अध्याय 1राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 3–25.

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स्रोत-चिह्न: ◆ प्राथमिक (मूल अधिनियम, आयोग की रिपोर्ट, संविधान, राजपत्र, न्यायालय का निर्णय, संयुक्त राष्ट्र) · ◇ सशक्त द्वितीयक। पूरी सूची §11 में।

विषय-सूची

खंडविषय
§1केंद्रीय प्रश्न
§2विधिक ढाँचा — भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
§3विभाजन
§4रियासतों का एकीकरण
§5संवैधानिक नींव — भाग 1, अनुच्छेद 1–4
§6राज्यों का पुनर्गठन — 1948 से 1956 तक
§71956 के बाद — निरंतर पुनर्गठन, 1960–2014
§8★★जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन, 2019–2026 — पाठ्यपुस्तक-पश्चात की सबसे बड़ी घटना
§9मूल्यांकन — प्रयोग सफल क्यों रहा
§10परीक्षा-दृष्टि — एक पृष्ठ में सब
§11सीमाएँ और अनिश्चितताएँ — ईमानदार सूची
§12स्रोत

1. केंद्रीय प्रश्न

15 अगस्त 1947 को भारत को राज्य (state) विरासत में मिला — नौकरशाही, सेना, रेल, न्यायपालिका। पर राष्ट्र (nation) उसे गढ़ना था। यही भेद “राष्ट्र-निर्माण” शब्द का अर्थ है।

उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय राष्ट्रवाद की मान्यता थी कि एक स्थायी राष्ट्र-राज्य के लिए भाषाई या धार्मिक एकरूपता आवश्यक है। जर्मनी और इटली इसी तर्क पर बने। द्वि-राष्ट्र सिद्धांत इसी यूरोपीय मान्यता का भारतीय संस्करण था — कि हिंदू और मुसलमान दो अलग “कौमें” हैं, इसलिए दो अलग राज्य चाहिए।

भारत ने ठीक उल्टा रास्ता चुना। प्रश्न यह था कि क्या विविधता को दबाए बिना एकता संभव है — और 1947 से आज तक के लगभग आठ दशक इसी प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर हैं। यह उत्तर चार मोर्चों पर लिखा गया, और अब भी लिखा जा रहा है: विभाजन का प्रबंधन, रियासतों का एकीकरण, राज्यों का पुनर्गठन — और 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, जो दिखाता है कि यह कहानी अभी भी चालू है।

2. विधिक ढाँचा — भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947

राजनीतिक कथा में यह अधिनियम अकसर छूट जाता है, जबकि आगे की हर घटना इसी की उपज है।

बिंदुविवरण
पारितब्रिटिश संसद द्वारा; शाही स्वीकृति 18 जुलाई 1947
मुख्य प्रभाव15 अगस्त 1947 से दो अधिराज्य (Dominions) — भारत और पाकिस्तान
धारा 6रियासतों को भारत या पाकिस्तान में मिलने के लिए परिग्रहण-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करने थे
धारा 7(1)(b)ब्रिटिश सर्वोच्च सत्ता (Paramountcy) की समाप्ति
◆◇

धारा 7 का महत्व: रियासतें ब्रिटिश उपनिवेश नहीं थीं — वे संधि-संबंध में थीं, जिसमें ब्रिटिश ताज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार थी और बदले में आंतरिक स्वायत्तता मिली थी। इसलिए 1947 में सत्ता का हस्तांतरण उन पर लागू ही नहीं होता था। पैरामाउंटसी किसी को सौंपी नहीं गई — वह समाप्त हो गई। इसी विधिक शून्य से वह स्थिति बनी जिसमें 565 रियासतें तकनीकी रूप से स्वतंत्र हो गईं।

प्रथम गवर्नर-जनरल: भारत — लॉर्ड माउंटबेटन; पाकिस्तान — मुहम्मद अली जिन्ना।

3. विभाजन

3.1 निर्णय तक की शृंखला

वर्षघटना
1940मुस्लिम लीग का लाहौर प्रस्ताव — द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का औपचारिक राजनीतिक रूप
16 अगस्त 1946डायरेक्ट ऐक्शन डे — कलकत्ता में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा
3 जून 1947माउंटबेटन योजना (3 June Plan) — विभाजन की घोषणा
18 जुलाई 1947भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृति
◇

3.2 रैडक्लिफ़ रेखा — सीमा किसने और कब खींची

  • सर सिरिल रैडक्लिफ़ (Sir Cyril Radcliffe) — पंजाब और बंगाल, दोनों सीमा आयोगों के अध्यक्ष।
  • दोनों आयोगों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के दो-दो नामित सदस्य।
  • रैडक्लिफ़ ने काम 12 अगस्त 1947 को पूरा किया, 13 अगस्त को मुहरबंद अवार्ड वायसराय को सौंपा।
  • अवार्ड 17 अगस्त 1947 को घोषित हुआ — यानी स्वतंत्रता के दो दिन बाद। ◆◇

यही विभाजन की हिंसा का एक बड़ा कारण है। 14–15 अगस्त को लोगों को यह पता ही नहीं था कि उनका गाँव किस देश में पड़ेगा। जब अवार्ड घोषित हुआ तब तक पलायन और हिंसा शुरू हो चुकी थी, और स्थानीय प्रशासन की निष्ठा बदल चुकी थी। रैडक्लिफ़ रेखा आज भी भारत–पाकिस्तान और भारत–बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा है।

