यह क्या है: नीचे दिया गया हर वाक्य वैसा ही है जैसा शिक्षक कक्षा में बोलेंगे और विद्यार्थी अपनी कॉपी में लिखेंगे। यह सारांश नहीं, बोलने की स्क्रिप्ट है।
कैसे इस्तेमाल करें:
- बोल्ड शब्दों पर आवाज़ ठहराइए — विद्यार्थी इन्हें रेखांकित करेंगे।
- [रुकिए] का अर्थ है — लिखने का समय दीजिए।
- 〔शिक्षक के लिए〕 — यह बोलना नहीं है, केवल आपके लिए निर्देश है।
- कुल 10 श्रुतलेख-खंड, 6 कालांशों में बँटे हुए।
कालांश 1
खंड 1 — सुरक्षा क्या है?
〔शिक्षक के लिए: बोर्ड पर शीर्षक लिखकर शुरू कीजिए। धीमे बोलिए — यह अध्याय की नींव है।〕
लिखिए — शीर्षक: सुरक्षा क्या है? [रुकिए]
एक। सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है — खतरे से आजादी। [रुकिए]
दो। लेकिन हर खतरा सुरक्षा का मसला नहीं होता। अगर हम हर खतरे को इसमें शामिल कर लें, तो — और यह पाठ्यपुस्तक के अपने शब्द हैं — “हर घड़ी और हर जगह सुरक्षा के ही सवाल नज़र आयेंगे।” [रुकिए]
तीन। इसलिए सुरक्षा की धारणा में दो शर्तें लगाई जाती हैं। [रुकिए]
चार। पहली शर्त — खतरा जीवन के ‘केंद्रीय मूल्यों’ को होना चाहिए। [रुकिए]
पाँच। दूसरी शर्त — खतरा इतना गंभीर हो कि उपाय न किए जाने पर केंद्रीय मूल्यों को ‘अपूरणीय क्षति’ पहुँचे। [रुकिए]
छह। लेकिन पाठ्यपुस्तक स्वयं एक सवाल उठाती है — “किसके केंद्रीय मूल्य?” पूरे देश के? आम स्त्री-पुरुषों के? क्या सरकार हमेशा वही अर्थ लेती है जो एक साधारण नागरिक? [रुकिए]
सात। और इसीलिए पाठ्यपुस्तक कहती है — सुरक्षा एक ‘विवादग्रस्त धारणा’ है। क्योंकि — “करीब 200 मुल्कों के 7 अरब लोग” सुरक्षा की एक जैसी धारणा नहीं रख सकते। [रुकिए]
आठ। सुरक्षा की दो कोटियाँ हैं — पारंपरिक और अपारंपरिक। [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ रुककर पूछिए — “अगर एक मछुआरे, एक सैनिक और एक किसान से पूछा जाए कि सुरक्षा क्या है, तो क्या तीनों एक ही जवाब देंगे?” दो-तीन उत्तर लेकर आगे बढ़िए।〕
कालांश 2
खंड 2 — पारंपरिक सुरक्षा : बाहरी
〔शिक्षक के लिए: शीर्षक बोर्ड पर लिखिए।〕
लिखिए — शीर्षक: सुरक्षा की पारंपरिक धारणा — बाहरी सुरक्षा। [रुकिए]
एक। पारंपरिक सुरक्षा को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ भी कहते हैं। [रुकिए]
दो। इसमें सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है। [रुकिए]
तीन। और इस खतरे का स्रोत कोई दूसरा मुल्क होता है — जो सैन्य हमले की धमकी देकर देश के केंद्रीय मूल्यों के लिए खतरा पैदा करता है। [रुकिए]
चार। ये केंद्रीय मूल्य तीन हैं — संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता। [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: ये तीन शब्द बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखिए और घेर दीजिए।〕
पाँच। और यह भी लिखिए — युद्ध में सिर्फ सैनिक नहीं मारे जाते। पाठ्यपुस्तक कहती है — “अक्सर निहत्थे और आम औरत-मर्द को जंग का निशाना बनाया जाता है; उनका और उनकी सरकार का हौसला तोड़ने की कोशिश होती है।” [रुकिए]
