Chapter 3नियोजित विकास की राजनीति

Beyond the textbook31 minSources checked

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

पाठ्यपुस्तक से आगे — संवर्धन सामग्री (T1 · T2 · T3)

यह दस्तावेज़ पाठ्यपुस्तक का विकल्प नहीं, विस्तार है। T1 — बोर्ड परीक्षा के लिए भी उपयोगी; कक्षा में बताई जा सकती है T2 — प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC प्रारंभिक, राज्य PCS, CUET, SSC, NDA/CDS) के लिए T3 — उन्नत स्तर (UPSC मुख्य परीक्षा, वैकल्पिक विषय)

★हर गैर-स्पष्ट तथ्य वेब-सत्यापित है — अद्यतन अगस्त 2026 तक। स्रोत-चिह्न: ◆ = प्राथमिक स्रोत · ◇ = द्वितीयक स्रोत · 【पाठ】 = NCERT पाठ्यपुस्तक पूरी स्रोत-सूची अंत में।

विषय-सूची

#खंडस्तर
1★★पोस्को की कहानी का अंत — 2017 में क्या हुआT1
2! प्रश्न 4 के तीन ‘लापता’ नामों की पूरी पृष्ठभूमिT1
3सभी पंचवर्षीय योजनाओं की तालिका (1951–2017)T1–T2
4★योजना आयोग से नीति आयोग तक — पूरी तुलनाT1–T2
5‘महालनोबिस मॉडल’ का असली तर्कT2–T3
6‘नेहरूवादी सर्वसम्मति’ और उसकी आलोचनाएँT2–T3
7★‘केरल मॉडल’ का दूसरा अध्याय — जन-योजना अभियान, 1996T1–T2
8भूमि-सुधार — घोषणा और अमल के बीच की खाईT2
9नियोजन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वT1–T2
10विकास के सिद्धांत — तीन नज़रिएT3
11दो प्रकरण-अध्ययनT1–T2
12संक्षिप्ताक्षर और पद-कोशT1–T2
13अभ्यास प्रश्न (20)सभी
14स्रोत-सूची—

1 · पोस्को की कहानी का अंत — 2017 में क्या हुआ 【T1】★★

पाठ्यपुस्तक 23 जून 2006 की एक खबर पर रुक जाती है 【पाठ】। उसके बाद ग्यारह साल तक क्या हुआ, यह जानना इस अध्याय के तर्क को पूरा कर देता है। ◇

चरणक्या हुआ
2005पोस्को (दक्षिण कोरिया) और उड़ीसा सरकार के बीच सहमति-पत्र — जगतसिंहपुर में 12 मिलियन टन का इस्पात संयंत्र; निवेश लगभग ₹52,000 करोड़
2006 से★धिंकिया, नुआगाँव और गढ़कुजंगा के ग्रामीणों का लगातार प्रतिरोध 【पाठ】 — जिसे ‘एंटी-पोस्को आंदोलन’ कहा गया
! बाधाएँभूमि-अधिग्रहण के विवाद · नियामकीय देरी · स्थानीय प्रतिरोध; और ★खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में बदलाव — जिसके बाद राज्य सरकार संयंत्र के लिए ‘कैप्टिव खदान’ देने का वादा नहीं कर सकती थी
★★मार्च 2017पोस्को ने परियोजना से औपचारिक रूप से हटने की घोषणा की
★भूमिकंपनी ने पारादीप के पास मिली लगभग 2,700 एकड़ भूमि लौटाने की पेशकश की; अधिगृहीत भूमि उड़ीसा सरकार के ‘लैंड बैंक’ में चली गई
! कीमतपरियोजना बारह वर्ष चली और बनी नहीं — पर उस दौरान हज़ारों पेड़ काटे जा चुके थे और अनेक लोगों की आजीविका बाधित हो चुकी थी

★★और यही इस अध्याय का सबसे शक्तिशाली निष्कर्ष है — कक्षा में यह ज़रूर कहिए: “पाठ्यपुस्तक ने 2006 में पूछा था — ‘किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?’ 2017 में उस सवाल का जवाब आ गया — और वह जवाब न विशेषज्ञों ने दिया, न कंपनी ने। वह जवाब बारह साल के राजनीतिक संघर्ष से निकला। यानी पाठ्यपुस्तक का दावा सही निकला: अंतिम निर्णय राजनीतिक ही होता है।”

! पर संतुलन भी रखिए: “परियोजना रुक गई, पर न रोज़गार आया, न पेड़ लौटे। यह किसी की पूरी जीत नहीं थी। यही विकास की राजनीति की असली कठिनाई है।”

★और कहानी अभी चल भी रही है — बाद के वर्षों में उड़ीसा में इस्पात-निवेश की चर्चा फिर उठी है ◇, जो दिखाता है कि यह बहस बंद नहीं हुई है।

2 · प्रश्न 4 के तीन ‘लापता’ नामों की पूरी पृष्ठभूमि 【T1】ध्यान

प्रश्नावली का प्रश्न 4 चार मेल पूछता है, पर तीन पद अध्याय में हैं ही नहीं 【पाठ】। यहाँ उनकी पूरी पृष्ठभूमि है, ताकि विद्यार्थी उत्तर समझकर लिखे, रटकर नहीं।

