Chapter 5कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

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यह दस्तावेज़ कैसे इस्तेमाल करें: ➤ चिह्न वाली पंक्तियाँ शिक्षक बोलते हैं (कक्षा से बातचीत — इन्हें विद्यार्थी नहीं लिखते)। 📝 चिह्न के बाद जो है, वही बोर्ड पर लिखा जाता है और विद्यार्थी अपनी कॉपी में उतारते हैं। ⏸ = यहाँ रुकिए, कक्षा को लिखने का समय दीजिए।

कुल: 5 खंड, 5 कालांश के अनुरूप। ★हर खंड के अंत में ‘दो मिनट की जाँच’ है।

खंड 1 · नेहरू के बाद — उत्तराधिकार की दो परीक्षाएँ

(कालांश 1 · पृष्ठ 72–75)

➤ “बच्चों, किताब खोलिए और पहले पन्ने का कार्टून देखिए। कुछ मत लिखिए, बस देखिए। चार खाने हैं। हर खाने में एक किसान और बैलों की एक जोड़ी है। और हर खाने पर एक संख्या लिखी है — एक साल, नौ साल, सत्रह साल, बाईस साल।”

⏸ (कक्षा को देखने दीजिए।)

➤ “अब पहले खाने में देखिए — बैल साथ चल रहे हैं। और आख़िरी खाने में? दोनों अलग-अलग दिशा में भाग रहे हैं। अब मैं आपको एक बात बताता हूँ जिसके बाद यह कार्टून पूरी तरह खुल जाएगा — आज़ादी के बाद शुरुआत में कांग्रेस का चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी था।”

➤ “अब बताइए — आज़ादी के बाईस साल का मतलब कौन-सा वर्ष?” (कक्षा से उत्तर लीजिए — 1969।) “बिल्कुल। और उसी साल कांग्रेस टूटी थी। यानी यह कार्टून पूरे अध्याय का सारांश है, और वह पहले पन्ने पर है।”

📝 ★★पहला कार्टून (आर.के. लक्ष्मण): कांग्रेस का पुराना चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ था। “आज़ादी के 22 वर्ष गुजरते-गुजरते कांग्रेस किस कदर फूट का शिकार हो गई थी।” — यानी 1969।

⏸

➤ “अब अगले पन्ने पर आइए। एक अख़बार का पन्ना छपा है — 28 मई 1964। शीर्षक अंग्रेज़ी में है, पर उसे पढ़ना मुश्किल नहीं: ‘PRIME MINISTER NEHRU IS DEAD’। और उसी के बगल में एक कार्टून है जिसका नाम है ‘The Void’ — यानी ‘शून्य’।”

➤ “अब सोचिए — जब नेहरू जी नहीं रहे, तो दो सवाल उठे। एक छोटा और एक बहुत बड़ा। दोनों लिखिए।”

📝 मई 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद दो सवाल उठे: छोटा सवाल — “नेहरू के बाद कौन?” ★★बड़ा सवाल — “नेहरू के बाद आखिर इस देश में होगा क्या?”

⏸

➤ “दूसरा सवाल ज़्यादा गंभीर क्यों था? क्योंकि दुनिया को भारत पर भरोसा नहीं था। तीन आशंकाएँ थीं।”

📝 तीन आशंकाएँ (पृ. 73): 1. “भारत से बाहर के बहुत से लोगों को संदेह था कि यहाँ नेहरू के बाद लोकतंत्र कायम भी रह पाएगा या नहीं।” 2. ! “आशंका थी कि बाकी बहुत से नव-स्वतंत्र देशों की तरह भारत भी राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा। असफल रहने की सूरत में भय था कि सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी।” 3. “संदेह थे कि… नया नेतृत्व उनका समाधान खोज पाएगा या नहीं।”

⏸

➤ “अब पाठ्यपुस्तक ने हाशिये में एक बहुत तीखा सवाल रखा है। सुनिए — ‘फ्रांस और कनाडा में ऐसी सूरत कायम हो, तो वहाँ कोई भी लोकतंत्र के असफल होने अथवा देश के टूटने की बात नहीं कहता। हम ही आखिर लगातार इतने शक में क्यों पड़े रहते हैं?’”

