Chapter 4भारत के विदेश संबंध

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यह दस्तावेज़ कैसे इस्तेमाल करें: ➤ चिह्न वाली पंक्तियाँ शिक्षक बोलते हैं (कक्षा से बातचीत — इन्हें विद्यार्थी नहीं लिखते)। 📝 चिह्न के बाद जो है, वही बोर्ड पर लिखा जाता है और विद्यार्थी अपनी कॉपी में उतारते हैं। ⏸ = यहाँ रुकिए, कक्षा को लिखने का समय दीजिए।

कुल: 6 खंड, 6 कालांश के अनुरूप। ★हर खंड के अंत में ‘दो मिनट की जाँच’ है।

खंड 1 · आज़ादी और विदेश नीति

(कालांश 1 · पृष्ठ 54–56)

➤ “बच्चों, आज हम एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं — ‘भारत के विदेश संबंध’। पर शुरू करने से पहले एक सवाल सोचिए। मान लीजिए किसी देश के अंदर सब कुछ उसका अपना है — उसकी सरकार, उसकी अदालतें, उसकी पुलिस। लेकिन यह तय कोई और करता है कि वह देश किससे दोस्ती करेगा और किससे लड़ेगा। क्या वह देश आज़ाद है?”

⏸ (कक्षा से दो-तीन उत्तर लीजिए।)

➤ “नेहरू जी ने संविधान सभा में, मार्च 1949 में, इसी सवाल का जवाब दिया था। यह वाक्य लिख लीजिए — यह पूरे अध्याय की चाबी है।”

📝 ★★जवाहरलाल नेहरू (संविधान सभा, मार्च 1949): “आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है।”

⏸

➤ “अब समझिए यह बात इतनी सख़्त क्यों है। अंग्रेज़ों के ज़माने में भारत में विधान परिषदें थीं, प्रांतीय सरकारें थीं — यानी कुछ अंदरूनी अधिकार थे। लेकिन दो-दो विश्वयुद्धों में भारतीय सैनिक लड़ने गए, और वह फ़ैसला दिल्ली में नहीं, लंदन में हुआ था। इसीलिए नेहरू कहते हैं — बाकी सब स्थानीय स्वायत्तता है।”

📝 अध्याय का दूसरा दावा (पृ. 54): “इन लड़ाइयों और हमारे विदेशी संबंधों को देश की राजनीति ने एक शक्ल प्रदान की। ★★देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।”

⏸

➤ “इस दूसरे वाक्य पर निशान लगा लीजिए। ज़्यादातर विद्यार्थी सिर्फ़ पहली दिशा पढ़ते हैं — कि राजनीति ने विदेश नीति बनाई। लेकिन असली मज़ा दूसरी दिशा में है — विदेश नीति ने राजनीति को बदल डाला। यह हम इसी अध्याय में तीन बार देखेंगे।”

📝 भारत किस दुनिया में आज़ाद हुआ — चार बातें: 1. दुनिया महायुद्ध की तबाही से अभी बाहर निकली थी; सामने पुनर्निर्माण का सवाल था। 2. एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रयास हो रहे थे। 3. उपनिवेशवाद की समाप्ति से नक्शे पर नए देश नमूदार हो रहे थे। 4. नए देशों के सामने दोहरी चुनौती थी — लोकतंत्र कायम करना और जनता की भलाई करना।

⏸

📝 और भारत की अपनी तीन चिंताएँ: 1. “अंग्रेजी सरकार अपने पीछे अंतर्राष्ट्रीय विवादों की एक पूरी विरासत छोड़ गई थी।” 2. “बँटवारे के कारण अलग से दबाव पैदा हुए थे।” 3. “गरीबी मिटाने का काम सामने मुँह बाए खड़ा था।”

⏸

➤ “अब पाठ्यपुस्तक एक बहुत सुंदर उपमा देती है। ध्यान से सुनिए और लिखिए।”

📝 ★★पाठ की उपमा (पृ. 55): “जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं, उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।”

⏸

➤ “यह वाक्य नोट कर लीजिए, क्योंकि प्रश्नावली का चौथा प्रश्न ठीक इसी पर आधारित है — ‘विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।’ यह वाक्य याद रहेगा तो वह प्रश्न अपने-आप हल हो जाएगा।”

