अध्याय 6पुनर्गठन का काल

इंटरैक्टिव अध्याय45 मिनट

NCERT — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, कक्षा 7 भाग 1, अध्याय 6 (पृ. 117–144)।

एक साम्राज्य टूटा, कई राज्य उभरे

शुरुआत

भविषा और ध्रुव ने "इतिहास" फिर चालू किया और कलाकृतियों के एक संग्रह के बीच जा पहुँचे — हर एक दूसरी से बिलकुल अलग। क्या ये एक ही साम्राज्य की हैं, या कई की? उनका अनुमान सही था: कई की।

“सतत जीवंत परंपरा और नवजीवन की एक अद्भुत शक्ति के कारण इस भूमि ने असंख्य परिवर्तनों के माध्यम से स्वयं को समायोजित किया है।”

— जगदीश चंद्र बोस (1917) (पृ. 117)

अध्याय इन प्रश्नों का उत्तर देता है (पृ. 117)

  1. मौर्योत्तर काल को कभी-कभी "पुनर्गठन का काल" क्यों कहा जाता है?
  2. वे कौन-से मूल्य और सिद्धांत थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया?
  3. विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में कैसे योगदान दिया?

कक्षा 7 के रिवीजन नोट्स अभी तैयार हो रहे हैं; तब तक यह पन्ना सीधे पाठ्यपुस्तक से बना है। आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।

1मौर्यों के बाद

अशोक के उत्तराधिकारियों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। आम तौर पर माना जाता है कि अंतिम मौर्य शासक की हत्या लगभग 185 सा.सं.पू. में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की। इसके बाद उपमहाद्वीप में कई नए राज्य उभरे — अक्सर वही, जो पहले मौर्यों के अधीन थे। उत्तर-पश्चिम कमज़ोर हुआ और बाहरी आक्रमणों के लिए खुल गया (पृ. 118)।

"पुनर्गठन का काल" क्यों? (पृ. 118)

कुछ विद्वानों के अनुसार, क्योंकि पुराने क्षेत्र नए राज्यों में पुनर्गठित हो रहे थे, जो लगातार ताक़तवर बनने की होड़ में थे। भारत का मानचित्र बहुत बदला — और लोगों का जीवन भी।

उपमहाद्वीप के भीतर से या बाहर से? (चित्र 6.3, पृ. 120)

हर राजवंश को सही खाने में रखिए।

नियंत्रण पाने के दो तरीक़े (पृ. 120)

पता लगाइए (पृ. 118–119): एक पन्ने पर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. के पहले वर्ष से तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की समय-रेखा बनाइए। यह अवधि कितने वर्षों की है? सा.सं.पू. से सा.सं. में बदलते समय कक्षा 6 का अध्याय "इतिहास की समय-रेखा एवं उसके स्रोत" याद कीजिए। अध्याय पढ़ते हुए प्रमुख व्यक्ति, राज्य और घटनाएँ उस पर लगाते जाइए।

जाँच पड़ाव

  1. 1अंतिम मौर्य शासक की हत्या लगभग कब और किसने की?

  2. 2इनमें कौन-सा राजवंश उपमहाद्वीप के बाहर से आया?

2शुंगों का उत्कर्ष

पुष्यमित्र शुंग ने शुंग राजवंश की स्थापना की, जिसने उत्तर और मध्य भारत के कुछ भागों पर शासन किया। उनका साम्राज्य मौर्य साम्राज्य से छोटा था, फिर भी उन्होंने उसे बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखा और शुरुआती सैन्य अभियानों के बाद ग्रीकों से मैत्री रखी। पर उनके लगभग एक शताब्दी बाद शुंग साम्राज्य समाप्त हो गया (पृ. 121)।

अश्वमेध यज्ञ: घोड़ा छोड़िए

एक वैदिक अनुष्ठान, जिससे शासक ख़ुद को शक्तिशाली राजा घोषित करता। घोड़ा सैनिकों के साथ स्वतंत्र घूमने छोड़ा जाता; जिस क्षेत्र से वह बिना चुनौती निकल जाता, वह यज्ञ करने वाले राजा का माना जाता। किसी राजा ने घोड़ा रोका तो सर्वोच्चता तय करने के लिए युद्ध होता (पृ. 121)। हर पड़ोसी राज्य के लिए चुनिए।

