Chapter 5कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

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NCERT से आगे — संवर्धन सामग्री(Enrichment Beyond the Textbook)

यह क्या है? पाठ्यपुस्तक जहाँ रुक जाती है, यह दस्तावेज़ वहाँ से शुरू होता है। हर बाहरी तथ्य जाँचा गया है और स्रोत-चिह्न के साथ दर्ज़ है।

चिह्नअर्थ
【पाठ】NCERT पाठ्यपुस्तक में मौजूद
◆प्राथमिक स्रोत — संविधान, न्यायालय का निर्णय, चुनाव आयोग/सरकारी अभिलेख
◇द्वितीयक स्रोत — प्रामाणिक अकादमिक/पत्रकारीय अभिलेख
➕व्याख्या और संश्लेषण (तथ्य नहीं, तर्क)

!! बोर्ड-परीक्षा की चेतावनी: उत्तर की रीढ़ 【पाठ】 है। यहाँ की सामग्री उत्तर के अंत में एक-दो पंक्तियों में जोड़िए।

तिहाई-1 · आँकड़े जो पाठ नहीं देता

§1 · 1967 और 1971 — असली संख्याएँ★★

【पाठ】 कहती है कि 1967 में कांग्रेस को “जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिल गया” और “अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें।” ! पर संख्या नहीं देती।

चुनावकांग्रेस की सीटें【स्रोत】
1962 (तीसरा आम चुनाव)361◇
★★1967 (चौथा आम चुनाव)283 — यानी 78 सीटों की गिरावट◇
★★1971 (पाँचवाँ आम चुनाव)कांग्रेस (आर) अकेले 352 सीटें, 44% वोट【पाठ】+◇

★★➕ इन तीन संख्याओं को एक साथ रखिए और पूरा अध्याय एक पंक्ति में दिख जाता है: 361 → 283 → 352। यानी कांग्रेस गिरी, टूटी, और फिर पहले से भी ऊपर पहुँच गई — पर लौटी हुई कांग्रेस वही कांग्रेस नहीं थी। ! ध्यान दीजिए — 1971 की 352 सीटें अकेले कांग्रेस (आर) की हैं, यानी टूटी हुई आधी पार्टी की। यही इंदिरा गाँधी की जीत का असली पैमाना है।

§2 · दल-बदल का असली पैमाना ◇★

【पाठ】 ‘आया राम-गया राम’ का किस्सा देती है, पर यह नहीं बताती कि यह परिघटना कितनी बड़ी थी।

★★◇ 1967 और 1971 के चुनावों में केंद्रीय और राज्य विधायिकाओं के लिए चुने गए लगभग 4,000 विधायकों/सांसदों में से करीब आधों ने आगे चलकर दल-बदल किया।”

➕ अब ‘आया राम-गया राम’ मज़ाक नहीं, एक व्यवस्थागत संकट लगता है। और यही बताता है कि 【पाठ】 की वह पंक्ति — “बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया” — कितनी ज़रूरी थी।

§3 · वह संविधान संशोधन जिसका नाम पाठ नहीं लेता ◆+◇★★

【पाठ】 केवल इतना कहती है: “बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।” ➕ पर न वर्ष बताती है, न संख्या। परीक्षा में यही पूछा जाता है।

मदविवरण
★★कानून52वाँ संविधान संशोधन, 1985 — इसी ने संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी
प्रावधानदल-बदल के आधार पर सांसदों और विधायकों की अयोग्यता (disqualification) का प्रावधान
★91वाँ संशोधन, 2003इसने दो काम किए — (1) मंत्रिपरिषद् का आकार सदन की कुल सदस्य-संख्या के 15% तक सीमित किया; (2) ◇ दल-बदल पर मिलने वाली ‘विभाजन’ (split) की छूट समाप्त कर दी — अब केवल विलय (merger) की स्थिति में ही संरक्षण मिलता है

