अध्याय 7वैश्वीकरण

पाठ्यपुस्तक से आगे41 मिनटस्रोत जाँचे गए

पाठ्यपुस्तक से आगे — संवर्धन सामग्री (T1 · T2 · T3)

यह दस्तावेज़ पाठ्यपुस्तक का विकल्प नहीं, विस्तार है। T1 — बोर्ड परीक्षा के लिए भी उपयोगी; कक्षा में बताई जा सकती है T2 — प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC प्रारंभिक, राज्य PCS, CUET, SSC, NDA/CDS) के लिए T3 — उन्नत स्तर (UPSC मुख्य परीक्षा, वैकल्पिक विषय, शोध-रुचि)

★हर गैर-स्पष्ट तथ्य वेब-सत्यापित है — तिथियाँ और आँकड़े अगस्त 2026 तक अद्यतन। स्रोत-चिह्न: ◆ = प्राथमिक स्रोत (WTO/IMF/UNCTAD/भारत सरकार) · ◇ = द्वितीयक स्रोत · 【पाठ】 = NCERT पाठ्यपुस्तक। पूरी स्रोत-सूची अंत में।

विषय-सूची

#खंडस्तर
1! हटाए गए अध्याय की भरपाई — ‘वर्चस्व’ की पूरी अवधारणाT1
2वैश्वीकरण के तीन ऐतिहासिक दौर (1870–2026)T1–T2
3वैश्वीकरण की संस्थागत वास्तुकला — ब्रेटन वुड्स से WTO तकT2
4★WTO का संकट — और MC14, याउंडे (2026)T1–T2
5★★‘मंदीकरण’ (Slowbalisation) और भू-आर्थिक विखंडनT1–T2
6वैश्वीकरण के चार सिद्धांत-सम्प्रदायT2–T3
7‘त्रिलेम्मा’ — रॉड्रिक का असंभव त्रिकोणT3
8★भारत 2026 में — वैश्वीकरण का प्राप्तकर्ता या भागीदार?T1–T2
91991 के सुधारों का पूरा ब्योरा — LPGT1–T2
10★‘नीम’ पेटेंट-विवाद का पूरा प्रकरणT1–T2
11सांस्कृतिक सिद्धांत — समरूपता, वैभिन्नीकरण और संकरणT2–T3
12डिजिटल वैश्वीकरण — डेटा, प्लेटफ़ॉर्म और AIT2
13वैश्वीकरण-विरोध का इतिहास — सिएट्ल से आज तकT2
14तीन प्रकरण-अध्ययनT1–T2
15संक्षिप्ताक्षर-कोश (45+)T1–T2
16अभ्यास प्रश्न (25)सभी
17स्रोत-सूची—

1 · हटाए गए अध्याय की भरपाई — ‘वर्चस्व’ की पूरी अवधारणा 【T1】ध्यान

पाठ्यपुस्तक पृ. 107 पर लिखती है 【पाठ】—

“हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।”

!! वह अध्याय — ‘समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व’ — पाठ्यक्रम-युक्तिकरण में पूरी तरह हटा दिया गया है। विद्यार्थी उसे कहीं नहीं पाएँगे। यह खंड उस कमी को भरता है — और यही इस पूरे संवर्धन-दस्तावेज़ का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।

1.1 ‘वर्चस्व’ (Hegemony) के तीन अर्थ★★

प्रकारअर्थकैसे काम करता हैउदाहरण
★1. सैन्य वर्चस्वबल का असंतुलन — किसी एक शक्ति की सैन्य क्षमता इतनी बड़ी कि कोई सीधी चुनौती न दे सकेडर और अपरोध सेशीतयुद्ध के बाद अमरीका का असाधारण सैन्य-व्यय और वैश्विक पहुँच
★2. संरचनात्मक वर्चस्ववैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम बनाने की क्षमता — ‘वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं’ का प्रावधानसंस्थाओं और नियमों सेब्रेटन वुड्स व्यवस्था · डॉलर का आरक्षित मुद्रा होना · IMF, विश्व बैंक, WTO · इंटरनेट का जन्म
★★3. सांस्कृतिक वर्चस्वजब किसी शक्ति के विचार, मूल्य और जीवन-शैली इतने सामान्य लगने लगें कि उनका विकल्प ही सोचा न जा सके★★सहमति से, बल से नहीं — ‘आकर्षण’ सेहॉलीवुड · नीली जीन्स · बर्गर · अंग्रेज़ी का प्रभुत्व · अमरीकी विश्वविद्यालयों का आकर्षण

1.2 सांस्कृतिक वर्चस्व का सैद्धांतिक आधार — ग्राम्शी★★

यह अवधारणा इतालवी विचारक अंतोनियो ग्राम्शी से आती है। उनका मूल तर्क यह था:

★★कोई भी सत्ता केवल बल से नहीं टिकती। वह तब सबसे मज़बूत होती है जब अधीनस्थ लोग स्वयं उसके मूल्यों को अपना ‘सामान्य ज्ञान’ (common sense) मान लें। — यानी सबसे कारगर वर्चस्व वह है जो वर्चस्व दिखाई ही न दे।

1.3 अब पाठ्यपुस्तक की पंक्तियाँ फिर पढ़िए — वे अचानक अर्थपूर्ण हो जाती हैं 【पाठ】★

पाठ्यपुस्तक की पंक्तिअब इसका अर्थ
“बर्गर अथवा नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है”सांस्कृतिक वर्चस्व का लक्षण
“राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है”★संरचनात्मक ताकत → सांस्कृतिक ताकत में बदलती है
“संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है”★★ग्राम्शी का ‘सामान्य ज्ञान’ वाला तर्क, लगभग शब्दश:
“दुनिया का ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’”सांस्कृतिक वर्चस्व का लोकप्रिय नाम

1.4 और वर्चस्व से बचने के तीन रास्ते(हटाए गए अध्याय का निष्कर्ष)★★

रणनीतिअर्थ
‘बैंडवैगन’ (साथ बहना)वर्चस्वशाली शक्ति का विरोध करने के बजाय उसी व्यवस्था के भीतर रहकर अपने लाभ के अवसर खोजना
‘छिपकर बचना’ (hide)वर्चस्वशाली शक्ति की नज़र से यथासंभव दूर रहना
★★राज्येतर प्रतिरोधराज्य नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन, स्वयंसेवी संगठन और नागरिक समाज ही सबसे कारगर प्रतिरोध खड़ा करते हैं

