अध्याय 6भारतीय सभ्यता का प्रारंभ

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कक्षा 6 · सामाजिक विज्ञान · NCERT समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, पृ. 85–104 परीक्षा से एक दिन पहले यही पढ़िए। सब कुछ यहाँ है, और क्रम में है।

एक पंक्ति में पूरा अध्याय

पुस्तक पहले बताती है कि सभ्यता किसे कहते हैं (सात विशेषताएँ), फिर दिखाती है कि हड़प्पा में उनमें से छह के प्रमाण मिलते हैं — और सातवीं (लेखन) मौजूद तो है, पर पढ़ी नहीं जा सकी।

1. सभ्यता क्या है (पृ. 86)

‘सभ्यता’ = मानव समाज का उन्नत चरण।

सात विशेषताएँ — यह सूची अवश्य याद कीजिए★

#विशेषताअर्थ
1शासन और प्रशासन का कोई रूपजटिल समाज के प्रबंधन हेतु
2नगरीकरणनगर योजना, विकास और प्रबंधन (जल प्रबंधन व जल निकास सहित)
3विभिन्न प्रकार के शिल्पकच्चे माल का प्रबंधन और तैयार माल का उत्पादन
4व्यापारआंतरिक (नगर/क्षेत्र के अंदर) और बाहरी (दूरस्थ)
5लेखन का कोई रूपअभिलेख रखने और संवाद बनाने के लिए
6जीवन और विश्व के बारे में सांस्कृतिक विचारकला, स्थापत्य, साहित्य, श्रुति परंपराएँ, रीति-रिवाज
7कृषि उत्पादकताजो गाँव ही नहीं, नगरों को भी भोजन दे सके

याद रखने का सूत्र — ‘शा-न-शि-व्या-ले-सां-कृ’ शासन · नगरीकरण · शिल्प · व्यापार · लेखन · सांस्कृतिक विचार · कृषि

2. सभ्यताओं का आरंभ (पृ. 87)

कहाँकब
मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक और सीरिया)लगभग 6,000 वर्ष पहले
प्राचीन मिस्रमेसोपोटामिया के कुछ शताब्दियों बाद — 3100 सा.सं.पू.
सिंधु-सरस्वती सभ्यता2600 से 1900 सा.सं.पू. (चित्र 6.2)

3. गाँव से नगर (पृ. 88)

भूगोल

  • पंजाब (आज भारत और पाकिस्तान में विभाजित) और सिंध (अब पाकिस्तान में) के विशाल मैदान।
  • इन्हें सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियाँ सिंचित करती हैं — सिंधु ने इन्हें उपजाऊ और कृषि के अनुकूल बनाया।
  • पूर्व दिशा में कुछ सहस्राब्दियों पहले सरस्वती नदी बहती थी — हिमालय की तलहटी से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात तक।

सहायक नदी = वह नदी जो किसी बड़ी नदी (या झील) में मिलती है। उदाहरण: यमुना → गंगा।

दो तिथियाँ — सबसे अधिक पूछी जाने वाली जोड़ी★★

तिथिक्या हुआकारण
3500 सा.सं.पू. सेगाँव → नगर—
लगभग 2600 सा.सं.पू.नगर → महानगरबढ़ता व्यापार और अन्य विनिमय

कारण मत भूलिए। केवल तिथि लिखने पर आधे अंक कटते हैं।

सभ्यता के तीन नाम

सिंधु सभ्यता · हड़प्पा सभ्यता · सिंधु-सरस्वती सभ्यता — पुस्तक तीनों का प्रयोग करती है।

  • निवासी = हड़प्पाई / हड़प्पावासी
  • यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।
  • इस प्रक्रिया को ‘भारत का पहला नगरीकरण’ भी कहते हैं।

दो तिथियाँ जो गड्डमड्ड होती हैंध्यान

तिथिकिसकी
1920–21हड़प्पा — इस सभ्यता से संबंधित पहला उत्खनित नगर (इसीलिए नाम ‘हड़प्पाई’)
1924हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोज — “लगभग एक शताब्दी पूर्व”

