अध्याय 2एक दल के प्रभुत्व का दौर

पाठ्यपुस्तक से आगे42 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 26–43.

पाठ्यपुस्तक से आगे — संवर्धन सामग्री (T1 · T2 · T3)

यह दस्तावेज़ पाठ्यपुस्तक का विकल्प नहीं, विस्तार है। T1 — बोर्ड परीक्षा के लिए भी उपयोगी; कक्षा में बताई जा सकती है T2 — प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC प्रारंभिक, राज्य PCS, CUET, SSC, NDA/CDS) के लिए T3 — उन्नत स्तर (UPSC मुख्य परीक्षा, वैकल्पिक विषय)

★हर गैर-स्पष्ट तथ्य वेब-सत्यापित है — अद्यतन अगस्त 2026 तक। स्रोत-चिह्न: 【पाठ】 = NCERT पाठ्यपुस्तक · ◆ = प्राथमिक स्रोत (चुनाव आयोग, संविधान, राजपत्र, मूल शोध-लेख) · ◇ = सशक्त द्वितीयक स्रोत · ➕ = व्याख्या एवं संश्लेषण पूरी स्रोत-सूची अंत में।

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यह विद्यार्थी की बोर्ड-परीक्षा सामग्री नहीं है। बोर्ड के लिए 04-Revision-Notes.md, 05-Question-Bank.md और 06-Flashcards.md पर्याप्त हैं — उनमें इस फ़ाइल का एक भी तथ्य नहीं गया है।

यह प्रतियोगी अभ्यर्थी, शिक्षक और सामान्य ज्ञान के पाठक के लिए है। जहाँ NCERT चुप है वहाँ अतिरिक्त जानकारी हानि नहीं करती; जहाँ NCERT कुछ और कहती है वहाँ बोर्ड के उत्तर में NCERT ही लिखिए (§13 की जाल-तालिका देखिए)।

ईमानदारी की शर्त: यह फ़ाइल “100% शुद्ध” होने का दावा नहीं करती। वादा यह है कि हर कथन के साथ उसका स्रोत है, और जो सत्यापित नहीं हो सका वह §14 में अलग रखा गया है।

विषय-सूची

#खंडस्तर
1★★स्वतंत्र पार्टी — पूरी कहानी: गठन से 1974 के विलय तकT1
2★★‘कांग्रेस-प्रणाली’ — सही शब्दावली और पूर्ण उद्धरणT1–T2
3★चुनाव आयोग — संवैधानिक और विधिक आधारT1
4★★पहला आम चुनाव — वे ब्योरे जो NCERT छोड़ देती हैT1–T2
5★★दूसरा और तीसरा आम चुनाव — पूरे आँकड़े, पहली बार एक जगहT2
6★मतदान पद्धति का पूरा तकनीकी इतिहासT1
7★सोशलिस्ट धारा — जे.बी. कृपलानी और वह कड़ी जो अकसर छूट जाती हैT1–T2
8★कम्युनिस्ट पार्टी — 1964 के विभाजन की पूरी कहानीT2
9★भारतीय जनसंघ — गठन से भाजपा तक की पूरी कड़ीT1–T2
10★★केरल 1957–59 — निर्वाचन से बर्खास्तगी तक, पूरा घटनाक्रमT1–T2
11★1967 — प्रभुत्व के अंत की शुरुआतT2
12★आगे की झलक — दुहराता हुआ पैटर्न, 2014–2024T2–T3
13! जाल — जहाँ NCERT की पंक्ति परीक्षा में अंक गँवा सकती हैसभी
14सत्यापित नहीं हो सका—
15🔄 अस्थिर तथ्य—
16शब्दावली और संक्षिप्ताक्षरT1–T2
17अभ्यास प्रश्न (24)सभी
18स्रोत-सूची—
19संबंधित फ़ाइलें—

1 · स्वतंत्र पार्टी — पूरी कहानी: गठन से 1974 के विलय तक 【T1】★★

NCERT क्या देती है: केवल तीन जगह नाम — मानचित्र की संकेत-सूची (पृ. 31), और प्रश्नावली के प्रश्न 1(ग) तथा 2 (पृ. 42) 【पाठ】। कोई विवरण-बॉक्स नहीं, जबकि सोशलिस्ट पार्टी, CPI और जनसंघ — तीनों के पूरे बॉक्स हैं। यानी विद्यार्थी से दो प्रश्नों के उत्तर माँगे जाते हैं जिनकी सामग्री पाठ में है ही नहीं।

1.1 गठन ◇

  • ★★पहला अखिल भारतीय सम्मेलन — 1 अगस्त 1959, बंबई; औपचारिक गठन अगस्त 1959 में हुआ।
  • मुख्य संस्थापक — चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (‘राजाजी’), जिन्होंने कांग्रेस की नीतियों से असहमत होकर पार्टी छोड़ी थी; साथ में मीनू मसानी और एन.जी. रंगा (प्रमुख किसान-नेता)।
  • ★कई क्षेत्रीय दल और पूर्व राजघराने भी इस मंच से जुड़े — जिनमें जयपुर और पटियाला के पूर्व महाराजा शामिल थे — ताकि समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के विरुद्ध एक उदार मोर्चा बने।

1.2 विचारधारा और मुख्य तर्क ◇

  • गैर-समाजवादी, संविधानवादी और रूढ़िवादी; मुक्त उद्यम (free enterprise) की समर्थक और साम्यवाद-विरोधी; राज्यों पर केंद्र सरकार के नियंत्रण में कमी की पक्षधर।
  • ★यही वह “राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था” वाला निर्देशक सिद्धांत है जो प्रश्न 1(ग) का उत्तर है। पार्टी ‘लाइसेंस-परमिट राज’ को समाप्त करने और बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था की पक्षधर थी।
  • गठन का कारण: राजगोपालाचारी की यह धारणा कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस का रुख लगातार अधिक समाजवादी और राज्य-केंद्रित (statist) होता जा रहा है।
  • ➕ राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल भी थे (यह तथ्य पाठ्यपुस्तक के पृ. 41 के चित्र-शीर्षक में परोक्ष रूप से आता है) 【पाठ】।

