अध्याय 9उपनिवेशवाद और देहात

रिवीजन नोट्स16 मिनट

★= अति-संभावित परीक्षा-बिंदु | पुस्तक: भाग-3, पृ. 227–257

1. एक नज़र में — तीन क्षेत्र, तीन कहानियाँ

क्षेत्रटकरावपरिणति
बंगालज़मींदार बनाम कंपनी (और जोतदार)नीलामियाँ-हथकंडे; जोतदारों का उदय
राजमहलपहाड़िया (कुदाल) बनाम संथाल (हल) बनाम राजदामिन-इ-कोह; संथाल विद्रोह 1855-56
बम्बई दक्कनरैयत बनाम ऋणदाता (और राजस्व-माँग)1875 का विद्रोह; दंगा आयोग

2. इस्तमरारी बंदोबस्त (बंगाल, 1793)★★

  • गवर्नर जनरल — चार्ल्स कार्नवालिस (चित्रकार गेन्सबोरो, 1785; अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का कमांडर)
  • किनसे — राजाओं व ताल्लुक़दारों से (अब ‘ज़मींदार’ वर्गीकृत); सदा के लिए निर्धारित राजस्व
  • ★★परिभाषा: ज़मींदार “गाँव में भू-स्वामी नहीं, राज्य का राजस्व समाहर्ता (संग्राहक) मात्र”
  • क्यों: 1770s का संकट (बार-बार अकाल); संपत्ति-अधिकार + स्थायी दरें → कृषि-निवेश; योमॅन/धनी भूस्वामी वर्ग की आशा — कंपनी का वफ़ादार
  • संरचना: ज़मींदार के नीचे 400 तक गाँव; गाँव मिलाकर एक राजस्व संपदा; कुल माँग कंपनी तय करती, बँटवारा ज़मींदार
  • ★बर्दवान की नीलामी (1797): ख़रीददार अधिकतर राजा के नौकर/एजेंट; 95%+ बिक्री फ़र्जी; नियंत्रण राजा के ही हाथ
  • बंदोबस्त के बाद 75%+ ज़मींदारियाँ हस्तांतरित

चूक के चार कारण★★

  1. प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची (भविष्य की ‘प्रत्याशित हानि’ से बचने को; तर्क — बोझ शनै: शनै: घटेगा)
  2. 1790s में कृषि-कीमतें नीचीं → रैयत दे नहीं पाते
  3. माँग अपरिवर्तनीय + समय की पाबंदी; ★सूर्यास्त विधि — निश्चित तारीख़ के सूर्यास्त तक भुगतान नहीं → नीलामी
  4. बंदोबस्त ने ज़मींदार की शक्ति सीमित की (वसूली+प्रबंधन तक)

कंपनी का शिकंजा (5 कदम)★

सैन्य-टुकड़ियाँ भंग • सीमा शुल्क समाप्त • कचहरियाँ कलेक्टर-अधीन • स्थानीय न्याय-पुलिस की शक्ति छीनी • कलेक्टर = सत्ता का विकल्पी केंद्र

  • वसूली-अधिकारी: अमला; ★1798 — अकेले बर्दवान में 30,000+ लंबित वाद

3. जोतदार बनाम ज़मींदार★★

  • जोतदार — धनी किसान; बुकानन का दिनाजपुर-सर्वेक्षण; कई हज़ार एकड़; स्थानीय व्यापार व साहूकारी पर नियंत्रण
  • खेती बटाईदारों (अधियार/बरगादार) से — अपना हल, मेहनत, आधी उपज जोतदार को
  • शक्ति ज़मींदार से अधिक प्रभावी क्यों (6): गाँव में ही रहते • जमा-वृद्धि का घोर प्रतिरोध • ज़मींदारी अधिकारियों को रोकते • रैयत को एकजुट रखते • भुगतान में जान-बूझकर देरी कराते • ★नीलामी में ख़ुद ज़मीनें ख़रीदते
  • अन्य नाम: हवलदार, गाँटीदार, मंडल; सबसे शक्तिशाली — उत्तरी बंगाल