3.3 विभाजन की चार संरचनात्मक कठिनाइयाँ

आधार: धार्मिक बहुसंख्या।

  1. कोई सटा हुआ मुस्लिम-बहुल भू-भाग नहीं था। ऐसे दो क्षेत्र थे — एक पश्चिम में, एक पूर्व में। इसलिए पाकिस्तान दो भागों में बना, बीच में 1,600 किमी से अधिक भारतीय भू-भाग। (यही भौगोलिक विसंगति 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने का एक कारण बनी।)
  2. हर मुस्लिम-बहुल क्षेत्र पाकिस्तान नहीं जाना चाहता था। खान अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गाँधी’) पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता थे और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के विरोधी — पर उनकी आवाज़ की अनदेखी हुई।
  3. पंजाब और बंगाल में बड़े गैर-मुस्लिम हिस्से थे, इसलिए इन प्रांतों को भी बाँटना पड़ा — जिले या उससे निचले प्रशासनिक हलके के आधार पर।
  4. दोनों ओर अल्पसंख्यक रह गए — यह सबसे अबूझ कठिनाई थी, क्योंकि इसका कोई भौगोलिक समाधान था ही नहीं।

3.4 मानवीय परिणाम — और आँकड़ों की सीमा

मात्राप्रचलित अनुमानटिप्पणी
विस्थापित80 लाख (तात्कालिक, मुख्यतः पश्चिमी सीमा) से 1.4–1.8 करोड़ (दीर्घकालिक, दोनों सीमाएँ)अंतर परिभाषा का है — कालावधि और सीमा
मृत2 लाख से 20 लाख तक; 5–10 लाख सर्वाधिक उद्धृतकोई आधिकारिक गणना कभी नहीं हुई
◇

यह विषय का एक स्वतंत्र पाठ भी है: इतिहास के कुछ सबसे बड़े आँकड़े अनुमान होते हैं, गणना नहीं। किसी एक संख्या को “सही” मानकर चलना ही त्रुटि है।

4. रियासतों का एकीकरण

4.1 समस्या का पैमाना

  • 565 रियासतें — भारतीय साम्राज्य के लगभग एक-तिहाई भू-भाग और लगभग एक-चौथाई जनसंख्या पर।
  • 15 अगस्त 1947 से सब तकनीकी रूप से स्वतंत्र, और विलय का निर्णय प्रजा को नहीं, शासकों को करना था।
  • जून 1947 में त्रावणकोर ने स्वतंत्रता की घोषणा की; अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने; भोपाल के नवाब संविधान सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे। ◇

4.2 समाधान का तंत्र — और वह क्यों काम कर गया

  • रियासती विभाग (States Department) — 5 जुलाई 1947 को गठित; मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, सचिव वी.पी. मेनन (V.P. Menon)। ◇
  • परिग्रहण-पत्र (Instrument of Accession) में रियासतें केवल तीन विषय सौंपती थीं — प्रतिरक्षा (Defence), विदेशी मामले (External Affairs), संचार (Communications)। शेष सब उनके पास रहा।
  • शासक भारत के भावी संविधान को स्वतः स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं थे। ◇

यही पूरे एकीकरण की कुंजी है। यह पूर्ण विलय नहीं, सीमित हस्तांतरण था — इसीलिए लगभग सभी रियासतें 15 अगस्त 1947 से पहले ही, शांतिपूर्ण बातचीत से शामिल हो गईं। “पटेल ने बलपूर्वक मिलाया” वाली धारणा तथ्यतः गलत है; बल केवल एक मामले में लगा।

पूर्ण एकीकरण बाद में विलय समझौतों (Merger Agreements) से हुआ, परिग्रहण-पत्र से नहीं।

4.3 चार कठिन मामले

रियासतविषमतासमाधानतिथि
जूनागढ़हिंदू-बहुल प्रजा, मुस्लिम शासक; नवाब ने पाकिस्तान चुना; रियासत भारतीय भू-भाग से घिरीजनमत-संग्रह (plebiscite) — 2,22,174 (99.94%) भारत के पक्ष में, 130 (0.06%) पाकिस्तान के पक्ष में20 फरवरी 1948
हैदराबादहिंदू-बहुल प्रजा, मुस्लिम शासक; निज़ाम स्वतंत्रता चाहता थानवंबर 1947 का एक-वर्षीय यथास्थिति समझौता; तेलंगाना किसान आंदोलन; निज़ाम का रज़ाकार बल; फिर सैन्य कार्रवाई13–18 सितंबर 1948
कश्मीरमुस्लिम-बहुल प्रजा, हिंदू शासक — ऊपर के दोनों का दर्पणपरिग्रहण-पत्र (26 अक्तूबर 1947), फिर युद्ध; बाद में अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा (§8 में पूरी कहानी)अक्तूबर 1947 से
मणिपुरविधानसभा में गहरे मतभेदविलय समझौता, शिलांग में हस्ताक्षरित21 सितंबर 1949; प्रभावी 15 अक्तूबर 1949
◆◇

तर्क का सूत्र: जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर एक ही असममिति के तीन रूप हैं — शासक का धर्म और प्रजा का धर्म अलग। भारत ने जूनागढ़ में जनमत का तर्क दिया; पाकिस्तान ने कश्मीर में वही तर्क दिया। यही 1947–48 की कूटनीतिक गाँठ है, और UPSC में प्रश्न इसी पर बनते हैं। कश्मीर की गाँठ आज भी पूरी तरह नहीं खुली — §8 में इसका 2019–2026 वाला अध्याय देखिए।

4.4 हैदराबाद — ‘ऑपरेशन पोलो’

  • कार्रवाई का सांकेतिक नाम ‘ऑपरेशन पोलो’; 13 से 18 सितंबर 1948; निज़ाम के बलों का आत्मसमर्पण 17 सितंबर को। तत्कालीन निज़ाम — मीर उस्मान अली ख़ान।
  • सरकारी तौर पर इसे ‘पुलिस ऐक्शन’ (Police Action) कहा गया — अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप से बचने के लिए, ताकि यह अंतर-राज्यीय युद्ध न कहलाए। ◇
  • सुंदरलाल समिति — नेहरू द्वारा गठित; कार्रवाई के बाद हुई हिंसा की जाँच; समिति ने 27,000–40,000 मृत्यु दर्ज कीं, अन्य अनुमान अधिक। रिपोर्ट दशकों तक अप्रकाशित रही। ◆