2.1 चरण सिंह — ‘किसान’★

पहलूविवरण
कौनकिसान-हितों के सबसे प्रबल राजनीतिक पैरोकार; उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और बाद में भारत के प्रधानमंत्री
★★उनका मुख्य तर्कनियोजन में कृषि और ग्रामीण भारत की उपेक्षा हुई; भारी उद्योगों पर ज़ोर देकर गाँव को पीछे छोड़ दिया गया
यह अध्याय से कैसे जुड़ता है★यह ठीक वही आलोचना है जो पाठ्यपुस्तक दर्ज़ करती है 【पाठ】 — “आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि… योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी होती नज़र आती है” और “कृषि की जगह उद्योग को प्राथमिकता देकर गलती की गई।”
इसलिए मेलचरण सिंह → किसान

2.2 बिहार का अकाल — ‘जोनिंग’★

पहलूविवरण
कब1966-67 का भीषण अकाल — लगातार दो वर्ष सूखा और भारी खाद्यान्न-संकट
★★‘जोनिंग’ क्या हैअनाज की अंतर-राज्यीय आवाजाही पर सरकारी रोक — यानी हर क्षेत्र (ज़ोन) को अपने ही अनाज पर निर्भर रहना पड़ता था; अधिशेष वाले राज्य से घाटे वाले राज्य में अनाज स्वतंत्र रूप से नहीं जा सकता था
! परिणामअकाल-ग्रस्त क्षेत्रों में संकट और गहरा गया — यह नीति और आपदा के टकराव का उदाहरण बन गया
यह अध्याय से कैसे जुड़ता है★★पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है 【पाठ】 — “उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज्यादा आकर्षित किया — ऐसे में खाद्यान्न-संकट की आशंका अलग से सता रही थी।” बिहार का अकाल उसी आशंका का सच हो जाना था। और 1966 में चौथी योजना का स्थगित होना भी इसी संकट से जुड़ा है
इसलिए मेलबिहार का अकाल → जोनिंग

2.3 वर्गीज़ कूरियन — ‘सहकारी डेयरी’★

पहलूविवरण
कौन★‘श्वेत क्रांति’ के जनक; अमूल और सहकारी डेयरी आंदोलन के शिल्पी
★★मॉडलदुग्ध-उत्पादक किसानों की सहकारी समितियाँ — जिनमें उत्पादक ही मालिक होता है, और मुनाफ़ा बिचौलिये के बजाय किसान तक पहुँचता है
परिणामभारत दुग्ध-उत्पादन में आत्मनिर्भर बना
★यह अध्याय से कैसे जुड़ता हैयह विकास का एक तीसरा रास्ता है — न पूरी तरह राज्य-नियंत्रित, न पूरी तरह निजी, बल्कि सहकारी। और यह ‘केरल मॉडल’ की तरह विकेंद्रित तथा लोगों की भागीदारी पर टिका है। ★प्रश्न 2 में ‘सहकारी खेती’ का विकल्प भी इसी परिवार का है
इसलिए मेलवर्गीज़ कूरियन → सहकारी डेयरी

★★कक्षा के लिए एक सुंदर निष्कर्ष: “ध्यान दीजिए — प्रश्न 4 के चारों नाम विकास के चार अलग रास्तों की ओर इशारा करते हैं: महालनोबिस = भारी उद्योग · चरण सिंह = किसान · जोनिंग = राज्य-नियंत्रण की सीमा · कूरियन = सहकारिता। यह प्रश्न अपने-आप में पूरे अध्याय का सार है — बस उसका आधा हिस्सा किताब से हटा दिया गया है।”

3 · सभी पंचवर्षीय योजनाओं की तालिका (1951–2017) 【T1–T2】

पाठ्यपुस्तक पहली तीन योजनाओं पर रुकती है और 1966 के विराम का उल्लेख करती है 【पाठ】। पूरी सूची यह है — यह प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाती है।

