कक्षा 6 · सामाजिक विज्ञान · NCERT समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, पृ. 105–124 परीक्षा से एक दिन पहले यही पढ़िए। सब कुछ यहाँ है, और क्रम में है।
एक पंक्ति में पूरा अध्याय
भारतीय संस्कृति एक प्राचीन वृक्ष की तरह है — अनेक जड़ें, एक साझा तना, अनेक शाखाएँ। वेद जड़ें हैं; उपनिषद्, बौद्ध और जैन मत शाखाएँ; साझी संकल्पनाएँ तना; और लोक-जनजातीय परंपराएँ वे नई जड़ें, जो शाखाओं से ही बनीं।
! एक बात पहले जान लीजिए: पुस्तक ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग जान-बूझकर नहीं करती। वह ‘दर्शन’, ‘मत’ और ‘विश्वास’ कहती है, क्योंकि “अंग्रेजी का शब्द ‘रिलिजन’ भारतीय सभ्यता के संदर्भ में बहुत सीमित है” (पृ. 118)। उत्तर लिखते समय पुस्तक की यही शब्दावली प्रयोग कीजिए।
1. वृक्ष का रूपक (पृ. 106)
- किसी प्राचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ें और अनेक शाखाएँ हैं।
- जड़ें एक सामान्य तने को पोषण देती हैं; इस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं।
- शाखाएँ: कला · साहित्य · विज्ञान · चिकित्सा · धर्म · शासन पद्धति · मार्शल आर्ट्स — और कुछ दर्शन भी।
- कुछ जड़ें सिंधु या हड़प्पा अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता की ओर जाती हैं (अध्याय 6)।
- “इन्हें तथा इनकी जड़ों को समझकर ही हम ‘इंडिया अर्थात भारत’ को भलीभाँति समझ सकेंगे।”
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आध्यात्मिक | आत्मा से संबंधित; वर्तमान व्यक्तित्व से परे एक गहरे या ऊँचे आयाम की खोज |
| साधक | वह व्यक्ति जो इस दुनिया के सत्य को जानना चाहता है — ऋषि, संत, योगी, दार्शनिक |
2. वेद (पृ. 106–107)★
| बात | विवरण |
|---|---|
| ‘वेद’ शब्द | विद् से — अर्थ ‘ज्ञान’ (जैसे विद्या) |
| चार वेद | ऋग्वेद · यजुर्वेद · सामवेद · अथर्ववेद |
| महत्व | भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ, और विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक |
| सामग्री | हजारों ऋचाएँ — कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ |
| रूप | ★लिखित नहीं थीं — मौखिक पाठ किया जाता था |
| कहाँ रची गईं | सप्तसिंधु क्षेत्र (अध्याय 5) |
| तिथि | “यह कहना कठिन है…” — विशेषज्ञों ने पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. का प्रस्ताव किया है |
| ★★संप्रेषण | 100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण से स्मृतिबद्ध, और बिना किसी विशेष परिवर्तन के आगे संप्रेषित |
! “विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक” — यह ‘में से एक’ मत छोड़िए। पुस्तक यह नहीं कहती कि वे सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं।
यूनेस्को (पृ. 107)★
2008 में यूनेस्को ने वैदिक पाठशैली के इस सुव्यवस्थित संप्रेषण को ‘मानवीयता के मौखिक और अमूर्त विरासत की अनुपम कोटि’ के रूप में मान्यता दी।
