Chapter 5कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

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यह दस्तावेज़ केवल शिक्षक के लिए है। इसमें पढ़ाने का क्रम, कठिन बिंदु, अपेक्षित भ्रांतियाँ, बोर्ड-कार्य और संवेदनशील विषयों को सँभालने के सुझाव हैं।

1 · इस अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी

★★“इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।” (पृ. 89)

यह वाक्य पहले दिन बोर्ड के कोने में लिख दीजिए और अध्याय भर मत मिटाइए। हर पड़ाव पर उस पर लौटिए —

  • 1967 में क्या टूटा? → प्रभुत्व।
  • 1969 में क्या टूटा? → संगठन।
  • 1971 में क्या लौटा? → ★केवल प्रभुत्व — संगठन नहीं।

2 · अध्याय का तर्क-प्रवाह — पाँच पड़ावों में

पड़ावक्या स्थापित होता हैपृष्ठ
1. उत्तराधिकार★भारत ने दो बार उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल किया73–75
2. 1967 का जनादेश‘राजनीतिक भूकंप’ — कांग्रेस को हराया जा सकता है76–79
3. गठबंधन और दल-बदलदो नयी परिघटनाएँ जन्मीं80–81
4. 1969 की टूट★★सत्ता-संघर्ष विचारधारात्मक संघर्ष में बदला और पार्टी दो हो गई82–85
5. 1971 और पुनर्स्थापन★★कांग्रेस लौटी — पर एक अलग कांग्रेस86–89

★★इस अध्याय की सबसे बड़ी शिक्षण-खूबी यह है कि इसका उत्तर उसके शीर्षक में ही है। ‘चुनौतियाँ’ — तीन तरह की: चुनावी (1967), संगठनात्मक (1969), और वैचारिक। ‘पुनर्स्थापना’ — केवल पहली की।

3 · ✓ पढ़ाने से पहले — दो अच्छी ख़बरें

3.1 ✓ इस अध्याय में कोई अनाथ क्रॉस-रेफ़रेंस नहीं है

पृष्ठसंदर्भ✓ जाँच
72“इस किताब के दूसरे अध्याय में… कांग्रेस प्रणाली के उद्भव”✓ अध्याय 2
74“इसके बारे में आपने पिछले अध्याय में पढ़ा था” (1965 का युद्ध)✓ अध्याय 4
76“दूसरे अध्याय में आप पढ़ चुके हैं कि 1952 के बाद से…”✓ अध्याय 2
77“इस अध्याय के पूर्ववर्ती हिस्से और तीसरे अध्याय की चर्चा”✓ अध्याय 3
★77“आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि… मार्क्सवादी-लेनिनवादी… सशस्त्र कृषक-विद्रोह”✓ अध्याय 6 (पृ. 94) में सत्यापित — वहाँ लिखा है: “ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए”
83“पहले अध्याय में आपने देसी रियासतों के विलय के बारे में पढ़ा था”✓ अध्याय 1
88“चौथे अध्याय में आप पढ़ चुके हैं कि 1971 के चुनावों के बाद…”✓ अध्याय 4
89“अगले अध्याय में आप पढ़ेंगे कि कैसे इन बातों से एक राजनीतिक संकट…”✓ अध्याय 6

3.2 ✓ इस अध्याय में कोई स्पष्ट तथ्यात्मक त्रुटि नहीं मिली

तिथियाँ, नाम और आँकड़े — तीनों आंतरिक रूप से संगत हैं और बाहरी स्रोतों से भी मेल खाते हैं।

★यह विद्यार्थी को बताइए — इससे उनका पाठ्यपुस्तक पर भरोसा बढ़ता है, और वे बेवजह ‘गाइड’ नहीं खोजते।

4 · बोर्ड-कार्य — छह ढाँचे

ढाँचा 1 — दो उत्तराधिकार(कालांश 1)