योजनाअवधिमुख्य ज़ोर / प्रतिमान
★पहली1951–56कृषि, सिंचाई, बाँध, भूमि-सुधार; के.एन. राज — ‘धीमी चाल’ 【पाठ】
★★दूसरी1956–61भारी उद्योग; महालनोबिस मॉडल; आयात-शुल्क से संरक्षण 【पाठ】
तीसरी1961–66“दूसरी योजना से कुछ खास अलग नहीं” 【पाठ】; ! युद्ध और सूखे से बाधित
! ‘योजना अवकाश’1966–69★★तीन ‘वार्षिक योजनाएँ’ — 【पाठ】 “नियोजन का नयापन मंद पड़ गया था और भारत गहन आर्थिक संकट की चपेट में आ चुका था”
चौथी1969–74आत्मनिर्भरता और स्थिरता के साथ संवृद्धि
पाँचवीं1974–79‘गरीबी हटाओ’; न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम
वार्षिक योजनाएँ1979–80सरकार-परिवर्तन के कारण
छठी1980–85गरीबी-उन्मूलन और आधुनिकीकरण
सातवीं1985–90खाद्यान्न, रोज़गार और उत्पादकता
वार्षिक योजनाएँ1990–92! राजनीतिक अस्थिरता और 1991 का भुगतान-संतुलन संकट
★आठवीं1992–97★★उदारीकरण के बाद की पहली योजना — भूमिका बदली
नौवीं1997–2002न्यायसंगत वितरण के साथ संवृद्धि
★दसवीं2002–07【पाठ】 (पृ. 51 पर इसी का दस्तावेज़ चित्र में दिखाया गया है)
ग्यारहवीं2007–12“तीव्रतर और अधिक समावेशी संवृद्धि”
★★बारहवीं2012–17भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना — इसके बाद नीति आयोग ने अलग ढाँचा अपनाया

★★एक तथ्य जो उत्तर में बहुत प्रभावी होता है: भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का दौर 1951 से 2017 तक — लगभग 66 वर्ष — चला। बारहवीं योजना अंतिम थी।

4 · योजना आयोग से नीति आयोग तक — पूरी तुलना 【T1–T2】★

पाठ्यपुस्तक बस इतना कहती है कि नीति आयोग 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आया 【पाठ】। पूरी तुलना यह है। ◇

कसौटीयोजना आयोग (1950–2014)नीति आयोग (2015– )
स्थापना★मार्च 1950, सरकार के प्रस्ताव से 【पाठ】★1 जनवरी 2015, मंत्रिमंडलीय संकल्प से
संवैधानिक दर्ज़ा! नहीं — 【पाठ】 “संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों की तरह नहीं”! नहीं — यह भी संवैधानिक या वैधानिक निकाय नहीं
★★मुख्य शक्तिराज्यों की योजनाओं को मंज़ूरी और धन-आबंटन!★धन-आबंटन की कोई शक्ति नहीं — यह नीति-थिंक टैंक है
★★दृष्टिकोणऊपर से नीचे (top-down); केंद्रीकृतनीचे से ऊपर (bottom-up); सहकारी संघवाद
राज्यों की भूमिका! राज्य आबंटन के लिए ‘याचक’ — इसे ‘सौदेबाज़ी वाला संघवाद’ कहा गया★राज्य ‘भागीदार’ — मुख्यमंत्री शासी परिषद् के सदस्य
अध्यक्षप्रधानमंत्री 【पाठ】प्रधानमंत्री
मुख्य कार्यकारीउपाध्यक्षउपाध्यक्ष + मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)
औज़ारपंचवर्षीय योजनादृष्टि-पत्र, रणनीति-पत्र, कार्य-योजना; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम; SDG सूचकांक

4.1 योजना आयोग पर मुख्य आलोचनाएँ ◇ध्यान

  1. ★★केंद्रीकृत, ऊपर-से-नीचे दृष्टिकोण — “राज्यों को निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया।”
  2. पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी।
  3. निरंतर गरीबी और बेरोज़गारी; आय तथा संपत्ति की असमानता घटाने में विफलता।

★★और पाठ्यपुस्तक के दोनों कार्टून ठीक यही कह रहे थे 【पाठ】 — पृ. 48 का “बादल पर बैठे योजनाकार” और पृ. 50 का “CENTRALISED PLANNING का बाँस, VILLAGE REALITY का बार।” यानी 2015 का सुधार उस आलोचना का ही उत्तर था जो 1950 से चली आ रही थी।

4.2 और नीति आयोग पर भी आलोचनाएँ हैं ◇ध्यान

  • “नीति आयोग के पास योजना आयोग जैसे वित्तीय दाँत नहीं हैं” — इससे ज़मीन पर परियोजनाएँ चलाने की उसकी क्षमता सीमित हो सकती है।
  • ! “सहकारी संघवाद असमान रहा है — कुछ राज्य गंभीरता से जुड़े, कुछ अलग-थलग रहे।”

★संतुलित निष्कर्ष जो उत्तर में लिखा जा सकता है: “योजना आयोग के पास शक्ति थी पर सहमति नहीं; नीति आयोग के पास सहमति है पर शक्ति नहीं। यही केंद्रीकृत और विकेंद्रित नियोजन की स्थायी दुविधा है — और पाठ्यपुस्तक ने इसी दुविधा को ‘केरल मॉडल’ के ज़रिए उठाया था।”

5 · ‘महालनोबिस मॉडल’ का असली तर्क 【T2–T3】

पाठ्यपुस्तक बताती है कि दूसरी योजना महालनोबिस ने बनाई और उसमें भारी उद्योगों पर ज़ोर था 【पाठ】 — पर उसका तर्क क्या था, यह नहीं बताती। यह UPSC मुख्य परीक्षा में बहुत काम आता है।