4. ज़मींदारों का प्रतिरोध★★

  • ★फ़र्जी बिक्री: बर्दवान-राजा ने पहले ज़मींदारी का हिस्सा अपनी माता को दिया (स्त्रियों की संपत्ति नहीं छीनी जाएगी — कंपनी-निर्णय); एजेंटों की जोड़-तोड़ — ऊँची बोली → ख़रीद-राशि देने से इनकार → बार-बार नीलामी → थके ख़रीददार → नीची क़ीमत पर ज़मींदार को ही वापसी
  • ★आँकड़े: 1793–1801 — चार बड़ी ज़मींदारियों की बेनामी ख़रीद = 30 लाख रु.; कुल नीलामी-बिक्रियों में 15% नक़ली
  • बेनामी = ‘गुमनाम’ — फ़र्ज़ी/महत्वहीन नाम से सौदे; लठियाल = लाठी-डंडे वाले लठैत
  • बाहरी ख़रीददार — लठियालों से पिटते; पुराने रैयत घुसने न देते (ज़मींदार = अन्नदाता, स्वयं = प्रजा)
  • 19वीं सदी के प्रारंभ में मंदी ख़त्म → बचे ज़मींदार सुदृढ़; ★1930 के दशक की मंदी में अंतत: “ज़मींदारों का भट्ठा बैठ गया”, जोतदार जमे
  • महाराजा मेहताब चंद (1820-79) — बर्दवान; संथाल-विद्रोह व 1857 में अंग्रेज़ों का साथ; अंडुल राजमहल — सत्यजित राय की ‘जलसाघर’ की शूटिंग

5. पाँचवीं रिपोर्ट★★

  • 1813 में ब्रिटिश संसद में पेश; कंपनी के प्रशासन-क्रियाकलापों पर रिपोर्टों की पाँचवीं; प्रवर समिति द्वारा
  • ★1,002 पृष्ठ; 800+ पृष्ठ परिशिष्ट — ज़मींदारों-रैयतों की अर्ज़ियाँ, कलेक्टरों की रिपोर्टें, सांख्यिकीय तालिकाएँ, बंगाल-मद्रास के राजस्व-न्यायिक प्रशासन पर टिप्पणियाँ
  • पृष्ठभूमि — इंग्लैंड में कंपनी-विरोध: एकाधिकार-विरोधी (चार्टर रद्द कराने वाले), निजी व्यापारी, उद्योगपति (भारत का बाज़ार), “लाभ केवल कंपनी को, राष्ट्र को नहीं”; कुशासन-भ्रष्टाचार की बहसें; संसद के अधिनियम, नियमित रिपोर्टें, जाँच समितियाँ
  • ★★सीमाएँ (आधुनिक शोध): लेखक कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना पर तुले थे → ज़मींदारी सत्ता के पतन का अतिरंजित वर्णन; ज़मीन खोने का पैमाना बढ़ा-चढ़ाकर; वास्तव में ज़मींदार बहुत कम विस्थापित
  • स्रोत 2 के आँकड़े: 1796-97 — जुम्मा 28,70,061 सिक्का रु. विज्ञापित, 17,90,416 में बिकी; 1797-98 — 26,66,191 विज्ञापित; बाकीदार — नदिया, राजशाही, विशनपुर के राजा; ★सबक़ — दो वर्षों के आँकड़ों से दीर्घकालीन निष्कर्ष नहीं