4.5 आगे की कड़ी — प्रिवी पर्स

विलय के बदले शासकों को प्रिवी पर्स और कुछ विशेषाधिकार मिले। 26वें संविधान संशोधन (1971) द्वारा इन्हें समाप्त किया गया। ◇

5. संवैधानिक नींव

तिथिघटना
9 दिसंबर 1946संविधान सभा की पहली बैठक
26 नवंबर 1949संविधान अंगीकृत
26 जनवरी 1950संविधान लागू
◆

भाग 1 — संघ और उसका राज्यक्षेत्र (अनुच्छेद 1–4)

यही वह संवैधानिक शक्ति है जिसके अधीन आज तक हर राज्य बना है — 1953 के आंध्र से लेकर 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन तक।

अनुच्छेदउपबंध
अनुच्छेद 1“इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा”; राज्य और राज्यक्षेत्र पहली अनुसूची में
अनुच्छेद 2संसद नए राज्यों को संघ में प्रवेश दे सकती है या नए राज्य स्थापित कर सकती है
अनुच्छेद 3संसद नए राज्य बना सकती है; क्षेत्र, सीमा या नाम बदल सकती है
अनुच्छेद 4अनुच्छेद 2–3 के अधीन विधि अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं — साधारण बहुमत पर्याप्त
◇

अनुच्छेद 3 की दो शर्तें: विधेयक (i) राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से ही पेश हो सकता है, और (ii) राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार जानने के लिए भेजेंगे।

★यह “परामर्श” है, “सहमति” नहीं। राज्य की राय बाध्यकारी नहीं है, और राज्य विधानमंडल किसी निर्धारित अवधि में उत्तर न दे तो भी संसद आगे बढ़ सकती है। इसीलिए भारत को “अविनाशी संघ के विनाशी राज्य” (indestructible Union of destructible states) कहा जाता है — संघ तोड़ा नहीं जा सकता, राज्य पुनर्गठित किए जा सकते हैं।

तुलना के लिए: अमेरिकी संघ में राज्य की सीमा उसकी सहमति के बिना नहीं बदली जा सकती। भारत का संघवाद इस अर्थ में केंद्र की ओर झुका (holding-together federalism) है। 2019 में जम्मू-कश्मीर राज्य का केंद्र-शासित प्रदेशों में पुनर्गठन भी इसी अनुच्छेद 3 से हुआ — राज्य विधानसभा की सहमति के बिना, क्योंकि उस समय राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन था और संसद ने स्वयं वह भूमिका निभाई (§8 देखिए)।

6. राज्यों का पुनर्गठन — 1948 से 1956 तक

6.1 वादा, और उससे पीछे हटना

कांग्रेस ने 1920 के नागपुर अधिवेशन के बाद से यह सिद्धांत मान लिया था कि पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा; प्रांतीय कांग्रेस समितियाँ भी भाषाई आधार पर बनी थीं। पर विभाजन के बाद नेतृत्व पीछे हट गया — और यह पीछे हटना मनमाना नहीं, दो औपचारिक सिफ़ारिशों पर आधारित था:

समितिगठनअध्यक्ष / सदस्यनिष्कर्ष
धर आयोग (भाषाई प्रांत आयोग / Linguistic Provinces Commission)17 जून 1948, संविधान सभा द्वारान्यायमूर्ति एस.के. धर; सदस्य — जगत नारायण लाल, पन्ना लालरिपोर्ट 10 दिसंबर 1948: भाषाई आधार अस्वीकार; कहा कि केवल या मुख्यतः भाषाई आधार पर प्रांत बनाना राष्ट्रहित में नहीं
जे.वी.पी. समितिदिसंबर 1948Jawaharlal Nehru, Vallabhbhai Patel, Pattabhi Sitaramayyaभाषाई पुनर्गठन का विचार फिर अस्वीकार
◆◇

6.2 जनता का दबाव — आंध्र

तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विशाल आंध्र आंदोलन। गाँधीवादी पोट्टी श्रीरामुलु ने आमरण अनशन किया (19 अक्तूबर 1952 से) और 15 दिसम्बर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। व्यापक अशांति के बाद दिसंबर 1952 में प्रधानमंत्री ने अलग राज्य की घोषणा की।

  • आंध्र राज्य (Andhra State) 1953 में बना — भारत का पहला भाषाई आधार पर बना राज्य; राजधानी कर्नूल। (गठन-तिथि पर स्रोतों में मतभेद — §11 देखिए।)
  • आंध्र प्रदेश 1956 में बना, जब हैदराबाद के तेलुगु-भाषी क्षेत्र इसमें मिलाए गए। ◇

कारण-क्रम याद रखिए: आंध्र की घोषणा (1952) → आयोग का गठन (1953)। आंध्र ने आयोग को जन्म दिया, आयोग ने आंध्र को नहीं।

6.3 राज्य पुनर्गठन आयोग (फ़ज़ल अली आयोग)

बिंदुविवरण
गठनदिसंबर 1953
अध्यक्षन्यायमूर्ति सैयद फ़ज़ल अली
सदस्यहृदय नाथ कुंज़रू (H.N. Kunzru), के.एम. पणिक्कर (K.M. Panikkar)
कार्यराज्यों के सीमांकन पर विचार
रिपोर्टसितंबर 1955
सिफ़ारिशभाषा को आधार के रूप में स्वीकार किया, पर ‘एक भाषा — एक राज्य’ के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया
परिणामराज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 → 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश
◆◇

