श्रुतलेख नोट्स(Dictation Notes — बोला जाने वाला शब्दशः पाठ)
यह दस्तावेज़ कैसे इस्तेमाल करें: ➤ चिह्न वाली पंक्तियाँ शिक्षक बोलते हैं (कक्षा से बातचीत — इन्हें विद्यार्थी नहीं लिखते)। 📝 चिह्न के बाद जो है, वही बोर्ड पर लिखा जाता है और विद्यार्थी अपनी कॉपी में उतारते हैं। ⏸ = यहाँ रुकिए, कक्षा को लिखने का समय दीजिए।
!! इस अध्याय के लिए विशेष निर्देश: यह पुस्तक का सबसे संवेदनशील अध्याय है। पूरे श्रुतलेख में पाठ्यपुस्तक के शब्द रखे गए हैं और कोई मूल्यांकनात्मक विशेषण नहीं जोड़ा गया। कृपया उसी संयम से बोलिए।
खंड 1 · पृष्ठभूमि — आर्थिक संकट और जन-आंदोलन
(कालांश 1 · पृष्ठ 92–95)
➤ “बच्चों, आज कुछ लिखने से पहले किताब का पहला पन्ना खोलिए और सिर्फ़ देखिए। एक अख़बार का पन्ना छपा है — ‘नई दुनिया’, 27 जून 1975।”
⏸ (कक्षा को देखने दीजिए।)
➤ “अब उसके नीचे काले रंग का एक छोटा बॉक्स है। उसे मैं पढ़ता हूँ, आप सुनिए।”
➤ “‘27 जून, 1975 के नई दुनिया अखबार का संपादकीय भी बाकी दिनों की ही तरह बदस्तूर मौजूद था। बस अंतर यह था कि संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी गई थी।’”
➤ “अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। एक खाली जगह — जिसमें कुछ लिखा ही नहीं — वह विरोध कैसे बन सकती है?”
⏸ (कक्षा से दो-तीन उत्तर लीजिए।)
➤ “बिल्कुल सही। क्योंकि खाली जगह पाठक को बता देती है कि यहाँ कुछ था, जो हटा दिया गया। सेंसरशिप चाहती है कि पाठक को पता ही न चले — और खाली जगह उसी बात को उलट देती है। अब बॉक्स की आख़िरी पंक्ति सुनिए, और फिर लिखिए।”
📝 ★★‘नई दुनिया’, 27 जून 1975: “संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी गई थी। संपादकीय को आपातकालीन अधिकारों के अंतर्गत ‘सेंसर’ कर दिया गया था। कई अन्य अखबारों में भी जगह-जगह रिक्त स्थान छोड़े जाते थे। कई दफे ऐसा आपातकाल के प्रति विरोध जताने के लिए किया जाता था। ! बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।”
⏸
➤ “आख़िरी वाक्य पर निशान लगा लीजिए। सोचिए — नियंत्रण सिर्फ़ इस बात पर नहीं था कि क्या छपे; नियंत्रण इस बात पर भी था कि जो नहीं छपा, उसका संकेत तक न दिखे।”
📝 अध्याय का परिचय: “आमतौर पर आपातकाल से हमारे मन में युद्ध और आक्रमण अथवा प्राकृतिक आपदा की तसवीर कौंधती है लेकिन अपने देश में आपातकाल की यह घोषणा अंदरूनी गड़बड़ियों की आशंका के मद्देनजर की गई थी।”
📝 ★अध्याय के चार प्रश्न: 1. आपातकाल क्यों लागू किया गया? क्या ऐसा करना जरूरी था? 2. आपातकाल लागू करने का व्यावहारिक अर्थ क्या था? 3. दलगत राजनीति के लिहाज से आपातकाल के क्या परिणाम हुए? 4. आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र ने क्या सबक सीखे?