यूनेस्को = संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन। यह शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से लोगों और राष्ट्रों के बीच संवाद बढ़ाता है।
रचनाकार और देव (पृ. 107)
- रचना ऋषियों (कवि) और ऋषिकाओं (कवियत्रियाँ) द्वारा, संस्कृत के एक प्रारंभिक रूप में।
- देव: इंद्र · अग्नि · वरुण · मित्र · सरस्वती · उषा और अन्य।
- इन दृष्टाओं के साथ मिलकर देवों ने मानव जीवन और ब्रह्मांड में ऋत या सत्य और क्रम को बनाए रखा।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्मांड | विश्व की सुव्यवस्थित और संतुलित संरचना |
| ऋत | सत्य और क्रम |
| वैश्विक दर्शन | विश्व का एक निश्चित दर्शन या समझ, उसका उद्भव या कार्य प्रणाली |
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति (पृ. 107)★★
“परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।”
- आद्य ऋषियों और ऋषिकाओं ने देवताओं और देवियों को अलग नहीं, बल्कि एक ही माना।
- इस वैश्विक दर्शन की मान्यताएँ ‘सत्य’ से आरंभ हुईं — जो ईश्वर का दूसरा नाम था।
- ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में लोगों के बीच एकता का भी आह्वान किया गया।
! इसका अर्थ है ‘परम सत्य की एकता’ — न कि ‘ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता’। अभ्यास का ‘सही या गलत’ प्रश्न 3 यहीं फँसाता है, और उसका उत्तर ग़लत है।
एकता का मंत्र (पृ. 108)
“साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें, एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें… एक हो हमारा उद्देश्य, एक हो हमारा हृदय… हमारे विचार एक हों, अत: सभी सहमत हों।”
3. वैदिक समाज (पृ. 108–109)
- प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न जनों (लोगों का बड़ा समूह) में संगठित था।
- ऋग्वेद में 30 से अधिक जनों की सूची — भरत · पुरु · कुरु · यदु · तुर्वश आदि।
- प्रत्येक जन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग के एक विशेष क्षेत्र से जुड़ा था।
★‘भरत’ — यही वह जन है जिससे अध्याय 5 में ‘भारत’ नाम बना। वहाँ पढ़ा था कि ऋग्वेद में भरत कोई राजा नहीं, एक जन-समूह है।
शासन के संकेत
- बहुत अधिक ज्ञात नहीं है कि ये जन अपने समाज का शासन कैसे चलाते थे।
- वेदों में राजा · सभा · समिति जैसे कुछ शब्दों से ही संकेत मिलते हैं।
- ★“सभा और समिति दोनों शब्द सामूहिकता को इंगित करते हैं।”
व्यवसाय (पृ. 109)
किसान · बुनकर · कुम्हार · शिल्पकार · बढ़ई · आरोग्यकर्ता · नर्तक-नर्तकी · नाई · पुजारी
आरोग्यकर्ता = पारंपरिक प्रथाओं से राहत देने या रोग ठीक करने वाला व्यक्ति।
समय-रेखा (पृ. 108)
| क्या | कब |
|---|---|
| अंकित बिंदु | 1500 सा.सं.पू. · 1000 सा.सं.पू. · 500 सा.सं.पू. · 1 सा.सं. · 500 सा.सं. |
| बुद्ध और महावीर का जन्म | 1000 और 500 सा.सं.पू. के बीच, 500 के अधिक निकट |
| उपनिषद् | लगभग 1500 से 500 सा.सं.पू. तक की पट्टी |
| वैदिक दर्शन | लगभग 700 सा.सं.पू. से आगे |
★पट्टियों के सिरे बिंदुदार हैं — इसका अर्थ है ‘तिथि अनिश्चित’। यह पुस्तक की ईमानदारी है। इन पट्टियों की सटीक तिथियाँ याद करने की आवश्यकता नहीं।
