अध्याय 7वैश्वीकरण

शिक्षण नोट्स43 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), पृ. 99–112 (+ 2 पृष्ठ अंत-सामग्री) = 16 पृष्ठ

पाठ्यपुस्तक का पूरा पाठ, पृष्ठ-संदर्भ सहित। यह शिक्षक की फाइल है — पढ़ाने से पहले एक बार पूरी पढ़िए।

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पढ़ाने से पहले — एक गंभीर अनाथ-संदर्भध्यान

यह अध्याय पहले ‘अध्याय 9’ था — QR कोड 12108CH09। पैटर्न अब पूरा हो गया: पुराने अध्याय 1 और अध्याय 3 हटाए गए; 2→1, 4→2, 5→3, 6→4, 7→5, 8→6, 9→7.

अनाथ-संदर्भ — और यह सबसे गंभीर है(पृ. 107)ध्यान

“हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।”

!! वह अध्याय — ‘समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व’ — पाठ्यक्रम-युक्तिकरण में पूरी तरह हटा दिया गया है। वह अब पुस्तक में मौजूद ही नहीं है।

यह पिछले सभी अनाथ-संदर्भों से भिन्न है — बाकी में अध्याय खिसका था; यहाँ अध्याय गायब है। विद्यार्थी कहीं भी ‘वर्चस्व का सांस्कृतिक अर्थ’ नहीं ढूँढ पाएँगे।

✓ कक्षा में यह कमी भरिए — नीचे खंड 4.2 में उस अवधारणा का सार दिया गया है, ताकि विद्यार्थी को पूर्वापेक्षित ज्ञान मिल जाए।

अध्याय की संरचना

क्रमखंडपृष्ठ
—पोस्टर — विश्व सामाजिक मंच : एक मुक्त आकाश99
—परिचय99
1वैश्वीकरण की अवधारणा100–102
2वैश्वीकरण के कारण102–103
3राजनीतिक प्रभाव103–104
4आर्थिक प्रभाव104–106
5सांस्कृतिक प्रभाव106–108
—बॉक्स — उफ! फिर से एक हिंदुस्तानी108
6भारत और वैश्वीकरण108–109
7वैश्वीकरण का प्रतिरोध109–111
8भारत और वैश्वीकरण का प्रतिरोध111
—आओ मिलजुल कर करें110
—प्रश्नावली — प्रश्न 1 से 11112
—अंत-सामग्री — राजनीतिक विश्व का मानचित्र; सतत विकास लक्ष्य (SDGs) का पोस्टर—

पोस्टर — विश्व सामाजिक मंच : एक मुक्त आकाश (पृ. 99)

केंद्र में नारा: ★★“एक और दुनिया मुमकिन है” (स्रोत: गोबर टाइम्स, डाउन टू अर्थ के पोस्टर पर आधारित)

पोस्टर में मंच के भीतर की बहसें (सफ़ेद बुलबुले):

  • “एक ओर पुराने किस्म की सतही वामपंथी राजनीति है और दूसरी ओर अलग-अलग रंगों वाली अराजकतावादी ताकतें हैं। इनका साझे मुद्दों पर सघन रूप से एक होना नामुमकिन है।”
  • “कोमिन्टर्न जैसा संगठन बनाना खतरनाक होगा जो समूचे आंदोलन का प्रवक्ता और केंद्र बनने की कोशिश करे।”
  • “क्या पूँजीवाद को खत्म करने का इकलौता तरीका सर्वसत्तावादी तानाशाही है।”
  • “नवउदारवाद नई बोतल में पुरानी शराब है। यह पूँजीवाद का खतरनाक रूप है। इसे हर कीमत पर खत्म कर देना चाहिए। क्या यह कुछ अच्छा भी हो सकता है? हम भी उतने ही भ्रमित हैं जितने की आप।”
  • “विकल्पों की खोज और निर्माण की लगातार चलने वाली यह प्रक्रिया बहुलता और विविधता भरी होगी। इसका संदर्भ गैर दलीय और गैर सरकारी होगा।”
  • “सच्ची समाजवादी व्यवस्था केवल संघर्ष से लाई जा सकती है; अंतहीन और निरर्थक बहसों से नहीं।”

! लाल पैनल — मंच की तीखी आलोचना:

  • “बेहतर है कि मुंबई प्रतिरोध 2004 तथाकथित विश्व सामाजिक मंच का विरोध कर रहा है। मुंबई प्रतिरोध ने विश्व सामाजिक मंच के अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों तथा साम्राज्यवादी देशों और बड़े व्यापार के धन पर इसकी निर्भरता को उजागर किया है।”
  • “विश्व सामाजिक मंच साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और युद्ध के खिलाफ पनप रहे जुझारूपन को पटरी से उतारना और अपने में हजम कर लेना चाहता है। …संघर्ष को सुधारवाद की तरफ मोड़ना चाहता है।”
  • ! “एन.जी.ओ. साम्राज्यवाद के दलाल हैं। ये जनता को भरमाते-बरगालते हैं और भ्रष्ट करते हैं।”

★★कक्षा के लिए: यह पोस्टर पूरे अध्याय की भूमिका है — वैश्वीकरण-विरोध भी एकजुट नहीं है; उसके भीतर भी उतनी ही बहस है। इसे पहले दिन दिखाइए।

परिचय (पृ. 99)