⏸
➤ “अब पृष्ठभूमि। मैं आठ बातें बोलूँगा — ये सब 1972 से 1975 के बीच एक साथ हो रही थीं। आठों लिखिए।”
📝 आर्थिक संकट के आठ कारक: 1. मानसून की असफलता (1972–73)। 2. कृषि की पैदावार में भारी गिरावट। 3. खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। 4. बांग्लादेश संकट — लगभग 80 लाख लोग सीमा पार करके भारत आए। 5. युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। 6. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी। 7. ★1973 में चीजों की कीमतों में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा। 8. औद्योगिक विकास की दर बहुत कम और बेरोजगारी बहुत बढ़ गई।
⏸
➤ “अब एक नौवीं बात, जो इन आठों से जुड़ी है और आगे बहुत काम आएगी। लिखिए।”
📝 ★“खर्चे को कम करने के लिए सरकार ने अपने कर्मचारियों के वेतन को रोक लिया। इससे सरकारी कर्मचारियों में बहुत असंतोष पनपा।”
➤ “इस वाक्य पर निशान लगा लीजिए। अगले कालांश में जब हम 1974 की रेल हड़ताल पढ़ेंगे, तो उसकी जड़ यहीं मिलेगी।”
📝 इस दौर में मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी बढ़ी। “इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया।” ★“ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सक्रिय थे।”
⏸
➤ “रुकिए। पिछले अध्याय में हमने पढ़ा था कि ‘आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हुए एक समूह ने सशस्त्र कृषक-विद्रोह का नेतृत्व किया।’ यही वह जगह है। किताब आपस में जुड़ी हुई है — यह देखना अच्छा लगता है।”
➤ “अब दो राज्यों के आंदोलन। पहले गुजरात।”
📝 गुजरात, जनवरी 1974: छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमत और उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। “छात्र-आंदोलन में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हो गईं और इस आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया।” ! गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। मोरारजी देसाई ने कहा कि “अगर राज्य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ जाऊँगा।” ★जून 1975 में विधानसभा के चुनाव हुए — कांग्रेस इस चुनाव में हार गई।
⏸
📝 ★★बिहार, मार्च 1974: बढ़ती कीमतों, खाद्यान्न के अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। छात्रों ने जयप्रकाश नारायण — जेपी — को बुलावा भेजा। “जेपी तब सक्रिय राजनीति छोड़ चुके थे और सामाजिक कार्यों में लगे हुए थे।”
📝 ★★जेपी की दो शर्तें: “जेपी ने छात्रों का निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा।”
⏸
➤ “इन दो शर्तों पर ध्यान दीजिए। पहली शर्त ने आंदोलन को नैतिक बल दिया, और दूसरी ने उसे राष्ट्रीय बना दिया। दो वाक्यों में एक स्थानीय छात्र-आंदोलन देश का आंदोलन बन गया।”
📝 ★★“जयप्रकाश नारायण ने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की माँग की। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके।”
⏸
➤ “अब मैं आपको दो नारे बोलूँगा। दोनों 1974 के हैं। दोनों लिखिए, और आमने-सामने लिखिए।”
📝 ★★आंदोलन का नारा: “सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!” सत्ता का नारा: “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” — यह नारा कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ ने 1974 में दिया था।
⏸
➤ “अब दोनों को साथ पढ़िए और सोचिए। पहला कहता है कि भविष्य हमारा है। दूसरा कहता है कि देश और नेता एक ही हैं। इस दूसरे वाक्य में लोकतंत्र के लिए क्या ख़तरा छिपा है?”