4. मानचित्र — चित्र 6.3 (पृ. 89)

पाँच बड़े नगर(मानचित्र पर लाल बिंदु)★

नगरआज कहाँ
हड़प्पापंजाब (पाकिस्तान) — रावी नदी पर
मोहनजो-दड़ोसिंध (पाकिस्तान) — सिंधु नदी पर
गँवेरीवालाचोलिस्तान मरुस्थल (पाकिस्तान)
राखीगढ़ीहरियाणा
धौलावीरागुजरात (कच्छ का रन)

ये पाँच जोड़ियाँ अवश्य याद कीजिए★

नगरराज्य/प्रदेश
धौलावीरागुजरात
हड़प्पापंजाब
कालीबंगाराजस्थान
मोहनजो-दड़ोसिंध
राखीगढ़ीहरियाणा

!! पृष्ठ 90 की तालिका देखकर मत याद कीजिए। वह मिलान का अभ्यास है — उसकी जोड़ियाँ जान-बूझकर आपस में बदली हुई हैं। ऊपर वाली तालिका सही है।

अन्य बस्तियाँ

कालीबंगा · लोथल · बनावली · भिर्राना · फरमाना · चन्हुदड़ो · बालाकोट · नागेश्वर · खिरसरा · बगासरा · नागवाड़ा · रूपनगर · मांडा · मुसा खेल · डाबरकोट · लखनजो-दड़ो · करनपुरा · शोर्तुगई

मानचित्र पर पर्वत और नदियाँ

प्रकारनाम
पर्वत (भूरे रंग में — प्राकृतिक सीमाएँ)हिंदुकुश · हिमालय · सुलैमान श्रेणी · अरावली श्रेणी
नदियाँसिंधु · झेलम · चिनाब · रावी · सतलुज · ब्यास · सरस्वती · बनास · यमुना · गंगा

5. सरस्वती नदी (पृ. 90)

  • आज भारत में घग्गर, पाकिस्तान में हाकरा — इसलिए घग्गर-हाकरा भी कहते हैं।
  • इसके किनारे भी अनेक पुरास्थल मिले हैं।
  • आज यह एक मौसमी नदी है, जो मात्र वर्षा ऋतु में बहती है।
  • वर्णन सबसे पहले ऋग्वेद में — देवी के रूप में भी, और पर्वत से समुद्र तक बहने वाली नदी के रूप में भी।
  • बाद के ग्रंथों में इसके सूखने और लुप्त हो जाने का वर्णन है।

सरस्वती की द्रोणी (बेसिन) में क्या है

प्रकारनाम
दो महानगरराखीगढ़ी · गँवेरीवाला
छोटे नगरफरमाना (हरियाणा) · कालीबंगा (राजस्थान)
अन्य नगरभिर्राना · बनावली (दोनों हरियाणा)

6. नगर-योजना (पृ. 90–92)

‘सिंधु घाटी’ क्यों नहीं कहा जाता★

पुस्तक ‘घाटी’ शब्द का प्रयोग नहीं करती, क्योंकि अब हम जानते हैं कि यह सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी।

नगरों की विशेषताएँ

विशेषताविवरण
योजनाअधिकांश नगर सुनियोजित योजना के अंतर्गत निर्मित
सड़केंचौड़ी, सामान्यत: चारों दिशाओं की ओर उन्मुख
किलेबंदीअधिकांश नगरों के चारों ओर
दो भाग‘ऊपरी नगर’ (संभवत: अभिजात वर्ग) और ‘निचला नगर’ (साधारण लोग)
बड़े भवनसामूहिक उद्देश्यों के लिए — जैसे गोदाम
घरविभिन्न आकारों के; ★बड़े और छोटे घरों की निर्माण-गुणवत्ता एक समान
सामग्रीसामान्यत: ईंटें