  • ★“पुस्तक के इस अंतिम अध्याय में हम वैश्वीकरण पर बात करेंगे।”
  • “वैश्वीकरण की चर्चा इस पुस्तक के कई अध्यायों में और कई विषयों की पुस्तक में की गई है।”
  • अध्याय की योजना — पाँच चरण:
    1. “शुरुआत वैश्वीकरण की अवधारणा के विश्लेषण और इसके कारणों की जाँच से करेंगे।”
    2. “इसके बाद हम वैश्वीकरण के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिणामों की बात करेंगे।”
    3. ★“हमारी दिलचस्पी यह समझने में भी है कि वैश्वीकरण का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा है और भारत वैश्वीकरण को कैसे प्रभावित कर रहा है।”
    4. “आखिर में हम वैश्वीकरण को लेकर होने वाले प्रतिरोध पर नज़र डालेंगे”
    5. “और जानेंगे कि कैसे भारत के सामाजिक आंदोलन इस प्रतिरोध का हिस्सा हैं।”

1. वैश्वीकरण की अवधारणा (पृ. 100–102)

1.1 तीन कहानियाँ — जिनसे अध्याय शुरू होता है★★

कहानीक्या दिखाती है
★जनार्दनकॉल-सेंटर में काम करता है। “वह देर दोपहर में काम के लिए निकलता है; दफ्तर में घुसने के साथ ही वह जॉन बन जाता है; नया लहजा अख़्तियार कर लेता है और हजारों किलोमीटर दूर बसे अपने ग्राहकों से बात करने के लिए एक नयी भाषा बोलने लगता है।” ★“जनार्दन की छुट्टियाँ भी भारतीय कैलेंडर से नहीं बल्कि अमरीका के कैलेंडर से मेल खाती हैं जहाँ उसके ग्राहक रहते हैं।” → सेवाओं का वैश्वीकरण
★रामधारीबेटी के जन्मदिन पर साइकिल खरीदी “जो बनी तो चीन में थी लेकिन बिक भारत में रही है।” पिछले साल ‘बार्बी डॉल’ खरीदी थी “जो दरअसल संयुक्त राज्य अमरीका में बनी थी और भारत में बिक रही थी।” → वस्तुओं की आवाजाही
★सारिका“अपने परिवार में पहली पीढ़ी की शिक्षित है… अब उसे नौकरी करने और एक स्वतंत्र कॅरिअर की शुरुआत करने का अवसर हाथ लगा है। ऐसे अवसर के बारे में उसके परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं।” ! “सारिका के रिश्तेदारों में से कुछ इस नौकरी का विरोध कर रहे हैं”, पर उसने नौकरी करने का फ़ैसला किया। → ★★जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा

★पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष: “सारिका के सामने जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा की स्थिति है। यह दुविधा अंशत: उन अवसरों के कारण पैदा हुई है जो उसके परिवार की महिलाओं को पहले उपलब्ध नहीं थे लेकिन आज वे एक सच्चाई हैं और जिन्हें व्यापक स्वीकृति मिल रही है।”

1.2 और फिर पाँच उलटे उदाहरण★★

पाठ्यपुस्तक तुरंत संतुलन बनाती है — “नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं… ये उदाहरण ऊपर के उदाहरणों से कुछ अलग हैं।”

  1. ! “फसल के मारे जाने से कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महंगे बीज खरीदे थे।”
  2. “यूरोप स्थित एक बड़ी और अपनी प्रतियोगी कंपनी को एक भारतीय कंपनी ने खरीद लिया जबकि खरीदी गई कंपनी के मालिक इस खरीददारी का विरोध कर रहे थे।”
  3. ★“अनेक खुदरा दुकानदारों को भय है कि अगर कुछ बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने देश में खुदरा दुकानों की अपनी शृंखला खोल ली तो उनकी रोजी-रोटी जाती रहेगी।”
  4. “मुम्बई के एक फिल्म-निर्माता पर आरोप लगे कि उसने हॉलीवुड में बनी एक फिल्म की कहानी उठाकर अपनी फिल्म बना ली है।”
  5. ! “पश्चिमी परिधान पहनने वाली कॉलेज की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन ने अपने एक बयान में धमकी दी है।”

★★इनसे निकलने वाले तीन निष्कर्ष — ये तीनों परीक्षा में काम आते हैं:

  1. “वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता; लोगों पर इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं।”
  2. ★“दरअसल ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो मानते हैं कि वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं।”
  3. ★★“वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा और ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।”

1.3 परिभाषा — ‘प्रवाह’ और ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’★★

  • “एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह।”
  • ★★चार प्रवाह:
    1. “विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना”
    2. “पूँजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना”
    3. “वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना और उनका व्यापार”
    4. “बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही”
  • ★★सबसे ज़रूरी बात: “यहाँ सबसे ज़रूरी बात है ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है।”

1.4 बहुआयामी अवधारणा — यह प्रश्न 1 का उत्तर है★★

★★“वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए।”

  • ! “यह मान लेना ग़लत है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक परिघटना है।”
  • ! “ठीक इसी तरह यह मान लेना भी भूल होगी कि वैश्वीकरण एकदम सांस्कृतिक परिघटना है।”

1.5 प्रभाव विषम है — यह प्रश्न 2 का उत्तर है★★

★★“वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा है — यह कुछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित कर रहा है।”

  • ★इसलिए चेतावनी: “ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि विशिष्ट संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना हम वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज करें।”

साइड-टिप्पणियाँ (पृ. 100–102):

  • “बहुत-से नेपाली मजदूर काम करने के लिए भारत आते हैं। क्या यह वैश्वीकरण है?”
  • “भारत में बिकने वाली चीन की बनी बहुत-सी चीजें तस्करी की होती हैं। क्या वैश्वीकरण के चलते तस्करी होती है?”
  • ★“क्या साम्राज्यवाद का ही नया नाम वैश्वीकरण नहीं है? हमें नये नाम की ज़रूरत क्यों है?”

