NCERT से आगे — संवर्धन सामग्री(Enrichment Beyond the Textbook)
यह क्या है? पाठ्यपुस्तक जहाँ रुक जाती है, यह दस्तावेज़ वहाँ से शुरू होता है। हर बाहरी तथ्य जाँचा गया है और स्रोत-चिह्न के साथ दर्ज़ है।
| चिह्न | अर्थ |
|---|---|
| 【पाठ】 | NCERT पाठ्यपुस्तक में मौजूद |
| ◆ | प्राथमिक स्रोत — संविधान, न्यायालय का निर्णय, जाँच-आयोग की रिपोर्ट, सरकारी अभिलेख |
| ◇ | द्वितीयक स्रोत — प्रामाणिक अकादमिक/पत्रकारीय अभिलेख |
| ➕ | व्याख्या और संश्लेषण (तथ्य नहीं, तर्क) |
!! बोर्ड-परीक्षा: उत्तर की रीढ़ 【पाठ】 रहे। यहाँ की सामग्री उत्तर के अंत में एक-दो पंक्तियों में जोड़िए।
तिहाई-1 · वह मुकदमा जिसका नाम पाठ नहीं लेता
§1 · अप्रैल 1976 का फ़ैसला — उसका नाम, उसका अनुपात, और उसका एकाकी विरोध★★
【पाठ】 केवल इतना कहती है (पृ. 101): “1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले को उलट दिया और सरकार की दलील मान ली। …इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।” ! पर वह न मुकदमे का नाम देती है, न यह कि किसी एक न्यायाधीश ने असहमति जताई थी।
| मद | ◆/◇ विवरण |
|---|---|
| ★★मुकदमे का नाम | अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट, जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल — प्रसिद्ध नाम: ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण मुकदमा’ (Habeas Corpus Case) |
| वर्ष | 1976 |
| ★निर्णय का अनुपात | 4 : 1 |
| बहुमत | मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे, तथा न्यायमूर्ति बेग, चंद्रचूड़ और भगवती |
| ★★एकमात्र असहमति | न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना |
| बहुमत का निष्कर्ष | आपातकाल में कोई व्यक्ति अनुच्छेद 21 के प्रवर्तन के लिए अदालत नहीं जा सकता; बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई-योग्य नहीं, चाहे नज़रबंदी अवैध या दुर्भावनापूर्ण ही क्यों न हो |
| ★★खन्ना का असहमति-मत | “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल अनुच्छेद 21 से नहीं निकलता।” अनुच्छेद 21 के अभाव में भी राज्य के पास यह शक्ति नहीं है कि वह विधि के अधिकार के बिना किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ले।” |
और उसकी व्यक्तिगत कीमत ◇ध्यान★★
न्यायमूर्ति खन्ना सबसे वरिष्ठ होने के बावजूद मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाए गए — उनकी वरिष्ठता की अनदेखी कर दी गई।
★★➕ इस तथ्य को 【पाठ】 पृ. 96 से जोड़िए और एक पूरा वृत्त बन जाता है: 1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी हुई थी क्योंकि उन्होंने सरकार के विरुद्ध फ़ैसला दिया था। 1976 में एक और न्यायाधीश की वरिष्ठता की अनदेखी हुई — उसी कारण से। यानी पाठ का ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ वाला वाक्यांश कोरा शब्द नहीं था; उसके ठोस परिणाम थे।
§2 · और चालीस साल बाद उस फ़ैसले का क्या हुआ ◆★★
2017 में न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (निजता के अधिकार का मुकदमा) में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने 1976 के उस फ़ैसले को स्पष्ट रूप से निरस्त (overrule) कर दिया और उसके बहुमत-मत को “गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण” बताया। न्यायालय ने माना कि “न्यायमूर्ति खन्ना स्पष्ट रूप से सही थे।”
