Chapter 1राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 3–25.

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कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • स्वतंत्र भारत में राजनीति • अध्याय 1 — राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति) · पृष्ठ — 3 से 25

1947 में लगभग सभी को यकीन था कि भारत टिक नहीं पाएगा। वे गलत क्यों निकले?

इतनी भाषाएँ, इतने धर्म, इतनी संस्कृतियाँ — दुनिया में ऐसा कोई देश एकजुट नहीं रहा था। इस अध्याय में तीन उत्तर हैं • विभाजन और पुनर्वास • 565 रजवाड़ों का विलय • राज्यों का भाषावार पुनर्गठन

1 | नए राष्ट्र-राज्य की चुनौतियाँ | आज़ादी की रात; तीन चुनौतियाँ; यह अध्याय किस पर है

आज़ादी की वह रात

14–15 अगस्त 1947

  • सन् 1947 के 14–15 अगस्त की मध्यरात्रि को हिंदुस्तान आज़ाद हुआ।
  • प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उस रात संविधान सभा के एक विशेष सत्र को संबोधित किया।
  • वह भाषण ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ के नाम से जाना गया।
  • आज़ादी की लड़ाई में कई आवाज़ें थीं, पर दो बातों पर सबकी सहमति थी।
    • शासन लोकतांत्रिक सरकार के जरिए चलेगा।
    • सरकार सबके भले के लिए काम करेगी — गरीबों और कमज़ोरों का खास खयाल।

राष्ट्र-राज्य के रूप में आज़ाद हिंदुस्तान का जन्म कठिन परिस्थितियों में हुआ।

उसी दिन, कलकत्ता में

कल हम अंग्रेज़ी-राज की गुलामी से आज़ाद हो जाएँगे लेकिन आधी रात को भारत का बँटवारा भी होगा। इसलिए कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन होगा और गम का भी।

महात्मा गाँधी, 14 अगस्त 1947, कलकत्ता

तीन चुनौतियाँ

चुनौतीमूल प्रश्नसंविधान में उत्तर
पहली — एकताक्या भारत एक रह पाएगा? क्षेत्रीय अखंडता कैसे मिले?विविधता की स्वीकृति
दूसरी — लोकतंत्रसंविधान तो है, पर व्यवहार-बरताव कैसे बदले?मौलिक अधिकार; मतदान का अधिकार
तीसरी — विकाससमूचे समाज का भला कैसे हो, कुछ तबकों का नहीं?समानता; अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा; नीति-निर्देशक सिद्धांत

यह अध्याय किस चुनौती पर है

  • आज़ादी के तुरंत बाद राष्ट्र-निर्माण की चुनौती सबसे प्रमुख थी।
  • इस पहले अध्याय में हम केवल पहली चुनौती — एकता और अखंडता — पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
  • लोकतंत्र और आर्थिक विकास की चुनौतियाँ अगले दो अध्यायों में आएँगी।

याद रखने का सूत्र — ए-लो-वि: एकता, लोकतंत्र, विकास।

2 | विभाजन : विस्थापन और पुनर्वास | द्वि-राष्ट्र सिद्धांत; चार कठिनाइयाँ; परिणाम; धर्मनिरपेक्षता

द्वि-राष्ट्र सिद्धांत

विभाजन की जड़

  • 14–15 अगस्त 1947 को एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र — भारत और पाकिस्तान — अस्तित्व में आए।
  • मुस्लिम लीग का सिद्धांत था कि भारत एक कौम का नहीं, ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है।
  • इसी आधार पर लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश — पाकिस्तान — की माँग की।
  • कांग्रेस ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत तथा पाकिस्तान की माँग, दोनों का विरोध किया।

सन् 1940 के दशक की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बाद पाकिस्तान की माँग मान ली गई।

विभाजन का आधार, और पहली दो कठिनाइयाँ

  • तय हुआ कि धार्मिक बहुसंख्या को विभाजन का आधार बनाया जाएगा।
  • पहली कठिनाई — ब्रिटिश इंडिया में कोई एक सटा हुआ मुस्लिम-बहुल इलाका था ही नहीं; ऐसे दो इलाके थे, एक पश्चिम में और एक पूर्व में।
    • इसलिए पाकिस्तान दो हिस्सों में बना, और बीच में भारतीय भू-भाग का बड़ा विस्तार रहा।
  • दूसरी कठिनाई — हर मुस्लिम-बहुल इलाका पाकिस्तान जाने को राजी नहीं था।
    • खान अब्दुल गफ्फार खान — ‘सीमांत गाँधी’ — द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़ थे।
    • उनकी आवाज़ की अनदेखी की गई और पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया।