2. वैश्वीकरण के कारण (पृ. 102–103)

2.1 क्या इसमें कुछ नया है?★

  • “अगर इन चार तरह के प्रवाहों की ही बात है तो फिर वैश्वीकरण मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है।”
  • ★★तो नया क्या है: “जो लोग तर्क देते हैं कि समकालीन वैश्वीकरण के साथ कुछ ख़ास बात है, वे ध्यान दिलाते हैं कि नयी बात है इन प्रवाहों की गति और इनके प्रसार का धरातल। ये दोनों बातें मौजूदा वैश्वीकरण को अनूठा बनाती हैं।”
  • “वैश्वीकरण का एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है इसलिए ज़रूरी है कि हम इन प्रवाहों को इतिहास के संदर्भ में देखें।”

2.2 प्रौद्योगिकी — ‘अपरिहार्य कारण’(यह प्रश्न 3 और 7 का उत्तर है)★★

  • ★★“हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं, फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।”
  • ★“इसमें कोई शक नहीं कि टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।”
  • ★★ऐतिहासिक समानांतर — यह उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण है: “शुरू-शुरू में जब छपाई (मुद्रण) की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तरह आज हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि प्रौद्योगिकी का प्रभाव हमारे सोचने के तरीके पर पड़ेगा।”
  • ★“हम अपने बारे में जिस ढंग से सोचते हैं और हम सामूहिक जीवन के बारे में जिस तर्ज़ पर सोचते हैं — प्रौद्योगिकी का उस पर असर पड़ेगा।”

2.3 प्रवाहों की गति में अंतर★

  • “विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण संभव हुई है।”
  • ★★“इन प्रवाहों की गति में अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए विश्व के विभिन्न भागों के बीच पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में ज्यादा तेज और व्यापक होगी।”

2.4 केवल तकनीक नहीं — ‘जुड़ाव की चेतना’★★

  • ! “बहरहाल, संचार-साधनों की तरक्की और उनकी उपलब्धता मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में आया हो — ऐसी बात नहीं।”
  • ★★“यहाँ ज़रूरी बात यह है कि विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं।”
  • ★“आज हम इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक हिस्से में घटने वाली घटना का प्रभाव विश्व के दूसरे हिस्से में भी पड़ेगा।”
  • ★दो उदाहरण: “बर्ड फ्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते। ये घटनाएँ राष्ट्रीय-सीमाओं का जोर नहीं मानतीं।”
  • “ठीक इसी तरह जब बड़ी आर्थिक घटनाएँ होती हैं तो उनका प्रभाव उनके मौजूदा स्थान अथवा क्षेत्रीय परिवेश तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्व भर में महसूस किया जाता है।”

कार्टून (पृ. 102): ‘डिजीटल अर्थव्यवस्था का महाचक्र’ — डॉलर के नोट से बना कंप्यूटर।

3. राजनीतिक प्रभाव (पृ. 103–104)★★

“राज्य की संप्रभुता की परंपरागत धारणा पर वैश्वीकरण का असर कैसे होता है? इस सवाल का जवाब देते समय हमें कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा।”

3.1 पहला पहलू — राज्य की क्षमता में कमीध्यान

  • ★“सबसे सीधा-सरल विचार यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत में कमी आती है।”
  • ★★“पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है।”
  • ★“राज्य अब कुछेक मुख्य कामों तक ही अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना।”
  • ! “इस तरह के राज्य ने अपने को पहले के कई ऐसे लोक-कल्याणकारी कामों से खींच लिया है जिनका लक्ष्य आर्थिक और सामाजिक-कल्याण होता था।”
  • ★★“लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।”
  • ★“पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता में कमी आती है।”

3.2 दूसरा पहलू — पर राज्य की प्रधानता को चुनौती नहीं मिली★★

  • ★“वैश्वीकरण से हमेशा राज्य की ताकत में कमी आती हो — ऐसी बात नहीं।”
  • ★★“राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है और राज्य इस अर्थ में आज भी प्रमुख है।”
  • “विश्व की राजनीति में अब भी विभिन्न देशों के बीच मौजूद पुरानी ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता की दखल है।”
  • ★“राज्य कानून और व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अपने अनिवार्य कार्यों को पूरा कर रहे हैं और बहुत सोच-समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मर्जी हो।”
  • ★★“राज्य अभी भी महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।”

3.3 तीसरा पहलू — बल्कि राज्य की ताकत बढ़ी भी है★★

★★“वस्तुत: कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है।”

  • ★“अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं।”
  • ★“इस सूचना के दम पर राज्य ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। उनकी क्षमता बढ़ी है; कम नहीं हुई।”
  • ★★“इस प्रकार नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं।”