📝 संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 51 (नीति-निर्देशक सिद्धांत): राज्य प्रयास करेगा — (क) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का, (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का, (ग) अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और (घ) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का।

⏸

➤ “‘माध्यस्थम’ का मतलब है — किसी तीसरे तटस्थ पक्ष से विवाद सुलझवाना। और एक बात ध्यान रखिए — यह नीति-निर्देशक सिद्धांत है। यानी मार्गदर्शक है, अदालत में बाध्यकारी नहीं। फिर भी यह दिखाता है कि शांति की नीति भारत के संविधान में ही लिखी हुई थी।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “बिना कॉपी देखे बताइए — नेहरू का वाक्य? भारत की तीन चिंताएँ? कौन-सा अनुच्छेद?”

खंड 2 · गुटनिरपेक्षता

(कालांश 2 · पृष्ठ 56–57)

➤ “पिछली बार हमने देखा कि भारत उस समय आज़ाद हुआ जब दुनिया दो खेमों में बँट रही थी। एक तरफ़ अमरीका, दूसरी तरफ़ सोवियत संघ। अब सवाल यह था — भारत किधर जाए? जवाब था — किसी तरफ़ नहीं। इस नीति का नाम है गुटनिरपेक्षता।”

📝 ★★गुटनिरपेक्षता — नेहरू के शब्दों में: “गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना… चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना… किसी सैन्य गुट के नज़रिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना।”

⏸

➤ “अब बहुत ध्यान से सुनिए, क्योंकि यहीं सबसे बड़ी गलती होती है। गुटनिरपेक्षता का मतलब तटस्थता नहीं है। तटस्थ देश किसी झगड़े में राय ही नहीं देता। गुटनिरपेक्ष देश राय देता है — बस वह राय किसी और की नहीं होती, अपनी होती है।”

📝 ! गुटनिरपेक्षता ≠ तटस्थता। तटस्थता = राय न देना। गुटनिरपेक्षता = स्वतंत्र राय देना, पर किसी गुट के दबाव में नहीं।

⏸

📝 ★★नेहरू की विदेश नीति के तीन उद्देश्य (पृ. 57): 1. कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना। 2. क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना। 3. तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना। और साधन — गुटनिरपेक्षता।

⏸

📝 नेहरू 1946 से 1964 तक प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे।

➤ “यह छोटा-सा तथ्य बहुत बड़ा है। एक ही व्यक्ति अठारह साल तक दोनों पद सँभाले — इसीलिए पाठ्यपुस्तक कहती है कि ‘विदेश नीति को तैयार करने के मामले में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।’”

➤ “लेकिन क्या सब सहमत थे? नहीं। और यह बात लिखिए — यह आपके उत्तर को परिपक्व बना देगी।”

📝 ! गुटनिरपेक्षता सर्वसम्मत नहीं थी। कुछ लोग मानते थे कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ नजदीकी बढ़ानी चाहिए, “क्योंकि इस खेमे की प्रतिष्ठा लोकतंत्र के हिमायती के रूप में थी।” ★इस धारा पर सोचने वालों में डा. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे। दलों में भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी प्रमुख थे।

⏸

📝 दो सैन्य गठबंधन: अमरीका ने NATO (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) बनाया; सोवियत संघ ने इसके जवाब में ‘वारसा पैक्ट’ बनाया। भारत दोनों से बाहर रहा।

➤ “अब आता है इस अध्याय का सबसे ईमानदार पन्ना। 1956 का साल। एक ही साल में दो हमले हुए, और भारत ने दोनों पर एक जैसा रुख नहीं लिया।”

📝 ★★1956 की दो घटनाएँ: (क) ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया → भारत ने इस नव-औपनिवेशिक हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की। (ख) ! सोवियत संघ ने हंगरी पर आक्रमण किया → भारत ने सोवियत संघ के इस कदम की सार्वजनिक निंदा नहीं की।