⏸ (कक्षा से उत्तर लीजिए — उन्हें बोलने दीजिए।)
➤ “अब पन्ना पलटिए। एक कार्टून है, आर.के. लक्ष्मण का, 16 अप्रैल 1974 का। पीछे उथल-पुथल है और तीन शब्द तैर रहे हैं — भ्रष्टाचार, जंगलराज, हिंसा। दाईं ओर एक आदमी चटाई पर बैठा है, हाथ में तख्ती है — ‘लोकतंत्र बचाओ, जे.पी.’। और बाईं ओर से कुछ नेता उँगली उठाकर कह रहे हैं — ‘देखो! वह लोकतंत्र को पलीता लगाना चाहता है, अराजकता फैलाना चाहता है और सत्ता हासिल…’।”
➤ “कार्टूनिस्ट क्या कह रहा है? कि जो आदमी शांति से ‘लोकतंत्र बचाओ’ की तख्ती लिए बैठा है, उसी पर लोकतंत्र तोड़ने का आरोप लग रहा है — जबकि पीछे भ्रष्टाचार और हिंसा साफ़ दिख रही है।”
📝 ! और यह भी लिखिए — पाठ आलोचनाएँ भी दर्ज़ करता है: “जेपी के विचारों और उनके द्वारा अपनायी गई जन-प्रतिरोध की रणनीति की आलोचनाएँ भी मुखर हुईं… कहा गया कि ये आंदोलन राज्य सरकार के खिलाफ़ नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व के खिलाफ़ चलाए गए हैं। इंदिरा गाँधी का मानना था कि ये आंदोलन उनके प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं।”
दो मिनट की जाँच★
➤ “1973 और 1974 में कीमतें कितनी बढ़ीं? जेपी की दो शर्तें? दोनों नारे?”
खंड 2 · न्यायपालिका से संघर्ष और घोषणा
(कालांश 2 · पृष्ठ 96–98)
➤ “आज तीन चीज़ें हैं — एक हड़ताल, एक टकराव, और एक तारीख़। पहले हड़ताल।”
📝 1974 की रेल हड़ताल: “रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।” माँगें बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तों को लेकर थीं। हड़ताल मई 1974 में हुई।
📝 ★★और इससे एक बड़ा सवाल उठा: “क्या आवश्यक सेवाओं से जुड़े हुए कर्मचारी अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर सकते हैं या नहीं।”
📝 ! “सरकार ने इस हड़ताल को अवैधानिक करार दिया… उसने इसके कई नेताओं को गिरफ्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना को तैनात कर दिया। ऐसे में 20 दिन के बाद यह हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।”
⏸
➤ “अब टकराव। सरकार और न्यायपालिका के बीच तीन संवैधानिक मसले उठे थे। तीनों लिखिए — और तीनों पर सर्वोच्च न्यायालय का जवाब एक ही था।”
📝 ★★तीन संवैधानिक मसले: 1. क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? — “सर्वोच्च न्यायालय का जवाब था कि संसद ऐसा नहीं कर सकती।” 2. क्या संसद संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? — “सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए।” 3. संसद ने संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है — “लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया।”
⏸
📝 ★★इसकी परिणति केशवानंद भारती के मशहूर मुकदमे में हुई: “सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है।”
📝 ! और दो बातों ने तनाव और बढ़ाया: 1973 में केशवानंद भारती के फ़ैसले के तुरंत बाद मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हुआ। “सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाने की परिपाटी चली आ रही थी, लेकिन 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।” ! “जिन तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी की गई थी उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फ़ैसला दिया।”
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📝 ★और इस दौर की पहचान बना एक शब्द: “जो लोग प्रधानमंत्री के नज़दीकी थे वे एक ऐसी ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की ज़रूरत के बारे में बातें करने लगे जो विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करे।”
➤ “किताब हाशिये में इस पर एक सवाल पूछती है — ‘क्या प्रतिबद्ध न्यायपालिका और प्रतिबद्ध नौकरशाही का मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?’ इस सवाल को याद रखिए। यह इस अध्याय का सबसे बड़ा वैचारिक सवाल है।”
➤ “और अब वह तारीख़, जिससे सब कुछ बदला। मैं पाँच बिंदु बोलूँगा — पाँचों तारीख़ के साथ लिखिए।”
📝 ★★12 जून 1975: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी के लोकसभा के लिए निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया। यह फ़ैसला समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव-याचिका पर आया, जो 1971 में उनके खिलाफ़ उम्मीदवार थे। आरोप यह था कि “उन्होंने चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्तेमाल किया था।”
📝 ★फ़ैसले का मतलब: “कानूनन अब इंदिरा गाँधी सांसद नहीं रहीं और अगर अगले छह महीने की अवधि में दोबारा सांसद निर्वाचित नहीं होतीं, तो प्रधानमंत्री के पद पर कायम नहीं रह सकतीं।”
📝 24 जून 1975: सर्वोच्च न्यायालय ने आंशिक स्थगनादेश सुनाया — “जब तक इस फ़ैसले को लेकर की गई अपील की सुनवाई नहीं होती तब तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी; लेकिन वे लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती हैं।”
⏸
📝 ★★25 जून 1975, दिन: जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शन किया। जेपी ने इस्तीफ़े की माँग करते हुए राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की। ! “जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें। इससे भी सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।”
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➤ “किताब यहाँ हाशिये में एक बहुत तीखा सवाल रखती है — ‘यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?’”
