यह दस्तावेज़ केवल शिक्षक के लिए है। इसमें पढ़ाने का क्रम, कठिन बिंदु, अपेक्षित भ्रांतियाँ, बोर्ड-कार्य और — इस अध्याय में सबसे महत्वपूर्ण — राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री को सँभालने के सुझाव हैं।
1 · पहले यह पढ़िए — इस अध्याय की विशेष ज़िम्मेदारीध्यान
यह पुस्तक का सबसे संवेदनशील अध्याय है। इसमें जीवित राजनीतिक स्मृति है, और कक्षा में बैठे बच्चों के परिवारों की राय आपस में बहुत अलग हो सकती है।
तीन नियम जो पूरे अध्याय में लागू रहें★★
| # | नियम | क्यों |
|---|---|---|
| 1 | ★★पाठ्यपुस्तक के शब्द बोलिए, अपने विशेषण नहीं। | पाठ स्वयं संयत है — वह “ज्यादतियाँ”, “दुरुपयोग”, “विवादास्पद” जैसे नपे-तुले शब्द चुनती है। वही शब्द काफ़ी हैं। |
| 2 | ★★आँकड़े दीजिए, आरोप नहीं। | “लगभग एक लाख ग्यारह हज़ार गिरफ़्तारियाँ” कहना विश्लेषण है; उसके साथ कोई निंदा-वाक्य जोड़ना राजनीति है। |
| 3 | ★★हर पक्ष का तर्क उसकी सर्वोत्तम शक्ल में रखिए। | सरकार का तर्क भी, जेपी का तर्क भी, और न्यायालय का भी। विद्यार्थी को सोचना सिखाइए, निष्कर्ष मत सौंपिए। |
! यदि कक्षा में बहस गरम हो जाए, तो हमेशा पाठ के वाक्य पर लौटिए — वही तटस्थ भूमि है।
2 · इस अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी
★★पाठ के दो वाक्य, जो साथ-साथ पढ़े जाने चाहिए: “भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” (पृ. 102) “सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।” (पृ. 109)
इन्हें बोर्ड के दो कोनों में लिख दीजिए और अध्याय भर मत मिटाइए। ★पहला वाक्य आश्वस्ति देता है; दूसरा सतर्क करता है। शिक्षण का लक्ष्य यह है कि विद्यार्थी दोनों को साथ लेकर निकले — न भोला आशावाद, न निराशा।
3 · अध्याय का तर्क-प्रवाह — पाँच पड़ावों में
| पड़ाव | क्या स्थापित होता है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. पृष्ठभूमि | तीन धाराएँ — आर्थिक संकट, जन-आंदोलन, न्यायपालिका से संघर्ष | 93–96 |
| 2. घोषणा | 12 जून से 25 जून तक का चौदह दिन का क्रम | 97–98 |
| 3. व्यावहारिक अर्थ | संघीय ढाँचा, मौलिक अधिकार, प्रेस, नज़रबंदी, और अदालत का बंद दरवाज़ा | 99–101 |
| 4. सबक और जनादेश | 42वाँ संशोधन · तीन सबक · 1977 का जनमत-संग्रह | 102–104 |
| 5. विरासत | जनता सरकार की विफलता · दलगत प्रणाली में बदलाव · अंतिम निर्णय | 105–109 |
★★ध्यान दीजिए — अध्याय आपातकाल पर समाप्त नहीं होता। वह उसके परिणामों पर समाप्त होता है। और सबसे दूरगामी परिणाम वह है जिसका ज़िक्र अंत में एक पंक्ति में है: “1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ।”
4 · ✓ पढ़ाने से पहले — क्रॉस-रेफ़रेंस की स्थिति
| पृष्ठ | संदर्भ | ✓ जाँच |
|---|---|---|
| 93 | “1967 के बाद से… हम पहले ही पढ़ चुके हैं” | ✓ अध्याय 5 |
| 96 | “आपने पिछले साल पढ़ा था” (तीन संवैधानिक मसले) | ✓ कक्षा 11 — ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ |
| ★109 | “इस आयोग और पिछड़ी जातियों की राजनीति… के बारे में आप अंतिम अध्याय में पढ़ेंगे” | ✓ अध्याय 8 — ‘भारतीय राजनीति: नए बदलाव’ |