1964 — शास्त्री1966 — इंदिरा गाँधी
प्रक्रियाकामराज का सलाह-मशविरागुप्त मतदान
परिणामनिर्विरोधदो-तिहाई से अधिक मत

★नीचे लिखिए: “दोनों बार शांतिपूर्ण — ‘भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता’।”

ढाँचा 2 — 1967 के आठ आर्थिक कारक(कालांश 2)

मानसून की असफलता · सूखा · पैदावार में गिरावट · खाद्य संकट · विदेशी मुद्रा में कमी · औद्योगिक उत्पादन में गिरावट · निर्यात में गिरावट · ★सैन्य खर्च में भारी बढ़ोतरी ★अंतिम को अध्याय 3 और 4 से जोड़िए — तीनों अध्याय यहीं मिलते हैं।

ढाँचा 3 — नौ राज्य(कालांश 3)

पंजाब · हरियाणा · उत्तर प्रदेश · मध्य प्रदेश · बिहार · पश्चिम बंगाल · उड़ीसा · मद्रास · केरल ★साथ में लिखिए: “7 में बहुमत नहीं + 2 में दलबदल = 9”।

ढाँचा 4 — सिंडिकेट के पाँच नाम(कालांश 3)

नेताप्रांत
के. कामराज (अगुवा)मद्रास
एस.के. पाटिलबंबई सिटी
एस. निजलिंगप्पामैसूर
एन. संजीव रेड्डीआंध्र प्रदेश
अतुल्य घोषपश्चिम बंगाल
★तीन नाम (कामराज, पाटिल, घोष) 1967 में स्वयं चुनाव हारे — यह घेर दीजिए।

ढाँचा 5 — 1969 का क्रम(कालांश 4)

ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु → संजीव रेड्डी (आधिकारिक) → वी.वी. गिरि (स्वतंत्र) → ‘व्हिप’ बनाम ‘अंतरात्मा की आवाज़’ → गिरि की जीत → निष्कासन → कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)

ढाँचा 6 — दो नारे(कालांश 5)

“इंदिरा हटाओ”“गरीबी हटाओ”
नकारात्मक · एक व्यक्ति के बारे में · कोई कार्यक्रम नहींसकारात्मक · जनता के बारे में · पूरा कार्यक्रम

★★यह जोड़ी अध्याय के अंत तक बोर्ड पर रहनी चाहिए।

5 · कठिन बिंदु और उन्हें कैसे सँभालें

5.1 1967 और 1969 को गड्डमड्ड होने से बचाइए — यह सबसे बड़ी भूल हैध्यान★★

विद्यार्थी मान लेते हैं कि कांग्रेस 1967 में ही टूट गई। ✓ साफ़ कहिए: “1967 = चुनावी हार। 1969 = पार्टी की टूट। बीच में दो साल हैं।” ★और यह ज़रूरी क्यों है: प्रश्न 6 का विकल्प (ख) — “कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट” — ठीक इसी भूल की जाँच करता है। वह 1967 की हार का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि टूट बाद में हुई।

बोर्ड पर एक रेखा खींचकर तीन बिंदु लगाइए: 1967 (हार) — 1969 (टूट) — 1971 (वापसी)।

5.2 कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) — उलट जाने से बचाइएध्यान

! अक्सर उलटा याद रहता है✓ सही
—(ओ) = ऑर्गनाइजेशन = सिंडिकेट = पुरानी कांग्रेस
—(आर) = रिक्विजिनिस्ट = इंदिरा गाँधी = नयी कांग्रेस

★तरकीब: “O” से Old — यानी पुरानी। यह अंग्रेज़ी की मदद से हिन्दी में भी याद रह जाता है।

5.3 “सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया” — इसे नाटकीय ढंग से पढ़ाइए★★

दो चरणों में जाइए:

  1. पहले प्रश्न रखिए: “मान लीजिए दो नेता आपस में लड़ रहे हैं कि पार्टी पर किसका नियंत्रण हो। इससे आम मतदाता को क्या फ़र्क़ पड़ता है?” → कक्षा कहेगी: कुछ नहीं।
  2. फिर पलटिए: “अब मान लीजिए वही लड़ाई ‘गरीबों के हिमायती बनाम अमीरों के तरफ़दार’ बन जाए। अब?”