➤ “मैं आपको ईमानदार जवाब देता हूँ, दोनों तरफ़ का। एक तरफ़ — उस दशक में सचमुच कई नव-स्वतंत्र देशों में लोकतंत्र टूटा था, इसलिए आशंका का आधार था। दूसरी तरफ़ — वही घटना यूरोप में होती तो उसे ‘सामान्य राजनीतिक अस्थिरता’ कहा जाता, और एशिया में उसे ‘लोकतंत्र की विफलता’ कहा गया। दोनों बातें सच हैं।”

📝 ★1960 के दशक को ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है — क्योंकि गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन के सवाल अभी अनसुलझे थे। “संभव था कि… देश में लोकतंत्र की परियोजना असफल हो जाती अथवा खुद देश ही बिखर जाता।”

⏸

➤ “अब देखिए भारत ने क्या किया। पहली परीक्षा — 1964।”

📝 पहली परीक्षा, 1964: “नेहरू के उत्तराधिकारी का सवाल इतनी आसानी से हल कर लिया गया कि आलोचक ठगे-से रह गए।” कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने पार्टी के नेताओं और सांसदों से सलाह-मशविरा किया। “उन्होंने पाया कि सभी लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में हैं।” ★★शास्त्री कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए और इस तरह देश के प्रधानमंत्री बने।

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➤ “शास्त्री जी के बारे में एक बात है जो मैं चाहता हूँ आप कभी न भूलें। लिखिए।”

📝 ★शास्त्री “अपनी सादगी और सिद्धांत निष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। एक दफा वे एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी स्वीकार करते हुए रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे।”

⏸

➤ “आज के ज़माने में यह वाक्य पढ़कर आपको कैसा लगता है? एक दुर्घटना, जिसमें मंत्री का कोई सीधा हाथ नहीं था — और मंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसे ‘नैतिक जिम्मेवारी’ कहते हैं। यह पद परीक्षा में भी आता है और जीवन में भी काम आता है।”

📝 शास्त्री-काल (1964–1966) की चुनौतियाँ: चीन-युद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयाँ; मानसून की असफलता से सूखा और “कई जगहों पर खाद्यान्न का गंभीर संकट”; और 1965 में पाकिस्तान से युद्ध। ★★इसीलिए नारा — ‘जय जवान-जय किसान’। ‘जय जवान’ यानी युद्ध का मोर्चा, ‘जय किसान’ यानी अन्न का मोर्चा।

⏸

📝 ! 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में शास्त्री का अचानक देहान्त हो गया। ताशकंद तब सोवियत संघ में था; आज वह उज़्बेकिस्तान की राजधानी है। वे वहाँ पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान से बातचीत और समझौते पर हस्ताक्षर करने गए थे।

⏸

📝 ★★दूसरी परीक्षा, 1966: मुकाबला मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के बीच। “इंदिरा गाँधी के नाम पर सर्वसम्मति कायम नहीं की जा सकी। ऐसे में फ़ैसले के लिए कांग्रेस के सांसदों ने गुप्त मतदान किया। इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हरा दिया।” उन्हें कांग्रेस के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने मत दिया।

📝 ★★निष्कर्ष: “प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।”

⏸

➤ “और अब एक वाक्य, जिस पर मैं चाहता हूँ आप निशान लगा दें। क्योंकि पूरा अध्याय इसी वाक्य के उलट जाने की कहानी है।”

📝 ★★“कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने संभवतया यह सोचकर उनका समर्थन किया होगा कि प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में खास अनुभव न होने के कारण समर्थन और दिशा-निर्देशन के लिए इंदिरा गाँधी उन पर निर्भर रहेंगी।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “‘खतरनाक दशक’ के चार कारण? 1964 में शास्त्री कैसे चुने गए? 1966 में इंदिरा गाँधी कैसे?”