★★कक्षा के लिए: यह खंड जान-बूझकर तीन-स्तरीय है। पाठ्यपुस्तक एकतरफा निष्कर्ष नहीं देती — राज्य कमज़ोर भी हुआ, बना भी रहा, और मज़बूत भी हुआ। यही प्रश्न 8 का पूरा उत्तर है।

कार्टून (पृ. 104): ‘वैश्वीकरण के खतरे?’ — ‘कल’ और ‘आज’

कलआज
“अपना खाना जल्दी खत्म करो। चीन और भारत के भूखे लोग तुम्हारा खाना खा जाएंगे…”“अपना होमवर्क जल्दी पूरा करो। चीन और भारत के लोग तुम्हारी नौकरी खा जाएँगें…”

4. आर्थिक प्रभाव (पृ. 104–106)★★

4.1 परिभाषा की समस्या

  • “जैसे ही आर्थिक वैश्वीकरण का उल्लेख होता है, हमारा ध्यान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं तथा विश्व भर में आर्थिक नीतियों के निर्धारण में इनके द्वारा निभायी गई भूमिका पर जाता है।”
  • ! “हालाँकि वैश्वीकरण को इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। आर्थिक वैश्वीकरण में इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के अलावा भी कई खिलाड़ी शामिल हैं।”
  • ★★सही कसौटी: “आर्थिक वैश्वीकरण को अधिक व्यापक नजर से समझने के लिए हमें इससे होने वाले आर्थिक फायदों के बँटवारे के अर्थ में सोचना चाहिए — यानी इस संदर्भ में कि किसे वैश्वीकरण से सबसे ज्यादा फायदा हुआ और किसे सबसे कम। यह भी देखने की ज़रूरत है कि वैश्वीकरण के कारण किसने नुकसान उठाया।”

4.2 आर्थिक प्रवाहों की स्थिति★

  • “अमूमन जिस प्रक्रिया को आर्थिक वैश्वीकरण कहा जाता है उसमें दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है।”
  • !★“कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं।”
प्रवाहस्थिति
वस्तुओं का व्यापार★“वैश्वीकरण के चलते पूरी दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में इजाफा हुआ है; अलग-अलग देश अपने यहाँ होने वाले आयात पर प्रतिबंध लगाते थे लेकिन अब ये प्रतिबंध कम हो गए हैं।”
पूँजी★“दुनिया भर में पूँजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध हैं।” व्यावहारिक अर्थ — “धनी देश के निवेशकर्ता अपना धन अपने देश की जगह कहीं और निवेश कर सकते हैं, खासकर विकासशील देशों में जहाँ उन्हें ज्यादा मुनाफा होगा।”
विचार★“वैश्वीकरण के चलते अब विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही, उनका प्रवाह अबाध हो उठा है। इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका एक उदाहरण है।”
!★★लोग“लेकिन वैश्वीकरण के कारण जिस सीमा तक वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ सकी है।” — कारण: ★“विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक विकसित देशों में आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।”

★★यह असमानता उत्तर में ज़रूर लिखिए — यह आर्थिक वैश्वीकरण की सबसे बड़ी विषमता है: पूँजी और वस्तु के लिए सीमाएँ खुलीं, लोगों के लिए नहीं।

4.3 एक ही नीति, अलग-अलग परिणामध्यान

  • ★“वैश्वीकरण के परिणामों पर सोचते हुए हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर जगह एक समान नीति अपना लेने का मतलब यह नहीं होता कि हर जगह परिणाम भी समान होंगे।”
  • “वैश्वीकरण के कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारों ने एकसार आर्थिक नीतियों को अपनाया है, लेकिन विश्व के विभिन्न भागों में इसके परिणाम बहुत अलग-अलग हुए हैं।”
  • ★“यहाँ भी हमें सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने के बजाय संदर्भ-विशेष पर ध्यान देना होगा।”

4.4 जनमत का बँटवारा — दोनों पक्ष★★

“आर्थिक वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराई से बँट गया है।”

! आलोचकों का पक्ष (सामाजिक न्याय के पक्षधर):

  • “आर्थिक वैश्वीकरण से आबादी के एक बड़े छोटे तबके को फायदा होगा जबकि नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई की सुविधा आदि) के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जाएँगे।”
  • ★★समाधान की माँग — ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’: “कुछ सांस्थानिक उपाय किए जाने चाहिए, या कहें कि ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ तैयार किया जाना चाहिए ताकि जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके।”
  • ! पर और तीखी आवाज़ भी है: “दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि ‘सामाजिक सुरक्षा-कवच’ की बात अव्यावहारिक है और इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा।” — ये आंदोलन “बलपूर्वक किए जा रहे वैश्वीकरण को रोकने” की आवाज़ उठाते हैं।
  • ★★सबसे तीखा वाक्य: “कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ कहा है।”

✓ समर्थकों का पक्ष:

  • “इससे समृद्धि बढ़ती है और ‘खुलेपन’ के कारण ज्यादा से ज्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है।”
  • “व्यापार की बढ़ती से हर देश को अपना बेहतर कर दिखाने का मौका मिलता है। इससे पूरी दुनिया को फायदा होगा।”
  • ★“आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं।”

⚖️ मध्यमार्गी समर्थकों का पक्ष:

  • ★★“वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।”

4.5 निष्कर्ष★

“बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ्तार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।”

साइड-टिप्पणी (पृ. 106): ★“जब हम सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात करते हैं तो इसका सीधा-सादा मतलब होता है कि कुछ लोग तो वैश्वीकरण के चलते बदहाल होंगे ही! तभी तो सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात की जाती है। है न?”

