति का स्वतंत्र संचालन → गुटनिरपेक्षता।

पृष्ठ 54 · अध्याय-आरंभ

चित्र

अक्तूबर 1960, न्यूयार्क — गुटनिरपेक्ष देशों की एक संगोष्ठी। चित्र में जवाहरलाल नेहरू, घाना के एनक्रूमा, मिस्र के नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और युगोस्लाविया के टीटो नज़र आ रहे हैं। (साभार: नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एवं लाइब्रेरी)

★कक्षा में इस चित्र से शुरू कीजिए। पाँच नेता, पाँच नव-स्वतंत्र या गैर-गुट देश — यही ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ का चेहरा है। इन पाँच नामों को बोर्ड पर लिखवा दीजिए; ये पूरे अध्याय में लौटेंगे।

‘इस अध्याय में…’(पाठ का अपना परिचय)

“अब तक हमने इस किताब में देश में हुए बदलाव और घरेलू चुनौतियों पर अपनी नजर डाली है। इस अध्याय में हम बाहरी चुनौतियों के बारे में पढ़ेंगे। इस मोर्चे पर भी अपने देश के नेताओं ने नयी राह अपनायी और बाहरी चुनौतियों के मामले में गुटनिरपेक्षता की नीति का पालन किया। बहरहाल, हमारे नेताओं को पड़ोसी देशों से हुए युद्धों से भी निपटना पड़ा। भारत को अपने पड़ोसी देशों से 1962, 1965 और 1971 में युद्ध लड़ना पड़ा। इन लड़ाइयों और हमारे विदेशी संबंधों को देश की राजनीति ने एक शक्ल प्रदान की। देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।”

चार प्रश्न जिन पर अध्याय में चर्चा होगी:

  1. भारत के विदेश संबंधों ने किन अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आकार ग्रहण किया;
  2. भारत की विदेश नीति किन सिद्धांतों से निर्देशित हुई;
  3. चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते कैसे रहे; और
  4. भारत की परमाणु नीति का उद्भव किन स्थितियों में हुआ?

★★यह वाक्य पूरे अध्याय की धुरी है — “देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।” यानी अध्याय दोतरफ़ा है: राजनीति ने विदेश नीति को गढ़ा, और विदेश नीति ने राजनीति को बदला। (1962 के बाद पहला अविश्वास प्रस्ताव · भाकपा का विभाजन · 1971 के बाद इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता — ये तीनों इसी दूसरी दिशा के प्रमाण हैं।)

पृष्ठ 55 · अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ

1948 की दुनिया — भारत किस माहौल में आज़ाद हुआ

“भारत बड़ी विकट और चुनौतीपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आजाद हुआ था।”

#वैश्विक स्थिति
1दुनिया महायुद्ध की तबाही से अभी बाहर निकली थी और उसके सामने पुनर्निर्माण का सवाल प्रमुख था
2एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रयास हो रहे थे (संयुक्त राष्ट्र संघ)
3उपनिवेशवाद की समाप्ति के फलस्वरूप दुनिया के नक्शे पर नए देश नमूदार हो रहे थे
4★नए देशों के सामने दोहरी चुनौती — लोकतंत्र कायम करना और अपनी जनता की भलाई करना

और भारत की अपनी तीन चिंताएँ

#चिंता
1! “अंग्रेजी सरकार अपने पीछे अंतर्राष्ट्रीय विवादों की एक पूरी विरासत छोड़ गई थी”
2! “बँटवारे के कारण अलग से दबाव पैदा हुए थे”
3! “गरीबी मिटाने का काम सामने मुँह बाए खड़ा था”

★इन तीनों को जोड़िए — यही बताता है कि भारत की विदेश नीति ‘आदर्शवादी’ नहीं, बल्कि ‘मजबूरी और आदर्श दोनों से बनी’ थी।

विदेश नीति का घोषित लक्ष्य और उसका संवैधानिक सूत्र

“भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। इस लक्ष्य की प्रतिध्वनि संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में सुनाई देती है।”

विदेश नीति किससे बनती है — पाठ की सुंदर उपमा★

“जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।”

विकासशील देशों की तीन विवशताएँ (पाठ के अनुसार):

  1. संसाधनों का अभाव — इसलिए वे “बड़े सीधे-सादे लक्ष्यों को लेकर अपनी विदेश नीति तय करते हैं”
  2. उनका ज़ोर इस पर होता है कि “उनके पड़ोस में अमन-चैन कायम रहे और विकास होता रहे”
  3. ! वे “आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से ज्यादा ताकतवर देशों पर निर्भर” होते हैं — और “इस निर्भरता का भी उनकी विदेश नीति पर जब-तब असर पड़ता है”

★★यह पूरे अध्याय का सैद्धांतिक ढाँचा है — प्रश्न 4 ठीक इसी पर आधारित है (“विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है”)।

दो खेमों में बँटती दुनिया

“दूसरे विश्वयुद्ध के तुरंत बाद के दौर में अनेक विकासशील देशों ने ताकतवर देशों की मर्जी को ध्यान में रखकर अपनी विदेश नीति अपनाई क्योंकि इन देशों से इन्हें अनुदान अथवा कर्ज मिल रहा था। इस वजह से दुनिया के विभिन्न देश दो खेमों में बँट गए। एक खेमा संयुक्त राज्य अमरीका और उसके समर्थक देशों के प्रभाव में रहा तो दूसरा खेमा सोवियत संघ के प्रभाव में।” “इस दौरान गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का प्रयोग भी हुआ था, जिसमें भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।” ★“जब भारत आज़ाद हुआ था और अपनी विदेश नीति तैयार कर रहा था तब शीतयुद्ध शुरू ही हुआ था और दुनिया बड़ी तेज़ी से दो खेमों में बँटती जा रही थी।”

अवतरण — नेहरू, संविधान सभा की एक बहस में (मार्च 1949)★★

“आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। एक बार विदेश संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ तो फिर जिस हद तक आपके हाथ से ये संबंध छूटे और जिन मसलों में छूटे — वहाँ तक आप आज़ाद नहीं रहते।”

★★प्रश्न 3 का पूरा उत्तर इसी अवतरण में है। इसे कक्षा से शब्दशः लिखवाइए।

पृष्ठ 56 · संवैधानिक सिद्धांत और गुटनिरपेक्षता की जड़ें

📦 बॉक्स:संवैधानिक सिद्धांत — अनुच्छेद 51

“भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के बढ़ावे’ के लिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत के हवाले से कहा गया है कि राज्य —”

उपखंडपाठ
(क)अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का
(ख)राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का
(ग)संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
(घ)अंतर्राष्ट्रीय विवादों को माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का, प्रयास करेगा

★★यह बॉक्स परीक्षा में सीधे पूछा जाता है — ‘अनुच्छेद 51’ और ‘नीति-निर्देशक सिद्धांत’, दोनों शब्द याद रखिए। ! और यह भी कि यह ‘निर्देशक’ है — बाध्यकारी नहीं।

पाठ के दो प्रश्न(जिनका उत्तर पूरा अध्याय देता है)

“क्या 1950 और 1960 के दशक की विश्व राजनीति में भारत इन दोनों में से किसी खेमे में शामिल था? क्या भारत अपनी विदेश नीति को शांतिपूर्ण ढंग से लागू करने और अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों से बचे रहने में सफल रहा?”