खंड 2 · 1967 — ‘राजनीतिक भूकंप’

(कालांश 2 · पृष्ठ 76–79)

➤ “आज हम भारत के चुनावी इतिहास के सबसे बड़े मोड़ों में से एक पर आएँगे। पर पहले यह समझिए कि 1967 आने तक देश की हालत क्या थी। मैं आठ बातें बोलूँगा, आप आठों लिखिए।”

📝 1967 से पहले का आर्थिक संकट — आठ कारक:

  1. मानसून की असफलता 2. व्यापक सूखा 3. खेती की पैदावार में गिरावट 4. गंभीर खाद्य संकट
  2. विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी 6. औद्योगिक उत्पादन में गिरावट 7. निर्यात में गिरावट
  3. ★सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोतरी — “नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य-मद में लगाना पड़ा।”

⏸

➤ “अब आठवें बिंदु पर रुकिए। यह वाक्य आपको कहाँ ले जाता है? तीसरे अध्याय में — नियोजित विकास। और चौथे अध्याय में — 1962 और 1965 के युद्ध। यानी तीन अध्याय — नियोजन, विदेश नीति और अब कांग्रेस प्रणाली — एक ही चुनाव-परिणाम पर आकर मिल जाते हैं। यह इस किताब की सबसे सुंदर बात है। परीक्षा में यह कड़ी जोड़ दीजिए, उत्तर अलग दिखेगा।”

📝 ! इंदिरा गाँधी की सरकार के शुरुआती फ़ैसलों में एक था — रुपये का अवमूल्यन। “माना गया कि रुपये का अवमूल्यन अमरीका के दबाव में किया गया।” पहले 1 अमरीकी डॉलर की कीमत 5 रुपये थी, जो अब बढ़कर 7 रुपये हो गई।

⏸

➤ “अब एक वाक्य आ रहा है जो इस पूरी किताब में सबसे ज़्यादा दोहराया जाता है — बस अलग-अलग रूपों में। ध्यान से लिखिए।”

📝 ★★“देश में अकसर ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ की स्थिति रहने लगी। सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना न कि जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति। इससे लोगों की नाराजगी बढ़ी और जन विरोध ने ज्यादा उग्र रूप धारण किया।”

⏸

➤ “इस वाक्य को याद रखिए। यह अगले अध्याय में फिर आएगा — जब 1974 के आंदोलनों को ‘व्यक्तिगत विरोध’ कहा जाएगा, और 1975 में असहमति को ‘अराजकता’। एक ही प्रवृत्ति, तीन बार, और हर बार नतीजा ज़्यादा गंभीर।”

➤ “अब विपक्ष की तरफ़ आइए। विपक्ष ने एक बहुत सीधा हिसाब लगाया।”

📝 गैर-कांग्रेसवाद: “कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उसके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है।” जो दल विचारधारा में एकदम अलग थे, वे भी एकजुट हुए — कुछ राज्यों में कांग्रेस-विरोधी मोर्चा, और अन्य राज्यों में सीटों के मामले में चुनावी तालमेल।

📝 ★★इस रणनीति को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ नाम समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने दिया। उनका सैद्धांतिक तर्क था: “कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीब लोगों के हितों के खिलाफ़ है इसलिए गैर-कांग्रेसी दलों का एक साथ आना जरूरी है, ताकि गरीबों के हक में लोकतंत्र को वापस लाया जा सके।”

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➤ “ध्यान दीजिए — लोहिया इसे केवल चुनावी चाल नहीं कह रहे। वे इसे एक लोकतांत्रिक सिद्धांत बता रहे हैं। यह अंतर परीक्षा में लिखिए।”

➤ “अब चुनाव के नतीजे। फरवरी 1967। और एक बात जो पहली बार हो रही थी।”

📝 ★“कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी।”

📝 ★★परिणाम: “तत्कालीन अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने चुनाव परिणामों को ‘राजनीतिक भूकंप’ की संज्ञा दी।” कांग्रेस को “जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिल गया”, पर मतों के प्रतिशत और सीटों में भारी गिरावट आई। “अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें मिली थीं।” ! “इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के आधे मंत्री चुनाव हार गए थे।”

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📝 ★चार दिग्गजों की हार: तमिलनाडु से कामराज, महाराष्ट्र से एस.के. पाटिल, पश्चिम बंगाल से अतुल्य घोष और बिहार से के.बी. सहाय।

➤ “इन चार नामों पर निशान लगा लीजिए। इनमें से तीन — कामराज, पाटिल और घोष — ‘सिंडिकेट’ के सदस्य थे, जिनके बारे में हम अगले कालांश में पढ़ेंगे। यानी 1967 में सिंडिकेट की व्यक्तिगत हार भी हुई थी। और यही आगे चलकर इंदिरा गाँधी के लिए मौका बना।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “‘राजनीतिक भूकंप’ किसने कहा? ‘गैर-कांग्रेसवाद’ किसने नाम दिया? अवमूल्यन के बाद डॉलर कितने का?”