4. वैदिक दर्शन (पृ. 109–110)★
अनुष्ठान
- वैदिक संस्कृति में अनेक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) विकसित हुए, जो व्यक्तिगत अथवा सामूहिक हितों तथा मंगल के लिए समर्पित थे।
- दैनिक अनुष्ठान प्रार्थनाओं तथा अग्नि देव को आहुति के रूप में होते थे — किंतु ये समय के साथ और अधिक जटिल होते चले गए।
उपनिषद् — दो नई संकल्पनाएँ
| संकल्पना | अर्थ |
|---|---|
| पुनर्जन्म | बार-बार जन्म लेना |
| कर्म | हमारे कर्म और कर्म-फल |
वेदांत और ब्रह्म★★
- एक दर्शन, जिसे सामान्यत: ‘वेदांत’ कहा जाता है, के अनुसार सब कुछ — मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड — एक दैवी तत्व है, जिसे ‘ब्रह्म’ अथवा कभी-कभी केवल ‘तत्’ कहा जाता है।
!! ब्रह्म और ब्रह्मा देव अलग हैं। पुस्तक स्वयं कोष्ठक में यह लिखती है। यह इस अध्याय की सबसे आम ग़लती है।
दो प्रसिद्ध मंत्र (पृ. 109)
| मंत्र | अर्थ |
|---|---|
| अहम् ब्रह्मास्मि | “मैं ब्रह्म हूँ” (अर्थात, मैं दिव्य हूँ) |
| तत् त्वम् असि… | “वह ब्रह्म आप ही हैं” |
आत्मन् (पृ. 110)
- उपनिषदों में आत्मन् या स्व की संकल्पना की गई है, जो प्रत्येक जीव में निवास करता है, परंतु ब्रह्म का ही स्वरूप होता है।
- ★“इसके अनुसार इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।”
- सर्वे भवन्तु सुखिन: — “सभी जीव सुखी रहें”; और यह सबके लिए रोग तथा दुख से मुक्ति की कामना करती है।
योग और ‘हिंदू दर्शन’ (पृ. 110)
- प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वेदों से कुछ अन्य दर्शनों का विकास हुआ।
- इनमें से एक था योग, जिसने किसी व्यक्ति की चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने की अनेक विधियाँ विकसित कीं।
- ★“इन सभी दर्शनों से मिलकर कुछ आधारभूत विचार बने, जिन्हें हम आज ‘हिंदू दर्शन’ कहते हैं।”
चेतना = जागृत होने का गुण या अवस्था।
5. उपनिषदों की तीन कथाएँ (पृ. 111–112)★★
पुस्तक की अपनी घोषणा: “उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।”
(क) श्वेतकेतु(छांदोग्य उपनिषद्)
- ऋषि उद्दालक आरुणि ने पुत्र श्वेतकेतु को गुरुकुल भेजा।
- 12 वर्ष बाद लौटा, तो पिता ने अनुभव किया कि वह अपने ज्ञान के कारण बहुत अहंकारी हो गया है।
- ब्रह्म के स्वरूप पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर श्वेतकेतु नहीं दे सका।
उद्दालक के दो उदाहरण:
| उदाहरण | आशय |
|---|---|
| बरगद के फल का बीज | खोलने पर रिक्त (खाली) दिखता है, किंतु इसमें बरगद के वृक्ष का भावी रूप निहित है |
| एक ही मिट्टी से अलग-अलग बर्तन | हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, एक ही तत्व — ब्रह्म — से उसका उद्भव हुआ है |
समापन: “सभी में यही सूक्ष्म तत्व व्याप्त है… तुम वही हो, श्वेतकेतु।”
★यह तत् त्वम् असि का ही कथा-रूप है।
(ख) नचिकेता(कठोपनिषद्)
- पिता यज्ञ के समय समस्त संपत्ति का दान दे रहे थे; नचिकेता ने पूछा — “मुझे किस देवता को अर्पित करेंगे?”