🔷 गुटनिरपेक्षता की नीति — उसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन में

“भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने आप में कोई स्वतंत्र घटना नहीं है। पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष चल रहे थे और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन भी इसी विश्वव्यापी संघर्ष का हिस्सा था। इस आंदोलन का असर एशिया और अफ्रीका के कई मुक्ति आंदोलनों पर हुआ।” “आज़ादी मिलने से पहले भी भारत के राष्ट्रवादी नेता दुनिया के अन्य उपनिवेशों में मुक्ति संग्राम चला रहे नेताओं के संपर्क में थे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ (आई.एन.ए.) का गठन किया था। इससे साफ़-साफ़ ज़ाहिर होता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के संबंध विदेशों में रह रहे भारतीयों से बन चुके थे।”

उस समय की दुनिया — पाँच एक साथ घटती बातें

“भारत को जिस वक्त आजादी हासिल हुई उस समय शीतयुद्ध का दौर भी शुरू हो चुका था… एक खेमे का अगुआ संयुक्त राज्य अमरीका था और दूसरे का सोवियत संघ। दोनों खेमों के बीच विश्वस्तर पर आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य टकराव जारी था।”

#उसी दौर की घटना
1संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया
2परमाणु हथियारों का निर्माण शुरू हुआ
3चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना हुई
4अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई

“भारत के नेताओं को अपने राष्ट्रीय हित इसी संदर्भ के दायरे में साधने थे।”

💬 हाशिये का प्रश्न(कार्टून-संवाद)

“चौथे अध्याय में एक बार फिर से जवाहरलाल नेहरू! क्या वे कोई सुपरमैन थे या, उनकी भूमिका महिमा-मंडित कर दी गई है?” ★यह प्रश्न कक्षा में ज़रूर उठाइए — यह विद्यार्थी को ‘नायक-पूजा’ से बचाकर आलोचनात्मक बनाता है।

पृष्ठ 57 · नेहरू की भूमिका और दो खेमों से दूरी

🔷 नेहरू की भूमिका

“भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एजेंडा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई। ★★वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के रूप में 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला।”

नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य(यह हर परीक्षा में आता है)★★

#उद्देश्य
1कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना
2क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना
3तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना

“नेहरू इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।” ★तरकीब: “संप्रभुता · अखंडता · विकास” — और साधन: गुटनिरपेक्षता।

पर विरोध भी था — यह ज़रूर पढ़ाइएध्यान

“उन दिनों देश में कुछ पार्टियाँ और समूह ऐसे भी थे जिनका मानना था कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ ज्यादा नजदीकी बढ़ानी चाहिए क्योंकि इस खेमे की प्रतिष्ठा लोकतंत्र के हिमायती के रूप में थी। ★★इस धारा पर सोचने वालों में डा. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे।” “साम्यवाद की विरोधी कुछ राजनीतिक पार्टियाँ भी चाहती थीं कि भारत अपनी विदेश नीति अमरीका के पक्ष में बनाए। ऐसे दलों में भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी प्रमुख थे। लेकिन, विदेश नीति को तैयार करने के मामले में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।”

★★अंबेडकर का नाम यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि गुटनिरपेक्षता सर्वसम्मत नहीं थी — उस पर गंभीर, सम्मानित असहमति भी थी। यह तथ्य उत्तर में लिखने पर उत्तर तुरंत परिपक्व दिखता है।

🔷 दो खेमों से दूरी

“आज़ाद भारत की विदेश नीति में शांतिपूर्ण विश्व का सपना था… भारत ने शीतयुद्ध से उपजे तनाव को कम करने की कोशिश की और संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति-अभियानों में अपनी सेना भेजी।” “भारत, अमरीका और सोवियत संघ की अगुवाई वाले सैन्य गठबंधनों से अपने को दूर रखना चाहता था। शीतयुद्ध के समय अमरीका ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) और सोवियत संघ ने इसके जवाब में ‘वारसा पैक्ट’ नामक संधि संगठन बनाया था।” ! “संतुलन साधने की यह कठिन कोशिश थी और कभी-कभी संतुलन बहुत कुछ नहीं भी सध पाता था।”

1956 — वह वर्ष जो गुटनिरपेक्षता की परीक्षा भी था और उसकी सीमा भी★★

घटनाभारत का रुख
ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया✓ भारत ने इस नव-औपनिवेशिक हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की
सोवियत संघ ने हंगरी पर आक्रमण किया! भारत ने सोवियत संघ के इस कदम की सार्वजनिक निंदा नहीं की

★★यह जोड़ी पूरे अध्याय का सबसे ईमानदार क्षण है — पाठ्यपुस्तक स्वयं भारत की असंगति दर्ज़ करती है। और फिर संतुलित निष्कर्ष देती है: “ऐसी स्थिति के बावजूद, कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया। उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए।” ! प्रश्न 1(क) का उत्तर यहीं है — ‘सही’।

अमरीका से खटास के दो कारणध्यान

“भारत अभी बाकी विकासशील देशों को गुटनिरपेक्षता की नीति के बारे में आश्वस्त करने में लगा था कि पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया। इस वजह से 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास पैदा हो गई। अमरीका, सोवियत संघ से भारत की बढ़ती हुई दोस्ती को लेकर भी नाराज था।” ★प्रश्न 1(ग) — “शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा” — का प्रमाण यही है।

आर्थिक कड़ी — पिछले अध्याय से जोड़

“आपने पिछले अध्याय में पढ़ा कि भारत ने नियोजित विकास की रणनीति अपनाई थी। इस नीति में ज़ोर आयात को कम करने पर था। इसमें संसाधन-आधार तैयार करने पर जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप निर्यात के मामले में भी प्रगति बड़ी सीमित थी। विकास की इस रणनीति के कारण बाहरी दुनिया से भारत का आर्थिक लेन-देन बड़ा सीमित था।” ★यह अध्याय 3 से सीधी कड़ी है — इसे कक्षा में ज़रूर जोड़िए।

अवतरण — नेहरू, के.पी.एस. मेनन को पत्र (जनवरी 1947)★

“आमतौर पर हमारी नीति ताकत की राजनीति से अपने को अलग रखने और महाशक्तियों के एक खेमे के विरुद्ध दूसरे खेमे में शामिल न होने की है। आज दो अग्रणी खेमे रूस और अमरीका-ब्रिटेन के हैं। हमें दोनों के साथ दोस्ताना संबंध रखना है साथ ही उनके खेमे में शामिल भी नहीं होना है। रूस और अमरीका एक-दूसरे को लेकर बहुत शंकित हैं और अन्य देशों पर भी शक करते हैं। इस कारण हमारा रास्ता कठिन है और दोनों हम पर शक कर सकते हैं कि हम उनके विरोधी खेमे की तरफ झुक रहे हैं। इससे बचा नहीं जा सकता।”

★★ध्यान दीजिए — यह पत्र आज़ादी से सात महीने पहले का है। यानी गुटनिरपेक्षता आज़ादी के बाद की प्रतिक्रिया नहीं, पहले से सोची हुई नीति थी।

पृष्ठ 58 · एफ्रो-एशियाई एकता, और चीन के साथ रिश्ते की शुरुआत

🔷 एफ्रो-एशियाई एकता

“भारत के आकार, अवस्थिति और शक्ति-संभावना को भाँपकर नेहरू ने विश्व के मामलों, खासकर एशियाई मामलों में भारत के लिए बड़ी भूमिका निभाने का स्वप्न देखा था।”

वर्षघटना★
मार्च 1947★★एशियाई संबंध सम्मेलन (एशियन रिलेशंस कांफ्रेंस) का आयोजन — “जबकि अभी भारत को आज़ादी मिलने में पाँच महीने शेष थे”आज़ादी से पहले ही विदेश-पहल!
1949इंडोनेशिया के स्वतंत्रता-संग्राम के समर्थन में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन — भारत चाहता था कि इंडोनेशिया डच औपनिवेशिक शासन से यथासंभव शीघ्र मुक्त हो जाए—
1955★★बांडुंग (इंडोनेशिया) में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन — “आमतौर पर हम इसे बांडुंग-सम्मेलन के नाम से जानते हैं”; “अफ्रीका और एशिया के नव-स्वतंत्र देशों के साथ भारत के बढ़ते संपर्क का यह चरम बिंदु था”★★“बांडुंग-सम्मेलन में ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी”
सितंबर 1961★★गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन — बेलग्रेड में“इसकी स्थापना में नेहरू की महती भूमिका रही थी”