6. पहाड़िया लोग★★

  • नाम — राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहने से (18वीं सदी के परवर्ती राजस्व-अभिलेख)
  • जीविका: जंगल-उपज + झूम खेती — झाड़ियाँ काटना, घास-फूँस जलाना, ★राख की पोटाश से उपजाऊ ज़मीन; दालें व ज्वार-बाजरा (अपने खाने के लिए); कुदाल से खुरचना; कुछ वर्ष खेती → परती → नयी जगह
  • जंगल से: महुआ (खाना), रेशम-कोया व राल (बिक्री), लकड़ी (काठकोयला); परती की घास = चरागाह
  • जंगल = “पहचान और जीवन का आधार”; बाहरी प्रवेश का प्रतिरोध; मुखिया — एकता, झगड़े-निपटान, लड़ाई का नेतृत्व
  • मैदानों पर आक्रमण — अभाव/अकाल में जीवित रहने; ताक़त दिखाने; राजनीतिक संबंध बनाने; ★ज़मींदार ख़िराज देकर शांति ख़रीदते; व्यापारी पथकर देते (बदले में रक्षा)
  • ★★नीतियाँ: 1770s — निर्मूलन/संहार की क्रूर नीति → 1780s — ऑगस्टस क्लीवलैंड (भागलपुर कलेक्टर) की शांति-नीति: मुखियाओं को वार्षिक भत्ता, बदले में आदमियों के चाल-चलन की ज़िम्मेदारी; परिणाम — बहुतों ने मना किया; लेने वाले समुदाय में सत्ता खो बैठे (‘वैतनिक मुखिया’)
  • 1810-11 में बुकानन को संदेह-अविश्वास से देखा — “प्रत्येक गोरा आदमी” जंगल-ज़मीन छीनने वाली शक्ति का प्रतिनिधि
  • औपनिवेशिक दृष्टि: जंगल = उजाड़; वनवासी = “असभ्य, बर्बर, उपद्रवी, क्रूर” → सफ़ाया + स्थायी कृषि + ‘सभ्य बनाना’; कारण — राजस्व, निर्यात-फ़सलें, स्थायी समाज
  • विलियम होजेज — कुक की दूसरी प्रशांत यात्रा (1772-75) से भारत; 1781 क्लीवलैंड-मित्र; 1782 जंगल महाल; एक्वाटिंट (ताम्रपट्टी + अम्ल); स्वच्छंदतावाद — वही ‘उजाड़’ दृश्य उसे रमणीय दिखे

7. संथाल और दामिन-इ-कोह★★

  • संथाल 1780 के दशक से बंगाल में; ज़मींदार भाड़े पर रखते (नयी ज़मीन तैयार करने); ब्रिटिश निमंत्रण — जंगल महालों में बसना
  • कारण: पहाड़िया हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं, “उपद्रवी”; संथाल “आदर्श बाशिंदे” — सफ़ाये में हिचक नहीं, पूरी ताक़त से जुताई
  • ★★दामिन-इ-कोह (1832): राजमहल की तलहटी का बड़ा इलाका सीमांकित — “संथालों की भूमि”; शर्त — अनुदान की ज़मीन का कम-से-कम 1/10 भाग पहले 10 वर्षों में साफ़ कर जोतना; सर्वेक्षण, नक्शा, खंबों से परिसीमा
  • ★विस्तार: गाँव 40 (1838) → 1,473 (1851); जनसंख्या 3,000 → 82,000+; कंपनी-राजस्व बढ़ा; संथाल गीतों-मिथकों में यात्रा का इतिहास — दामिन में ‘पूर्ण विराम’
  • पहाड़िया-पराभव: भीतर धकेले गए; निचली पहाड़ियों-घाटियों से रोक; चट्टानी-बंजर ऊपरी भाग तक सीमित → ग़रीब; ★कारण — झूम को चाहिए नयी उर्वर ज़मीनें, जो अब दामिन का हिस्सा; जंगल कटने से शिकार भी संकट में
  • संथाल-परिवर्तन: खानाबदोशी छोड़ी; वाणिज्यिक फ़सलें; व्यापारी-साहूकार से लेन-देन
  • ★★विद्रोह के कारण (तीन निशाने): (1) राज्य — साफ़ की ज़मीन पर भारी कर; (2) साहूकार (दिकू) — ऊँचा ब्याज, कर्ज़ पर ज़मीन-क़ब्ज़ा; (3) ज़मींदार — दामिन पर नियंत्रण का दावा → 1850s: “अपना शासन” वाला आदर्श संसार → विद्रोह 1855-56; नेता — सिधू मांझी
  • ★संथाल परगना: भागलपुर व बीरभूम से 5,500 वर्ग मील; विशेष क़ानूनों की आशा
  • ★चित्र-राजनीति (ILN 1856): जलते गाँव “गर्वपूर्वक” ब्रिटेन में दिखाए; हाथी पर विजयगर्वित अधिकारी, हुक्का — ‘अजेय हुकूमत’ का संदेश; “नीरव-शांत” गाँव अब “नृशंस-बर्बर कृत्यों के स्थान”

