अध्याय 4भारत के विदेश संबंध

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★उत्तर लिखने का नियम: पहले पाठ्यपुस्तक का तथ्य, फिर एक उदाहरण, फिर एक पंक्ति का निष्कर्ष। तिथियाँ और नाम उत्तर में ज़रूर आने चाहिए — इस अध्याय में वही अंक दिलाते हैं।


प्रश्न 1 · सही या गलत(पृ. 70)

(क)“गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।”

✓ सही। कारण: पाठ स्वयं कहता है — “कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया। उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए।” (पृ. 57) ★उदाहरण: 1962 के संकट में भारत को अमरीका और ब्रिटेन से सैन्य मदद मिली; और 1971 में सोवियत संघ के साथ शांति एवं मित्रता की संधि हुई।

(ख)“अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।”

❌ गलत। कारण — तीन प्रमाण:

1★चीन के साथ शुरुआत “बड़े दोस्ताना ढंग से” हुई

उत्तर देखिए

1949 की क्रांति के बाद मान्यता देने वाले पहले देशों में भारत था, और 29 अप्रैल 1954 को पंचशील की घोषणा हुई।

2★★पाकिस्तान के साथ भी सहयोग हुआ — 1960 की सिंधु नदी जल संधि (विश्व बैंक की मध्यस्थता; नेहरू और अयूब खान), जिस पर “नरमी-गरमी के बावजूद ठीक-ठाक अमल होता रहा।”

3बँटवारे में अपहृत महिलाओं की वापसी के लिए दोनों सरकारों ने मिलकर प्रयास किया।

(ग)“शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा।”

✓ सही। कारण: “पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया। इस वजह से 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास पैदा हो गई।” (पृ. 57) ★और 1971 में भी: अमरीका और चीन ने पाकिस्तान की मदद की, जिसके जवाब में भारत ने सोवियत संघ से संधि की। यानी दोनों देशों के रिश्ते शीतयुद्ध की धुरियों से सीधे जुड़े रहे।

(घ)“1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।”

❌ गलत। !★★यह प्रश्न का सबसे बड़ा जाल है। कारण: वह संधि अमरीका से निकटता का नहीं, बल्कि अमरीका से दूरी का परिणाम थी। “अमरीका–पाकिस्तान–चीन की धुरी बनती देख भारत ने इसके जवाब में सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की एक 20-वर्षीय संधि पर दस्तखत किए।” (पृ. 66) ★पृष्ठभूमि: जुलाई 1971 में निक्सन के सलाहकार हेनरी किसिंजर ने पाकिस्तान होते हुए गुपचुप चीन का दौरा किया — यही वह घटना थी जिसने भारत को सोवियत संघ की ओर धकेला।

प्रश्न 2 · जोड़ा मिलाइए(पृ. 70)

पद✓ मेलकारण
(क) 1950–64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य(ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास★नेहरू के तीन उद्देश्य (पृ. 57)
(ख) पंचशील(iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत29 अप्रैल 1954, नेहरू और चाऊ एन लाई (पृ. 58)
(ग) बांडुंग सम्मेलन(iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई★★“बांडुंग-सम्मेलन में ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी” (पृ. 58)
(घ) दलाई लामा(i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए1959 में शरण माँगी; निवास धर्मशाला (पृ. 59)

प्रश्न 3 ·नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? दो कारण और उदाहरण।

कारण 1 — विदेश नीति ही संप्रभुता की असली कसौटी है★

नेहरू का अपना कथन (संविधान सभा, मार्च 1949): “आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। एक बार विदेश संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ… वहाँ तक आप आज़ाद नहीं रहते।”

★तर्क: औपनिवेशिक भारत में आंतरिक प्रशासन में कुछ भारतीय भागीदारी थी, पर विदेश नीति पूरी तरह लंदन के हाथ में थी। भारतीय सैनिक ब्रिटेन के युद्धों में लड़े — भारत के निर्णय से नहीं। इसलिए नेहरू के लिए विदेश नीति पर नियंत्रण = आज़ादी।

उदाहरण: ★★मार्च 1947 का एशियाई संबंध सम्मेलन — “जबकि अभी भारत को आज़ादी मिलने में पाँच महीने शेष थे।” यानी भारत ने स्वतंत्र विदेश-पहल आज़ादी से पहले ही शुरू कर दी थी।

