हड़प्पा के बाद नगर फिर लौटे
शुरुआत
राजगीर, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी — ये आज के जीते-जागते शहर हैं, पर इनमें से कई लगभग 2500 वर्ष पुराने हैं! इस अध्याय में देखिए, ये नगर और राज्य कैसे बने।

“राज्य की रक्षा के लिए राजधानी तथा सीमांत नगरों की दुर्गबंदी आवश्यक है।… जल के लिए केवल वर्षा पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए अपितु राज्य में नदियाँ, जलाशय तथा अन्य स्रोत भी हों। सड़कें तथा जलमार्ग सुगम व सुव्यवस्थित होने चाहिए।”
अध्याय इन प्रश्नों का उत्तर देता है (पृ. 67)
- भारत में "द्वितीय नगरीकरण" से क्या अभिप्राय है?
- जनपदों और महाजनपदों का भारत के प्रारंभिक इतिहास में क्या महत्व है?
- इन जनपदों और महाजनपदों ने किस प्रकार की शासन प्रणाली का विकास किया?
एक शब्द
इस अध्याय में तिथियाँ "सा.सं.पू." में हैं — सामान्य संवत पूर्व (अंग्रेज़ी में BCE)।
कक्षा 7 के रिवीजन नोट्स अभी तैयार हो रहे हैं; तब तक यह पन्ना सीधे पाठ्यपुस्तक से बना है। आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।
1पहला नगरीकरण और उसके बाद
याद कीजिए: द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभिक काल में (2000 सा.सं.पू. के कुछ शताब्दियों बाद) सिंधु या हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता — भारत का "प्रथम नगरीकरण" — बिखर गई। कुछ नगर छोड़ दिए गए; कुछ में लोग रहते रहे, पर गाँव जैसी जीवन-शैली में लौट आए (पृ. 68)।
ध्यान दीजिए (पृ. 69)
उस दौर में कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संस्कृतियाँ थीं; उनका अध्ययन हम यहाँ नहीं कर रहे।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1भारत का "प्रथम नगरीकरण" किसे कहा गया?
पृ. 68।
2हड़प्पा नगरों के विघटन के बाद कुछ जगह रहने वाले लोगों का क्या हुआ?
पृ. 68।
2द्वितीय नगरीकरण
फिर प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में, ख़ासकर गंगा के मैदान, सिंधु घाटी के कुछ हिस्सों और आस-पास, नगरीकरण का एक नया, जीवंत चरण शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे पूरे उपमहाद्वीप में फैला। इसे भारत का "द्वितीय नगरीकरण" कहते हैं — और यह आज तक लगातार चल रहा है! (पृ. 69)
सोचिए (प्र. 3, पृ. 81): आप इतिहासकार हैं। महाजनपदों के बारे में और जानने के लिए कौन-कौन से स्रोत देखेंगे, और हर स्रोत से क्या पता चल सकता है?
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1द्वितीय नगरीकरण कब शुरू हुआ?
पृ. 69।
2द्वितीय नगरीकरण के बारे में पुस्तक क्या कहती है?
पृ. 69।
3जनपद और महाजनपद
द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के अंत की ओर उत्तर भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियाँ फिर से संगठित होने लगीं। लोग कुलों या वंशों में बँटे, जो शायद एक भाषा और एक-से रीति-रिवाज साझा करते थे। हर कुल एक भूभाग से जुड़ गया — "जनपद" — जिसका नेतृत्व एक राजा या शासक करता था (पृ. 69)।
सोलह महाजनपद (चित्र 4.3, पृ. 71)
ग्रंथों में अलग-अलग सूचियाँ मिलती हैं; ज़्यादा प्रचलित सूची में 16 नाम हैं। ये उत्तर-पश्चिम में गांधार से पूर्व में अंग तक, और मध्य भारत में गोदावरी के पास अश्मक तक फैले थे। कुछ और महाजनपद और छोटे स्वतंत्र जनपद भी रहे होंगे (पृ. 69)। मानचित्र और राजधानियाँ अपनी पुस्तक के चित्र 4.3 में देखिए — उसकी सीमाएँ अनुमानित हैं।
ज़्यादातर महाजनपद गंगा के मैदान में क्यों? पुस्तक के बताए कुछ संभावित कारण (पृ. 70)
पता लगाइए (पृ. 70)
सबसे शक्तिशाली महाजनपद थे — मगध, कोसल, वत्स और अवंति। पुस्तक के मानचित्र में इनकी राजधानियाँ पहचानिए। इनमें से कितने नगर आज के भारतीय नगरों से मिलते हैं? फिर कक्षा 6 के अध्याय "भारत अर्थात इंडिया" के महाभारत वाले मानचित्र (चित्र 5.4) से तुलना कीजिए — दोनों में कौन-से नाम समान हैं?
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1"जनपद" का अर्थ क्या है?
पृ. 69।
2ज़्यादा प्रचलित सूची में कितने महाजनपद हैं?
पृ. 69।
4दुर्ग वाले नगर
महाजनपदों की ज़्यादातर राजधानियाँ बड़े, सुदृढ़ प्राचीरों वाले नगर थे, जिनके बाहर सुरक्षा के लिए गहरी परिखा (खाई) बनाई जाती थी (पृ. 70)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1नगर के द्वार प्रायः जान-बूझकर सँकरे क्यों बनाए जाते थे?
पृ. 70।
2परिखा क्या है?