⏸

➤ “अब सोचिए — क्या यह दोहरा मापदंड था? कुछ लोग कहेंगे हाँ, नैतिक नीति चुनिंदा नहीं हो सकती। कुछ कहेंगे कि भारत को सोवियत संघ की ज़रूरत थी — सुरक्षा परिषद में और विकास में। दोनों तर्क ठीक हैं। पर देखिए कि पाठ्यपुस्तक इसे छिपाती नहीं, दर्ज़ करती है। और फिर बहुत संतुलित निष्कर्ष देती है।”

📝 पाठ का निष्कर्ष: “ऐसी स्थिति के बावजूद, कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया। ★उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए।”

➤ “‘कमोबेश’ शब्द पर ध्यान दीजिए। यही पाठ्यपुस्तक की ईमानदारी है — और यही अच्छे इतिहास-लेखन का लक्षण भी। और यही वाक्य प्रश्न 1(क) का उत्तर भी है, जिसका जवाब ‘सही’ है।”

📝 ! भारत-अमरीका में खटास क्यों: “पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया। इस वजह से 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास पैदा हो गई।” अमरीका भारत-सोवियत दोस्ती से भी नाराज था।

दो मिनट की जाँच★

➤ “तीन उद्देश्य? 1956 की दो घटनाएँ? गुटनिरपेक्षता और तटस्थता में अंतर?”

खंड 3 · एफ्रो-एशियाई एकता और चीन से दोस्ती

(कालांश 3 · पृष्ठ 58–59)

➤ “आज हम भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि पर आएँगे — एशिया और अफ्रीका के नए-नए आज़ाद हुए देशों का नेतृत्व। इसकी चार तिथियाँ हैं। चारों लिखिए और तीरों से जोड़िए।”

📝 ★★एफ्रो-एशियाई एकता — चार तिथियाँ: 1. मार्च 1947 — एशियाई संबंध सम्मेलन। ★ध्यान दीजिए: “जबकि अभी भारत को आज़ादी मिलने में पाँच महीने शेष थे।” 2. 1949 — इंडोनेशिया के स्वतंत्रता-संग्राम के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन। 3. ★★1955 — बांडुंग (इंडोनेशिया) में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन। “बांडुंग-सम्मेलन में ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी।” 4. ★★सितंबर 1961 — बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन।

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➤ “अब यह याद रखने की तरकीब — बांडुंग नींव, बेलग्रेड पहला सम्मेलन। बांडुंग 1955, बेलग्रेड 1961। परीक्षा में सबसे ज़्यादा गलती यहीं होती है। मैं तीन बार बोलूँगा, आप तीनों बार दोहराइए।”

➤ “बांडुंग 1955 — नींव। बेलग्रेड 1961 — पहला सम्मेलन।” (तीन बार दोहरवाइए।)

📝 भारत अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थक था और उसने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का दृढ़ विरोध किया।

➤ “पाठ्यपुस्तक ने हाशिये में एक बहुत गहरा सवाल रखा है। सुनिए — ‘हम लोग आज की बनिस्बत जब ज्यादा गरीब, कमज़ोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान कहीं ज्यादा थी। है ना विचित्र बात?’ इसका जवाब उसी पन्ने पर राजगोपालाचारी के अवतरण में है।”

📝 सी. राजगोपालाचारी (1950): “ताकत के तीनों साधनों — संपदा, धन और जन — से हीन एक देश अब बड़ी तेजी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है।”

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➤ “अब चीन। और शुरुआत बहुत मीठी है — इतनी मीठी कि आगे का दुखांत और भी तीखा लगता है।”

📝 चीन के साथ दोस्ती: • चीनी क्रांति 1949 में हुई। भारत चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले पहले देशों में एक था। • ★★29 अप्रैल 1954 — पंचशील। नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांतों की संयुक्त रूप से घोषणा की।

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➤ “पाठ्यपुस्तक पाँच सिद्धांत गिनाती नहीं। मैं गिना देता हूँ — परीक्षा में यही पूछा जाता है।”

📝 ➕ पंचशील के पाँच सिद्धांत: 1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का परस्पर सम्मान। 2. परस्पर अनाक्रमण। 3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना। 4. समानता और परस्पर लाभ। 5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