★★और यही तीसरी रणनीति सीधे इस अध्याय के अंतिम खंड से जुड़ती है 【पाठ】 — ‘वैश्वीकरण का प्रतिरोध’, वर्ल्ड सोशल फोरम और ‘नीम’ का पेटेंट-विरोध। ★कक्षा में यह कड़ी ज़रूर जोड़िए — इससे हटाए गए अध्याय की कमी लगभग पूरी हो जाती है।

2 · वैश्वीकरण के तीन ऐतिहासिक दौर 【T1–T2】

पाठ्यपुस्तक कहती है कि “वैश्वीकरण मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है” और उसका “मजबूत ऐतिहासिक आधार” है 【पाठ】। वह ऐतिहासिक ढाँचा यह है —

दौरकालविशेषताभारत की स्थिति
★पहला दौरलगभग 1870–1914भाप-इंजन, तार (टेलीग्राफ), स्वर्णमान; ★विश्व व्यापार GDP के अनुपात में तेज़ी से बढ़ा! औपनिवेशिक — 【पाठ】 “आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक”
! व्यवधान1914–1945दो विश्वयुद्ध · महामंदी (1929) · संरक्षणवाद की लहर — ★वैश्वीकरण उलट गयाऔपनिवेशिक
★दूसरा दौर1945–1980 का दशकब्रेटन वुड्स व्यवस्था · GATT · पुनर्निर्माण — पर ! मुख्यत: पश्चिमी गुट के भीतर★‘संरक्षणवाद’ 【पाठ】
★★तीसरा दौर1980 का दशक–2008सोवियत संघ का विघटन · चीन का खुलना · WTO (1995) · इंटरनेट — ★सबसे तीव्र दौर★★1991 के सुधार 【पाठ】
★मंदीकरण2008–वर्तमानवैश्विक वित्तीय संकट · ब्रेक्ज़िट · व्यापार-तनाव · COVID-19 · भू-राजनीतिक विखंडनभारत सेवाओं का बड़ा निर्यातक बना

2.1 एक निष्कर्ष जो उत्तर में बहुत काम आता है★★

वैश्वीकरण एकरेखीय नहीं है — वह बढ़ता और घटता रहा है। 1914 से 1945 के बीच वह उलट भी चुका है। इसलिए यह मान लेना कि वैश्वीकरण अपरिहार्य और अपरिवर्तनीय है, इतिहास से मेल नहीं खाता। ★यह पाठ्यपुस्तक के इस वाक्य को संतुलित करता है 【पाठ】 — “आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं” — वह समर्थकों का तर्क है, इतिहास का निष्कर्ष नहीं।

3 · वैश्वीकरण की संस्थागत वास्तुकला 【T2】

पाठ्यपुस्तक IMF और WTO का नाम लेती है 【पाठ】 — पूरा ढाँचा यह है:

संस्थास्थापनाकामभारत
★IMF — अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष1944 (ब्रेटन वुड्स), कार्य 1945 सेभुगतान-संतुलन संकट में ऋण; विनिमय-दर स्थिरता★संस्थापक सदस्य; 1991 के संकट में IMF से ऋण लिया — यही सुधारों का तात्कालिक कारण बना
★विश्व बैंक (IBRD)1944पुनर्निर्माण और विकास के लिए दीर्घकालिक ऋणसंस्थापक सदस्य
GATT1948व्यापार-वार्ता का ढाँचा (संगठन नहीं, समझौता)संस्थापक हस्ताक्षरकर्ता
★★WTO — विश्व व्यापार संगठन1 जनवरी 1995 (उरुग्वे दौर से)व्यापार-नियम + विवाद-निपटान★संस्थापक सदस्य; ★166 सदस्य (2026 तक)
UNCTAD1964विकासशील देशों के व्यापार-हितों का मंचसक्रिय भागीदार
OECD1961विकसित देशों का आर्थिक मंच! सदस्य नहीं
G-201999 (शिखर 2008 से)★वैश्विक आर्थिक समन्वय★★भारत ने 2023 में अध्यक्षता की; नई दिल्ली घोषणापत्र

3.1 WTO के तीन प्रमुख समझौते(प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं)★

समझौताविषय
GATTवस्तुओं का व्यापार
★GATSसेवाओं का व्यापार — ★★भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण (पाठ्यपुस्तक का ‘जनार्दन’ इसी का हिस्सा है)
★★TRIPSबौद्धिक संपदा अधिकार — ★‘नीम’ का पेटेंट-विवाद इसी से जुड़ा है (खंड 10 देखिए)

4 · WTO का संकट — और MC14, याउंडे (2026) 【T1–T2】★

पाठ्यपुस्तक 1999 के सिएट्ल विरोध पर रुक जाती है 【पाठ】। उसके बाद WTO के साथ जो हुआ, वह बहुत नाटकीय है। ◆

4.1 अपीलीय निकाय (Appellate Body) का पक्षाघातध्यान

पहलूविवरण
यह क्या था★WTO का ‘सर्वोच्च न्यायालय’ — व्यापार-विवादों पर बाध्यकारी अंतिम निर्णय देने वाला निकाय
! क्या हुआनये सदस्यों की नियुक्ति रुक जाने से यह निष्क्रिय हो गया
!! कब से★छह वर्ष से अधिक समय से यह निष्क्रिय है — WTO के पास व्यापार-विवादों के बाध्यकारी समाधान का प्राथमिक तंत्र नहीं बचा ◆
★अंतरिम व्यवस्थाMPIA (बहु-पक्षीय अंतरिम अपील मध्यस्थता व्यवस्था) — WTO महानिदेशक ने इसे “व्यावहारिक, विश्वास-निर्माणकारी पुल” कहा; ! पर “यह सार्वभौम समाधान नहीं है और उसका दायरा आंशिक है।” ◆
समर्थन★130 सदस्य नये अपीलीय-निकाय सदस्यों के चयन की माँग कर रहे हैं ◆

4.2 MC14 — याउंडे, 2026 ◆★

पहलूविवरण
कबमार्च 2026 — WTO का 14वाँ मंत्री-स्तरीय सम्मेलन
! विवाद-निपटान परसदस्यों ने स्वीकार किया कि “WTO विवाद-निपटान प्रणाली पूर्णत: कार्यशील नहीं है और उसमें सुधार आवश्यक है” — पर ! “कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।”
आगे की योजनासुधार पर काम अप्रैल 2026 से पुन: शुरू; सामान्य परिषद् को प्रगति-रिपोर्ट जुलाई 2026, दिसंबर 2026, जुलाई 2027 और दिसंबर 2027 में; MC15 से पहले मध्यावधि समीक्षा
★भारत की भूमिकाभारत, ओमान और दक्षिण अफ्रीका ने WTO सुधार पर याउंडे मंत्री-स्तरीय वक्तव्य का संयुक्त प्रस्ताव रखा ◆