★★➕ कक्षा में यह कहिए: “आपकी पाठ्यपुस्तक 1967 में एक विधायक की हड़बड़ी का किस्सा सुनाती है। उस हड़बड़ी को रोकने में भारत को अठारह साल लगे — 1967 से 1985 तक। और उसके बाद भी उसमें एक छेद रह गया, जिसे 2003 में बंद करना पड़ा।”

तिहाई-2 · अदालत, संविधान और 1969 की टूट

§4 · बैंक-राष्ट्रीयकरण — पूरी कहानी ◆+◇★★

【पाठ】 केवल कहती है: “चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण… जैसी कुछ बड़ी और जनप्रिय नीतियों की घोषणा भी की।”

तिथि/मदविवरण
★★19 जुलाई 1969सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया
★कसौटीहर बैंक की जमा-राशि ₹50 करोड़ से अधिक थी
★★पैमानाइन 14 बैंकों के पास देश की कुल बैंक-जमा का लगभग 85 प्रतिशत था
! 10 फ़रवरी 1970सर्वोच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की पीठ ने 10–1 के बहुमत से आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ में अध्यादेश को अवैध ठहराया
★आगेइसके बाद सरकार ने मुआवज़े का प्रावधान करते हुए नया कदम उठाया — और राष्ट्रीयकरण कायम रहा

★★➕ यहाँ एक बहुत सुंदर विडंबना है, जो कक्षा में ज़रूर बताइए: राष्ट्रपति पद के लिए इंदिरा गाँधी ने जिन वी.वी. गिरि को जितवाया था, बैंक-राष्ट्रीयकरण से जुड़ी अगली कार्रवाई पर उन्हीं राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए। यानी 1969 का राष्ट्रपति चुनाव केवल प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं थी — उसके ठोस नीतिगत परिणाम थे।

§5 · ‘प्रिवी पर्स’ — अदालत और संसद की पूरी लड़ाई ◆+◇★★

【पाठ】 का बॉक्स तीन चरण बताता है — राज्यसभा में विफलता → अध्यादेश → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त → 1971 के बाद संशोधन। ➕ पर न मुकदमे का नाम देता है, न संशोधन की संख्या।

चरणविवरण
1970संविधान संशोधन का प्रयास — राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली 【पाठ】
फिरसरकार ने राष्ट्रपति के आदेश/अध्यादेश का रास्ता लिया 【पाठ】
!★15 दिसंबर 1970सर्वोच्च न्यायालय ने माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ में उस आदेश को असंवैधानिक ठहराया — तर्क यह कि सरकार संवैधानिक गारंटी को एकतरफ़ा वापस नहीं ले सकती ◆
★★28 दिसंबर 19711971 की भारी जीत और दो-तिहाई बहुमत के बाद 26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 पारित — इसने प्रिवी पर्स समाप्त किया, शासकों की मान्यता हटाई और पुराने समझौतों से मिले सभी विशेषाधिकार समाप्त कर दिए ◆

★★➕ इस पूरे प्रकरण की सीख 【पाठ】 खुद संकेत में देती है, पर आप इसे स्पष्ट कर दीजिए: एक नीति संसद के ऊपरी सदन में हारी, फिर सर्वोच्च न्यायालय में हारी — और अंततः जनता की अदालत में जीत गई। लोकतंत्र में यही तीनों दरवाज़े हैं, और तीनों काम करते दिखते हैं। ! पर संतुलन भी दीजिए: यही घटना यह भी दिखाती है कि बड़ा बहुमत मिलने पर संविधान संशोधन कितना आसान हो जाता है — और यही चिंता आगे अध्याय 6 का विषय बनेगी।

§6 · 1969 का राष्ट्रपति चुनाव — वह विवरण जो इसे अनोखा बनाता है ◇★★

【पाठ】 केवल कहती है कि “आखिरकार राष्ट्रपति पद के चुनाव में वी.वी. गिरि ही विजयी हुए।” ➕ पर वे कैसे जीते — यह भारत के चुनावी इतिहास की एक अनूठी घटना है।