★★यही इंदिरा गाँधी की पूरी रणनीति है, और यही अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य। इसके बाद दस-सूत्री कार्यक्रम, बैंक-राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स — तीनों अपने-आप समझ में आ जाते हैं।

5.4 ‘अंतरात्मा की आवाज़’ — इसे तटस्थ रहकर पढ़ाइए★

यह प्रसंग आसानी से “इंदिरा गाँधी सही या गलत” की बहस बन जाता है। ! उसे वहाँ मत जाने दीजिए।

★सही ढाँचा: “दोनों पक्षों के तर्क सुनिए। व्हिप का पक्ष: पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार है, अनुशासन ज़रूरी है। अंतरात्मा का पक्ष: राष्ट्रपति देश का होता है, दल का नहीं; और यह गुप्त मतदान है। अब आप तय कीजिए — पर तर्क के साथ।” ★★यह प्रश्न 5 का सर्वोत्तम अभ्यास है।

5.5 ‘प्रिवी पर्स’ बॉक्स — इसे ‘तीन दरवाज़ों’ की कहानी बनाइए★

बोर्ड पर लिखिए: संसद ✗ → अदालत ✗ → जनता ✓ 1970 में राज्यसभा में विफल → अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय से निरस्त → 1971 की जीत के बाद संविधान संशोधन। ★कक्षा से पूछिए: “इससे लोकतंत्र के बारे में क्या पता चलता है?” — उत्तर की दोनों दिशाएँ स्वीकारिए: (क) अंतिम अदालत जनता है; (ख) पर बड़ा बहुमत संविधान भी बदल सकता है — और यही अगले अध्याय की चिंता है।

5.6 अंतिम अनुच्छेद (पृ. 89) मत छोड़िए — यही अध्याय की आत्मा है★★

शिक्षक अक्सर 1971 की जीत पर अध्याय समाप्त कर देते हैं। ! यह सबसे बड़ी चूक होगी।

यह वाक्य ज़रूर लिखवाइए: “कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी… लेकिन नयी कांग्रेस… इस क्षमता से हीन थी। …जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।” ★★और फिर एक सामान्य नियम बताइए: “जो संस्था असहमति को अपने भीतर जगह देती है, वह असहमति को व्यवस्था के भीतर रखती है। जो असहमति को बाहर धकेलती है, वह उसे सड़क पर पहुँचा देती है।” यही अध्याय 5 और अध्याय 6 के बीच का पुल है।

5.7 कार्टून — इस अध्याय में वे केवल सजावट नहीं हैं★

कार्टूनक्या पढ़ाना है
पृ. 72 — लक्ष्मण, 22 वर्ष★★पूरा अध्याय एक चित्र में — दो बैलों की जोड़ी बिखर जाती है
पृ. 75 — लक्ष्मण, 18 जनवरी 1966★इंदिरा गाँधी मंच पर, पर ‘M’ दौड़ फिर शुरू कर रहा है — प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई
पृ. 83 — लक्ष्मण, 21 अगस्त 1969★★पाठ का अपना प्रश्न पूछिए: “इंदिरा गाँधी को दस्ताना पहने क्यों दिखाया गया है?”
पृ. 85 — विजयन, 20 जुलाई 1969“Bapu’s wish was to see the Congress DISSOLVED” — दोनों ‘असली कांग्रेस’ का दावा कर रहे हैं
पृ. 87 — ‘द ग्रैंड फिनिश’★तीनों पदक इंदिरा गाँधी के; विपक्ष को विश्वास ही नहीं हो रहा
पृ. 88 — कुट्टी★★मुख्यमंत्री कारखाने की पट्टी पर — केंद्रीकरण का सबसे तीखा चित्र