5. सांस्कृतिक प्रभाव (पृ. 106–108)★★

5.1 यह हमें कहाँ छूता है

  • ★“वैश्वीकरण के परिणाम सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक दायरों में ही नज़र नहीं आते; हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं।”
  • ★★“हम जो कुछ खाते-पीते-पहनते हैं अथवा सोचते हैं — सब पर इसका असर नज़र आता है। हम जिन बातों को अपनी पसंद कहते हैं वे बातें भी वैश्वीकरण के असर में तय होती हैं।”

5.2 सांस्कृतिक समरूपता — और उसका असली अर्थध्यान

  • “वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी। वैश्वीकरण से यह होता है क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है।”
  • ★★पर सावधानी: “सांस्कृतिक समरूपता का यह अर्थ नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है। विश्व- संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।”
  • !! अनाथ-संदर्भ यहीं है: “हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।” — वह अध्याय अब पुस्तक में नहीं है। (नीचे 5.5 देखिए)
  • ★उदाहरण: “कुछ लोगों का तर्क है कि बर्गर अथवा नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है।”
  • ★★“जो यह तर्क देते हैं वे अक्सर दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं। उनका मानना है कि विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं।”
  • ★खतरा किसके लिए: “चूँकि इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे खत्म होती है इसलिए यह केवल गरीब देशों के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए खतरनाक है।”

5.3 पर दूसरा पक्ष — यह मान लेना भी भूल है★★

★★“इसके साथ-साथ यह मान लेना एक भूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं।”

  • ★“संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती। हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करते रहती है।”
  • “कुछ बाहरी प्रभाव नकारात्मक होते हैं क्योंकि इससे हमारी पसंदों में कमी आती है।”
  • ★“कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है तो कभी इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।”
  • ★★दो सुंदर उदाहरण — कक्षा में ज़रूर दीजिए:
    1. “बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है इसलिए बर्गर से वस्तुत: कोई खतरा नहीं है। इससे हुआ मात्र इतना है कि हमारे भोजन की पसंद में एक चीज़ और शामिल हो गई है।”
    2. ★★“दूसरी तरफ, नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है। यहाँ हम बाहरी प्रभाव से एक अनूठी बात देखते हैं कि नीली जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता पहना जा रहा है। मज़ेदार बात तो यह है कि इस अनूठे पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।”

5.4 सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण — यह प्रश्न 10 का उत्तर है★★

★★“सांस्कृतिक समरुपता वैश्वीकरण का एक पहलू है तो वैश्वीकरण से इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है। वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।”

  • ! पर संतुलन के साथ: “इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में उनकी ताकत का सवाल गौण है, परंतु इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफा नहीं होता।”

5.5 ✓ अनाथ-संदर्भ की भरपाई — ‘वर्चस्व का सांस्कृतिक अर्थ’

चूँकि वह अध्याय हटा दिया गया है, कक्षा में यह सार दे दीजिए:

‘वर्चस्व’ (Hegemony) के तीन अर्थ होते हैं —

  1. सैन्य वर्चस्व — बल का असंतुलन
  2. संरचनात्मक वर्चस्व — वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम बनाने की क्षमता
  3. ★★सांस्कृतिक वर्चस्व — जब किसी शक्ति के विचार, मूल्य और जीवन-शैली इतने सामान्य लगने लगें कि उनका विकल्प ही सोचा न जा सके। यहाँ सहमति बल से नहीं, आकर्षण से पैदा होती है।

★यही ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ और ‘नीली जीन्स’ वाले उदाहरणों का सैद्धांतिक आधार है।

साइड-टिप्पणियाँ (पृ. 107–108):

  • ★“हम पश्चिमी संस्कृति से क्यों डरते हैं? क्या हमें अपनी संस्कृति पर विश्वास नहीं है?”
  • “यह बात तो सही है कि कभी-कभी मुझे नए गीत अच्छे लगते हैं। क्या हम सबको थोड़ा नृत्य करना अच्छा नहीं लगता भले ही बजायी जा रही धुन पर पश्चिमी संगीत का असर हो?”
  • गतिविधि: “अपनी भाषा की सभी जानी-पहचानी बोलियों की सूची बनाएँ। अपने दादा की पीढ़ी के लोगों से इस बारे में सलाह लीजिए। कितने लोग आज इन बोलियों को बोलते हैं?”

