हर पद पुस्तक के अपने शब्दों में है। पर्याय मत लिखिए।
एक वाक्य में पूरा अध्याय
पृथ्वी की सतह तीन मुख्य रूप लेती है — पर्वत, पठार और मैदान — और मनुष्य ने हर रूप के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है; हर स्थलरूप अपने साथ चुनौतियाँ भी लाता है और अवसर भी।
और अध्याय का साँचा — यह तीन बार लौटता है
| चरण | पर्वत | पठार | मैदान |
|---|---|---|---|
| परिभाषा | आस-पास से ऊँचा; चौड़ा आधार, खड़ी ढलान, सँकरे शिखर | उठा हुआ, सतह प्राय: चपटी, कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले | विस्तृत सपाट/हल्का तरंगित; समुद्र तल से 300 मी. से अधिक नहीं |
| परिवेश | पर्वतीय वन, शंकुधारी वृक्ष; ऊपर घास, मॉस, लाइकेन | चट्टानी मिट्टी (लावा पठार में काली मिट्टी) | उपजाऊ मिट्टी; विविध वनस्पति और जीव-जंतु |
| जीवन | घाटियों में कृषि, वेदिका कृषि, पशुपालन, पर्यटन | खनन मुख्य गतिविधि | कृषि मुख्य व्यवसाय; मत्स्य पालन |
| चुनौतियाँ | बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, हिमपात, ठंड, पर्यटकों का दबाव | कृषि के लिए कम अनुकूल | गिरता भूमिगत जलस्तर, जनसंख्या, प्रदूषण |
अध्याय के दो महत्वपूर्ण प्रश्न (पृ. 41)
- स्थलरूपों के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं और जीवन तथा संस्कृति के लिए इनका क्या महत्व है?
- प्रत्येक स्थलरूप के साथ संबंधित जीवन की क्या चुनौतियाँ एवं अवसर हैं?
इनसे बाहर की कोई बात इस अध्याय में नहीं है।
भाग 1 — स्थलरूप की मूल बातें (पृ. 42)
- स्थलरूप = पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप।
- स्थलरूप लाखों वर्षों में आकार लेते हैं।
- पर्यावरण तथा जीवन के साथ इनका महत्वपूर्ण संबंध है।
- तीन श्रेणियाँ — पर्वत, पठार और मैदान (चित्र 3.1)।
- हर स्थलरूप में अलग जलवायु, अलग पेड़-पौधे, अलग जीव-जंतु।
- मानव ने सभी स्थलरूपों के अनुसार स्वयं को ढाला है, पर रहने वालों की संख्या भिन्न-भिन्न है।
दो माप-पद
| पद | परिभाषा |
|---|---|
| तुंगता (एल्टीट्यूड) | समुद्र तल से किसी वस्तु/लक्ष्य की ऊँचाई — पर्वत की, उड़ती चिड़िया या वायुयान की, उपग्रह की |
| समुद्र तल | समुद्र की सतह का औसत स्तर; ‘माध्य समुद्र तल’ भी कहते हैं |
🧭 अध्याय की यात्रा — यही अभ्यास-प्रश्न 2 है
| पड़ाव | राज्य | स्थलरूप |
|---|---|---|
| छोटा नागपुर | झारखंड | पठार |
| प्रयागराज | उत्तर प्रदेश | मैदान |
| अल्मोड़ा | उत्तराखंड | पर्वत |
भाग 2 — पर्वत (पृ. 42–43)
परिभाषा और तीन पहचान
पर्वत वे स्थलरूप हैं जो आस-पास की भूमि से कुछ अधिक ऊँचे होते हैं — चौड़ा आधार • खड़ी ढलान (चढ़ाई) • सँकरे शिखर (चोटियाँ)
पर्वत बनाम पहाड़ी — सबसे आम भ्रम★
| पर्वत | पहाड़ी (छोटे पहाड़ / हिल) | |
|---|---|---|
| ऊँचाई | अधिक | कम |
| चढ़ाई | खड़ी | कम खड़ी |