पड़ोसी राज्य क

पड़ोसी राज्य ख

पड़ोसी राज्य ग

राज्यों के नाम काल्पनिक; नियम पुस्तक का।

वैदिक अनुष्ठान और दूसरे मत (पृ. 121–122)

इस काल में वैदिक अनुष्ठानों का पुनरुत्थान हुआ, पर दूसरे दर्शन और मत भी फलते-फूलते रहे। दर्शन और साहित्य के लिए संस्कृत एक प्रमुख भाषा बनी। कक्षा 6 में आपने जिन योग सूत्रों के अंश पढ़े थे, वे इसी काल में पतंजलि ने संकलित किए।

भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश) (पृ. 122)

पता लगाइए (पृ. 124): पुस्तक के चित्र 6.7 में दाहिनी ओर की दो आकृतियाँ क्या कर रही हैं? उनका व्यवसाय और पहनावा क्या बताता है? चित्र 6.6 के कोलाज में कपड़ों, आभूषणों और रोज़ की चीज़ों पर टिप्पणी लिखिए।

जाँच पड़ाव

  1. 1अश्वमेध यज्ञ में घोड़ा रोकने का क्या मतलब था?

  2. 2योग सूत्र किसने संकलित किए?

3सातवाहन

शुंगों के दक्षिण में सातवाहन — कभी-कभी "आंध्र" भी कहलाते — दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से दक्कन के बड़े भूभाग पर राज करते थे; साम्राज्य मुख्यतः आज के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में था। अलग-अलग समय पर राजधानियाँ बदलीं — सबसे प्रसिद्ध अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन) (पृ. 124)।

सिक्के पर जहाज़ (चित्र 6.8, पृ. 125)

सातवाहन सिक्के गुजरात से आंध्र प्रदेश तक — पश्चिमी और पूर्वी दोनों तटों पर — मिले हैं। कई पर जहाज़ बने हैं, जैसे दो मस्तूलों वाला समुद्री जहाज़: एक-दूसरे को काटती रेखाएँ शायद पाल हैं, नीचे की लहरदार रेखाएँ समुद्र। इससे पता चलता है कि समुद्री व्यापार आर्थिक जीवन का अहम हिस्सा था और जहाज़ बनाने व नौवहन की तकनीक उन्नत थी।

रोमन साम्राज्य तक व्यापार: निर्यात या आयात? (पृ. 125)

हर वस्तु को सही खाने में रखिए।

माँ के नाम पर नाम (पृ. 126)

सातवाहन परंपरा में राजकुमारों के नाम प्रायः उनकी माताओं के नाम पर रखे जाते थे। दोनों टुकड़े जोड़िए।

सोचिए (पृ. 126): राजा के नाम के आरंभ में माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ हो सकता है?

सातवाहनों का अंत (पृ. 127–128)

तीसरी शताब्दी सा.सं. में सातवाहन साम्राज्य छोटे स्वतंत्र राज्यों में बँट गया। सबसे बड़े कारण: कमज़ोर केंद्रीय शासन और धीरे-धीरे आर्थिक गिरावट।

जाँच पड़ाव

  1. 1सातवाहनों की सबसे प्रसिद्ध राजधानियाँ?

  2. 2कई सातवाहन सिक्कों पर जहाज़ होना क्या बताता है?