किलेबंदी = सुरक्षा हेतु बस्ती/नगर के चारों ओर बनाई गई विशाल दीवार। अभिजात वर्ग = समाज का उच्च स्तर — शासक, अधिकारी, प्रशासक, प्राय: पुरोहित या पुजारी।

धौलावीरा — अपवाद वाला नगर★

  • तीन अलग-अलग क्षेत्र थे, न कि अन्य नगरों की तरह दो।
  • अधिकांश भवनों की नींव पत्थरों से बनाई गई थी।

7. महास्नानागार — मोहनजो-दड़ो (पृ. 91, 93)

बातविवरण
आकार12 × 7 मीटर
जल रोधक परतप्राकृतिक बिटुमेन (डामर), सबसे ऊपर की ईंटों पर
चारों ओरछोटे-छोटे कमरे; एक कमरे के अंदर कुआँ
पानी निकालने के लिएकोने में एक नाली
भरा जाता थास्वच्छ पानी से, समय-समय पर

तीन व्याख्याएँ — और एक क्यों छोड़ी गई★

व्याख्यास्थिति
सार्वजनिक स्नान के लिए स्नानागार! अब स्वीकार्य नहीं
केवल राजसी परिवार के लिए स्नानागारविचाराधीन
धार्मिक कार्यों के लिए स्नानागारविचाराधीन

पहली क्यों छोड़ी गई — यह कारण अवश्य याद कीजिए: “क्योंकि यह पाया गया है कि इस नगर के अधिकांश घरों में स्नानागार बने हुए थे।”

पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी (पृ. 93)★★

“इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं, जैसे न कोई शिलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही किसी यात्री का विवरण।”

इसीलिए पूरे अध्याय में ‘संभवत:’, ‘रहा होगा’ और ‘प्रतीत होता है’ आते हैं।

8. जल प्रबंधन (पृ. 94–95)

  • हड़प्पावासी जल प्रबंधन और स्वच्छता को बहुत महत्व देते थे।
  • घरों में स्नान के लिए अलग स्नानागार।
  • जल-निकास प्रणाली — साधारणत: सड़कों के नीचे, जिनमें अपशिष्ट जल बहता था।
  • मोहनजो-दड़ो में ईंटों से बनाए कुओं से पानी निकालते थे।
  • अन्य क्षेत्रों में तालाब, पास के झरने या मानव निर्मित जलाशय।

धौलावीरा के जलाशय★

बातविवरण
सबसे बड़ा जलाशय73 मीटर लंबा
कुलकम से कम छह विशाल जलाशय
बनाए गएपत्थरों से और चट्टान को काटकर
जुड़े हुएभूमिगत नालियों से — कुशल जल संचयन और वितरण के लिए

! चित्र 6.8 का जलाशय 33 मीटर लंबा है — वह चट्टान काटकर बनाया गया है, सबसे बड़ा नहीं। 73 = सबसे बड़ा। 33 = चित्र वाला।

जलाशय = विशाल प्राकृतिक या कृत्रिम स्थान, जहाँ जल का भंडारण किया जाता है।

इससे प्रशासन का क्या पता चलता है (पृ. 96)★

इतने बड़े जलाशयों के लिए चाहिए था — बड़ी संख्या में श्रमिक, उन्हें निर्देश देने वाला कोई, मजदूरी का भुगतान (उस समय मुद्रा का प्रचलन नहीं था), और सफाई व रख-रखाव के लिए कोई स्थानीय प्राधिकारी।

यही सभ्यता की विशेषता #1 — शासन और प्रशासन — का प्रमाण है।

9. हड़प्पावासी क्या खाते थे (पृ. 96–97)

बस्तियाँ नदियों के किनारे क्यों: केवल जल के लिए नहीं, कृषि की दृष्टि से भी — क्योंकि नदियाँ अपने आस-पास की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं।

फ़सलें

प्रकारनाम
अनाजजौ · गेहूँ · कुछ मोटे अनाज · बाजरा · कभी-कभी धान
अन्यदलहन · अनेक किस्म की सब्जियाँ
★रेशाकपास — यूरेशिया में उगाने वाले वे सर्वप्रथम थे; उपयोग कपड़ा बुनने में