5.1 मूल तर्क — ‘मशीनें बनाने वाली मशीनें’★★

यदि कोई गरीब देश केवल उपभोक्ता वस्तुएँ बनाता रहे, तो वह हमेशा मशीनों के लिए दूसरों पर निर्भर रहेगा। इसलिए पहले पूँजीगत वस्तुओं का क्षेत्र (capital goods sector) खड़ा करो — यानी वे उद्योग जो मशीनें बनाते हैं। एक बार वह क्षेत्र खड़ा हो जाए, तो उपभोक्ता वस्तुएँ अपने-आप और तेज़ी से बढ़ेंगी।

★इसीलिए दूसरी योजना में बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार को चुना गया 【पाठ】 — ये सब ‘आधारभूत’ क्षेत्र हैं, उपभोक्ता वस्तुएँ नहीं।

5.2 तीन आधार-मान्यताएँ★

मान्यताअर्थ
1. आत्मनिर्भरताविदेशी मशीनों पर निर्भरता राजनीतिक निर्भरता भी बनाती है
2. राज्य ही निवेशकइतने बड़े और लंबी अवधि में लाभ देने वाले उद्योगों में निजी पूँजी नहीं आएगी
3. ‘बंद’ अर्थव्यवस्था★मॉडल यह मानकर चलता था कि निर्यात से बहुत कमाई नहीं होगी, इसलिए घरेलू उत्पादन ही रास्ता है

5.3 और तीन बड़ी आलोचनाएँ(इनमें से दो पाठ्यपुस्तक में भी हैं)ध्यान

  1. ★रोज़गार का सवाल — भारी उद्योग पूँजी-प्रधान होते हैं, श्रम-प्रधान नहीं। एक ऐसे देश में जहाँ श्रम अधिक और पूँजी कम थी 【पाठ】, यह चुनाव उलटा था।
  2. ★कृषि की उपेक्षा — 【पाठ】 “उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज्यादा आकर्षित किया” → खाद्यान्न- संकट। (और 1966 का बिहार अकाल उसी का परिणाम माना जाता है।)
  3. ! ‘तीसरी मान्यता’ गलत निकली — बाद के दशकों में पूर्वी एशियाई देशों ने निर्यात-आधारित रास्ते से तेज़ वृद्धि हासिल की, जिससे ‘बंद अर्थव्यवस्था’ की मान्यता कमज़ोर पड़ी।

★★पर एक बात संतुलन के लिए ज़रूर लिखिए 【पाठ】 — “औद्योगीकरण पर दिए गए इस ज़ोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया” और “इस वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।” आज भारत का इस्पात, बिजली और रेल का ढाँचा उसी दौर की देन है।

6 · ‘नेहरूवादी सर्वसम्मति’ और उसकी आलोचनाएँ 【T2–T3】

6.1 यह सर्वसम्मति क्या थी★

पाठ्यपुस्तक जिन दो सहमतियों का उल्लेख करती है 【पाठ】, उन्हें मिलाकर विद्वान ‘नेहरूवादी सर्वसम्मति’ कहते हैं। उसके चार स्तंभ थे —

स्तंभविवरण
1. नियोजनयोजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाएँ
2. मिश्रित अर्थव्यवस्था★न पूरी तरह पूँजीवादी, न पूरी तरह समाजवादी — सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ
3. आत्मनिर्भरताआयात-प्रतिस्थापन; आयात पर भारी शुल्क 【पाठ】
4. सामाजिक न्यायभूमि-सुधार, गरीबी-उन्मूलन, पुनर्वितरण

6.2 तीन दिशाओं से आलोचनाएँ★★

दिशाआलोचना
★दक्षिणपंथी (जैसे स्वतंत्र पार्टी)‘लाइसेंस-परमिट राज’ — अत्यधिक नियंत्रण से उद्यमशीलता दबी, भ्रष्टाचार बढ़ा, और संवृद्धि धीमी रही
★वामपंथीसुधार पर्याप्त नहीं थे — भूमि-सुधार अधूरा रहा, असमानता बनी रही, और लाभ बड़े उद्योगपतियों तक पहुँचा
★★गाँधीवादी (जैसे जे.सी. कुमारप्पा) 【पाठ】★केंद्रीकृत, भारी-उद्योग आधारित मॉडल गाँव और ग्राम-स्वराज्य की उपेक्षा करता है; विकास विकेंद्रित, श्रम-प्रधान और टिकाऊ होना चाहिए

★★और यही तीसरी आलोचना पाठ्यपुस्तक में मौजूद है — बस बिना नाम लिए। जे.सी. कुमारप्पा का ‘इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस’ 【पाठ】 ठीक इसी दृष्टि की पुस्तक है, और ‘केरल मॉडल’ उसी परिवार का व्यावहारिक उदाहरण। ★कक्षा में यह कड़ी जोड़ने से पूरा अध्याय एक सूत्र में बँध जाता है।

7 · ‘केरल मॉडल’ का दूसरा अध्याय — जन-योजना अभियान (1996) 【T1–T2】★

पाठ्यपुस्तक 1987–1991 की ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ पर रुक जाती है 【पाठ】। उसके बाद जो हुआ, वह और भी महत्वपूर्ण है।