1.3 चुनावी यात्रा — उभार और पतन, पूरी समय-रेखा ◇★★

वर्षघटना
1959गठन; अभी चुनाव नहीं लड़े
1962★पहला चुनाव लड़ा — तीसरी लोकसभा में 18 सीटें, 7.89% वोट (कुछ द्वितीयक स्रोत सहयोगी निर्दलीयों को जोड़कर 25 तक की संख्या देते हैं — आधिकारिक दल-सीट संख्या 18 है)
★★1967चौथी लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी — 44 सीटें, 8.7% वोट — पार्टी का शिखर
! 1971मात्र 8 सीटों पर सिमट गई — तेज़ पतन
1972राजगोपालाचारी का निधन — पार्टी की गति और कमज़ोर हुई
★1974भारतीय लोक दल (BLD) में विलय — संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, उत्कल कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल सहित सात विरोधी दलों के साथ मिलकर यह मोर्चा बना

★★कक्षा में क्या करें: प्रश्न 1(ग) और 2 के उत्तर अलग से लिखवाइए, वरना विद्यार्थी पाठ में ढूँढ़ता रह जाएगा — उत्तर हैं “राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था” और मीनू मसानी ↔ स्वतंत्र पार्टी। ➕ और यह भी जोड़िए — स्वतंत्र पार्टी 1967 में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनी थी, यानी वह उस दौर का कोई मामूली दल नहीं थी — 1974 में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया, पर उसकी ‘लाइसेंस राज’ वाली आलोचना 1991 के आर्थिक सुधारों तक ज़िंदा रही।

2 · ‘कांग्रेस-प्रणाली’ — सही शब्दावली और पूर्ण उद्धरण 【T1–T2】★★

NCERT क्या देती है: पद का प्रयोग करती है — “इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है” (पृ. 40) 【पाठ】 — पर यह कभी नहीं बताती कि यह पद किसने गढ़ा या इसका मूल अंग्रेज़ी पद क्या है।

2.1 पूर्ण उद्धरण-विवरण ◆

  • यह पद राजनीति-शास्त्री रजनी कोठारी ने अपने लेख “The Congress ‘System’ in India” में गढ़ा।
  • पूर्ण प्रकाशन-विवरण: Asian Survey, खंड 4, अंक 12 (दिसंबर 1964), पृष्ठ 1161–1173।
  • ! ➕ शब्दावली-सुधार: कोठारी के मूल अंग्रेज़ी पद हैं “party of consensus” (सहमति की पार्टी) और “parties of pressure” (दबाव के दल) — “consensus” को “consent” न लिखें, ये दोनों अलग अवधारणाएँ हैं। (इस चैप्टर की पुरानी कक्षा-सामग्री में कभी-कभी “party of consent” लिखा मिलता है — यह अशुद्ध है।)

2.2 सिद्धांत क्या कहता है ◆◇

कोठारी का तर्क यह था कि 1952–1967 का दौर एकदलीय तानाशाही नहीं, बल्कि एक “प्रतिस्पर्धी दल-व्यवस्था, जिसमें प्रतिस्पर्धी हिस्से असमान भूमिकाएँ निभाते हैं” थी:

  • कांग्रेस ‘सहमति की पार्टी’ (party of consensus) थी — वह “गुटों के एक विस्तृत जाल के ज़रिए काम करती थी” और पूरे राजनीतिक वर्णक्रम को अपने भीतर समेटती थी।
  • बाहर के विरोधी और असंतुष्ट समूह ‘दबाव के दल’ (parties of pressure) की भूमिका निभाते थे — यानी वे शासक-दल को हाशिए से आलोचना और दबाव के ज़रिए प्रभावित करते थे।
  • ★कांग्रेस के भीतर के गुट भी ‘सहमति के भीतर की दबाव-शक्तियाँ’ थे — यानी असली प्रतिस्पर्धा दलों के बीच नहीं, कांग्रेस के भीतर चलती थी।

2.3 ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक स्वयं कोठारी को उद्धृत करती है 【पाठ】★

प्रश्नावली प्रश्न 5 का पूरा अवतरण भी रजनी कोठारी का ही है (पृ. 43) — पर उसमें भी नाम के अलावा और कोई पहचान नहीं दी गई। यानी अध्याय का पूरा ढाँचा उन्हीं के विश्लेषण पर टिका है, पर मूल पद की न परिभाषा दी गई है, न सही अंग्रेज़ी शब्द।

UPSC-दृष्टि: “कांग्रेस-प्रणाली” पर प्रश्न आने पर रजनी कोठारी, 1964, Asian Survey, “party of consensus” और “parties of pressure” — यह चार शब्द उत्तर को तुरंत ऊँचा उठा देते हैं।

3 · चुनाव आयोग — संवैधानिक और विधिक आधार 【T1】★

NCERT क्या देती है: “भारत के चुनाव आयोग का गठन 1950 के जनवरी में हुआ। सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।” — बस इतना 【पाठ】। कोई अनुच्छेद, कोई अधिनियम, कोई तिथि नहीं।

तथ्यविवरणचिह्न
★★स्थापना25 जनवरी 1950 — गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले◆
राष्ट्रीय मतदाता दिवसइसी तिथि पर हर वर्ष मनाया जाता है; यह परंपरा 2011 से शुरू हुई; 2026 में आयोग का 76वाँ स्थापना-वर्ष मनाया गया, विषय — “मेरा भारत, मेरा वोट”◆
★★संवैधानिक आधारअनुच्छेद 324 — चुनावों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण चुनाव आयोग में निहित; अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव-संबंधी उपबंध◆
मताधिकारअनुच्छेद 326 — सार्वभौम वयस्क मताधिकार का उपबंध (NCERT पूरे अध्याय में सार्वभौम मताधिकार की बात करती है पर अनुच्छेद नहीं बताती)◆
विधिक ढाँचाजन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 — मतदाता-सूची से संबंधित; 1951 — चुनाव कराने की प्रक्रिया तय करता है◆
★सुकुमार सेन — पृष्ठभूमिजन्म 1899; 1921 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) में शामिल; 1947–1950 तक बंगाल के मुख्य सचिव और न्यायाधीश रहे◇
नियुक्ति और कार्यकालमार्च 1950 में पहले चुनाव आयुक्त नियुक्त; कार्यकाल 21 मार्च 1950 – 19 दिसंबर 1958; पहले और दूसरे, दोनों आम चुनाव उन्हीं की देखरेख में हुए◇
★अंतरराष्ट्रीय पहचान1953 में सूडान ने अपने पहले सार्वभौम-मताधिकार चुनाव के लिए सेन की विशेषज्ञता माँगी; नेपाल और इंडोनेशिया ने भी 1951-52 में पर्यवेक्षक भेजे◇
मूल्यांकनइतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उन्हें “भारतीय लोकतंत्र का एक अनगाया नायक” कहा है; सेन ने कोई संस्मरण या निजी दस्तावेज़ नहीं छोड़े◇