8. बुकानन★★

  • फ्रांसिस बुकानन — चिकित्सक; बंगाल चिकित्सा सेवा 1794–1815; वेलेज़्ली का शल्य-चिकित्सक; कलकत्ता (अलीपुर) चिड़ियाघर की स्थापना; वानस्पतिक उद्यान प्रभारी; बंगाल सरकार के अनुरोध पर भूमि-सर्वेक्षण; 1815 इंग्लैंड; माता की जायदाद + वंश-नाम ‘हैमिल्टन’ → बुकानन-हैमिल्टन
  • ★★यात्रा की असलियत: कंपनी का कर्मचारी; नक्शा नवीसों-सर्वेक्षकों-कुलियों का दल; ख़र्च कंपनी उठाती (सूचनाएँ चाहिए थीं); “क्या देखना, खोजना, लिखना” की साफ़ हिदायतें; गाँव में “सरकार का एजेंट”
  • प्रेक्षण: लौह खनिज, अबरक, ग्रेनाइट, साल्टपीटर; नमक-लोहा की स्थानीय पद्धतियाँ; चट्टानों की परतें (स्रोत 4)
  • ★★विकास-दृष्टि: हर भूदृश्य में — “अधिक उत्पादक कैसे बने”; प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न; आकलन कंपनी के वाणिज्यिक सरोकार + पाश्चात्य प्रगति-विचार से; वनवासी जीवन-शैली का आलोचक — “वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा”
  • स्रोत 3 — संथाल “नयी ज़मीनें साफ़ करने में बहुत होशियार, लेकिन नीचता से रहते हैं”; स्रोत 5 — “कमी है तो बस प्रगति की… टसर-लाख के बागान… बाकी जंगल भी साफ़… पनई ताड़ और महुआ”

9. बम्बई दक्कन — 1875 का विद्रोह★★

  • 12 मई 1875 — सूपा (पूना ज़िले की मंडी) से आरंभ; साहूकारों पर हमला — ★बही-खातों व ऋणबंधों की माँग → जलाना; अनाज-दुकानें लूटीं; घरों में आग
  • फैलाव — पूना → अहमदनगर → 2 महीनों में 6,500 वर्ग किमी; 30+ गाँव; स्वरूप सब जगह एक-समान
  • प्रतिक्रिया — 1857 की याद से घबराहट; थाने; सेना; 95 गिरफ़्तार; काबू में कई महीने
  • स्रोत 6 (“उस दिन सूपा में”, 16 मई 1875): एक साहूकार का घर पूरा जला; दर्जन मकान टूटे; 50 गिरफ़्तार; 2,000 रु. माल बरामद; हानि-अनुमान 25,000+; साहूकारों का दावा 1 लाख+
  • साहूकार = पैसा उधार + व्यापार दोनों

10. नयी राजस्व प्रणाली (रैयतवाड़ी)★★

  • इस्तमरारी बंगाल से बाहर बिरले क्यों — ★1810 के बाद कीमतें बढ़ीं → ज़मींदारों की आय बढ़ी, पर सरकार स्थायी माँग से हिस्सा नहीं ले सकती थी → नए प्रदेशों में अस्थायी बंदोबस्त
  • ★★रिकार्डो-प्रभाव: 1820s में इंग्लैंड में डेविड रिकार्डो विख्यात; अधिकारियों ने कॉलेज में पढ़ा; सिद्धांत — भूस्वामी का हक़ केवल ‘औसत लगान’; उससे अधिक = अधिशेष → उस पर राज्य का कर, वरना किसान किरायाजीवी (Rentier) बन जाएँगे, अधिशेष भूमि-सुधार में निवेश नहीं होगा; “बंगाल के ज़मींदार किरायाजीवी बन गए” — रिकार्डो की पुष्टि मानी गई
  • रैयतवाड़ी: राजस्व सीधे रैयत से तय; भूमि-प्रकारों की औसत आय का अनुमान; रैयत की क्षमता का आकलन; सरकार का अनुपात निर्धारित; ★हर 30 साल पुनर्सर्वेक्षण — दर बढ़ जाती → माँग चिरस्थायी नहीं