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➤ “अब वह अनुच्छेद आता है जिसे मैं चाहता हूँ आप लाल पेन से रेखांकित करें। 1962 की पूरी त्रासदी इन तीन वाक्यों में पहले से लिखी हुई है।”

📝 !★★वह चेतावनी जो अनसुनी रह गई (पृ. 58): “नेहरू के कुछ सहयोगियों — मसलन सरदार वल्लभ भाई पटेल — को आशंका थी कि आगामी दिनों में चीन भारत पर चढ़ाई कर सकता है। लेकिन नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बहुत दिनों से भारत की चीन से लगती सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे।”

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➤ “और अब वह एक विचार जिससे पूरा चीन-खंड खुल जाता है। सुनिए — 1950 तक भारत और चीन के बीच तिब्बत था। 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया। और उसके बाद भारत और चीन आमने-सामने आ गए। और जहाँ दो देश आमने-सामने आते हैं, वहाँ सीमा तय करनी पड़ती है — पर सीमा तय नहीं थी।”

📝 ★★मध्यवर्ती राज्य (Buffer State): चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्ज़ा किया — “इससे भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक रूप से जो एक मध्यवर्ती राज्य बना चला आ रहा था, वह खत्म हो गया।”

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📝 तिब्बत का कालक्रम: 1950 — चीन का नियंत्रण। 1954 — पंचशील समझौता; ! चीन ने इसका अर्थ लगाया कि भारत तिब्बत पर चीनी दावेदारी स्वीकार कर रहा है। 1956 — चाऊ एन लाई का दौरा; दलाई लामा ने नेहरू को स्थिति बताई। 1958 — तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह, चीनी सेनाओं ने दबा दिया। ★★1959 — दलाई लामा भारत आए और शरण माँगी; भारत ने शरण दी; चीन ने कड़ा विरोध किया। दलाई लामा का निवास-स्थान — धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश।

दो मिनट की जाँच★

➤ “बांडुंग कब? बेलग्रेड कब? पंचशील की तिथि? ‘मध्यवर्ती राज्य’ का मतलब?”

खंड 4 · 1962 का युद्ध और उसका घरेलू भूचाल

(कालांश 4 · पृष्ठ 60–63)

➤ “आज का दिन भारी है। हम 1962 पर आएँगे। पहले नक्शा देखिए — विवाद दो छोरों पर था।”

📝 ★★सीमा-विवाद के दो छोर: • पश्चिमी छोर — अक्साई-चीन (जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से में)। • पूर्वी छोर — अरुणाचल प्रदेश, जिसे “उस समय नेफा या उत्तर-पूर्वी सीमांत कहा जाता था।”

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📝 दोनों देशों के तर्क: भारत — “चीन के साथ सीमा-रेखा का मामला अंग्रेजी-शासन के समय ही सुलझाया जा चुका है।” चीन — “अंग्रेजी शासन के समय का फ़ैसला नहीं माना जा सकता।”

📝 ! 1957 से 1959 के बीच चीन ने अक्साई-चीन इलाके पर कब्जा कर लिया और वहाँ रणनीतिक बढ़त के लिए एक सड़क बनाई।

➤ “वह सड़क क्यों बनाई? क्योंकि वही सड़क चीन के दो सुदूर क्षेत्रों — ज़िंगजियाँग और तिब्बत — को जोड़ती थी। यानी अक्साई-चीन चीन के लिए कोई बंजर पठार नहीं था; वह उसका एकमात्र ज़मीनी गलियारा था। यह याद रखिए — इसी से समझ आएगा कि 1962 में चीन ने पश्चिम में कब्ज़ा क्यों रखा और पूर्व से क्यों लौट गया।”

➤ “अब हमले की तारीख़ और उसका समय देखिए। समय ही सबसे बड़ी बात है।”

📝 ★★अक्तूबर 1962: “जिस समय पूरे विश्व का ध्यान दो महाशक्तियों की तनातनी से पैदा क्यूबा मिसाइल संकट की तरफ लगा हुआ था, ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्तूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर बड़ी तेज़ी तथा व्यापक स्तर पर हमला किया।”