तीसरी और चौथी कठिनाई

  • तीसरी — पंजाब और बंगाल में बहुत बड़े गैर-मुस्लिम हिस्से थे, इसलिए इन प्रांतों को भी बाँटना पड़ा।
    • बँटवारा जिले या उससे निचले प्रशासनिक हलके के आधार पर होना था।
    • 14–15 अगस्त की मध्यरात्रि तक यह फ़ैसला हो ही नहीं पाया था।
    • यानी आज़ादी के दिन तक अनेक लोगों को पता नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में।
  • चौथी और सबसे अबूझ — ‘अल्पसंख्यकों’ की समस्या; सीमा के दोनों तरफ़ अल्पसंख्यक थे।

पंजाब और बंगाल का बँटवारा विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ।

चौथी कठिनाई का मर्म

इन लोगों ने पाया कि हम तो अपने ही घर में विदेशी बन गए। जिस जमीन पर वे और उनके पुरखे सदियों से आबाद रहे उसी जमीन पर वे ‘विदेशी’ बन गए थे।

NCERT, अध्याय 1, पृ. 9

80 लाख

80 लाख

इतने लोगों को विभाजन के कारण घर-बार छोड़कर सीमा-पार जाना पड़ा

पाँच से दस लाख

5–10 लाख

विभाजन की हिंसा में इतने लोगों ने अपनी जान गँवाई

विभाजन के परिणाम

आकस्मिक, अनियोजित, त्रासद

  • यह स्थानांतरण मानव-इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक था।
  • लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील हो गए।
  • अल्पसंख्यकों को शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी; कल तक जो अपना वतन था, वहीं का प्रशासन अब रुखाई का बरताव कर रहा था।
  • हजारों औरतों का अपहरण हुआ; कई जगह परिवार वालों ने ही ‘कुल की इज्ज़त’ के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला।
  • बँटवारा टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का हुआ।

लाखों शरणार्थियों के लिए आज़ादी का मतलब था — महीनों और कभी-कभी सालों तक शिविर में ज़िंदगी काटना।

विभाजन ने जो सवाल छोड़ा

क्या भारत हिंदू राष्ट्र बन गया?

  • विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था — तो क्या भारत अपने-आप एक हिंदू राष्ट्र बन गया?
  • नहीं। 1951 में भारत की कुल आबादी में 10–12 फीसदी मुसलमान थे।
  • सवाल यह था कि भारत अपने मुसलमान नागरिकों और सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी अल्पसंख्यकों के साथ क्या बरताव करे।
  • भारत की कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्ज़ा देने के हामी थे।
  • नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए — यही धर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श है।

इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।

नेहरू का तर्क

लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में हमें उन्हें नागरिक के अधिकार देने होंगे और उनकी रक्षा करनी होगी। अगर हम ऐसा करने में कामयाब नहीं होते तो यह एक नासूर बन जाएगा जो पूरी राज-व्यवस्था में ज़हर फैलाएगा।

जवाहरलाल नेहरू, मुख्यमंत्रियों को पत्र, 15 अक्तूबर 1947

महात्मा गाँधी की शहादत

30 जनवरी 1948

  • गाँधीजी ने 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के किसी जश्न में भाग नहीं लिया; वे कोलकाता के दंगाग्रस्त इलाकों में थे।
  • उनकी मौजूदगी से हालात सुधरे — आज़ादी का जश्न लोगों ने सांप्रदायिक सद्भाव के जज़्बे से मनाया।
  • दंगे फिर भड़के, और वे अमन कायम करने के लिए ‘उपवास’ पर बैठ गए; जनवरी 1948 में दिल्ली में अंतिम उपवास रखा।
  • दोनों समुदायों के अतिवादी उन पर दोष मढ़ रहे थे, फिर भी उन्होंने सशस्त्र सुरक्षा लेने से मना कर दिया।
  • 30 जनवरी 1948 को नाथूराम विनायक गोडसे ने संध्याकालीन प्रार्थना के समय उन पर तीन गोलियाँ चलाईं।