और यह भी: “भारत अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया का प्रबल समर्थक था और उसने पूरी दृढ़ता से नस्लवाद का, खासकर दक्षिण अफ्रीका में जारी रंगभेद का विरोध किया।”

★★कड़ी याद रखिए — बांडुंग 1955 → नींव; बेलग्रेड 1961 → पहला सम्मेलन। ! विद्यार्थी इन दोनों को गड्डमड्ड करते हैं। बोर्ड पर तीर के साथ लिखिए। यही प्रश्न 2(ग) का उत्तर भी है।

💬 हाशिये का प्रश्न

“हम लोग आज की बनिस्बत जब ज्यादा गरीब, कमज़ोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान कहीं ज्यादा थी। है ना विचित्र बात?” ★यह अध्याय का सबसे अच्छा चर्चा-प्रश्न है। (संकेत: नैतिक शक्ति और भौतिक शक्ति अलग-अलग चीज़ें हैं — नीचे राजगोपालाचारी का अवतरण ठीक यही कहता है।)

अवतरण — सी. राजगोपालाचारी, एडविना माउंटबेटन को पत्र, 1950★

”…ताकत के तीनों साधनों — संपदा, धन और जन — से हीन एक देश अब बड़ी तेजी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है …. उसकी आवाज़ को दिग्गज देशों की जमात में बड़ी इज़्ज़त के साथ सुना जाता है…”

🔷 चीन के साथ शांति और संघर्ष — दोस्ती का दौर

“पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के विपरीत आज़ाद भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों की शुरुआत बड़े दोस्ताना ढंग से की। चीनी क्रांति 1949 में हुई थी। इस क्रांति के बाद भारत, चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले पहले देशों में एक था।” “पश्चिमी प्रभुत्व के चंगुल से निकलने वाले इस देश को लेकर नेहरू के हृदय में गहरे भाव थे और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फ़लक पर इस सरकार की मदद की।”

वह चेतावनी जो अनसुनी रह गईध्यान★★

“नेहरू के कुछ सहयोगियों — मसलन सरदार वल्लभ भाई पटेल — को आशंका थी कि आगामी दिनों में चीन भारत पर चढ़ाई कर सकता है। लेकिन नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बहुत दिनों से भारत की चीन से लगती सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे।”

★★इस अनुच्छेद को रेखांकित करवाइए। 1962 की पूरी त्रासदी इन तीन वाक्यों में पहले से लिखी हुई है।

पंचशील — 29 अप्रैल 1954★★

“शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांतों यानी पंचशील की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल 1954 में की। दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध की दिशा में यह एक अगला कदम था। भारत और चीन के नेता एक-दूसरे के देश का दौरा करते थे और उनके स्वागत में बड़ी भीड़ जुटती थी।” ★प्रश्न 2(ख) का उत्तर: पंचशील = शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत।

🔷 चीन का आक्रमण, 1962 — खटास का पहला कारण

“चीन के साथ भारत के इस दोस्ताना रिश्ते में दो कारणों से खटास आई। ★चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया। इससे भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक रूप से जो एक मध्यवर्ती राज्य बना चला आ रहा था, वह खत्म हो गया।”

★★‘मध्यवर्ती राज्य’ (buffer state) — यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक पद है। कक्षा में एक वाक्य में समझाइए: “1950 तक भारत और चीन के बीच तिब्बत था। 1950 के बाद भारत और चीन आमने-सामने आ गए — और जहाँ दो देश आमने-सामने आते हैं, वहाँ सीमा तय करनी पड़ती है। सीमा तय नहीं थी।”

पृष्ठ 59 · 📦 बॉक्स — तिब्बत(पूरा, क्योंकि यह परीक्षा में आता है)

समाचारपत्र-कतरन

The Hindustan Times: “INDIA OFFERS SANCTUARY TO THE DALAI LAMA · Arrival In NEFA With 80 Others · LOK SABHA APPLAUDS NEHRU’S STATEMENT · AN EPIC ESCAPE · Dalai Lama Expected …wang Tomorrow” चित्र-शीर्षक: “दलाई लामा ने अपने अनुयायियों के साथ भारत से शरण की माँग की।”

बॉक्स का पाठ — कालक्रम में

वर्षघटना
—तिब्बत मध्य एशिया का मशहूर पठार है। “ऐतिहासिक रूप से तिब्बत भारत और चीन के बीच विवाद का एक बड़ा मसला रहा है।” अतीत में चीन ने समय-समय पर प्रशासनिक नियंत्रण जताया और कई दफा तिब्बत आज़ाद भी हुआ।
★1950चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया। तिब्बत के ज्यादातर लोगों ने चीनी कब्जे का विरोध किया।
★★1954पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर — प्रावधानों में यह भी था कि दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करेंगे। ! “चीन ने इस प्रावधान का अर्थ लगाया कि भारत तिब्बत पर चीनी दावेदारी की बात को स्वीकार कर रहा है।”
1956चाऊ एन लाई भारत के आधिकारिक दौरे पर आए; साथ ही दलाई लामा भी भारत पहुँचे और तिब्बत की बिगड़ती स्थिति की जानकारी नेहरू को दी। चीन आश्वासन दे चुका था कि तिब्बत को चीन के अन्य इलाकों से कहीं ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी।
1958! चीनी आधिपत्य के विरुद्ध तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह — चीन की सेनाओं ने दबा दिया
★★1959दलाई लामा ने सीमा पारकर भारत में प्रवेश किया और भारत से शरण माँगी। भारत ने शरण दे दी। ! “चीन ने भारत के इस कदम का कड़ा विरोध किया।”

आज की स्थिति (पाठ के अनुसार):

  • पिछले 50 सालों में बड़ी संख्या में तिब्बती जनता ने भारत और दुनिया के अन्य देशों में शरण ली है।
  • भारत में (खासकर दिल्ली में) तिब्बती शरणार्थियों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं।
  • ★हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में संभवतया सबसे बड़ी बस्ती है; दलाई लामा ने भी धर्मशाला को ही अपना निवास-स्थान बनाया है।
  • ★1950 और 1960 के दशक में भारत के अनेक राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने तिब्बत की आज़ादी के प्रति समर्थन जताया — इन दलों में सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ शामिल हैं।

विवाद का वर्तमान रूप:

“चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया है और इस इलाके को वह चीन का अभिन्न अंग मानता है। ! तिब्बती जनता चीन के इस दावे को नहीं मानती… ज्यादा से ज्यादा संख्या में चीनी बाशिंदों को तिब्बत लाकर वहाँ बसाने की चीन की नीति का तिब्बती जनता ने विरोध किया। तिब्बती चीन के इस दावे को भी नकारते हैं कि तिब्बत को स्वायत्तता दी गई है। वे मानते हैं कि तिब्बत की पारंपरिक संस्कृति और धर्म को नष्ट करके चीन वहाँ साम्यवाद फैलाना चाहता है।”

★प्रश्न 2(घ) का उत्तर — दलाई लामा = तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।

पृष्ठ 60 · मानचित्र और 1960 का सीमा-विवाद

🗺 मानचित्र —भारत-चीन सीमाध्यान

अंकित स्थान (पश्चिम से पूर्व): काराकोरम पास · अकसाय चीन · करगिल · श्रीनगर · लेह · डेमचोक · नीलांग · बारा होती · देहरादून · काठगोदाम · दिल्ली · आगरा · लखनऊ · नेपाल (काठमांडु) · गंगटोक · दार्जिलिंग · भूटान (थिम्फु) · तवांग · अलोंग · डोंग · ईटानगर · शिलांग · पटना · बांग्लादेश ऊपर अंकित: ज़िंगजियाँग स्वायत्त क्षेत्र (सिंकियांग) · चीन · तिब्बत