| ★109 | “आगे के अध्याय में हम इस तनाव की कुछ अभिव्यक्तियों को समझने की कोशिश करेंगे… विशेष रूप से क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी बहसों के बारे में” | ✓ अध्याय 7 — ‘क्षेत्रीय आकांक्षाएँ’ |
✓ अनाथ संदर्भ शून्य। ★और ध्यान दीजिए — ‘अंतिम अध्याय’ अब अध्याय 8 है, अध्याय 9 नहीं, क्योंकि युक्तिकरण में ‘जन आंदोलनों का उदय’ हटा दिया गया। यदि किसी विद्यार्थी के पास पुरानी गाइड हो तो यह अंतर बता दीजिए।
5 · बोर्ड-कार्य — छह ढाँचे
ढाँचा 1 — पृष्ठभूमि की तीन धाराएँ(कालांश 1–2)
आर्थिक संकट → जन-आंदोलन → न्यायपालिका से संघर्ष → और तीनों का संगम: 12 जून 1975 ★तीनों को अलग रंग की चॉक से लिखिए और अंत में तीनों तीर एक बिंदु पर मिलाइए। यह चित्र बच्चे भूलते नहीं।
ढाँचा 2 — चौदह दिन(कालांश 2)
12 जून → 24 जून → 25 जून (दिन) → 25 जून (रात) → 26 जून सुबह 6 बजे ★★यह समय-रेखा परीक्षा में सबसे ज़्यादा अंक दिलाती है।
ढाँचा 3 — दो नारे(कालांश 1)
| आंदोलन | सत्ता |
|---|---|
| “सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!” | “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” |
ढाँचा 4 — आपातकाल के छह परिणाम(कालांश 3)
विरोध रुका · नेता जेल में · प्रेस सेंसरशिप · दो संगठनों पर प्रतिबंध · धरना-प्रदर्शन पर रोक · अदालत का दरवाज़ा बंद
ढाँचा 5 — तीन सबक(कालांश 4)
1. लोकतंत्र को विदा करना कठिन · 2. खामियाँ सुधारी गईं (‘सशस्त्र विद्रोह’ + लिखित सलाह) · 3. नागरिक अधिकारों के प्रति सचेतना
ढाँचा 6 — दो जनादेश(कालांश 5)
| 1977 | 1980 |
|---|---|
| अलोकतांत्रिक सरकार को दंड | अस्थिर सरकार को दंड |
| कांग्रेस 154 | कांग्रेस 353 |
★★यह समरूपता अध्याय की सबसे सुंदर बात है — इसे अंत तक बोर्ड पर रखिए।
6 · कठिन बिंदु और उन्हें कैसे सँभालें
6.1 ‘पृष्ठभूमि’ और ‘घोषित कारण’ को अलग रखिए — यह सबसे बड़ी भूल हैध्यान★★
विद्यार्थी मान लेते हैं कि आपातकाल आर्थिक संकट के कारण घोषित हुआ। ✓ साफ़ कहिए: “आर्थिक संकट आपातकाल की पृष्ठभूमि था — पर सरकार ने जो कारण बताया वह था ‘देश में गड़बड़ी की आशंका’। ये दो अलग बातें हैं।” ★यही प्रश्न 1(ग) का उत्तर है, और वहीं सबसे ज़्यादा अंक कटते हैं।
6.2 “आपातकाल इंदिरा गाँधी ने घोषित किया” — इसे ठीक कीजिए, पर सावधानी सेध्यान
✓ पाठ का वाक्य पढ़िए: “प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी।” ★लिखने का सर्वोत्तम तरीका सिखाइए: “पहल प्रधानमंत्री की थी, परंतु संवैधानिक रूप से उद्घोषणा राष्ट्रपति ने की।” ! और उसी पन्ने का हाशिया-प्रश्न ज़रूर उठाइए — “क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी?” — क्योंकि उसका उत्तर तीसरे सबक में मिलता है।
6.3 अनुच्छेद 352 और 356 को गड्डमड्ड मत होने दीजिएध्यान★
| अनुच्छेद | कब | इसी अध्याय में उदाहरण |
|---|---|---|
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | ★गुजरात, 1974 — राष्ट्रपति शासन |
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल | ★★25 जून 1975 |
★दोनों एक ही अध्याय में हैं और एक साल के भीतर हैं — इसीलिए भ्रम होता है। बोर्ड पर साथ लिखिए।
6.4 जेपी वाले हाशिया-प्रश्न से भागिए मत★★
प्रश्न है: “यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?”
