अध्याय 8भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?

इंटरैक्टिव अध्याय40 मिनट

NCERT — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, कक्षा 7 भाग 1, अध्याय 8 (पृ. 167–184)।

नदी, पर्वत, वन — और एक जुड़ा हुआ देश

शुरुआत

आपके गाँव या मोहल्ले में भी कोई पेड़, कुआँ, पहाड़ी या मंदिर होगा जिसे लोग आदर से देखते हैं। इस अध्याय में देखिए कि ऐसे स्थान मिलकर पूरे भूभाग को कैसे पावन बना देते हैं।

“आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह, सभी प्रकार के जीव-जंतु, दिशाएँ, वृक्ष तथा पौधे, नदियाँ और समुद्र परमेश्वर के शरीर के अंग हैं।”

— भागवत पुराण (पृ. 167)

अध्याय इन प्रश्नों का उत्तर देता है (पृ. 167)

  1. "पावनता" क्या है?
  2. भूमि कैसे पावन हो जाती है?
  3. पावन स्थल और तीर्थ स्थल किस प्रकार मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाते हैं?
  4. पावन भूगोल ने भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण में क्या भूमिका निभाई?

कक्षा 7 के रिवीजन नोट्स अभी तैयार हो रहे हैं; तब तक यह पन्ना सीधे पाठ्यपुस्तक से बना है। आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।

1पावनता क्या है?

इस अध्याय के सीमित संदर्भ में पावनता का अर्थ है — गहरे धार्मिक या आध्यात्मिक महत्व वाली कोई चीज़, जो आदर और श्रद्धा के योग्य हो, पवित्र या दिव्य। यह कोई विशेष स्थान हो सकता है, कोई विशेष यात्रा (तीर्थयात्रा), उसका मार्ग, या पूरा भूभाग। भारत में पावनता केवल धर्म से नहीं, भूगोल और तरह-तरह की परंपराओं से भी जुड़ी है (पृ. 168)।

शब्दकोश (पृ. 169–171)

हर परंपरा के अपने पावन स्थल (पृ. 168–171)

पुस्तक में दिए हर स्थल को उसकी परंपरा के खाने में रखिए।

बोधगया (पृ. 169)

बौद्ध परंपरा के अनुसार यहीं बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया। यहाँ हर वर्ष चालीस लाख से अधिक यात्री आते हैं।

सिख तख़्त और गुरुओं की यात्राएँ (पृ. 169)

तख़्त सिख धर्म में आध्यात्मिक अधिकार के केंद्र हैं — तख़्त श्री पटना साहिब, अकाल तख़्त, तख़्त श्री केशगढ़ साहिब। सिख श्रद्धालु जीवन में कम से कम एक बार इनकी यात्रा करना चाहते हैं। सिख परंपरा में गुरु नानक जैसे गुरुओं की हरिद्वार, प्रयाग, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, पुरी और कुछ मुस्लिम पावन स्थलों की यात्राएँ भी दर्ज हैं।

जाँच पड़ाव

  1. 1"तीर्थ" का शाब्दिक अर्थ क्या है?

  2. 2बोधगया में हर वर्ष कितने से अधिक यात्री आते हैं?

2तीर्थयात्राएँ

अनेक भारतीय जीवन में तीर्थों की यात्रा करते हैं। यह केवल शारीरिक यात्रा नहीं, एक आंतरिक यात्रा भी है, जिसके लिए एक विशिष्ट आचार-व्यवहार चाहिए। लगभग 3000 वर्षों से, आधुनिक यातायात के बिना भी, लोग पूरे उपमहाद्वीप में चारों दिशाओं में तीर्थयात्राएँ करते आए हैं — इसीलिए पूरा भूभाग पावन माना जाता है (पृ. 170)।

"भारत अनादिकाल से तीर्थयात्राओं का देश रहा है… बर्फ़ीले हिमालय में बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से दक्षिण में कन्याकुमारी तक… ऐसा क्या है जो हमारे लोगों को उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर की यात्रा के लिए आकर्षित करता है? यह एक देश और एक संस्कृति की भावना है।"

— जवाहरलाल नेहरू, 1961 (पृ. 170)

इतिहासकार धर्मपाल की एक मुलाक़ात (पृ. 170)

  1. धर्मपालमैं ग्वालियर से दिल्ली की यात्रा कर रहा था, जब मैं लोगों के एक समूह से मिला — लगभग बारह लोग, तीन या चार महिलाएँ और सात या आठ पुरुष।
  2. तीर्थयात्रीहम लगभग तीन महीने से तीर्थयात्रा पर हैं — और जगहों के साथ रामेश्वरम तक गए। हम लखनऊ के उत्तर के दो गाँवों से हैं।
  3. धर्मपालउनके पास मिट्टी के पात्र और कई गठरियाँ थीं, और भोजन की सब ज़रूरी चीज़ें — आटा, घी, चीनी। "क्या आप दिल्ली जा रहे हैं?"
  4. तीर्थयात्रीहाँ! पर रुकेंगे नहीं, केवल ट्रेन बदलेंगे। हम हरिद्वार जा रहे हैं… हमारे पास समय नहीं है… फिर घर लौटना है।