दलहन = फसलों की श्रेणी, जिसमें सेम, मटर के दाने और दालें सम्मिलित हैं।

  • उन्होंने हल सहित खेती के कई उपकरण बनाए — कुछ का उपयोग आधुनिक समय में भी किसान करते हैं।
  • चित्र 6.9 — मिट्टी से निर्मित हल का लघु प्रतिरूप (बनावली, हरियाणा)।

गाँव और नगर

  • यह गहन कृषि सैकड़ों छोटे ग्रामीण स्थलों अथवा गाँवों द्वारा संचालित होती थी।
  • ★“अभी की तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्रों से पर्याप्त कृषि उपज प्रतिदिन उपलब्ध होने पर ही नगर जीवित रह सकते थे।”

माँस, मछली और बर्तनों की जाँच

  • माँस के लिए अनेक पशु पाले; मछलियों के लिए नदियों और समुद्रों पर निर्भर।
  • प्रमाण: खुदाई में मिली पशुओं की हड्डियाँ और मत्स्य जीवाश्म।
  • ★मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच में मिले —
प्रकारअवशेष
प्रत्याशितदुग्ध उत्पाद
अप्रत्याशितहल्दी · अदरक · केले

“स्पष्ट है कि उनके भोजन में बहुत विविधता थी।”

10. सक्रिय व्यापार (पृ. 97–99)

किसके साथ: अपनी सभ्यता के भीतर (आस-पास और दूर के नगरों में), और भारत के भीतर व बाहर की अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के साथ भी।

दिशावस्तुएँ
निर्यातआभूषण · लकड़ी · दैनिक उपयोग की वस्तुएँ · संभवत: सोना एवं कपास · कुछ खाद्य वस्तुएँ
आयात! “स्पष्ट नहीं है” — संभवत: तांबा, क्योंकि यह धातु उनके पास बहुतायत में नहीं थी

व्यापार के दो पक्के प्रमाण★★

चित्रवस्तुकहाँ मिली
6.10कार्नेलियन मनकेसूसा — वर्तमान ईरान
6.11हाथी दाँत का कंघा (लगभग 7 सेमी.)ओमान का तट

शिल्प

  • सर्वाधिक प्रिय आभूषण — कार्नेलियन के मोती; अधिकतर गुजरात में पाए जाने वाले लाल रंग के अल्प मूल्यवान पत्थर।
  • कारीगरों ने उनमें छेद करने की तकनीक विकसित की, ताकि धागा डाला जा सके।
  • शंखों से बहुत सुंदर चूड़ियाँ बनाईं — शंख का खोल सख़्त होता है, अत: परिष्कृत तकनीक की आवश्यकता होती होगी।
  • तांबा + टिन = कांस्य, जो तांबे से अधिक कठोर होता है; उपकरण और बर्तन बनाने में प्रयोग।

मार्ग और लोथल

  • स्थल मार्ग एवं नदियाँ, और दूरवर्ती गंतव्यों के लिए समुद्री रास्ते।
  • ★“यह भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि थी।”
  • लोथल — एक लघु बस्ती, पर वहाँ 217 × 36 मीटर का विशाल बेसिन मिला।
  • “इसकी लंबाई फुटबॉल के दो मैदानों से थोड़ी अधिक है।”
  • इसमें बंदरगाह जैसी संरचना अवश्य रही होगी — नावों से आयात-निर्यात के लिए।