★★इसे कक्षा-बहस बनाइए, पर संरचना दीजिए। बोर्ड को दो हिस्सों में बाँटिए: पक्ष में: “अनैतिक और अवैधानिक आदेश मानने से इनकार करना नागरिक-कर्तव्य है; जेपी ने ‘अवैधानिक’ शब्द जोड़ा था।” विपक्ष में: “वर्दीधारी बलों से अपील करना अनुशासन की रेखा पार करना है; लोकतंत्र में सरकार बदलने का रास्ता चुनाव है।” ! किसी एक पक्ष को अपनी राय के रूप में मत थोपिए। पाठ्यपुस्तक भी इसे प्रश्न के रूप में ही छोड़ती है।
6.5 अप्रैल 1976 का फ़ैसला — इसे पूरा सुनाइए, यह अध्याय का नैतिक शिखर है★★
पाठ केवल इतना कहती है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले उलट दिए और यह “सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक” माना गया।
★★संवर्धन से तीन बातें जोड़िए — कक्षा इन्हें कभी नहीं भूलती: (1) निर्णय 4:1 का था। (2) अकेले असहमत होने वाले न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना को इसकी कीमत मुख्य न्यायाधीश न बन पाने से चुकानी पड़ी। (3) 2017 में नौ न्यायाधीशों ने उस फ़ैसले को निरस्त करते हुए कहा कि खन्ना ही सही थे।” ★फिर पूछिए: “चालीस साल लगे। तो क्या अकेले सही होना बेकार था?” — यह अध्याय का सर्वश्रेष्ठ चर्चा-क्षण है।
6.6 42वें संशोधन को केवल खलनायक मत बनाइए★
पाठ उसका एक ही पक्ष देती है — कार्यकाल 5 से 6 साल।
!★पर उसी संशोधन ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द तथा मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) भी जोड़े। ★★कक्षा से पूछिए: “एक ही दस्तावेज़ में वह भी है जिसकी हम आलोचना करते हैं और वह भी जिस पर हमें गर्व है। इससे इतिहास पढ़ने के बारे में क्या सीख मिलती है?” उत्तर की दिशा: इतिहास में शुद्ध नायक और शुद्ध खलनायक कम होते हैं।
6.7 प्रतिरोध को महिमामंडित मत कीजिए — पाठ भी नहीं करती★
पाँच प्रतिरोध पढ़ाने के तुरंत बाद यह वाक्य पढ़िए:
! “बहरहाल, मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।” और फिर हाशिया-प्रश्न: “जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें — बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया! क्या कर रहे थे बड़े-बड़े अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक-धार्मिक नेता और नागरिक…?” ★★यह प्रश्न विद्यार्थी को नायक-कथा से निकालकर नागरिक-ज़िम्मेदारी की ओर ले जाता है। इसे मत छोड़िए।
6.8 1977 का जनादेश ‘पूरे देश का’ नहीं था — यह ज़रूर बताइए★
विद्यार्थी मान लेते हैं कि पूरा देश कांग्रेस के खिलाफ़ था। ✓ पाठ का वाक्य: “कांग्रेस देश में हर जगह चुनाव नहीं हारी थी। महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में… और दक्षिण भारत के राज्यों में तो एक तरह से उसकी चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला था।”
★★और पृ. 106 का हाशिया-प्रश्न पूछिए: “अगर उत्तर और दक्षिण के राज्यों में मतदाताओं ने इतने अलग ढर्रे पर मतदान किया, तो हम कैसे कहें कि 1977 के चुनावों का जनादेश क्या था?” ★यह प्रश्न सिखाता है कि ‘जनादेश’ कोई एकल चीज़ नहीं होती।