6 · संवेदनशील विषय — कैसे सँभालेंध्यान

विषयपाठ्यपुस्तक का रुख★शिक्षक के लिए सुझाव
!! इंदिरा गाँधी का मूल्यांकनपाठ दोनों पक्ष दर्ज़ करता है — असाधारण राजनीतिक कौशल और केंद्रीकरण की कीमत★★वही संतुलन रखिए। “महज चार साल में चुनौतियों को धूल चटा दी” और “लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई” — दोनों वाक्य एक ही अध्याय के हैं। दोनों पढ़ाइए। ! किसी एक पक्ष को कक्षा पर मत थोपिए।
! सिंडिकेट बनाम इंदिरा गाँधीपाठ किसी को खलनायक नहीं बनातायही करिए। सिंडिकेट ने दो बार सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण करवाया — यह उसकी उपलब्धि है। और वह अनौपचारिक शक्ति-केंद्र भी था — यह उसकी समस्या।
! ‘गैर-कांग्रेसवाद’ और आज की राजनीतिपाठ हाशिये में स्वयं पूछता है — “क्या आज गैर-कांग्रेसवाद प्रासंगिक है?”★सिद्धांत पर रहिए, वर्तमान दलों के नाम मत लीजिए। प्रश्न यह है: “क्या केवल ‘किसके विरुद्ध’ होने से बना गठबंधन टिक सकता है?” — और उसका उत्तर 1971 में मिल चुका है।
! जाति और चुनाव (देवीसर गाँव का बॉक्स)पाठ इसे तथ्य के रूप में और बिना निंदा के दर्ज़ करता है★★वही ढंग अपनाइए। यह बॉक्स दिखाता है कि लोकतंत्र गाँव के स्तर पर कैसे काम करता है — किसी समुदाय पर टिप्पणी नहीं है। ! कक्षा को जाति-चर्चा में मत उतरने दीजिए; ध्यान ‘स्थानीय समीकरण बनाम राष्ट्रीय दल’ पर रखिए।
! प्रिवी पर्स और राजा-महाराजापाठ दोनों तर्क देता है — “उस वक्त एकता-अखंडता का लक्ष्य प्रमुख था” और “ये वंशानुगत विशेषाधिकार… समानता के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते थे”★मोरारजी देसाई का तर्क भी ज़रूर पढ़िए — “रियासतों के साथ विश्वासघात”। एक ही निर्णय के नैतिक और संवैधानिक पक्ष अलग हो सकते हैं — यह सिखाने का अच्छा मौका है।
! महिला-नेतृत्व वाला प्रश्न (पृ. 76)पाठ पूछता है — “ऊँचे पदों पर अपने देश में ज्यादा महिलाएँ क्यों नहीं हैं?”★इसे टालिए मत। पाँच मिनट की चर्चा दीजिए, पर उसे व्यक्ति-केंद्रित न होने दीजिए — प्रश्न संरचना का है, किसी एक नेता का नहीं।

7 · पाठ में ध्यान देने योग्य बातें

#कहाँक्या
1प्रश्न 1चार में से केवल (क) सही है — बाकी तीनों में तथ्यात्मक चूक है
2प्रश्न 4! (ख) गलत है क्योंकि पाठ कहता है “‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था”; (ग) गलत है क्योंकि सीपीआई कांग्रेस के साथ थी
3प्रश्न 5 और 10★ये मत-आधारित हैं — तर्क सिखाइए, राय मत थोपिए
4!★★प्रश्न 6(ख)“पार्टी के भीतर टूट” — यह 1967 की हार का कारण नहीं है, क्योंकि टूट 1969 में हुई। यही इस प्रश्न का जाल है।
5पृ. 79 का मानचित्र! पाठ की नोट पढ़वाइए: “इसे प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए”; और राजस्थान का विशेष मामला दिखाइए
6पृ. 82 का हाशिया★“मैं तो सोचती थी कि ऐसा केवल 1990 के दशक में हुआ” — गठबंधन-राजनीति की जड़ 1967 में है
7पृ. 89 का हाशिया★★“मकान की बुनियाद और छत बदल दे…” — यह प्रश्न पूरे अध्याय का सारांश है
8जीवनी-बॉक्स★आठ बॉक्स हैं — शास्त्री, इंदिरा गाँधी, अन्नादुरई, लोहिया, कामराज, निजलिंगप्पा, कर्पूरी ठाकुर, वी.वी. गिरि। ! कर्पूरी ठाकुर का बॉक्स अक्सर छूट जाता है