★★पाठ्यपुस्तक से जोड़िए: 1999 के सिएट्ल विरोध का तर्क था 【पाठ】 — “उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।” सत्ताईस साल बाद, MC14 में भारत उसी माँग को — इस बार मंच के भीतर से, ओमान और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर — उठा रहा है। यानी प्रतिरोध सड़क से बातचीत की मेज़ तक पहुँच गया है। ★यह तुलना उत्तर-लेखन में बहुत प्रभावी होती है।

5 · ‘मंदीकरण’ और भू-आर्थिक विखंडन 【T1–T2】★★

यह पाठ्यपुस्तक के बाद की सबसे बड़ी सैद्धांतिक घटना है।

5.1 तीन शब्द जिन्हें अलग-अलग समझना ज़रूरी है★

पदअर्थक्या यह हो रहा है?
वि-वैश्वीकरण (Deglobalization)वैश्वीकरण का उलट जाना — व्यापार और पूँजी-प्रवाह का घटना! आँकड़े इसका समर्थन नहीं करते
★★मंदीकरण (Slowbalisation)वैश्वीकरण जारी है, पर उसकी गति धीमी पड़ गई है✓ यही सबसे सटीक वर्णन माना जाता है
★★भू-आर्थिक विखंडन (Geoeconomic fragmentation)व्यापार का भूगोल बदल रहा है — ‘गुटों’ के भीतर बढ़ रहा है, गुटों के बीच घट रहा है✓ इसके स्पष्ट संकेत हैं

5.2 आँकड़े क्या कहते हैं 【प्रा/द्वि】★★

  • ! “वि-वैश्वीकरण की व्यापक भविष्यवाणियों के विपरीत, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विस्तार जारी रहा है — 2025 में अमरीकी आयात और चीनी निर्यात दोनों सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर पहुँचे।”
  • ★UNCTAD का अनुमान: वैश्विक वस्तु-व्यापार की वृद्धि 2025 के 4.7% से घटकर 2026 में 1.5%–2.5% के बीच रह सकती है।
  • ★★UNCTAD: “भू-राजनीतिक अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अस्थिरता का प्रमुख स्रोत बन गई है” — और 2026 की शुरुआत तक इसने ‘व्यापार-नीति की अनिश्चितता’ को पीछे छोड़ दिया।
  • ★“यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से व्यापार-प्रवाह भू-राजनीतिक दूरी के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं — यह भू-राजनीतिक रेखाओं पर व्यापार-विखंडन का पहला संकेत है।”
  • ! IMF की चेतावनी: “निरंतर भू-आर्थिक विखंडन वैश्विक उत्पादन को घटा सकता है और इसका असमान रूप से अधिक नुकसान उन छोटी तथा मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को होगा जो खुले बाज़ारों पर निर्भर हैं।”

5.3 तीन नयी रणनीतियाँ — इनके नाम याद रखिए★

रणनीतिअर्थ
★रीशोरिंग (Reshoring)उत्पादन को वापस अपने देश में लाना
★★फ्रेंड-शोरिंग (Friend-shoring)उत्पादन और आपूर्ति-शृंखला को मित्र-देशों में ले जाना — यानी कीमत नहीं, भरोसा मानदंड बनना
★नियर-शोरिंग (Near-shoring)उत्पादन को भौगोलिक रूप से पास के देशों में ले जाना
डी-रिस्किंग (De-risking)किसी एक देश पर निर्भरता घटाना (‘डी-कपलिंग’ यानी पूर्ण अलगाव से भिन्न)

★★कक्षा और उत्तर के लिए यह वाक्य बहुत कारगर है: “पाठ्यपुस्तक लिखी गई तब सवाल था — ‘क्या वैश्वीकरण अपरिहार्य है?’ 2026 का सवाल अलग है — ‘वैश्वीकरण किसके साथ?’ व्यापार रुका नहीं है; उसका भूगोल बदल रहा है। अब कीमत ही नहीं, भरोसा भी आपूर्ति-शृंखला का मानदंड बन गया है।”

6 · वैश्वीकरण के चार सिद्धांत-सम्प्रदाय 【T2–T3】

पाठ्यपुस्तक ‘समर्थक’, ‘आलोचक’ और ‘मध्यमार्गी’ — तीन नाम देती है 【पाठ】। शोध-जगत में चार सुस्पष्ट पद हैं — ये UPSC मुख्य परीक्षा में बहुत काम आते हैं।

सम्प्रदायमूल दावापाठ्यपुस्तक में कहाँ
★अति-वैश्वीकरणवादी (Hyperglobalists)राष्ट्र-राज्य का युग समाप्त हो रहा है; वैश्विक बाज़ार सर्वोपरि हैपाठ का पहला पहलू — “राज्य की क्षमता में कमी”
★संशयवादी (Sceptics)वैश्वीकरण अतिशयोक्ति है; राज्य आज भी निर्णायक हैं; और यह वास्तव में ‘त्रि-ध्रुवीय’ (उत्तरी अमरीका, यूरोप, पूर्वी एशिया) है, वैश्विक नहींपाठ का दूसरा पहलू — “राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली”
★★रूपांतरणवादी (Transformationalists)राज्य न कमज़ोर हुआ, न वैसा ही रहा — उसकी भूमिका बदल गई★पाठ का तीसरा पहलू — “राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं”
★आलोचनात्मक/उत्तर-औपनिवेशिकवैश्वीकरण असमान शक्ति-संबंधों का नया रूप है★★“कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ कहा है”

★★और यही इस अध्याय की सबसे बड़ी खूबी है — पाठ्यपुस्तक बिना नाम लिए चारों दृष्टिकोण दे देती है, और किसी एक को नहीं चुनती। उत्तर में भी यही संतुलन दिखाइए।

7 · ‘त्रिलेम्मा’ — रॉड्रिक का असंभव त्रिकोण 【T3】

अर्थशास्त्री डैनी रॉड्रिक का प्रसिद्ध तर्क — जो पूरे अध्याय के राजनीतिक खंड को एक सूत्र में बाँध देता है:

★★तीन चीज़ें एक साथ नहीं मिल सकतीं — किन्हीं दो को चुनना पड़ेगा: (1) गहन आर्थिक वैश्वीकरण · (2) राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता · (3) लोकतांत्रिक राजनीति

तीन संभावित संयोजन:

चुनावपरिणाम
वैश्वीकरण + राष्ट्र-राज्य (लोकतंत्र छोड़कर)! ‘स्वर्णिम बंधन’ — आर्थिक नीति बाज़ार तय करता है, मतदाता नहीं
वैश्वीकरण + लोकतंत्र (राष्ट्र-राज्य छोड़कर)वैश्विक संघवाद — नीति वैश्विक संस्थाओं के पास
राष्ट्र-राज्य + लोकतंत्र (गहन वैश्वीकरण छोड़कर)★‘ब्रेटन वुड्स समझौता’ — सीमित वैश्वीकरण, पर घरेलू नीति पर नियंत्रण

★★अब पाठ्यपुस्तक की यह पंक्ति देखिए 【पाठ】 — “लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।” यह ठीक पहले संयोजन का वर्णन है — जहाँ लोकतांत्रिक विकल्प सिकुड़ जाता है। ★और ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ की माँग इसी तनाव को कम करने की कोशिश है। यदि उत्तर में यह ढाँचा प्रयोग किया जाए तो वह विश्लेषण बन जाता है, केवल विवरण नहीं।

8 · भारत 2026 में — प्राप्तकर्ता या भागीदार? 【T1–T2】★

पाठ्यपुस्तक का प्रश्न 11 पूछता है 【पाठ】 — “भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?” 2026 के आँकड़े इसका बहुत मज़बूत उत्तर देते हैं। 【प्रा/द्वि】

8.1 भारत — सेवाओं का वैश्विक आपूर्तिकर्ता★★

मानआँकड़ा
★★सेवा-निर्यात (2024-25)लगभग 387 अरब डॉलर
★2025-26 का अनुमानलगभग 465–475 अरब डॉलर
अप्रैल–जनवरी (चालू वित्त वर्ष)348 अरब डॉलर पार 【प्रा — भारत सरकार】
★★वैश्विक रैंकविश्व का 7वाँ सबसे बड़ा सेवा-निर्यातक
★वैश्विक सेवा-व्यापार में हिस्सा2005 के 2% से बढ़कर 2024 में 4.3% — यानी दोगुने से ज्यादा
GDP में सेवा-क्षेत्र का हिस्सा53.6% (वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही); GVA में 56.4% — ऐतिहासिक उच्चतम

★★यही पाठ्यपुस्तक के ‘जनार्दन’ का 2026 वाला रूप है 【पाठ】 — “जनार्दन सेवाओं के वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है।” — आज वह हिस्सेदारी 465 अरब डॉलर की है, और भारत उसमें विश्व में सातवें स्थान पर है।

8.2 प्रेषण (Remittances) — यहाँ भारत विश्व में पहला है★

  • ★★भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रेषण-प्राप्तकर्ता देश है — वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 135.4 अरब डॉलर। 【प्रा/द्वि】
  • ★यह पाठ्यपुस्तक के ‘लोगों के प्रवाह’ का दूसरा पहलू है — लोग गए, और उनके साथ पूँजी लौटी।

8.3 प्रत्यक्ष विदेशी निवेश★

  • अप्रैल–नवंबर 2025 में सकल FDI प्रवाह लगभग 64.7 अरब डॉलर — पिछले वर्ष की समान अवधि के 55.8 अरब डॉलर से अधिक। ◇
  • सेवा-क्षेत्र में FDI का सबसे बड़ा हिस्सा आता है।

8.4 और यह कड़ी उत्तर में ज़रूर जोड़िए★★

पाठ्यपुस्तक का उदाहरण 【पाठ】2026 का पैमाना
जनार्दन का कॉल-सेंटर465 अरब डॉलर का सेवा-निर्यात; विश्व में 7वाँ स्थान
“एक भारतीय कंपनी ने यूरोपीय कंपनी खरीद ली”भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब वैश्विक अधिग्रहण करती हैं
“जीन्स के ऊपर कुर्ता… निर्यात किया जा रहा है”भारतीय संस्कृति, भोजन और मनोरंजन का वैश्विक विस्तार
‘नीम’ के पेटेंट का विरोध★भारत ने TRIPS-व्यवस्था को ही चुनौती दी और जीता (खंड 10)
WSF की मुंबई बैठक (2004)★भारत वैश्वीकरण-विरोध का भी मंच रहा है
सिएट्ल 1999 का तर्क★★MC14 (2026) में भारत ने ओमान और दक्षिण अफ्रीका के साथ WTO-सुधार का प्रस्ताव रखा

★★निष्कर्ष जो उत्तर का अंत होना चाहिए: भारत वैश्वीकरण का केवल ‘प्राप्तकर्ता’ नहीं रहा — वह उसका आपूर्तिकर्ता, निवेशक, सांस्कृतिक निर्यातक और नियम-निर्माण का दावेदार बन चुका है। पाठ्यपुस्तक ने जो कहा था कि “ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो” — भारत उसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

9 · 1991 के सुधारों का पूरा ब्योरा — LPG 【T1–T2】

पाठ्यपुस्तक कहती है 【पाठ】 — “1991 में, वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई।” — वह संकट और वे सुधार क्या थे:

9.1 1991 का संकट — तात्कालिक कारणध्यान

  • विदेशी मुद्रा भंडार कुछ ही सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था।
  • खाड़ी युद्ध से तेल की कीमतें बढ़ीं और खाड़ी से प्रेषण घटा।
  • भुगतान-संतुलन का गंभीर संकट → IMF से ऋण → और उसके साथ नीतिगत शर्तें।

9.2 ‘LPG’ — तीन स्तंभ★★

स्तंभअर्थप्रमुख कदम
★उदारीकरण (Liberalisation)सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस घटाना★★‘लाइसेंस राज’ का अंत — अधिकांश उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंस समाप्त
★निजीकरण (Privatisation)सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घटानासार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश; आरक्षित क्षेत्रों की संख्या घटी
★★वैश्वीकरण (Globalisation)विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ावआयात-शुल्क में भारी कटौती; FDI के लिए दरवाज़े खुले; रुपये का अवमूल्यन और बाद में विनिमय-दर का बाज़ार-निर्धारण