➤ “मैं इसका उत्तर नहीं दूँगा, क्योंकि किताब भी नहीं देती। पर दोनों तर्क सुन लीजिए। एक तरफ़ — जेपी ने ‘अवैधानिक आदेश’ शब्द जोड़ा था, और अनैतिक आदेश मानने से इनकार करना नागरिक का कर्तव्य है। दूसरी तरफ़ — वर्दी पहने बलों से अपील करना एक रेखा पार करना है, और लोकतंत्र में सरकार बदलने का रास्ता चुनाव है। आप दोनों पर सोचिए।”
📝 ★★25 जून 1975, रात: “सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया।” इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान है कि “बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।” ★“तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था।”
📝 ★★“25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी। ! आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई। 26 जून की सुबह 6 बजे एक विशेष बैठक में मंत्रिमंडल को इन बातों की सूचना दी गई, लेकिन तब तक बहुत कुछ हो चुका था।”
⏸
➤ “आख़िरी वाक्य दोबारा पढ़िए — ‘लेकिन तब तक बहुत कुछ हो चुका था।’ किताब इस पर भी हाशिये में सवाल पूछती है: ‘क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी?’ इस सवाल को याद रखिए — इसका जवाब हमें चौथे कालांश में मिलेगा।”
दो मिनट की जाँच★
➤ “तीन संवैधानिक मसले? 12 जून का फ़ैसला किसने दिया? कौन-सा अनुच्छेद? राष्ट्रपति कौन थे?”
खंड 3 · आपातकाल का व्यावहारिक अर्थ
(कालांश 3 · पृष्ठ 98–103)
➤ “आज हम यह समझेंगे कि ‘आपातकाल’ शब्द का ज़मीन पर मतलब क्या था। पहले दो संवैधानिक बातें।”
📝 ★★आपातकाल के दो बड़े अर्थ: 1. “आपातकाल की घोषणा के साथ ही शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथ में चली आती हैं।” 2. “सरकार चाहे तो ऐसी स्थिति में किसी एक अथवा सभी मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा उनमें कटौती कर सकती है।”
⏸
➤ “अब छह परिणाम। ये परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं।”
📝 ★★आपातकाल के छह परिणाम: 1. “विरोध-आंदोलन एकबारगी रुक गया; हड़तालों पर रोक लगा दी गई।” 2. “अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक माहौल में तनाव भरा एक गहरा सन्नाटा छा गया।” 3. प्रेस सेंसरशिप — “समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है।” 4. ! “सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया।” 5. “धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी।” 6. ★★“नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए। उनके पास अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ।”
⏸
➤ “अब एक परिभाषा, जिसे मैं चाहता हूँ आप शब्द-दर-शब्द लिखें।”
📝 ★★निवारक नज़रबंदी: “इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है, बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।”
⏸
➤ “इसे दोबारा पढ़िए। ‘किया है’ नहीं — ‘कर सकते हैं’। यही पूरा अंतर है।”
📝 ! “जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, वे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे।”
📝 !★★अप्रैल 1976: “अनेक उच्च न्यायालयों ने फ़ैसला दिया कि आपातकाल की घोषणा के बावजूद अदालत ऐसी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को विचार के लिए स्वीकार कर सकती है। 1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले को उलट दिया और सरकार की दलील मान ली। इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले से नागरिकों के लिए अदालत के दरवाज़े बंद हो गए। इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।”
⏸