! पाठ की अपनी नोट: “यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है। इसमें दिखाई गई भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।” ★यह नोट कक्षा में पढ़कर सुनाइए — विद्यार्थी को स्रोत की सीमा समझना भी सीखना चाहिए।

📰 समाचारपत्र-कतरन

“MENON GOES — Dramatic announcement by Mr Nehru — Tremendous cheers acclaim news” (साथ में “Ranadive, other Reds arrested”) ★यह कतरन 1962 की हार के बाद रक्षामंत्री कृष्णमेनन के इस्तीफ़े की है — इसे पृ. 61 के बॉक्स से जोड़िए।

🎨 कार्टून

दो नेता ‘INDIAN TERRITORY’ लिखी रस्सी को दोनों ओर से खींच रहे हैं; नीचे की चकती पर लिखा है — “BASELESS CHARGES, ACCUSATIONS, PROVOCATIONS”; संवाद: “खबरदार! अब अगर कोई भी नागवार हरकत होती है तो जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।” चित्र-शीर्षक: “चीन के साथ 1960 में सीमा विवाद उठा। नेहरू और माओत्से तुंग के बीच बातचीत व्यर्थ साबित हुई।”

★कार्टून का संदेश: दोनों पक्ष एक ही ज़मीन को अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं, और दोनों की भाषा आरोप की है — इसलिए बातचीत का धरातल ही नहीं बचा।

पृष्ठ 61 · 1962 — कोलाज और कृष्णमेनन

📰 समाचारपत्र (The Hindustan Times Weekly, Sunday, October 21, 1962)

  • “Indian troops fall back in NEFA and Ladakh”
  • “Dhola, Khinzemane posts abandoned”
  • “Chinese advance pushed at heavy cost”
  • “China has numerical and logistic edge”
  • नईदुनिया: “चीन द्वारा नेफा व लद्दाख क्षेत्र में एक साथ भीषण आक्रमण · दो भारतीय चौकियों का पतन · एक भारतीय हेलिकॉप्टर को मार गिराया”

🎨 दो कार्टून

कार्टूनविवरण
अमूल★“Hindi Chini Bye Bye? — Attack this Instead” — ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे का करारा उलटफेर
आर.के. लक्ष्मण★★‘CHINESE INCURSION’ नाम का रोड-रोलर ‘HISTORICAL EVIDENCE UNDER CONSTRUCTION’ लिखी सड़क को कुचलता हुआ; टिप्पणी: “China roller evidence under construction.”

★★लक्ष्मण के कार्टून का अर्थ ज़रूर समझाइए: चीन ‘ऐतिहासिक प्रमाण’ का दावा करता है, पर वह प्रमाण वह ज़मीन पर सेना भेजकर स्वयं ‘बना’ रहा है। — यानी दावे को तथ्य में बदलने की कोशिश।

📦 बॉक्स:वी.के. कृष्णमेनन (1897–1974)

पहलूविवरण
परिचयराजनयिक एवं मंत्री
1934–1947इंग्लैंड की लेबर पार्टी में सक्रिय
पदइंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त; बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के मुखिया
संसदराज्यसभा के सांसद, बाद में लोकसभा सांसद
1956संघ केबिनेट के सदस्य
★1957रक्षा मंत्री
!★★1962भारत-चीन युद्ध के बाद इस्तीफा

पृष्ठ 62 · सीमा-विवाद का ब्योरा और 1962 का युद्ध

तिब्बत पर भारत की बेचैनी

“चीन के इस कदम का खुले तौर पर विरोध नहीं किया। बहरहाल, तिब्बत की संस्कृति को कुचलने की खबरें जैसे-जैसे सामने आने लगीं, वैसे-वैसे भारत की बेचैनी भी बढ़ी। …1959 में भारत ने उन्हें शरण दे दी। ! चीन ने आरोप लगाया कि भारत सरकार अंदरूनी तौर पर चीन विरोधी गतिविधियों को हवा दे रही है।”

सीमा-विवाद — दूसरा कारण★★

“भारत का दावा था कि चीन के साथ सीमा-रेखा का मामला अंग्रेजी-शासन के समय ही सुलझाया जा चुका है। लेकिन चीन की सरकार का कहना था कि अंग्रेजी शासन के समय का फ़ैसला नहीं माना जा सकता।”

छोरविवादित क्षेत्रटिप्पणी
★पश्चिमीजम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से का अक्साई-चीन! “1957 से 1959 के बीच चीन ने अक्साई-चीन इलाके पर कब्जा कर लिया और इस इलाके में उसने रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए एक सड़क बनाई।”
★पूर्वीअरुणाचल प्रदेश — “उस समय नेफा या उत्तर-पूर्वी सीमांत कहा जाता था”चीन ने अधिकांश हिस्सों पर अधिकार जताया

“दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लंबी-लंबी चर्चाएँ और बातचीत चली लेकिन इसके बावजूद मतभेद को सुलझाया नहीं जा सका। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा पर कई बार झड़प हुई।”

अक्तूबर–नवंबर 1962 — युद्ध★★

“जिस समय पूरे विश्व का ध्यान दो महाशक्तियों की तनातनी से पैदा क्यूबा मिसाइल संकट की तरफ लगा हुआ था, ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्तूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर बड़ी तेज़ी तथा व्यापक स्तर पर हमला किया।”

चरणविवरण
पहला हमलाएक हफ्ते तक चला — चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया
अगला दौरनवंबर महीने में शुरू हुआ
पश्चिमी मोर्चा✓ “लद्दाख से लगे पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना ने चीन की बढ़त रोकी”
! पूर्वी मोर्चा! “पूर्व में चीनी सेना आगे बढ़ते हुए असम के मैदानी हिस्से के प्रवेशद्वार तक पहुँच गई”
अंत★“आखिरकार, चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित किया और चीन की सेनाएँ उस मुकाम पर लौट गईं जहाँ वे हमले से पहले के वक्त में तैनात थीं।”

★★‘क्यूबा मिसाइल संकट’ वाली बात रेखांकित करवाइए — यह दिखाता है कि चीन ने समय चुना था; दुनिया का ध्यान कहीं और था। यह अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ का सबसे अच्छा उदाहरण है (प्रश्न 4 और 7 के लिए)।

युद्ध के छह परिणाम — यह सारणी पूरे अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण सारणी है★★

#परिणामपाठ के शब्द
1! छवि को धक्का“चीन-युद्ध से भारत की छवि को देश और विदेश दोनों ही जगह धक्का लगा”
2! गुटनिरपेक्षता की परीक्षा“इस संकट से उबरने के लिए भारत को अमरीका और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी। ★सोवियत संघ इस संकट की घड़ी में तटस्थ बना रहा।”
3★दोहरा भावनात्मक असर“भारतीय राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँची लेकिन इसके साथ-साथ राष्ट्र-भावना भी बलवती हुई”
4सैन्य नेतृत्व में उथल-पुथल“कुछ प्रमुख सैन्य-कमांडरों ने या तो इस्तीफा दे दिया या अवकाश ग्रहण कर लिया”; ★रक्षामंत्री वी.के. कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा
5! नेहरू की आलोचना“नेहरू की छवि भी थोड़ी धूमिल हुई। चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई”
6★★घरेलू राजनीति बदली“पहली बार, उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और लोकसभा में इस पर बहस हुई। इसके तुरंत बाद, कांग्रेस ने कुछ महत्त्वपूर्ण उप-चुनावों में पटखनी खाई। देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था।”

★★परिणाम 6 सबसे महत्वपूर्ण है — यह अध्याय के मूल दावे (“देश की राजनीति स्वयं भी प्रभावित हुई”) का प्रत्यक्ष प्रमाण है, और अगले अध्याय (कांग्रेस प्रणाली को चुनौती) की भूमिका भी।

अवतरण — सी. राजगोपालाचारी, एक पत्र में, दिसंबर 1956★

“सच कहूँ तो उनको (चाऊ एन लाई) लेकर मेरे मन में बड़े अच्छे भाव जगे… मेरा खयाल है कि चीन के शासनाध्यक्ष अच्छे इनसान हैं और उन पर भरोसा किया जा सकता है।” !★★यह अवतरण 1956 का है — छह साल बाद 1962 हुआ। पाठ्यपुस्तक ने इसे जानबूझकर यहाँ रखा है। कक्षा से पूछिए: “अब इस वाक्य को पढ़कर कैसा लगता है?” — यही इतिहास पढ़ाने का सबसे अच्छा क्षण है।

💬 हाशिये की टिप्पणी

“मैंने सुना है कि 1962 के युद्ध के बाद जब लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ गाया तो नेहरू भरी सभा में रो पड़े थे। बड़ा अजीब लगता है यह सोचकर कि इतने बड़े लोग भी किसी भावुक लम्हे में रो पड़ते हैं!”