कारण 2 — केवल स्वतंत्र विदेश नीति ही राष्ट्रीय हित साध सकती है★

नेहरू के तीन उद्देश्य थे — संप्रभुता की रक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और तेज़ आर्थिक विकास। ! यदि भारत किसी खेमे में शामिल हो जाता, तो उसके निर्णय उस खेमे के हित से बँध जाते — और दोनों खेमों से सहायता लेना असंभव हो जाता।

उदाहरण: ★1956 में भारत ने स्वेज नहर के मामले में मिस्र पर ब्रिटेन के हमले का विरोध किया — अपने पूर्व औपनिवेशिक शासक के विरुद्ध। यह स्वतंत्र विदेश नीति का सबसे स्पष्ट प्रमाण है।

प्रश्न 4 ·“विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक से एक उदाहरण।

सर्वोत्तम उदाहरण — 1971 की भारत-सोवियत संधि★★

दबावविवरण
घरेलू ज़रूरत★“1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा।” यह आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा — तीनों दृष्टियों से असह्य था।
अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति★★किसिंजर का जुलाई 1971 का गुपचुप चीन-दौरा और “अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी” का बनना।
परिणामभारत ने सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय शांति और मित्रता संधि की — “हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।”

दूसरा उदाहरण — 1962 के बाद★

घरेलू ज़रूरत: चीन-युद्ध में हार के बाद सैन्य ढाँचे का तत्काल आधुनिकीकरण। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति: सोवियत संघ तटस्थ रहा। परिणाम: ! गुटनिरपेक्ष भारत को अमरीका और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी।

★★निष्कर्ष लिखिए: “दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि भारत की विदेश नीति न विशुद्ध आदर्शवाद थी, न विशुद्ध यथार्थवाद — वह घरेलू विवशता और वैश्विक समीकरण के बीच का लगातार बदलता संतुलन थी।”

प्रश्न 5 ·आप किन दो बातों को बदलना चाहेंगे और किन दो को बरकरार रखना चाहेंगे?

! यह मत-आधारित प्रश्न है — कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं। पर उत्तर में तर्क और पाठ का प्रमाण होना चाहिए।

✓ जिन्हें बरकरार रखना चाहिए — दो सुझाव

#पहलूतर्क
1★निर्णय की स्वायत्तता (किसी सैन्य गुट में न जाना)इसी कारण भारत दोनों खेमों से सहायता ले सका (पृ. 57); और आज भी बहु-ध्रुवीय दुनिया में यह लचीलापन उपयोगी है।
2★‘प्रयोग पहले नहीं’ और भेदभाव-हीन निशस्त्रीकरणयह भारत को उत्तरदायी परमाणु-शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा देता है (पृ. 69)।

🔄 जिन्हें बदलना चाहिए — दो सुझाव(तर्क सहित)

#पहलूतर्क
1! सिद्धांत और व्यवहार का अंतर घटाना1956 में भारत ने स्वेज का विरोध किया पर हंगरी पर चुप रहा — ऐसा दोहरा रुख नैतिक साख घटाता है।
2! सुरक्षा-तैयारी को नीति के साथ जोड़ना1962 में “चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने” की आलोचना हुई — शांति की नीति का अर्थ असावधानी नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 6(क) · संक्षिप्त टिप्पणी —भारत की परमाणु नीति

1आरंभ: ★1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में; यह नेहरू की औद्योगीकरण नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक था। भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था।

2नेहरू का रुख: ★“नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे” — उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया।

3बदली परिस्थिति: ! अक्तूबर 1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण किया।

4NPT का विरोध: 1968 की परमाणु अप्रसार संधि को पाँच परमाणु-संपन्न देशों (अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन — जो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे) ने अन्य देशों पर थोपना चाहा। ★★भारत ने इसे “भेदभावपूर्ण” माना और दस्तखत से इनकार किया, क्योंकि “इन संधियों के द्वारा परमाणु हथियारों से लैस देशों की जमात के परमाणु शक्ति पर एकाधिकार को वैधता दी जा रही थी।”