| शीर्ष | सँकरे शिखर | गोल आकार |
हिम, तुंगता और नदियाँ
- ग्रीष्म ऋतु में कम तुंगता पर हिम पिघल जाती है → जल बनकर नदियों में पहुँचती है।
- बहुत अधिक ऊँचाइयों पर हिम कभी नहीं पिघलती → ये पर्वत स्थायी रूप से हिम से ढँके रहते हैं।
- वर्षण = वायुमंडल से भूमि पर किसी भी रूप में जल का गिरना → वर्षा, हिमपात, ओले।
- हिम और ओले का गिरना वास्तव में जल का ठोस रूप में गिरना है।
भाग 3 — विश्व के छह पर्वत और शृंखलाएँ (पृ. 44–46)
पर्वत शृंखलाएँ
- विश्व के अधिकांश पर्वत पर्वत शृंखलाओं के रूप में वर्गीकृत हैं।
- एशिया — हिमालय • यूरोप — आल्प्स • दक्षिणी अमेरिका — एंडीज
- कुछ शृंखलाएँ हजारों किलोमीटर तक फैली हैं।
छह पर्वत — यह तालिका पूरी परीक्षा-योग्य है★
| गिरिशृंग | स्थिति | विशेषता |
|---|---|---|
| एवरेस्ट | नेपाल तथा तिब्बत के बीच | हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों में; 8848 मीटर |
| कंचनजुंगा | सिक्किम (भारत) और नेपाल के बीच | हिमालय की दो सबसे ऊँची चोटियों में दूसरी |
| अकोंकागुआ | दक्षिणी अमेरिका | एंडीज की सबसे ऊँची चोटी |
| किलिमंजारो | पूर्वी अफ्रीका | पृथक पर्वत — किसी शृंखला का भाग नहीं |
| ब्लांक | पश्चिमी यूरोप | आल्प्स का सबसे ऊँचा शिखर |
| अनाईमुडी | केरल | दक्षिण भारत का सबसे ऊँचा; ‘अनाई शिखर’ भी |
चित्र 3.3 केवल सापेक्ष ऊँचाई दिखाता है। पुस्तक ने एवरेस्ट के अतिरिक्त किसी की ऊँचाई अंकों में नहीं दी — इसलिए वैसा कोई प्रश्न बनता ही नहीं।
नवीन बनाम प्राचीन पर्वत★
| नवीन (युवा) | प्राचीन | |
|---|---|---|
| उदाहरण | हिमालय | अरावली शृंखला |
| ऊँचाई | ऊँचे | छोटे |
| चोटियाँ | नुकीली | गोलाकार |
| कारण | हाल ही में निर्मित | अपरदन से घिसकर गोल |
- हिमालय नवीन है, फिर भी उसे बने लाखों वर्ष हो चुके हैं।
- उन्नयन और अपरदन आज भी चल रहे हैं; हिमालय की ऊँचाई आज भी बढ़ रही है।
भाग 4 — पर्वतीय परिवेश (पृ. 46–48)
वनस्पति — ऊँचाई के साथ बदलती है
शंकुधारी वन → (और ऊपर) → घास, मॉस, लाइकेन
- पर्वतीय वन — पर्वतों की ढलानों पर उगने वाले वनों का एक प्रकार।
- शंकुधारी वृक्ष — पाइन (चीड़), फर, स्प्रूस, देवदार; ऊँचे, शंकु के आकार, पत्तियाँ पतली, नोंकदार।
- मॉस (काई) — फूलों और वास्तविक जड़ों से रहित छोटा हरा पौधा; मखमली आवरण की तरह फैलता है।
- लाइकेन — पौधे के समान जीव, जो चट्टानों, दीवारों या पेड़ों से चिपके होते हैं।
जीव-जंतु (पृ. 48)
पर्वतों में घने वन, बहती नदियाँ, झीलें, घास के मैदान और कंदराएँ अनेक जीवों को आश्रय देते हैं — गोल्डन ईगल (सुनहरा गरुड़) · पेरेग्रिन फाल्कन (घुमंतू बाज) · कैनेडियन लिंक्स · हिम तेंदुआ · आइबेक्स (जंगली भेड) · हिमालयन तहर · पर्वतीय खरगोश · याक · ग्रे फॉक्स · भालू
गंगा और उसकी सहायक नदियाँ (बॉक्स, पृ. 48)★