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📝 युद्ध का क्रम: पहला हमला एक हफ्ते चला — अरुणाचल के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्ज़ा। अगला दौर नवंबर में। लद्दाख से लगे पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना ने बढ़त रोकी, लेकिन ! पूर्व में चीनी सेना असम के मैदानी हिस्से के प्रवेशद्वार तक पहुँच गई। आखिरकार चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित किया और उसकी सेनाएँ हमले से पहले वाली जगह लौट गईं।

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➤ “अब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — इस युद्ध ने भारत के अंदर क्या-क्या तोड़ा। छह परिणाम। यह सारणी परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाती है।”

📝 ★★1962 के छह परिणाम: 1. “भारत की छवि को देश और विदेश दोनों ही जगह धक्का लगा।” 2. ! “इस संकट से उबरने के लिए भारत को अमरीका और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी। सोवियत संघ इस संकट की घड़ी में तटस्थ बना रहा।” 3. “राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँची लेकिन इसके साथ-साथ राष्ट्र-भावना भी बलवती हुई।” 4. कुछ प्रमुख सैन्य-कमांडरों ने इस्तीफा दिया; रक्षामंत्री वी.के. कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा। 5. ! “नेहरू की छवि भी थोड़ी धूमिल हुई। चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई।” 6. ★★“पहली बार, उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और लोकसभा में इस पर बहस हुई। इसके तुरंत बाद, कांग्रेस ने कुछ महत्त्वपूर्ण उप-चुनावों में पटखनी खाई। देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था।”

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➤ “आख़िरी वाक्य पर रुकिए — ‘देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था।’ यह वाक्य अगले अध्याय का दरवाज़ा है। याद रखिए, यह अध्याय दोतरफ़ा है।”

➤ “और अब देखिए कि एक युद्ध ने एक राजनीतिक दल को कैसे तोड़ दिया।”

📝 ★★भाकपा का विभाजन: चीन-युद्ध और चीन-सोवियत मतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में उठा-पटक मची। सोवियत-पक्षधर खेमा भाकपा में रहा; दूसरा खेमा कुछ समय चीन का पक्षधर रहा। “भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई।” चीन-पक्षधर खेमे ने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — माकपा — बनाई। ! माकपा के कई नेताओं को चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

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📝 पूर्वोत्तर पर असर: युद्ध ने नेताओं को “पूर्वोत्तर की डावाँडोल स्थिति के प्रति सचेत किया।” ★नगालैंड को प्रांत का दर्जा दिया गया। मणिपुर और त्रिपुरा केंद्र-शासित प्रदेश थे, पर उन्हें अपनी विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार मिला।

➤ “अब एक बात जो पाठ्यपुस्तक में नहीं है, पर जानने लायक है। 1963 में सरकार ने इस हार की एक सैन्य जाँच करवाई थी — हेंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट। वह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है। इस पर सोचिए: पाठ्यपुस्तक कहती है कि विदेश नीति पर सब दलों में सहमति है — और सहमति अच्छी बात है। पर जब कोई प्रबल विपक्ष जवाबदेही न माँगे, तो असुविधाजनक रिपोर्टें दशकों तक बंद रह सकती हैं। सहमति की भी एक कीमत होती है।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “दो छोर? हमला किस वैश्विक संकट के समय? छह परिणामों में से चार?”

खंड 5 · पाकिस्तान — 1965 और 1971

(कालांश 5 · पृष्ठ 64–67)

➤ “आज पाकिस्तान। और शुरुआत में ही एक चेतावनी — इस अध्याय में पाकिस्तान सिर्फ़ टकराव का नाम नहीं है। पाठ्यपुस्तक बहुत सावधानी से सहयोग के उदाहरण भी देती है। पहले वही लिखिए।”

📝 ★संघर्ष के बावजूद सहयोग — दो उदाहरण: 1. “दोनों सरकारों ने मिल-जुल कर प्रयास किया कि बँटवारे के समय जो महिलाएँ अपहृत हुई थीं उन्हें अपने परिवार के पास वापस लौटाया जा सके।” 2. ★★सिंधु नदी जल संधि, 1960 — विश्व बैंक की मध्यस्थता से; नेहरू और जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए। “भारत-पाक संबंधों में नरमी-गरमी के बावजूद इस संधि पर ठीक-ठाक अमल होता रहा।”