पृ. 70।
5प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराएँ
हर जनपद में एक सभा या परिषद होती थी — "सभा" या "समिति" — जहाँ कुल से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श होता था। ये दोनों शब्द सबसे पहले वेदों में मिलते हैं। शायद इसके ज़्यादातर सदस्य कुल के वरिष्ठजन होते थे (पृ. 70)।
राजा के काम (पृ. 71–72)
सावधानी से पढ़िए (पृ. 70–71)
अच्छा राजा वह माना जाता था जो मंत्रियों, प्रशासकों और सभा-समिति से सलाह लेकर फ़ैसले करे। कुछ ग्रंथों के अनुसार अयोग्य राजा को सभा हटा भी सकती थी। ये उल्लेख महत्वपूर्ण हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि यह कोई तय क़ानून था — उस दौर के पूरे सबूत हमारे पास नहीं हैं।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1वज्जि और मल्ल में राजा का चयन कौन करता था?
पृ. 72।
2विद्वान वज्जि और मल्ल को क्या कहते हैं?
पृ. 72–73।
7वर्ण-जाति व्यवस्था
सभ्यता के साथ समाज जटिल हुआ, और हर जटिल समाज ख़ुद को वर्ग, व्यवसाय या किसी और आधार पर समूहों में बाँटता है — शासन, प्रशासन, धर्म, शिक्षा, व्यापार, नगर-नियोजन, कृषि, शिल्प, कला… आदर्श समाज में ये समूह एक-दूसरे के पूरक होते हैं; पर ज़्यादातर ऐसे बँटवारे असमानता भी लाते हैं। "समानता" एक आदर्श है जिसकी मनुष्य ने अक्सर कल्पना की, पर शायद ही कोई समाज इसे पूरी तरह पा सका (पृ. 74, 76)।
चार वर्ण, पुस्तक के शब्दों में (पृ. 76)
इसे अनदेखा न करें (पृ. 76)
अंग्रेज़ी शब्द "कास्ट" पुर्तगाली शब्द "कास्टा" से आया। 16वीं शताब्दी में भारत आए पुर्तगाली यात्रियों ने भारतीय समाज को समझने के लिए इसका प्रयोग किया। कुछ विद्वान "कास्ट" को वर्ण के लिए, ज़्यादातर जाति के लिए, और कुछ पूरी वर्ण-जाति व्यवस्था के लिए प्रयोग करते हैं।
सोचिए (पृ. 77): क्या कभी आपको या आपके किसी परिचित को दूसरों से अलग समझा गया? क्या समाज में समानता ज़रूरी है — क्यों? क्या आपने ऐसा कोई व्यक्ति या पहल देखी है जिसने असमानता कम की हो?
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1अंग्रेज़ी शब्द "कास्ट" किस भाषा से आया?
पृ. 76।
2विद्वानों की आम सहमति के अनुसार प्राचीन काल में व्यवस्था कैसी थी?
पृ. 77।
8भारत के अन्य भागों में
प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में व्यापार, तीर्थयात्रा और सैन्य अभियानों के लिए अहम संचार मार्ग बने। दो मार्ग ख़ास प्रसिद्ध रहे और साहित्य में भी मिलते हैं — उत्तरापथ और दक्षिणापथ (पृ. 77–78)।
दक्षिण भारत (पृ. 79–80)
उपमहाद्वीप के दक्षिणी क्षेत्रों में नगर लगभग 400 सा.सं.पू. से उभरे, हालाँकि नई खुदाइयों में इससे पहले की व्यापारिक गतिविधियों के संकेत भी मिले हैं। इसी समय तीन राज्य उभरे — चोल, चेर और पांड्य। प्राचीनतम तमिल साहित्य में इन राज्यों और कई राजाओं का उल्लेख है।
दक्षिण किससे समृद्ध था? (पृ. 80)
इनके कारण दक्षिण ने बाक़ी भारत ही नहीं, विदेशी राज्यों और साम्राज्यों से भी लाभ का व्यापार किया। कोडुमनल (इरोड के पास, तमिलनाडु) में शंख और रत्न उद्योग के प्रमाण मिले हैं (चित्र 4.9)।
एक जुड़ा हुआ भूभाग (पृ. 80)
लगभग 300 या 200 सा.सं.पू. तक उत्तर-पूर्व समेत लगभग पूरा उपमहाद्वीप एक-दूसरे से जुड़ा जीवंत भूभाग बन चुका था; वस्तुएँ और संस्कृति एक क्षेत्र से दूसरे तक, और अक्सर भारत से बाहर मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचीं। लगभग इसी समय महाजनपदों का अस्तित्व समाप्त हो गया।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1दक्षिणापथ कहाँ से शुरू होता था?
पृ. 78।
2दक्षिण में कौन-से तीन राज्य उभरे?
पृ. 80।
9सार और अभ्यास
सोचिए (प्र. 4, पृ. 81): प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में नगरीकरण के लिए लोहे का विकास इतना महत्वपूर्ण क्यों था? पाठ के तथ्यों के साथ अपनी जानकारी या कल्पना भी जोड़िए।
पुस्तक का अपना सार — "आगे बढ़ने से पहले…" (पृ. 80)
पहले खुद याद कीजिए, फिर कार्ड पलटिए।
आख़िरी जाँच✓ पड़ाव पूरा
1लगभग कब तक महाजनपदों का अस्तित्व समाप्त हो गया?
पृ. 80।
2शिशुपालगढ़ किस क्षेत्र की राजधानी था?
पृ. 78।
नौ पड़ाव पूरे! अगली बार राजगीर, उज्जैन या वाराणसी का नाम सुनिए तो याद कीजिए — ये नगर लगभग 2500 वर्ष से जी रहे हैं।