➤ “अब मैं आपको एक बात बताता हूँ जो किताब में नहीं है, पर जिसे जानना चाहिए। उस फ़ैसले में पाँच न्यायाधीश थे। चार ने सरकार का पक्ष लिया। एक ने नहीं — न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना। उन्होंने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार सिर्फ़ अनुच्छेद इक्कीस से नहीं निकलता; वह अधिकार उसके बिना भी है।”
➤ “इसकी कीमत क्या चुकानी पड़ी? वे सबसे वरिष्ठ थे, फिर भी उन्हें मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया।”
⏸
➤ “और अब आख़िरी बात। इसे सुनकर आपको अच्छा लगेगा। साल 2017 में — यानी चालीस साल बाद — सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने उस पुराने फ़ैसले को रद्द कर दिया और कहा कि न्यायमूर्ति खन्ना ही सही थे।”
➤ “अब सोचिए — चालीस साल लगे। तो क्या अकेले सही होना बेकार था?”
⏸ (इस प्रश्न पर कक्षा को बोलने दीजिए।)
📝 ★प्रतिरोध के पाँच रूप: 1. गिरफ्तारी से बचे कार्यकर्ता “भूमिगत” हो गए और सरकार के खिलाफ़ मुहिम चलायी। 2. “‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने प्रेस पर लगी सेंसरशिप का विरोध किया। जिन समाचारों को छापने से रोका जाता था उनकी जगह ये अखबार खाली छोड़ देते थे।” 3. “‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाओं ने सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा।” 4. गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स निकले। 5. ★★“पद्मभूषण से सम्मानित कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत और पद्मश्री से सम्मानित हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने लोकतंत्र के दमन के विरोध में अपनी-अपनी पदवी लौटा दी।”
⏸
➤ “अब एक बात जो किताब बहुत ईमानदारी से कहती है। लिखिए।”
📝 ! “बहरहाल, मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।”
➤ “और उसी पन्ने पर हाशिये में सवाल है — ‘जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें; बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया! क्या कर रहे थे बड़े-बड़े अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक-धार्मिक नेता और नागरिक?’ किताब नायकों की कहानी नहीं सुना रही — वह हमसे हमारे बारे में पूछ रही है।”
📝 ! और शाह आयोग का निष्कर्ष: “आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं। इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। ! यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।”
दो मिनट की जाँच★
➤ “आपातकाल के दो बड़े अर्थ? निवारक नज़रबंदी की परिभाषा? प्रतिरोध के तीन रूप?”
खंड 4 · 42वाँ संशोधन, तीन सबक और 1977 का जनादेश
(कालांश 4 · पृष्ठ 102–104)
📝 ★★संविधान में बदलाव: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले की पृष्ठभूमि में संशोधन हुआ कि “प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।” और “आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ।” इसके ज़रिए हुए बदलावों में एक था — “देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना।” ! “यह व्यवस्था मात्र आपातकाल की अवधि भर के लिए नहीं की गई थी।” और “अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था।” ★“इस तरह देखें तो 1971 के बाद अब चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।”
⏸
➤ “अब मैं आपको उसी संशोधन के बारे में एक बात और बताता हूँ, जो किताब नहीं बताती। उसी 42वें संशोधन ने संविधान की प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े — ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’। और उसी ने मौलिक कर्तव्य भी दिए, अनुच्छेद इक्यावन-ए में।”
➤ “अब सोचिए। एक ही दस्तावेज़ में वह भी है जिसकी हम आलोचना करते हैं, और वह भी जिस पर हमें गर्व है। इससे इतिहास पढ़ने के बारे में क्या सीख मिलती है?”