पहलूविवरण
★★जन-योजना अभियान (People’s Plan Campaign)1996 में शुरू — केरल में विकेंद्रित नियोजन का सबसे बड़ा प्रयोग
★★मुख्य कदमराज्य की योजना-निधि का एक बड़ा हिस्सा सीधे स्थानीय निकायों (पंचायत और नगरपालिका) को सौंप दिया गया — ताकि योजनाएँ वहीं बनें जहाँ उन्हें लागू होना है
प्रक्रियाग्राम सभाओं में ज़रूरतों की पहचान → स्थानीय स्तर पर परियोजना-निर्माण → जन-भागीदारी से क्रियान्वयन
★संवैधानिक आधार73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992) — जिसने पंचायती राज और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्ज़ा दिया
महत्त्व★यह भारत में ‘नीचे से ऊपर’ नियोजन का सबसे व्यापक उदाहरण माना जाता है

★★और यह पाठ्यपुस्तक की उस पंक्ति को पूरा कर देता है 【पाठ】 — “केरल में यह प्रयास भी किए गए कि लोग पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं को तैयार करने में शामिल हों।” वह प्रयास 1996 के जन-योजना अभियान में अपने चरम पर पहुँचा।

7.1 और ‘केरल मॉडल’ की आलोचनाएँ भी हैं — संतुलन के लिएध्यान

  1. ! कम औद्योगिक आधार के कारण रोज़गार के अवसर सीमित रहे — इसीलिए केरल से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ (विशेषकर खाड़ी देशों की ओर)।
  2. ! प्रेषण (remittances) पर निर्भरता — मानव-विकास के आँकड़े आंशिक रूप से बाहर से आए धन पर टिके हैं।
  3. ★इसलिए सवाल बचा रहता है: क्या यह मॉडल उन राज्यों में दोहराया जा सकता है जिनके पास ऐसा प्रेषण-आधार नहीं है?

★कक्षा में यह ज़रूर कहिए: “‘केरल मॉडल’ पाठ्यपुस्तक में विकल्प के रूप में रखा गया है, आदर्श के रूप में नहीं। उत्तर में भी उसे विकल्प ही कहिए — और उसकी सीमाएँ भी लिखिए। यही संतुलित उत्तर होता है।”

8 · भूमि-सुधार — घोषणा और अमल के बीच की खाई 【T2】

पाठ्यपुस्तक कहती है कि प्रथम योजना में भूमि-सुधार को “देश के विकास की बुनियादी चीज़” माना गया 【पाठ】 — पर उसका क्या हुआ, यह नहीं बताती।

8.1 भूमि-सुधार के चार अंग★

अंगउद्देश्यपरिणाम
★1. बिचौलियों (ज़मींदारी) का उन्मूलनकिसान और राज्य के बीच से मध्यस्थ हटाना★सबसे सफल अंग माना जाता है
2. काश्तकारी सुधारबटाईदारों को सुरक्षा और उचित लगान! मिश्रित सफलता
! 3. जोत की अधिकतम सीमा (land ceiling)अधिशेष भूमि का पुनर्वितरण!! सबसे कमज़ोर अंग — छूटें, मुक़दमेबाज़ी और बेनामी हस्तांतरण से बचाव
4. चकबंदीबिखरे खेतों को एक साथ लानाकुछ राज्यों में सफल

8.2 अमल कमज़ोर क्यों रहा — और इसका उत्तर इसी अध्याय में हैध्यान★★

कारणव्याख्या
★★भूमि राज्य-सूची का विषय हैकेंद्र योजना बनाता था, पर कानून राज्यों को बनाने और लागू करने थे
★★राज्यों में सत्ता का सामाजिक आधारप्रांतीय स्तर पर कांग्रेस का आधार बड़े पैमाने पर भूस्वामी और प्रभावशाली कृषक वर्गों पर टिका था — जिनके हित भूमि-सुधार से सीधे टकराते थे
कानूनी बाधाएँमुक़दमेबाज़ी और छूटों ने वर्षों तक अमल रोका

★★यही प्रश्न 7(ग) का उत्तर है — “क्या कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और प्रांतीय नेताओं के बीच कोई अंतर्विरोध था?” — हाँ, और भूमि-सुधार उसका सबसे स्पष्ट प्रमाण है। ★और पृ. 50 का कार्टून भी यही कहता है — ‘CENTRALISED PLANNING’ का बाँस ‘VILLAGE REALITY’ का बार पार नहीं कर पाता।