4चेदियों का आगमन

कलिंग युद्ध याद है? मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद कलिंग चेदि वंश के अधीन एक प्रमुख शक्ति बना। इसके प्रमुख राजा खारवेल जैन दर्शन के अनुयायी थे — कभी-कभी "भिक्षु-राजा" कहलाते — फिर भी सभी मतों का सम्मान करते थे (पृ. 128)।

चट्टान में कक्ष तराशिए

भुवनेश्वर के पास उदयगिरि-खंडगिरि की गुफाएँ, संभवतः जैन मुनियों के लिए बनीं — सजे शिल्प-फलक, मूर्तियाँ और चट्टान काटकर बने बड़े कक्ष। इसे "शैलकृत स्थापत्य" कहते हैं (पृ. 128)। छेनी-हथौड़ी चलाइए।

चित्र और प्रहारों की गिनती हमारी है।

हाथीगुंफा अभिलेख (पृ. 128–129)

उदयगिरि की एक प्रमुख गुफा में ब्राह्मी लिपि में यह अभिलेख खारवेल की हर वर्ष की उपलब्धियाँ बताता है — विजयी सैन्य अभियानों से जनकल्याण के कामों तक। खारवेल अपने बारे में क्या कहते हैं? हर दावा खोलिए।

भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि (पृ. 129)

एक बार फिर एक राजा सभी दर्शनों और मतों को संरक्षण देने में गौरव महसूस करता है — पुस्तक इसे "भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि" का एक आधारभूत तत्व कहती है।

जाँच पड़ाव

  1. 1खारवेल किस दर्शन के अनुयायी थे?

  2. 2हाथीगुंफा अभिलेख कहाँ है?

5दक्षिण में राज्य और जन-जीवन

दक्षिण में दूसरी या तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक तीन शक्तिशाली राजवंश उभरे — चेर, चोल और पांड्य। ये आपस में होड़ करते रहे और साथ ही व्यापार और संस्कृति को आगे बढ़ाते रहे। अशोक का साम्राज्य इन तक नहीं पहुँचा था (उन्होंने अपने शिलालेखों में इनका उल्लेख किया है) — यानी मौर्य शक्ति के शिखर पर भी ये स्वतंत्र रहे। खारवेल ने दक्षिण भारतीय राजाओं के एक महासंघ को हराने का दावा किया, पर उस युद्ध का स्थान ज्ञात नहीं (पृ. 129)।

संगम साहित्य (पृ. 129–130)

"संगम" शब्द संस्कृत के "संघ" से — अर्थ: समिति, एकत्र होना; यहाँ कवियों की सभाएँ। संगम साहित्य दक्षिण भारत का सबसे प्राचीन साहित्य है — कई काव्य-संग्रह, जिनमें प्रेम जैसी निजी भावनाएँ और वीरता, उदारता जैसे सामाजिक मूल्य बड़ी कुशलता से व्यक्त हैं। इतिहासकार उस समय के समाज और संस्कृति को समझने के लिए इसे ख़ूब पढ़ते हैं। उस पूरे युग को "संगम युग" कहते हैं।

तीन मुकुटधारी राजा — कौन-सा राज्य?

हर बात को उसके राजवंश के खाने में रखिए (पृ. 130–134)।

कल्लनई (ग्रैंड एनीकट) (पृ. 132)

राजा करिकाल की सबसे प्रसिद्ध जनहित परियोजना: श्रीरंगम द्वीप के ठीक नीचे, भौगोलिक रूप से अहम जगह पर एक जटिल जल-वितरण प्रणाली, जिससे कावेरी का पानी डेल्टा के मध्य और दक्षिणी भागों की ओर मोड़ा गया। बाँध लगाकर देखिए।

योजनाबद्ध चित्र, मानचित्र नहीं।

सिलप्पदिकारम् — पायल की कथा (पृ. 131)

संगम-संग्रहों के तुरंत बाद रचा गया प्रसिद्ध महाकाव्य। कथा को आगे बढ़ाइए।

  1. कण्णगी अपने पति कोवलन के साथ समृद्ध चोल राजधानी पुहार (जिसे आज के कावेरीपट्टनम् से जोड़ा जाता है) में सुख से रहती थी।

  2. कोवलन एक नर्तकी पर आसक्त हुआ और अपनी सारी संपत्ति गँवा बैठा। भूल समझकर वह लौटा; कण्णगी ने उसे क्षमा किया।