⏸ (कक्षा से उत्तर लीजिए — दिशा: इतिहास में शुद्ध नायक और शुद्ध खलनायक कम होते हैं।)
➤ “अब तीन सबक। यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।”
📝 ★★आपातकाल के तीन सबक:
- “हालाँकि बहुत-से पर्यवेक्षक मानते हैं कि आपातकाल के दौरान भारत लोकतांत्रिक नहीं रह गया था, लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि थोड़े ही दिनों के अंदर कामकाज फिर से लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट आया। इस तरह आपातकाल का एक सबक तो यही है कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।”
- “आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव भी प्रकट हुए, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में दे।”
- “आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ… आपातकाल के बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।”
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➤ “दूसरे सबक पर रुकिए। कल हमने एक सवाल छोड़ा था — क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर घोषणा करनी चाहिए थी? यही उसका जवाब है। अब वह सलाह लिखित में देना ज़रूरी है। यानी संविधान ने अपनी ही खामी से सीखा।”
➤ “और एक बात जोड़ लीजिए, जो किताब नहीं बताती — ये सुधार 44वें संविधान संशोधन, 1978 से हुए। उसी ने कार्यकाल भी वापस पाँच साल कर दिया, और यह भी तय किया कि आपातकाल में भी अनुच्छेद बीस और इक्कीस निलंबित नहीं किए जा सकते।”
📝 ★पहला वाक्य याद रखिए: “भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” ! ध्यान दीजिए — किताब ‘असंभव’ नहीं कहती। वह ‘कठिन’ कहती है।
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➤ “अब 1977। आपातकाल अठारह महीने चला।”
📝 ★★1977 के चुनाव: “1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे। उत्तर भारत में तो खासतौर पर, क्योंकि यहाँ आपातकाल का असर सबसे ज्यादा महसूस किया गया था। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा। जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था।”
📝 जनवरी 1977 में सरकार ने चुनाव कराने का फ़ैसला किया और सभी नेता जेल से रिहा हुए। मार्च 1977 में चुनाव हुए। ★“चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया।” जगजीवन राम ने ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई, जो बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गई।
📝 ★★और जनता पार्टी की असली ताक़त: “जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”
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➤ “अब नतीजे। चार संख्याएँ लिखिए।”
📝 ★★1977 के परिणाम: “आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई।” कांग्रेस को लोकसभा की मात्र 154 सीटें मिलीं और 35 प्रतिशत से भी कम वोट। जनता पार्टी और उसके साथी दलों को कुल 542 सीटों में से 330 सीटें मिलीं। अकेले जनता पार्टी 295 सीटों पर जीती और उसे स्पष्ट बहुमत मिला।
📝 ! “कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली। इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए।”
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➤ “अब रुकिए, क्योंकि यहीं ज़्यादातर विद्यार्थी गलती करते हैं। यह मत सोचिए कि पूरा देश कांग्रेस के खिलाफ़ था। किताब खुद यह साफ़ करती है। लिखिए।”
📝 ★“कांग्रेस देश में हर जगह चुनाव नहीं हारी थी। महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में उसने कई सीटों पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखा था और दक्षिण भारत के राज्यों में तो एक तरह से उसकी चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला था।” इसके दो कारण: 1. “आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था” — ज़बरन विस्थापन और नसबंदी ज्यादातर उत्तर भारत में हुई। 2. ★★“उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और मध्यवर्ग के कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर इससे आ जुड़े।”
📝 ★और इसीलिए किताब कहती है: “1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते हैं, बल्कि इसके आगे की भी कुछ बातों का संकेत करते हैं।”
दो मिनट की जाँच★
➤ “42वें संशोधन का बदलाव? तीन सबक? 154, 330 और 295 किसके हैं?”