खंड 3 — युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प
〔शिक्षक के लिए: यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला उत्तर है — प्रश्न 6। इसे सारणी की तरह लिखवाइए।〕
लिखिए — उपशीर्षक: युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प। [रुकिए]
पहला — आत्मसमर्पण। अर्थात्, “दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना।” [रुकिए]
दूसरा — अपरोध। अर्थात्, “युद्ध से होने वाले नाश को इस हद तक बढ़ाने के संकेत देना कि दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से बाज आये।” [रुकिए]
तीसरा — रक्षा। अर्थात्, “युद्ध ठन जाय तो अपनी रक्षा करना ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो सके और पीछे हट जाए — अथवा हमलावर को पराजित कर देना।” [रुकिए]
अब एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखिए — [रुकिए] — पाठ्यपुस्तक कहती है कि “युद्ध में कोई सरकार भले ही आत्मसमर्पण कर दे, लेकिन वह इसे अपने देश की नीति के रूप में कभी नहीं प्रचारित करना चाहेगी।” [रुकिए]
इसलिए विकल्प तीन होते हैं, पर सुरक्षा-नीति सिर्फ दो पर बनती है — अपरोध और रक्षा। [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ एक उदाहरण दीजिए — “ताला लगाना अपरोध है; चोर घुस आए तो लाठी उठाना रक्षा है।” बच्चे इसे नहीं भूलते।〕
खंड 4 — शक्ति-संतुलन और गठबंधन
लिखिए — उपशीर्षक: शक्ति-संतुलन। [रुकिए]
एक। परंपरागत सुरक्षा-नीति का एक और तत्व है — शक्ति-संतुलन। [रुकिए]
दो। कोई देश अपने पड़ोस को देखकर अंदाज़ा लगाता है कि भविष्य में किससे उसे खतरा हो सकता है। [रुकिए]
तीन। और यहाँ इरादा नहीं, क्षमता देखी जाती है। पाठ्यपुस्तक के शब्दों में — “हमले का कोई प्रकट कारण भी नहीं जान पड़ता। फिर भी यह देखकर कि कोई देश बहुत ताकतवर है, यह भांपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है।” [रुकिए]
चार। शक्ति-संतुलन में सिर्फ सेना नहीं आती। आर्थिक और प्रौद्योगिकी की ताकत भी आती है — क्योंकि सैन्य-शक्ति का यही आधार है। [रुकिए]
अब अगला उपशीर्षक — गठबंधन। [रुकिए]
पाँच। गठबंधन में कई देश मिलकर “सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम” उठाते हैं। [रुकिए]
छह। अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से औपचारिक रूप मिलता है, और उनमें यह स्पष्ट रहता है कि खतरा किससे है। [रुकिए]
सात। और अब सबसे ज़रूरी वाक्य — “गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं, और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।” [रुकिए]
आठ। इसका उदाहरण — अमरीका ने 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया। लेकिन 11 सितंबर 2001 को अल-कायदा के हमले के बाद उसने उन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। [रुकिए]
खंड 5 — खतरा ‘बाहर’ से क्यों?