खंड 3 · गठबंधन, दल-बदल और सिंडिकेट

(कालांश 3 · पृष्ठ 80–82)

➤ “अब राज्यों की तरफ़ चलिए, क्योंकि असली भूकंप वहीं आया था। पहले हिसाब लिखिए।”

📝 ★★राज्यों का हिसाब: कांग्रेस को सात राज्यों में बहुमत नहीं मिला। दो अन्य राज्यों में दलबदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी। यानी कुल नौ राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई।

📝 वे नौ राज्य: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास और केरल। “ये राज्य देश के किसी एक भाग में कायम राज्य नहीं थे। ये राज्य पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में थे।”

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📝 ★★मद्रास प्रांत में एक क्षेत्रीय पार्टी — द्रविड़ मुनेत्र कड़गम — पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। डीएमके हिंदी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करके सत्ता में आई थी। “चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला।”

⏸

➤ “अब एक वाक्य जो उस समय लोगों की ज़ुबान पर था। यह लिख लीजिए — यह पूरे बदलाव को एक चित्र में कह देता है।”

📝 ★“उस समय आमतौर पर कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा जाने के लिए ट्रेन पर बैठो, तो यह ट्रेन अपने पूरे रास्ते में एक भी कांग्रेस-शासित राज्य से होकर नहीं गुज़रेगी।”

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➤ “अब दो नयी चीज़ें भारतीय राजनीति में आईं, जो आज तक हमारे साथ हैं। पहली — गठबंधन।”

📝 गठबंधन: “1967 के चुनावों से गठबंधन की परिघटना सामने आयी।” अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया — इसीलिए इन सरकारों को ‘संयुक्त विधायक दल की सरकार’ कहा गया। ★“अधिकतर मामलों में ऐसी सरकार के घटक दल विचारधारा के लिहाज से एक-दूसरे से भिन्न थे।”

📝 ★उदाहरण — बिहार: एक ही सरकार में दो समाजवादी पार्टियाँ (एसएसपी और पीएसपी), वामपंथी सीपीआई, और दक्षिणपंथी जनसंघ — सब साथ।

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➤ “रुकिए और सोचिए। वामपंथी और दक्षिणपंथी एक ही सरकार में। यह गैर-कांग्रेसवाद की ताक़त भी दिखाता है और उसकी कमज़ोरी भी। ताक़त — कि कांग्रेस को हराया जा सकता है। कमज़ोरी — ऐसी सरकार कितने दिन चलेगी?”

➤ “और यहीं से दूसरी चीज़ आती है — दल-बदल। पहले परिभाषा लिखिए, फिर किस्सा सुनिए।”

📝 ★★दल-बदल की परिभाषा: “कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और जीत जाए और चुनाव जीतने के बाद इस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं।”

⏸

➤ “अब किस्सा। 1967 के चुनावों के बाद हरियाणा के एक विधायक थे — गया लाल। उन्होंने एक पखवाड़े के अंदर तीन बार अपनी पार्टी बदली। पहले कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट में गए। फिर कांग्रेस में लौटे। और कांग्रेस में लौटने के नौ घंटों के अंदर दोबारा यूनाइटेड फ्रंट में चले गए।”

⏸ (कक्षा को हँसने दीजिए।)

➤ “और जब वे कांग्रेस में आने वाले थे, तो कांग्रेस के नेता राव वीरेन्द्र सिंह उन्हें लेकर चंडीगढ़ में प्रेस के सामने गए और घोषणा की — ‘गया राम था अब आया राम है।’ बस, यह जुमला भारत के राजनीतिक शब्दकोश में हमेशा के लिए दर्ज़ हो गया।”

📝 ★★‘आया राम-गया राम’ — हरियाणा के विधायक गया लाल; एक पखवाड़े में तीन बार दल-बदल; कांग्रेस में लौटने के 9 घंटों के अंदर फिर पलटना; राव वीरेन्द्र सिंह की घोषणा — “गया राम था अब आया राम है।” ★“बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।”