पता लगाइए (पृ. 171): रामेश्वरम से हरिद्वार तक इन यात्रियों का मार्ग अपनी पुस्तक के मानचित्र पर खोजिए। वे दिल्ली रुकने के बजाय सीधे हरिद्वार क्यों गए होंगे? और प्राचीन काल में मदुरै से वाराणसी जाने वाले किन-किन भाषाओं से मिलते होंगे, कहाँ ठहरते, क्या खाते?

पंढरपुर वारी — 21 दिन पैदल (चित्र 8.4)

महाराष्ट्र की लगभग 800 वर्ष पुरानी परंपरा। "वारी" यानी नियमित — यहाँ वार्षिक — तीर्थयात्रा। श्रद्धालु बड़े समूहों में इक्कीस दिन चलकर पंढरपुर के प्रसिद्ध विठोबा मंदिर पहुँचते हैं। हर दिन आगे बढ़िए।

चित्र हमारा है; हर दिन की दूरी नहीं दिखाई गई।

जाँच पड़ाव

  1. 1पंढरपुर वारी में श्रद्धालु कितने दिन चलते हैं?

  2. 2नेहरू के अनुसार लोगों को उत्तर-दक्षिण की तीर्थयात्रा की ओर क्या खींचता है?

3प्रकृति में पावनता

हिंदू और कई लोक तथा जनजातीय परंपराओं में पर्वत, नदी, वृक्ष, पौधे, पशु और कभी पत्थर भी पावन माने जाते हैं। कई नदियाँ देवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह परंपरा इस समझ पर टिकी है कि प्रकृति के कण-कण में दैवी उपस्थिति है — और अंततः पूरी पृथ्वी पावन है: पृथ्वी माता या भूदेवी (पृ. 172)।

चित्र 8.5 (बेलूर मंदिर, कर्नाटक)

भगवान विष्णु वराह अवतार में एक दैत्य का संहार करते हैं और भूदेवी (पृथ्वी माता) की रक्षा करते हैं; भूदेवी उनकी कोहनी पर बैठी दिखाई गई हैं।

तीन उदाहरण (पृ. 172)

जाँच पड़ाव

  1. 1नियम डोंगर पहाड़ी किस जनजाति के लिए पावन है?

  2. 2पृथ्वी माता को और किस नाम से जाना जाता है?

4पावन भूगोल

पावन स्थल पूरे देश में फैले हैं, फिर भी आपस में जुड़े हैं। ये जाल भारत की लंबाई-चौड़ाई में हर दिशा से गुज़रकर एक "पावन भूगोल" बनाते हैं — और भूमि ख़ुद पावन हो जाती है (पृ. 173)।

तीन जाल (पृ. 173)

हर जाल पर टैप कीजिए।

पता लगाइए (पृ. 173): उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम की यात्रा करते समय इन धामों का लोगों के लिए क्या अर्थ रहा होगा?

51 शक्तिपीठों की कथा (पृ. 173)

  1. सती के रूप में आदि शक्ति माता और उनके पति भगवान शिव का अपमान सती के पिता ने किया। तब सती ने आत्मदाह कर लिया।

  2. भगवान शिव अत्यंत कुपित हुए; सती का शव लेकर घूमने लगे और अंतिम संस्कार से मना कर दिया। उनका क्रोध सृष्टि और ब्रह्मांड के लिए घातक था।

  3. तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर को अनेक हिस्सों में बाँट दिया।

  4. उपमहाद्वीप में जहाँ-जहाँ माता के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ बने। आशय स्पष्ट है: पूरा उपमहाद्वीप देवी माता का ही रूप है।

लोग इतनी दूर क्यों जाते थे? (पृ. 175)

अलग-अलग कारणों से निकले यात्रियों को चलाइए — देखिए उनके रास्ते कहाँ मिलते हैं।

योजनाबद्ध चित्र, मानचित्र नहीं।

रास्ते में (पृ. 173)

अपने पावन स्थलों की यात्रा में तीर्थयात्री स्वाभाविक रूप से पूरे भारत के भूभाग से परिचित होते — तरह-तरह की भाषाएँ, रीति-रिवाज, वस्त्र और भोजन, और साथ में उनकी समानताएँ भी।

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  1. 1शक्तिपीठ कितने बताए गए हैं?

  2. 2पुस्तक के अनुसार विभिन्न यात्रियों के मिलते मार्ग किसका प्रमुख कारण बने?