लिखिए — उपशीर्षक: खतरा बाहर से क्यों माना जाता है? [रुकिए]
एक। किसी देश के भीतर हिंसा से निपटने की एक व्यवस्था होती है। इसे ‘सरकार’ कहते हैं। [रुकिए]
दो। लेकिन विश्व-राजनीति में ऐसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं जो सबके ऊपर हो। [रुकिए]
तीन। संयुक्त राष्ट्रसंघ के बारे में पाठ्यपुस्तक बहुत तीखी बात कहती है — “अपनी बनावट के अनुरूप संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने सदस्य देशों का दास है” — उसे उतनी ही सत्ता मिलती है जितनी सदस्य देश उसे सौंपते हैं। [रुकिए]
चार। इसलिए निष्कर्ष यह है — “विश्व-राजनीति में हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है।” [रुकिए]
कालांश 3
खंड 6 — आंतरिक सुरक्षा और वे दो आँकड़े
〔शिक्षक के लिए: इस खंड के दो आँकड़े पूरे अध्याय में सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं। इन्हें बोर्ड पर लिखकर अध्याय के अंत तक मत मिटाइए।〕
लिखिए — शीर्षक: पारंपरिक धारणा — आंतरिक सुरक्षा। [रुकिए]
एक। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद आंतरिक सुरक्षा पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया, क्योंकि ताकतवर देश अपनी अंदरूनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे। [रुकिए]
दो। 1945 के बाद अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अंदर “एकीकृत और शांति संपन्न” जान पड़ते थे, और पश्चिमी यूरोप को अपने भीतर से कोई गंभीर खतरा नहीं था। [रुकिए]
तीन। लेकिन कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में चिंता थी। फ्रांस को 1950 के दशक में वियतनाम में, और ब्रिटेन को 1950 तथा 1960 के दशक में केन्या में जूझना पड़ा। [रुकिए]
चार। अब एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों की बात। उनकी चुनौतियाँ दो मायनों में विशिष्ट थीं। [रुकिए]
पहली — इन देशों को अपने पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका थी — सीमा रेखा, भूक्षेत्र या आबादी पर नियंत्रण को लेकर। [रुकिए]
दूसरी — इन्हें अंदरूनी सैन्य-संघर्ष की भी चिंता करनी थी — यानी अलगाववादी आंदोलनों की। [रुकिए]
पाँच। और ये दोनों जुड़ भी जाते थे — जब कोई पड़ोसी मुल्क ऐसे आंदोलन को हवा देता, तो दो देशों के बीच तनाव बन जाता। [रुकिए]
छह। अब दो आँकड़े लिखिए — और इन्हें रेखांकित कीजिए। [रुकिए]
पहला — “विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं।” [रुकिए]
दूसरा — “सन् 1946 से 1991 के बीच गृह युद्धों की संख्या में बारहगुनी वृद्धि हुई है — जो पिछले 200 वर्षों में सबसे लंबी छलांग है।” [रुकिए]
सात। और एक तीसरा आँकड़ा — दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जितने युद्ध हुए, उनमें एक तिहाई के लिए शीतयुद्ध जिम्मेदार रहा; और इनमें अधिकांश तीसरी दुनिया में हुए। [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ रुककर कहिए — “ध्यान दीजिए, अध्याय अभी-अभी अपनी ही पहली धारणा तोड़ रहा है। अभी हमने पढ़ा कि खतरा बाहर से आता है — और अब पता चल रहा है कि 95 प्रतिशत संघर्ष भीतर हैं।”〕
खंड 7 — न्याय-युद्ध और तीन तरीके
लिखिए — शीर्षक: सुरक्षा के पारंपरिक तरीके। [रुकिए]
एक। पहला विचार है ‘न्याय-युद्ध’ की परंपरा। यह कहती है कि हिंसा का इस्तेमाल यथासंभव सीमित होना चाहिए — युद्ध के लक्ष्य और साधन, दोनों के स्तर पर। [रुकिए]
दो। लक्ष्य के स्तर पर — युद्ध केवल उचित कारणों से हो, यानी आत्म-रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए। [रुकिए]
तीन। साधन के स्तर पर — संघर्षविमुख शत्रु, निहत्थे व्यक्ति अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु को न मारा जाए; उतने ही बल का प्रयोग हो जितना आत्मरक्षा के लिए ज़रूरी है; और बल-प्रयोग तभी हो जब बाकी सब उपाय असफल हो गए हों। [रुकिए]