9.3 1991 के बाद के प्रमुख पड़ाव★

वर्षघटना
1991आर्थिक सुधारों की शुरुआत 【पाठ】
★1995भारत WTO का संस्थापक सदस्य बना
2005विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) अधिनियम
2016दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC)
★2017वस्तु एवं सेवा कर (GST) — “एक राष्ट्र, एक कर”
2020 का दशक‘आत्मनिर्भर भारत’ और उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना — ! कुछ विश्लेषक इसे ‘चुनिंदा संरक्षणवाद की वापसी’ मानते हैं

★★कक्षा-चर्चा का शानदार सवाल: “पाठ्यपुस्तक 1947 के बाद के ‘संरक्षणवाद’ की आलोचना करती है और 1991 के खुलेपन का उल्लेख करती है। तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और PLI योजना को किस श्रेणी में रखेंगे — संरक्षणवाद की वापसी, या वैश्वीकरण में सोच-समझकर की गई भागीदारी?” ★यह प्रश्न विद्यार्थियों को अध्याय के तर्क को वर्तमान पर लागू करना सिखाता है — और उत्तर में दोनों पक्ष रखना।

10 · ‘नीम’ पेटेंट-विवाद का पूरा प्रकरण 【T1–T2】★

पाठ्यपुस्तक एक वाक्य में कहती है 【पाठ】 — “कुछ वनस्पतियाँ मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फर्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध हुआ।” — पूरी कहानी यह है, और यह भारत की सबसे बड़ी वैश्विक कानूनी जीत है।

चरणविवरण
पृष्ठभूमिनीम भारत में सदियों से कीटनाशक, औषधि और प्रसाधन के रूप में प्रयोग होता आया है — यह पारंपरिक ज्ञान है
! विवादनीम के कवकनाशी (fungicidal) गुणों पर यूरोपीय पेटेंट कार्यालय में पेटेंट दिया गया
★चुनौतीभारत सरकार तथा नागरिक-समाज संगठनों ने संयुक्त रूप से पेटेंट को चुनौती दी
★★मुख्य तर्क‘पूर्व-ज्ञान’ (prior art) — यानी यह ज्ञान भारत में पहले से सार्वजनिक रूप से मौजूद था, इसलिए यह ‘नयी खोज’ नहीं है और पेटेंट-योग्य नहीं
✓ परिणाम★★पेटेंट रद्द कर दिया गया
★दीर्घकालिक परिणामभारत ने ★★‘पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय’ (TKDL) बनाया — आयुर्वेद, योग, यूनानी और सिद्ध के पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल दस्तावेज़ीकरण, ताकि विश्व के पेटेंट कार्यालय उसे ‘पूर्व-ज्ञान’ के रूप में देख सकें
इसी शृंखला मेंहल्दी (अमरीकी पेटेंट रद्द) और बासमती के विवाद भी

10.1 ‘जैव-चोरी’ (Biopiracy) — यह पद याद रखिए★★

किसी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान या जैविक संसाधन का, उसकी सहमति और लाभ-बँटवारे के बिना, व्यावसायिक उपयोग और पेटेंट कराना।

★इसी के उत्तर में बना — CBD का नागोया न्यायाचार (2010) (पहुँच और लाभ-साझाकरण) और भारत का जैव-विविधता अधिनियम, 2002।

★★और यही इस अध्याय का सबसे शक्तिशाली उदाहरण है: यह दिखाता है कि वैश्वीकरण-विरोध केवल ‘नारा’ नहीं होता — वह कानूनी और संस्थागत रूप भी लेता है, और जीत भी सकता है। ★इसे प्रश्न 11 (“भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?”) के उत्तर में ज़रूर लिखिए।

11 · सांस्कृतिक सिद्धांत — तीन प्रक्रियाएँ 【T2–T3】

पाठ्यपुस्तक दो प्रक्रियाएँ देती है 【पाठ】। शोध में तीन मानी जाती हैं —

प्रक्रियाअर्थपाठ्यपुस्तक का उदाहरण
★समरूपता (Homogenisation)संस्कृतियाँ एक-दूसरे जैसी होती जाती हैं — प्राय: प्रभुत्वशाली संस्कृति की ओर★‘मैक्डोनॉल्डीकरण’
★वैभिन्नीकरण (Heterogenisation)हर संस्कृति और अधिक अलग तथा विशिष्ट होती जाती है — बाहरी दबाव के जवाब में पहचान और मज़बूत होती है★“हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है”
★★संकरण (Hybridisation)दो संस्कृतियाँ मिलकर कुछ तीसरा और नया बना देती हैं★★“नीली जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता” — यह न पूरी तरह भारतीय है, न पश्चिमी; यह कुछ नया है

11.1 और ‘ग्लोकलाइज़ेशन’(Glocalization)★★

वैश्विक उत्पाद या विचार का स्थानीय स्वाद के अनुसार ढल जाना।

उदाहरण: मैकडॉनल्ड्स का भारत में शाकाहारी और ‘मैकआलू टिक्की’ मेन्यू — ★और पाठ्यपुस्तक की तस्वीर संख्या 19 इसी का उदाहरण है: “ग्लोबल बाजार का लोकल चेहरा — पश्चिम एशिया में बड़ी कंपनियों का देशीकरण” 【पाठ】 (पृ. 109 का ‘मैकअरेबिया मील’ का चित्र)।

★★यानी पाठ्यपुस्तक ने चित्र के रूप में ‘ग्लोकलाइज़ेशन’ दिखा दिया है, बस उसका नाम नहीं लिया। कक्षा में यह जोड़ना बहुत प्रभावी होता है।

11.2 ‘नरम शक्ति’(Soft Power) — जोसेफ नाय★

“किसी को वह करने के लिए राज़ी कर लेना जो आप चाहते हैं — बल या धन से नहीं, बल्कि आकर्षण से।”

स्रोत: संस्कृति · राजनीतिक मूल्य · विदेश-नीति की वैधता ★भारत की नरम शक्ति के स्रोत: योग (21 जून = अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, 2014 में UN द्वारा घोषित), सिनेमा, भोजन, आयुर्वेद, प्रवासी भारतीय समुदाय, लोकतंत्र।

★★और यह ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ का ही उलटा पहलू है — जो अमरीका ने हॉलीवुड और जीन्स से किया, भारत योग और भोजन से कर रहा है। यही ‘जीन्स पर कुर्ता’ की वापसी का सैद्धांतिक नाम है।