पृष्ठ 63 · 1962 के बाद, भाकपा का विभाजन, पूर्वोत्तर, और ‘हकीकत’

📦 बॉक्स:कुछ आगे की… 1962 के बाद भारत-चीन संबंध

वर्षघटना
—“भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य होने में करीब दस साल लग गए।”
★1976दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल
★1979अटल बिहारी वाजपेयी (तब विदेश मंत्री) चीन के दौरे पर गए — “शीर्ष नेता के तौर पर पहली बार”
—बाद में, नेहरू के बाद राजीव गाँधी बतौर प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर गए
—“इसके बाद से चीन के साथ भारत के संबंधों में ज्यादा जोर व्यापारिक मसलों पर रहा है। ‘समकालीन विश्व राजनीति’ की किताब में आप इन बातों को पढ़ चुके हैं।”

1962 का असर भारतीय वामपंथ पर — भाकपा का विभाजन★★

“भारत–चीन संघर्ष का असर विपक्षी दलों पर भी हुआ। इस युद्ध और चीन-सोवियत संघ के बीच बढ़ते मतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के अंदर बड़ी उठा-पटक मची।”

खेमारुख
सोवियत संघ का पक्षधरभाकपा में ही रहा और कांग्रेस के साथ नजदीकी बढ़ायी
दूसरा खेमाकुछ समय के लिए चीन का पक्षधर रहा; कांग्रेस के साथ किसी भी तरह की नजदीकी के खिलाफ़ था

★★“भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई। इस पार्टी के भीतर जो खेमा चीन का पक्षधर था उसने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई.एम. — माकपा) बनाई। ! चीन-युद्ध के क्रम में माकपा के कई नेताओं को चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।”

★★यह अध्याय का सबसे साफ़ प्रमाण है कि “विदेश नीति ने घरेलू राजनीति को बदला” — एक युद्ध ने एक राष्ट्रीय दल को दो हिस्सों में तोड़ दिया। यह अगले अध्याय में भी काम आएगा।

पूर्वोत्तर पर असर★

“चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत के नेताओं को पूर्वोत्तर की डावाँडोल स्थिति के प्रति सचेत किया। यह इलाका अत्यंत पिछड़ी दशा में था और अलग-थलग पड़ गया था। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिहाज से भी यह इलाका चुनौतीपूर्ण था। चीन-युद्ध के तुरंत बाद इस इलाके को नयी तरतीब में ढालने की कोशिशें शुरू की गईं।”

कदमविवरण
★नगालैंडप्रांत का दर्जा दिया गया
★मणिपुर और त्रिपुराकेंद्र-शासित प्रदेश थे, लेकिन उन्हें अपनी विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार मिला

🎬 सिने-संसार:हकीकत

पहलूविवरण
वर्ष1964
निर्देशकचेतन आनंद
अभिनयधर्मेंद्र, प्रिया राजवंश, बलराज साहनी, जयंत, सुधीर, संजय खान, विजय आनंद
कथानकपृष्ठभूमि में 1962 का चीनी आक्रमण। भारतीय सेना की एक छोटी-सी टुकड़ी लद्दाख क्षेत्र में घिर गई है। कप्तान बहादुर सिंह स्थानीय घुमंतू कबीले की लड़की कम्मो की मदद से टुकड़ी को निकालने की कोशिश करता है; दोनों शहीद हो जाते हैं। जवान पूरे प्राणपण से मुकाबला करते हैं परंतु अंततः उन्हें अपनी जान न्यौछावर करनी पड़ती है।
★महत्व“यह फिल्म सेना के जवान के सामने आने वाली चुनौतियों, दिक्कतों के साथ-साथ चीनी विश्वासघात से उपजी राजनीतिक निराशा का भी मुआयना कराती है।” युद्ध के दृश्यों में डाक्युमेंटरी फुटेज का काफी इस्तेमाल। “हकीकत युद्ध आधारित फिल्मों की विधा में अहम स्थान रखती है।”

पृष्ठ 64 · पाकिस्तान के साथ युद्ध और शांति

🔷 कश्मीर — संघर्ष की शुरुआत

“जम्मू-कश्मीर मसले को लेकर पाकिस्तान के साथ बँटवारे के तुरंत बाद ही संघर्ष छिड़ गया था। आप इस विवाद के बारे में सातवें अध्याय में विस्तार से पढ़ सकते हैं।” ✓ सत्यापित — युक्तिकरण के बाद ‘क्षेत्रीय आकांक्षाएँ’ अब वास्तव में अध्याय 7 है, इसलिए यह संदर्भ सही है।

“1947 में ही जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच एक छाया-युद्ध छिड़ गया था। बहरहाल, यह संघर्ष पूर्णव्यापी युद्ध का रूप न ले सका। यह मसला फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया गया। ★संयुक्त राज्य अमरीका और चीन के साथ भारत के संबंधों के लिहाज़ से पाकिस्तान एक महत्त्वपूर्ण घटक रहा।”

संघर्ष के बावजूद सहयोग — दो उदाहरण(यह अक्सर छूट जाता है)★

#सहयोग
1“दोनों सरकारों ने मिल-जुल कर प्रयास किया कि बँटवारे के समय जो महिलाएँ अपहृत हुई थीं उन्हें अपने परिवार के पास वापस लौटाया जा सके।”
2★★सिंधु नदी जल संधि — 1960 — “विश्व बैंक की मध्यस्थता से नदी जल में हिस्सेदारी को लेकर चला आ रहा एक लंबा विवाद सुलझा लिया गया। नेहरू और जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए।” और: “भारत-पाक संबंधों में नरमी-गरमी के बावजूद इस संधि पर ठीक-ठाक अमल होता रहा।”

★★प्रश्न 1(ख) — “अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे” — का उत्तर ‘गलत’ है, और उसका प्रमाण ठीक यही दो उदाहरण हैं (और चीन के साथ पंचशील का दौर भी)।

1965 का युद्ध★★

“दोनों देशों के बीच 1965 में कहीं ज्यादा गंभीर किस्म के सैन्य-संघर्ष की शुरुआत हुई। आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि इस वक्त लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री थे।”

क्रमघटना
अप्रैल 1965पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोला
अगस्त–सितंबर 1965जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हमला
★पाकिस्तान की गलत उम्मीद“पाकिस्तान के नेताओं को उम्मीद थी कि जम्मू-कश्मीर की जनता उनका समर्थन करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।”
★★भारत का जवाब“कश्मीर के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना की बढ़त को रोकने के लिए प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पंजाब की सीमा की तरफ से जवाबी हमला करने के आदेश दिए। …भारत की सेना आगे बढ़ते हुए लाहौर के नजदीक तक पहुँच गई।”
अंत★“संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से इस लड़ाई का अंत हुआ।”
★★1966ताशकंद-समझौता — लालबहादुर शास्त्री और जनरल अयूब खान के बीच; ★“सोवियत संघ ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई।”
! कीमत“हालाँकि 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सैन्य क्षति पहुँचाई लेकिन इस युद्ध से भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा।”