7 · संवेदनशील विषय — कैसे सँभालेंध्यान
| विषय | पाठ्यपुस्तक का रुख | ★शिक्षक के लिए सुझाव |
|---|---|---|
| !! इंदिरा गाँधी और आपातकाल | पाठ तथ्य और परिणाम दर्ज़ करता है, व्यक्ति पर नैतिक फ़ैसला नहीं सुनाता | ★★वही कीजिए। “सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था; फिर भी नेतृत्व ने लोकतंत्र ठप्प करने का फ़ैसला किया” — यह वाक्य पर्याप्त है। ! इसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ने की ज़रूरत नहीं। |
| !! नसबंदी | पाठ केवल एक पंक्ति देता है — “ज़बरन नसबंदी… ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में” | ★★आँकड़े दीजिए (संवर्धन §7) और वहीं रुक जाइए। ! विवरणात्मक कहानियाँ मत सुनाइए — कक्षा में कुछ बच्चों के परिवार इससे प्रभावित रहे हो सकते हैं। तथ्य + परिणाम = पर्याप्त। |
| ! RSS और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध | पाठ इसे एक तथ्य के रूप में दर्ज़ करता है, कारण-सहित (“सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर”) | ★उसी वाक्य में रहिए। ! इन संगठनों की वर्तमान राजनीति पर चर्चा में मत जाइए — वह इस अध्याय का विषय नहीं है। |
| ! जयप्रकाश नारायण | पाठ प्रशंसा और आलोचना — दोनों दर्ज़ करता है | ★★दोनों पढ़ाइए। जीवनी-बॉक्स की गरिमा भी, और यह भी कि “जेपी के विचारों और… जन-प्रतिरोध की रणनीति की आलोचनाएँ भी मुखर हुईं।” |
| ! न्यायपालिका की भूमिका | पाठ 1976 के फ़ैसले को “सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक” कहता है | ★यह पाठ का अपना आकलन है — इसे उद्धरण के रूप में दीजिए। और साथ में 2017 वाला सुधार भी, ताकि कहानी अधूरी न रहे। |
| ! वर्तमान राजनीति से तुलना | पाठ कोई समकालीन तुलना नहीं करता | !! आप भी मत कीजिए। यदि विद्यार्थी आज की किसी घटना से तुलना करे, तो कहिए: “यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, पर उसका उत्तर तथ्यों से देना होगा — और वे तथ्य इस पाठ्यपुस्तक में नहीं हैं।” ★फिर सिद्धांत पर लौटिए: “हम यह पूछ सकते हैं कि 44वें संशोधन के बाद ऐसा दोबारा कितना कठिन हो गया।” |
8 · पाठ में ध्यान देने योग्य बातें
| # | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| 1 | प्रश्न 1(क) | ! “आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की” — तकनीकी रूप से उद्घोषणा राष्ट्रपति की थी। विद्यार्थी को संतुलित वाक्य लिखना सिखाइए। |
| 2 | प्रश्न 1(ग) | !★सबसे बड़ा जाल — पृष्ठभूमि बनाम घोषित कारण |
| 3 | प्रश्न 1(ङ) | ★“सी.पी.आई. ने समर्थन किया” — सही। यह अध्याय 5 से जुड़ता है, जहाँ 1971 का कांग्रेस-सीपीआई गठजोड़ था। ! यह माकपा नहीं है — यह अंतर बताइए। |
| 4 | प्रश्न 2 | ★★उत्तर (ङ) शाह आयोग — क्योंकि बाकी चारों घोषणा से पहले के हैं और वह बाद का। यह तर्क लिखवाइए। |