चार। अब तीन तरीके लिखिए। [रुकिए]
पहला — निरस्त्रीकरण। अर्थात् “सभी राज्य, चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ खास किस्म के हथियारों से बाज आयें।” [रुकिए]
दूसरा — अस्त्र-नियंत्रण। अर्थात् “हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ कायदे-कानूनों का पालन करना पड़ता है।” [रुकिए]
तीसरा — विश्वास बहाली के उपाय। अर्थात् प्रतिद्वन्द्वी देश “सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का फैसला” करते हैं। [रुकिए]
पाँच। निरस्त्रीकरण की दो संधियाँ लिखिए — जैविक हथियार संधि, सन् 1972, जिस पर 155 से ज्यादा देशों ने हस्ताक्षर किए; और रासायनिक हथियार संधि, सन् 1997, जिस पर 193 देशों ने। [रुकिए]
छह। इन दोनों पर सभी महाशक्तियों ने भी दस्तख़त किए। [रुकिए]
सात। लेकिन — और यह ‘लेकिन’ महत्वपूर्ण है — महाशक्तियाँ परमाण्विक हथियार का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने परमाणु हथियारों के मामले में ‘अस्त्र-नियंत्रण’ का सहारा लिया। [रुकिए]
कालांश 4
खंड 8 — संधियाँ और NPT की रेखा
〔शिक्षक के लिए: बोर्ड पर एक क्षैतिज रेखा खींचकर उस पर ‘1967’ लिखिए। बाएँ ‘अनुमति’, दाएँ ‘वंचित’। ऊपर लिखिए ‘संधि: 1968’।〕
लिखिए — उपशीर्षक: अस्त्र-नियंत्रण की संधियाँ। [रुकिए]
एक। एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि, सन् 1972 — इसने अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा-कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका। दोनों को सीमित संख्या में ऐसी प्रणाली रखने की अनुमति थी, पर व्यापक उत्पादन पर रोक थी। [रुकिए]
दो। इसी क्रम में दो और संधियाँ आईं — सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि-2, यानी SALT टू; और सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि, यानी START। [रुकिए]
तीन। अब सबसे महत्वपूर्ण — परमाणु अप्रसार संधि, सन् 1968। [रुकिए]
चार। ध्यान से लिखिए — “जिन देशों ने सन् 1967 से पहले परमाणु हथियार बना लिये थे या उनका परीक्षण कर लिया था, उन्हें इस संधि के अंतर्गत इन हथियारों को रखने की अनुमति दी गई।” [रुकिए]
पाँच। “जो देश सन् 1967 तक ऐसा नहीं कर पाये थे, उन्हें ऐसे हथियारों को हासिल करने के अधिकार से वंचित किया गया।” [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ ज़ोर देकर कहिए — “संधि का वर्ष 1968 है। रेखा 1967 की है। हर साल यहीं गलती होती है।”〕
छह। और NPT का मूल्यांकन — “परमाणु अप्रसार संधि ने परमाण्विक आयुधों को समाप्त तो नहीं किया, लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या ज़रूर कम की।” [रुकिए]
सात। अब विश्वास बहाली के उपायों के बारे में — इनमें देश एक-दूसरे को अपने फौजी मकसद, अपनी सैन्य योजनाएँ, अपने पास किस तरह के सैन्य-बल हैं, और वे कहाँ तैनात किए जा रहे हैं — यह बताते हैं। [रुकिए]
आठ। इसका मकसद यह है कि “प्रतिद्वन्द्वी देश किसी ग़लतफहमी या गफलत में पड़कर जंग के लिए आमादा न हो जाएँ।” [रुकिए]
नौ। और अब पारंपरिक धारणा का पूरा सार, एक वाक्य में — इसे रेखांकित कीजिए — “सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है, और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।” [रुकिए]
खंड 9 — अपारंपरिक धारणा
〔शिक्षक के लिए: यह अध्याय का मोड़ है। थोड़ा ठहरकर, धीमे स्वर में बोलिए।〕
लिखिए — शीर्षक: सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा। [रुकिए]
एक। “सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा सिर्फ सैन्य खतरों से संबद्ध नहीं। इसमें मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों और आशंकाओं को शामिल किया जाता है।” [रुकिए]
दो। यह चार सवाल उठाती है — सुरक्षा किसकी? किन चीजों की सुरक्षा? किन खतरों से सुरक्षा? और सुरक्षा के तरीके क्या? [रुकिए]