5नदियाँ, संगम और कुंभ

तीर्थ प्रायः नदी या झील के किनारे, वन में या पर्वत पर होते हैं; प्राकृतिक परिदृश्य ख़ुद पावन माना जाता है — "पुण्यक्षेत्र"। इस धारणा ने प्रकृति की रक्षा में मदद की, क्योंकि हम प्रकृति से अलग नहीं। वैदिक काल से नदियों की पूजा होती रही है; ऋग्वेद का "नदीस्तुति सूक्त" प्राचीन उत्तर-पश्चिम भारत की उन्नीस प्रमुख नदियों का आह्वान करता है (पृ. 175)।

जल में सात नदियाँ (पृ. 175)

आज भी कई अनुष्ठानों में जल का आह्वान इस श्लोक से होता है। नदियों को श्लोक के क्रम में लगाइए।

▲ पहली

  1. 1नर्मदा
  2. 2गंगा
  3. 3कावेरी
  4. 4गोदावरी
  5. 5सिंधु
  6. 6यमुना
  7. 7सरस्वती

▼ अंतिम

आदर से नाम (पृ. 175)

ये नदियाँ भारतीय सभ्यता के लिए जीवनदायिनी रही हैं; उनके उद्गम, सहायक नदियाँ और जिन स्थानों से वे बहती हैं, वे भी प्रायः पावन माने जाते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं में उनका नाम आदर से लिया जाता है — "गंगा जी", "यमुना जी"।

कुंभ मेला: अमृत की बूँदें (पृ. 176)

अमृत मंथन के आख्यान में देवता और असुर समुद्र-मंथन के लिए एक हुए। असुर अमृत न पाएँ, इसलिए श्री विष्णु ने मोहिनी का रूप धरकर अमृत-कलश (कुंभ) ले लिया। इसी क्रम में अमृत की कुछ बूँदें चार स्थानों पर गिरीं। कलश से बूँदें गिराइए।

चित्र हमारा है; स्थानों की जगहें मानचित्र पर नहीं।

इसे अनदेखा न करें (पृ. 176)

प्रयागराज में हर छह वर्ष में कुंभ मेला होता है। प्रयाग तीन नदियों — गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती — के संगम पर है। कुछ वर्ष पहले यूनेस्को ने कुंभ मेले को "अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर" के रूप में सूचीबद्ध किया। 2025 के कुंभ मेले में लगभग 66 करोड़ लोगों ने भाग लिया।

पुस्तक का प्रश्न: यह भारत की पूरी जनसंख्या का कितना अनुपात है? (जनसंख्या का आँकड़ा अध्याय में नहीं दिया गया — अपने शिक्षक के साथ किसी सरकारी स्रोत से लीजिए।)

सोचिए (पृ. 177): पावन स्थल लोगों के आर्थिक जीवन से कैसे जुड़े हैं? एक मानस मानचित्र (माइंड मैप) बनाइए।

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  1. 1ऋग्वेद का नदीस्तुति सूक्त कितनी नदियों का आह्वान करता है?

  2. 2इनमें कौन-सा स्थान कुंभ मेले के चार स्थानों में नहीं है?

6पर्वत, वृक्ष और पावन निकुंज

दुनिया भर की दंतकथाओं में पर्वत अक्सर देवताओं और नायकों से जुड़े होते हैं, और ऊँचाई के कारण पृथ्वी से स्वर्ग तक के प्रतीकात्मक द्वार माने जाते हैं। इसीलिए भारत के कई तीर्थ और मंदिर पहाड़ियों की चोटियों पर हैं — चोटी तक की कठिन यात्रा शरीर के साथ मन की शक्ति की भी परीक्षा है। आज ऐसे स्थानों तक सड़कों से भी पहुँचा जा सकता है (पृ. 177)।

पीपल (पृ. 178–179)

महाकाव्य हर क्षेत्र के (पृ. 178)

रामायण और महाभारत में तीर्थयात्राओं, पावन नदियों, वनों और पर्वतों का स्पष्ट वर्णन है। भारत के लगभग हर क्षेत्र में कई ग्रामीण और जनजातीय परंपराएँ मानती हैं कि इनके नायक उनके क्षेत्र से गुज़रे — और पावन स्थल इसकी याद दिलाते हैं, जैसे बस्तर (छत्तीसगढ़) का एक स्थल जहाँ भगवान राम के आने का उत्सव मनता है। इससे अलग-अलग समुदायों ने इन महाकाव्यों को अपना माना।

कई ग्रामीण और जनजातीय समुदायों ने कुछ वनों को शिकार, पेड़ कटाई या खनन से बचाने का निश्चय किया और उन्हें देवताओं का निवास माना — जैसे मेघालय में रिंगक्यू (Ryngkew) या बासा। इन्हें अंग्रेज़ी में "सेक्रेड ग्रोव्स" (पावन निकुंज) कहते हैं। पावन होने के कारण इनमें बड़ी जैव-विविधता बची, और कई में छोटे जलाशय जल संरक्षण में मदद करते हैं (पृ. 179)।

एक निकुंज, कई नाम (पृ. 180)

हर भाषा या क्षेत्र पर टैप कीजिए और उसका नाम देखिए। क्या आप कोई और नाम जोड़ सकते हैं?