★★यह गैप क्यों मायने रखता है: NCERT पढ़कर लगता है कि चुनाव आयोग एक प्रशासनिक व्यवस्था थी। वास्तव में यह एक संवैधानिक निकाय है, और अनुच्छेद 324 पर सीधे प्रश्न आते हैं।

4 · पहला आम चुनाव — वे ब्योरे जो NCERT छोड़ देती है 【T1–T2】★★

NCERT क्या देती है: “1951 के अक्तूबर से 1952 के फरवरी तक चुनाव हुए”; 17 करोड़ मतदाता; 15 फीसदी साक्षर; 3 लाख से ज्यादा कर्मी; 20 लाख स्टील के बक्से 【पाठ】।

4.1 पैमाना — पूरे आँकड़े ◆◇★★

मात्रामाननोट
मतदान की अवधि25 अक्तूबर 1951 – 21 फरवरी 195217 दिनों में चरणबद्ध मतदान; कुल लगभग चार महीने
पंजीकृत मतदाता17,32,13,635 (लगभग 17.32 करोड़)NCERT में 17 करोड़ — गोल आँकड़ा
★मतदान8,86,12,171 वोट डाले गए◇
★★मतदान प्रतिशतलगभग 51.15% (8.86 करोड़ ÷ 17.32 करोड़)यही NCERT के “आधे से अधिक मतदाताओं ने वोट डाला” का सटीक आँकड़ा है
साक्षरता16.6% (चुनाव आयोग की 1955 की रिपोर्ट के अनुसार)NCERT 15% पर गोल करती है
लोकसभा सीटें489 (कुल 499 में से; शेष रियासतों/क्षेत्रों से संबद्ध)—
विधानसभा सीटेंलगभग 3,283 (कुछ स्रोतों में 3,200)—
उम्मीदवारलगभग 1,900 (स्रोतों में 1,874 से 1,949 के बीच भिन्नता)! सटीक संख्या पर स्रोत असहमत हैं
राजनीतिक दल53—
★कहाँ नहीं हुआजम्मू और कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में◇

4.2 महिला मतदाता — असली कहानी, दो चरणों में ◆★★

पुरानी संस्करण में यह दावा “सत्यापित नहीं हो सका” था। अब मूल 1955 की चुनाव आयोग रिपोर्ट के आधार पर पूरी कहानी उपलब्ध है — और यह दो-चरण की कहानी है, न कि एक ही आँकड़ा:

चरणक्या हुआ
पहला प्रारूपकुछ राज्यों में लगभग 40 लाख महिलाओं के नाम मतदाता-सूची में ‘अलां की बेटी’, ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज मिले — क्योंकि ये महिलाएँ अजनबियों को अपना नाम बताने में हिचकिचाती थीं
चुनाव आयोग का निर्देशआयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को अस्वीकार्य ठहराया और आदेश दिया कि मतदाता का नाम पहचान का अनिवार्य हिस्सा है, अतः दर्ज होना चाहिए
★★अंतिम परिणामकुल लगभग 8 करोड़ महिला मतदाताओं में से लगभग 28 लाख (2.8 करोड़ में से नहीं — 28 लाख) महिलाओं ने अपना सही नाम देने से इनकार किया, और उनकी प्रविष्टियाँ सूची से हटा दी गईं
प्रभावित राज्यबिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान और विंध्य प्रदेश — लगभग सभी मामले इन्हीं राज्यों से थे

➕ यानी “40 लाख” और “28 लाख” — दोनों आँकड़े सही हैं, पर अलग-अलग चरणों के हैं। 40 लाख नाम शुरुआत में समस्याग्रस्त पाए गए; उनमें से 28 लाख आख़िर में सूची से हटाए गए क्योंकि वे महिलाएँ अपना नाम देने को राज़ी नहीं हुईं। परीक्षा में “लगभग 40 लाख” ही लिखिए — यह व्यापक रूप से प्रचलित और मूल स्रोत-सम्मत आँकड़ा है।

4.3 कांग्रेस का चुनाव-चिह्न और नेहरू का अभियान ◇★

  • ★कांग्रेस का 1952 का चुनाव-चिह्न — “दो बैलों की जोड़ी, जुए सहित” (yoke of two bullocks)।
  • ★★नेहरू ने अभियान में लगभग 25,000 से 30,000 मील की यात्रा की — छोटे चार्टर्ड विमानों, रेलगाड़ियों, खुली कारों और दूरदराज़ के गाँवों में बैलगाड़ियों तक से।
  • लगभग 300 बड़ी सभाओं को संबोधित किया और सीधे लगभग 2 से 3.5 करोड़ लोगों तक पहुँचे — देश की आबादी के लगभग दसवें हिस्से तक।
  • ➕ यह पैमाना बताता है कि 1952 का प्रभुत्व केवल संगठन का नहीं, व्यक्तिगत करिश्मे का भी परिणाम था — जो पाठ्यपुस्तक के “नेहरू भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे” 【पाठ】 कथन को संख्याओं से पुष्ट करता है।