तीन। सबसे बड़ा बदलाव ‘संदर्भी’ में आता है — यानी वह इकाई जिसकी सुरक्षा की बात हो रही है। [रुकिए]
चार। पारंपरिक धारणा में संदर्भी ‘भूक्षेत्र और संस्थाओं सहित राज्य’ है। [रुकिए]
पाँच। अपारंपरिक धारणा में — “सिर्फ राज्य ही नहीं, व्यक्तियों और समुदायों, या कहें कि समूची मानवता को सुरक्षा की ज़रूरत है।” [रुकिए]
छह। इसीलिए इसे ‘मानवता की सुरक्षा’ अथवा ‘विश्व-रक्षा’ कहा जाता है। [रुकिए]
सात। अब वह वाक्य लिखिए जो इस अध्याय का सबसे तीखा वाक्य है — [रुकिए] — “मानवता की सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए और अक्सर होते भी हैं। लेकिन सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता।” [रुकिए]
आठ। और इसका प्रमाण — “सच्चाई यह है कि पिछले 100 वर्षों में जितने लोग विदेशी सेना के हाथों मारे गए, उससे कहीं ज्यादा लोग खुद अपनी ही सरकारों के हाथों खेत रहे।” [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यह वाक्य पढ़ने के बाद दस सेकंड चुप रहिए। कक्षा को सोचने दीजिए। फिर आगे बढ़िए।〕
नौ। मानवता की सुरक्षा के तीन अर्थ हैं। [रुकिए]
संकीर्ण अर्थ — व्यक्तियों को हिंसक खतरों यानी खून-खराबे से बचाना। कोफ़ी अन्नान के शब्दों में — “व्यक्तियों और समुदायों को अंदरूनी खून-खराबा से बचाना।” [रुकिए]
व्यापक अर्थ — इसमें अकाल, महामारी और आपदाएँ भी शामिल हैं — क्योंकि “युद्ध, जन-संहार और आतंकवाद साथ मिलकर जितने लोगों को मारते हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग अकाल, महामारी और प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं।” [रुकिए]
व्यापकतम अर्थ — इसमें आर्थिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा भी शामिल है — यानी ‘अभाव से मुक्ति’ और ‘भय से मुक्ति’। [रुकिए]
दस। और विश्व सुरक्षा की धारणा 1990 के दशक में उभरी — वैश्विक तापवृद्धि, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और एड्स तथा बर्ड फ्लू जैसी महामारियों के कारण। [रुकिए]
ग्यारह। इसका मूल तर्क है — “कोई भी देश इन समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता।” [रुकिए]
बारह। और असर सब पर बराबर नहीं पड़ता। अगर समुद्रतल दो मीटर ऊँचा उठता है तो बांग्लादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा; कमोबेश पूरा मालदीव सागर में समा जाएगा; और थाईलैंड की 50 फीसदी आबादी को खतरा पहुँचेगा। [रुकिए]
कालांश 5
खंड 10 — खतरे के नये स्रोत
लिखिए — शीर्षक: खतरे के नये स्रोत। [रुकिए]
पहला — आतंकवाद। [रुकिए]
एक। “आतंकवाद का आशय राजनीतिक खून-खराबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है।” [रुकिए]
दो। “अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं।” [रुकिए]
तीन। 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद दुनिया भर की सरकारें आतंकवाद पर ज्यादा ध्यान देने लगीं। [रुकिए]
चार। लेकिन यह भी लिखिए — “आतंकवाद कोई नयी परिघटना नहीं है।” पहले भी इसकी अधिकांश घटनाएँ मध्यपूर्व, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्षिण एशिया में होती रही हैं। [रुकिए]
दूसरा — मानवाधिकार। [रुकिए]
पाँच। मानवाधिकारों की तीन कोटियाँ हैं — पहली, राजनीतिक अधिकार, जैसे अभिव्यक्ति और सभा करने की आज़ादी; दूसरी, आर्थिक और सामाजिक अधिकार; और तीसरी, उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार। [रुकिए]
छह। इस वर्गीकरण पर व्यापक सहमति है — लेकिन इस पर सहमति नहीं है कि किस कोटि को सार्वभौम माना जाए, और उल्लंघन की स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को क्या करना चाहिए। [रुकिए]
सात। यह बहस तीन घटनाओं से चली — रवांडा में जनसंहार, कुवैत पर इराक का हमला, और पूर्वी तिमूर में इंडोनेशियाई सेना का रक्तपात। [रुकिए]