9 · नियोजन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व 【T1–T2】

व्यक्तिभूमिका★याद रखने की बात
★जवाहरलाल नेहरूयोजना आयोग के अध्यक्ष 【पाठ】; नियोजन और सोवियत मॉडल के प्रभाव में【पाठ】 “सोशलिस्ट पार्टी और खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे”
★★पी.सी. महालनोबिस (1893–1972)दूसरी योजना के योजनाकार 【पाठ】भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931); तीव्र औद्योगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र के समर्थक
★के.एन. राजपहली योजना के विशेषज्ञों में एक 【पाठ】★“अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए”
★★जे.सी. कुमारप्पा (1892–1960)योजना आयोग के सदस्य; गाँधीवादी अर्थशास्त्री 【पाठ】★असली नाम जे.सी. कॉर्नेलियस; ‘इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस’ के लेखक
★चरण सिंहकिसान-हितों के प्रबल पैरोकार (प्रश्न 4)कृषि और ग्रामीण भारत को प्राथमिकता; बाद में प्रधानमंत्री
★वर्गीज़ कूरियन‘श्वेत क्रांति’ और सहकारी डेयरी (प्रश्न 4)अमूल के शिल्पी
‘बॉम्बे प्लान’ के हस्ताक्षरकर्ता1944 में उद्योगपतियों का एक तबका 【पाठ】★उन्होंने नियोजन का समर्थन किया — यही चौंकाने वाली बात है

10 · विकास के सिद्धांत — तीन नज़रिए 【T3】

पाठ्यपुस्तक कहती है कि आज़ादी के बाद ‘विकास’ का अर्थ ‘आधुनिक होना’ और ‘पश्चिमी देशों की तरह होना’ समझा जाता था 【पाठ】 — वह एक सिद्धांत था, जिसका नाम है ‘आधुनिकीकरण सिद्धांत’। तीनों नज़रिए ये हैं:

नज़रियामूल दावापाठ्यपुस्तक में कहाँ
★आधुनिकीकरण सिद्धांतसभी समाज एक ही रास्ते से गुज़रते हैं — परंपरागत से आधुनिक की ओर; पश्चिम आगे है, बाकी उसके पीछे【पाठ】 “आधुनिक होने का अर्थ था, पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना”; और “जिस तरह पश्चिमी मुल्कों में… पुरानी सामाजिक संरचना टूटी… उसी तरह बाकी देशों में भी होगा”
★निर्भरता सिद्धांत (Dependency theory)! गरीब देश इसलिए गरीब नहीं कि वे ‘पीछे’ हैं — बल्कि इसलिए कि वे एक ऐसी विश्व-व्यवस्था में हैं जो उन्हें कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बनाए रखती है★【पाठ】 का यह वाक्य उसी दिशा में है — “आज़ाद भारत की सरकार के आर्थिक सरोकार अंग्रेजी हुकूमत के आर्थिक सरोकारों से एकदम अलग होंगे”
★★मानव-विकास दृष्टिकोण (अमर्त्य सेन, महबूब उल हक़)विकास केवल आय नहीं — वह लोगों की क्षमताओं और विकल्पों का विस्तार है: शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा★★यही ‘केरल मॉडल’ का सैद्धांतिक नाम है 【पाठ】 — आय कम, पर साक्षरता और स्वास्थ्य बेहतर

★★कक्षा और उत्तर के लिए यह वाक्य बहुत कारगर है: “पाठ्यपुस्तक ने कार्टून में जो सवाल पूछा — ‘क्या “आधुनिक” बनने के लिए “पश्चिमी” होना ज़रूरी नहीं है?’ 【पाठ】 — उसका उत्तर मानव-विकास दृष्टिकोण देता है: विकास का पैमाना यह नहीं कि आप किसके जैसे दिखते हैं, बल्कि यह कि आपके लोग कितना लंबा, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी पाते हैं। और ‘केरल मॉडल’ उसी उत्तर का भारतीय प्रमाण है।”

11 · दो प्रकरण-अध्ययन 【T1–T2】

प्रकरण 1 — पोस्को : बारह साल, और एक अनुत्तरित सवाल★★

चरणविवरण
2005सहमति-पत्र — जगतसिंहपुर में 12 मिलियन टन का संयंत्र; लगभग ₹52,000 करोड़
2006【पाठ】 धिंकिया, नुआगाँव और गढ़कुजंगा के सौ से ज्यादा स्त्री-पुरुषों का विरोध; नारा — “हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर…”
! बाधाएँभूमि-अधिग्रहण के विवाद · नियामकीय देरी · स्थानीय प्रतिरोध · खनिज-कानून में बदलाव से ‘कैप्टिव खदान’ का वादा असंभव
★★मार्च 2017पोस्को ने परियोजना से हटने की घोषणा की; लगभग 2,700 एकड़ भूमि लौटाने की पेशकश
! कीमतहज़ारों पेड़ कट चुके थे और आजीविकाएँ बाधित हो चुकी थीं — पर संयंत्र बना ही नहीं
★★सबकपाठ्यपुस्तक का दावा सही निकला — अंतिम निर्णय राजनीतिक ही था। ! पर यह किसी की पूरी जीत नहीं थी — और यही विकास की राजनीति की असली कठिनाई है।