4.4 समकालीन आलोचना — मूल उद्धरण 【पाठ】

पाठ्यपुस्तक में पहले से मौजूद उद्धरण (“इतिहास का सबसे बड़ा जुआ”, ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका की भविष्यवाणी) सही संदर्भ में हैं — बस याद रखिए कि ये सब गलत साबित हुए, और यही अध्याय का केंद्रीय तर्क है।

5 · दूसरा और तीसरा आम चुनाव — पूरे आँकड़े, पहली बार एक जगह 【T2】★★

NCERT क्या देती है: केवल सीटों की तालिका — 494 में से 371 (1957) और 494 में से 361 (1962) 【पाठ】। वोट-प्रतिशत और अन्य दलों के आँकड़े नहीं दिए गए। पिछले संस्करण में यह जानबूझकर छोड़ा गया था; अब पुष्ट आँकड़े उपलब्ध हैं।

5.1 दूसरा आम चुनाव — 1957 ◇★★

दलसीटें (कुल 494)वोट-प्रतिशत
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस37147.78%
★भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी278.92%
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी1910.41%
भारतीय जनसंघ45.97%
अखिल भारतीय गणतंत्र परिषद्71.07%
शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन61.69%
निर्दलीय4219.32%

मतदान प्रतिशत — 45.44% (1952 के 51.15% से घटकर)।

5.2 तीसरा आम चुनाव — 1962 ◇★★

दलसीटें (कुल 494)वोट-प्रतिशत
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस36144.72%
★भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी299.94%
स्वतंत्र पार्टी187.89%
भारतीय जनसंघ146.44%

मतदान प्रतिशत — 55.42% (1957 से लगभग 10 अंक अधिक)।

5.3 सबसे बड़ी नई बात — CPI लगातार तीन बार मुख्य विपक्ष रही ➕★★

चुनावCPI की सीटेंस्थिति
195216मुख्य विपक्षी दल
195727मुख्य विपक्षी दल — वोट-प्रतिशत में कांग्रेस से लगभग पाँच गुना पीछे
196229मुख्य विपक्षी दल (तीसरी बार)

★★यह पैटर्न पाठ्यपुस्तक में कहीं नहीं जुड़ता — NCERT केवल 1952 का आँकड़ा देती है। वास्तव में CPI तीनों चुनावों में लगातार सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी रही — यह दिखाता है कि 1950 के दशक का विपक्षी नेतृत्व वैचारिक रूप से वामपंथ-केंद्रित था, भले ही सीटों की संख्या कम रही। ➕ और ध्यान दीजिए: 1952 में सोशलिस्ट पार्टी और KMPP, दोनों का वोट-प्रतिशत (10.59% और 5.79%) मिलाकर CPI के 3.29% से कहीं ज्यादा था, फिर भी CPI को अधिक सीटें मिलीं — यह FPTP प्रणाली का वही सिद्धांत है जो पाठ्यपुस्तक §3.3 में समझाती है 【पाठ】, बस CPI के मामले में यह उलटी दिशा में काम कर गया।

6 · मतदान पद्धति का पूरा तकनीकी इतिहास 【T1】★

NCERT का बॉक्स (पृ. 29) मतदान पद्धति के तीन चरण देता है, पर 1952 और 1957 की अलग-अलग मतपेटी वाली पद्धति के पीछे का तकनीकी तर्क नहीं बताता 【पाठ】।

चरणतरीकाअवधि/कारण
1952 और 1957हर उम्मीदवार के लिए अलग, रंग-भिन्न मतपेटी, जिस पर उसका नाम और चुनाव-चिह्न लिखा होता; मतदाता को खाली मतपत्र मिलता, जिसे वह अपनी पसंद की पेटी में डालता16.6% साक्षरता को ध्यान में रखकर यह पद्धति जान-बूझकर चुनी गई ◇
★1962 से — ‘मार्किंग सिस्टम’एक ही मतपत्र पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चिह्न; मतदाता रबर मुहर से अपनी पसंद के सामने निशान लगातातीसरे आम चुनाव (1962) से शुरू; पिछली पद्धति की जटिलता दूर करने के लिए अपनाई गई; लगभग चालीस वर्ष तक चली
1990 के दशक का अंतइलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का प्रायोगिक प्रयोग शुरू—
2004पूरे देश में EVM—

➕ यानी “मार्किंग सिस्टम” ठीक उसी चुनाव से शुरू हुआ जिससे कांग्रेस का प्रभुत्व दिखाने वाली तीसरी तालिका शुरू होती है (1962) — संयोग नहीं, बल्कि चुनाव-प्रणाली की परिपक्वता और मतदाता-आधार की साक्षरता, दोनों साथ-साथ बढ़ रहे थे।

7 · सोशलिस्ट धारा — जे.बी. कृपलानी और वह कड़ी जो अकसर छूट जाती है 【T1–T2】★

NCERT का बॉक्स (पृ. 34) सीधे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934) → सोशलिस्ट पार्टी (1948) से “किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी” की सूची देती है 【पाठ】, पर बीच की कड़ी — किसने, कब, क्यों — नहीं बताती।

7.1 पूरी शृंखला, तिथि-वार ◇★★

वर्षघटना
1934कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन — कांग्रेस के भीतर ही, युवा नेताओं की एक टोली द्वारा
1948कांग्रेस ने संविधान में बदलाव कर दोहरी सदस्यता समाप्त की → समाजवादी अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बने
★★1951जे.बी. कृपलानी — कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, जिन्होंने 1947 में इस्तीफ़ा दिया था — ने किसान मज़दूर प्रजा पार्टी (KMPP) बनाई
★1952पहले आम चुनाव के बाद, KMPP और सोशलिस्ट पार्टी का विलय होकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) बनी
1955राममनोहर लोहिया ने PSP छोड़कर पुरानी सोशलिस्ट पार्टी को फिर ज़िंदा किया (Socialist Party of India, 1955)
1964पुनः विलय और विभाजन से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का गठन