★★➕ यह इस अध्याय की सबसे प्रेरक कड़ी है, और इसे कक्षा में ज़रूर सुनाइए: “1976 में एक न्यायाधीश अकेले असहमत हुए और उसकी कीमत अपने करियर से चुकाई। 2017 में नौ न्यायाधीशों ने कहा कि अकेला वही सही था।” ★पाठ्यपुस्तक का तीसरा सबक — “अदालतों ने… नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई” — इस घटना में अपने पूर्ण रूप तक पहुँचता है।
तिहाई-2 · संख्याएँ जो पाठ नहीं देता
§3 · 42वाँ संशोधन — पूरा चित्र ◆+◇★★
【पाठ】 केवल एक बदलाव बताती है — कार्यकाल 5 से 6 साल। ➕ पर इसे ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहा जाता है, क्योंकि उसने संविधान के अनेक हिस्सों को बदला।
| # | बदलाव | 【स्रोत】 |
|---|---|---|
| 1 | ★★प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े गए — ‘समाजवादी’ (Socialist), ‘पंथनिरपेक्ष’ (Secular) और ‘अखंडता’ (Integrity) | ◆ |
| 2 | ★★मौलिक कर्तव्य जोड़े गए — अनुच्छेद 51A, कुल दस कर्तव्य | ◆ |
| 3 | 【पाठ】 विधायिका का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष | 【पाठ】 |
| 4 | पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित — यानी केंद्र की शक्ति बढ़ी | ◇ |
| 5 | ! न्यायिक पुनरावलोकन (judicial review) की परिधि सीमित की गई | ◇ |
| 6 | 【पाठ】 प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं | 【पाठ】 |
★★➕ कक्षा में यह कहिए: “आपकी पाठ्यपुस्तक 42वें संशोधन का सिर्फ़ एक बदलाव बताती है, क्योंकि वही अध्याय के तर्क से जुड़ा है — चुनाव टालना। पर उसी संशोधन ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द भी जोड़े और मौलिक कर्तव्य भी दिए। यानी उसी दस्तावेज़ में वह भी है जिसे हम आज संविधान की पहचान मानते हैं। इसीलिए इसे ‘लघु संविधान’ कहा जाता है।” ! यह विरोधाभास ज़रूर बताइए — एक ही संशोधन में लोकतंत्र-विरोधी प्रावधान भी थे और स्थायी योगदान भी।
§4 · 44वाँ संशोधन, 1978 — पाठ के ‘दूसरे सबक’ का असली नाम ◆★★
【पाठ】 (पृ. 102) कहती है कि खामियाँ “बाद में सुधार ली गईं” — पर संशोधन का नाम नहीं देती।
| # | सुधार | 【पाठ】 में? |
|---|---|---|
| 1 | ★★अनुच्छेद 352 में ‘आंतरिक अशांति’ (internal disturbance) की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ (armed rebellion) | ✓ है (शब्द के रूप में) |
| 2 | ★★आपातकाल की घोषणा के लिए राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की लिखित सलाह अनिवार्य | ✓ है |
| 3 | ★विधायिका का कार्यकाल वापस 5 वर्ष | ! नहीं |
| 4 | ★★आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं किए जा सकते | ! नहीं |
| 5 | ★अनुच्छेद 359 में बदलाव — अब आपातकाल में भी बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका दी जा सकती है | ! नहीं |
★★➕ बिंदु 4 और 5 सबसे महत्वपूर्ण हैं, और वे सीधे §1 के मुकदमे का उत्तर हैं। 1976 में अदालत ने कहा था कि सरकार जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार वापस ले सकती है। 1978 में संसद ने संविधान बदलकर कहा — नहीं, अब यह असंभव है। ★यानी न्यायपालिका जो नहीं बचा सकी, वह विधायिका ने बचा दिया। और 2017 में न्यायपालिका ने अपनी भूल स्वयं स्वीकार की। यही तीन चरणों की पूरी कहानी है — और यह कक्षा में सुनाने लायक है।
§5 · शाह आयोग — नाम, तिथियाँ और वह एक संख्या ◆+◇★★
【पाठ】 शाह आयोग का उल्लेख दो बार करती है, पर न अध्यक्ष का नाम देती है, न कोई आँकड़ा।
| मद | विवरण |
|---|---|
| ★अध्यक्ष | सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.सी. शाह |
| गठन | 28 मई 1977, जाँच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3 के अंतर्गत |
| उद्देश्य | आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों, उल्लंघनों और हिंसा की जाँच |