- बार-बार यही प्रश्न पूछने पर पिता क्रोध में बोले — “मैं तुम्हें यम अर्थात मृत्यु के देवता को अर्पित करता हूँ।”
- नचिकेता यमलोक की ओर निकल पड़े। उनका प्रश्न था — “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”
- ★यम ने पहले तो उत्तर टालने का प्रयास किया — किंतु नचिकेता के निरंतर आग्रह करते रहने पर अंतत: यम देव ने प्रसन्न होकर उन्हें आत्मा के बारे में समझाया।
- “इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है; यह अमर है।”
- नचिकेता पिता के पास लौटे, जिन्होंने उल्लासपूर्वक उसका स्वागत किया।
(ग) गार्गी और याज्ञवल्क्य(बृहदारण्यक उपनिषद्)★
- राजा जनक ने दार्शनिक शास्त्रार्थ के विजेता को पुरस्कार देने की घोषणा की।
- याज्ञवल्क्य ने गार्गी (एक ऋषिका) के प्रश्न पूछने से पहले तक अनेक विद्वानों को पराजित किया।
- गार्गी ने विश्व के स्वरूप पर अनेक प्रश्न पूछे, और अंत में ब्रह्म के स्वरूप पर भी।
- ★★तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें आगे प्रश्न पूछने से मना किया।
- ★★“हालाँकि कुछ समय बाद गार्गी ने पुन: प्रश्न पूछा” — और तभी याज्ञवल्क्य ने समझाया कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों तथा अन्य सभी चीजों का निर्माण करता है।
★★तीनों में क्या समान है — यह प्रश्न परीक्षा में आ सकता है: तीनों में कोई प्रश्न पूछ रहा है, और तीनों में वह कोई बड़ा विद्वान नहीं है — दो बच्चे (श्वेतकेतु, नचिकेता) और एक स्त्री (गार्गी)।
6. बौद्ध मत (पृ. 110, 113)★
आरंभ: “कुछ अन्य दर्शनों का भी अविर्भाव हुआ, जिन्होंने वेदों की प्रभुता को नहीं स्वीकार किया और अपनी स्वयं की पद्धति विकसित की। उनमें से एक बौद्ध मत है।”
| बात | विवरण |
|---|---|
| जन्म | लुंबिनी (वर्तमान नेपाल में), लगभग ढाई सहस्राब्दी पूर्व |
| तिथि | ★“विद्वानों में सर्वसम्मति नहीं है।” अध्याय 4 में 560 सा.सं.पू. को अनुमानित जन्म वर्ष माना गया |
| आयु | 29 वर्ष — रथ पर नगर-भ्रमण |
| चार दृश्य | एक वृद्ध · एक रोगी · एक शव · और एक संन्यासी, जो प्रसन्न और शांत लग रहा था |
| त्याग | राजसी जीवन, पत्नी और बेटे को त्यागने का विचार |
| ज्ञान | बोधगया (वर्तमान बिहार) में पीपल के वृक्ष के नीचे |
| खोज | ‘अविद्या’ और ‘मोह’ मानवीय कष्ट के स्रोत हैं |
| ‘बुद्ध’ का अर्थ | ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ व्यक्ति |
| उपदेश | अहिंसा (मूल अर्थ — चोट या नुकसान न पहुँचाना); और आंतरिक अनुशासन |
| संघ | भिक्षुओं (आगे चलकर भिक्षुणियों) का समुदाय |
| प्रभाव | भारत और पूरे एशिया पर; “यह प्रभाव आज भी अनुभव किया जा सकता है” |
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संन्यासी | वह व्यक्ति जो चेतना का उच्चतर स्तर प्राप्त करने के लिए कठोर अनुशासन में रहता है |
| मोह | किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ संबंध की स्थिति, भावना या आदत के माध्यम से |
| भिक्षु | सामान्य जीवन त्यागकर, व्रत लेकर अनुशासित जीवन जीने वाला व्यक्ति |
| भिक्षुणी | महिला भिक्षु |
बुद्ध के दो कथन (पृ. 113)★★
“जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं। परंतु वह व्यक्ति शुद्ध है जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं।”
“युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”