7.2 जे.बी. कृपलानी — गुम कड़ी ◇★

  • पूरा नाम — आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी; स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1947) — यानी स्वतंत्रता के समय पार्टी अध्यक्ष।
  • 1951 में कांग्रेस से अलग होकर KMPP का गठन किया — यह सोशलिस्ट पार्टी से अलग एक स्वतंत्र प्रयास था, न कि उसी का विस्तार।
  • ➕ इसीलिए 1952 का चुनाव KMPP और सोशलिस्ट पार्टी ने अलग-अलग लड़ा (§5 की तालिका में KMPP को 9 सीटें, 5.79% वोट मिले — सोशलिस्ट पार्टी से अलग गिनती में); चुनाव के बाद ही दोनों का विलय हुआ।

★कक्षा के लिए यह ज़रूरी है: यदि विद्यार्थी सीधे “1934 → 1948 → PSP” पढ़ लेता है, तो वह कृपलानी का नाम कभी नहीं जान पाएगा — जबकि वे स्वतंत्रता के समय कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके व्यक्ति थे और उनका पार्टी छोड़ना अपने आप में एक महत्वपूर्ण संकेत था।

8 · कम्युनिस्ट पार्टी — 1964 के विभाजन की पूरी कहानी 【T2】★

NCERT बताती है: “1964 में बड़ी टूट — चीन और सोवियत संघ के बीच वैचारिक अंतर आने के बाद” 【पाठ】 — पर सटीक तिथि, तात्कालिक कारण और घटनाक्रम नहीं देती।

8.1 पूरा घटनाक्रम ◇★★

चरणविवरण
पृष्ठभूमिविश्व साम्यवादी आंदोलन सोवियत संघ (ख्रुश्चेव — “शांतिपूर्ण सहअस्तित्व”, संसदीय रास्ता) और चीन (माओ — क्रांतिकारी रास्ता; सोवियत नीति को “संशोधनवादी” बताया) — दो खेमों में बँट गया
★★तात्कालिक कारण1962 का भारत-चीन युद्ध — पार्टी के परंपरावादी धड़े ने नेहरू सरकार को पूरा समर्थन दिया; कट्टरपंथी धड़े ने बिना शर्त समर्थन का विरोध किया, यह कहते हुए कि यह सरकार के वर्ग-चरित्र का सवाल है
★★विभाजन की तिथि7 नवंबर 1964 — दिल्ली में CPI की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में 32 सदस्यों ने वॉकआउट किया
नई पार्टीबाद में कलकत्ता में सम्मेलन कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — CPI(M) का औपचारिक गठन किया
वैचारिक भेदCPI सोवियत शैली के साम्यवाद के करीब मानी जाती है; CPI(M) चीनी क्रांतिकारी दृष्टिकोण से अधिक प्रभावित थी

➕ यानी 1964 का विभाजन भारत के किसी आंतरिक मुद्दे से नहीं, बल्कि 1962 के युद्ध और वैश्विक साम्यवादी आंदोलन के विभाजन से जुड़ा था — यह ठीक वही बात है जो पाठ्यपुस्तक के मुख्य आँकड़ों (§7.5) में संक्षेप में कही गई है, यहाँ पूरा संदर्भ मिलता है।

9 · भारतीय जनसंघ — गठन से भाजपा तक की पूरी कड़ी 【T1–T2】★

NCERT बताती है: गठन 1951, संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी, विचारधारा ‘एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र’ 【पाठ】। RSS से संबंध और आगे भाजपा तक की कड़ी संक्षेप में ही है।

9.1 गठन का पूरा विवरण ◇★★

  • ★स्थापना — 21 अक्तूबर 1951, दिल्ली।
  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने RSS प्रमुख एम.एस. गोलवलकर से परामर्श के बाद पार्टी बनाई; मौलीचंद्र शर्मा सहित कोर-समूह के कई सदस्य RSS प्रचारक थे।
  • ★★विचारधारा के चार स्तंभ (NCERT केवल “एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र” देती है): हिंदुत्व/हिंदू राष्ट्रवाद · समग्र मानवतावाद (दीनदयाल उपाध्याय द्वारा बाद में प्रतिपादित) · राष्ट्रीय रूढ़िवाद · आर्थिक राष्ट्रवाद।

9.2 आगे की कड़ी — जनसंघ से भाजपा तक ◇★

वर्षघटना
1951भारतीय जनसंघ की स्थापना
1952 / 1957 / 1962लोकसभा सीटें — 3 / 4 / 14 (वोट-प्रतिशत क्रमशः — / 5.97% / 6.44%)
1977★आपातकाल के बाद जनसंघ का जनता पार्टी में विलय
1980★★जनता पार्टी में RSS की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर विभाजन → पूर्व जनसंघ-समर्थकों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बनाई

★यह श्रृंखला परीक्षा में अकसर पूछी जाती है: जनसंघ (1951) → जनता पार्टी में विलय (1977) → भाजपा का गठन (1980)। पाठ्यपुस्तक केवल “भारतीय जनता पार्टी की जड़ें इसी जनसंघ में हैं” कहती है — बीच के दो पड़ाव यहाँ पूरे मिलते हैं।

10 · केरल 1957–59 — निर्वाचन से बर्खास्तगी तक, पूरा घटनाक्रम 【T1–T2】★★

NCERT बताती है: 126 में से 60 सीटें, EMS मुख्यमंत्री, ‘मुक्ति संघर्ष’, 1959 में अनुच्छेद 356 से बर्खास्तगी 【पाठ】। आँकड़े, बहुमत की गणना, प्रशासनिक निर्णय और आलोचना के दोनों पक्ष अनुपस्थित हैं।

10.1 चुनाव और सरकार-गठन — सटीक आँकड़े ◇★★

तथ्यविवरण
तिथिमार्च 1957 — केरल की पहली विधानसभा का चुनाव
कुल सीटें126
बहुमत के लिए आवश्यक64
★★CPI का प्रदर्शन60 सीटें — बहुमत से 4 कम
मतदान प्रतिशत65.49%
★सरकार कैसे बनी5 निर्दलीय विधायकों के समर्थन से — कुल 65, बहुमत से ठीक 1 अधिक
मुख्यमंत्रीई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, शपथ अप्रैल 1957 में