★वह भेद जो सबसे अधिक छूटता है: आयोग ने भाषा को एक आधार माना, एकमात्र नहीं। इसीलिए हिंदी-भाषी क्षेत्र आज भी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा में बँटा है — एक भाषा, अनेक राज्य। और इसी असंगत सिद्धांत की सबसे बड़ी क़ीमत बंबई ने चुकाई — आयोग ने उसे द्विभाषी (गुजराती और मराठी दोनों) रखने की सिफ़ारिश की, जिसने अगले चार वर्षों में भारत के दो सबसे बड़े हिंसक भाषाई आंदोलन खड़े किए (§7.1 देखिए)।

7. 1956 के बाद — निरंतर पुनर्गठन, 1960–2014

यहीं वह कहानी शुरू होती है जो NCERT की पुस्तक में केवल एक बॉक्स की सात पंक्तियों में सिमटी है (पृ. 23, ‘कुछ आगे की…’)। असल में हर पंक्ति के पीछे वर्षों का आंदोलन है।

7.1 बंबई का विभाजन — महाराष्ट्र और गुजरात, 1960★★

फ़ज़ल अली आयोग ने बंबई को द्विभाषी रखने की सिफ़ारिश की थी। इसके विरुद्ध दो समानांतर आंदोलन खड़े हुए:

आंदोलननेतृत्वकालखंडपरिणति
संयुक्त महाराष्ट्र समिति — मराठी-भाषी राज्य, बंबई शहर सहितबहुदलीय मोर्चा1955–1960पुलिस गोलीबारी में ~105–106 प्रदर्शनकारी मारे गए; बंबई का फ़्लोरा फाउंटेन चौक आज हुतात्मा चौक (‘शहीद चौक’) कहलाता है
महागुजरात आंदोलन — गुजराती-भाषी अलग राज्यइंदुलाल याज्ञिक8 अगस्त 1956 से — अहमदाबाद के लाल दरवाज़ा स्थित कांग्रेस भवन में पुलिस गोलीबारी (मृतकों की संख्या पर मतभेद — §11)याज्ञिक ने महागुजरात जनता परिषद बनाई
◇

1 मई 1960 को बंबई पुनर्गठन अधिनियम से महाराष्ट्र और गुजरात दो अलग राज्य बने; बंबई शहर महाराष्ट्र को मिला। 1 मई आज भी दोनों राज्यों में राज्य-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

7.2 नगालैंड, 1963

आधार भाषा नहीं, जनजातीय पहचान था। 1951 में अंगामी ज़ापू फ़िज़ो के नेतृत्व में स्वतंत्रता की एकतरफ़ा घोषणा हुई थी; 1963 में नगालैंड राज्य बना — पंजाब (1966) और मेघालय (1972) से पहले, यह अकसर भ्रमित किया जाता है। पर मूल असंतोष तब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ।

7.3 पंजाब का पुनर्गठन — पंजाबी सूबा आंदोलन, 1966★

  • माँग 1948 से — अकाली दल के मास्टर तारा सिंह ने पहली बार पंजाबी-भाषी सूबे की माँग उठाई।
  • आंदोलन 18 वर्ष चला — भूख-हड़तालें और सामूहिक गिरफ़्तारियाँ इसके औज़ार रहे। अगस्त 1965 में संत फ़तेह सिंह ने आमरण अनशन और आत्मदाह की धमकी दी।
  • लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं और माँग मान ली। पंजाब पुनर्गठन विधेयक 3 सितंबर 1966 को लोकसभा में पेश हुआ; 1 नवंबर 1966 से नया, छोटा पंजाबी-भाषी पंजाब; पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को गए; शेष हिंदी-भाषी मैदानी क्षेत्र से हरियाणा बना; चंडीगढ़ दोनों की साझा राजधानी, केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में। ◇

आगे की कड़ी: यही असंतोष 1973 के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और 1980 के दशक के पंजाब संकट (ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, 1985 का राजीव–लोंगोवाल समझौता) की पृष्ठभूमि बना — यह इसी पुस्तक के आगे के अध्याय (क्षेत्रीय आकांक्षाएँ) का विषय है।

7.4 पूर्वोत्तर का बड़ा पुनर्गठन, 1972 और 1987

वर्षराज्य/परिवर्तन
21 जनवरी 1972मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा पूर्ण राज्य बने; अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम को केंद्र-शासित प्रदेश का दर्जा
30 जून 1986राजीव गांधी–लालडेंगा शांति समझौता — दो दशक के मिज़ो सशस्त्र आंदोलन का अंत
20 फरवरी 1987मिज़ोरम पूर्ण राज्य — भारत का सबसे सफल शांति-समझौतों में गिना जाता है
20 फरवरी 1987अरुणाचल प्रदेश भी पूर्ण राज्य
30 मई 1987गोवा भारत का 25वाँ राज्य — NCERT के अपने बॉक्स में इसका नाम छूट जाता है, यद्यपि यह उसी वर्ष का परिवर्तन है (गोवा 1961 में पुर्तगाली शासन से मुक्त हुआ था और 1967 के जनमत-सर्वेक्षण में अलग बने रहने का निर्णय लिया था)
◆◇

7.5 छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड — 2000, तीन अलग-अलग चरित्र के आंदोलन★