मुहरें★

  • व्यापक व्यापार में ज़रूरी था कि व्यापारी अपने सामान को और एक-दूसरे को पहचानें।
  • हज़ारों की संख्या में छोटी मुहरें मिलीं — मुख्य उपयोग यही रहा होगा।
  • मुलायम पत्थर स्टीऐटाइट की बनीं, गरम कर कठोर की जाती थीं; माप केवल कुछ सेंटीमीटर।
  • ऊपर जानवरों के चित्र, और लेखन प्रणाली के कुछ संकेत भी।
  • ★★“इस लेखन प्रणाली और पशुओं के चित्रों के प्रतीकों के अर्थ को अभी समझा जाना बाकी है, पर यह निश्चित है कि ये किसी प्रकार की व्यापार की गतिविधियों से संबंधित हैं।”
  • चित्र 6.13 — एकशृंगी पशु · बैल · सींग वाला बाघ।

11. प्राचीन जीवन (पृ. 100–101)

दैनिक उपयोग की वस्तुएँ

वस्तुकहाँ सेमाप
कांस्य दर्पणधौलावीरा—
पकी मिट्टी (टेराकोटा) का पात्रधौलावीरा—
भार तौलने के पत्थरधौलावीरा—
कांस्य छैनीधौलावीरा—
पत्थर पर उकेरा खेल-बोर्डधौलावीरा25 सेमी.
मिट्टी की सीटीकरनपुरा, राजस्थानलगभग 4 सेमी.

“हड़प्पावासियों ने वयस्कों और बच्चों, दोनों के मनोरंजन के लिए अनेक खेल तैयार किए!”

सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक वस्तुएँ

वस्तुविवरण
‘पुरोहित राजा’एक छोटी मूर्ति — ! “यद्यपि यह मालूम नहीं है कि यह प्रतिमा किसकी है”
स्वास्तिक मुहरस्वास्तिक दर्शाती हुई मुहर
त्रिमुखी देवता की मुहरशक्तिशाली पशुओं से घिरे ऊँचे स्थान पर बैठे त्रिमुखी देवता
‘नर्तकी’मोहनजो-दड़ो से, कांस्य, 10.8 सेमी. ऊँची
नमस्ते की मुद्रा वाली मूर्तिपकी मिट्टी (टेराकोटा)
प्यासे कौए की कहानीएक पात्र पर चित्रण — लोथल से

चूड़ियों वाला सूत्र (पृ. 102)★

‘नर्तकी’ की पूरी बाँह ढँकने वाली चूड़ियाँ, जो गुजरात और राजस्थान में आज भी महिलाएँ पहनती हैं — और अध्याय में चूड़ियाँ एक और जगह आई थीं: शंख की चूड़ियाँ (पृ. 97)।

निष्कर्ष: यह परंपरा चार हज़ार वर्षों से चली आ रही है।

12. अंत अथवा नई शुरुआत? (पृ. 102–103)

पतन का विवरण

  • 1900 सा.सं.पू. के आस-पास सभी उपलब्धियों के बावजूद ह्रास हो गया।
  • नगर एक के बाद एक खाली होते गए।
  • जो रहे, उन्होंने परिवर्तित वातावरण में ग्रामीण जीवन-शैली अपनाई।
  • “ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती सरकार या प्रशासन अब विद्यमान नहीं रहा।”
  • हड़प्पावासी सैकड़ों छोटी-छोटी बस्तियों के रूप में बिखर गए।

पतन के कारण — तीनों हिस्से लिखिए★★

(क) जो कारण ख़ारिज हुआ — युद्ध या आक्रमण। क्योंकि युद्ध या आक्रमण के कोई निशान नहीं मिलते, और हड़प्पावासियों ने वास्तव में कभी भी कोई सेना या युद्ध के हथियार नहीं रखे। “यह अपेक्षाकृत एक शांतिपूर्ण सभ्यता प्रतीत होती है।”

(ख) जिन दो कारणों पर सहमति है —

#कारणविवरण
1जलवायु परिवर्तन2200 सा.सं.पू. से वर्षा में कमी और शुष्कता → कृषि कठिन → नगरों को खाद्य आपूर्ति में कमी
2सरस्वती का सूखनामध्य बेसिन सूख गया; कालीबंगा और बनावली अचानक छोड़ दिए गए

(ग) पुस्तक की स्वीकारोक्ति — “इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे, लेकिन ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं।”