खंड 5 · जनता सरकार, विरासत और निष्कर्ष
(कालांश 5 · पृष्ठ 105–109)
➤ “आज हम अध्याय पूरा करेंगे। और आज की कहानी थोड़ी उदास है — क्योंकि जो जीत इतनी बड़ी थी, वह टिकी नहीं।”
📝 !★जनता सरकार: “1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद नेताओं के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए होड़ मची। इस होड़ में मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम शामिल थे।” मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, “लेकिन इससे जनता पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म न हुई।”
📝 ! “आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका। इस पार्टी के आलोचकों ने कहा कि जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था। जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी।”
📝 ★★“जनता पार्टी बिखर गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर दूसरी सरकार चरण सिंह के नेतृत्व में बनी। लेकिन बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया। इस वजह से चरण सिंह की सरकार मात्र 4 महीने तक सत्ता में रही। 1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए… कांग्रेस पार्टी को 353 सीटें मिलीं और वह सत्ता में आई।”
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➤ “अब पन्ना पलटिए। तीन कार्टून हैं, जनता पार्टी की गुटबाज़ी पर। दूसरा सबसे तीखा है। उसमें एक नेता तख्ती लिए खड़ा है — ‘मैंने जनता सरकार गिराई!’ और बाकी सब कह रहे हैं — ‘यह झूठ है। सब जानते हैं कि हम सबने दो साल मेहनत की और इसे गिराया!’”
⏸ (कक्षा को हँसने दीजिए।)
➤ “अब गंभीरता से — किताब इससे एक सबक निकालती है। और यह सबक 1977 वाले सबक जितना ही महत्वपूर्ण है।”
📝 ★★“1977–79 के चुनावों ने लोकतांत्रिक राजनीति का एक और सबक सिखाया — सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।”
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➤ “अब दोनों सबक साथ रखिए। 1977 में मतदाता ने अलोकतांत्रिक सरकार को सज़ा दी। 1980 में उसने अस्थिर सरकार को सज़ा दी। यानी लोकतंत्र सिर्फ़ आज़ादी नहीं माँगता — वह स्थिरता भी माँगता है।”
📝 ★★विरासत — दलगत प्रणाली में बदलाव: “1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी। अपने बदले हुए स्वभाव में कांग्रेस ने स्वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा। उसने अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और ग़रीबों की हिमायती पार्टी बताना शुरू किया… इसके साथ-साथ यह पार्टी अब एक नेता यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर भी निर्भर हुई।”
📝 ★और विपक्ष पर असर: “कांग्रेस की प्रकृति में आए बदलावों के मद्देनजर अन्य विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े… चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए। इस चीज़ ने 1977 के चुनावों में एक बड़ी भूमिका निभाई।”
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➤ “और अब वह बदलाव जो सबसे दूरगामी था। यह एक पंक्ति है, पर यही आगे के पूरे दशक की राजनीति तय करेगी।”
📝 ★★“अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ।” “बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा। इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।” किताब कहती है कि इसका विस्तार आप अंतिम अध्याय में पढ़ेंगे।
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➤ “अब अध्याय का आख़िरी और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा। किताब एक सवाल का जवाब देती है — क्या आपातकाल एक संवैधानिक संकट था या राजनीतिक?”