⏸

➤ “पाठ्यपुस्तक यहाँ रुक जाती है। मैं एक बात जोड़ देता हूँ, जो परीक्षा में बहुत काम आती है। वह संशोधन था — 52वाँ संविधान संशोधन, 1985, जिसने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी। और 2003 में 91वें संशोधन ने उसमें बचा हुआ छेद भी बंद किया। यानी एक विधायक की हड़बड़ी को रोकने में देश को अठारह साल लगे।”

➤ “अब अंतिम बात। इंदिरा गाँधी को असली चुनौती कहाँ से मिली? विपक्ष से नहीं।”

📝 ★★“इंदिरा गाँधी को असली चुनौती विपक्ष से नहीं बल्कि खुद अपनी पार्टी के भीतर से मिली। उन्हें ‘सिंडिकेट’ से निपटना पड़ा।”

📝 ‘सिंडिकेट’ — पाँच नेता और उनके प्रांत: के. कामराज (मद्रास, अगुवा) · एस.के. पाटिल (बंबई सिटी) · एस. निजलिंगप्पा (मैसूर) · एन. संजीव रेड्डी (आंध्र प्रदेश) · अतुल्य घोष (पश्चिम बंगाल)। ★“इस समूह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।” और “लालबहादुर शास्त्री और उसके बाद इंदिरा गाँधी, दोनों ही सिंडिकेट की सहायता से प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ हुए थे।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “नौ राज्य कौन-से? डीएमके क्यों जीती? सिंडिकेट के पाँच नाम?”

खंड 4 · 1969 — कांग्रेस में विभाजन

(कालांश 4 · पृष्ठ 82–85)

➤ “आज के कालांश में एक ही वाक्य सबसे महत्वपूर्ण है। मैं पहले आपसे एक सवाल पूछूँगा, फिर वह वाक्य दूँगा।”

➤ “मान लीजिए दो नेता आपस में लड़ रहे हैं कि पार्टी पर किसका नियंत्रण हो। इससे आम मतदाता को क्या फ़र्क़ पड़ता है?”

⏸ (कक्षा कहेगी — कुछ नहीं।)

➤ “बिल्कुल, कुछ नहीं। अब मान लीजिए वही लड़ाई ‘गरीबों के हिमायती बनाम अमीरों के तरफ़दार’ बन जाए। अब?”

➤ “अब जनता का सीधा लेना-देना है। यही इंदिरा गाँधी ने किया। लिखिए।”

📝 ★★“इंदिरा गाँधी ने बड़ी साहसिक रणनीति अपनायी। उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया। उन्होंने सरकार की नीतियों को वामपंथी रंग देने के लिए कई कदम उठाए।”

⏸

📝 और उसका औज़ार था — मई 1967 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा अपनाया गया दस-सूत्री कार्यक्रम, जिसमें शामिल थे: बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण · आम बीमा का राष्ट्रीयकरण · शहरी संपदा और आय का परिसीमन · खाद्यान्न का सरकारी वितरण · भूमि सुधार · ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देना। ! “सिंडिकेट के नेताओं ने औपचारिक तौर पर… स्वीकृति दे दी, लेकिन इसे लेकर उनके मन में गहरे संदेह थे।”

⏸

➤ “अब 1969 आता है — और उसका मैदान बनता है राष्ट्रपति पद का चुनाव। मैं पूरा क्रम बोलूँगा, आप छह चरण लिखिए।”

📝 ★★राष्ट्रपति चुनाव, 1969 — छह चरण: 1. राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु से पद खाली हुआ। 2. सिंडिकेट ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार बनवाया — “इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद”। 3. इंदिरा गाँधी ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को बढ़ावा दिया कि वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरें। 4. कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने ‘व्हिप’ जारी किया कि सभी कांग्रेसी सांसद और विधायक संजीव रेड्डी को वोट डालें। 5. ★★इंदिरा गाँधी ने “खुलेआम अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट डालने को कहा” — यानी सांसद-विधायक अपनी मनमर्ज़ी से किसी को भी वोट दे सकते हैं। 6. ★वी.वी. गिरि विजयी हुए। “वे स्वतंत्र उम्मीदवार थे, जबकि एन. संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार थे।”

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➤ “अब एक बात जो पाठ्यपुस्तक में नहीं है, पर बहुत ज़रूरी है। गिरि जीते कैसे? राष्ट्रपति का चुनाव वरीयता-क्रम से होता है। पहली गिनती में किसी को ज़रूरी कोटा नहीं मिला। तीसरे उम्मीदवार सी.डी. देशमुख बाहर हुए, उनके दूसरी वरीयता वाले वोट बँटे — और उन्हीं से गिरि जीते। अंतर बहुत कम था। यह भारत का एकमात्र राष्ट्रपति चुनाव है जो दूसरी वरीयता के वोटों से तय हुआ।”

