पाठ्यपुस्तक: स्वतंत्र भारत में राजनीति, पृष्ठ 136–156 · पुस्तक का अंतिम अध्याय !! यह अध्याय 9 नवम्बर 2019 के अयोध्या निर्णय, 2019 के लोकसभा चुनाव और 17वीं लोकसभा तक अद्यतन है।
🧭 एक नज़र में
| खंड | पृष्ठ | केंद्रीय बात |
|---|---|---|
| 1990 का दशक | 137–139 | पाँच बड़े बदलाव |
| गठबंधन का युग | 140–143 | 1989 के बाद 11 सरकारें; कोई एकल बहुमत नहीं (2014 तक) |
| OBC का राजनीतिक उदय | 144–147 | मंडल आयोग · इंदिरा साहनी · बामसेफ → बसपा |
| सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता | 148–150 | भाजपा · हिन्दुत्व · शाहबानो · अयोध्या |
| एक नयी सहमति | 150–153 | तीन आरेख + बढ़ती सहमति की चार बातें |
| निष्कर्ष | 154 | “लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी” |
1 · 1990 का दशक — पाँच बड़े बदलाव★★
“1980 के दशक के आखिर के सालों में देश में ऐसे पाँच बड़े बदलाव आए, जिनका हमारी आगे की राजनीति पर गहरा असर पड़ा।”
| # | बदलाव | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| 1 | 1989 में कांग्रेस की हार | 1984 में 415 → 1989 में 197 सीटें; ★‘कांग्रेस प्रणाली’ की समाप्ति; 1991 में मध्यावधि चुनाव |
| 2 | ‘मंडल मुद्दे’ का उदय | 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं; OBC आरक्षण; हिंसक विरोध |
| 3 | नयी आर्थिक नीति | ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम; शुरुआत राजीव गाँधी के समय, 1991 तक व्यापक |
| 4 | अयोध्या का विवाद | धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के विमर्श की दिशा बदली; परिणति 9 नवम्बर 2019 के निर्णय के उपरांत |
| 5 | राजीव गाँधी की हत्या | मई 1991, तमिलनाडु दौरे पर, लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों द्वारा; नरसिम्हा राव PM |
तीसरे बदलाव का महत्वपूर्ण वाक्य★
“बहरहाल इस अवधि में जितनी सरकारें बनीं, सबने नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा।” (यह ‘बढ़ती सहमति’ की पहली बात की जड़ है।)
2 · गठबंधन का युग
1989 का अंकगणित — यह ठीक-ठीक समझिए★
- कांग्रेस हारी, पर किसी दूसरी पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला
- कांग्रेस अब भी सबसे बड़ी पार्टी थी — फिर भी उसने विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया
- राष्ट्रीय मोर्चा = जनता दल + कुछ अन्य क्षेत्रीय दल
- समर्थन दिया परस्पर विरुद्ध दो समूहों ने — भाजपा और वाम मोर्चा
- ★दोनों ने सरकार में शिरकत नहीं की — यह ‘बाहर से समर्थन’ का पहला बड़ा उदाहरण है
1989 बनाम 1996 — ‘छुईमुई’ समीकरण★★
| 1989 | 1996 | |
|---|---|---|
| सरकार | राष्ट्रीय मोर्चा (वी.पी. सिंह) | संयुक्त मोर्चा (देवगौड़ा) |
| समर्थन | भाजपा + वाम मोर्चा | कांग्रेस + वाम मोर्चा |
| उद्देश्य | कांग्रेस को बाहर रखना | भाजपा को बाहर रखना |
★“इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।”
अध्याय का धुरी-वाक्य★★
“1989 के बाद से लोकसभा के चुनावों में कभी भी किसी एक पार्टी को 2014 तक पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बदलाव के साथ केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। यद्यपि, पुनः 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनावों में भा.ज.पा. दल को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ है।”
‘11 सरकारें’
“1989 के चुनावों से भारत में गठबंधन की राजनीति के एक लंबे दौर की शुरुआत हुई। इसके बाद से केंद्र में 11 सरकारें बनीं। ये सभी या तो गठबंधन की सरकारें थीं अथवा दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें थीं।” “इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी।” ! “हालांकि, 2014 में यह प्रवृत्ति बदल गयी है।”
केंद्रीय सरकार 1989 के बाद(यह सारणी अवश्य याद कीजिए)★★★
| अवधि | गठबंधन / सरकार | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|
| दिसंबर 1989 – नवंबर 1990 | राष्ट्रीय मोर्चा; वाम मोर्चा और भाजपा का समर्थन | वी.पी. सिंह |
| नवंबर 1990 – जून 1991 | समाजवादी जनता पार्टी; कांग्रेस का समर्थन | चंद्रशेखर |
| जून 1991 – मई 1996 | कांग्रेस; AIADMK तथा अन्य का समर्थन | पी.वी. नरसिम्हा राव |
| मई 1996 – जून 1996 | भाजपा — अल्पमत सरकार | अटल बिहारी वाजपेयी |
| जून 1996 – अप्रैल 1997 | संयुक्त मोर्चा; कांग्रेस का समर्थन | एच.डी. देवगौड़ा |
| अप्रैल 1997 – मार्च 1998 | संयुक्त मोर्चा; कांग्रेस का समर्थन | इंद्रकुमार गुजराल |
| मार्च 1998 – अक्तूबर 1999 | भाजपा-नीत राजग | अटल बिहारी वाजपेयी |
| अक्तूबर 1999 – मई 2004 | भाजपा-नीत राजग | अटल बिहारी वाजपेयी |