प्रकरण 2 — भाखड़ा-नांगल : वही सवाल, बीस साल पहले★

पहलूविवरण
क्या【पाठ】 प्रथम पंचवर्षीय योजना की “विशाल परियोजनाओं” में सबसे प्रसिद्ध — सतलुज नदी पर बाँध
★उद्देश्यसिंचाई और बिजली — 【पाठ】 “इसी योजना के अंतर्गत बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया”
★★नेहरू का प्रसिद्ध वाक्यउन्होंने ऐसी परियोजनाओं को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा — यह उस दौर की आधुनिकीकरण-दृष्टि का सबसे सटीक वाक्य है
✓ लाभपंजाब और हरियाणा में सिंचाई का विस्तार — जिसने बाद में हरित क्रांति की ज़मीन तैयार की
! कीमतबड़े बाँधों से विस्थापन — और यही सवाल दशकों बाद नर्मदा और पोस्को में लौटा
★★सबक“आधुनिक भारत के मंदिर” और “हमारी जीविका की कीमत पर नहीं” — ये दो वाक्य एक ही सवाल के दो छोर हैं। और यही अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है: किसकी ज़रूरत को ‘देश की ज़रूरत’ कहा जाए?

12 · संक्षिप्ताक्षर और पद-कोश 【T1–T2】

पदअर्थ
★नियोजन (Planning)सरकार द्वारा विकास का खाका तैयार करना 【पाठ】
★★योजना आयोगमार्च 1950, प्रस्ताव से; सलाहकार; संवैधानिक निकाय नहीं 【पाठ】
★नीति आयोगराष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था, 1 जनवरी 2015 【पाठ】; थिंक टैंक; धन-आबंटन की शक्ति नहीं
★सहकारी संघवादकेंद्र और राज्य साझेदार — नीति आयोग का घोषित सिद्धांत
प्रतिस्पर्धी संघवादराज्यों के बीच सूचकांकों पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा
★मिश्रित अर्थव्यवस्थासार्वजनिक + निजी क्षेत्र साथ-साथ — भारत का चुना हुआ रास्ता
★आयात-प्रतिस्थापनआयात पर शुल्क लगाकर देसी उत्पादन को बढ़ावा 【पाठ】
★★बॉम्बे प्लान1944, उद्योगपतियों का नियोजित अर्थव्यवस्था का प्रस्ताव 【पाठ】
★महालनोबिस मॉडलपूँजीगत वस्तुओं (भारी उद्योग) को प्राथमिकता देने वाला दो-क्षेत्रीय मॉडल
लाइसेंस-परमिट राजनियंत्रण-प्रधान व्यवस्था की दक्षिणपंथी आलोचना का नाम
★भूमि-सुधार के चार अंगज़मींदारी उन्मूलन · काश्तकारी सुधार · जोत की सीमा · चकबंदी
★★केरल मॉडलविकेंद्रित नियोजन — शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, खाद्य-वितरण, गरीबी-उन्मूलन 【पाठ】
★जन-योजना अभियान1996 — केरल में योजना-निधि का बड़ा हिस्सा स्थानीय निकायों को
73वाँ/74वाँ संशोधन1992 — पंचायती राज और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्ज़ा
★आधुनिकीकरण सिद्धांतसभी समाज एक ही रास्ते से गुज़रते हैं; पश्चिम आगे है
★मानव-विकास दृष्टिकोणविकास = लोगों की क्षमताओं और विकल्पों का विस्तार (सेन, महबूब उल हक़)
★जोनिंगअनाज की अंतर-राज्यीय आवाजाही पर रोक (प्रश्न 4)
★श्वेत क्रांतिसहकारी डेयरी आंदोलन — वर्गीज़ कूरियन (प्रश्न 4)
SDGसतत विकास लक्ष्य — नीति आयोग इनका भारत सूचकांक जारी करता है