पर यह अंत नहीं था★

“यद्यपि नगर लुप्त हो गए, लेकिन हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई, जिसके बारे में हम अगले अध्याय में पता करेंगे।”

13. आगे बढ़ने से पहले — पुस्तक का अपना सार (पृ. 103)

  1. सिंधु, हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। हड़प्पावासियों ने कुशल जल प्रबंधन, विविध शिल्पों और सक्रिय व्यापार के साथ सुनियोजित नगरों का निर्माण किया।
  2. उपजाऊ कृषि से नगरों को विभिन्न प्रकार की फसलें प्राप्त हुईं।
  3. इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण अंतत: ह्रास हो गया; लोग ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए।

⚡ अंतिम दस मिनट — केवल यह पढ़िए

प्रश्नउत्तर
सभ्यता की सात विशेषताएँशासन · नगरीकरण · शिल्प · व्यापार · लेखन · सांस्कृतिक विचार · कृषि
मेसोपोटामियालगभग 6,000 वर्ष पहले
मिस्र3100 सा.सं.पू.
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का काल2600–1900 सा.सं.पू.
गाँव → नगर3500 सा.सं.पू. से
नगर → महानगर2600 सा.सं.पू., कारण बढ़ता व्यापार
पहला उत्खनित नगरहड़प्पा, 1920–21
खोज1924
तीन नामसिंधु · हड़प्पा · सिंधु-सरस्वती
पाँच बड़े नगरहड़प्पा · मोहनजो-दड़ो · गँवेरीवाला · राखीगढ़ी · धौलावीरा
सरस्वती का आज का नामघग्गर (भारत), हाकरा (पाकिस्तान)
सरस्वती की द्रोणी के दो महानगरराखीगढ़ी · गँवेरीवाला
‘घाटी’ क्यों नहींसभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे फैली थी
नगर के दो भागऊपरी नगर · निचला नगर
धौलावीरा का अपवादतीन क्षेत्र · पत्थर की नींव
महास्नानागार12 × 7 मीटर, मोहनजो-दड़ो, बिटुमेन की परत
पहली व्याख्या क्यों छोड़ीअधिकांश घरों में स्नानागार थे
धौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय73 मीटर
चित्र 6.8 का जलाशय33 मीटर, चट्टान काटकर
धौलावीरा के जलाशयकम से कम छह
कपासयूरेशिया में सर्वप्रथम
बर्तनों में अप्रत्याशित अवशेषहल्दी · अदरक · केले
कार्नेलियन मनके कहाँ मिलेसूसा — ईरान
हाथी दाँत का कंघा कहाँ मिलाओमान, लगभग 7 सेमी.
कांस्यतांबा + टिन, तांबे से अधिक कठोर
मुहरें किस पत्थर कीस्टीऐटाइट
लोथल का बेसिन217 × 36 मीटर
भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधिहड़प्पाई व्यापार
‘नर्तकी’मोहनजो-दड़ो, कांस्य, 10.8 सेमी.
खेल-बोर्ड / सीटी25 सेमी. (धौलावीरा) / लगभग 4 सेमी. (करनपुरा)
पतन कब1900 सा.सं.पू. के आस-पास
जलवायु परिवर्तन कब से2200 सा.सं.पू. से
कौन-सा कारण ख़ारिज हुआयुद्ध/आक्रमण — कोई निशान नहीं, कोई सेना या हथियार नहीं
दो सहमत कारणजलवायु परिवर्तन · सरस्वती के मध्य बेसिन का सूखना
कौन-से नगर अचानक छोड़े गएकालीबंगा · बनावली
क्या बचा रहाहड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी

और अंत में यह याद रखिए — सभ्यता की सात विशेषताओं में ‘लेखन’ भी है। हड़प्पा में लेखन मिलता है — पर उसे आज तक कोई पढ़ नहीं सका। इसीलिए इस अध्याय में हर बात ‘संभवत:’ है।