| नदी | स्रोत | संबंध |
|---|---|---|
| गंगा | हिमालय | हिमालय से निकलने वाली भारतीय नदियों में विशालतम; लगभग 2500 कि.मी. |
| यमुना | हिमालय | गंगा की सहायक नदी |
| घाघरा | हिमालय | गंगा की सहायक नदी |
| सोन | विंध्यांचल की शृंखलाएँ (गंगा के मैदान के दक्षिण में) | गंगा की सहायक |
सहायक नदी = मुख्य नदी में आकर मिलने वाली अन्य नदी। इसीलिए “गंगा, यमुना की सहायक नदी है” गलत है — उलटा है।
कालिदास का ‘कुमारसंभव’ (पृ. 46)
- कम से कम 1500 वर्ष पूर्व के महान कवि कालिदास।
- ग्रंथ ‘कुमारसंभव’ हिमालय की स्तुति से आरंभ होता है।
- हिमालय = पर्वतों का राजा, जो पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक फैला है; पृथ्वी को नापने का मापदंड।
भाग 5 — पर्वतीय जीवन (पृ. 49)
कृषि
- पर्वतीय भूभाग खड़े ढलानों के साथ ऊबड़-खाबड़ → कुछ ही घाटियों में नियमित कृषि।
- वेदिका कृषि = ढलान की भूमि को काटकर सीढ़ीनुमा स्थान पर कृषि करना।
- अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि की जगह पशुपालन को अधिक महत्व दिया जाता है।
पर्यटन — एक ही चीज़, दोनों पक्ष★
| अवसर | चुनौती |
|---|---|
| आय का महत्वपूर्ण साधन | बहुत सारे पर्यटक एक साथ आते हैं |
| स्वच्छ हवा, मनोरम प्राकृतिक दृश्य | पर्वतों के पर्यावरण पर दबाव |
| स्कीइंग, हाइकिंग, पर्वतारोहण, पैरा ग्लाइडिंग | सही संतुलन बनाए रखना कठिन |
| शताब्दियों से तीर्थयात्रा |
दो पर्वतारोही — चार वर्ष अलग-अलग रखिए
| नाम | उपलब्धि | सम्मान |
|---|---|---|
| बछेंद्री पाल | 1984 में एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला; महिला अभियानों का नेतृत्व | पद्मश्री 1984, पद्मभूषण 2019 |
| अरुणिमा सिन्हा | 22 वर्ष की आयु में दुर्घटना में एक पैर गया; 2013 में एवरेस्ट; विंसन सहित सभी महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियाँ | पद्मश्री 2015 |
अरुणिमा को बछेंद्री पाल से ही प्रोत्साहन और प्रशिक्षण मिला था।
भाग 6 — पर्वतीय चुनौतियाँ (पृ. 50)★
चार परिभाषाएँ — चारों परीक्षा-योग्य
| पद | परिभाषा |
|---|---|
| आकस्मिक बाढ़ | स्थान विशेष में अकस्मात बाढ़ आना; बहुधा बादल फटने से |
| भूस्खलन | पर्वतीय भूखंड के एक बड़े भाग या एक चट्टान का अकस्मात टूटकर गिरना |
| हिमस्खलन (एवलांश) | पर्वत से अकस्मात हिम का गिरना; प्राय: तब जब हिम का पिघलना आरंभ होता है |
| बादल फटना | अचानक प्रचंड तूफ़ान सहित वर्षा होना |
दो कारण-श्रृंखलाएँ — दीर्घ उत्तर में यही अंक दिलाती हैं
बादल फटना → आकस्मिक बाढ़ हिम का पिघलना आरंभ होना → हिमस्खलन
सात चुनौतियाँ — छह प्राकृतिक, एक मानव-निर्मित
| प्राकृतिक | मानव-निर्मित |
|---|---|
| आकस्मिक बाढ़ · भूस्खलन · हिमस्खलन (एवलांश) · भारी हिमपात · बादल फटना · ठंडा मौसम | पर्यटकों का अनियंत्रित रूप से आ जाना |