तीनों एक ही दिन नहीं, एक ही कारण से भी नहीं बने — यह भूल परीक्षा में सबसे आम है।

राज्यबनामूल राज्यआंदोलन की जड़ें
छत्तीसगढ़1 नवंबर 2000मध्य प्रदेशअपेक्षाकृत कम टकराव वाला आंदोलन
उत्तराखंड9 नवंबर 2000उत्तर प्रदेश★★सबसे उग्र आंदोलन; उत्तराखंड क्रांति दल का नेतृत्व; 2 अक्तूबर 1994 की रात रामपुर तिराहा (मुज़फ़्फ़रनगर) कांड — दिल्ली की ओर धरना-यात्रा पर जा रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस गोलीबारी में छह कार्यकर्ता मारे गए, महिलाओं से बदसलूकी के गंभीर आरोप (संख्या पर मतभेद — §11)
झारखंड15 नवंबर 2000बिहारजड़ें 1973 के झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) में, नेता शिबू सोरेन; आधार — आदिवासी भूमि-अलगाव, विस्थापन, सांस्कृतिक पहचान; भारत का 28वाँ राज्य
◇

भेद जो परीक्षा में उपयोगी है: छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड मुख्यतः प्रशासनिक/सांस्कृतिक असंतोष से बने; झारखंड का आंदोलन सबसे पुराना (1973 से) और आदिवासी पहचान पर आधारित था — इस अर्थ में यह पूर्वोत्तर के जनजातीय राज्यों (§7.4) के करीब है, छत्तीसगढ़-उत्तराखंड से अलग चरित्र का।

7.6 तेलंगाना, 2014 — भाषावार पुनर्गठन के बाद की सबसे बड़ी बिखराव-गाथा★★

आंध्र प्रदेश स्वयं भाषा के आधार पर 1956 में बना था (§6.2) — पर उसी राज्य के भीतर तेलंगाना क्षेत्र में उप-क्षेत्रीय असंतोष पनपता रहा।

तिथिघटना
—नेतृत्व — के. चंद्रशेखर राव (KCR), तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के संस्थापक; नारा ‘जय तेलंगाना’; शिकायतें — सिंचाई, नौकरी, विकास में असंतुलन
29 नवंबर 2009KCR अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठे
9 दिसंबर 2009केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अलग तेलंगाना बनाने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की
18 फरवरी 2014आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 लोकसभा में ध्वनिमत से पारित
1 मार्च 2014राष्ट्रपति की स्वीकृति
2 जून 2014अधिनियम प्रभावी — तेलंगाना भारत का 29वाँ राज्य
◆
  • तेलंगाना — 10 ज़िले; शेष (अवशिष्ट) आंध्र प्रदेश — 13 ज़िले।
  • हैदराबाद को अधिकतम 10 वर्ष तक दोनों राज्यों की साझा राजधानी रखने का प्रावधान था — यह अवधि 2 जून 2024 को समाप्त हुई, जिसके बाद हैदराबाद केवल तेलंगाना की राजधानी रह गया।
  • 🔄 2026 अद्यतन: संसद ने आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित कर अमरावती को आंध्र प्रदेश की स्थायी और एकमात्र राजधानी घोषित किया — प्रभाव पूर्वव्यापी रूप से 2 जून 2024 से। ◇

यह दिखाता है कि पुनर्गठन कभी ‘एक दिन में पूरा’ नहीं होता — 2014 का बँटवारा-अधिनियम राजधानी का प्रश्न भी छोड़ गया था, जो बारह वर्ष बाद, 2026 में जाकर तय हुआ।

8. जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन, 2019–2026 — पाठ्यपुस्तक-पश्चात की सबसे बड़ी घटना★★★

यह इस पूरी फ़ाइल का सबसे लंबा और सबसे नया खंड है, और जान-बूझकर ऐसा है — यह अध्याय के अपने विषय (राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ, विशेषकर आंतरिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण) का सबसे बड़ा उदाहरण है जो पाठ्यपुस्तक-प्रकाशन के बाद घटा। पाठ्यपुस्तक में इसका कोई उल्लेख नहीं है।

8.1 पृष्ठभूमि — अनुच्छेद 370 था क्या

  • अनुच्छेद 370 — संविधान में 17 अक्तूबर 1949 को जोड़ा गया एक ‘अस्थाई उपबंध’ (temporary provision); जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान, अलग ध्वज, और रक्षा, विदेशी मामले तथा संचार को छोड़कर बाक़ी विषयों पर स्वायत्तता देता था — ठीक वही तीन विषय जो §4.2 के परिग्रहण-पत्र में तय हुए थे।
  • मसौदा एन. गोपालस्वामी आयंगर (जम्मू-कश्मीर के भूतपूर्व प्रधानमंत्री) और शेख अब्दुल्ला (कश्मीर के प्रथम निर्वाचित प्रधानमंत्री) ने मिलकर तैयार किया।
  • इसमें बदलाव राज्य की संविधान सभा की सहमति आवश्यक थी — पर वह सभा 1957 में अपना काम पूरा करके भंग हो चुकी थी। यही तथ्य 2019–2023 की पूरी क़ानूनी बहस का केंद्र बना। ◇

8.2 5 अगस्त 2019 — पुनर्गठन कैसे हुआ, चरण-दर-चरण

तिथिघटना
5 अगस्त 2019राष्ट्रपति का संवैधानिक आदेश 272 (C.O. 272) — अनुच्छेद 367 में संशोधन करके अनुच्छेद 370(3) के प्रयोजन हेतु ‘संविधान सभा’ को ‘विधानसभा’ पढ़ा गया; राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन था, इसलिए संसद ने ही राज्य विधानमंडल की भूमिका निभाई
5 अगस्त 2019राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश (गृहमंत्री अमित शाह); उसी दिन पारित — 125 पक्ष, 61 विपक्ष
6 अगस्त 2019लोकसभा में पारित — 370 पक्ष, 70 विपक्ष
9 अगस्त 2019राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की स्वीकृति
31 अक्तूबर 2019अधिनियम प्रभावी — तिथि जान-बूझकर सरदार पटेल की जयंती/राष्ट्रीय एकता दिवस पर रखी गई
◆◇

