Chapter 3नियोजित विकास की राजनीति

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कक्षा: 12 · विषय: राजनीति विज्ञान · पुस्तक: स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2) पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 44–53 · कुल कालांश: 5

अध्याय-स्तरीय अधिगम-प्रतिफल

पाठ पूरा होने पर विद्यार्थी —

  1. सिद्ध कर सकेंगे कि विकास एक राजनीतिक सवाल है, तकनीकी नहीं — और यह कि अंतिम निर्णय जन-प्रतिनिधि का होना चाहिए।
  2. उड़ीसा/पोस्को के उदाहरण से चार टकराते हितों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  3. वामपंथ और दक्षिणपंथ में भेद कर सकेंगे।
  4. आज़ादी के समय की सहमतियाँ और तीन मतभेद बता सकेंगे।
  5. विकास के दो मॉडलों की तुलना कर सकेंगे और बता सकेंगे कि भारत ने कौन-सा रास्ता चुना।
  6. योजना आयोग की प्रकृति — संवैधानिक निकाय नहीं, सलाहकार संस्था — स्पष्ट कर सकेंगे।
  7. ★‘बॉम्बे प्लान’ का महत्त्व समझा सकेंगे।
  8. पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना की तुलना कर सकेंगे — आँकड़ों सहित।
  9. ‘केरल मॉडल’ को विकेंद्रित नियोजन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकेंगे।

पढ़ाने से पहले — एक ज़रूरी चेतावनीध्यान

प्रश्नावली का प्रश्न 4 (पृ. 53) चार मेल पूछता है — चरण सिंह, पी.सी. महालनोबिस, बिहार का अकाल और वर्गीज़ कूरियन।

!! इनमें से केवल महालनोबिस का उल्लेख अध्याय के पाठ (पृ. 44–53) में है। चरण सिंह, बिहार का अकाल, वर्गीज़ कूरियन और ‘जोनिंग’ — इनमें से कोई भी इस अध्याय में नहीं आता।

✓ यह पाठ्यक्रम-युक्तिकरण का अवशेष है — ये विषय हरित क्रांति और श्वेत क्रांति वाले हटाए गए खंड से थे। कालांश 5 में इनकी पूरी भरपाई की गई है (नीचे देखिए), ताकि विद्यार्थी प्रश्न 4 हल कर सकें।

कालांश 1 — विकास एक राजनीतिक सवाल है

पाठ्यपुस्तक: पृ. 44–46

समयगतिविधि
0–4 मिनटहुक — पहले सवाल पूछिए, फिर पाठ खोलिए। “मान लीजिए आपके गाँव के नीचे लोहे का बड़ा भंडार निकल आए और सरकार वहाँ कारखाना लगाना चाहे। आप क्या चाहेंगे?” दो-तीन उत्तर लीजिए।
4–14 मिनट★★उड़ीसा का उदाहरण। इस्पात की विश्वव्यापी माँग → उड़ीसा में लौह-अयस्क का विशाल भंडार → राज्य सरकार ने सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। ! पेच: “लौह-अयस्क के ज्यादातर भंडार उड़ीसा के सर्वाधिक अविकसित इलाकों में हैं — खासकर आदिवासी-बहुल जिलों में।”
14–22 मिनट★★चार टकराते हित — बोर्ड पर सारणी बनवाइए। राज्य सरकार (पूँजी-निवेश और रोज़गार) · आदिवासी (विस्थापन का डर, आजीविका छिनना) · पर्यावरणविद (प्रदूषण) · केंद्र सरकार (बुरी मिसाल और निवेश में बाधा)। फिर पाठ का सवाल दागिए — “किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?”
22–30 मिनट★★अध्याय का शीर्षक-वाक्य बोर्ड पर लिखवाइए: “खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए। जन-प्रतिनिधि जनता की भावनाओं को समझते हैं और जन-प्रतिनिधियों को ही ऐसे फ़ैसले लेने चाहिए।” यह पूरे अध्याय की धुरी है — अध्याय भर मत मिटाइए।
30–36 मिनट★समाचार-बॉक्स — पोस्को (पृ. 45)। जगतसिंह जिला · धिंकिया, नुआगाँव और गढ़कुजंगा · सौ से ज्यादा स्त्री-पुरुष · माँग: सहमति-पत्र रद्द हो। नारा पढ़िए — “हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर कंपनी को इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।” (द हिंदू, 23 जून 2006)
36–40 मिनट★वामपंथ और दक्षिणपंथ का बॉक्स (पृ. 46) — दो पंक्तियाँ बोर्ड पर। वाम = राज्य नियंत्रण; दक्षिण = खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ार। और बॉक्स का सवाल कक्षा पर छोड़ दीजिए।