12 · डिजिटल वैश्वीकरण — डेटा, प्लेटफ़ॉर्म और AI 【T2】

पाठ्यपुस्तक चार प्रवाह गिनाती है 【पाठ】। 2026 में एक पाँचवाँ प्रवाह जुड़ चुका है — डेटा।

पहलूविवरण
★★डेटा — पाँचवाँ प्रवाहसीमापार डेटा-प्रवाह अब व्यापार, सेवाओं और नवाचार की रीढ़ है
! डेटा स्थानीयकरण★कुछ देश चाहते हैं कि नागरिकों का डेटा देश के भीतर ही संग्रहित हो — यह डिजिटल संप्रभुता का प्रश्न है
★भारत का कानूनडिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023
★प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्थाकुछ वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों का बाज़ार-मूल्य अनेक देशों की GDP से बड़ा है — ! यह पाठ्यपुस्तक के ‘बहुराष्ट्रीय निगम’ वाले तर्क का चरम रूप है
★★भारत का प्रतिमॉडल — DPIडिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना — आधार · UPI · डिजिलॉकर। ★UPI कई देशों में स्वीकार किया जा रहा है — यह भारत का ‘डिजिटल निर्यात’ है
! AI और श्रम★यह सीधे ‘जनार्दन’ से जुड़ता है — कॉल-सेंटर का काम स्वचालन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में है
★डिजिटल विभाजनपाठ्यपुस्तक का “प्रभाव विषम रहा है” 【पाठ】 अब इंटरनेट-पहुँच की असमानता के रूप में भी दिखता है

★★कक्षा-चर्चा का सबसे अच्छा सवाल: “पाठ्यपुस्तक का जनार्दन कॉल-सेंटर में काम करता है और ‘जॉन’ बन जाता है। अगर वह काम कल कोई AI कर दे, तो जनार्दन का क्या होगा? और क्या तब भी हम कहेंगे कि ‘प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर नहीं होती’?”

13 · वैश्वीकरण-विरोध का इतिहास 【T2】

पड़ाववर्षक्या हुआ
★सिएट्ल1999 【पाठ】WTO की मंत्री-स्तरीय बैठक; बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन — इसे ‘सिएट्ल की लड़ाई’ भी कहा जाता है
वाशिंगटन, प्राग, जेनोआ2000–2001IMF/विश्व बैंक और G-8 बैठकों के विरुद्ध प्रदर्शन
★★वर्ल्ड सोशल फोरम — पहली बैठक2001 【पाठ】पोर्तो अलेग्रे (ब्राजील) — नारा: “एक और दुनिया मुमकिन है”; ★यह जान-बूझकर ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ (दावोस) के प्रति-मंच के रूप में बना
★WSF मुंबई2004 【पाठ】चौथी बैठक — और उसी समय ! ‘मुंबई प्रतिरोध 2004’ ने WSF का ही विरोध किया 【पाठ】
दोहा दौर2001 से! WTO का ‘विकास दौर’ — दो दशक से अधिक अटका हुआ
! वैश्विक वित्तीय संकट2008वैश्वीकरण की आलोचना मुख्यधारा में आ गई
‘ऑक्युपाई’ आंदोलन2011नारा — “हम 99 प्रतिशत हैं”
! ब्रेक्ज़िट और व्यापार-तनाव2016 से★★अब वैश्वीकरण-विरोध विकसित देशों से भी उठने लगा — यह बड़ा मोड़ था
COVID-192020आपूर्ति-शृंखला की भेद्यता उजागर; ‘डी-रिस्किंग’ की शुरुआत
WSF नेपालफरवरी 2024 【पाठ】हाल की बैठक
★MC14, याउंडे2026 ◆भारत, ओमान और दक्षिण अफ्रीका का WTO-सुधार प्रस्ताव

13.1 एक बहुत महत्वपूर्ण अवलोकन★★

पाठ्यपुस्तक लिखी गई तब वैश्वीकरण-विरोध मुख्यत: दक्षिण से आता था — विकासशील देशों और उनके सामाजिक आंदोलनों से। ★★2016 के बाद वह उत्तर से भी आने लगा — विकसित देशों की राजनीति से, जहाँ ‘नौकरियाँ बाहर चली गईं’ का तर्क प्रबल हुआ।

और पाठ्यपुस्तक ने यह पहले ही कह दिया था 【पाठ】 — “ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।” और उसका कार्टून (पृ. 104) — “चीन और भारत के लोग तुम्हारी नौकरी खा जाएँगें” — ठीक इसी बदलाव की भविष्यवाणी थी।

14 · तीन प्रकरण-अध्ययन 【T1–T2】

प्रकरण 1 — ‘नीम’ : जब भारत ने वैश्विक नियम को चुनौती दी★★

पहलूविवरण
मुद्दानीम के कवकनाशी गुणों पर यूरोपीय पेटेंट
चुनौतीभारत सरकार + नागरिक-समाज
★तर्क‘पूर्व-ज्ञान’ (prior art) — यह ज्ञान सदियों से भारत में सार्वजनिक था
✓ परिणामपेटेंट रद्द
★★स्थायी परिणामपारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL) की स्थापना
पाठ से जोड़ 【पाठ】“‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फर्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध हुआ।”
★सबकवैश्वीकरण-विरोध केवल विरोध नहीं — वह नियम भी बदल सकता है।

प्रकरण 2 — कॉल-सेंटर : वैश्वीकरण का दोहरा चेहरा★

पहलूविवरण
✓ एक तरफ 【पाठ】जनार्दन को रोज़गार; सारिका को अवसर जो “परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं”; भारत सेवा-निर्यात में विश्व का 7वाँ बड़ा देश
! दूसरी तरफ 【पाठ】“दफ्तर में घुसने के साथ ही वह जॉन बन जाता है” — पहचान बदलनी पड़ती है; रात की पाली; और वह अपमान — “आह री किस्मत! फिर एक हिन्दुस्तानी!”
! और अब तीसरा पहलू★AI और स्वचालन — यही क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होने वालों में है
★★सबकवैश्वीकरण ने अवसर भी दिया और कीमत भी माँगी — और वह कीमत हमेशा आर्थिक नहीं होती।