राज्य दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बँटा — जम्मू-कश्मीर (विधानसभा सहित) और लद्दाख (बिना विधानसभा)। विधिक आधार वही अनुच्छेद 3 था जिससे 1956 से हर राज्य/UT बना है (§5) — इस अर्थ में यह किसी नए सिद्धांत का प्रयोग नहीं, बल्कि उसी पुराने संवैधानिक औज़ार का सबसे बड़ा उपयोग था।

8.3 उच्चतम न्यायालय का निर्णय — 11 दिसंबर 2023★★

मदविवरण
मामलाइन रे अनुच्छेद 370 — निरसन को चुनौती देने वाली 23 याचिकाओं का समूह
पीठपाँच न्यायाधीश — CJI डी.वाई. चंद्रचूड़, संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बी.आर. गवई, सूर्य कांत
निर्णयसर्वसम्मत (5–0) — निरसन वैध
आधारअनुच्छेद 370 ‘अस्थाई’ ही था — रियासत को उस समय की आंतरिक अशांति और युद्ध के बीच संघ में सहजता से लाने का उपबंध; संविधान सभा भंग होने के बाद भी राष्ट्रपति की शक्ति समाप्त नहीं हुई
! जो नहीं तय हुआन्यायालय ने राज्य को केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँटने की संवैधानिकता पर कोई राय नहीं दी — केंद्र के इस आश्वासन को स्वीकार किया कि राज्य-दर्जा बहाल किया जाएगा
निर्देशCJI चंद्रचूड़ — “राज्य-दर्जे की बहाली जल्द से जल्द होगी”; चुनाव आयोग को 30 सितंबर 2024 तक चुनाव कराने का निर्देश
◆

! राजनीतिक रूप से विवादित विषय — तटस्थ भाषा में: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अनुच्छेद 370 को केवल राज्य की अपनी संविधान सभा की सहमति से बदला जा सकता था, जो 1957 में भंग हो चुकी थी — इसलिए निरसन असंवैधानिक है। न्यायालय ने यह तर्क अस्वीकार किया। यहाँ केवल विधिक और तथ्यात्मक स्थिति दी गई है — किसी नैतिक या राजनीतिक निष्कर्ष के रूप में नहीं। यह विषय क़ानूनी रूप से निपट चुका है, पर राजनीतिक रूप से आज भी बहस का विषय है, और दोनों तथ्य साथ-साथ सच हैं।

8.4 परिसीमन, चुनाव और वर्तमान सरकार, 2022–2024

  • परिसीमन आयोग (अध्यक्ष — न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त रंजना प्रकाश देसाई) ने विधानसभा सीटें 87 से बढ़ाकर 90 कीं — जम्मू को 6, कश्मीर को 1 अतिरिक्त सीट।
  • ★पहली बार अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 9 सीटें आरक्षित (जम्मू में 6, घाटी में 3) — पहले J&K विधानसभा में ST आरक्षण कभी नहीं था; अनुसूचित जाति (SC) के लिए 7 सीटें पूर्ववत। 2 सीटें कश्मीरी प्रवासियों के लिए, 1 सीट पाक-अधिकृत कश्मीर से विस्थापितों के लिए उपराज्यपाल द्वारा मनोनीत हो सकती हैं। ◆
  • विधानसभा चुनाव — 18 सितंबर से 1 अक्तूबर 2024 (तीन चरण); नेशनल कॉन्फ्रेंस–कांग्रेस गठबंधन को 90 में से 48 सीटें।
  • 16 अक्तूबर 2024 — उमर अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली — 2019 के बाद J&K की पहली निर्वाचित सरकार, पर राज्य नहीं, केंद्र-शासित प्रदेश की सरकार, सीमित शक्तियों के साथ। ◆

8.5 🔄 वर्तमान स्थिति, 2025–2026 — राज्य-दर्जा अभी बहाल नहीं

  • राज्य-दर्जा आज तक (अगस्त 2026 तक) बहाल नहीं हुआ है, यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने दिसंबर 2023 में “जल्द से जल्द” बहाली का निर्देश दिया था।
  • मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला केंद्र से लगातार माँग कर रहे हैं; अगस्त 2025 में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में घर-घर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया; जुलाई 2026 में पार्टी ने जंतर-मंतर पर धरने की माँग की।
  • ★लद्दाख की अपनी अलग माँग — लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने नवंबर 2025 में गृह मंत्रालय को दो प्रस्तावित विधेयकों का मसौदा सौंपा — ‘जम्मू-कश्मीर राज्य अधिनियम, 2025’ (30-सदस्यीय विधानसभा सहित पूर्ण राज्य-दर्जे के लिए) और ‘संविधान (129वाँ संशोधन) अधिनियम, 2025’ (छठी अनुसूची का संरक्षण, लद्दाख की 97% जनजातीय आबादी की भूमि-संस्कृति के लिए)। मार्च 2026 में लेह और करगिल में एक साथ बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए। ◇

! यह एक चालू, अनिश्चित प्रक्रिया है — भविष्यवाणी के रूप में नहीं, स्थिति के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। न तो राज्य-दर्जे की बहाली की कोई निश्चित तिथि है, न ही लद्दाख की माँग पर केंद्र का अंतिम निर्णय सार्वजनिक हुआ है।

8.6 इस अध्याय के तर्क से इसे कैसे जोड़ें

पाठ्यपुस्तक का यह अध्याय कहता है कि भारत ने राष्ट्र-निर्माण की पहली चुनौती विविधता को दबाकर नहीं, स्वीकार कर के जीती (§9)। जम्मू-कश्मीर की कहानी इस निष्कर्ष को न सिद्ध करती है, न खंडित — यह उसे जटिल बनाती है:

  • एक ओर, यह अनुच्छेद 3 का ही उपयोग है — वही संवैधानिक औज़ार जिससे 1956 से हर राज्य बना (§5, §6), इसलिए प्रक्रिया की दृष्टि से यह असाधारण नहीं है।
  • दूसरी ओर, यह विशेष स्वायत्तता को हटाने की दिशा में है — जबकि 1947–56 की मूल कहानी विशेष व्यवस्थाएँ देकर विविधता को समायोजित करने की थी (जैसे परिग्रहण-पत्र, या पूर्वोत्तर की छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 शृंखला, जो आज भी लागू हैं)।

★निबंध-प्रश्न के लिए: क्या 2019 का पुनर्गठन 1947–56 की ‘विविधता की स्वीकृति’ वाली नीति की निरंतरता है, या उससे प्रस्थान? दोनों तर्कों के लिए साक्ष्य ऊपर मौजूद हैं — किसी एक निष्कर्ष को अंतिम मत मानिए।

9. मूल्यांकन — प्रयोग सफल क्यों रहा

आशंका क्या थी: कि भाषाई राज्य अलगाववाद को हवा देंगे और नव-निर्मित राष्ट्र टूट जाएगा।

वास्तव में क्या हुआ:

  1. देश टूटा नहीं; एकता मज़बूत हुई। भाषाई मान्यता ने असंतोष को संविधान के भीतर रास्ता दे दिया — अलगाव के बजाय भागीदारी।
  2. सत्ता का लोकतंत्रीकरण। राजनीति और प्रशासन का रास्ता एक छोटे अंग्रेजीभाषी अभिजात वर्ग से आगे, क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वाले नेतृत्व के लिए खुला।
  3. सीमांकन का समरूप आधार मिला — पहले सीमाएँ प्रशासनिक सुविधा या विजय-क्रम से बनी थीं।
  4. विभिन्नता का सिद्धांत स्वीकृत हुआ — यही सबसे गहरा परिणाम है।

पर मूल्य भी चुकाया गया — ईमानदारी से यह भी कहना चाहिए:

  • हर नए राज्य के भीतर नए भाषाई अल्पसंख्यक बन गए।
  • ‘भूमिपुत्र’ (sons of the soil) की राजनीति को आधार मिला।
  • भाषा हर जगह पर्याप्त आधार नहीं थी — 2000 के तीन राज्य और तेलंगाना (§7.5, §7.6) इसका प्रमाण हैं।
  • कुछ आंदोलनों की क़ीमत मानव जीवन में चुकाई गई — बंबई (~105–106), महागुजरात, रामपुर तिराहा (§7.1, §7.5) — पुनर्गठन कभी पूरी तरह शांतिपूर्ण नहीं रहा, भले ही उसका समग्र परिणाम स्थिरता का रहा हो।

संतुलित निष्कर्ष: भाषावार पुनर्गठन ने एक समस्या हल की और एक नई समस्या का बीज भी बोया। इसे निर्विवाद सफलता कहना उतना ही अधूरा है जितना इसे विफलता कहना।

तुलनात्मक दृष्टि — भारत और सोवियत संघ

दोनों ने विशाल भौगोलिक और जनसांख्यिकीय विविधता पर राष्ट्र-निर्माण किया। अंतर निर्णायक हैं: भारत ने यह काम बहुदलीय लोकतंत्र और सार्वभौम वयस्क मताधिकार के भीतर किया, सोवियत संघ ने एकदलीय व्यवस्था में; भारत ने भाषाई माँगों को मान्यता देकर संघ के भीतर जगह दी। सोवियत संघ 1991 में बिखर गया; भारत नहीं — और अस्सी वर्षों बाद भी, जम्मू-कश्मीर जैसे सबसे कठिन मामलों में भी, समाधान अब तक संविधान के भीतर ही खोजा गया है (न्यायालय, चुनाव, संसद) — सड़क या सीमा-पार युद्ध से नहीं।