पहले कथन का आशय: बाहरी कर्मकांड से शुद्धता नहीं आती — शुद्धता आचरण और भीतर के सत्य से आती है। (यह अभ्यास प्रश्न 3 है।)
7. जैन मत (पृ. 114–115)★
| बात | विवरण |
|---|---|
| स्थिति | उसी समय लोकप्रिय हुआ, यद्यपि इस मत को अधिक प्राचीन माना जाता है |
| जन्म | राजकुमार वर्धमान, छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में, वैशाली (वर्तमान बिहार) नगर के समीप |
| आयु | 30 वर्ष — घर त्यागने और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का निर्णय |
| ज्ञान | 12 वर्ष बाद — ‘अनंत’ ज्ञान या सर्वोपरि विवेक |
| नाम | ‘महावीर’ या ‘महानायक’ |
‘जैन’ शब्द (पृ. 115)★
‘जैन’ शब्द जिन से आया है, जिसका अर्थ है ‘विजेता’। इसका अर्थ किसी क्षेत्र या शत्रुओं पर विजय पाने से नहीं है, बल्कि अविद्या और मोह पर विजय पाने से है, ताकि ज्ञान प्राप्त किया जा सके।
★‘अविद्या और मोह’ — ठीक वही दो शब्द जो बुद्ध के लिए आए थे। यह संयोग नहीं है।
जैन मत के तीन विचार★★
| विचार | अर्थ |
|---|---|
| अहिंसा | “सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए।” |
| अनेकांतवाद | ‘केवल एक’ पक्ष या दृष्टिकोण नहीं। सत्य के अनेक पक्ष हैं और इसे केवल एक कथन द्वारा पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता। |
| अपरिग्रह | ‘असंग्रह’ — पार्थिव वस्तुओं से दूर और केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना |
- ये विचार काफी हद तक बौद्ध तथा वेदांत दर्शन के विचारों को साझा करते हैं, जो भारतीय संस्कृति के केंद्र में हैं।
- ★जैन मत में सभी जीवों, मानवों से लेकर अदृश्य जीवों तक, आपसी संबद्धता और आपसी निर्भरता पर भी बल दिया गया है — क्योंकि ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते।
- “प्रकृति, जीवों और वनस्पतियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने इस गहन सत्य की बार-बार पुष्टि की है।”
8. दो कथाएँ (पृ. 116–117)
जातक कथाएँ
“ये बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं और बड़े ही सरल तरीके से बौद्ध आदर्शों को व्यक्त करती हैं।”
वानर-राज की कथा: बुद्ध वानरों के राजा थे; एक पका फल नदी में गिरकर राजमहल पहुँचा; राजा ने वृक्ष खोजने का आदेश दिया; सैनिकों ने वानरों पर हमला किया। ★वानर-राज ने नदी के दूसरे किनारे एक पेड़ पकड़कर अपने शरीर को मानो एक पुल बना दिया — इस प्रक्रिया में वे घायल हुए और अंत में उनकी मृत्यु हो गई। राजा इस नि:स्वार्थ बलिदान से बहुत प्रभावित हुआ और प्रजा के साथ अपनी भूमिका पर सोच-विचार करने लगा।
एक जैन कथा — रोहिनेय
रोहिनेय एक बहुत कुशल चोर था। रास्ते में उसने अकस्मात महावीर के उपदेश के कुछ वाक्य सुन लिए। नगर में पकड़ा गया, स्वयं को साधारण कृषक बताया। ★मंत्री ने चतुराई से जाल बिछाया, किंतु महावीर के शब्दों को याद रखते हुए रोहिनेय योजना समझ गया और बच निकला। बाद में उसे बहुत पछतावा हुआ — उसने अपराध स्वीकार किए, चुराया धन वापस किया, क्षमा माँगी, और भिक्षु बन गया।
सीख: “यह कहानी सम्यक कर्म और सम्यक विचारों के महत्व को दर्शाती है और यह भी बताती है कि हर व्यक्ति को जीवन में दूसरा अवसर मिलना चाहिए।”
अहिंसा का असली विस्तार (पृ. 117)★★
“बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है। इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना।”