★★यह गणना कक्षा में ज़रूर कीजिए: “126 में से 64 चाहिए, CPI को 60 मिले — यानी अकेले बहुमत नहीं था। पाँच निर्दलियों के साथ 65 — बहुमत से केवल एक ज़्यादा।” यह दिखाता है कि सरकार कितनी नाज़ुक बहुमत पर टिकी थी — जो आगे की अस्थिरता को भी समझाता है।

10.2 सरकार के प्रमुख कदम ◇★

  • भूमि सुधार अध्यादेश (Land Reform Ordinance) — बड़ी जोतों पर सीमा और काश्तकारों को सुरक्षा देने की दिशा में।
  • शिक्षा विधेयक (Education Bill) — निजी (मुख्यतः ईसाई और नायर प्रबंधन वाले) स्कूलों पर सरकारी नियमन बढ़ाने का प्रयास।
  • ➕ यही दोनों कदम आगे चलकर ‘मुक्ति संघर्ष’ के तात्कालिक कारण बने — क्योंकि इनसे भूस्वामी वर्ग और निजी-स्कूल प्रबंधन, दोनों को सीधा नुक़सान दिखा।

10.3 ‘मुक्ति संघर्ष’ — दोनों दृष्टियाँ, तटस्थता से ◇ध्यान

  • समर्थकों का दृष्टिकोण: यह एक जन-आंदोलन था — कांग्रेस, नायर सर्विस सोसाइटी, कैथोलिक चर्च और अन्य सामुदायिक-धार्मिक संगठनों की साझी प्रतिक्रिया, जो सरकार की नीतियों से सीधे प्रभावित महसूस कर रहे थे।
  • ! आलोचकों का दृष्टिकोण: वामपंथी इतिहासकार इसे “घरेलू और सांप्रदायिक विरोधियों की सुनियोजित साज़िश” मानते हैं, कुछ का दावा है कि इसमें विदेशी एजेंसियों (जिनमें CIA का नाम लिया जाता है) की भी भूमिका थी।
  • !! यह दावा विवादित और अपुष्ट है — इसे तथ्य के रूप में न पढ़ाइए, केवल “कुछ इतिहासकारों का दावा” कहकर संदर्भ दीजिए। किसी समुदाय या संगठन को दोषी न ठहराएँ — यह इस चैप्टर के लिए भी वही नियम है जो अन्य अध्यायों की संवेदनशील सामग्री पर लागू होता है।

10.4 बर्खास्तगी — सटीक विवरण 【पाठ】◆★★

तथ्यविवरण
तिथि31 जुलाई 1959
प्रक्रियाकेंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत सरकार बर्खास्त की और विधानसभा भंग की
★★ऐतिहासिक महत्वयह पहला अवसर था जब नेहरू सरकार ने किसी गैर-कांग्रेसी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया
सरकार की अवधिअप्रैल 1957 से जुलाई 1959 — लगभग 27 महीने
समाचारपत्रThe Hindu, मद्रास, 31 जुलाई 1959 — “PRESIDENT’S RULE IN KERALA — CABINET ADVISES ACTION UNDER ARTICLE 356” (पाठ्यपुस्तक में भी उद्धृत, पृ. 33)

★★यही इस पूरे दौर का सबसे असुविधाजनक तथ्य है। प्रभुत्व लोकतांत्रिक रूप से अर्जित था — पर जब विपक्ष कहीं जीत गया, तो संघीय शक्तियों का प्रयोग करके उसे हटा दिया गया। अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग की जो लंबी कथा आगे चली — और जिसे 1994 के एस.आर. बोम्मई निर्णय ने सीमित किया (अध्याय 8 में विस्तार से) — उसका पहला बड़ा अध्याय यही है।

11 · 1967 — प्रभुत्व के अंत की शुरुआत 【T2】★

पाठ्यपुस्तक इसे केवल एक पंक्ति में समेटती है — “प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा” 【पाठ】। चौथे आम चुनाव के ठोस आँकड़े अध्याय में कहीं नहीं हैं।

तथ्यविवरणचिह्न
★★लोकसभा में कांग्रेस1962 के 361 से घटकर 1967 में 283 सीटें◇
★★राज्यों में हारनौ राज्यों में सत्ता गँवाई — पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास (तमिलनाडु) और केरल◇
कैसे हारीसात राज्यों में सीधे बहुमत गँवाया; दो अन्य में दल-बदल के कारण सरकार नहीं बना सकी◇
★नई परिघटनागैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर संयुक्त विधायक दल (SVD) बनाए और कई राज्यों में गठबंधन सरकारें बनाईं◇
स्वतंत्र पार्टीइसी चुनाव में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी (44 सीटें) बनी — §1.3 देखिए◇

➕ यह अध्याय 8 (गठबंधन की राजनीति) की पहली कड़ी है — 1967 के संयुक्त विधायक दल प्रयोगों ने ही आगे चलकर 1989 के राष्ट्रीय मोर्चे और उसके बाद के गठबंधन-युग की नींव रखी। यानी ‘कांग्रेस-प्रणाली’ का अंत और ‘गठबंधन-युग’ का बीजारोपण, दोनों एक ही चुनाव (1967) में हुए।

12 · आगे की झलक — दुहराता हुआ पैटर्न, 2014–2024 【T2–T3】★

! यह खंड पूरी तरह तथ्यात्मक और तटस्थ है — वर्तमान राजनीति पर कोई मूल्यांकन या राय इसमें नहीं है। केवल यह दिखाया गया है कि ‘एकल-दल प्रभुत्व → गठबंधन’ का चक्र भारतीय राजनीति में एक से अधिक बार दोहराया है।

दौरपैटर्नचिह्न
1952–1967कांग्रेस का एकल-दल प्रभुत्व; 1967 में समाप्त, गठबंधन-राजनीति का उदय【पाठ】
1989–2014कोई भी दल स्पष्ट बहुमत नहीं — 11 गठबंधन/अल्पमत सरकारें (विस्तार से अध्याय 8 में)➕
★2014भाजपा को 282 सीटें — 1984 के बाद पहली बार किसी एकल दल को स्पष्ट बहुमत◆
2019भाजपा — 303 सीटें◆
★★2024भाजपा 240 सीटें — 272 के बहुमत-अंक से कम; सरकार राजग सहयोगी दलों (टीडीपी, जदयू आदि) के समर्थन से बनी — कुल राजग सीटें लगभग 293◆