5परीक्षण: ★★मई 1974 — पहला परीक्षण, जिसे भारत ने “शांतिपूर्ण परीक्षण” करार दिया।
1995 में NPT के अनिश्चितकालीन विस्तार का विरोध और CTBT से इनकार। मई 1998 में परीक्षण करके भारत ने सैन्य क्षमता जताई; तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगे, जो बाद में हटा लिए गए।

6★★वर्तमान नीति के दो स्तंभ: (क) भारत रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, पर उनका ‘प्रयोग पहले नहीं’ करेगा। (ख) भारत “वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव-हीन परमाणु निशस्त्रीकरण” के प्रति वचनबद्ध है, ताकि “परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।”

प्रश्न 6(ख) · संक्षिप्त टिप्पणी —विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति

1कथन: “हालाँकि राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद जरूर हैं लेकिन… राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है।” (पृ. 69)

2प्रमाण: ★“1962–1971 के बीच जब भारत ने तीन युद्धों का सामना किया” और उसके बाद भी, जब “समय-समय पर कई पार्टियों ने सरकार बनाई — विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।”

31977 का उदाहरण: जनता पार्टी की सरकार ने “सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति” की घोषणा की — आशय था सोवियत झुकाव खत्म करना। पर इसके बाद की सभी सरकारों ने (कांग्रेसी या गैर-कांग्रेसी) एक ही दिशा ली — चीन से बेहतर और अमरीका से नजदीकी रिश्ते। ★यानी सरकार बदली, दिशा नहीं।

4! पर सहमति निरपवाद नहीं थी: 1950 के दशक में डा. अंबेडकर, भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी गुटनिरपेक्षता के बजाय अमरीका-समर्थक नीति चाहते थे; और 1990 के बाद “अमरीका-समर्थक विदेश नीति अपनाने के लिए शासक दलों की आलोचना हुई है।”

उत्तर देखिए

निष्कर्ष ★★भारत में विदेश नीति चुनावी मुद्दा नहीं बनती — विवाद साधनों पर होता है, लक्ष्यों पर नहीं।

प्रश्न 7 ·तीन युद्ध — विदेश नीति की असफलता या अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम?

★आदर्श उत्तर की संरचना: पहले एक पक्ष, फिर दूसरा, फिर संतुलित निष्कर्ष।

पक्ष 1 — इसे विदेश नीति की असफलता माना जा सकता है

1! 1962 में तैयारी नहीं थी — “बहुत दिनों से भारत की चीन से लगती सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे।”

2! चेतावनी अनसुनी रही

उत्तर देखिए

सरदार पटेल को आशंका थी कि चीन चढ़ाई कर सकता है, पर नेहरू का आकलन था कि “आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।”

3! तिब्बत के प्रश्न पर स्पष्टता का अभाव

उत्तर देखिए

1954 के पंचशील प्रावधान का चीन ने अपने पक्ष में अर्थ लगाया।

4! गुटनिरपेक्षता संकट में काम नहीं आई

उत्तर देखिए

भारत को अमरीका-ब्रिटेन से मदद माँगनी पड़ी; सोवियत संघ तटस्थ रहा।

पक्ष 2 — इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम माना जा सकता है

1★शीतयुद्ध का ढाँचा

उत्तर देखिए

पाकिस्तान अमरीकी सैन्य-गठबंधन में शामिल हुआ; यह भारत के हाथ में नहीं था।

2★★1962 का समय स्वयं बताता है — चीन ने ठीक उसी समय हमला किया जब “पूरे विश्व का ध्यान… क्यूबा मिसाइल संकट की तरफ लगा हुआ था।” यह चीन का सुनियोजित अवसरवाद था।

3★1971 का युद्ध पाकिस्तान के अंदरूनी संकट से उपजा — खंडित जनादेश, अवामी लीग की जीत को अस्वीकार करना, दमन और 80 लाख शरणार्थी। भारत के पास विकल्प सीमित थे।