| रिपोर्ट | तीन भागों में; अंतिम रिपोर्ट 6 अगस्त 1978 |
| ★★एक बड़ा आँकड़ा | निवारक नज़रबंदी कानूनों के अंतर्गत लगभग एक लाख ग्यारह हज़ार (≈1,11,000) लोग गिरफ्तार किए गए |
★★➕ यह संख्या 【पाठ】 के उस वाक्य को ठोस बना देती है — “हज़ारों लोगों की गिरफ्तारी”। ★उत्तर में लिखने का तरीका: “शाह आयोग के अनुसार निवारक नज़रबंदी कानूनों के तहत लगभग एक लाख ग्यारह हज़ार लोग गिरफ्तार किए गए थे।” — एक पंक्ति, और उत्तर तुरंत भारी हो जाता है।
§6 · ‘मीसा’ — वह कानून जिसका नाम कार्टून में है, पाठ में नहीं ◆★
【पाठ】 (पृ. 104) का लक्ष्मण-कार्टून ‘MISA’ लिखा काँटेदार गोला दिखाता है — पर मुख्य पाठ इस शब्द की व्याख्या नहीं करता।
| मद | विवरण |
|---|---|
| ★पूरा नाम | आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम — Maintenance of Internal Security Act (MISA) |
| वर्ष | 1971 |
| प्रकृति | निवारक नज़रबंदी का कानून — यानी बिना अपराध सिद्ध हुए गिरफ़्तारी की शक्ति |
| ! आपातकाल में | इसी के अंतर्गत बड़े पैमाने पर विपक्षी नेता और कार्यकर्ता बंद किए गए |
| ★★अंत | आपातकाल के बाद व्यापक आलोचना के चलते 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने इसे निरस्त कर दिया |
★➕ अब कार्टून पूरी तरह खुल जाता है: कांग्रेस की गिरी हुई आकृति के पैरों में ‘EMERGENCY’ की बेड़ी, गले में ‘CENSOR’ का पट्टा, जंजीर से बँधा ‘MISA’ का गोला और ‘42nd AMENDMENT’ की एक और जंजीर। चारों वही औज़ार हैं जिनसे आपातकाल चला — और कार्टूनिस्ट कह रहा है कि अंततः वही उसका बोझ बन गए।
§7 · नसबंदी — वे आँकड़े जिन्हें पाठ केवल छूकर निकल जाता है ◇ध्यान★★
【पाठ】 केवल इतना कहती है (पृ. 104): “लोगों को ज़बरन उजाड़ने और विस्थापित करने अथवा ज़बरन नसबंदी करने का काम ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था।” और पृ. 100 के कोलाज में अमूल का व्यंग्य-विज्ञापन है — “We’ve always practised Compulsory Sterilisation”।
| वर्ष | नसबंदी की संख्या |
|---|---|
| 1975–76 | लगभग 26.42 लाख |
| !★★1976–77 | लगभग 81.32 लाख |
| ★दो वर्षों में कुल | लगभग 1.07 करोड़ |
| ! साथ ही | लगभग 1,774 मौतें इस प्रक्रिया से जुड़ी हुई बताई गईं |
★★➕ 1975-76 से 1976-77 में संख्या तीन गुना से अधिक हो गई — और यही बताता है कि यह कोई सामान्य स्वास्थ्य-कार्यक्रम नहीं, एक लक्ष्य-आधारित प्रशासनिक अभियान बन चुका था। ★और यही 【पाठ】 के उस वाक्य की व्याख्या है कि “आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था” — इसीलिए उत्तर भारत में कांग्रेस का सफ़ाया हुआ और दक्षिण में नहीं। ! कक्षा में यह विषय संयत भाषा में रखिए — आँकड़े दीजिए, विशेषण नहीं।
तिहाई-3 · गहराई के सवाल
§8 · आपातकाल का सबसे बड़ा विरोधाभास★★
➕ इस अध्याय का सबसे विचारोत्तेजक तथ्य यह है कि आपातकाल पूरी तरह वैध रास्ते से आया:
| कदम | क्या यह संविधान के अनुसार था? |
|---|---|
| अनुच्छेद 352 का प्रयोग | ✓ हाँ — 【पाठ】: “तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था” |
| राष्ट्रपति की उद्घोषणा | ✓ हाँ — संवैधानिक प्रक्रिया |
| मौलिक अधिकारों का निलंबन | ✓ हाँ — तत्कालीन अनुच्छेद 359 के अंतर्गत |
| 42वाँ संशोधन | ✓ हाँ — संसद ने आवश्यक बहुमत से पारित किया |
| न्यायालय की स्वीकृति | ✓ हाँ — अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की दलील मानी |