11. राजस्व-कर्ज़-अकाल-चक्र★

  • पहला बंदोबस्त 1820 के दशक (काल-रेखा: 1818); माँग इतनी अधिक कि किसान गाँव छोड़ गए; ख़राब ज़मीन-अनिश्चित वर्षा वाले इलाकों में विकट
  • कलेक्टरों की कठोर वसूली — फ़सल-ज़ब्ती, समूचे गाँव पर जुर्माना
  • ★1832 के बाद कृषि-कीमतों में तेज़ गिरावट (डेढ़ दशक); 1832-34 अकाल — दक्कन का 1/3 पशुधन मरा, आधी मानव जनसंख्या काल-ग्रस्त; बकाया आसमान पर
  • कर्ज़-चक्र: राजस्व, ज़रूरत, हल-बैल, शादियाँ — सब उधार से; 1840s तक सर्वत्र कर्ज़-साक्ष्य; 1840s मध्य में पुनरुत्थान — माँग हलकी; 1845 के बाद कीमतें बढ़ीं; विस्तार (गोचर → खेती) → फिर उधार

12. कपास-तेज़ी और पतन★★

  • 1860 से पहले ब्रिटेन की 3/4 कपास अमेरिका से; चिंता → 1857 कपास आपूर्ति संघ; 1859 मैनचेस्टर कॉटन कंपनी — “दुनिया के हर भाग में कपास-उत्पादन को प्रोत्साहन”; भारत = भूमि-जलवायु उपयुक्त, सस्ता श्रम
  • ★★1861 अमेरिकी गृहयुद्ध: अमेरिका से आयात 3% से कम — 1861: 20 लाख गाँठें (400 पाउंड प्रति) → 1862: 55 हज़ार; भारत को संदेश — और निर्यात करो; कीमतों में उछाल; अग्रिम-शृंखला: निर्यातक → शहरी साहूकार → ग्रामीण ऋणदाता; ★रैयत को असीमित ऋण — 100 रु. प्रति एकड़ (कपास पर)
  • विस्तार: 1860-64 रकबा दोगुना; ★1862 — ब्रिटेन के कपास-आयात का 90% अकेले भारत से
  • ★पर — “कुछ धनी किसानों को लाभ, अधिकांश कर्ज़ के बोझ से और अधिक दबे”
  • 1865: गृहयुद्ध ख़त्म → अमेरिकी उत्पादन बहाल → निर्यात-गिरावट; बॉम्बे गजट (1861) का सपना — “लंकाशायर का एकमात्र आपूर्तिकर्ता” — ध्वस्त
  • ★★दोहरी मार: ऋण-स्रोत सूखा (अग्रिम बंद, वसूली की माँग) + नया बंदोबस्त — माँग में 50-100% वृद्धि; ऋणदाता का इनकार — क्षमता में अविश्वास

13. अन्याय का अनुभव★★

  • रैयत का गुस्सा — कर्ज़ पर उतना नहीं जितना ★★ऋणदाता की संवेदनहीनता व “देहात के प्रथागत मानकों (रूढ़ि रिवाजों) के उल्लंघन” पर
  • ★प्रथागत मानक: ब्याज मूलधन से अधिक नहीं — जबरन वसूली सीमित करने व ‘उचित ब्याज’ की परिभाषा; औपनिवेशिक शासन में धज्जियाँ — आयोग का केस: 100 रु. मूलधन पर 2,000+ रु. ब्याज
  • ★★परिसीमन क़ानून (1859): ऋणपत्र केवल 3 वर्ष मान्य — उद्देश्य: ब्याज-संचय रोकना; उलटा असर — हर तीसरे साल नया बंधपत्र; शेष राशि (मूलधन+संचित ब्याज = मिश्रधन) नया ‘मूलधन’ → उस पर नया ब्याज
  • हथकंडे: चुकाने पर रसीद देने से इनकार; बंधपत्रों में जाली आँकड़े; फ़सल नीची क़ीमत पर; अंतत: संपत्ति पर क़ब्ज़ा
  • ★दस्तावेज़ों का आतंक: दस्तावेज़-बंधपत्र = “नयी अत्याचारपूर्ण प्रणाली के प्रतीक”; ब्रिटिश दृष्टि — शर्तें लिखित-स्पष्ट-विधिसम्मत हों, वरना मूल्यहीन; किसान अनजाने हस्ताक्षर/अँगूठा लगाते; “हर लिखे हुए शब्द से डरने लगे” — पर लाचार (ऋण चाहिए, दस्तावेज़ के बिना ऋण नहीं)
  • स्रोत 8 (रैयत अर्जी, मीरगाँव, करजत → कलेक्टर अहमदनगर): कीमतें नकद-ग्राहकों से 25-50% ज़्यादा; उपज ले जाते पर खाते में नहीं चढ़ाते, रसीद नहीं
  • स्रोत 9 (भाड़ा-पत्र, नवंबर 1873): कर्ज़ के खाते में दो गाड़ियाँ + चार बैल ‘बेचे’, फिर उन्हीं को भाड़े पर लिया — 4 रु. प्रतिमाह; अपने ही बैलों का किराया!
  • स्रोत 10 (कर्ज़ कैसे बढ़े): 100 रु. @ 3-2 आने प्रतिशत मासिक; हर 3 साल मिश्रधन का नया बांड; ★12 वर्षों में 1,000 रु. पर कुल ब्याज 2,028 रु. 10 आना 3 पैसे