इस तरह न्याय और सहिष्णुता को आजीवन समर्पित एक आत्मा का देहावसान हुआ।

3 | रजवाड़ों का विलय | 565 रजवाड़े; पटेल की भूमिका; हैदराबाद और मणिपुर

समस्या क्या थी

565 रजवाड़े

  • ब्रिटिश इंडिया के दो हिस्से थे — ब्रिटिश प्रभुत्व वाले प्रांत और देसी रजवाड़े।
  • रजवाड़ों पर राजाओं का शासन था; उन्होंने ब्रिटिश-राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी।
  • साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े थे; प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी रजवाड़े की प्रजा था।
  • आज़ादी के तुरंत पहले घोषणा हुई कि सभी 565 रजवाड़े कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे — वे चाहें तो स्वतंत्र भी रह सकते हैं।
  • और यह फ़ैसला प्रजा को नहीं, राजाओं को करना था।

इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था।

संकट तुरंत सामने आ गया

  • सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य को आज़ाद रखने की घोषणा की।
  • अगले ही दिन हैदराबाद के निज़ाम ने ऐसी ही घोषणा कर दी।
  • भोपाल के नवाब जैसे कुछ शासक संविधान-सभा में शामिल ही नहीं होना चाहते थे।
  • साफ़ हो गया कि आज़ादी के बाद हिंदुस्तान कई छोटे-छोटे देशों में बँट जाने वाला है।
  • अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक था और शासक प्रजा को अधिकार देने को तैयार नहीं थे।

लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय जान पड़ रहा था।

पटेल की अपील

हम भारत के इतिहास के एक यादगार मुकाम पर खड़े हैं। साथ मिलकर चलें तो देश को हम महानता की नयी बुलंदियों तक पहुँचा सकते हैं, जबकि एकता के अभाव में हम अप्रत्याशित विपदाओं के घेरे में होंगे।

सरदार पटेल, रियासतों के शासकों को एक पत्र में, 1947

सरकार का नज़रिया

बातचीत पहले, बल अंत में

  • अंतरिम सरकार ने कड़ा रुख अपनाया; माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें शामिल होने को स्वतंत्र थीं।
  • रजवाड़ों के शासकों को मनाने-समझाने में सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
  • शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए लगभग सभी रजवाड़े 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गए।
  • शासकों ने विलय के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए — इसे ‘इंस्टूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ कहा जाता है।
  • कठिन मामले चार रहे — जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर।

कश्मीर के विलय के बारे में आप अध्याय 8 में पढ़ेंगे।

तीन बातें जो इस चर्चा से निकलती हैं

परीक्षा में बार-बार

  • अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।
  • भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी — जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ।
    • यह रुख विभिन्नताओं को सम्मान देने और विभिन्न क्षेत्रों की माँगों को संतुष्ट करने के लिए अपनाया गया था।
  • विभाजन की पृष्ठभूमि में सीमांकन पर खींचतान थी, इसलिए क्षेत्रीय अखंडता-एकता का सवाल सबसे अहम हो उठा।

रजवाड़ों का पैमाना समझिए — सौराष्ट्र में ही 14 बड़े और 119 छोटे रजवाड़े थे।

हैदराबाद बनाम मणिपुर

हैदराबाद — सैन्य कार्रवाई

  • शासक निज़ाम, दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में शुमार
  • नवंबर 1947 में एक साल का यथास्थिति समझौता
  • तेलंगाना के किसानों का आंदोलन; महिलाएँ सबसे ज्यादा जुल्म का शिकार
  • कम्युनिस्ट और हैदराबाद कांग्रेस अग्रिम पंक्ति में
  • निज़ाम ने रज़ाकार भेजे — सांप्रदायिक और अत्याचारी
  • सितंबर 1948 — भारतीय सेना; निज़ाम का आत्मसमर्पण; विलय

मणिपुर — वार्ता

  • महाराजा बोधचंद्र सिंह ने आज़ादी के चंद रोज पहले सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए
  • एवज में आंतरिक स्वायत्तता का आश्वासन
  • जनमत के दबाव में जून 1948 में चुनाव → संवैधानिक राजतंत्र
  • भारत का पहला भाग जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार से चुनाव हुए
  • विधानसभा में गहरे मतभेद — कांग्रेस पक्ष में, अन्य दल विरुद्ध
  • सितंबर 1949 — भारत सरकार को सफलता मिली

4 | राज्यों का पुनर्गठन | आंतरिक सीमाएँ; आंध्र आंदोलन; आयोग और अधिनियम; परिणाम

चुनौती अभी खत्म नहीं हुई थी

अब आंतरिक सीमाएँ

  • बँटवारे और रियासतों के विलय के साथ ही राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का अंत नहीं हुआ।
  • अब भारतीय प्रांतों की आंतरिक सीमाओं को तय करना था।
  • यह महज प्रशासनिक विभाजन का मामला न था — सीमाएँ ऐसी हों कि भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता की झलक मिले, और राष्ट्रीय एकता भी खंडित न हो।
  • औपनिवेशिक सीमाएँ केवल प्रशासनिक सुविधा या जीते गए क्षेत्र के आधार पर बनी थीं।