9. साझा तना (पृ. 118–119)
एलोरा
- बौद्ध एलोरा (महाराष्ट्र) में छठवीं और दसवीं शताब्दी सा.सं. के बीच पहाड़ों में काटकर गुफाएँ बनाई गईं।
- ★कुछ गुफाएँ हिंदू दर्शन से हैं, जबकि अन्य बौद्ध और जैन मतों से संबंधित हैं।
- भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने सुदूर स्थानों की यात्राएँ कीं और उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया; कुछ ने नए विहार बनाए, कुछ ने गुफाओं में संन्यासी का जीवन बिताया।
- ★“कई स्थानों पर पत्थर की गुफाओं में उन भिक्षुओं के नाम भी मिले हैं जो यहाँ रहते थे और पत्थरों के बिस्तर पर सोए थे।”
पुस्तक ‘धर्म’ शब्द क्यों नहीं कहती (पृ. 118)ध्यान
पुस्तक ‘दर्शन’, ‘मत’ और ‘विश्वास’ कहती है, क्योंकि इन मतों के अनेक आयाम हैं — दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक। “अनेक विद्वान मानते हैं कि अंग्रेजी का शब्द ‘रिलिजन’ भारतीय सभ्यता के संदर्भ में बहुत सीमित है।”
चार्वाक / लोकायत (पृ. 118–119)
- इसके अनुसार यह भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है और इसलिए मृत्यु के पश्चात जीवन का होना असंभव है।
- “ऐसा प्रतीत होता है कि इस दर्शन को अधिक लोकप्रियता नहीं मिली और समय के साथ यह विलुप्त हो गया।”
- ★पुस्तक ने इसका उल्लेख क्यों किया: “ताकि यह दर्शाया जा सके कि यहाँ बौद्धिक या आध्यात्मिक विश्वास प्रथाओं में व्यापक विविधता थी और लोग अपने अनुसार इन्हें चुनने के लिए स्वतंत्र थे।”
साझी संकल्पनाएँ (पृ. 119)★★
“यद्यपि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ थीं, तथापि उनमें कुछ समान संकल्पनाएँ भी थीं, जैसे — धर्म, कर्म, पुनर्जन्म, दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज एवं अनेक अन्य महत्वपूर्ण मूल्य आदि। वास्तव में यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी।”
10. लोक और जनजातीय जड़ें (पृ. 119–121)★
मौखिक परंपराएँ
- लिखित शास्त्रों के अलावा भारत में समृद्ध मौखिक परंपराएँ भी रही हैं — ज्ञान जो नित्य अभ्यास के द्वारा आगे संचारित हुआ।
- ★“वेदों के संदर्भ में यह लागू होता है।”
- लोक प्रथाएँ आम लोगों द्वारा, और जनजातीय परंपराएँ जनजातियों द्वारा प्रसारित होती हैं।
जनजाति क्या है (पृ. 119)
मानव वैज्ञानिकों के अनुसार जनजाति उन परिवारों या वंशों का समूह है, जो —
- एक सामान्य उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करते हैं;
- आपस में निकट संबंध बनाए रखते हुए समुदाय में रहते हैं;
- जिसके एक मुखिया होते हैं;
- और उनके पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती है।
★★“प्राचीन भारत में जनजाति के लिए कोई शब्द नहीं था — जनजातियाँ केवल अलग-अलग जन थीं जो एक विशेष परिवेश में रहती थीं, जैसे कि वन या पहाड़।” ‘जन’ शब्द तीसरी बार आया — अध्याय 5 में भरत, इसी अध्याय में वैदिक जन, और अब यहाँ।
- संविधान में अंग्रेजी में ‘ट्राइब’ और ‘ट्राइबल कम्युनिटी’, हिंदी में ‘जनजाति’ शब्द का उपयोग किया गया है।
- आँकड़े (2011): 705 जनजातियाँ, संख्या लगभग 104 मिलियन — “यह ऑस्ट्रेलिया और युनाइटेड किंगडम की कुल जनसंख्या से अधिक है।”
- ! 19वीं शताब्दी में मानव वैज्ञानिकों ने जनजातियों को ‘आदिम’ या ‘हीन’ बताया था — गहन अध्ययन के बाद इन पक्षपातपूर्ण विचारों को अधिकांशत: नकार दिया गया है।
आदान-प्रदान — दोनों दिशाओं में (पृ. 120)★★