➕ इसका पाठ्यपुस्तक-सम्मत अर्थ: पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है कि “कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा” 【पाठ】। 2014–2019 का भाजपा-प्रभुत्व और 2024 में गठबंधन पर निर्भरता — यह वही ऐतिहासिक पैटर्न है जो 1952–1967 और 1967 के बाद देखा गया था, बस दूसरे दल के साथ। यह किसी दल की जीत-हार का आकलन नहीं, बल्कि भारतीय दलीय-व्यवस्था की एक संरचनात्मक प्रवृत्ति है — एकल-दल प्रभुत्व स्थायी नहीं रहता।

! परीक्षा-निर्देश: बोर्ड परीक्षा के उत्तर में यह तुलना बिल्कुल न लिखें — पाठ्यपुस्तक 1967 पर ही रुकती है। यह पंक्ति केवल प्रतियोगी परीक्षा के निबंध या सामान्य ज्ञान के लिए है।

13 · जाल — जहाँ NCERT की पंक्ति परीक्षा में अंक गँवा सकती हैध्यान

#NCERT कहती हैप्रतियोगी परीक्षा में क्या चाहिए
1स्वतंत्र पार्टी का केवल नामअगस्त 1959, राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, एन.जी. रंगा; मुक्त उद्यम, लाइसेंस-राज का विरोध; 1967 में सबसे बड़ी विपक्ष (44 सीट); 1974 में BLD में विलय
2“इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है”पद रजनी कोठारी ने दिसंबर 1964, Asian Survey में गढ़ा; सही अंग्रेज़ी शब्द “party of consensus” (न कि “consent”) और “parties of pressure”
3“चुनाव आयोग का गठन 1950 के जनवरी में”25 जनवरी 1950; अनुच्छेद 324; राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2011 से
4“सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त”कार्यकाल 21 मार्च 1950 – 19 दिसंबर 1958; पहले दो आम चुनाव दोनों उन्हीं की देखरेख में
5“अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 तक”25 अक्तूबर 1951 – 21 फरवरी 1952; मतदान प्रतिशत ≈ 51.15%
6“17 करोड़ मतदाता”17.32 करोड़; साक्षरता 16.6% (न कि 15%); चुनाव जम्मू-कश्मीर को छोड़कर हुआ
7“40 लाख महिलाओं के नाम छूटे” (पिछले संस्करण में अपुष्ट)अब पुष्ट: ~40 लाख शुरुआती समस्या; अंततः ~28 लाख नाम सूची से हटाए गए
8केवल 1952 की सीट-तालिका1957 — कांग्रेस 371 (47.78%), CPI 27 (8.92%); 1962 — कांग्रेस 361 (44.72%), CPI 29 (9.94%); CPI तीनों बार मुख्य विपक्ष
9केरल — “दुनिया में पहली बार”ध्यान से — “चुनाव के जरिए बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार”; 126 में से 64 चाहिए, CPI को 60 + 5 निर्दलीय = 65
10जनसंघ — केवल 1951, मुखर्जी21 अक्तूबर 1951; RSS प्रमुख गोलवलकर से परामर्श; 1977 जनता पार्टी में विलय → 1980 भाजपा
11CPI विभाजन — “1964”सटीक तिथि 7 नवंबर 1964; कारण 1962 के युद्ध पर मतभेद, न कि केवल “वैचारिक अंतर”
12“प्रभुत्व सिर्फ़ एक दौर में रहा”1967 में कांग्रेस 361→283 सीट; नौ राज्यों में सत्ता गई; संयुक्त विधायक दल का उदय

14 · सत्यापित नहीं हो सका

दावास्थिति
“स्वतंत्र पार्टी ने 1962 में 25 सीटें जीतीं”आधिकारिक आँकड़ा (Wikipedia निर्वाचन-डेटा) 18 सीटें, 7.89% वोट देता है। कुछ द्वितीयक स्रोत सहयोगी निर्दलीय उम्मीदवारों को जोड़कर 25 तक की संख्या देते हैं — परीक्षा में 18 ही सुरक्षित उत्तर है
मुक्ति संघर्ष में विदेशी एजेंसियों (CIA) की भूमिकाविवादित और अपुष्ट दावा। कुछ इतिहासकार इसे मानते हैं, अन्य नकारते हैं — मूल-स्रोत से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। इसे तथ्य के रूप में न पढ़ाया जाए
चुनाव में प्रशिक्षित कर्मियों और मतपेटियों की सटीक संख्या“3 लाख से ज्यादा कर्मी” और “20 लाख मतपेटियाँ” NCERT का अपना आँकड़ा है; द्वितीयक स्रोत 1 लाख अधिकारी, 16,500 लिपिक, 56,000 पीठासीन अधिकारी जैसे भिन्न उप-आँकड़े देते हैं — कुल मिलाकर संख्याएँ एक-दूसरे का खंडन नहीं करतीं, पर स्वतंत्र रूप से जोड़कर सत्यापित नहीं हो सकीं
मतदान केंद्रों/बूथों की सटीक संख्यास्रोतों में 1,32,560 केंद्र / 1,96,084 बूथ से लेकर “2,24,000 से अधिक बूथ” तक भिन्नता — सटीक आँकड़े पर सहमति नहीं
उम्मीदवारों की कुल संख्या (1952)1,874 से 1,949 के बीच स्रोतों में भिन्नता — औसत “चार प्रति सीट” स्थिर तथ्य है, कुल संख्या नहीं

15 · 🔄 अस्थिर तथ्य

तथ्यवर्तमानकब जाँचें
लोकसभा की कुल सीटेंआज 543 (अध्याय के दौर में 489 → 494)परिसीमन पर
सोशलिस्ट धारा के आज के दलसमाजवादी पार्टी, RJD, JD(U), JD(S)दल-विलय या विभाजन पर
वर्तमान लोकसभा की संरचना (2024 के बाद)भाजपा 240, कांग्रेस 99, राजग ≈ 293अगले आम चुनाव (2029) पर