8 · मूल्यांकन-सुझाव

8.1 कक्षा में मौखिक जाँच(हर कालांश के अंत में 2 मिनट)

कालांशपूछिए
1“‘खतरनाक दशक’ क्यों? 1964 और 1966 में उत्तराधिकार कैसे तय हुआ?”
2“‘राजनीतिक भूकंप’ किसने कहा और क्यों? ‘गैर-कांग्रेसवाद’ नाम किसने दिया?”
3“नौ राज्य कौन-से? डीएमके क्यों जीती? ‘आया राम-गया राम’ किससे जुड़ा है?”
4“1969 के राष्ट्रपति चुनाव में दो उम्मीदवार कौन? कांग्रेस (ओ) किसका खेमा है?”
5“375, 352 और 16 — किसकी सीटें? नयी कांग्रेस में क्या नहीं था?”

8.2 लिखित मूल्यांकन का ढाँचा

प्रकारअंकअनुशंसित प्रश्न
वस्तुनिष्ठ1×6NCERT प्रश्न 1, 2, 3 और 4 (ये स्वयं वस्तुनिष्ठ हैं)
लघु2×4दल-बदल की परिभाषा · ‘गैर-कांग्रेसवाद’ · दस-सूत्री कार्यक्रम · प्रिवी पर्स
दीर्घ4×2NCERT प्रश्न 7 और 8
निबंधात्मक6×1NCERT प्रश्न 9 (1969 की टूट के मसले) — या “पुनर्स्थापित किया, पर प्रकृति बदलकर”
स्रोत-आधारित5×1NCERT प्रश्न 10 (कविराज का अवतरण) — या 05-Question-Bank का खंड ख.5

8.3 परियोजना-कार्य के तीन सुझाव★

  1. ★★‘नारों की सूची’ — पाठ्यपुस्तक स्वयं यह सुझाव देती है (खुद करें-खुद सीखें)। विद्यार्थी दस राजनीतिक नारे इकट्ठा करें और हर एक के सामने लिखें: वह किसके पक्ष में है, किसके विरुद्ध, और उसमें कोई ठोस कार्यक्रम है या नहीं। ★‘इंदिरा हटाओ’ बनाम ‘गरीबी हटाओ’ को नमूने के रूप में दीजिए।
  2. ★‘हमारे राज्य में 1967’ — विद्यार्थी पता करें कि 1967 में उनके अपने राज्य में क्या हुआ था — किसकी सरकार बनी, कितने दिन चली। (पृ. 79 का मानचित्र इसका आधार है।)
  3. ★‘कार्टून पढ़ना’ — इस अध्याय के छह कार्टूनों में से कोई तीन चुनकर विद्यार्थी तीन-तीन पंक्तियों में लिखें कि कार्टूनिस्ट क्या कह रहा है और वह पाठ के किस वाक्य से मेल खाता है।