41965 में भी पहल पाकिस्तान की थी — कच्छ के रन में और फिर जम्मू-कश्मीर में।

संतुलित निष्कर्ष★★

तीनों युद्धों को एक साथ ‘विदेश नीति की विफलता’ कहना उचित नहीं — 1965 और 1971 में पहल भारत की नहीं थी, और वे शीतयुद्ध के व्यापक ढाँचे तथा पाकिस्तान के अंदरूनी संकट से उपजे। परंतु 1962 अलग है: वहाँ नीति की नहीं, बल्कि आकलन और तैयारी की विफलता स्पष्ट थी। इसलिए सही उत्तर यह है कि विदेश नीति के लक्ष्य गलत नहीं थे — गलत यह मान लेना था कि शांति की नीति अकेले सुरक्षा की गारंटी दे सकती है।

प्रश्न 8 ·क्या भारत क्षेत्रीय महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के संदर्भ में।

‘हाँ’ के पक्ष में तर्क★

1भारत ने पहली बार तीनों सेनाओं — वायु, नौ और थल — का समन्वित प्रयोग किया और “दस दिनों के अंदर” ढाका घेर लिया।

2★★90,000 सैनिकों का आत्म-समर्पण और एक नए राष्ट्र (बांग्लादेश) का उदय — यह दक्षिण एशिया का नक्शा बदल देने वाली घटना थी।

3भारत ने महाशक्तियों के दबाव के बावजूद अपना रास्ता चुना — अमरीका-चीन-पाकिस्तान की धुरी के जवाब में सोवियत संघ से संधि करके।

4“अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य-पराक्रम प्रबल हुआ है।”

‘नहीं’ के पक्ष में तर्क★

1★★भारत ने विजय के बाद “अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया”

उत्तर देखिए

विजय को क्षेत्रीय विस्तार में नहीं बदला।

2★3 जुलाई 1972 का शिमला-समझौता

उत्तर देखिए

समस्या का समाधान बातचीत से खोजा गया, थोपा नहीं गया।

3युद्ध का तात्कालिक कारण 80 लाख शरणार्थियों का बोझ था — यानी यह मानवीय और सुरक्षा-विवशता थी, महत्वाकांक्षा नहीं।

4भारत की घोषित नीति सदा “शांति और सहयोग के सिद्धांतों” तथा “अन्य सभी देशों की संप्रभुता के सम्मान” पर आधारित रही।

संतुलित निष्कर्ष★★

1971 ने यह अवश्य सिद्ध किया कि भारत दक्षिण एशिया की निर्णायक शक्ति है। पर ‘शक्ति होना’ और ‘महाशक्ति बनना चाहना’ — दो अलग बातें हैं। एकतरफा युद्ध-विराम और शिमला-समझौता बताते हैं कि भारत ने अपनी शक्ति को विस्तार में नहीं, व्यवस्था-बहाली में लगाया।

प्रश्न 9 ·राजनीतिक नेतृत्व विदेश नीति पर किस तरह असर डालता है?

नेतृत्वप्रभाव — पाठ से प्रमाण
★★नेहरू (1946–64)प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, दोनों। गुटनिरपेक्षता, पंचशील, बांडुंग, एफ्रो-एशियाई एकता, परमाणु हथियारों का विरोध — सब उनकी छाप है। “विदेश नीति को तैयार करने के मामले में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।”
★लालबहादुर शास्त्री (1964–66)1965 में निर्णायक सैन्य निर्णय — “पंजाब की सीमा की तरफ से जवाबी हमला”; और ताशकंद-समझौता।
★★इंदिरा गाँधी (1966 से)1971 की सोवियत संधि, बांग्लादेश युद्ध, शिमला-समझौता, और 1974 का परमाणु परीक्षण।
★जनता पार्टी (1977)“सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति” की घोषणा — सोवियत झुकाव खत्म करने का प्रयास।
वाजपेयी (विदेश मंत्री, 1979)1962 के बाद चीन जाने वाले पहले शीर्ष नेता — संबंध-सामान्यीकरण की शुरुआत।

★★पर संतुलन भी दीजिए: नेतृत्व दिशा तय करता है, पर सीमाओं के भीतर। पाठ स्वयं कहता है कि “राष्ट्रीय अखंडता, सीमा की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है” — इसीलिए सरकारें बदलने पर भी विदेश नीति की मूल दिशा बहुत नहीं बदली।

प्रश्न 10 · अवतरण-आधारित(पृ. 71)

अवतरण (नेहरू): “गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना… इसका अर्थ होता है चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नज़रिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना….”