13 · अभ्यास प्रश्न 【सभी स्तर】

1 अंक

  1. पोस्को परियोजना कहाँ प्रस्तावित थी और कितने निवेश की थी? — जगतसिंहपुर, उड़ीसा; लगभग ₹52,000 करोड़
  2. ★पोस्को ने परियोजना से कब हटने की घोषणा की? — मार्च 2017
  3. कंपनी ने कितनी भूमि लौटाने की पेशकश की? — लगभग 2,700 एकड़
  4. भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना कौन-सी थी? — ★बारहवीं (2012–17)
  5. ‘योजना अवकाश’ किन वर्षों में रहा? — 1966–69 (तीन वार्षिक योजनाएँ)
  6. ★नीति आयोग की स्थापना किस माध्यम से हुई? — मंत्रिमंडलीय संकल्प से
  7. ★★नीति आयोग और योजना आयोग में सबसे बड़ा अंतर? — नीति आयोग के पास धन-आबंटन की शक्ति नहीं; वह थिंक टैंक है
  8. योजना आयोग का दृष्टिकोण कैसा था? — ऊपर से नीचे (top-down), केंद्रीकृत
  9. महालनोबिस मॉडल का मूल तर्क? — पहले ‘मशीनें बनाने वाली मशीनें’ यानी पूँजीगत वस्तुओं का क्षेत्र खड़ा करो
  10. महालनोबिस मॉडल की मुख्य आलोचना? — भारी उद्योग पूँजी-प्रधान होते हैं, श्रम-प्रधान नहीं — रोज़गार नहीं बना
  11. ‘नेहरूवादी सर्वसम्मति’ के चार स्तंभ? — नियोजन · मिश्रित अर्थव्यवस्था · आत्मनिर्भरता · सामाजिक न्याय
  12. ★केरल का जन-योजना अभियान कब शुरू हुआ? — 1996
  13. उसका मुख्य कदम क्या था? — राज्य की योजना-निधि का बड़ा हिस्सा सीधे स्थानीय निकायों को
  14. पंचायती राज को संवैधानिक दर्ज़ा किस संशोधन से मिला? — 73वाँ संविधान संशोधन, 1992
  15. ★भूमि-सुधार के चार अंग? — ज़मींदारी उन्मूलन · काश्तकारी सुधार · जोत की अधिकतम सीमा · चकबंदी
  16. भूमि-सुधार का सबसे सफल और सबसे कमज़ोर अंग? — सफल — ज़मींदारी उन्मूलन; कमज़ोर — जोत की सीमा
  17. ★★भूमि-सुधार का अमल कमज़ोर क्यों रहा? — भूमि राज्य-सूची का विषय है, और प्रांतीय राजनीति का आधार भूस्वामी वर्गों पर टिका था
  18. ‘जोनिंग’ क्या है? — अनाज की अंतर-राज्यीय आवाजाही पर रोक
  19. वर्गीज़ कूरियन किस क्रांति से जुड़े हैं? — श्वेत क्रांति (सहकारी डेयरी)
  20. नेहरू ने बड़ी परियोजनाओं को क्या कहा था? — “आधुनिक भारत के मंदिर”

2–4 अंक

  1. पोस्को परियोजना का 2017 में क्या हुआ? यह पाठ्यपुस्तक के दावे को कैसे सिद्ध या चुनौती देता है?
  2. योजना आयोग और नीति आयोग की तुलना कीजिए। दोनों की क्या आलोचनाएँ हैं?
  3. महालनोबिस मॉडल का मूल तर्क समझाइए और उसकी तीन आलोचनाएँ बताइए।
  4. ‘नेहरूवादी सर्वसम्मति’ क्या थी? उस पर किन तीन दिशाओं से आलोचना हुई?
  5. केरल का जन-योजना अभियान (1996) क्या था? क्या ‘केरल मॉडल’ दूसरे राज्यों में दोहराया जा सकता है?
  6. भूमि-सुधार को “देश के विकास की बुनियादी चीज़” माना गया, फिर उसका अमल कमज़ोर क्यों रहा?
  7. विकास के तीन सिद्धांतों की तुलना कीजिए और बताइए कि ‘केरल मॉडल’ किससे मेल खाता है।

6 अंक

  1. “अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए।” — पोस्को परियोजना के 2005 से 2017 तक के पूरे घटनाक्रम के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
  2. 1950 से 2015 तक भारत में नियोजन की संस्था और दर्शन कैसे बदले? योजना आयोग से नीति आयोग तक की यात्रा का मूल्यांकन कीजिए।
  3. केंद्रीकृत और विकेंद्रित नियोजन की बहस का विवेचन कीजिए — पाठ्यपुस्तक के दो कार्टूनों, ‘केरल मॉडल’ और भूमि-सुधार के अनुभव के आधार पर।

14 · स्रोत-सूची

पाठ्यपुस्तक 【पाठ】

  1. NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), अध्याय 3, पृ. 44–53

द्वितीयक स्रोत ◇ 2. Scroll.in — “As Posco exits steel project, Odisha is left with thousands of felled trees and lost livelihoods” — scroll.in 3. Wikipedia — Anti-POSCO movement (घटनाक्रम की समयरेखा के लिए) — en.wikipedia.org 4. The Wire Science — “Three Odisha Panchayats Are Caught Between Ecological Disasters and Steel Corporations” — science.thewire.in 5. Business Standard — “Odisha pins hopes on JSW-POSCO steel plant amid stronger India-Korea ties” (परवर्ती घटनाक्रम) — business-standard.com 6. Policy Circle — “NITI Aayog’s challenge: From command and control to cooperative federalism” — policycircle.org 7. Anantam IAS — “Dismantling of the Planning Commission: Why India Moved to NITI Aayog” — anantamias.com 8. UPSC Geeks — “NITI Aayog vs. Planning Commission: Comparative Analysis of India’s Development Strategies” — blog.upscgeeks.in

! शिक्षक के लिए अंतिम नोट: बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक के तथ्य और उसकी भाषा ही लिखवाइए। यह संवर्धन सामग्री कक्षा-चर्चा और प्रतियोगी परीक्षा के लिए है। ★★पर दो अपवाद हैं — खंड 1 (पोस्को का 2017 वाला अंत) और खंड 2 (प्रश्न 4 के तीन लापता नाम) कक्षा में अवश्य पढ़ाइए। पहला अध्याय के दावे को पूरा करता है, और दूसरे के बिना विद्यार्थी प्रश्न 4 हल ही नहीं कर पाएँगे।