9 · समय की तंगी हो तो — क्या छोड़ें, क्या नहीं

✓ कभी मत छोड़िए! संक्षेप में कर सकते हैं
★★पृ. 72 का 22-वर्ष वाला कार्टून‘The Void’ कार्टून (पर उल्लेख ज़रूर)
★‘खतरनाक दशक’ के चार कारणतीनों अंतर्राष्ट्रीय आशंकाओं का विस्तार
★★1964 निर्विरोध / 1966 गुप्त मतदान‘गार्जियन’ का संपादकीय (पर एक पंक्ति ज़रूर)
★शास्त्री का रेल-दुर्घटना वाला इस्तीफ़ाशास्त्री-बॉक्स का पूरा विवरण
★★सिंडिकेट की गणना — “इंदिरा गाँधी उन पर निर्भर रहेंगी”आठों आर्थिक कारक (पर खाद्य संकट और सैन्य खर्च ज़रूर)
★अवमूल्यन 5→7मैक्सवेल का अवतरण
★★‘राजनीतिक भूकंप’ और चार दिग्गजों की हारदेवीसर गाँव का पूरा बॉक्स (पर निष्कर्ष-वाक्य ज़रूर)
★★गैर-कांग्रेसवाद और लोहिया का तर्कअन्नादुरई-बॉक्स का विस्तार
★★नौ राज्य और डीएमके की पहली पूर्ण-बहुमत जीतपंजाब के गठबंधन का पूरा विवरण
★दल-बदल की परिभाषा और ‘आया राम-गया राम’कुट्टी का 1974 वाला कार्टून
★★सिंडिकेट के पाँच नामकर्पूरी ठाकुर का बॉक्स
★★“सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया”दस-सूत्री कार्यक्रम के सभी छह प्रावधान (पर बैंक और भूमि-सुधार ज़रूर)
★★1969 का पूरा क्रम और कांग्रेस (ओ)/(आर)निजलिंगप्पा का पूरा अवतरण (पर ‘आत्ममोह’ वाला वाक्यांश ज़रूर)
★प्रिवी पर्स के तीन दरवाज़ेप्रिवी पर्स की गणना-विधि
★★“इंदिरा हटाओ” बनाम “गरीबी हटाओ”ग्रैंड अलायंस के सभी पाँच घटक (पर ‘गैर-कम्युनिस्ट’ ज़रूर)
★★375 / 352 / 16 के आँकड़े‘द ग्रैंड फिनिश’ कार्टून
★★अंतिम अनुच्छेद (पृ. 89) — “पचा लेने की क्षमता”‘ज़ंजीर’ का पूरा कथानक (पर ‘गुस्सैल नौजवान नायक’ ज़रूर)

10 · एक पंक्ति में — यदि केवल पाँच मिनट हों

नेहरू की मृत्यु (1964) के बाद जो सबसे बड़ा डर था — कि भारत उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा — वह गलत साबित हुआ: शास्त्री निर्विरोध चुने गए और 1966 में इंदिरा गाँधी गुप्त मतदान से। पर 1967 का चौथा आम चुनाव एक ‘राजनीतिक भूकंप’ था — कांग्रेस केंद्र में जैसे-तैसे बची, पर नौ राज्यों में सत्ता से बाहर हो गई, और मद्रास में डीएमके ने पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत दिलाया। इससे दो नयी परिघटनाएँ जन्मीं — गठबंधन और दल-बदल। फिर असली चुनौती भीतर से आई: इंदिरा गाँधी बनाम सिंडिकेट। उन्होंने एक साधारण सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया — दस-सूत्री कार्यक्रम, चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति। 1969 का राष्ट्रपति चुनाव निर्णायक मोड़ बना: ‘व्हिप’ के विरुद्ध ‘अंतरात्मा की आवाज़’ का आह्वान हुआ, वी.वी. गिरि जीते, और पार्टी कांग्रेस (ओ) तथा कांग्रेस (आर) में बँट गई। 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के सहारे इंदिरा गाँधी ने 375 सीटें जीतीं और कांग्रेस का दबदबा लौटा। पर सबसे महत्वपूर्ण बात अंत में है — लौटी हुई कांग्रेस अपने सर्वोच्च नेता पर आश्रित थी, उसका संगठन कमज़ोर था, और उसमें वह क्षमता नहीं बची थी जो पुरानी कांग्रेस की पहचान थी: हर तनाव को अपने भीतर पचा लेने की क्षमता। और इसी से अगला संकट जन्मा।