📝 ★★“आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपातकाल के मूल में था। दूसरी तरफ़ यह राजनीतिक संकट का भी दौर था। सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।”
📝 ★★और किताब का अंतिम निर्णय: “यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।”
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➤ “क्यों ‘ज्यादा संगीन’? मैं आपको एक बात दिखाता हूँ जिससे यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा। सोचिए — अनुच्छेद 352 का प्रयोग संविधान के अनुसार था। राष्ट्रपति की उद्घोषणा संवैधानिक थी। 42वाँ संशोधन संसद ने ज़रूरी बहुमत से पारित किया। और अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार की दलील मान ली।”
➤ “यानी हर कदम कानूनी था — और नतीजा फिर भी अलोकतांत्रिक था। समस्या कानून तोड़ने की नहीं थी; समस्या कानून के भीतर रहकर उसका उपयोग करने की थी। इसीलिए सुधार भी कानून में ही करने पड़े, 1978 में।”
📝 ! और संविधान-निर्माताओं की दो अपेक्षाएँ जो टूटीं: 1. “भारतीय संविधान के निर्माताओं को विश्वास था कि सभी राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मानकों का पालन करेंगे।” 2. “उन्हें यह भी विश्वास था कि आपातकाल की स्थिति में भी सरकार अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल विधि के शासन के दायरे में रहते हुए ही करेगी। इसी उम्मीद में सरकार को… व्यापक और चहुँमुखी शक्तियाँ दे दी गईं। इन शक्तियों का आपातकाल के दौरान दुरुपयोग हुआ।”
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➤ “और अंत में किताब एक सवाल छोड़ जाती है, जिसका जवाब वह नहीं देती। मैं भी नहीं दूँगा। सुनिए और लिखिए।”
📝 ★“क्या नागरिकों को विरोध की कार्रवाई में शामिल होने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए अथवा उन्हें इसका कोई अधिकार ही नहीं होना चाहिए? ऐसे विरोध की सीमा क्या मानी जाए?”
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➤ “इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है — और यही इस किताब की ईमानदारी है। आपको जीवन भर यह सवाल किसी न किसी रूप में मिलता रहेगा।”
अंतिम श्रुतलेख — पूरे अध्याय का सार(यह ज़रूर लिखवाइए)★★
➤ “अब आख़िरी बार लिखिए। यह एक पैराग्राफ़ पूरे अध्याय का निचोड़ है।”
📝 1972 से 1975 के बीच भारत तीन तरफ़ से दबाव में था — बेतहाशा मूल्यवृद्धि, खाद्यान्न-संकट और बेरोज़गारी; गुजरात और बिहार के छात्र-आंदोलन, जिनका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के आह्वान के साथ किया; और सरकार तथा न्यायपालिका का गहराता टकराव, जिसकी परिणति केशवानंद भारती के उस फ़ैसले में हुई कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गाँधी का निर्वाचन अवैध ठहराया; 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने आंशिक स्थगनादेश दिया; और 25 जून को रामलीला मैदान में जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की। उसी रात प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा कर दी। इसका व्यावहारिक अर्थ था संघीय ढाँचे का निष्प्रभावी होना, मौलिक अधिकारों का स्थगन, प्रेस सेंसरशिप, आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध, बड़े पैमाने पर निवारक नज़रबंदी, और अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नागरिकों के लिए अदालत के दरवाज़े भी बंद कर देना। प्रतिरोध हुआ — अख़बारों ने खाली जगह छोड़ी, कुछ पत्रिकाएँ बंद हो गईं, और दो लेखकों ने अपनी पदवी लौटाई — पर किताब ईमानदारी से कहती है कि ऐसे प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए। अठारह महीने बाद हुए 1977 के चुनाव आपातकाल पर जनमत-संग्रह साबित हुए: कांग्रेस को 154 सीटें और 35 प्रतिशत से कम वोट मिले, जबकि जनता पार्टी और उसके साथियों को 542 में से 330 सीटें — और आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा हार गई। पर वह जीत टिकी नहीं: मोरारजी देसाई की सरकार 28 माह में बहुमत खो बैठी, चरण सिंह की सरकार चार महीने चली, और 1980 में कांग्रेस 353 सीटों के साथ लौट आई। अध्याय दो सबकों पर समाप्त होता है — कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है, और यह भी कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी उसे ठप्प करने का फ़ैसला ले सकती है। इसीलिए किताब का अंतिम निर्णय यह है कि यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।
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➤ “बस। अध्याय पूरा। घर जाकर सिर्फ़ एक काम कीजिए — प्रश्नावली का आठवाँ प्रश्न पूरा लिखकर लाइए, चारों हिस्से: नागरिक अधिकार, कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंध, जनसंचार माध्यम, और पुलिस-नौकरशाही। क्योंकि उन चार हिस्सों में यह पूरा अध्याय समाया हुआ है।”