  3. नया जीवन शुरू करने दोनों पांड्य राजधानी मदुरै पहुँचे। कण्णगी ने कोवलन को अपनी एक पायल बेचने को दी।

  4. कोवलन पर चोरी का झूठा आरोप लगा और पांड्य राजा ने उसे मृत्युदंड दे दिया। कण्णगी ने अपनी दूसरी पायल दिखाकर उसे निर्दोष सिद्ध किया; राजा भूल समझकर शोक से मर गया।

  5. कण्णगी ने मदुरै को श्राप दिया; अग्नि देवता ने नगर जला दिया। वह पश्चिम में चेर राज्य गई, जहाँ उसे देवी के रूप में सम्मान मिला। आज भी तमिलनाडु और केरल में कण्णगी की पूजा होती है।

सोचिए (पृ. 133–134): इतिहासकार कई सौ साल पहले के दो दूर-दराज़ राज्यों के व्यापार का पता कैसे लगाते होंगे? उस समय मोती व्यापार के लिए इतने अहम क्यों थे?

जाँच पड़ाव

  1. 1"संगम" शब्द किस शब्द से बना है?

  2. 2कल्लनई (ग्रैंड एनीकट) किस नदी का पानी मोड़ती है?

6इंडो-ग्रीक और शक

इसी काल में कुछ आक्रमणकारी उत्तर-पश्चिमी सीमा से आए और उत्तर-पश्चिम, उत्तर और मध्य भारत के भागों पर अधिकार किया। एलेक्जेंडर पीछे हटते समय क्षत्रप छोड़ गया था; समय के साथ उन्होंने अपने स्वतंत्र राज्य बनाए — "इंडो-ग्रीक"। वे विजेता बनकर आए, पर स्थानीय समृद्ध संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए; शासन, कला, भाषा और रोज़ के जीवन में ग्रीक और भारतीय तत्व घुल-मिल गए (पृ. 134)।

हेलियोडोरस स्तंभ, विदिशा के पास (मध्य प्रदेश) (पृ. 134–135)

यह स्तंभ एक इंडो-ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस के नाम पर है, जिसने अपने अभिलेख में वासुदेव की "देवताओं के देवता" के रूप में स्तुति की। अभिलेख के "तीन अमर उपदेश (पदचिह्न)", जिनका आचरण स्वर्ग तक ले जाता है — हर एक खोलिए।

इंडो-ग्रीक सिक्का पलटिए (पृ. 135)

इन शासकों के बारे में हमारी ज़्यादातर जानकारी उत्तर भारत की खुदाई में मिले उनके सिक्कों से है — सोना, चाँदी, ताँबा और गिलट धातु के।

धातुओं के नाम हिंदी पुस्तक से; अंग्रेज़ी पुस्तक "गिलट" की जगह "निकल" लिखती है। सिक्के का चित्र हमारा है।

पता लगाइए (पृ. 135): कुछ इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी का होना क्या बताता होगा?

शक (इंडो-सीथियन) (पृ. 135)

इंडो-ग्रीक शासन शकों के आक्रमणों से समाप्त हुआ। शकों ने उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम पर आक्रमण कर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. (अंग्रेज़ी पुस्तक: उसके उत्तरार्ध) से पाँचवीं शताब्दी सा.सं. तक शासन किया, और कुषाणों के आने तक सत्ता में रहे। इसी अवधि में शक संवत पंचांग विकसित हुआ।

शक संवत निकालिए (पृ. 135)

पुस्तक का नियम: शक संवत ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे है — जनवरी से मार्च को छोड़कर, जब यह 79 वर्ष पीछे होता है। 1957 में इसे भारतीय राष्ट्रीय पंचांग के रूप में अपनाया गया; चित्र 6.21 में भारत सरकार के एक राजकीय प्रकाशन पर तिथियाँ ग्रेगोरियन और शक संवत, दोनों में दी गई हैं।

गणना केवल पुस्तक के नियम से; किसी तारीख़-विशेष के लिए भारत सरकार का पंचांग देखिए।

जाँच पड़ाव

  1. 1हेलियोडोरस स्तंभ कहाँ है?