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?

1★क्योंकि गुट में जाने से निर्णय की स्वतंत्रता चली जाती — और नेहरू के लिए विदेश नीति पर नियंत्रण ही आज़ादी की कसौटी थी।

2तीन उद्देश्य साधने के लिए — संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और तेज़ आर्थिक विकास। गुट में जाने से भारत किसी और के युद्ध में खिंच सकता था और विकास पर ध्यान बँट जाता।

3★दोनों खेमों से सहायता और अनुदान लेने की संभावना बनी रहती (जो वास्तव में हुआ भी)।

4अवतरण के अपने शब्दों में — ताकि “चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखा जाए” और “सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते” बने रहें।

(ख) क्या भारत-सोवियत संधि से गुटनिरपेक्षता का उल्लंघन हुआ?

! ‘हाँ’ का पक्ष: आलोचकों का कहना था कि “भारत सोवियत खेमे में शामिल हो गया” (पाठ का अपना हाशिया-प्रश्न, पृ. 66); संधि में सैन्य आश्वासन था — “हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।”

✓ ‘नहीं’ का पक्ष — यह अधिक मज़बूत तर्क है:

1★★वह एक द्विपक्षीय संधि थी, सैन्य गठबंधन नहीं। भारत न NATO में गया, न वारसा पैक्ट में।

2★वह प्रतिक्रिया थी, पहल नहीं

उत्तर देखिए

“अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख” की गई।

3गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं, बल्कि “स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना” है — और भारत ने ठीक यही किया।

41977 में जनता सरकार ने “सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति” की बात कहकर सोवियत झुकाव को कम भी किया — यानी नीति बंधी हुई नहीं थी।

★★संतुलित निष्कर्ष: संधि गुटनिरपेक्षता की भावना पर दबाव अवश्य थी, पर उसका औपचारिक उल्लंघन नहीं। वह इस बात का प्रमाण है कि गुटनिरपेक्षता कोई कठोर सिद्धांत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित साधने का लचीला साधन थी।

(ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

❌ नहीं।

1★★अवतरण स्वयं बताता है कि गुटनिरपेक्षता केवल ‘गुट में न जाना’ नहीं है — वह है “चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना” और “स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना।” यह सकारात्मक सिद्धांत है, केवल नकारात्मक इनकार नहीं।

2उसका दूसरा अंग है — “सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना।” यह किसी भी युग में अर्थपूर्ण है।

3★व्यवहार में भी यह सही निकला: शीतयुद्ध 1991 में समाप्त हो गया, वारसा पैक्ट भंग हो गया — फिर भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन बना रहा, क्योंकि उसका असली मुद्दा ‘निर्णय की स्वायत्तता’ और ‘विकासशील देशों का साझा स्वर’ था।

4और पाठ का सूत्र-वाक्य यहाँ भी लागू है — “विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।”

खंड ख · अतिरिक्त अभ्यास

ख.1 · वस्तुनिष्ठ प्रश्न(1 अंक)

#प्रश्नउत्तर
1भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित है?अनुच्छेद 51
2नेहरू किस अवधि तक प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री रहे?1946 से 1964
3पंचशील की घोषणा किस तिथि को हुई?29 अप्रैल 1954
4बांडुंग सम्मेलन किस वर्ष और किस देश में हुआ?1955, इंडोनेशिया
5गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन कब और कहाँ?सितंबर 1961, बेलग्रेड
6एशियाई संबंध सम्मेलन कब हुआ?मार्च 1947
7दलाई लामा ने भारत से शरण किस वर्ष माँगी?1959
8अरुणाचल प्रदेश को उस समय क्या कहा जाता था?नेफा / उत्तर-पूर्वी सीमांत
91962 में किस केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा?वी.के. कृष्णमेनन (रक्षा मंत्री)
10सिंधु नदी जल संधि किस वर्ष और किसकी मध्यस्थता से?1960, विश्व बैंक
11ताशकंद-समझौता किनके बीच हुआ?लालबहादुर शास्त्री और जनरल अयूब खान (1966)
121971 में भारत ने किस देश से 20-वर्षीय संधि की?सोवियत संघ
13ढाका में आत्म-समर्पण किस तिथि को हुआ?16 दिसंबर 1971
14शिमला-समझौता किस तिथि को और किनके बीच?3 जुलाई 1972; इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो
15भारत के परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत किसके निर्देशन में हुई?होमी जहाँगीर भाभा
16भारत का पहला परमाणु परीक्षण कब?मई 1974
171964 में भाकपा से टूटकर कौन-सा दल बना?माकपा (CPI-M)
18करगिल संघर्ष में भारत ने कब तक अधिकांश ठिकाने वापस ले लिए?26 जुलाई 1999