पर्वत और पवित्रता (पृ. 51)
- विश्व-भर के अनेक पारंपरिक समुदाय पर्वतों को पवित्र मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
- एवरेस्ट — 8848 मीटर, विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर।
- चोमोलुंगमा — तिब्बती नाम, अर्थ ‘जगत जननी’।
- सागरमाथा — नेपाली नाम, अर्थ ‘आकाश की देवी’।
- कैलाश पर्वत (तिब्बत) — हिंदू दर्शन, बौद्ध मत, जैन मत और बॉन के अनुयायी पवित्र मानते हैं।
भाग 7 — पठार (पृ. 51–52)
परिभाषा
- आस-पास की भूमि से उठी स्थलाकृति, सतह प्राय: चपटी।
- कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले।
- कुछ पठार नवीन, कुछ प्राचीन।
- ऊँचाई कुछ सौ मीटर से कई हजार मीटर तक।
दो पठार जो नाम से याद रखने हैं
| पठार | तथ्य |
|---|---|
| तिब्बत का पठार | विश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा; औसत ऊँचाई 4500 मीटर; इसीलिए ‘विश्व की छत’; पूर्व-पश्चिम लगभग 2500 किलोमीटर (= चंडीगढ़ से कन्याकुमारी की दूरी) |
| दक्कन का पठार | मध्य और दक्षिण भारत; विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक; कई लाख वर्ष पहले ज्वालामुखी की सक्रियता से बना |
पुस्तक दूसरा उदाहरण ‘दक्षिणी पठार’ भी देती है।
खनिज — पठार का सबसे बड़ा तथ्य★
- पठारों में खनिजों का प्रचुर जमाव → इन्हें ‘खनिजों का भंडार-गृह’ कहा जाता है।
- खनन पठारों की मुख्य गतिविधि है; विश्व की सबसे बड़ी खानें यहीं मिलती हैं।
| पठार | खनिज |
|---|---|
| पूर्वी अफ्रीका का पठार | सोना और हीरा |
| छोटा नागपुर का पठार | लौह, कोयला और मैंगनीज |
कृषि — नियम और उसका अपवाद★
| मिट्टी | कृषि | |
|---|---|---|
| अधिकांश पठार | चट्टानी मिट्टी | कम अनुकूल |
| लावा पठार (ज्वालामुखी क्रियाओं से निर्मित) | समृद्ध काली मिट्टी | उपजाऊ |
चार जल प्रपात
| जल प्रपात | नदी | स्थान |
|---|---|---|
| विक्टोरिया | जम्बेजी | अफ्रीका |
| हुंडरू | सुवर्ण रेखा | छोटा नागपुर पठार |
| जोग | शरावती | पश्चिमी घाट |
| नहकालीकाई | — | चेरापूंजी (मेघालय) — 340 मीटर की ऊँचाई से गिरता है |
भाग 8 — मैदान (पृ. 53–56) सबसे अधिक अंक वाला भाग★
परिभाषा
- विस्तृत सपाट अथवा हल्का तरंगित धरातल।
- कोई ऊँची पहाड़ियाँ अथवा गहरी घाटियाँ नहीं।
- सामान्यत: समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं।
मैदान कैसे बनते हैं — इसी क्रम में लिखिए★
पर्वत शृंखलाओं से नदियाँ निकलती हैं → उनकी बाढ़ से समतल भूमि बनती है → नदियाँ रेत, चट्टानों के कण और गाद एकत्र करती हैं (= तलछट) → उन्हें बहाकर समतल भूमि में जमा कर देती हैं → मिट्टी उपजाऊ बनती है → मैदान सभी प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त हो जाते हैं → लोगों का मुख्य आर्थिक व्यवसाय कृषि हो जाता है।