प्रकरण 3 — WTO का अपीलीय निकाय : जब नियम-व्यवस्था ही रुक गई★★

पहलूविवरण
क्या थाWTO का बाध्यकारी विवाद-निपटान का शीर्ष निकाय — ★इसे ‘विश्व व्यापार का सर्वोच्च न्यायालय’ कहा जाता था
! क्या हुआनियुक्तियाँ रुक जाने से छह वर्ष से अधिक समय से निष्क्रिय ◆
अंतरिम उपायMPIA — “व्यावहारिक, विश्वास-निर्माणकारी पुल”, पर ! “सार्वभौम समाधान नहीं”
MC14 (2026)सदस्यों ने माना कि प्रणाली “पूर्णत: कार्यशील नहीं”, पर ! कोई ठोस प्रगति नहीं
★★सबकवैश्वीकरण केवल आर्थिक प्रवाह नहीं — वह एक नियम-व्यवस्था भी है। और जब वह व्यवस्था रुक जाती है, तो ‘खुला व्यापार’ भी शक्ति-संतुलन का खेल बन जाता है।
पाठ से जोड़ 【पाठ】“कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं।”

15 · संक्षिप्ताक्षर-कोश 【T1–T2】

वैश्विक आर्थिक संस्थाएँ

संक्षेपपूरा नामहिंदी / टिप्पणी
★IMFInternational Monetary Fundअंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, 1944
★WB / IBRDWorld Bankविश्व बैंक, 1944
GATTGeneral Agreement on Tariffs and Trade1948
★★WTOWorld Trade Organizationविश्व व्यापार संगठन, 1 जनवरी 1995; 166 सदस्य
★GATSGeneral Agreement on Trade in Servicesसेवाओं का व्यापार — भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण
★★TRIPSTrade-Related Aspects of Intellectual Property Rightsबौद्धिक संपदा — ‘नीम’ विवाद इसी से जुड़ा
TRIMSTrade-Related Investment Measuresनिवेश-संबंधी उपाय
★MC1414th Ministerial Conferenceयाउंडे, 2026
★ABAppellate Bodyअपीलीय निकाय — 6+ वर्ष से निष्क्रिय
★MPIAMulti-Party Interim Appeal Arbitration Arrangementअंतरिम अपील-व्यवस्था
UNCTADUN Conference on Trade and Development1964
OECDOrganisation for Economic Co-operation and Development! भारत सदस्य नहीं
WEFWorld Economic Forumदावोस
★★WSFWorld Social Forumवर्ल्ड सोशल फोरम — WEF का प्रति-मंच; 2001 पोर्तो अलेग्रे
MNC / TNCMultinational / Transnational Corporationबहुराष्ट्रीय निगम
FDI / FPIForeign Direct / Portfolio Investmentप्रत्यक्ष / संविभाग विदेशी निवेश
G-20 / G-8Group of Twenty / Eight★भारत ने 2023 में G-20 की अध्यक्षता की

अवधारणाएँ

संक्षेप / पदअर्थ
★★LPGउदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण — 1991 के सुधारों का सूत्र
★Slowbalisationमंदीकरण — वैश्वीकरण जारी, पर धीमा
★Deglobalizationवि-वैश्वीकरण — वैश्वीकरण का उलट जाना
★★Geoeconomic fragmentationभू-आर्थिक विखंडन
★Friend-shoring / Near-shoring / Reshoringमित्र-देशों में / पास के देशों में / अपने देश में उत्पादन ले जाना
De-riskingकिसी एक देश पर निर्भरता घटाना (पूर्ण अलगाव नहीं)
★★Hegemonyवर्चस्व — सैन्य, संरचनात्मक और सांस्कृतिक
★Soft powerनरम शक्ति (जोसेफ नाय) — बल से नहीं, आकर्षण से
★★McDonaldisationमैक्डोनॉल्डीकरण 【पाठ】
★Glocalizationग्लोकलाइज़ेशन — वैश्विक उत्पाद का स्थानीय रूप
★Hybridisationसंकरण — “जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता”
★Biopiracyजैव-चोरी — ‘नीम’ विवाद
★Prior artपूर्व-ज्ञान — पेटेंट रद्द कराने का आधार
Trilemmaरॉड्रिक का असंभव त्रिकोण
★Social safety netसामाजिक सुरक्षा कवच 【पाठ】
★Re-colonisationपुन:उपनिवेशीकरण 【पाठ】

भारत-विशिष्ट

संक्षेपपूरा नाम
★TKDLTraditional Knowledge Digital Library — पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय
SEZSpecial Economic Zone — विशेष आर्थिक क्षेत्र, 2005
GSTGoods and Services Tax — 2017
IBCInsolvency and Bankruptcy Code — 2016
PLIProduction Linked Incentive — उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन
★DPIDigital Public Infrastructure — आधार, UPI, डिजिलॉकर
DPDP ActDigital Personal Data Protection Act, 2023
★ISFIndian Social Forum 【पाठ】

16 · अभ्यास प्रश्न 【सभी स्तर】

1 अंक

  1. ‘वर्चस्व’ के तीन अर्थ कौन-से हैं? — सैन्य, संरचनात्मक और सांस्कृतिक
  2. सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा किस विचारक से जुड़ी है? — अंतोनियो ग्राम्शी
  3. वर्चस्व से बचने की तीन रणनीतियाँ? — ‘बैंडवैगन’ · ‘छिपकर बचना’ · राज्येतर प्रतिरोध
  4. WTO की स्थापना कब हुई और उसके कितने सदस्य हैं? — 1 जनवरी 1995; 166 सदस्य
  5. WTO के तीन प्रमुख समझौते? — GATT, GATS और TRIPS
  6. ★WTO का अपीलीय निकाय कितने समय से निष्क्रिय है? — छह वर्ष से अधिक
  7. उसकी जगह कौन-सी अंतरिम व्यवस्था काम कर रही है? — MPIA
  8. MC14 कब और कहाँ हुआ? — मार्च 2026, याउंडे
  9. MC14 में भारत ने किन दो देशों के साथ WTO-सुधार का प्रस्ताव रखा? — ओमान और दक्षिण अफ्रीका
  10. ★‘Slowbalisation’ का अर्थ? — वैश्वीकरण जारी है, पर उसकी गति धीमी पड़ गई है
  11. UNCTAD के अनुसार 2026 में वैश्विक वस्तु-व्यापार की वृद्धि? — 1.5%–2.5% (2025 में 4.7%)
  12. ‘फ्रेंड-शोरिंग’ क्या है? — उत्पादन और आपूर्ति-शृंखला को मित्र-देशों में ले जाना
  13. वैश्वीकरण के चार सिद्धांत-सम्प्रदाय? — अति-वैश्वीकरणवादी, संशयवादी, रूपांतरणवादी, आलोचनात्मक
  14. रॉड्रिक के त्रिलेम्मा के तीन तत्व? — गहन वैश्वीकरण, राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता, लोकतांत्रिक राजनीति
  15. ★भारत सेवा-निर्यात में विश्व में कौन-से स्थान पर है? — सातवें
  16. वैश्विक सेवा-व्यापार में भारत का हिस्सा? — 2005 के 2% से बढ़कर 2024 में 4.3%
  17. ★प्रेषण-प्राप्ति में भारत का स्थान? — विश्व में पहला (FY25 में लगभग 135.4 अरब डॉलर)
  18. ‘LPG’ का पूरा अर्थ? — उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण
  19. 1991 के संकट का तात्कालिक कारण? — भुगतान-संतुलन का गंभीर संकट; विदेशी मुद्रा भंडार कुछ सप्ताह का रह गया
  20. ★‘नीम’ का पेटेंट किस आधार पर रद्द हुआ? — ‘पूर्व-ज्ञान’ (prior art)
  21. उसके बाद भारत ने क्या बनाया? — पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL)
  22. ‘जैव-चोरी’ किसे कहते हैं? — पारंपरिक ज्ञान या जैविक संसाधन का सहमति और लाभ-बँटवारे के बिना पेटेंट कराना
  23. ★‘संकरण’ (hybridisation) का पाठ्यपुस्तक-उदाहरण? — “नीली जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता”
  24. ‘ग्लोकलाइज़ेशन’ का उदाहरण? — मैकडॉनल्ड्स का स्थानीय मेन्यू (पाठ का ‘मैकअरेबिया’ का चित्र)
  25. ‘नरम शक्ति’ की अवधारणा किसकी है? — जोसेफ नाय
  26. WSF किस मंच का प्रति-मंच है? — वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (दावोस)