  2. 2शक संवत को भारतीय राष्ट्रीय पंचांग कब अपनाया गया?

7कुषाणों का उदय

कुषाण मूलतः मध्य एशिया के थे और संभवतः दूसरी शताब्दी सा.सं. में भारत आए। शिखर पर उनका साम्राज्य मध्य एशिया से उत्तर भारत के बड़े भूभाग तक फैला था। उनके शासन में ख़ूब सांस्कृतिक मेल-जोल हुआ (पृ. 136)।

कनिष्क की "सिरविहीन" मूर्ति (पृ. 136)

लगभग 1.85 मीटर ऊँची यह प्रसिद्ध मूर्ति कनिष्क की है — संभवतः कुषाणों के सबसे शक्तिशाली शासक। उस पर ब्राह्मी में लिखा है: "महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क" — "महाराजा, राजाओं के राजा, देवपुत्र कनिष्क"। सैन्य अभियानों से फ़ुर्सत में कनिष्क कला और संस्कृति को बढ़ावा देते, जिससे नई कला-शैलियाँ बनीं।

कनिष्क के सिक्के: सम्राट के अलावा कौन? (चित्र 6.23, पृ. 137)

सोचिए (पृ. 137): एक शक्तिशाली शासक ने सिक्कों पर बुद्ध और शिव क्यों बनवाए होंगे? यह उसके मूल्यों के बारे में क्या बताता है? क्या आज भी मुद्राओं पर ऐसे प्रतीक दिखते हैं?

रेशम मार्ग (सिल्क रूट) (पृ. 137–138)

कुषाणों का रेशम मार्ग के अहम हिस्सों पर नियंत्रण था — यह मार्ग चीन को मध्य एशिया और फ़ारस होते हुए भूमध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ता था। उनके समय में व्यापार बढ़ा और भारत एशिया के दूसरे भागों और पश्चिमी देशों से जुड़ा (मानचित्र: चित्र 6.25)।

गांधार या मथुरा? (पृ. 137–140)

पुस्तक में बताई हर विशेषता को उसकी कला-शैली के खाने में रखिए।

मिली-जुली विरासत (पृ. 137, 140)

मूर्तियों में तरह-तरह के देवता — अलग-अलग विचारधाराओं का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। सूर्य जैसे देवताओं का मनुष्य-जैसा चित्रण शुरू हुआ, जिसने बाद के मंदिर स्थापत्य की नींव रखी। शैलियाँ एक-दूसरे से प्रभावित हुईं, पर भारतीय विषय — ख़ासकर हिंदू और बौद्ध — प्रमुख रहे। इसी समय संस्कृत साहित्य फला-फूला और महाभारत तथा रामायण जैसे महाकाव्यों का संकलन हुआ।

सोचिए (पृ. 137): गांधार कहाँ है? क्या यह नाम आपको महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है?

जाँच पड़ाव

  1. 1कनिष्क के एक सिक्के पर ग्रीक लिपि में किसका नाम है?

  2. 2मथुरा शैली की मूर्तियाँ मुख्यतः किस पत्थर से बनीं?

8सार और अभ्यास

कौन-सा शासक, कौन-सा वंश? (चित्र 6.28)

हर शासक को उसके वंश के खाने में रखिए।

अपना राज्य (प्र. 5, पृ. 143): आप एक स्वतंत्र राज्य बनाएँ तो कौन-सा राजचिह्न और कौन-सी उपाधि चुनेंगे, और क्यों? अपने राज्य के मूल्य, नियम और विशेषताएँ लिखिए।

पुस्तक का अपना सार — "आगे बढ़ने से पहले…" (पृ. 142–143)

पहले खुद याद कीजिए, फिर कार्ड पलटिए।

आख़िरी जाँच

  1. 1किस शासक ने अपनी उपाधि में माता का नाम जोड़ा?

  2. 2पुस्तक के अनुसार इस काल की कला में किनकी प्रधानता रही?