- तलछट = रेत + चट्टानों के कण + गाद।
- मैदान विविध प्रकार की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का भी भरण-पोषण करते हैं।
मैदानी जीवन
- हजारों वर्ष पहले आरंभिक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आस-पास विकसित हुई थीं।
- आज भी विश्व की अधिकांश जनसंख्या मैदानों में रहती है।
- भारत की कुल जनसंख्या की एक-चौथाई से अधिक — लगभग 40 करोड़ — गंगा के मैदान में रहती है।
- मुख्य व्यवसाय — मत्स्य पालन और कृषि।
| फसल-वर्ग | नाम |
|---|---|
| खाद्य फसलें | चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) |
| रेशेदार फसलें | कपास, जूट और सन |
सिंचाई — फिर वही दो पक्ष★
| लाभ | कीमत |
|---|---|
| परंपरागत कृषि वर्षा पर निर्भर थी | भूमिगत जलस्तर में गिरावट |
| अब नहरों का जाल (नेटवर्क) | कृषि के भविष्य पर चुनौतीपूर्ण स्थिति |
| भूमिगत जल पंप से निकालकर सिंचाई | अन्य समस्याएँ — बढ़ती जनसंख्या और प्रदूषण |
| कृषि उत्पादन में वृद्धि |
नदियाँ और संस्कृति
- विश्व में बहने वाली नदियाँ बहुत से सांस्कृतिक मूल्यों का वहन करती हैं।
- बहुत से समुदाय नदी के स्रोत और संगम स्थल को पवित्र मानते हैं।
- भारत में इन स्थानों पर त्योहार, समारोह और धार्मिक कृत्य किए जाते हैं।
- संगम स्थल = दो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान।
- मैदान में हल्की ढलान → नौका-संचालन सुगम → आर्थिक गतिविधियों को सहायता।
भाग 9 — मरुस्थल : चौथा स्थलरूप (पृ. 56)
पुस्तक स्वयं कहती है कि तीन श्रेणियाँ पर्याप्त नहीं हैं।
- मरुस्थल यदा-कदा वर्षा प्राप्त करते हैं; दूर-दूर तक शुष्कता का फैलाव।
- उनका वनस्पति जगत और प्राणि जगत विलक्षण होता है।
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| गर्म | सहारा (अफ्रीका) • थार (भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में) |
| ठंडा | गोबी (एशिया) |
| विशेषज्ञों का मत | कुछ अंटार्कटिक महाद्वीप को भी मरुस्थल मानते हैं |
- कठिन परिस्थितियों के बाद भी लोगों ने मरुस्थलों के पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है।
- थार के समुदाय लोक गीतों और किंवदंतियों या दंत कथाओं जैसी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर सँजोकर रखते हैं।
अध्याय का समापन-वाक्य★
“मानव ने जिस प्रकार सभी स्थलाकृतियों में विभिन्न प्रकार से अपने घर बनाए हैं, वह हमारे अनुकूलन अर्थात स्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने और लचीलेपन का साक्षी है।”
- अनुकूलन = स्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेना।
- लचीलापन (रेजिलियंस) = चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने अथवा उनके अनुसार ढलने की क्षमता।
भाग 10 — तमिल संगम की पाँच तिणै (पृ. 57)