10. परीक्षा-दृष्टि — एक पृष्ठ में सब

तथ्यउत्तर
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृति18 जुलाई 1947
पैरामाउंटसी की समाप्ति — धाराधारा 7(1)(b)
परिग्रहण-पत्र के तीन विषयप्रतिरक्षा, विदेशी मामले, संचार
सीमा आयोग के अध्यक्षसर सिरिल रैडक्लिफ़
रैडक्लिफ़ अवार्ड की घोषणा17 अगस्त 1947
रियासतों की संख्या565
रियासती विभाग का गठन / सचिव5 जुलाई 1947 / वी.पी. मेनन
जूनागढ़ जनमत-संग्रह20 फरवरी 1948, 99.94% भारत के पक्ष में
हैदराबाद कार्रवाई का नाम और तिथिऑपरेशन पोलो, 13–18 सितंबर 1948
मणिपुर विलय समझौता21 सितंबर 1949, प्रभावी 15 अक्तूबर 1949
संविधान अंगीकृत / लागू26 नवंबर 1949 / 26 जनवरी 1950
राज्य पुनर्गठन की संवैधानिक शक्तिअनुच्छेद 3 (राज्य से परामर्श, सहमति नहीं)
धर आयोग17 जून 1948; अध्यक्ष एस.के. धर; भाषाई आधार अस्वीकार
जे.वी.पी. समितिदिसंबर 1948; नेहरू, पटेल, पट्टाभि सीतारमैया
श्रीरामुलु का अनशन19 अक्तूबर – 15 दिसम्बर 1952
प्रथम भाषाई राज्यआंध्र राज्य (1953), राजधानी कर्नूल
राज्य पुनर्गठन आयोगदिसंबर 1953; फ़ज़ल अली (अध्यक्ष), कुंज़रू, पणिक्कर
आयोग की रिपोर्टसितंबर 1955 — भाषा स्वीकार, ‘एक भाषा एक राज्य’ अस्वीकार
राज्य पुनर्गठन अधिनियम1956 → 14 राज्य + 6 केंद्र-शासित प्रदेश
महाराष्ट्र-गुजरात1 मई 1960; संयुक्त महाराष्ट्र समिति (~105–106 शहीद), महागुजरात आंदोलन (इंदुलाल याज्ञिक)
नगालैंड1963 — पंजाब व मेघालय से पहले
पंजाब-हरियाणा-हिमाचल1 नवंबर 1966; मास्टर तारा सिंह, संत फ़तेह सिंह; चंडीगढ़ केंद्र-शासित
मेघालय-मणिपुर-त्रिपुरा21 जनवरी 1972
मिज़ोरम / अरुणाचल / गोवा1987 — मिज़ोरम व अरुणाचल 20 फ़रवरी; गोवा 30 मई, 25वाँ राज्य
छत्तीसगढ़ / उत्तराखंड / झारखंड1 / 9 / 15 नवंबर 2000; झारखंड 28वाँ राज्य
रामपुर तिराहा कांड2 अक्तूबर 1994; उत्तराखंड आंदोलन का निर्णायक मोड़
तेलंगाना2 जून 2014, 29वाँ राज्य; नेता KCR; अनशन नवंबर 2009
आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014पारित 18 फरवरी 2014; स्वीकृति 1 मार्च 2014
वर्तमान संख्या28 राज्य + 8 केंद्र-शासित प्रदेश
अनुच्छेद 370 जोड़ा गया17 अक्तूबर 1949
J&K पुनर्गठन अधिनियम, 2019पारित 5–6 अगस्त; स्वीकृति 9 अगस्त; प्रभावी 31 अक्तूबर 2019
उच्चतम न्यायालय का निर्णय11 दिसंबर 2023; 5 न्यायाधीश (CJI चंद्रचूड़ सहित); 5–0, निरसन वैध
J&K परिसीमन90 सीटें (पहली बार 9 ST आरक्षित, 7 SC)
J&K विधानसभा चुनाव18 सितंबर – 1 अक्तूबर 2024; NC-कांग्रेस 48/90
J&K मुख्यमंत्रीउमर अब्दुल्ला, शपथ 16 अक्तूबर 2024
J&K राज्य-दर्जा🔄 अभी बहाल नहीं (अगस्त 2026 तक)
लद्दाख की माँग🔄 छठी अनुसूची + राज्य-दर्जा; प्रस्ताव नवंबर 2025, विचाराधीन
आंध्र प्रदेश की स्थायी राजधानीअमरावती — 2026 संशोधन अधिनियम, प्रभाव 2 जून 2024 से पूर्वव्यापी

11. सीमाएँ और अनिश्चितताएँ — ईमानदार सूची

यह फ़ाइल “100% शुद्ध” होने का दावा नहीं करती। नीचे वह सब है जो निश्चित नहीं है।

बिंदुस्थिति
आंध्र राज्य की गठन-तिथिस्रोतों में मतभेद — 1 अक्तूबर 1953 और 1 नवंबर 1953 दोनों मिलते हैं। वर्ष 1953 निर्विवाद है; परीक्षा में वर्ष लिखना सुरक्षित
विभाजन के मृतकों की संख्याकोई आधिकारिक गणना नहीं; अनुमान 2 लाख–20 लाख
विस्थापितों की संख्यापरिभाषा-सापेक्ष; 80 लाख से 1.8 करोड़ तक
हैदराबाद हिंसा के मृतकसुंदरलाल समिति 27,000–40,000; अन्य अनुमान अधिक; कोई सर्वमान्य आँकड़ा नहीं
“रैडक्लिफ़ को पाँच सप्ताह मिले, वे पहले कभी भारत नहीं आए थे”व्यापक रूप से उद्धृत, प्राथमिक स्रोत से पुष्ट नहीं कर सका — तथ्य के रूप में मत लिखिए
परिग्रहण-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली प्रथम रियासतसत्यापित नहीं — स्रोत भिन्न नाम देते हैं
महागुजरात आंदोलन (8 अगस्त 1956) के मृतकों की संख्याबड़ा अंतर — कुछ स्रोत 4 विद्यार्थी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने विधानसभा में 8–26 अगस्त के बीच 24 मृत्यु का आँकड़ा दिया था
संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के शहीदों की संख्या — 105 या 106?दोनों आँकड़े प्रचलित; “100 से अधिक” कहना सुरक्षित
रामपुर तिराहा कांड के मृतकों की संख्याअधिकांश स्रोत छह, कुछ सात
जम्मू-कश्मीर का राज्य-दर्जा कब बहाल होगा🔄 कोई निश्चित तिथि नहीं; उच्चतम न्यायालय ने “जल्द से जल्द” कहा (दिसंबर 2023), अगस्त 2026 तक बहाली नहीं हुई
लद्दाख को छठी अनुसूची/राज्य-दर्जा मिलेगा या नहीं🔄 प्रस्ताव विचाराधीन (नवंबर 2025 से); केंद्र का अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं
अनुच्छेद 370 के निरसन की संवैधानिक/नैतिक औचित्यता पर बहस! राजनीतिक रूप से विवादित। न्यायालय ने क़ानूनी रूप से वैध ठहराया; यह किसी राजनीतिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है — केवल विधिक व तथ्यात्मक स्थिति दी गई है

अस्थिर तथ्य (पुनः जाँच आवश्यक): राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों की संख्या; जम्मू-कश्मीर का राज्य-दर्जा; लद्दाख की माँग की स्थिति; चालू राज्य-आंदोलन। अगली अनुशंसित जाँच: अगस्त 2027, या किसी नए राज्य/UT के गठन पर, या J&K राज्य-दर्जे की बहाली पर तुरंत।

12. स्रोत

प्राथमिक ◆

सशक्त द्वितीयक ◇