➤ “अब समझिए कि वह ‘अंतरात्मा की आवाज़’ वाला दाँव कितना बड़ा था। अगर व्हिप का पालन हो जाता, तो रेड्डी आसानी से जीत जाते। इंदिरा गाँधी की वह एक अपील ही निर्णायक साबित हुई — और उसी ने पार्टी तोड़ दी।”

📝 ★★विभाजन: “कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की हार से पार्टी का टूटना तय हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी से निष्कासित प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली कांग्रेस है।”

📝 ★★नवंबर 1969 तक दो कांग्रेस बन गईं: सिंडिकेट की अगुवाई वाला खेमा — कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन), यानी कांग्रेस (ओ), ‘पुरानी कांग्रेस’। इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाला खेमा — कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट), यानी कांग्रेस (आर), ‘नयी कांग्रेस’।

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➤ “याद रखने की तरकीब — ‘ओ’ से ‘ओल्ड’, यानी पुरानी। यह जोड़ी परीक्षा में सबसे ज़्यादा उलटी याद रहती है।”

➤ “और अब निजलिंगप्पा ने निष्कासित करते हुए इंदिरा गाँधी को 11 नवंबर 1969 को एक चिट्ठी लिखी थी। उसकी एक पंक्ति सुनिए और लिखिए — यह पंक्ति छह साल बाद बहुत भारी लगने लगेगी।”

📝 ! एस. निजलिंगप्पा, 11 नवंबर 1969: “इतिहास… लोकतंत्र की त्रासदी के ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब जनसमर्थन की लहर के बूते अथवा किसी लोकतांत्रिक संगठन के बल पर सत्तासीन हुआ नेता राजनीतिक आत्ममोह का शिकार हो जाता है और चरित्रहीन चाटुकार दरबारियों की बातों में जीने लगता है…”

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📝 ★1969 की दो बड़ी जनप्रिय घोषणाएँ: चौदह अग्रणी बैंकों का राष्ट्रीयकरण, और भूतपूर्व राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार यानी ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति। ! इन्हीं दो मुद्दों पर उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री मोरारजी देसाई से गहरे मतभेद उभरे और उन्होंने सरकार से किनारा कर लिया।

📝 ★★‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति के तीन दरवाज़े: 1970 में संविधान संशोधन का प्रयास — राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली। फिर अध्यादेश — पर उसे सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया। और अंत में — 1971 में मिली भारी जीत के बाद संविधान में संशोधन हुआ और कानूनी अड़चनें खत्म हो गईं।

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➤ “इससे लोकतंत्र के बारे में क्या पता चलता है? दो बातें, और दोनों सच हैं। एक — अंतिम अदालत जनता है; जो नीति संसद में हारी और अदालत में हारी, वह चुनाव में जीत गई। दो — पर यही घटना यह भी दिखाती है कि बड़ा बहुमत मिलने पर संविधान बदलना कितना आसान हो जाता है। और यही चिंता अगले अध्याय का विषय बनेगी।”

दो मिनट की जाँच★

➤ “1969 में दोनों उम्मीदवार कौन? कांग्रेस (ओ) किसका खेमा है? प्रिवी पर्स के तीन दरवाज़े?”

खंड 5 · 1971 का चुनाव और पुनर्स्थापन

(कालांश 5 · पृष्ठ 86–89)

➤ “आज हम अध्याय पूरा करेंगे। और मैं आपसे वादा करता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण बात आख़िर में आएगी — जीत के बाद, जीत के बारे में नहीं।”

📝 कांग्रेस की टूट से इंदिरा गाँधी की सरकार अल्पमत में आ गई। डीएमके और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत कुछ दलों के मुद्दा-आधारित समर्थन से सरकार टिकी रही। इस दौरान “सरकार ने सचेत रूप से अपनी छवि को समाजवादी रंग में पेश किया” और भूमि सुधार के क्रियान्वयन के लिए ज़बरदस्त अभियान चलाया। ★★दिसंबर 1970 में सरकार ने लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश की। “यह भी एक आश्चर्यजनक और साहसिक कदम था।” पाँचवें आम चुनाव फ़रवरी 1971 में हुए।