| दिशा | उदाहरण |
|---|---|
| जनजातीय → प्रमुख परंपरा | परंपरा के अनुसार पुरी (ओडिशा) के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे; और देवी माताओं के विभिन्न रूप |
| प्रमुख परंपरा → जनजातीय | हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया; और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं — पूर्वोत्तर से तमिलनाडु तक |
! दोनों दिशाएँ लिखिए। केवल एक दिशा लिखने पर उत्तर अधूरा है।
यह संपर्क सहजता से क्यों हुआ: “क्योंकि लोक, जनजातियों और हिंदू विश्वास में अनेक समान प्रकार की संकल्पनाएँ थीं।” तीनों में प्राकृतिक तत्वों — पर्वतों, नदियों, पेड़ों, पौधों, जंतुओं और कुछ पत्थरों — को भी पवित्र माना गया, क्योंकि इन सबमें चेतना है।
चार जनजातीय उदाहरण
| जनजाति / क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| टोडा (नीलगिरि, तमिलनाडु) | पर्वत के 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास; इतने पवित्र कि लोग अंगुली से संकेत भी नहीं करते |
| अरुणाचल प्रदेश | डोनीपोलो — सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप, आगे चलकर परमात्मा माने गए |
| मध्य भारत | खंडोबा भगवान |
| पूर्वी भारत — मुंडा और संथाल | सिंगबोंगा, “जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं और जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया है” |
★पुस्तक का निष्कर्ष: “देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है।” यह एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति से सीधा जुड़ता है — अनेक नाम, एक सत्य।
आंद्रे बेते (पृ. 121)★★
“भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाली हजारों जातियाँ और जनजातियाँ इतिहास के आरंभिक समय तथा उससे भी पहले से आपस में एक-दूसरे की धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं को प्रभावित करती रही हैं। जनजातीय धर्मों पर हुए हिंदू दर्शन के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, किंतु यह भी सत्य है कि न केवल इसके निर्माण के चरण में, बल्कि इसके पूरे विकास-क्रम में हिंदू दर्शन जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ है।”
“स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपर्क का परिणाम आपसी समृद्धि रही है।”
11. आगे बढ़ने से पहले — पुस्तक का अपना सार (पृ. 121)
- भारत के प्राचीनतम ग्रंथ, वेदों ने अनेक दर्शनों को जन्म दिया। वेदांत और योग इनमें प्रमुख हैं।
- बौद्ध और जैन मत वेदों के प्राधिकार क्षेत्र से परे गए और उन्होंने कुछ विशिष्ट मूल्यों एवं प्रथाओं पर बल दिया।
- यद्यपि इन मतों के सिद्धांत और विधियाँ भिन्न थे, फिर भी इनमें कुछ महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ समान थीं। ये दुख के कारण और अज्ञान के निवारण के साधनों का पता लगाने का सतत प्रयास करते रहे।
- हजारों वर्षों से जनजातीय विश्वास, प्रथाओं तथा कलाओं का हिंदू दर्शन के साथ मेल-जोल होता रहा है। इनके बीच दोनों ओर से अबाधित आदान-प्रदान चलता रहा है। जनजातीय विश्वास प्रथाएँ आम तौर पर भूमि और उसकी विशेषताओं को पवित्र मानती हैं, उनमें प्राय: देवत्व की एक उच्च संकल्पना भी होती है।
12. वटवृक्ष (पृ. 123)★