| 5 | पृ. 96 का बॉक्स | ★रेल हड़ताल — और उसका बड़ा प्रश्न: “क्या आवश्यक सेवाओं के कर्मचारी हड़ताल कर सकते हैं?” |
| 6 | पृ. 104 का कार्टून | ★★चारों औज़ार एक चित्र में — EMERGENCY, CENSOR, MISA, 42nd AMENDMENT। इसे बोर्ड पर उतरवाइए। |
| 7 | पृ. 107 का दूसरा कार्टून | ★“WE ALL WORKED FOR TWO YEARS AND BROUGHT IT DOWN!” — प्रश्न 4 का तैयार उत्तर |
| 8 | पृ. 109 | ★★मंडल आयोग वाला वाक्य — यह अध्याय 8 का बीज है और अक्सर छूट जाता है |
9 · मूल्यांकन-सुझाव
9.1 कक्षा में मौखिक जाँच(हर कालांश के अंत में 2 मिनट)
| कालांश | पूछिए |
|---|---|
| 1 | “1973 और 1974 में कीमतें कितनी बढ़ीं? जेपी की दो शर्तें? दोनों नारे?” |
| 2 | “तीन संवैधानिक मसले? 12 जून का फ़ैसला किसने दिया? कौन-सा अनुच्छेद?” |
| 3 | “आपातकाल के दो बड़े अर्थ? निवारक नज़रबंदी क्या है? प्रतिरोध के तीन रूप?” |
| 4 | “42वें संशोधन का बदलाव? तीन सबक? 154, 330 और 295 किसके?” |
| 5 | “28 माह और 4 महीने किसके? 1980 में कितनी सीटें? अध्याय का अंतिम निर्णय?” |
9.2 लिखित मूल्यांकन का ढाँचा
| प्रकार | अंक | अनुशंसित प्रश्न |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ | 1×6 | NCERT प्रश्न 1, 2 और 3 |
| लघु | 2×4 | निवारक नज़रबंदी · ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ · केशवानंद भारती · तीन सबक |
| दीर्घ | 4×2 | NCERT प्रश्न 5 और 7 |
| निबंधात्मक | 6×1 | NCERT प्रश्न 8 (चार पक्षों पर असर) — या “राजनीतिक संकट बनाम संवैधानिक संकट” |
| स्रोत-आधारित | 5×1 | NCERT प्रश्न 10 (पार्थ चटर्जी) — या 05-Question-Bank का खंड ख.5 |
9.3 परियोजना-कार्य के तीन सुझाव★
- ★★‘एक खाली संपादकीय’ — विद्यार्थी 27 जून 1975 के किसी अख़बार का पहला पन्ना कल्पना से बनाएँ, जिसमें संपादकीय की जगह खाली हो और नीचे एक पंक्ति में लिखें कि वे उस जगह क्या लिखना चाहते थे। ★यह गतिविधि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को उपदेश से नहीं, अनुभव से सिखाती है।
- ★‘कार्टून पढ़ना’ — पृ. 95, 98, 104 और 107 के कार्टूनों में से कोई तीन चुनकर विद्यार्थी लिखें कि कार्टूनिस्ट क्या कह रहा है और वह पाठ के किस वाक्य से मेल खाता है।
- ★‘दो जनादेश’ — विद्यार्थी 1977 और 1980 के चुनाव-परिणामों की तुलना-तालिका बनाएँ और तीन पंक्तियों में लिखें कि मतदाता ने दोनों बार किस चीज़ को दंड दिया।
10 · समय की तंगी हो तो — क्या छोड़ें, क्या नहीं
| ✓ कभी मत छोड़िए | ! संक्षेप में कर सकते हैं |
|---|---|
| ★★खाली संपादकीय वाला बॉक्स (पृ. 92) | आठों आर्थिक कारक (पर 23%/30% और वेतन-रोक ज़रूर) |
| ★‘गड़बड़ी की आशंका’ — घोषित कारण | नक्सलवादी अंश का विस्तार (पर ‘पश्चिम बंगाल’ ज़रूर) |
| ★★जेपी की दो शर्तें और ‘सम्पूर्ण क्रांति’ | गुजरात आंदोलन का पूरा ब्योरा (पर राष्ट्रपति शासन ज़रूर) |
| ★रेल हड़ताल — फर्नान्डिस, 20 दिन | रेल-हड़ताल बॉक्स की भूमिका वाली पंक्तियाँ |