गृहकार्य: पृ. 46–48 पढ़कर आइए। तीन मतभेदों के प्रश्न लिखकर लाइए।

कालांश 2 — सहमति, मतभेद और दो मॉडल

पाठ्यपुस्तक: पृ. 46–47

समयगतिविधि
0–4 मिनटपुनरावृत्ति — चार टकराते हित और शीर्षक-वाक्य मौखिक।
4–12 मिनट★दो सहमतियाँ बोर्ड पर। (1) “भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय — दोनों ही हैं।” (2) “इस मामले को व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; सरकार को प्रमुख भूमिका निभानी थी।”
12–22 मिनट★★तीन मतभेद — तीन प्रश्नों के रूप में लिखवाइए। (1) “क्या कोई ऐसा केंद्रीय संगठन ज़रूरी है जो पूरे देश के लिए योजना बनाए?” (2) “क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए?” (3) “अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि के आड़े आता हो तो सामाजिक-न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा?” ★फिर वह पंक्ति: “इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।”
22–30 मिनट★‘विकास’ के अलग-अलग अर्थ। उद्योगपति · शहरी उपभोक्ता · आदिवासी — तीनों के लिए अलग। इसीलिए “‘विकास’ से जुड़ी कोई भी ‘चर्चा’ विवादों से परे नहीं होती।” और पहले दशक की धारणा — “‘विकास’ का अर्थ था ज्यादा-से-ज्यादा आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना।”
30–36 मिनट★★दो मॉडल — बोर्ड पर दो खाने। उदारवादी-पूंजीवादी (यूरोप और अमरीका) बनाम समाजवादी (सोवियत संघ)। ★फिर दो वाक्य: “उस वक्त हिंदुस्तान में बहुत-से लोग विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे” — CPI, सोशलिस्ट पार्टी और खुद नेहरू तक। और “अमरीकी तर्ज़ के पूँजीवादी विकास के पैरोकार बहुत कम थे।”
36–40 मिनट★कार्टून-संवाद (पृ. 47) पर चर्चा: “क्या आप यह कह रहे हैं कि ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?” — 3 मिनट की खुली चर्चा।

गृहकार्य: प्रश्न 2 और 3 हल कीजिए। प्रश्न 5 का उत्तर लिखिए।

कालांश 3 — योजना आयोग और ‘बॉम्बे प्लान’

पाठ्यपुस्तक: पृ. 48–50

समयगतिविधि
0–10 मिनट★★योजना आयोग — तीन बातें रेखांकित करवाइए। (1) “योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है।” — पिछली किताब में उसका ज़िक्र तक नहीं। (2) मार्च 1950 में, एक सीधे-सादे प्रस्ताव के जरिए स्थापित। (3) “यह आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता है और इसकी सिफ़ारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती हैं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंज़ूर करे।” प्रधानमंत्री अध्यक्ष।
10–16 मिनट★प्रस्ताव में उद्धृत तीन नीति-निर्देशक तत्व पढ़िए — (क) आजीविका के साधनों का बराबर अधिकार (ख) भौतिक संसाधनों का बँटवारा सर्वसामान्य की भलाई के लिए (ग) “धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ” — ऐसा न हो। फिर पात्र-प्रश्न कक्षा पर छोड़िए: “क्या योजना आयोग ने इन उद्देश्यों पर अमल किया है?”
16–20 मिनट★कार्टून (पृ. 48) दिखाइए — बादल पर बैठे योजनाकार: “बड़े खुशकिस्मत हैं ये लोग कि हम जैसे लोग इनके लिए विकास योजना बना रहे हैं” — और नीचे गाँव की वास्तविकता। ★यह केंद्रीकृत नियोजन की सबसे तीखी आलोचना है।
20–30 मिनट★★‘बॉम्बे प्लान’ — यही कालांश का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा है। पहले सामान्य धारणा बताइए: “निजी निवेशक… नियोजन के पक्ष में नहीं होते; वे एक खुली अर्थव्यवस्था चाहते हैं।” फिर पलटिए: “लेकिन, भारत में ऐसा नहीं हुआ। 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ… इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है।” ★निष्कर्ष: “चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले।”
30–36 मिनट★नियोजन के पक्ष में वैश्विक हवा — तीन कारण। यूरोप की ‘महामंदी’ का सबक · जापान और जर्मनी का युद्ध के बाद पुनर्निर्माण · सोवियत संघ की 1930–40 के दशक की प्रगति।
36–40 मिनट★पंचवर्षीय योजना का विचार और बजट का दो हिस्सों में बँटवारा — गैरयोजना-व्यय (सालाना, दैनंदिन) बनाम योजना-व्यय (पाँच साल, प्राथमिकताओं के अनुसार)। और फ़ायदा — “सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की एक बड़ी तसवीर होती थी।”