ख.2 · लघु उत्तरीय(2 अंक)

1‘गुटनिरपेक्षता’ को नेहरू के शब्दों में परिभाषित कीजिए।

21956 की उन दो घटनाओं का उल्लेख कीजिए जिनसे भारत की गुटनिरपेक्षता की परीक्षा हुई।

3‘मध्यवर्ती राज्य’ से क्या तात्पर्य है? भारत-चीन संदर्भ में समझाइए।

4भारत-चीन सीमा-विवाद के दो छोर कौन-से थे?

51962 के युद्ध का भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर क्या असर पड़ा?

6सिंधु नदी जल संधि का महत्व बताइए।

7भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?

8‘प्रयोग पहले नहीं’ नीति क्या है?

91962 के युद्ध के बाद पूर्वोत्तर में क्या दो परिवर्तन हुए?

101971 में भारत को सोवियत संघ से संधि क्यों करनी पड़ी?

ख.3 · दीर्घ उत्तरीय(4 अंक)

1नेहरू की विदेश नीति के तीन उद्देश्य बताइए और स्पष्ट कीजिए कि गुटनिरपेक्षता उन्हें कैसे साधती थी।

2भारत-चीन संबंधों में 1949 से 1962 तक आए बदलाव का क्रमबद्ध विवरण दीजिए।

31962 के युद्ध के छह परिणाम लिखिए।

41971 के बांग्लादेश युद्ध की पृष्ठभूमि, अंतर्राष्ट्रीय समीकरण और परिणाम बताइए।

5“विदेश नीति ने भारत की घरेलू राजनीति को बदला।” तीन उदाहरणों से सिद्ध कीजिए।

ख.4 · निबंधात्मक(6 अंक)★

1★★“आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है।” — नेहरू के इस कथन के आलोक में भारत की प्रारंभिक विदेश नीति का मूल्यांकन कीजिए।

2★गुटनिरपेक्षता की उपलब्धियों और सीमाओं का संतुलित मूल्यांकन कीजिए।

3★★1962 और 1971 — दो युद्ध, दो उलटे घरेलू परिणाम। इस विरोधाभास की व्याख्या कीजिए।

ख.5 · स्रोत-आधारित अभ्यास(5 अंक)

अवतरण पढ़िए: ”…ताकत के तीनों साधनों — संपदा, धन और जन — से हीन एक देश अब बड़ी तेजी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है …. उसकी आवाज़ को दिग्गज देशों की जमात में बड़ी इज़्ज़त के साथ सुना जाता है…” — सी. राजगोपालाचारी, एडविना माउंटबेटन को पत्र, 1950

(क) यह अवतरण भारत की किस विशेषता की ओर संकेत करता है? (1)

‘नैतिक ताकत’ — यानी भौतिक शक्ति के अभाव के बावजूद विचारों और नीतियों के बल पर प्रतिष्ठा।

(ख) भारत ने यह ‘नैतिक ताकत’ किन दो कदमों से अर्जित की? (2)

(1) अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थन और दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का दृढ़ विरोध। (2) एफ्रो-एशियाई एकता — एशियाई संबंध सम्मेलन (1947), इंडोनेशिया-समर्थक सम्मेलन (1949) और बांडुंग (1955)।

(ग) पाठ का कौन-सा हाशिया-प्रश्न इसी विचार को उठाता है? (2)

“हम लोग आज की बनिस्बत जब ज्यादा गरीब, कमज़ोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान कहीं ज्यादा थी।” ★यह प्रश्न पूछता है कि क्या आर्थिक-सैन्य शक्ति और नैतिक प्रभाव हमेशा साथ-साथ बढ़ते हैं।