| तिणै | दृश्यभूमि | मुख्य व्यवसाय |
|---|---|---|
| कुरिंजी | पर्वतीय क्षेत्र | आखेट और संग्रह करना |
| मुल्लाई | घास के मैदान और वन | पशु पालन |
| मरूदम | उपजाऊ कृषि के मैदान | कृषि |
| नेयदल | तटीय क्षेत्र | मत्स्य पालन और समुद्री यात्रा |
| पालै | शुष्क, मरुस्थल जैसे प्रदेश | घुमंतू और युद्धरत |
- ये भिन्न प्रकार का वर्गीकरण हैं।
- ये विविधता वाले प्रदेशों और उनकी विशेषताओं के प्रति गहन जागरूकता दिखाते हैं।
- ये हमारे और पर्यावरण के बीच गहन संबंध को दर्शाते हैं।
! पुस्तक का अपना निर्देश: “आपको तिणै के विवरण को याद रखने की आवश्यकता नहीं है, परंतु उससे प्रतिबिंबित अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है।”
पुस्तक का अपना सार — “आगे बढ़ने से पहले…” (पृ. 57)
- स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं — पर्वत, पठार और मैदान। उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
- ऐतिहासिक समय से लोगों द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप उस स्थलरूप से संबधित होते हैं जिसमें वे निवास करते हैं। ये स्थलरूप विश्व की संस्कृति के अभिन्न भाग हैं; विशेष रूप से भारतीय संस्कृति विविध प्रकार से उन्हें मनाती रही है।
- प्रत्येक स्थलरूप, विभिन्न प्रकार की चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों को भी प्रस्तुत करता है।
दीर्घ उत्तर का आरंभ और अंत इन्हीं तीन वाक्यों से कीजिए।
अंतिम दस मिनट — रटने की सूची
संख्याएँ एवरेस्ट 8848 मी. · तिब्बत का पठार 4500 मी. औसत, लगभग 2500 कि.मी. पूर्व-पश्चिम · गंगा लगभग 2500 कि.मी. · नहकालीकाई 340 मी. · मैदान 300 मी. से अधिक नहीं · गंगा का मैदान लगभग 40 करोड़ (जनसंख्या का एक-चौथाई से अधिक) · कालिदास 1500 वर्ष पूर्व · बछेंद्री पाल 1984 / 1984 / 2019 · अरुणिमा सिन्हा 22 वर्ष / 2013 / 2015
जोड़ियाँ हिमालय–नुकीली/नवीन · अरावली–गोल/प्राचीन · किलिमंजारो–पृथक · ब्लांक–आल्प्स · अकोंकागुआ–एंडीज · अनाईमुडी–दक्षिण भारत · यमुना–गंगा की सहायक · सोन–विंध्यांचल · छोटा नागपुर–लौह/कोयला/मैंगनीज · पूर्वी अफ्रीका–सोना/हीरा · जोग–शरावती · हुंडरू–सुवर्ण रेखा · विक्टोरिया–जम्बेजी · नहकालीकाई–चेरापूंजी · गोबी–ठंडा · सहारा व थार–गर्म · चोमोलुंगमा–तिब्बती · सागरमाथा–नेपाली
परिभाषाएँ जो शब्दश: याद हों स्थलरूप · तुंगता · समुद्र तल · पर्वत · पहाड़ी · वर्षण · मॉस · लाइकेन · भूभाग · घाटी · आकस्मिक बाढ़ · भूस्खलन · हिमस्खलन · बादल फटना · पठार · मैदान · तलछट · सहायक नदी · संगम स्थल · लचीलापन
पाँच जालियाँ जिनमें बच्चे गिरते हैं
- पर्वत और पहाड़ी को एक मान लेना।
- हिमालय की चोटियाँ गोल बता देना।
- भूस्खलन और हिमस्खलन को उलट देना।
- गंगा को यमुना की सहायक कह देना।
- सभी मरुस्थल गर्म मान लेना (गोबी ठंडा है)।