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📝 मुकाबला: सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने ‘ग्रैंड अलायंस’ बनाया — संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांतिदल। शासक दल ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठजोड़ किया।

➤ “अब कागज़ पर देखिए तो इंदिरा गाँधी की हालत खराब थी। ‘नयी कांग्रेस एक जर्जर होती हुई पार्टी का हिस्सा भर थी।’ और ‘हर किसी को विश्वास था कि कांग्रेस पार्टी की असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ) के नियंत्रण में है।’ फिर वे जीतीं कैसे? एक ही वजह से।”

📝 ★★“नयी कांग्रेस के पास एक मुद्दा था; एक अजेंडा और कार्यक्रम था। ‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।”

📝 ★★इंदिरा गाँधी ने देश भर में कहा कि “विपक्षी गठबंधन के पास बस एक ही कार्यक्रम है : इंदिरा हटाओ।” इसके विपरीत उन्होंने एक सकारात्मक कार्यक्रम रखा और उसे नारा दिया — ‘गरीबी हटाओ’।

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➤ “दो नारे बोर्ड पर देखिए। ‘इंदिरा हटाओ’ और ‘गरीबी हटाओ’। एक नकारात्मक, एक सकारात्मक। एक व्यक्ति के बारे में, दूसरा जनता के बारे में। एक के पास कोई कार्यक्रम नहीं, दूसरे के पास पूरा कार्यक्रम। चुनाव यहीं तय हो गया था।”

📝 ‘गरीबी हटाओ’ का लक्ष्य-वर्ग: भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएँ और बेरोज़गार नौजवान। ★“‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा हुआ कार्यक्रम इंदिरा गाँधी की राजनीतिक रणनीति थी।”

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📝 ★★1971 के परिणाम: कांग्रेस (आर) और सीपीआई के गठबंधन को लोकसभा की 375 सीटें मिलीं और कुल 48.4 प्रतिशत वोट। अकेले इंदिरा गाँधी की कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें और 44 प्रतिशत वोट हासिल किए। कांग्रेस (ओ) को महज़ 16 सीटें मिलीं। और ‘ग्रैंड अलायंस’ को 60 से भी कम सीटें।

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➤ “रुकिए और इन संख्याओं का असली अर्थ समझिए। 352 सीटें किसकी हैं? टूटी हुई आधी पार्टी की। यही इंदिरा गाँधी की जीत का असली पैमाना है।”

📝 इसके तुरंत बाद 1971 का बांग्लादेश युद्ध हुआ। “इन घटनाओं से इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए। विपक्ष के नेताओं तक ने उसके राज्यकौशल की प्रशंसा की।” 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में भी व्यापक सफलता मिली। ★“महज चार साल की अवधि में इंदिरा गाँधी ने अपने नेतृत्व और कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व के सामने खड़ी चुनौतियों को धूल चटा दी थी।”

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➤ “अब आख़िरी हिस्सा। और यही सबसे महत्वपूर्ण है। पाठ्यपुस्तक अध्याय का शीर्षक याद दिलाती है और एक सवाल पूछती है — ‘कांग्रेस प्रणाली का पुनर्स्थापन?’ — प्रश्न-चिह्न के साथ। क्यों?”

📝 ★★नयी कांग्रेस की पाँच विशेषताएँ:

  1. लोकप्रियता वही, “लेकिन यह अलग किस्म की पार्टी थी”।
  2. “यह पार्टी पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी।”
  3. “इस पार्टी का सांगठनिक ढाँचा भी अपेक्षाकृत कमजोर था।”
  4. “इस कांग्रेस पार्टी के भीतर कई गुट नहीं थे, यानी अब वह विभिन्न मतों और हितों को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं थी।”
  5. जीत के लिए वह गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर ज्यादा निर्भर थी।

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📝 ★★और निष्कर्ष: “जो कांग्रेस उभरकर सामने आई, वह एकदम नयी कांग्रेस थी। इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।”

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➤ “अब सबसे गहरी बात। और यह वह पैराग्राफ़ है जिसे ज़्यादातर विद्यार्थी छोड़ देते हैं। मत छोड़िएगा।”