मदविवरण
प्रणालीराष्ट्रपति का चुनाव एकल संक्रमणीय मत (वरीयता-क्रम) से होता है — मतदाता उम्मीदवारों को 1, 2, 3… की वरीयता देते हैं
पहली गिनतीगिरि को सबसे अधिक प्रथम-वरीयता मत मिले, पर किसी को भी आवश्यक कोटा नहीं मिला
★★निर्णायक मोड़तीसरे उम्मीदवार सी.डी. देशमुख के बाहर होने पर उनके द्वितीय-वरीयता मत बँटे — और उन्हीं से गिरि जीते
★अंतिम परिणामगिरि लगभग 4,20,000 मूल्य-मत; रेड्डी लगभग 4,05,000 — यानी अत्यंत निकट मुकाबला
★★विशिष्टतायह भारत का एकमात्र राष्ट्रपति चुनाव है जो द्वितीय-वरीयता मतों की गिनती के बाद तय हुआ

★★➕ अब 【पाठ】 का ‘अंतरात्मा की आवाज़’ वाला दाँव और भी बड़ा लगता है। अगर ‘व्हिप’ का पालन हुआ होता, तो रेड्डी आसानी से जीत जाते। जीत का अंतर इतना कम था कि इंदिरा गाँधी की यह एक अपील ही निर्णायक साबित हुई — और उसी ने पार्टी तोड़ दी। ★कक्षा में पूछिए: “क्या एक प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी के व्हिप के विरुद्ध अपील करनी चाहिए?” यह प्रश्न 5 के लिए बेहतरीन सामग्री है।

तिहाई-3 · गहराई के सवाल

§7 · ‘कांग्रेस प्रणाली’ आख़िर थी क्या — अध्याय 2 की याद★★

【पाठ】 पहले पन्ने पर कहती है: “इस किताब के दूसरे अध्याय में आपने कांग्रेस प्रणाली के उद्भव के बारे में पढ़ा था।” ➕ पर उसकी परिभाषा दोहराती नहीं। उत्तर लिखने से पहले वह याद होनी चाहिए।

➕ ‘कांग्रेस प्रणाली’ के तीन लक्षणअध्याय 5 में क्या हुआ
1. एक ही दल का प्रभुत्व, पर लोकतांत्रिक तरीके से! 1967 में प्रभुत्व टूटा; 1971 में लौटा
2. दल के भीतर कई गुट — यानी विपक्ष पार्टी के अंदर ही!★★1969 के बाद यह खत्म — “इस कांग्रेस पार्टी के भीतर कई गुट नहीं थे” 【पाठ】
3. हर तनाव को भीतर ही पचा लेने की क्षमता!★★“नयी कांग्रेस… इस क्षमता से हीन थी” 【पाठ】

★★➕ इसलिए अध्याय का शीर्षक ही उत्तर है: ‘चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना’। चुनौती तीनों लक्षणों पर आई; पुनर्स्थापना केवल पहले लक्षण की हुई। दूसरा और तीसरा लक्षण लौटा ही नहीं। ★यही सुदीप्त कविराज के “कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई” का अर्थ है।

§8 · गठबंधन-राजनीति की जड़ 1967 में है, 1989 में नहीं★

【पाठ】 का हाशिया-प्रश्न (पृ. 82) कहता है: “मैं तो सोचती थी कि ऐसा केवल 1990 के दशक में हुआ।”

★★➕ यह प्रश्न बहुत ज़रूरी सुधार करता है। आम धारणा यह है कि गठबंधन-युग 1989 में शुरू हुआ। पर 【पाठ】 दिखाती है कि — (1) गठबंधन-सरकारें 1967 में ही बन गई थीं (संयुक्त विधायक दल); (2) त्रिशंकु विधानसभाएँ 1967 में ही आ गई थीं; (3) दल-बदल 1967 में ही महामारी बन चुका था; (4) और क्षेत्रीय दल की पहली पूर्ण-बहुमत सरकार भी 1967 में ही बनी (मद्रास में डीएमके)।