★★➕ यानी हर कदम कानूनी था, और फिर भी परिणाम अलोकतांत्रिक था। यही 【पाठ】 के निष्कर्ष का पूरा अर्थ है: “यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।” ★और यही 44वें संशोधन की ज़रूरत भी समझाता है — क्योंकि समस्या कानून तोड़ने की नहीं, कानून के भीतर रह कर उसका दुरुपयोग करने की थी।
§9 · आपातकाल के तीन प्रकार — जो पाठ नहीं गिनाता ◆★
➕ संविधान में आपातकाल के तीन प्रकार हैं। 【पाठ】 केवल पहले की बात करती है।
| प्रकार | अनुच्छेद | आधार |
|---|---|---|
| ★★राष्ट्रीय आपातकाल | 352 | युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (1978 से पहले: ‘आंतरिक अशांति’) |
| राष्ट्रपति शासन | 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता |
| वित्तीय आपातकाल | 360 | भारत की वित्तीय स्थिरता को ख़तरा |
★➕ यह अंतर परीक्षा में बहुत काम आता है। इसी अध्याय में दोनों दिखते हैं — गुजरात में 1974 में अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) और 25 जून 1975 को अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल)। ! विद्यार्थी इन दोनों को अक्सर एक ही मान लेते हैं। ➕ और यह भी बताइए: वित्तीय आपातकाल आज तक कभी लागू नहीं हुआ।
§10 · 1975 का आपातकाल कौन-सा था — पहला, दूसरा या तीसरा? ◇★
➕ भारत में राष्ट्रीय आपातकाल तीन बार लगा है:
| # | कब | आधार |
|---|---|---|
| 1 | 1962 — चीन-युद्ध के समय | बाहरी आक्रमण |
| 2 | 1971 — पाकिस्तान-युद्ध के समय | बाहरी आक्रमण |
| ★★3 | 1975 | “अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका” |
★★➕ इसीलिए 【पाठ】 का पृ. 100 वाला अख़बारी शीर्षक — “नया आपातकाल” — अर्थपूर्ण है। और यही 1975 को बाकी दोनों से अलग करता है: पहले दो युद्ध के कारण थे, तीसरा अंदरूनी राजनीति के कारण। 【पाठ】 इसी अंतर से अध्याय शुरू करती है — “आमतौर पर आपातकाल से हमारे मन में युद्ध और आक्रमण… की तसवीर कौंधती है लेकिन…”।
§11 · पाँच बहसें जो इस अध्याय से निकलती हैं★
| # | बहस | दोनों पक्ष |
|---|---|---|
| 1 | ★★क्या जेपी का सेना-पुलिस से “अवैधानिक आदेश न मानने” का आह्वान लोकतांत्रिक था? | ★हाँ: अनैतिक आदेश मानने से इनकार नागरिक-कर्तव्य है। ! नहीं: वर्दीधारी बलों से अपील अनुशासन तोड़ती है — और 【पाठ】 का हाशिया यही पूछता है |
| 2 | क्या 1975 की स्थिति सचमुच ‘आपातकाल’ के योग्य थी? | ! नहीं: कोई युद्ध या सशस्त्र विद्रोह नहीं था। ★तर्क: तत्कालीन अनुच्छेद 352 में ‘आंतरिक अशांति’ पर्याप्त आधार था — और यही खामी 1978 में सुधारी गई |
| 3 | ★क्या न्यायपालिका ने 1976 में अपना कर्तव्य निभाया? | ! नहीं — और यह स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में स्वीकार किया (§2) |
| 4 | क्या 42वें संशोधन को पूरी तरह नकारात्मक कहा जा सकता है? | ! नहीं — उसी ने प्रस्तावना के तीन शब्द और मौलिक कर्तव्य दिए (§3) |
| 5 | ★★जनता पार्टी की विफलता से लोकतंत्र को नुकसान हुआ या लाभ? | ! नुकसान: अस्थिरता। ★लाभ: सिद्ध हुआ कि सत्ता-परिवर्तन संभव है और मतदाता अस्थिरता को भी दंड देता है |
§12 · अध्याय की स्थायी सीख — एक पैराग्राफ़ में★★
➕ आपातकाल भारत के लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा थी, और उसका परिणाम मिला-जुला है। वह विफल इसलिए रहा कि सत्ता ने पूर्ण बहुमत रखते हुए भी लोकतंत्र को ठप्प किया, संस्थाएँ झुक गईं, और न्यायपालिका ने भी नागरिक के जीवन-अधिकार पर सरकार का पक्ष लिया। ★पर वह सफल भी रहा — क्योंकि अठारह महीने बाद वही व्यवस्था चुनाव कराने पर मजबूर हुई, मतदाता ने उसे निर्णायक रूप से हराया, और उसके बाद संविधान ने अपनी ही खामियाँ सुधार लीं। ★★इसलिए 【पाठ】 का सबसे संतुलित वाक्य यही है: “भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” ध्यान दीजिए — पाठ यह नहीं कहती कि ‘असंभव’ है। वह कहती है ‘कठिन’। और यही सतर्कता इस अध्याय का असली सबक है।