| ★★तीन संवैधानिक मसले और केशवानंद भारती | ए.एन. रे प्रकरण का विस्तार (पर ‘तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी’ ज़रूर) |
| ★★12/24/25/26 जून की समय-रेखा | रामलीला मैदान का विस्तार |
| ★★अनुच्छेद 352 और फखरुद्दीन अली अहमद | दोनों समाचार-कोलाज (पर ‘WORK MORE TALK LESS’ और ‘MRS GANDHI DEFEATED’ ज़रूर दिखाइए) |
| ★★आपातकाल के दो बड़े अर्थ और छह परिणाम | RSS/जमात प्रतिबंध का विस्तार |
| ★★निवारक नज़रबंदी की परिभाषा | बंदी प्रत्यक्षीकरण की तकनीकी चर्चा |
| ★★अप्रैल 1976 का फ़ैसला | — यह कभी मत छोड़िए |
| ★प्रतिरोध के पाँच रूप + “कुछ ही लोगों ने” | शिवराम कारंत और ‘रेणु’ का विस्तार (पर नाम ज़रूर) |
| ★★42वाँ संशोधन (5→6) और तीन सबक | शाह आयोग का विस्तार (पर निष्कर्ष-वाक्य ज़रूर) |
| ★★1977 के आँकड़े — 154/330/295 | जनता पार्टी के घटक दलों की पूरी सूची |
| ★दक्षिण भारत वाला संतुलन | पृ. 106 के मानचित्र का विस्तार |
| ★★28 माह / 4 महीने / 353 सीटें और दूसरा सबक | तीनों गुटबाज़ी-कार्टून (पर दूसरा ज़रूर) |
| ★★“राजनीतिक संकट… कहीं ज्यादा संगीन था” | ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ का पूरा कथानक |
| ★मंडल आयोग वाला वाक्य | — |
11 · एक पंक्ति में — यदि केवल पाँच मिनट हों
1972 से 1975 के बीच भारत तीन तरफ़ से दबाव में था — बेतहाशा मूल्यवृद्धि और बेरोज़गारी, गुजरात-बिहार के छात्र-आंदोलन जिनका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के आह्वान के साथ किया, और न्यायपालिका से सरकार का गहराता टकराव जिसकी परिणति केशवानंद भारती के ‘बुनियादी ढाँचे’ वाले फ़ैसले में हुई। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी का निर्वाचन अवैध ठहराया, 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने आंशिक राहत दी, 25 जून को रामलीला मैदान में जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की — और उसी रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा कर दी। इसका अर्थ था संघीय ढाँचे का निष्प्रभावी होना, मौलिक अधिकारों का स्थगन, प्रेस सेंसरशिप, बड़े पैमाने पर निवारक नज़रबंदी, और अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नागरिकों के लिए अदालत का दरवाज़ा भी बंद कर देना। अठारह महीने बाद हुए 1977 के चुनाव आपातकाल पर जनमत-संग्रह साबित हुए — कांग्रेस को 154 सीटें मिलीं और जनता पार्टी तथा साथी दलों को 330, और आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा हार गई। पर जनता सरकार 28 महीने में बिखर गई और 1980 में कांग्रेस 353 सीटों के साथ लौट आई। अध्याय दो सबकों पर समाप्त होता है — कि भारत से लोकतंत्र को विदा करना बहुत कठिन है, और यह भी कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी उसे ठप्प करने का फ़ैसला ले सकती है। इसीलिए पाठ कहता है कि यह राजनीतिक संकट संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।