➕ अंतर बस इतना है कि 1967 का प्रयोग राज्यों तक सीमित रहा और केंद्र में कांग्रेस बची रही; 1989 के बाद वही परिघटना केंद्र तक पहुँची।

§9 · ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की सफलता और उसकी सीमा★

✓ सफलता! सीमा
1967 में नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर 【पाठ】! “राज्यों में बनी अधिकतर गैर-कांग्रेसी गठबंधन की सरकारें ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाईं” 【पाठ】
यह सिद्ध हुआ कि “कांग्रेस को चुनावों में हराया जा सकता है” 【पाठ】! “बहरहाल, अब भी कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं था” 【पाठ】
1971 में ‘ग्रैंड अलायंस’ के रूप में यह राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया गया!★पर “‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था” — और उसे 60 से भी कम सीटें मिलीं 【पाठ】

★★➕ इससे एक स्थायी सबक निकलता है, जो आज भी उतना ही सच है: केवल ‘किसके विरुद्ध’ होने से गठबंधन चुनाव जीत सकता है, पर सरकार नहीं चला सकता। 1967 में विपक्ष जीता क्योंकि उसके पास एक साझा शत्रु था; 1971 में हारा क्योंकि उसके पास साझा कार्यक्रम नहीं था। ★यही प्रश्न 4 और प्रश्न 6 दोनों की कुंजी है।

§10 · ‘गरीबी हटाओ’ — क्या वह “महज चुनावी छलावा” था?★★

【पाठ】 स्वयं हाशिये में पूछती है (पृ. 86): “क्या यह नारा महज चुनावी छलावा था?” और प्रश्न 10 का अवतरण कहता है: “कई नारे उछाले गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियाँ भी बनानी थीं।”

➕ दोनों पक्ष — उत्तर में यही संतुलन लिखिए

✓ “केवल नारा नहीं था” के तर्क! “नारा ही रह गया” के तर्क
14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक ठोस नीति थी 【पाठ】+◇कविराज का दावा — नारे और नीतियों के बीच मेल नहीं था 【पाठ】
प्रिवी पर्स समाप्त हुआ — 26वाँ संशोधन, 1971 ◆! 【पाठ】 स्वयं कहती है: “विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही”
“भूमि सुधार के मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन के लिए ज़बरदस्त अभियान” और भू-परिसीमन के नए कानून 【पाठ】! अगले ही अध्याय में गुजरात और बिहार के आंदोलनों का मुद्दा फिर वही है — कीमतें, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार

★★➕ सबसे परिपक्व उत्तर यह है: ‘गरीबी हटाओ’ एक साथ दोनों था — एक वास्तविक नीति-दिशा भी और एक चुनावी उपकरण भी। उसकी नीतियाँ बनीं ज़रूर, पर उनका असर उतना गहरा नहीं हुआ जितना नारे ने वादा किया था। और इसी अंतर से 1974 का असंतोष जन्मा।

§11 · अध्याय की सबसे बड़ी दार्शनिक सीख★

★★【पाठ】 का यह अनुच्छेद ध्यान से पढ़िए (पृ. 89): “कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी… लेकिन नयी कांग्रेस… इस क्षमता से हीन थी। …जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।”

➕ इसे एक सामान्य नियम के रूप में समझिए: जो संस्था असहमति को अपने भीतर जगह देती है, वह असहमति को व्यवस्था के भीतर बनाए रखती है। जो संस्था असहमति को बाहर धकेल देती है, वह असहमति को सड़क पर पहुँचा देती है। ★★1969 में कांग्रेस ने अपने भीतर की असहमति को बाहर कर दिया — और 1974 में वही असहमति गुजरात और बिहार की सड़कों पर लौटी। यही अध्याय 5 और अध्याय 6 के बीच की कड़ी है।