कार्टून (पृ. 106): ‘नए बाज़ारों पर कब्जा’ — मिकी माउस और कोक-कोला के डिब्बों के साथ सैनिक-आक्रमण का दृश्य (एंडी सिंगर)।

बॉक्स — उफ! फिर से एक हिंदुस्तानी (पृ. 108)★

‘कॉल सेन्टर की कहानी एक कर्मचारी की ज़बानी’

  • ★“कॉल-सेन्टर में काम करना अपने आप में आँख खोल देने वाला साबित हो सकता है। आप अमरीकियों के फोन-कॉल निबटाते हैं और आपको असली अमरीकी संस्कृति की एक झलक मिलती है। एक औसत अमरीकी हमारी अपेक्षा से कहीं ज्यादा जीवंत और ईमानदार होता है…”
  • ! “बहरहाल, हर फोन कॉल या बातचीत खुशगवार नहीं होती। आपके पास अविवेकी और बदज़बान लोगों के भी फोनकॉल आते हैं। ‘कॉल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, यह जानकर फोन करने वाले का लहजा कभी-कभी नफ़रत से भर उठता है और उससे निबटना बहुत तनाव का काम होता है।”
  • ! “अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो…”
  • ★★“आपको कुछ फोन ऐसे भी अटेंड करने होते हैं जिनकी शुरुआत इस पंक्ति से होती है — ‘चंद मिनट पहले मैंने एक दक्षिण अफ्रीकी से बात की और अब एक हिन्दुस्तानी से मुखातिब हूँ’ या “आह री किस्मत! फिर एक हिन्दुस्तानी! प्लीज किसी अमरीकी से बात कराइए…!” ऐसी स्थिति में सामने वाले से पटरी बैठाना मुश्किल होता है।”

(स्रोत: 10 जनवरी 2005 के ‘द हिंदू’ में रंजीता उर्स की रिपोर्ट)

★★कक्षा के लिए: यह बॉक्स जनार्दन की कहानी का दूसरा पहलू है — वैश्वीकरण ने अवसर दिया, पर पहचान की कीमत पर। इसे पृ. 100 की कहानी के साथ पढ़ाइए।

6. भारत और वैश्वीकरण (पृ. 108–109)

6.1 यह नया नहीं है★

  • “हमने पहले इशारा किया था कि दुनिया के विभिन्न भागों में वैश्वीकरण इतिहास की विभिन्न कालावधियों में पहले भी हो चुका है।”
  • ★“पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है।”

6.2 औपनिवेशिक दौरध्यान

★★“औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था।”

6.3 आज़ादी के बाद — ‘संरक्षणवाद’★

  • “आज़ादी हासिल करने के बाद, ब्रिटेन के साथ अपने इन अनुभवों से सबक लेते हुए हमने फ़ैसला किया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए।”
  • “हमने यह भी फ़ैसला किया कि दूसरों देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों को बनाना सीख सकें।”
  • !★“इस ‘संरक्षणवाद’ से कुछ नयी दिक्कतें पैदा हुईं। कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई तो कुछ ज़रूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे।”
  • ! “भारत में आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।”

6.4 1991 — मोड़★★

  • “1991 में, वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई।”
  • “इसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं। इन क्षेत्रों में व्यापार और विदेशी निवेश भी शामिल थे।”

6.5 और वह कसौटी जो पूरे अध्याय का नैतिक निष्कर्ष है★★

★★“यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है, क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।”

★यह वाक्य बोर्ड पर लिखवाइए — प्रश्न 9 और 11 दोनों का केंद्र यही है।

7. वैश्वीकरण का प्रतिरोध (पृ. 109–111)★★

7.1 दो तरह के आलोचक — यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है

पक्षतर्क
★★वामपंथी आलोचक“मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूंजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज्यादा ग़रीब बनाती है।” और — “राज्य के कमजोर होने से गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।”
★★दक्षिणपंथी आलोचकराजनीतिक अर्थों में — “राज्य के कमजोर होने की चिंता”; “वे चाहते हैं कि कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ का दौर फिर कायम हो।” सांस्कृतिक संदर्भ में — “परंपरागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो देंगे।”

★★कक्षा में यह ज़रूर बताइए: दोनों ‘राज्य के कमजोर होने’ से चिंतित हैं — पर कारण अलग हैं। वामपंथी को गरीबों की रक्षा की चिंता; दक्षिणपंथी को संस्कृति और आत्मनिर्भरता की।

7.2 और एक बहुत ज़रूरी बारीकी★★

★★“यहाँ हम गौर करें कि वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटवर्क में भागीदारी करते हैं और अपने से मिलती-जुलती सोच रखने वाले दूसरे देशों के लोगों से गठजोड़ करते हैं।”

★★“वैश्वीकरण-विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।”

★यह वाक्य परीक्षा में बहुत काम आता है — विरोध ‘वैश्वीकरण’ का नहीं, ‘नव-उदारवादी वैश्वीकरण’ का है।

7.3 सिएट्ल, 1999★

  • “1999 में, सिएट्ल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक हुई। यहाँ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए।”
  • “आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों को अपनाने के विरोध में ये प्रदर्शन हुए थे।”
  • ★“विरोधियों का तर्क था कि उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।”

7.4 वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF)★★

तथ्यविवरण
क्या है★“नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्व-व्यापी मंच”
★कौन शामिल“मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं”
★★पहली बैठक2001, ब्राजील के पोर्तो अलेग्रे में
★चौथी बैठक2004 में मुंबई में
★हाल की बैठकनेपाल में, फरवरी 2024

8. भारत और वैश्वीकरण का प्रतिरोध (पृ. 111)

  • “सामाजिक आंदोलनों से लोगों को अपने पास-पड़ोस की दुनिया को समझने में मदद मिलती है। लोगों को अपनी समस्याओं के हल तलाशने में भी सामाजिक आंदोलनों से मदद मिलती है।”
  • ★“भारत में वैश्वीकरण का विरोध कई हलकों से हो रहा है।”