| मई 2004 – मई 2014 | कांग्रेस-नीत संप्रग | मनमोहन सिंह |
| मई 2014 के बाद | भाजपा-नीत राजग | नरेंद्र मोदी |
★1999 की राजग सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया।
3 · अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिक उदय
‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की परिभाषा★
- OBC = ‘अदर बैकवर्ड क्लासेज़’ — विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि
- ★★यह अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति से अलग एक कोटि है
- इसमें शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना होती है
- इन्हें ‘पिछड़ा वर्ग’ भी कहा जाता है
मंडल आयोग — पूरा क्रम★★
| चरण | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | दक्षिण के राज्यों में 1960 के दशक से OBC आरक्षण; ! उत्तर भारत में नहीं |
| आवाज़ | 1977–79 की जनता पार्टी सरकार के समय उत्तर भारत में राष्ट्रीय स्तर पर माँग |
| अग्रणी | ★बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर — बिहार में OBC आरक्षण की नयी नीति |
| गठन | 1978 में केंद्र सरकार ने आयोग बैठाया |
| नाम | आज़ादी के बाद दूसरा अवसर → ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’; अध्यक्ष बी.पी. मंडल → ‘मंडल कमीशन’ |
| रिपोर्ट | 1980 में सिफ़ारिशें — तब तक जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी |
| मशविरा | पिछड़ा वर्ग को ‘पिछड़ी जाति’ के अर्थ में स्वीकार किया जाए |
| सर्वेक्षण | शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी |
| मुख्य सिफ़ारिश | ★★शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित |
| अन्य सुझाव | ★“कई और समाधान सुझाए जिनमें भूमि-सुधार भी एक था” |
| लागू | अगस्त 1990 — राष्ट्रीय मोर्चा सरकार; केंद्रीय सरकार और उपक्रमों की नौकरियों में |
| विरोध | उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध |
| न्यायालय | ‘इंदिरा साहनी केस’; नवंबर 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सही ठहराया |
| सहमति | ★“अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मसले पर देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों में सहमति थी” |
📦 बी.पी. मंडल (1918–1982)
- 1967–1970 तथा 1977–1979 में बिहार से सांसद
- दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष; बिहार के समाजवादी नेता
- ★1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री; 1977 में जनता पार्टी में शामिल
4 · दलित राजनीति
बामसेफ से बसपा तक★
| वर्ष / चरण | विवरण |
|---|---|
| 1978 | ‘बामसेफ’ का गठन — बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज़ कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन |
| ! “यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण-सा ट्रेड यूनियन नहीं था” | |
| ‘बहुजन’ | ★अनुसूचित जाति + अनुसूचित जनजाति + अन्य पिछड़ा वर्ग + अल्पसंख्यक |
| परवर्ती विकास | ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ |
| बसपा | इससे बहुजन समाज पार्टी का उदय; अगुआई कांशीराम ने की |
| आरंभिक आधार | पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के दलित मतदाता |
| सफलता | ★1989 और 1991 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में |
★★“आज़ाद भारत में यह पहला मौका था, जब कोई राजनीतिक दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता हासिल कर पाया था।”
बसपा का तर्क
- संगठन की बुनियाद व्यवहार केंद्रित नीतियों पर
- बहुजन देश की आबादी में सबसे ज्यादा हैं → संख्या के लिहाज़ से मजबूत राजनीतिक ताकत
- बसपा उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत बनी; एक से ज्यादा दफे सरकार बनायी
- ★“भारत के कई हिस्सों में दलित राजनीति और अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने स्वतंत्र रूप धारण किया है और इन दोनों के बीच अक्सर प्रतिस्पर्धा भी चलती है।”
📦 कांशीराम (1934–2006)
- बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक; बसपा के संस्थापक
- सामाजिक-राजनीतिक कार्य के लिए केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफ़ा
- बामसेफ → डीएस-4 → 1984 में बसपा की स्थापना; कुशाग्र रणनीतिकार
- ★“आप राजनीतिक सत्ता को सामाजिक समानता का आधार मानते थे”
5 · सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र
भाजपा का उदय
- आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय
- जनता पार्टी के बिखराव के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी
- आरंभ में जनसंघ की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक पटल
- विचारधारा — गांधीवादी समाजवाद + सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- ! 1984 के चुनावों में बहुत सफलता नहीं
- 1986 के बाद — राष्ट्रवाद पर विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल; हिन्दुत्व की राजनीति भी अपनाई
‘हिन्दुत्व’ — पाठ्यपुस्तक की परिभाषा★★
“हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया था। इसका मूल आशय यह था कि एक भारतीय होने के लिए आवश्यक है कि वह भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे। हिंदुत्व के विश्वासियों का तर्क है कि एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण एक संगठित राष्ट्रीय संस्कृति के आधार पर संभव है।”
शाहबानो वाद (1985)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| वादी | एक 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला |
| माँग | भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता |
| निर्णय | सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में |
| प्रतिक्रिया | पुरातन पंथी मुसलमानों ने इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना |
| क़ानून | मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 — SC के निर्णय को निरस्त |
| विरोध | ★“अनेक महिला संगठनों, अनेक मुस्लिम समूहों तथा अधिकांश बुद्धिजीवियों ने विरोध किया” |
| भाजपा | इसे “अल्पसंख्यक समुदाय को दी गयी अनावश्यक छूट और उसका तुष्टिकरण” बताया |
अयोध्या — पूरी समय-रेखा(पाठ्यपुस्तक के अनुसार)★★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1528 | श्री राम के जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित; 500 वर्ष के इतिहास में अनेक संघर्ष — लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित |
| 28 नवंबर 1858 | 📦 निहंग सिखों ने स्थल पर नियंत्रण कर पूजन और हवन किया |
| 1949 | ! न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ होने के कारण ढाँचा सील |
| 1986 | ★फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के निर्णय से ताला खुला, पूजा की अनुमति |
| — | मन्दिर का शिलान्यास हुआ, किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा |
| 1992 | ! ढाँचे का ध्वंस — “कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है” |
| 9 नवम्बर 2019 | ★★उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ का 5–0 निर्णय |
‘विधिक कार्यवाही से मैत्रीपूर्ण स्वीकृति’★★
मुख्य वाक्य:
“एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में इन विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है।”
रास्ते: न्यायालय में सुनवाईयां · मध्यस्थता के प्रयास · जन आन्दोलन
निर्णय के दो आदेश:
- श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को विवादित स्थल राम मन्दिर निर्माण के लिए आवंटित
- संबंधित सरकार सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटित करे
पाठ्यपुस्तक का मूल्यांकन: “यह विषय पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे साक्ष्यों के आधार पर विधि की उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सुलझाया गया।… यह भारत के सभ्यतागत स्वभाव में निहित लोकतान्त्रिक प्रकृति की परिपक्वता को प्रदर्शित करता है।”
न्यायालय का अवतरण(निर्णय, पृष्ठ 920)★
“संविधान एक धर्म और दूसरे धर्म की आस्था और विश्वास के बीच अंतर नहीं करता है। सभी प्रकार के विश्वास, पूजा और प्रार्थना समान हैं…”
6 · तीन आरेख★★
आरेख 1 — सीटें
| वर्ष | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|
| 1984 | 2 | 415 |
| 1989 | 85 | 197 |
| 1991 | 120 | 232 |
| 1996 | 160 | 140 |
| 1998 | 182 | 141 |
| 1999 | 182 | 114 |
| 2004 | 138 | 145 |
| 2009 | 116 | 206 |
| 2014 | 282 | 44 |
| 2019 | 303 | 52 |
आरेख 2 — वोट में हिस्सा (%)
| वर्ष | कांग्रेस | भाजपा |
|---|---|---|
| 1984 | 48.1 | 7.4 |
| 1989 | 39.5 | 11.4 |
| 1991 | 36.4 | 20.1 |
| 1996 | 28.8 | 20.3 |
| 1998 | (अंकित नहीं) | 25.6 |
| 1999 | 28.3 | 23.8 |
| 2004 | 26.5 | 22.2 |
| 2009 | 28.6 | 18.8 |
| 2014 | 19.5 | 31.3 |
| 2019 | 19.5 | 37.4 |
! 1998 पर दोनों रेखाएँ लगभग मिल जाती हैं; आरेख में वहाँ केवल एक अंक 25.6 छपा है।
★★पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष: “1989 के चुनाव के बाद से, 1996, 2004 और 2009 को छोड़कर ज्यादातर समय दोनों पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को मिले वोटों का योग 50 फीसदी से ज्यादा रहा है।”