§12 · बहस के लिए पाँच प्रश्न★

#प्रश्न
1क्या ‘अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट’ का आह्वान लोकतांत्रिक था, या पार्टी-अनुशासन का उल्लंघन?
21967 का जनादेश ‘भूकंप’ था या स्वस्थ लोकतंत्र का सामान्य संकेत?
3दल-बदल विरोधी कानून विधायक की स्वतंत्र राय छीन लेता है — क्या यह सही है?
4प्रिवी पर्स का मामला बताता है कि बड़ा बहुमत संविधान बदल सकता है। यह लोकतंत्र की ताक़त है या ख़तरा?
5★एक पार्टी जो चुनाव जीतती रहे पर संगठन के रूप में खोखली हो — क्या उसे ‘सफल’ कहा जा सकता है?

§13 · परीक्षा में इस्तेमाल करने योग्य आठ पंक्तियाँ★

इन्हें उत्तर के अंत में जोड़िए — एक उत्तर में एक ही।

  1. “1962 में कांग्रेस की 361 सीटें थीं, 1967 में 283 रह गईं — और 1971 में अकेले कांग्रेस (आर) को 352 मिलीं।”
  2. “1967 और 1971 में चुने गए लगभग 4,000 विधायकों में से करीब आधों ने आगे चलकर दल-बदल किया।”
  3. “दल-बदल रोकने वाला संशोधन 52वाँ संविधान संशोधन, 1985 था, जिसने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी।”
  4. “91वें संशोधन (2003) ने मंत्रिपरिषद् का आकार सदन के 15% तक सीमित किया और दल-बदल में ‘विभाजन’ की छूट समाप्त की।”
  5. “14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण 19 जुलाई 1969 के अध्यादेश से हुआ; इनके पास देश की कुल बैंक-जमा का लगभग 85 प्रतिशत था।”
  6. “सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 1970 में उस अध्यादेश को अवैध ठहराया, पर राष्ट्रीयकरण अंततः कायम रहा।”
  7. “प्रिवी पर्स की समाप्ति 26वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 से हुई — 1971 की भारी जीत के बाद।”
  8. “1969 का राष्ट्रपति चुनाव भारत का एकमात्र ऐसा चुनाव है जो द्वितीय-वरीयता मतों की गिनती के बाद तय हुआ।”

🌐 स्रोत-सूची

क्षेत्रस्रोत-प्रकार
NCERT पाठ 【पाठ】स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, अध्याय 5, पृष्ठ 72–91 — 150 dpi पर दृश्य पठन
1962/1967 की कांग्रेस सीटें (361 → 283)◇ चुनाव-अभिलेख आधारित संकलन
1971: कांग्रेस (आर) 352 सीटें, 44% वोट【पाठ】+◇
1967–71 में लगभग आधे विधायकों का दल-बदल◇
52वाँ संविधान संशोधन, 1985 और दसवीं अनुसूची◆ भारत का संविधान
91वाँ संविधान संशोधन, 2003 — मंत्रिपरिषद् का 15% कैप◆+◇
19 जुलाई 1969 का बैंक-राष्ट्रीयकरण; ₹50 करोड़ की कसौटी; ~85% जमा◇
आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ — 11-न्यायाधीश पीठ, 10–1, 10 फरवरी 1970◆ न्यायालय का निर्णय
माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ (15 दिसंबर 1970)◆ न्यायालय का निर्णय
26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 (28 दिसंबर 1971)◆ भारत का संविधान
1969 का राष्ट्रपति चुनाव — द्वितीय-वरीयता मतों से निर्णय; गिरि ~4.20 लाख, रेड्डी ~4.05 लाख मूल्य-मत◇ चुनाव-अभिलेख

! सटीकता-नीति: कोई भी तथ्य स्मृति से नहीं लिखा गया। जहाँ स्रोतों में मामूली भिन्नता है (विशेषकर मत-मूल्यों में), वहाँ “लगभग” लिखा गया है। झूठी परिशुद्धता से बचना ग़लत तथ्य देने से बचने जितना ही ज़रूरी है।