अगली अनुशंसित जाँच: अगस्त 2027। शेष फ़ाइल स्थिर है — 1950 और 1960 के दशक की तिथियाँ नहीं बदलेंगी।

16 · शब्दावली और संक्षिप्ताक्षर 【T1–T2】

पद/संक्षिप्ताक्षरपूरा नाम / अर्थ
CPIभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of India)
CPI(M)भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — 1964 में CPI से अलग हुई
PSPप्रजा सोशलिस्ट पार्टी — 1952 में KMPP और सोशलिस्ट पार्टी के विलय से बनी
KMPPकिसान मज़दूर प्रजा पार्टी — जे.बी. कृपलानी, 1951
BLDभारतीय लोक दल — 1974 में स्वतंत्र पार्टी सहित सात दलों के विलय से
SVDसंयुक्त विधायक दल — 1967 के बाद गैर-कांग्रेसी गठबंधनों का नाम
ECIभारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) — 25 जनवरी 1950
party of consensusकोठारी का पद — सहमति की पार्टी (कांग्रेस); “party of consent” गलत अनुवाद है
parties of pressureकोठारी का पद — दबाव के दल (विपक्षी दल)
FPTPFirst Past The Post — सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत, भारत की चुनाव-प्रणाली
मार्किंग सिस्टम1962 से शुरू — एक ही मतपत्र पर मुहर से मतदान
मुक्ति संघर्षVimochana Samaram — केरल की निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार के विरुद्ध आंदोलन
अनुच्छेद 356राष्ट्रपति शासन का उपबंध; 1959 में केरल पर पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार के विरुद्ध प्रयोग
अनुच्छेद 324–329संविधान के चुनाव-संबंधी उपबंध
समग्र मानवतावाददीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित जनसंघ का दार्शनिक सिद्धांत

17 · अभ्यास प्रश्न 【सभी स्तर】

1 अंक

  1. रजनी कोठारी का लेख किस पत्रिका में, किस वर्ष प्रकाशित हुआ? — Asian Survey, दिसंबर 1964
  2. कोठारी का सही अंग्रेज़ी पद क्या था — “party of consent” या “party of consensus”? — party of consensus
  3. चुनाव आयोग की स्थापना किस तिथि को हुई? — 25 जनवरी 1950
  4. ★सुकुमार सेन का कार्यकाल कब से कब तक रहा? — 21 मार्च 1950 – 19 दिसंबर 1958
  5. पहला आम चुनाव किस राज्य को छोड़कर हुआ? — जम्मू और कश्मीर
  6. ★पहले आम चुनाव में मतदान प्रतिशत लगभग कितना रहा? — लगभग 51.15%
  7. स्वतंत्र पार्टी का गठन कब और किसने किया? — अगस्त 1959; राजगोपालाचारी
  8. स्वतंत्र पार्टी 1967 में कितनी सीटों के साथ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी? — 44 सीटें
  9. स्वतंत्र पार्टी का 1974 में किस दल में विलय हुआ? — भारतीय लोक दल
  10. ★KMPP किसने और कब बनाई? — जे.बी. कृपलानी, 1951
  11. PSP कब और किन दो दलों के विलय से बनी? — 1952; KMPP और सोशलिस्ट पार्टी
  12. CPI का विभाजन किस तिथि को हुआ? — 7 नवंबर 1964
  13. भारतीय जनसंघ की स्थापना किस तिथि को हुई? — 21 अक्तूबर 1951
  14. जनसंघ का 1977 में किस दल में विलय हुआ? — जनता पार्टी
  15. भाजपा का गठन कब हुआ? — 1980
  16. केरल विधानसभा में बहुमत के लिए कितनी सीटें चाहिए थीं? — 64 (कुल 126 में से)
  17. ★CPI को 1957 के केरल चुनाव में कितनी सीटें मिलीं? — 60
  18. ★केरल की कम्युनिस्ट सरकार कब बर्खास्त हुई? — 31 जुलाई 1959
  19. 1962 से मतदान की कौन-सी नई पद्धति शुरू हुई? — मार्किंग सिस्टम
  20. 1967 में कांग्रेस को लोकसभा में कितनी सीटें मिलीं? — 283
  21. 1967 में कांग्रेस ने कितने राज्यों में सत्ता गँवाई? — नौ

2–4 अंक

  1. रजनी कोठारी के ‘कांग्रेस-प्रणाली’ सिद्धांत को समझाइए। “party of consensus” और “parties of pressure” का क्या अर्थ है?
  2. स्वतंत्र पार्टी के गठन, विचारधारा और 1959 से 1974 तक के उत्थान-पतन का वर्णन कीजिए।
  3. केरल 1957 चुनाव से 1959 की बर्खास्तगी तक की पूरी घटना का वर्णन कीजिए। इसमें अनुच्छेद 356 की क्या भूमिका रही?

6 अंक

  1. “एक-दल प्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में भी कायम हो सकता है, पर वह स्थायी नहीं होता।” — 1952 से 1967 के भारतीय अनुभव के आधार पर इस कथन की जाँच कीजिए।

18 · स्रोत-सूची

प्राथमिक ◆

सशक्त द्वितीयक ◇

! शिक्षक के लिए अंतिम नोट: बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक के तथ्य और उसकी भाषा ही लिखवाइए। यह संवर्धन सामग्री कक्षा-चर्चा और प्रतियोगी परीक्षा के लिए है। §1 (स्वतंत्र पार्टी) और §2 (कांग्रेस-प्रणाली की सही शब्दावली) कक्षा में अवश्य पढ़ाइए — पहले के बिना प्रश्नावली प्रश्न 1(ग) और 2 हल नहीं हो सकते, दूसरे के बिना विद्यार्थी परीक्षा में गलत अंग्रेज़ी पद लिख सकता है।

19 · संबंधित फ़ाइलें

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12-Independent-Chapter.mdइसी विषय का स्वतंत्र, पूर्ण विवरण — पाठ्यपुस्तक के क्रम से मुक्त
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