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  1. 1पीपल के वानस्पतिक नाम "फ़ाइकस रिलिजिओसा" का लैटिन में शाब्दिक अर्थ?

  2. 2राजस्थान में पावन निकुंज को क्या कहते हैं?

7तीर्थयात्रा से व्यापार तक, और भारत से बाहर

तीर्थयात्री रास्ते में व्यापारियों से मिलते हैं — दोनों का फ़ायदा: यात्रियों को चीज़ें चाहिए, व्यापारी देते हैं। इसलिए तीर्थयात्रा मार्ग और व्यापार मार्ग प्रायः एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं; कुछ व्यापारी तीर्थयात्रा करते हुए अपना माल दूर के नगरों तक ले जाते (पृ. 181)।

दो जाल एक-दूसरे पर (पृ. 181)

पुस्तक कहती है: व्यापार मार्गों का अनुरेखण (ट्रेसिंग) तीर्थों के मानचित्र पर रखिए। यहाँ एक योजनाबद्ध झलक — परतें चालू-बंद कीजिए।

योजनाबद्ध चित्र, मानचित्र नहीं; रेखाएँ काल्पनिक।

उत्तरापथ और दक्षिणापथ (पृ. 181)

उत्तरापथ उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भागों को जोड़ता था; दक्षिणापथ कौशांबी और उज्जयिनी होते हुए प्रतिष्ठान (पैठन) तक जाता था। इन पर बहुमूल्य रत्न (सीप और मोती), सिक्के, सोना, हीरे, कपास, मसाले और चंदन का व्यापार होता था।

भारत से बाहर पावन भूगोल (पृ. 182)

जाँच पड़ाव

  1. 1तीर्थयात्रा मार्ग और व्यापार मार्ग प्रायः क्यों जुड़ जाते थे?

  2. 2माओरी किस पर्वत को अपना पूर्वज मानते हैं?

8संरक्षण और सार

लोगों और पावन भूगोल का सौहार्दपूर्ण संबंध हज़ारों वर्ष भारतीय सभ्यता को सँभाले रहा और पूरे उपमहाद्वीप में साझा मूल्य बनाता रहा — पर आज इस पर संकट है (पृ. 183)।

सोचिए (पृ. 182)

उत्तर में यमुना, पूर्व में महानदी, दक्षिण में कावेरी — सब पावन मानी जाती हैं। फिर भी इतनी प्रदूषित कैसे हो गईं? क्या आपके आस-पास भी ऐसे पावन स्थान हैं जो मानवीय गतिविधियों से प्रदूषित या क्षीण हुए? उनकी पावनता बनाए रखना किसका दायित्व है?

दो दृष्टियाँ (प्र. 1, डेविड सुज़ुकी, पृ. 183–184)

"हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं।" दृष्टि बदलिए।

  • पर्वतखनिज का ढेरदेवता
  • नदीकेवल सिंचाई का स्रोतपृथ्वी की शिराएँ
  • वनइमारती लकड़ी का ढेरपावन निकुंज
  • अन्य प्रजातियाँकेवल साधनमात्रहमारे संबंधी
  • पृथ्वीकेवल एक अवसरहमारी माता

छोटे समूह में चर्चा कीजिए: इस कथन का क्या अर्थ है? हमारे चारों ओर की वायु, जल, भूमि, वृक्षों और पर्वतों के प्रति व्यवहार पर इसका क्या असर पड़ता है?

आज भी प्रासंगिक (पृ. 183)

जब किसी नदी का इतना दोहन हो कि वह लुप्त होने लगे, या किसी पावन पर्वत पर विकास के अलग विचार टकराएँ, तो लोगों ने अपने पर्यावरण, देवताओं और मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई है। जब सतत विकास एक वैश्विक विषय है, पावन भूगोल पर आधारित विश्व-दृष्टि इसमें अहम योगदान दे सकती है।

पुस्तक का अपना सार — "आगे बढ़ने से पहले…" (पृ. 183)

पहले खुद याद कीजिए, फिर कार्ड पलटिए।

लिखिए (प्र. 2, पृ. 184): अपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए। वे पावन क्यों माने जाते हैं? उनसे जुड़ी कहानियाँ? बड़ों से पूछकर 150 शब्दों में लिखिए।

आख़िरी जाँच

  1. 1तीर्थयात्रा का दोहरा महत्व क्या है? (प्र. 8)

  2. 2पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा का कर्तव्य हमें कौन याद दिलाता है?