★ध्यान दीजिए — 1965 में मध्यस्थ सोवियत संघ था; 1962 में वह तटस्थ था। यह बदलाव अपने-आप में एक कहानी है।

🔷 बांग्लादेश युद्ध, 1971 — पृष्ठभूमि

“1970 में पाकिस्तान के सामने एक गहरा अंदरूनी संकट आ खड़ा हुआ। पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया।”

पक्षपरिणाम
जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टीपश्चिमी पाकिस्तान में विजयी
★मुजीबुर्रहमान की पार्टी — अवामी लीगपूर्वी पाकिस्तान में ज़ोरदार कामयाबी

★★कारण (पाठ के शब्दों में): “पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के हाथों अपने साथ हुए दोयम दर्जे के नागरिक के बरताव के विरोध में पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनता ने इस पार्टी को वोट दिया था।” “! पाकिस्तान के शासक इस जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। आवामी लीग एक परिसंघ बनाने की माँग कर रही थी लेकिन वे इस माँग को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।”

💬 हाशिये का प्रश्न

“हम ऐसा क्यों कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ? नेता झगड़े और सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। ज्यादातर आम नागरिकों को इनसे कुछ लेना-देना न था।” ★यह प्रश्न कक्षा में बहुत अच्छी बहस देता है — ‘राष्ट्र’ और ‘राज्य’ का अंतर यहीं से खुलता है।

पृष्ठ 65 · 1965 — कोलाज

The Times of India (Tuesday, September 7, 1965):

  • ★“OUR TROOPS ON OUTSKIRTS OF LAHORE”
  • “IAF Planes Blast Military Installations”
  • “PAK FORCES ON THE RUN IN CHHAMB AREA”
  • “…aurian In Flames: Success In Uri Sector Too”
  • “BLACK-OUT IS ORDERED IN GREATER BOMBAY” · “Indo-Pak Flights Cancelled”

The Hindustan Times: “SIALKOT-PASRUR RAILWAY TAKEN” · “IAF pounds Sargodha, Chak Jhumra airports” · “TROOPS MARCH INTO PAKISTAN”

डाक टिकट: ★★‘जय जवान’ (0.15) और ‘जय किसान’ (15 पैसे)

★★इन दो टिकटों पर ज़रूर रुकिए। “जय जवान, जय किसान” लालबहादुर शास्त्री का नारा है — और यह अध्याय 3 (कृषि और खाद्य-संकट) तथा अध्याय 4 (युद्ध) को एक ही साँस में जोड़ देता है। 1965 में भारत एक साथ दो मोर्चों पर था — सीमा पर और खेत में।

पृष्ठ 66 · 1971 — युद्ध, संधि और शिमला

दमन और शरणार्थी

“पाकिस्तानी सेना ने 1971 में शेख मुजीब को गिरफ्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू किए। जवाब में पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने अपने इलाके यानी मौजूदा बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्त कराने के लिए संघर्ष छेड़ दिया।” ★★“1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा।” “भारत ने बांग्लादेश के ‘मुक्ति संग्राम’ को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी। ! पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत उसे तोड़ने की साजिश कर रहा है।”

अंतर्राष्ट्रीय समीकरण — यह सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद है★★

“पाकिस्तान को अमरीका और चीन ने मदद की। 1960 के दशक में अमरीका और चीन के बीच संबंधों को सामान्य करने की कोशिश चल रही थी और इससे एशिया में सत्ता-समीकरण नया रूप ले रहा था।” ★“अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सलाहकार हेनरी किसिंजर ने 1971 के जुलाई में पाकिस्तान होते हुए गुपचुप चीन का दौरा किया।” ★★“अमरीका–पाकिस्तान–चीन की धुरी बनती देख भारत ने इसके जवाब में सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की एक 20-वर्षीय संधि पर दस्तखत किए। संधि से भारत को इस बात का आश्वासन मिला कि हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।”

★★यह प्रश्न 1(घ) और प्रश्न 10(ख) दोनों की कुंजी है। प्रश्न 1(घ) — “1971 की संधि अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी” — ! गलत। वह ठीक उल्टा थी: अमरीका–चीन–पाकिस्तान की धुरी के जवाब में।

दिसंबर 1971 — युद्ध★★

क्रमघटना
आरंभ“महीनों राजनयिक तनाव और सैन्य तैनाती के बाद 1971 के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच एक पूर्णव्यापी युद्ध छिड़ गया।”
पाकिस्तानलड़ाकू विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमले किए; सेना ने जम्मू-कश्मीर में मोर्चा खोला
भारत★“जवाब में भारत ने अपनी वायुसेना, नौसेना और थलसेना के बूते पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे से कार्रवाई की।”
★पूर्वी मोर्चा“स्थानीय लोगों के समर्थन और स्वागत के बीच भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में तेजी से आगे बढ़ी।”
★★निर्णय“दस दिनों के अंदर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और अपने 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा।”
युद्ध-विराम“बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया।”
★★3 जुलाई 1972शिमला-समझौता — इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच; “इससे अमन की बहाली हुई।”

★तीन संख्याएँ याद रखिए: 80 लाख शरणार्थी · दस दिन · 90,000 सैनिक।

📦 बॉक्स:कुछ आगे की… करगिल संघर्ष

मदविवरण
कब1999 के शुरुआती महीने
कहाँ★नियंत्रण सीमा रेखा के ठिकाने — द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक
कौन“अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भाँप कर भारतीय सेना हरकत में आयी।”
अवधि1999 के मई–जून में लड़ाई जारी रही; ★“26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था।”
★★विश्व का ध्यान क्यों“क्योंकि इससे ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु हथियार बनाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे।”
सीमा“बहरहाल, यह लड़ाई सिर्फ करगिल के इलाके तक ही सीमित रही।”
! पाकिस्तान में असर“कहा गया कि सेना के प्रमुख ने प्रधानमंत्री को इस मामले में अँधेरे में रखा था। इस लड़ाई के तुरंत बाद पाकिस्तान की हुकूमत पर जनरल परवेज मुशर्रफ की अगुवाई में पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण ले लिया।”

💬 हाशिये का प्रश्न( यह सीधे प्रश्न 10(ख) है)★

“इस बात से तो ऐसा जान पड़ता है कि भारत, सोवियत खेमे में शामिल हो गया था। क्या सोवियत संघ के साथ इस 20-वर्षीय संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद हम कह सकते हैं कि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल कर रहा था?”