हमारी राष्ट्रीय सरकार ने ऐसे सीमांकन को बनावटी मानकर खारिज कर दिया।

वादा पुराना था, पर नेतृत्व डर गया

  • सन् 1920 के नागपुर अधिवेशन के बाद से ही कांग्रेस ने मान लिया था कि पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा।
  • अनेक प्रांतीय कांग्रेस-समितियाँ भाषाई इलाके के आधार पर ही बनी थीं।
  • पर आज़ादी और बँटवारे के बाद नेताओं को चिंता हुई कि इससे अव्यवस्था फैलेगी और देश टूट सकता है।
  • यह भी लगा कि इससे दूसरी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटक जाएगा।
  • केंद्रीय नेतृत्व ने मसले को स्थगित करने का फ़ैसला किया।

ध्यान दीजिए — गाँधीजी भी (जनवरी 1948) भाषावार गठन के पक्ष में नहीं थे।

आंध्र आंदोलन

जनता बनाम नेतृत्व

  • पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विरोध भड़क उठा।
    • उस प्रांत में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश शामिल थे।
  • विशाल आंध्र आंदोलन ने तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके नया राज्य बनाने की माँग की।
  • केंद्र सरकार ‘हाँ-ना’ की दुविधा में थी, और इसी मनोदशा से आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा।
  • कांग्रेस नेता और दिग्गज गाँधीवादी पोट्टी श्रीरामुलु अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ गए।
  • 56 दिनों की भूख-हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई।

दिसंबर 1952 में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा की।

आयोग से अधिनियम तक

वर्षक्या हुआ
1953राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन — काम था राज्यों के सीमांकन पर गौर करना
1955आयोग की रिपोर्ट — सिफ़ारिश कि सीमाएँ वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर तय हों
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास — 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बने

नए राज्यों का निर्माण — कहानी अभी जारी है

  1. 1960जन-आंदोलन के बाद द्विभाषी बंबई सेमहाराष्ट्र और गुजरात
  2. 1963नगालैंड
  3. 1966पंजाबी-भाषी इलाके कोपंजाब; अलग करके हरियाणा और हिमाचल प्रदेश
  4. 1972असम सेमेघालय; मणिपुर और त्रिपुरा भी अलग राज्य बने
  5. 1987मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश
  6. 2000छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड — भाषा से नहीं, विकास के असंतुलन से
  7. 2014तेलंगाना (2 जून)

डर क्या था, और हुआ क्या

अध्याय का सबसे बड़ा उलटफेर

  • डर यह था कि अलग राज्य की माँग से देश की एकता पर आँच आएगी और अलगाववाद पनपेगा।
  • जनता के दबाव में आखिरकार नेतृत्व ने भाषा के आधार पर पुनर्गठन का मन बनाया।
  • उम्मीद थी कि क्षेत्रीय और भाषाई दावे मान लेने से बँटवारे और अलगाववाद के खतरे में कमी आएगी।
  • बहुतों की आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा — इसके विपरीत देश की एकता और ज्यादा मज़बूत हुई।
  • सत्ता में भागीदारी का रास्ता अब छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके से आगे, बाकियों के लिए भी खुल गया।

सबसे बड़ी बात — भाषावार पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली।

5 | निचोड़ | तीन मोर्चे; एक निष्कर्ष

अध्याय का असली वाक्य

लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना। भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी।

NCERT, अध्याय 1, पृ. 23

पूरा अध्याय एक स्लाइड में

  • राष्ट्र-निर्माण की तीन चुनौतियाँ थीं — एकता, लोकतंत्र, विकास; यह अध्याय पहली पर है।
  • विभाजन — धर्म के आधार पर बँटवारा; 80 लाख विस्थापित, 5–10 लाख मृत; उत्तर में भारत ने धर्मनिरपेक्ष राज्य चुना।
  • रजवाड़े — 565 रियासतें कानूनी तौर पर आज़ाद; पटेल ने बातचीत और लचीलेपन से अखंड भारत बनाया।
  • पुनर्गठन — 1953 का आयोग, 1956 का अधिनियम, 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश।

भारत ने एकता विविधता को दबाकर नहीं, उसे स्वीकार करके पाई — यही इस अध्याय का उत्तर है।