8.1 वामपंथी विरोध★

  • “आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से उठी हैं तो इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से भी।”
  • ★“औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।”
  • ★★“कुछ वनस्पतियाँ मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फर्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध हुआ।”

8.2 दक्षिणपंथी विरोध★

“वैश्वीकरण का विरोध राजनीति के दक्षिणपंथी खेमों से भी हुआ है। यह खेमा विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है, जिसमें शामिल है —

  • “केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों” का विरोध
  • “वैलेन्टाईन-डे मनाने” का विरोध
  • “स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि” तक का विरोध

आओ मिलजुल कर करें (पृ. 110)

उद्देश्य: “ऐसी गतिविधियों से छात्रों को यह समझने में मदद मिलेगी कि वैश्वीकरण ने कैसे हमारे जीवन में प्रवेश किया है और वैश्वीकरण का सर्वव्यापी प्रभाव व्यक्ति, समुदाय तथा राष्ट्रों पर किस तरह पड़ा है।”

चरण:

  1. “कुछ उत्पादों की सूची बनाएँ — मसलन खाद्य-उत्पाद, बिजली से चलने वाले घरेलू इस्तेमाल के उपकरण और सुख-सुविधा के ऐसे सामान जिनसे आप परिचित हैं।”
  2. “अपने पसंदीदा टी.वी. कार्यक्रमों के नाम लिखें।”
  3. “अध्यापक इस सूची को एकत्र करें और एक साथ मिलायें।”
  4. “कक्षा को छोटे-छोटे समूह में बाँटें और प्रत्येक समूह को वस्तुओं तथा टी.वी. कार्यक्रमों की कुछ सूची दें।”
  5. “छात्रों से इन वस्तुओं के निर्माताओं और अपने पसंदीदा टीवी कार्यक्रमों के प्रायोजकों के नाम बताने को कहें।”
  6. ★★“अध्यापक इन उत्पादों के निर्माताओं को तीन वर्गों में सूचीबद्ध करें: (1) पूर्णतया विदेशी कंपनी (2) पूर्णतया भारतीय और (3) साझेदारी में काम करने वाली कंपनियाँ।”
  7. ★अपेक्षित निष्कर्ष: “इस वर्गीकरण से यह तथ्य सामने आएगा कि छात्रों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अधिकांश उत्पादों की बिनिर्माता कंपनियाँ विदेशी हैं जो स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर इन वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। शेष दो कोटियों के अंतर्गत आनेवाले उत्पाद अपेक्षतया कम हैं।”

अध्यापकों के लिए:

  • “छात्रों को किन्हीं चार भारतीय कंपनियों के बारे में बताएँ जो विभिन्न उद्योगों में विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रही हैं और जिनके ठिकाने दूसरे देशों में भी हैं।”
  • ! “छात्रों का ध्यान वैश्वीकरण के दूसरे पहलू पर भी खींचें। विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ा है वैसे-वैसे हमारे छोटे स्वदेशी उद्योगों के ग्राहक कम हुए हैं और ये उद्योग बंद हो रहे हैं।”
  • ”…विश्व-व्यापार संगठन से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद दुनिया भर में इसके विरुद्ध धरना और विरोध-प्रदर्शन हुए। छात्रों को इनकी जानकारी दें।”

1. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है? (क) वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक परिघटना है। (ख) वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई। (ग) वैश्वीकरण और पश्चिमीकरण समान हैं। (घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।

2. वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में कौन-सा कथन सही है? (क) विभिन्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है। (ख) सभी देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव समान रहा है। (ग) वैश्वीकरण का असर सिर्फ राजनीतिक दायरे तक सीमित है। (घ) वैश्वीकरण से अनिवार्यतया सांस्कृतिक समरूपता आती है।

3. वैश्वीकरण के कारणों के बारे में कौन-सा कथन सही है? (क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है। (ख) जनता का एक खास समुदाय वैश्वीकरण का कारण है। (ग) वैश्वीकरण का जन्म संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ। (घ) वैश्वीकरण का एकमात्र कारण आर्थिक धरातल पर पारस्परिक निर्भरता है।

4. वैश्वीकरण के बारे कौन-सा कथन सही है? (क) वैश्वीकरण का संबंध सिर्फ वस्तुओं की आवाजाही से है। (ख) वैश्वीकरण में मूल्यों का संघर्ष नहीं होता। (ग) वैश्वीकरण के अंग के रूप में सेवाओं का महत्त्व गौण है। (घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।

5. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन ग़लत है? (क) वैश्वीकरण के समर्थकों का तर्क है कि इससे आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी। (ख) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे आर्थिक असमानता और ज्यादा बढ़ेगी। (ग) वैश्वीकरण के पैरोकारों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी। (घ) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।

6. विश्वव्यापी ‘पारस्परिक जुड़ाव’ क्या है? इसके कौन-कौन से घटक हैं?

7. वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है?

8. वैश्वीकरण के संदर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें?

9. वैश्वीकरण की आर्थिक परिणतियाँ क्या हुई हैं? इस संदर्भ में वैश्वीकरण ने भारत पर कैसे प्रभाव डाला है।?

10. क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि वैश्वीकरण से सांस्कृतिक विभिन्नता बढ़ रही है?

11. वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया है और भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?