आरेख 3 — 17वीं लोकसभा में दलों की स्थिति
| दल | सीटें | हिस्सा |
|---|---|---|
| भारतीय जनता पार्टी | 303 | 56% |
| इंडियन नेशनल कांग्रेस | 52 | 10% |
| द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम | 24 | 4% |
| शिवसेना | 18 | 3% |
| जनता दल यूनाईटेड | 16 | 3% |
| बीजू जनता दल | 12 | 2% |
| बहुजन समाज पार्टी | 10 | 2% |
| अन्य पार्टियाँ | 108 | 20% |
📊 सन् 2004 से संसद में दलीय स्थिति(चुनिंदा पंक्तियाँ)
| पार्टी | 2004 | 2009 | 2014 | 2019 |
|---|---|---|---|---|
| भारतीय जनता पार्टी | 138 | 116 | 282 | 303 |
| इंडियन नेशनल कांग्रेस | 145 | 206 | 44 | 52 |
| ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम | 0 | 9 | 37 | 1 |
| बहुजन समाज पार्टी | 19 | 21 | – | 10 |
| समाजवादी पार्टी | 36 | 23 | 5 | 5 |
| CPI(M) | 43 | 16 | 9 | 3 |
| CPI | 10 | 4 | 1 | 2 |
| अन्य | 54 | 60 | 98 | 82 |
| कुल | 543 | 543 | 543 | 543 |
कुल सदस्य 543 = राज्यों से 530 + केंद्रशासित प्रदेशों से 13
7 · लोकसभा चुनाव 2004–2019
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 2004 | कांग्रेस पूरे ज़ोर से गठबंधन में; राजग की हार; संप्रग सरकार; वाम मोर्चा का समर्थन; ! राजग और संप्रग के कुल वोटों का अंतर बड़ा कम |
| जुलाई 2008 | भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया — फिर भी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया |
| 2009 | 15वीं लोकसभा; कांग्रेस 145 → 206; मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल |
| सितंबर 2013 | भाजपा ने नरेंद्र मोदी को PM पद का उम्मीदवार घोषित किया |
| 2014 | 16वीं लोकसभा; भाजपा को अपने दम पर 282; ★“30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी”; फिर भी राजग सरकार का विकल्प चुना |
| 2019 | भाजपा 303 सीटों के साथ फिर विजयी |
★★“जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है तब भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।”
8 · बढ़ती सहमति — चार बातें★★
| # | बात | सार |
|---|---|---|
| 1 | नयी आर्थिक नीति पर सहमति | कुछ समूह खिलाफ़, पर ज्यादातर दल पक्ष में; मान्यता कि इससे देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की आर्थिक शक्ति बनेगा |
| 2 | पिछड़ी जातियों के दावे की स्वीकृति | ★“आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं”; OBC को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी |
| 3 | प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति | ★“प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद अब लगातार कम होता जा रहा है” |
| 4 | विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि | दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर ज़ोर; अधिकतर दल ‘हिंदुत्व’ से सहमत नहीं, फिर भी गठबंधन में शामिल हुए और सरकार पाँच साल चली |
9 · निष्कर्ष
- राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तेज़ है — पर मुख्य दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है
- जन आंदोलन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीके पहचान रहे हैं
- मुद्दे — गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा
- “ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं”
- लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं
★★अंतिम वाक्य: “हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी और यह राजनीति इस अध्याय में वर्णित कुछ चीज़ों के मंथन के बीच आकार ग्रहण करेगी।”
📌 अंतिम-मिनट की जाँच-सूची
- पाँचों बदलाव क्रम से
- 415 → 197 और ‘कांग्रेस प्रणाली’ की समाप्ति
- “जितनी सरकारें बनीं, सबने नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा”
- 1989 का अंकगणित और ‘बाहर से समर्थन’
- 1989 बनाम 1996 की सारणी
- ★★‘केंद्रीय सरकार 1989 के बाद’ की दसों पंक्तियाँ
- OBC की परिभाषा (SC/ST से अलग)
- कर्पूरी ठाकुर · 1978 · 1980 · 27 प्रतिशत · भूमि-सुधार
- इंदिरा साहनी केस — नवंबर 1992
- बामसेफ 1978 · ‘बहुजन’ की परिभाषा · कांशीराम · 1984
- हिन्दुत्व की परिभाषा — सावरकर, ‘पितृभूमि’ और ‘पुण्यभूमि’
- शाहबानो और 1986 का अधिनियम + दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया
- अयोध्या की पूरी समय-रेखा — 1528, 1858, 1949, 1986, 1992, 9 नवम्बर 2019
- 5–0 निर्णय के दोनों आदेश
- ★★तीनों आरेख के आँकड़े
- ★★बढ़ती सहमति की चारों बातें
- 282 और 303 · “30 साल बाद पहला एकल बहुमत”
- अंतिम वाक्य