“वटवृक्ष… भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट प्रतीक है… यह अनेक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देता है और अपनी उन शाखाओं को, जो तने से जुड़ी होती हैं, को नई जड़ें बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। निस्संदेह हिंदू दर्शन और बौद्ध व जैन मतों में इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।”
★वटवृक्ष की शाखाएँ नीचे आकर स्वयं जड़ें बन जाती हैं — शाखा और जड़ का भेद मिट जाता है। यही पूरे अध्याय का तर्क है।
⚡ अंतिम दस मिनट — केवल यह पढ़िए
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| ‘वेद’ शब्द कहाँ से | विद् से — अर्थ ‘ज्ञान’ |
| चार वेद | ऋग्वेद · यजुर्वेद · सामवेद · अथर्ववेद |
| वेद लिखे गए थे? | नहीं — मौखिक पाठ; 100 से 200 पीढ़ियों तक स्मृतिबद्ध |
| यूनेस्को की मान्यता | 2008 में |
| ऋचाओं के रचनाकार | ऋषि (कवि) और ऋषिकाएँ (कवियत्रियाँ) |
| एकं सत् का अर्थ | “परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं” |
| ‘जन’ क्या है | लोगों का बड़ा समूह — ऋग्वेद में 30 से अधिक |
| सभा और समिति | दोनों सामूहिकता को इंगित करते हैं |
| उपनिषदों की दो नई संकल्पनाएँ | पुनर्जन्म · कर्म |
| ब्रह्म | वह एक दैवी तत्व; कभी-कभी केवल ‘तत्’ — ! ब्रह्मा देव से भिन्न |
| दो मंत्र | अहम् ब्रह्मास्मि · तत् त्वम् असि |
| आत्मन् | स्व, जो हर जीव में है, पर ब्रह्म का ही स्वरूप |
| योग | चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध पाने की विधियाँ |
| तीन कथाएँ | श्वेतकेतु · नचिकेता · गार्गी — विषय: प्रश्न पूछने का महत्व |
| बुद्ध का जन्म | लुंबिनी (नेपाल); 560 सा.सं.पू. (अनुमानित) |
| बुद्ध की आयु | 29 वर्ष — चार दृश्य |
| चार दृश्य | वृद्ध · रोगी · शव · संन्यासी |
| ज्ञान कहाँ | बोधगया (बिहार), पीपल के वृक्ष के नीचे |
| ‘बुद्ध’ का अर्थ | ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ |
| कष्ट के दो स्रोत | अविद्या और मोह |
| संघ | भिक्षुओं और भिक्षुणियों का समुदाय |
| महावीर का जन्म | छठी शताब्दी सा.सं.पू. का आरंभ, वैशाली (बिहार) के समीप |
| महावीर की आयु | 30 वर्ष — गृह-त्याग; 12 वर्ष बाद अनंत ज्ञान |
| ‘जिन’ का अर्थ | ‘विजेता’ — अविद्या और मोह पर विजय |
| जैन मत के तीन विचार | अहिंसा · अनेकांतवाद · अपरिग्रह |
| अनेकांतवाद | सत्य के अनेक पक्ष हैं |
| अपरिग्रह | ‘असंग्रह’ |
| जातक कथाएँ | बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ |
| एलोरा | छठवीं–दसवीं शताब्दी सा.सं.; तीनों परंपराओं की गुफाएँ |
| चार्वाक | भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य; विलुप्त हो गया |
| साझी संकल्पनाएँ | धर्म · कर्म · पुनर्जन्म · दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज |
| जनजातीय आँकड़े (2011) | 705 जनजातियाँ · लगभग 104 मिलियन |
| आदान-प्रदान | ★दोनों दिशाओं में — जगन्नाथ; और रामायण-महाभारत के जनजातीय रूप |
| चार जनजातीय उदाहरण | टोडा · डोनीपोलो · खंडोबा · सिंगबोंगा |
| आंद्रे बेते | हिंदू दर्शन भी जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ — पूरे विकास-क्रम में |
| वटवृक्ष | शाखाएँ नई जड़ें बनाती हैं |
और अंत में यह याद रखिए — इस अध्याय में हर बड़ा विचार किसी के प्रश्न पूछने से आया, और उन प्रश्न पूछने वालों में एक स्त्री थी और दो बच्चे।