आठ। एक पक्ष कहता है कि UN घोषणापत्र हस्तक्षेप का अधिकार देता है। दूसरा पक्ष कहता है — “संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निर्धारित होता हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ किस मामले में कार्रवाई करेगा और किसमें नहीं।” [रुकिए]
तीसरा — वैश्विक निर्धनता। [रुकिए]
नौ। विश्व की जनसंख्या 760 करोड़ है और 21वीं सदी के मध्य तक 1000 करोड़ होने का अनुमान है। [रुकिए]
दस। और इस वृद्धि का 50 फीसदी सिर्फ छह देशों में होगा — भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया। [रुकिए]
ग्यारह। इसका चक्र इस तरह चलता है — उच्च आय और कम जनसंख्या-वृद्धि धनी देशों को और धनी बनाती है; जबकि निम्न आय और तीव्र जनसंख्या-वृद्धि गरीब देशों को और गरीब। [रुकिए]
बारह। और यह लिखिए — “दुनिया में सबसे ज्यादा सशस्त्र संघर्ष अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं। यह इलाका दुनिया का सबसे गरीब इलाका है।” [रुकिए]
चौथा — प्रवासन और शरणार्थी। [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: तीन शब्द बोर्ड पर तीन खानों में लिखिए। यह भेद परीक्षा में लगभग निश्चित है।〕
तेरह। आप्रवासी वे हैं “जो अपनी मर्जी से स्वदेश छोड़ते हैं।” [रुकिए]
चौदह। शरणार्थी वे हैं “जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण स्वदेश छोड़ने पर मज़बूर होते हैं।” [रुकिए]
पंद्रह। और अंतर यह है — “सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि कोई राज्य शरणार्थियों को स्वीकार करेगा, लेकिन उन्हें आप्रवासियों को स्वीकारने की बाध्यता नहीं होती।” [रुकिए]
सोलह। एक तीसरी श्रेणी भी है — “जो लोग अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं, उन्हें ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ कहा जाता है।” [रुकिए]
सत्रह। इसका उदाहरण है — “1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित।” [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ ज़ोर देकर कहिए — “ध्यान दीजिए, कश्मीरी पंडित शरणार्थी नहीं हैं। उन्होंने देश की सीमा नहीं पार की। वे आंतरिक रूप से विस्थापित जन हैं।”〕
अठारह। और यह वाक्य लिखिए — “विश्व का शरणार्थी-मानचित्र विश्व के संघर्ष-मानचित्र से लगभग हू-ब-हू मेल खाता है।” [रुकिए]
उन्नीस। आँकड़े — “1990 से 1995 के बीच सत्तर देशों के मध्य कुल 93 युद्ध हुए और इसमें लगभग साढ़े 55 लाख लोग मारे गये।” [रुकिए]
बीस। और — “1990 के दशक में कुल 60 जगहों से शरणार्थी प्रवास करने को मजबूर हुए, और इसमें तीन को छोड़कर शेष सभी के मूल में सशस्त्र संघर्ष था।” [रुकिए]
पाँचवाँ — स्वास्थ्य-महामारी। [रुकिए]
इक्कीस। महामारियाँ “आप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन और सैन्य-अभियानों के जरिए” तेजी से फैलती हैं। [रुकिए]
बाईस। “अनुमान है कि 2003 तक पूरी दुनिया में 4 करोड़ लोग एचआईवी-एड्स से संक्रमित हो चुके थे। इसमें दो-तिहाई लोग अफ्रीका में रहते हैं जबकि शेष के 50 फीसदी दक्षिण एशिया में।” [रुकिए]
तेईस। और इनका आर्थिक असर भी होता है — ब्रिटेन को ‘मैड-काऊ’ महामारी के कारण अरबों डॉलर का नुकसान हुआ, और बर्ड फ्लू के कारण कई दक्षिण एशियाई देशों को मुर्ग-निर्यात बंद करना पड़ा। [रुकिए]
चौबीस। इनका निष्कर्ष यह है — “देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता बढ़ रही है और राष्ट्रीय सीमाएँ अब पहले की तुलना में कम सार्थक रह गई हैं।” [रुकिए]
कालांश 6
खंड 11 — सीमा कहाँ खींचें
〔शिक्षक के लिए: यह खंड अक्सर छूट जाता है। इसे मत छोड़िए — यह अध्याय का सबसे परिपक्व हिस्सा है।〕
लिखिए — उपशीर्षक: सुरक्षा की सीमा — ‘न्यूनतम मानक’। [रुकिए]
एक। “सुरक्षा की धारणा में विस्तार करने का यह मतलब नहीं है कि हम हर तरह के कष्ट या बीमारी को सुरक्षा विषयक चर्चा के दायरे में शामिल कर सकते हैं।” [रुकिए]