गृहकार्य: प्रश्न 1 और 3 हल कीजिए। योजनाओं का कालक्रम (1951, 1956, 1961, 1966) याद कीजिए।

कालांश 4 — पहली और दूसरी योजना

पाठ्यपुस्तक: पृ. 50–52

समयगतिविधि
0–6 मिनट★कालक्रम बोर्ड पर। 1951 (प्रारूप; नवंबर में वास्तविक दस्तावेज़) → 1956 (दूसरी — गहमागहमी चरम पर) → 1961 (तीसरी) → ! 1966 (चौथी चालू होनी थी, पर नियोजन का नयापन मंद पड़ गया था और भारत गहन आर्थिक संकट की चपेट में आ चुका था; योजना को विराम)।
6–18 मिनट★★प्रथम योजना (1951–56)। लक्ष्य: “देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की कोशिश।” मुख्य ज़ोर — कृषि। बाँध और सिंचाई में निवेश (विभाजन से कृषि को गहरी मार); भाखड़ा-नांगल। ★के.एन. राज की दलील — “अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा।” ★भूमि-सुधार — “देश के विकास की बुनियादी चीज़”।
18–24 मिनट★बचत की समस्या। “राष्ट्रीय आय के स्तर को ऊँचा करना तभी संभव था जब लोगों की बचत उनके खर्चे से ज्यादा हो।” ! पर 1950 के दशक में खर्च का स्तर भी बहुत नीचे था। ★“बचत तीसरी योजना तक बढ़ी, लेकिन उम्मीद के अनुरूप नहीं… 1960 के दशक से 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक बचत में लगातार कमी आई।”
24–34 मिनट★★दूसरी योजना (1956)। भारी उद्योगों पर ज़ोर; पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में तैयार। ★तुलना बोर्ड पर: “पहली योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी।” आयात पर भारी शुल्क (देसी उद्योगों को संरक्षण); बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार — सार्वजनिक क्षेत्र में।
34–40 मिनट★★आँकड़ों की सारणी बोर्ड पर बनवाइए (पृ. 52)। कृषि 15.1 → 11.8 · सिंचाई 17 → 10.1 · उद्योग और खनन 7.6 → 18.5। ★कहिए: “यही पूरा मोड़ है — आँकड़ों में।” फिर ! तीन समस्याएँ और तीन आलोचनाएँ संक्षेप में।