§13 · परीक्षा में इस्तेमाल करने योग्य दस पंक्तियाँ★
एक उत्तर में एक ही जोड़िए।
- “अप्रैल 1976 का वह फ़ैसला ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण मुकदमे’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें निर्णय 4:1 का था।”
- “न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने अकेले असहमति जताई थी और इसकी कीमत उन्हें मुख्य न्यायाधीश न बन पाने से चुकानी पड़ी।”
- “2017 में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने उस फ़ैसले को निरस्त करते हुए माना कि न्यायमूर्ति खन्ना ही सही थे।”
- “42वें संशोधन को ‘लघु संविधान’ कहा जाता है; उसी ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द तथा अनुच्छेद 51A के मौलिक कर्तव्य भी जोड़े।”
- “पाठ जिन सुधारों की बात करता है, वे 44वें संविधान संशोधन (1978) से हुए।”
- “44वें संशोधन के बाद आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं किए जा सकते।”
- “शाह आयोग की अध्यक्षता भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.सी. शाह ने की; उसकी अंतिम रिपोर्ट अगस्त 1978 में आई।”
- “आयोग के अनुसार निवारक नज़रबंदी कानूनों के तहत लगभग एक लाख ग्यारह हज़ार लोग गिरफ्तार किए गए।”
- “कार्टून में दिखने वाला ‘मीसा’ आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम, 1971 था, जिसे 1978 में निरस्त कर दिया गया।”
- “1975 का आपातकाल भारत का तीसरा राष्ट्रीय आपातकाल था — पर पहला जो युद्ध के कारण नहीं लगाया गया।”
🌐 स्रोत-सूची
| क्षेत्र | स्रोत-प्रकार |
|---|---|
| NCERT पाठ 【पाठ】 | स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, अध्याय 6, पृष्ठ 92–111 — 150 dpi पर दृश्य पठन |
| ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) — 4:1 निर्णय; पीठ के नाम; खन्ना का असहमति-मत | ◆ न्यायालय का निर्णय |
| न्यायमूर्ति खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी | ◇ |
| पुट्टास्वामी (2017) — नौ-न्यायाधीश पीठ ने ADM जबलपुर को निरस्त किया | ◆ न्यायालय का निर्णय |
| 42वाँ संशोधन — प्रस्तावना के तीन शब्द, अनुच्छेद 51A के मौलिक कर्तव्य, समवर्ती सूची में स्थानांतरण | ◆ भारत का संविधान |
| 44वाँ संशोधन, 1978 — ‘सशस्त्र विद्रोह’, लिखित सलाह, कार्यकाल 5 वर्ष, अनुच्छेद 20 व 21 का संरक्षण, अनुच्छेद 359 में बदलाव | ◆ भारत का संविधान |
| शाह आयोग — अध्यक्ष जे.सी. शाह; गठन 28 मई 1977; अंतिम रिपोर्ट 6 अगस्त 1978; ≈1,11,000 गिरफ्तारियाँ | ◆ आयोग की रिपोर्ट +◇ |
| मीसा (आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम), 1971; 1978 में निरस्त | ◆ विधि-पाठ |
| नसबंदी के आँकड़े — 1975-76 में ≈26.42 लाख; 1976-77 में ≈81.32 लाख; दो वर्षों में ≈1.07 करोड़; ≈1,774 मौतें | ◇ सरकारी एवं अकादमिक अभिलेख |
| आपातकाल के तीन प्रकार (अनुच्छेद 352, 356, 360); तीन राष्ट्रीय आपातकाल (1962, 1971, 1975) | ◆ भारत का संविधान +◇ |
! सटीकता-नीति: कोई भी तथ्य स्मृति से नहीं लिखा गया। जहाँ स्रोतों में मामूली भिन्नता है (विशेषकर नसबंदी और गिरफ़्तारी के आँकड़ों में), वहाँ “लगभग” लिखा गया है। ! यह अध्याय राजनीतिक रूप से संवेदनशील है — इसलिए यहाँ केवल संख्याएँ और न्यायिक/वैधानिक तथ्य दिए गए हैं, कोई मूल्यांकनात्मक विशेषण नहीं।