📝 ★★“कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी। कांग्रेस प्रणाली को इसी खासियत के कारण जाना जाता था, लेकिन नयी कांग्रेस ज्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद इस क्षमता से हीन थी। कांग्रेस ने अपनी पकड़ मज़बूत की और इंदिरा गाँधी की राजनीतिक हैसियत अप्रत्याशित रूप से बढ़ी, लेकिन जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।”

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➤ “अब मैं आपको एक सामान्य नियम बताता हूँ, जो सिर्फ़ इस अध्याय का नहीं है — जीवन का है। सुनिए, लिखने की ज़रूरत नहीं।”

➤ “जो संस्था असहमति को अपने भीतर जगह देती है, वह असहमति को व्यवस्था के भीतर बनाए रखती है। और जो संस्था असहमति को बाहर धकेल देती है, वह असहमति को सड़क पर पहुँचा देती है।”

➤ “1969 में कांग्रेस ने अपने भीतर की असहमति को बाहर कर दिया। और 1974 में वही असहमति गुजरात और बिहार की सड़कों पर लौटी। यही अध्याय पाँच और अध्याय छह के बीच का पुल है।”

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➤ “और आख़िरी बात। पाठ्यपुस्तक ने इसी पन्ने पर एक फ़िल्म का बॉक्स रखा है — ‘ज़ंजीर’, 1973। जिसमें अमिताभ बच्चन एक गुस्सैल नौजवान पुलिस अधिकारी हैं। किताब लिखती है — ”ज़ंजीर’ के साथ सातवें दशक में एक नए तरह के गुस्सैल नौजवान नायक का जन्म हुआ।’ अब सोचिए — 1971 में सत्ता अपने चरम पर, 1973 में परदे पर गुस्सैल नायक, 1974 में सड़कों पर आंदोलन। तीनों तीन साल के भीतर। यह संयोग नहीं है।”

अंतिम श्रुतलेख — पूरे अध्याय का सार(यह ज़रूर लिखवाइए)★★

➤ “अब आख़िरी बार लिखिए। यह एक पैराग्राफ़ पूरे अध्याय का निचोड़ है।”

📝 नेहरू की मृत्यु के बाद सबसे बड़ा डर यह था कि भारत उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा और सेना राजनीति में उतर आएगी। वह डर दो बार गलत साबित हुआ — 1964 में कामराज के सलाह-मशविरे से शास्त्री निर्विरोध चुने गए, और 1966 में गुप्त मतदान से इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हराया। पर 1967 का चौथा आम चुनाव एक ‘राजनीतिक भूकंप’ साबित हुआ — कांग्रेस केंद्र में जैसे-तैसे बची, आधे मंत्री हार गए, और नौ राज्यों में सत्ता उसके हाथ से निकल गई; मद्रास में डीएमके ने पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत दिलाया। इसकी जड़ में गंभीर आर्थिक संकट था और विपक्ष की वह रणनीति थी जिसे लोहिया ने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ नाम दिया। इससे दो नयी परिघटनाएँ जन्मीं — गठबंधन और दल-बदल। फिर असली चुनौती भीतर से आई: इंदिरा गाँधी बनाम सिंडिकेट। उन्होंने एक साधारण सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया — दस-सूत्री कार्यक्रम, चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति। 1969 का राष्ट्रपति चुनाव निर्णायक मोड़ बना, वी.वी. गिरि जीते, और पार्टी कांग्रेस (ओ) तथा कांग्रेस (आर) में बँट गई। 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के सहारे इंदिरा गाँधी ने 375 सीटें जीतीं और कांग्रेस का दबदबा लौटा। पर सबसे महत्वपूर्ण बात अंत में है — लौटी हुई कांग्रेस अपने सर्वोच्च नेता पर आश्रित थी, उसका संगठन कमज़ोर था, और उसमें वह क्षमता नहीं बची थी जो पुरानी कांग्रेस की असली पहचान थी: हर तनाव और संघर्ष को अपने भीतर पचा लेने की क्षमता।

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➤ “बस। अध्याय पूरा। घर जाकर सिर्फ़ एक काम कीजिए — प्रश्नावली का दसवाँ प्रश्न पूरा लिखकर लाइए, तीनों हिस्से। क्योंकि उस एक प्रश्न में यह पूरा अध्याय समाया हुआ है।”