उत्तर देखिए

उत्तर-कुंजी: पाठ्यपुस्तक में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है और कोई सारांश खंड भी नहीं है। उत्तर 05-Question-Bank.md में शिक्षक द्वारा तैयार हैं।

शब्दावली

पदअंग्रेज़ीअध्याय में प्रयुक्त अर्थ
★★वैश्वीकरणGlobalization“एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह”; और सबसे ज़रूरी — ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’
★★चार प्रवाहFlowsविचार · पूँजी · वस्तु · लोग
★★विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ावWorldwide interconnectedness“जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है”
★★बहुआयामी परिघटनाMultidimensional phenomenon“इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए”
★विषम प्रभावUneven impact“यह कुछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित कर रहा है”
★★कल्याणकारी राज्यWelfare state“पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है”
★★न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्यMinimalist state“राज्य अब कुछेक मुख्य कामों तक ही अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था तथा नागरिकों की सुरक्षा”
★बहुराष्ट्रीय निगमMultinational corporations“पूरे विश्व में अपने पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है”
★सामाजिक सुरक्षा कवचSocial safety net“ताकि जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके”
★★पुन:उपनिवेशीकरणRe-colonisation“कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का पुन:उपनिवेशीकरण कहा है”
★संरक्षणवादProtectionismआज़ादी के बाद भारत की नीति — “दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए”
★★सांस्कृतिक समरूपताCultural homogenisation! “इसका यह अर्थ नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है। विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है”
★★मैक्डोनॉल्डीकरणMcDonaldisation“विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं”
★★सांस्कृतिक वैभिन्नीकरणCultural heterogenisation“वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है”
★नव-उदारवादी वैश्वीकरणNeo-liberal globalizationजिसका विरोध वर्ल्ड सोशल फोरम करता है
★★वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF)World Social Forumपहली बैठक 2001, पोर्तो अलेग्रे (ब्राजील); चौथी 2004 मुंबई; हाल की फरवरी 2024 नेपाल
★इंडियन सोशल फोरमIndian Social Forumभारत में वैश्वीकरण-विरोध का मंच
★सिएट्ल, 1999SeattleWTO की मंत्री-स्तरीय बैठक; बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन
IMF / WTOअंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष / विश्व व्यापार संगठनआर्थिक वैश्वीकरण से सबसे पहले जुड़े नाम

मुख्य तिथियाँ और तथ्य

मानसंदर्भ
★★चार प्रवाहविचार · पूँजी · वस्तु · लोग
★तीन आयामराजनीतिक · आर्थिक · सांस्कृतिक
★★तीन राजनीतिक पहलूक्षमता में कमी · प्रधानता को चुनौती नहीं · ताकत में इजाफा
★प्रौद्योगिकी“अपरिहार्य कारण” — टेलीग्राफ, टेलीफोन, माइक्रोचिप
★छपाई और राष्ट्रवाद“जब छपाई की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी”
★1991भारत में आर्थिक-सुधारों की शुरुआत
★1999सिएट्ल — WTO की मंत्री-स्तरीय बैठक और विरोध-प्रदर्शन
★★2001 · 2004 · फरवरी 2024WSF — पहली बैठक (पोर्तो अलेग्रे) · चौथी (मुंबई) · हाल की (नेपाल)
★10 जनवरी 2005कॉल-सेन्टर वाले बॉक्स का स्रोत — द हिंदू, रंजीता उर्स
★‘नीम’जिसके पेटेंट का भारत में कड़ा विरोध हुआ
★मुंबई प्रतिरोध 2004जिसने WSF का ही विरोध किया

भ्रमित करने वाले युग्मध्यान

युग्मभेद
★★वैश्वीकरण बनाम पश्चिमीकरणसमान नहीं — प्रश्न 1 का विकल्प (ग) इसीलिए गलत है
★★सांस्कृतिक समरूपता बनाम वैभिन्नीकरणसमरूपता = सब एक जैसे हो रहे हैं (आलोचकों का तर्क); वैभिन्नीकरण = हर संस्कृति और अलग तथा विशिष्ट हो रही है (उलटा प्रभाव)
! समरूपता किसका तर्क है?★आलोचकों का, पैरोकारों का नहीं — यही प्रश्न 5 का जाल है
★★वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी आलोचकवामपंथी — पूंजीवाद और गरीबों का हित; दक्षिणपंथी — आत्मनिर्भरता, संरक्षणवाद और परंपरागत संस्कृति
★★वैश्वीकरण का विरोध बनाम नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध“बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं” — वे एक खास कार्यक्रम के विरोधी हैं
★कल्याणकारी बनाम न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्यलोक-कल्याण बनाम केवल कानून-व्यवस्था और सुरक्षा
★★पूँजी/वस्तु का प्रवाह बनाम लोगों का प्रवाहपहला बढ़ा; दूसरा नहीं — कारण वीजा-नीति
★WSF बनाम मुंबई प्रतिरोधWSF = नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का मंच; मुंबई प्रतिरोध 2004 = WSF का ही विरोध
★1991 बनाम 1999 बनाम 2001भारत के आर्थिक सुधार · सिएट्ल का विरोध · WSF की पहली बैठक
! “वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई”गलत — 1991 भारत के आर्थिक सुधारों का वर्ष है, वैश्वीकरण का नहीं। (प्रश्न 1 का विकल्प ख)