📰 अन्य कतरनें

“Refugee influx threatens peace, India warns Pak” · “PRESIDENT DECLARES EMERGENCY — Pakistanis bomb border airfields in sneak raids”

पृष्ठ 67 · 1971 — कोलाज

The Times of India (Saturday, December 18, 1971): ★★“YAHYA YIELDS TO INDIRA, ENDS WAR” · “Somersault by General as …” · “U.S. hails Delhi”

आत्म-समर्पण का दस्तावेज़ (Instrument of Surrender): ★★“signed at Dacca on 16 Dec 1971 at 1631 hours (IST)” — हस्ताक्षर: Lt-Gen जगजीत सिंह अरोड़ा (GOC-in-C, भारतीय और बांग्ला देश बलों, पूर्वी थियेटर) और Lt-Gen अमीर अब्दुल्ला खान नियाज़ी (पाकिस्तान) दस्तावेज़ में यह भी: आत्म-समर्पण करने वाले सैनिकों को जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार सम्मान मिलेगा, और पश्चिमी पाकिस्तानी मूल के लोगों, जातीय अल्पसंख्यकों तथा विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी।

अन्य शीर्षक: “MUJIB TAKES OVER ‘BANGLA DESH’” · “PAK PLANES BOMB BANGLA DESH”

★16 दिसंबर 1971, शाम 4:31 बजे — यह तिथि और समय दस्तावेज़ से सीधे पढ़ा जा सकता है।

पृष्ठ 68 · जीत का घरेलू असर, और भारत की परमाणु नीति

1971 की जीत का घरेलू राजनीति पर असर★★

“युद्ध में इस निर्णायक जीत से देश में उत्साह की लहर दौड़ गई थी। अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य-पराक्रम प्रबल हुआ है।” “आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि इंदिरा गाँधी इस वक्त भारत की प्रधानमंत्री थीं। 1971 के लोकसभा चुनावों में उन्हें विजय मिली थी। ★★1971 की जंग के बाद इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता को चार चाँद लग गए। इस युद्ध के बाद अधिकतर राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए और अनेक राज्यों में कांग्रेस पार्टी बड़े बहुमत से जीती।”

★★1962 और 1971 की तुलना कीजिए — यही अध्याय का सबसे सुंदर विरोधाभास है: 1962 की हार → नेहरू के विरुद्ध पहला अविश्वास प्रस्ताव, उप-चुनावों में हार। 1971 की जीत → इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता चरम पर, राज्यों में कांग्रेस की भारी जीत। यानी युद्ध का परिणाम सीधे-सीधे घरेलू सत्ता-समीकरण बदल देता है।

युद्धों की आर्थिक कीमत — अध्याय 3 से कड़ी★

“भारत ने अपने सीमित संसाधनों के साथ नियोजित विकास की शुरुआत की थी। पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई। 1962 के बाद भारत को अपने सीमित संसाधन खासतौर से रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े। भारत को अपने सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण करना पड़ा।”

वर्षकदम
★1962रक्षा-उत्पाद विभाग की स्थापना
★1965रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना

“! तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961–66) पर असर पड़ा और इसके बाद लगातार तीन एक-वर्षीय योजना पर अमल हुआ। चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में ही शुरू हो सकी। युद्ध के बाद भारत का रक्षा-व्यय बहुत ज्यादा बढ़ गया।” ★★अध्याय 3 का ‘योजना-अवकाश’ यहाँ फिर लौटता है — दोनों अध्यायों को जोड़कर पढ़ाइए।

🔷 भारत की परमाणु नीति

“इस दौर की एक खास बात थी भारत का परमाणु विस्फोट। ★★भारत ने 1974 के मई में परमाणु परीक्षण किया।”

नेहरू और परमाणु कार्यक्रम:

#तथ्य
1“तेज़ गति से आधुनिक भारत के निर्माण के लिए नेहरू ने हमेशा विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर अपना विश्वास जताया था।”
2★“नेहरू की औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक परमाणु कार्यक्रम था।”
3★★“इसकी शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी।”
4“भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था।”
5★“नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे। उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया। बहरहाल, परमाणु आयुधों में बढ़ोत्तरी होती रही।”

! बदलती परिस्थिति:

★★“साम्यवादी शासन वाले चीन ने 1964 के अक्तूबर में परमाणु परीक्षण किया।” “अणुशक्ति-संपन्न बिरादरी यानी संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन ने — जो संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे — दुनिया के अन्य देशों पर 1968 की परमाणु अप्रसार संधि को थोपना चाहा। ! भारत हमेशा से इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता आया था। भारत ने इस पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था।” “भारत ने जब अपना पहला परमाणु परीक्षण किया तो इसे उसने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत का कहना था कि वह अणुशक्ति को सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल करने की अपनी नीति के प्रति दृढ़ संकल्प है।”

★★यह तर्क-श्रृंखला बोर्ड पर लिखवाइए: 1964 चीन का परीक्षण → 1968 NPT (‘पाँच के पास हथियार, बाकी पर रोक’) → भारत का इनकार (‘भेदभावपूर्ण’) → 1974 भारत का परीक्षण (‘शांतिपूर्ण’)।

1974 का घरेलू संदर्भ — यह ज़रूर जोड़िएध्यान

“जिस वक्त परमाणु परीक्षण किया गया था वह दौर घरेलू राजनीति के लिहाज से बड़ा कठिन था। 1973 में अरब-इजरायल युद्ध हुआ था। इसके बाद पूरे विश्व में तेल के लिए हाहाकार मचा हुआ था। अरब राष्ट्रों ने तेल के दामों में भारी वृद्धि कर दी थी। भारत इस वजह से आर्थिक समस्याओं से घिर गया। भारत में मुद्रास्फीति बहुत ज्यादा बढ़ गई। जैसा कि आप छठे अध्याय में पढ़ेंगे, इस वक्त देश में कई आंदोलन चल रहे थे और इसी समय देशव्यापी रेल-हड़ताल भी हुई थी।” ✓ ‘छठे अध्याय’ का संदर्भ सही है — ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट’ अब भी अध्याय 6 ही है।

💬 हाशिये का प्रश्न

“बड़ा घनचक्कर है! क्या यहाँ सारा मामला परमाणु बम बनाने का नहीं है? हम ऐसा सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते।” ★यह प्रश्न बहुत ईमानदार है — कक्षा में इसे टालिए मत। उत्तर: 1974 में भारत ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ कहा; 1998 में उसने स्पष्ट रूप से सैन्य क्षमता स्वीकार की। पाठ स्वयं यह दोनों बातें दर्ज़ करता है।

पृष्ठ 69 · सर्व-सहमति, परमाणु-कार्यक्रम और बदलते समीकरण

विदेश नीति पर सर्व-सहमति(प्रश्न 6(ख) का सीधा उत्तर)★★

“हालाँकि राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद जरूर हैं लेकिन भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है। इस कारण, हम देखते हैं कि 1962–1971 के बीच जब भारत ने तीन युद्धों का सामना किया और इसके बाद के समय में भी जब समय-समय पर कई पार्टियों ने सरकार बनाई — विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।”

📦 बॉक्स:कुछ आगे की… भारत का परमाणु-कार्यक्रम

भारत के विरोध का तर्क:

“भारत ने परमाणु अप्रसार के लक्ष्य को ध्यान में रखकर की गई संधियों का विरोध किया क्योंकि ये संधियाँ उन्हीं देशों पर लागू होने को थीं जो परमाणु शक्ति से हीन थे। इन संधियों के द्वारा परमाणु हथियारों से लैस देशों की जमात के परमाणु शक्ति पर एकाधिकार को वैधता दी जा रही थी।”

वर्षघटना
★1995परमाणु-अप्रसार संधि (NPT) को अनियतकाल के लिए बढ़ा दिया गया → भारत ने विरोध किया; और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर भी हस्ताक्षर करने से इनकार
★★मई 1998भारत ने परमाणु परीक्षण किए और “यह जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए अणुशक्ति को इस्तेमाल में लाने की क्षमता है”
—! “इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किए। इससे क्षेत्र में परमाणु युद्ध की आशंका को बल मिला।”
—“अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी… बहुत नाराज थी और उसने भारत तथा पाकिस्तान, दोनों पर कुछ प्रतिबंध लगाए जिन्हें बाद में हटा लिया गया।”

★★भारत की परमाणु नीति के दो स्तंभ — यह परीक्षा में सीधे पूछा जाता है:

#स्तंभ
1“भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन इन हथियारों का ‘प्रयोग पहले नहीं’ करेगा”
2“भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव-हीन परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो”

📦 बॉक्स:विश्व राजनीति के बदलते समीकरण

“जैसा कि आप इस किताब के छठे और आठवें अध्याय में पढ़ेंगे, 1977 के बाद के दौर में कई गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। इस दौर में विश्व राजनीति में भी नाटकीय बदलाव आ रहे थे। इनका भारत के विदेशी संबंधों पर क्या असर पड़ा?” ✓ ‘छठे और आठवें अध्याय’ — दोनों संदर्भ नए क्रमांक के अनुसार सही हैं (अध्याय 8 = ‘भारतीय राजनीति: नए बदलाव’)।