गृहकार्य: प्रश्न 6 का उत्तर लिखिए। महालनोबिस की जीवनी पढ़कर आइए।

कालांश 5 — केरल मॉडल, और प्रश्न 4 की भरपाई

पाठ्यपुस्तक: पृ. 52–53

समयगतिविधि
0–4 मिनट! दूसरी योजना की तीन समस्याएँ दोहराइए। प्रौद्योगिकी में पिछड़ापन (विदेशी मुद्रा खर्च) · उद्योग ने कृषि से ज्यादा निवेश खींचा (खाद्यान्न-संकट की आशंका) · “उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई।” और तीन आलोचनाएँ — शहरों की तरफ़दारी · कृषि की जगह उद्योग · भारी उद्योग की जगह कृषि-आधारित उद्योग।
4–16 मिनट★★‘केरल मॉडल’ — विकेंद्रित नियोजन का विकल्प। पहले वह पंक्ति: “ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो।” ज़ोर किस पर — शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन। ★★फिर विरोधाभास बोर्ड पर: प्रति व्यक्ति आय कम + औद्योगिक आधार कमज़ोर, फिर भी — शत-प्रतिशत साक्षरता · बढ़ी आयु-प्रत्याशा · कम शिशु, मातृ और जन्म-दर · बेहतर चिकित्सा-सुविधा। और ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ (1987–1991); पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं में लोगों की भागीदारी।
16–20 मिनट★जे.सी. कुमारप्पा की जीवनी। असली नाम जे.सी. कॉर्नेलियस · अर्थशास्त्री और चार्टर्ड अकाउंटेंट · गाँधी के अनुयायी · ‘इकॉनोमी ऑफ़ परमानेंस’ के लेखक · योजना आयोग के सदस्य। ★कहिए: “यानी योजना आयोग में गाँधीवादी आवाज़ भी थी — नियोजन एकरंगा नहीं था।”
20–24 मिनट🔄 ‘कुछ आगे की…’ — नीति आयोग। 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आया; पूरा नाम राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था।
24–36 मिनट!! अब प्रश्न 4 की भरपाई — यह हिस्सा छोड़िए मत। कहिए: “प्रश्नावली का प्रश्न 4 चार नाम पूछता है, पर उनमें से तीन इस अध्याय में हैं ही नहीं। वे हटाए गए खंड से हैं। मैं वे चारों अभी बता देता हूँ।” बोर्ड पर चार पंक्तियाँ: चरण सिंह — किसान (किसान-हितों के प्रबल पैरोकार; बाद में प्रधानमंत्री) · पी.सी. महालनोबिस — औद्योगीकरण (दूसरी योजना) · बिहार का अकाल — जोनिंग (1966-67 का अकाल; ‘जोनिंग’ = अनाज की अंतर-राज्यीय आवाजाही पर रोक, जिससे प्रत्येक क्षेत्र अपने अनाज पर निर्भर रहे) · वर्गीज़ कूरियन — सहकारी डेयरी (‘श्वेत क्रांति’ और अमूल के जनक)।
36–40 मिनट★समापन। अध्याय का सारांश एक पंक्ति में और अगले अध्याय की भूमिका।

गृहकार्य: प्रश्न 4 और 7 के उत्तर लिखिए।

शिक्षक के लिए त्वरित संकेत

  • ★★इस अध्याय की धुरी एक ही वाक्य है — “अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए।” हर खंड में उस पर लौटिए: योजना आयोग क्यों सलाहकार है? क्योंकि निर्णय मंत्रिमंडल का है। कार्टून क्यों तीखा है? क्योंकि योजनाकार बादल पर है, ज़मीन पर नहीं।
  • ! प्रश्न 4 की भरपाई मत भूलिए। यदि न बताई जाए तो विद्यार्थी वह प्रश्न हल ही नहीं कर पाएँगे।
  • ★‘बॉम्बे प्लान’ को नाटकीय ढंग से पढ़ाइए। पहले अपेक्षा बनाइए (“उद्योगपति नियोजन नहीं चाहते”), फिर पलटिए। यही वह क्षण है जब कक्षा को समझ आता है कि नियोजन पर कितनी व्यापक सहमति थी।
  • ★आँकड़ों की सारणी (पृ. 52) पूरे अध्याय का सबसे अच्छा प्रमाण है। कम-से-कम तीन पंक्तियाँ — कृषि, सिंचाई और उद्योग — ज़रूर याद कराइए।
  • ! योजना आयोग ‘संवैधानिक निकाय’ नहीं है — यह हर साल की सबसे आम गलती है। दो बार दोहराइए।
  • केरल मॉडल को ‘विकल्प’ के रूप में रखिए, ‘श्रेष्ठ’ के रूप में नहीं। पाठ्यपुस्तक भी उसे विकल्प ही कहती है।