दो। “अगर हम ऐसा करते हैं तो सुरक्षा की धारणा में संगति नहीं रह जाती। ऐसे में हर चीज सुरक्षा का मसला हो सकती है।” [रुकिए]
तीन। इसलिए एक कसौटी चाहिए — और वह यह है — “अगर किसी मसले से संदर्भी, यानी राज्य अथवा जनसमूह के अस्तित्व को खतरा हो रहा हो, तो उसे सुरक्षा का मसला कहा जा सकता है — चाहे इस खतरे की प्रकृति कुछ भी हो।” [रुकिए]
चार। इसके तीन उदाहरण हैं — मालदीव को वैश्विक तापवृद्धि से खतरा है, क्योंकि समुद्र तल के ऊँचा उठने से उसका ज्यादातर हिस्सा डूब जाएगा। [रुकिए]
पाँच। दक्षिणी अफ्रीकी देशों में एचआईवी-एड्स से गंभीर खतरा है, क्योंकि वहाँ हर 6 वयस्क व्यक्ति में एक इस रोग से पीड़ित है — और बोस्तवाना की हालत सबसे बदतर है, जहाँ 3 में से एक व्यक्ति पीड़ित है। [रुकिए]
छह। और 1994 में रवांडा की तुत्सी जनजाति के अस्तित्व पर खतरा मंडराया, क्योंकि प्रतिद्वन्द्वी हुतु जनजाति ने कुछ ही हफ्तों में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को मार डाला। [रुकिए]
खंड 12 — सहयोगमूलक सुरक्षा
लिखिए — शीर्षक: सहयोगमूलक सुरक्षा। [रुकिए]
एक। इन अपारंपरिक खतरों से निपटने के लिए “सैन्य-संघर्ष की नहीं, बल्कि आपसी सहयोग की ज़रूरत है।” [रुकिए]
दो। आतंकवाद से लड़ने या मानवाधिकारों को बहाल करने में सैन्य-बल की कुछ भूमिका हो सकती है — पर वहाँ भी वह एक सीमा तक ही कारगर है। [रुकिए]
तीन। “लेकिन गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी, यह कहना मुश्किल है।” [रुकिए]
चार। और यह वाक्य रेखांकित कीजिए — “वस्तुत: ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।” [रुकिए]
पाँच। सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक — किसी भी स्तर का हो सकता है। [रुकिए]
छह। इसमें अंतर्राष्ट्रीय संगठन — जैसे संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष; स्वयंसेवी संगठन — जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और रेड क्रॉस; और जानी-मानी हस्तियाँ — जैसे नेल्सन मंडेला और मदर टेरेसा — सब शामिल हो सकते हैं। [रुकिए]
सात। और अंत में — बल-प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जा सकता है, उन सरकारों के खिलाफ जो अपनी ही जनता को मार रही हों या जनता के दुख-दर्द की उपेक्षा कर रही हों। [रुकिए]
आठ। लेकिन शर्त के साथ — “बल-प्रयोग सामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में किया जाए, न कि कोई एक देश अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी और स्वयंसेवी संगठनों की मर्जी पर कान दिए बगैर बल प्रयोग का रास्ता अख्तियार करे।” [रुकिए]
खंड 13 — भारत के चार घटक
〔शिक्षक के लिए: बोर्ड पर चार खाने बनाइए और साथ-साथ भरते जाइए।〕
लिखिए — शीर्षक: भारत — सुरक्षा की रणनीतियाँ। [रुकिए]
एक। भारत को पारंपरिक और अपारंपरिक — दोनों प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ा है, और ये खतरे सीमा के अंदर से भी उभरे और बाहर से भी। [रुकिए]
दो। भारत की सुरक्षा-नीति के चार बड़े घटक हैं। [रुकिए]
पहला घटक — सैन्य-क्षमता को मज़बूत करना। [रुकिए]
तीन। क्योंकि पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में, और चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया। [रुकिए]
चार। और “दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं।” [रुकिए]
पाँच। भारत ने सन् 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया था, और 1998 के परमाणु परीक्षण के फ़ैसलों को उचित ठहराते हुए भारतीय सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का तर्क दिया। [रुकिए]
दूसरा घटक — अंतर्राष्ट्रीय कायदों और संस्थाओं को मज़बूत करना। [रुकिए]
छह। जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई एकता, विउपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण के प्रयासों की हिमायत की, और “अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्रसंघ को अंतिम पंच मानने पर जोर दिया।” [रुकिए]