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➤ “यह दूसरा उदाहरण बहुत काम का है। प्रश्नावली में एक कथन है — ‘अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।’ उसका उत्तर है — गलत। और उसका प्रमाण यही है, साथ में चीन के साथ पंचशील का दौर भी।”

📝 ★★1965 का युद्ध: • अप्रैल 1965 — पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोला। • अगस्त-सितंबर 1965 — जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हमला। • ★“पाकिस्तान के नेताओं को उम्मीद थी कि जम्मू-कश्मीर की जनता उनका समर्थन करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” • प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पंजाब की सीमा की तरफ से जवाबी हमला करने के आदेश दिए; भारत की सेना आगे बढ़ते हुए लाहौर के नजदीक तक पहुँच गई। • संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से लड़ाई का अंत हुआ। • ★★1966 — ताशकंद-समझौता: शास्त्री और अयूब खान के बीच; सोवियत संघ ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। • ! “इस युद्ध से भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा।”

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➤ “एक बात जोड़ लीजिए जो पाठ्यपुस्तक में नहीं है। ताशकंद-घोषणापत्र पर हस्ताक्षर 10 जनवरी 1966 को हुए। और अगले ही दिन, 11 जनवरी को, ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया। अगले अध्याय में जो उत्तराधिकार का संघर्ष आप पढ़ेंगे, वह ठीक यहीं से शुरू होता है। देखिए — एक विदेश-नीति की घटना सीधे भारत के प्रधानमंत्री-चयन तक पहुँच गई।”

➤ “अब 1971। इसे तीन हिस्सों में समझिए — पाकिस्तान का अंदरूनी संकट, भारत पर बोझ, और अंतर्राष्ट्रीय समीकरण।”

📝 1971 की पृष्ठभूमि: 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया। जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में विजयी रही; मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में ज़ोरदार कामयाबी हासिल की। ★कारण — “पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के हाथों अपने साथ हुए दोयम दर्जे के नागरिक के बरताव के विरोध में” बंगाली जनता ने वोट दिया। ! “पाकिस्तान के शासक इस जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।”

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📝 1971 में पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीब को गिरफ्तार किया और दमन शुरू किया। ★★“1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा।” भारत ने बांग्लादेश के ‘मुक्ति संग्राम’ को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी।

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➤ “अब सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद। इसे ध्यान से लिखिए — प्रश्नावली के दो प्रश्न इसी पर टिके हैं।”

📝 ★★अंतर्राष्ट्रीय समीकरण: “पाकिस्तान को अमरीका और चीन ने मदद की।” अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सलाहकार हेनरी किसिंजर ने 1971 के जुलाई में पाकिस्तान होते हुए गुपचुप चीन का दौरा किया। “अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख भारत ने इसके जवाब में सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की एक 20-वर्षीय संधि पर दस्तखत किए। संधि से भारत को इस बात का आश्वासन मिला कि हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।”

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➤ “अब यह जाल समझिए। प्रश्नावली में कथन है — ‘1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।’ यह बिल्कुल उल्टा है। वह संधि अमरीका से निकटता का नहीं, अमरीका से दूरी का परिणाम थी। उत्तर — गलत।”

📝 ★★दिसंबर 1971: पाकिस्तानी विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमले किए। भारत ने वायुसेना, नौसेना और थलसेना के बूते पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों से कार्रवाई की। “दस दिनों के अंदर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और अपने 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा।” आत्म-समर्पण की तिथि — 16 दिसंबर 1971। बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र का उदय हुआ; भारत ने एकतरफा युद्ध-विराम घोषित किया। ★★3 जुलाई 1972 — इंदिरा गाँधी और भुट्टो के बीच शिमला-समझौता।

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➤ “तीन संख्याएँ याद रखिए — अस्सी लाख, दस दिन, नब्बे हज़ार।”

📝 करगिल संघर्ष, 1999: द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक पर “अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों” ने कब्जा किया; पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत। 26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था। ★विश्व का ध्यान इसलिए गया क्योंकि “इससे ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु हथियार बनाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे।” ! लड़ाई के तुरंत बाद जनरल परवेज मुशर्रफ की अगुवाई में पाकिस्तानी सेना ने हुकूमत पर नियंत्रण ले लिया।

दो मिनट की जाँच★

➤ “सिंधु जल संधि कब और किसकी मध्यस्थता से? ताशकंद किनके बीच? तीन संख्याएँ?”