2–4 अंक

  1. ‘वर्चस्व’ के तीनों अर्थ समझाइए और बताइए कि ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ उनमें से किससे जुड़ा है।
  2. वैश्वीकरण के तीन ऐतिहासिक दौर बताइए। क्या वैश्वीकरण कभी उलटा भी है?
  3. WTO के अपीलीय निकाय के पक्षाघात का क्या अर्थ है? MC14 (2026) में क्या हुआ?
  4. ‘वि-वैश्वीकरण’, ‘मंदीकरण’ और ‘भू-आर्थिक विखंडन’ में अंतर स्पष्ट कीजिए। आँकड़े किसका समर्थन करते हैं?
  5. रॉड्रिक के त्रिलेम्मा को समझाइए और उसका संबंध पाठ्यपुस्तक के ‘बाज़ार अब प्रमुख निर्धारक है’ वाले कथन से जोड़िए।
  6. 1991 के ‘LPG’ सुधारों के तीन स्तंभ समझाइए।
  7. ‘नीम’ पेटेंट-विवाद का पूरा प्रकरण बताइए। यह प्रश्न 11 का उत्तर कैसे मज़बूत करता है?
  8. समरूपता, वैभिन्नीकरण और संकरण — तीनों में अंतर स्पष्ट कीजिए और हर एक का पाठ्यपुस्तक-उदाहरण दीजिए।
  9. डिजिटल वैश्वीकरण को ‘पाँचवाँ प्रवाह’ क्यों कहा जा रहा है?

6 अंक

  1. “वैश्वीकरण अपरिहार्य है” — इस दावे का ऐतिहासिक और समकालीन आँकड़ों के आलोक में परीक्षण कीजिए।
  2. “भारत वैश्वीकरण का केवल प्राप्तकर्ता नहीं, भागीदार भी है।” — 2026 के आँकड़ों और ‘नीम’ प्रकरण के आधार पर सिद्ध कीजिए।
  3. वैश्वीकरण-विरोध का स्वरूप 1999 के सिएट्ल से 2026 के MC14 तक कैसे बदला है? क्या विरोध अब उत्तर से भी आ रहा है?

17 · स्रोत-सूची

प्राथमिक स्रोत ◆

  1. NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), अध्याय 7, पृ. 99–112 【पाठ】
  2. WTO — Dispute Settlement Reform — wto.org
  3. WTO — WTO Reform: Post-MC14 Briefing Note (14th Ministerial Conference) — wto.org
  4. WTO News — “DG cites MPIA as ‘practical, confidence-building bridge’ pending dispute reform deal” (28 मार्च 2026) — wto.org
  5. WTO News — “General Council chair outlines next steps to build on momentum from MC14 negotiations” (6 मई 2026) — wto.org
  6. tralac — MC14 Draft Yaoundé Ministerial Statement on WTO Reform: Communication from India, Oman and South Africa (29 मार्च 2026) — tralac.org
  7. WTO Research — “Is the Global Economy Fragmenting?” — wto.org
  8. IMF — “Demystifying Trade Patterns in a Fragmenting World” (जून 2025) — imf.org
  9. IMF — “The Price of De-Risking: Reshoring, Friend-Shoring, and Quality Downgrading” — imf.org
  10. News on AIR (भारत सरकार) — “India’s services exports cross $348 billion during April–January of current FY” (14 मार्च 2026) — newsonair.gov.in

द्वितीयक स्रोत ◇ 11. WTO Blog — “After MC14: Realistic WTO reform essential for institutional renewal” (17 जून 2026) — wto.org 12. Atlas Institute — “Geopolitical Fragmentation and the Rewiring of Global Trade” — atlasinstitute.org 13. Policy Center for the New South — “Slowbalization, Newbalization, Not Deglobalization” — policycenter.ma 14. IBEF — “India remains the world’s largest recipient of remittances, with inflows reaching US$135.4 billion in FY25” — ibef.org 15. IBEF — India’s Booming Business Services Sector — ibef.org 16. African Climate Wire — “WTO Reform Agenda takes a Dive at MC14” (अप्रैल 2026) — africanclimatewire.org

! शिक्षक के लिए अंतिम नोट: बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का आँकड़ा और उसकी भाषा ही लिखवाइए। यह संवर्धन सामग्री कक्षा-चर्चा, परियोजना-कार्य और प्रतियोगी परीक्षा के लिए है। ★★पर एक अपवाद है — खंड 1 (‘वर्चस्व’ की अवधारणा) कक्षा में अवश्य पढ़ाइए, क्योंकि पाठ्यपुस्तक स्वयं उसे ‘पढ़ चुके हैं’ मानकर आगे बढ़ती है, जबकि वह अध्याय हटा दिया गया है।