सात। भारत ने अप्रसार के संबंध में “एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति” की माँग की — जिसमें हर देश को सामूहिक संहार के हथियारों से संबद्ध बराबर के अधिकार और दायित्व हों। [रुकिए]
आठ। भारत ने नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग उठाई; और दो महाशक्तियों की खेमेबाजी से अलग गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व-शांति का तीसरा विकल्प सामने रखा। [रुकिए]
नौ। भारत उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं; और भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांतिबहाली के मिशनों में भेजी है। [रुकिए]
तीसरा घटक — देश की अंदरूनी सुरक्षा-समस्याओं से निबटने की तैयारी। [रुकिए]
दस। “नगालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कई उग्रवादी समूहों ने समय-समय पर इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोशिश की।” [रुकिए]
ग्यारह। और भारत का उत्तर क्या था? “भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया है। यह व्यवस्था विभिन्न समुदाय और जन-समूहों को अपनी शिकायतों को खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी करने का मौका देती है।” [रुकिए]
चौथा घटक — आर्थिक विकास। [रुकिए]
बारह। भारत में “अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास किए गए हैं कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से निज़ात मिले, तथा नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता ज्यादा न हो।” [रुकिए]
तेरह। और पाठ्यपुस्तक ईमानदारी से यह भी कहती है — “प्रयास आंशिक रूप से सफल हुए हैं।” [रुकिए]
चौदह। “फिर भी, लोकतांत्रिक राजनीति से ऐसे अवसर उपलब्ध हैं कि गरीब और वंचित नागरिक अपनी आवाज़ उठा सकें। लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित सरकार के ऊपर दबाव होता है कि वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए।” [रुकिए]
पंद्रह। और अब अध्याय का अंतिम वाक्य — इसे दो लाइन छोड़कर, अलग से, बड़े अक्षरों में लिखिए। [रुकिए]
“लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।” [रुकिए]
〔शिक्षक के लिए: यहाँ अध्याय समाप्त कीजिए। फिर एक सवाल कक्षा के लिए खुला छोड़ दीजिए — “पूरे अध्याय में हमने दो नज़रिए पढ़े। भारत के लिए किसे वरीयता दी जानी चाहिए?” — यही प्रश्न 11 है, और इस पर बहस अगली कक्षा में करवाइए।〕
शिक्षक के लिए अंतिम जाँच-सूची
| श्रुतलेख-खंड | कालांश | अनुमानित समय |
|---|---|---|
| 1 — सुरक्षा क्या है | 1 | 12 मिनट |
| 2, 3, 4, 5 — पारंपरिक सुरक्षा (बाहरी) | 2 | 30 मिनट |
| 6, 7 — आंतरिक सुरक्षा और तीन तरीके | 3 | 30 मिनट |
| 8, 9 — संधियाँ और अपारंपरिक धारणा | 4 | 32 मिनट |
| 10 — खतरे के नये स्रोत | 5 | 32 मिनट |
| 11, 12, 13 — सीमा, सहयोग और भारत | 6 | 34 मिनट |
★जिन वाक्यों को अवश्य रेखांकित करवाइए:
- “सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है — खतरे से आजादी।”
- “कोई सरकार आत्मसमर्पण को अपने देश की नीति के रूप में कभी नहीं प्रचारित करना चाहेगी।”
- “राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।”
- “हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है।”
- “95 प्रतिशत सशस्त्र संघर्ष अब आंतरिक युद्ध हैं” और “1946 से 1991 के बीच बारहगुनी वृद्धि।”
- “संधि 1968, रेखा 1967।”
- “सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।”
- “सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता।”
- “कश्मीरी पंडित — आंतरिक रूप से विस्थापित जन।”
- “ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।”
- “लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।”