खंड 6 · परमाणु नीति और सर्व-सहमति

(कालांश 6 · पृष्ठ 68–71)

➤ “आज पहले वह तुलना करेंगे जो इस पूरे अध्याय का सार है। बोर्ड पर दो कॉलम बनाइए।”

📝 ★★1962 बनाम 1971 — एक ही अध्याय, दो उलटे परिणाम: • 1962 की हार → नेहरू की छवि धूमिल; पहली बार अविश्वास प्रस्ताव; उप-चुनावों में कांग्रेस की हार; 1964 में भाकपा का विभाजन। • 1971 की जीत → “1971 की जंग के बाद इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता को चार चाँद लग गए”; अधिकतर राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और अनेक राज्यों में कांग्रेस बड़े बहुमत से जीती।

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➤ “यही अध्याय का दूसरा दावा है — देश की राजनीति स्वयं भी प्रभावित हुई। दोनों तरफ़ से।”

📝 युद्धों की आर्थिक कीमत: “पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई।” 1962 के बाद सीमित संसाधन रक्षा में लगाने पड़े। ★1962 में रक्षा-उत्पाद विभाग और 1965 में रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना हुई। तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961–66) पर असर पड़ा; इसके बाद लगातार तीन एक-वर्षीय योजनाएँ; चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में ही शुरू हो सकी।

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➤ “अब परमाणु नीति। इसे एक तर्क-श्रृंखला की तरह समझिए, अलग-अलग तथ्यों की तरह नहीं। मैं एक-एक कड़ी बोलूँगा, आप तीर लगाते जाइए।”

📝 ★★भारत की परमाणु नीति — तर्क-श्रृंखला: 1. 1940 के दशक के अंत — होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में कार्यक्रम शुरू; यह “नेहरू की औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक” था; लक्ष्य शांतिपूर्ण अणु ऊर्जा। ★“नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे।” 2. ! अक्तूबर 1964 — चीन ने परमाणु परीक्षण किया। 3. ! 1968 — परमाणु अप्रसार संधि (NPT)। इसे पाँच परमाणु-संपन्न देशों — अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन — ने, “जो संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे”, दूसरों पर थोपना चाहा। भारत ने इसे भेदभावपूर्ण माना और दस्तखत से इनकार कर दिया। 4. ★★मई 1974 — भारत ने परमाणु परीक्षण किया और “इसे उसने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया।” 5. ! 1995 — NPT को अनियतकाल के लिए बढ़ाया गया; भारत ने विरोध किया और CTBT पर भी हस्ताक्षर से इनकार किया। 6. ★★मई 1998 — भारत ने परीक्षण किए और जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए क्षमता है। तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगे, जो बाद में हटा लिए गए।

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📝 ★★भारत की परमाणु नीति के दो स्तंभ: 1. “भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन इन हथियारों का ‘प्रयोग पहले नहीं’ करेगा।” 2. “भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव हीन परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।”

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➤ “पाठ्यपुस्तक ने हाशिये में एक बहुत ईमानदार सवाल रखा है — ‘क्या यहाँ सारा मामला परमाणु बम बनाने का नहीं है? हम ऐसा सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते।’ मैं इसे टालूँगा नहीं। सच यह है कि 1974 में भारत ने इसे शांतिपूर्ण कहा और 1998 में उसने खुलकर सैन्य क्षमता स्वीकार की। और ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक दोनों बातें लिखती है। बदलाव क्यों आया, इसका सूत्र भी उसी में है: 1964 में चीन का परीक्षण और 1968 की भेदभावपूर्ण संधि।”