मदपाठ का कथन
★1977“जनता पार्टी की सरकार बनी… इस सरकार ने घोषणा की कि सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया जाएगा।” ! “इसका आशय यह था कि विदेश नीति में सोवियत संघ के प्रति आए झुकाव को खत्म किया जाएगा।”
इसके बाद“इसके बाद की सभी सरकारों ने (कांग्रेसी या गैर-कांग्रेसी) चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने और अमरीका के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने की पहल की।”
★दो कसौटियाँ“भारत की विदेश नीति को विशेष तौर पर दो संदर्भों में देखा जाता है — एक तो पाकिस्तान को लेकर भारत के रुख के संदर्भ में और दूसरे भारत-अमरीका संबंधों के संदर्भ में।” ! “1990 के बाद के दौर में अमरीका-समर्थक विदेश नीति अपनाने के लिए शासक दलों की आलोचना हुई है।”
★★कारण“विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। रूस लगातार भारत का एक महत्त्वपूर्ण मित्र बना हुआ है लेकिन 1990 के बाद से रूस का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व कम हुआ है। इसी कारण भारत की विदेश नीति में अमरीका समर्थक रणनीतियाँ अपनाई गई हैं।”
★और दूसरा कारण“मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का जोर ज्यादा है। इसका भी असर भारत की विदेश नीति में अपनाए गए विकल्पों पर पड़ा है।”
भारत-पाक“कश्मीर दोनों देशों के बीच मुख्य मसले के तौर पर कायम है” — पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान, नागरिकों की आवाजाही, आर्थिक सहयोग, और रेल तथा बस सेवा की शुरुआत ★“यह हाल के समय की सबसे बड़ी उपलब्धि है।” ! “बहरहाल, इन सारे प्रयासों के बावजूद 1999 में… युद्ध की स्थिति पैदा हो गई थी।”

पृष्ठ 70–71 · प्रश्नावली(NCERT के 10 प्रश्न — शब्दशः)

1. इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ: (क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों की सहायता हासिल कर सका। · (ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे। · (ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा। · (घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।

2. निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ: (क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य · (ख) पंचशील · (ग) बांडुंग सम्मेलन · (घ) दलाई लामा

  1. iतिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए। ·
  2. iiक्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास। ·
  3. iiiशांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत। ·
  4. ivइसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई।

3. नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।

4. “विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए पुष्टि करें।

5. भारत की विदेश नीति की किन दो बातों को बदलना चाहेंगे और किन दो पहलुओं को बरकरार रखना चाहेंगे? तर्क दीजिए।

6. संक्षिप्त टिप्पणी: (क) भारत की परमाणु नीति · (ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति

7. शांति और सहयोग के सिद्धांतों पर बनी विदेश नीति, पर 1962–1971 में तीन युद्ध — विदेश नीति की असफलता या अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम? तर्क दीजिए।

8. क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में विचार करें।

9. किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत के उदाहरण देते हुए विचार कीजिए।

10. अवतरण — जवाहरलाल नेहरू:

“गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना… इसका अर्थ होता है चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नज़रिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना….”

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे? (ख) क्या भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ? तर्क दीजिए। (ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

⚡ पूरे अध्याय का कालक्रम — एक पृष्ठ पर

वर्षघटना
मार्च 1947★एशियाई संबंध सम्मेलन (आज़ादी से पाँच महीने पहले)
जनवरी 1947नेहरू का के.पी.एस. मेनन को पत्र — गुटनिरपेक्षता का सूत्र
1949चीनी क्रांति; भारत का इंडोनेशिया-समर्थक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
मार्च 1949नेहरू — “आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है”
★1950चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण किया — मध्यवर्ती राज्य समाप्त
★★29 अप्रैल 1954पंचशील — नेहरू और चाऊ एन लाई
★★1955बांडुंग सम्मेलन — गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव
1956★स्वेज संकट (भारत ने विरोध की अगुवाई की) · ! हंगरी (भारत ने निंदा नहीं की) · चाऊ एन लाई और दलाई लामा भारत में
1957–59! चीन ने अक्साई-चीन पर कब्ज़ा किया और सड़क बनाई
1958तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह, दबा दिया गया
★1959दलाई लामा को भारत में शरण
★★सितंबर 1961गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन — बेलग्रेड
★1960सिंधु नदी जल संधि (नेहरू–अयूब खान, विश्व बैंक की मध्यस्थता)
★★अक्तूबर–नवंबर 1962चीन का आक्रमण (क्यूबा मिसाइल संकट के समय); कृष्णमेनन का इस्तीफा; पहला अविश्वास प्रस्ताव
1962 / 1965रक्षा-उत्पाद विभाग / रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना
★अक्तूबर 1964चीन का परमाणु परीक्षण
★★1964भाकपा का विभाजन → माकपा का गठन; फ़िल्म ‘हकीकत’
★★1965भारत-पाक युद्ध (कच्छ का रन → जम्मू-कश्मीर → पंजाब मोर्चा → लाहौर के नज़दीक)
★1966ताशकंद-समझौता (शास्त्री–अयूब खान, सोवियत मध्यस्थता)
1968परमाणु अप्रसार संधि (NPT) — ! भारत ने दस्तखत से इनकार किया
1970पाकिस्तान का पहला आम चुनाव — खंडित जनादेश
★जुलाई 1971किसिंजर का गुपचुप चीन दौरा (पाकिस्तान होते हुए)
★★1971भारत-सोवियत 20-वर्षीय शांति और मित्रता संधि; 80 लाख शरणार्थी
★★16 दिसंबर 1971ढाका में आत्म-समर्पण — 90,000 सैनिक; बांग्लादेश का उदय
★★3 जुलाई 1972शिमला-समझौता (इंदिरा गाँधी–भुट्टो)
1973अरब-इजरायल युद्ध → तेल-संकट → मुद्रास्फीति
★★मई 1974भारत का पहला परमाणु परीक्षण (“शांतिपूर्ण परीक्षण”)
1976भारत-चीन पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल
★1977जनता पार्टी की सरकार — “सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति”
1979वाजपेयी (विदेश मंत्री) का चीन दौरा
! 1995NPT का अनिश्चितकालीन विस्तार → भारत का विरोध; CTBT से इनकार
★★मई 1998भारत के परमाणु परीक्षण; तुरंत बाद पाकिस्तान के परीक्षण
★मई–जुलाई 1999करगिल संघर्ष (द्रास, माश्कोह, काकसर, बतालिक; 26 जुलाई तक अधिकांश ठिकाने वापस)

✓ इस अध्याय की जाँच-सूची

कसौटीपरिणाम
पढ़े गए पृष्ठ✓ 18 / 18 (150 dpi दृश्य पठन)
अंतर-अध्याय संदर्भ✓ 5 में से 5 सही — “सातवें अध्याय” (कश्मीर), “अगले अध्याय” (शास्त्री/इंदिरा), “छठे अध्याय” (आंदोलन), “छठे और आठवें अध्याय”, “समकालीन विश्व राजनीति”
★★अनाथ संदर्भ (orphan)✓ शून्य — NCERT ने इस अध्याय के सभी क्रॉस-रेफ़रेंस युक्तिकरण के बाद अद्यतन कर दिए
स्पष्ट तथ्यात्मक त्रुटि✓ कोई नहीं मिली
कार्टून / दृश्य-सामग्री✓ 10 दर्ज़ (2 कार्टून-संवाद, 3 कार्टून, 1 मानचित्र, 3 समाचार-कोलाज, 1 फ़िल्म-बॉक्स)
NCERT प्रश्न✓ 10 / 10 दर्ज़