➤ “एक बात जोड़ लीजिए — भारत का परमाणु सिद्धांत जनवरी 2003 में औपचारिक रूप से घोषित हुआ। उसमें एक बहुत महत्वपूर्ण बात है: जवाबी कार्रवाई का आदेश केवल राजनीतिक नेतृत्व दे सकता है, सेना नहीं। यह वही तर्क है जो आपने पिछले अध्याय में पढ़ा था — अंतिम निर्णय राजनीतिक होना चाहिए।”

📝 ★★विदेश नीति पर सर्व-सहमति: “राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद जरूर हैं लेकिन… राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है।” इसी कारण, “1962–1971 के बीच जब भारत ने तीन युद्धों का सामना किया” और उसके बाद भी, “विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।”

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📝 1977 के बाद: जनता पार्टी की सरकार ने घोषणा की कि “सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया जाएगा” — आशय था सोवियत झुकाव खत्म करना। “इसके बाद की सभी सरकारों ने (कांग्रेसी या गैर-कांग्रेसी) चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने और अमरीका के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने की पहल की।”

📝 ★1990 के बाद बदलाव के दो कारण: (1) “रूस लगातार भारत का एक महत्त्वपूर्ण मित्र बना हुआ है लेकिन 1990 के बाद से रूस का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व कम हुआ है।” (2) “मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का जोर ज्यादा है।” और सूत्र-वाक्य: “विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।”

अंतिम श्रुतलेख — पूरे अध्याय का सार(यह ज़रूर लिखवाइए)★★

➤ “अब आख़िरी बार लिखिए। यह एक पैराग्राफ़ पूरे अध्याय का निचोड़ है। यदि आपको सिर्फ़ यही याद रहे, तो भी आप उत्तर लिख पाएँगे।”

📝 भारत उस समय आज़ाद हुआ जब दुनिया दो खेमों में बँट रही थी। नेहरू ने तीन उद्देश्य रखे — संप्रभुता की रक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और तेज़ आर्थिक विकास — और उन्हें साधने का साधन चुना गुटनिरपेक्षता, यानी किसी सैन्य गुट में शामिल न होना पर सभी देशों से दोस्ती। इसकी उपलब्धि यह रही कि भारत को दोनों खेमों से सहायता मिली और एशिया-अफ्रीका में नैतिक नेतृत्व मिला — बांडुंग 1955 से बेलग्रेड 1961 तक। चीन के साथ रिश्ता 1954 के पंचशील से शुरू हुआ, पर तिब्बत का मध्यवर्ती राज्य समाप्त होने और सीमा अनसुलझी रहने से वह 1962 के युद्ध तक पहुँच गया, जिसने भारत की छवि, नेहरू की प्रतिष्ठा और घरेलू राजनीति — तीनों को हिला दिया। पाकिस्तान के साथ 1947, 1965 और 1971 में टकराव हुआ, पर 1960 की सिंधु जल संधि बताती है कि सहयोग असंभव नहीं था। 1971 में अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी के जवाब में भारत ने सोवियत संघ से बीस वर्ष की संधि की, और दस दिनों की लड़ाई के बाद बांग्लादेश बना। परमाणु नीति में भारत ने NPT को भेदभावपूर्ण मानकर ठुकराया, 1974 में शांतिपूर्ण परीक्षण किया, 1998 में सैन्य क्षमता जताई — पर नीति रखी ‘प्रयोग पहले नहीं’। और सबसे बड़ी बात यह कि इन सब घटनाओं ने भारत की घरेलू राजनीति को भी बदल डाला — 1962 ने पहला अविश्वास प्रस्ताव और भाकपा का विभाजन दिया, और 1971 की जीत ने इंदिरा गाँधी को उस ऊँचाई पर पहुँचाया जहाँ से आगे का पूरा दशक तय हुआ।

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➤ “बस। अध्याय पूरा। अब घर जाकर सिर्फ़ एक काम कीजिए — प्रश्नावली का दसवाँ प्रश्न पूरा लिखकर लाइए। तीनों हिस्से। क्योंकि उस एक प्रश्न में यह पूरा अध्याय समाया हुआ है।”