14. दक्कन दंगा आयोग★★

  • बम्बई सरकार गंभीर नहीं थी; भारत सरकार (1857-भय) के दबाव से जाँच आयोग; रिपोर्ट 1878 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में
  • सामग्री: दंगा-ज़िलों में जाँच; रैयत-साहूकार-चश्मदीदों के बयान; राजस्व-दरों, कीमतों, ब्याज के आँकड़े; कलेक्टर-रिपोर्टों का संकलन
  • ★★★पक्षधरता: आयोग से विशिष्ट रूप से पूछा गया — क्या सरकारी राजस्व-माँग कारण थी? उत्तर — माँग कारण नहीं; सारा दोष ऋणदाताओं/साहूकारों का — “औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या रोष कभी सरकारी कार्रवाई के कारण उत्पन्न हुआ था।”
  • ★★विधि-सूत्र: सरकारी रिपोर्टें बहुमूल्य पर — समाचारपत्रों, गैर-सरकारी वृत्तांतों, वैधिक अभिलेखों, मौखिक स्रोतों से मिलान करके विश्वसनीयता की जाँच

15. काल-रेखा★

1765 दीवानी → 1773 रेग्यूलेटिंग एक्ट → 1793 इस्तमरारी बंदोबस्त → 1800s संथाल-आगमन (राजमहल) → 1813 पाँचवीं रिपोर्ट → 1818 दक्कन का पहला बंदोबस्त → 1820s कीमतें गिरीं → 1832-34 अकाल → 1832 दामिन-इ-कोह → 1840-50s धीमा कृषि-विस्तार → 1855-56 संथाल बगावत → 1857 कपास आपूर्ति संघ → 1859 मैनचेस्टर कॉटन कंपनी + परिसीमन क़ानून → 1861 कपास-तेज़ी → 1865 पतन → 1875 दक्कन-विद्रोह → 1878 आयोग-रिपोर्ट

16. स्मरण-सूत्र

  1. चूक के कारण: “ऊँची-नीची-सूर्यास्त-सीमित” (ऊँची माँग, नीची कीमतें, सूर्यास्त विधि, सीमित शक्ति)
  2. जोतदार के अन्य नाम: “ह-गाँ-मं” (हवलदार, गाँटीदार, मंडल)
  3. संथाल के तीन शत्रु: “क-दि-ज़” (कर, दिकू, ज़मींदार)
  4. दामिन-आँकड़े: “40 से 1473; 3 से 82 हज़ार”
  5. कपास: “3/4 → 3% → 90%” (अमेरिका-निर्भरता → गृहयुद्ध-गिरावट → भारत-हिस्सा)
  6. दक्कन-गुस्से की जड़: “ब्याज > मूलधन = रूढ़ि-उल्लंघन”
  7. स्रोत-जाँच: “स-गै-वै-मौ” से मिलान (समाचारपत्र, गैर-सरकारी, वैधिक, मौखिक)

17. अंतिम 10 मिनट (परीक्षा-द्वार पर)

  1. 1793 कार्नवालिस • “राजस्व समाहर्ता मात्र” • सूर्यास्त विधि • 75% हस्तांतरण
  2. बर्दवान 1797 — 95% फ़र्जी • बेनामी 30 लाख (1793-1801) • 15% नक़ली • लठियाल-अन्नदाता
  3. जोतदार — दिनाजपुर-बुकानन • अधियार/बरगादार • 1930s में ज़मींदारों का भट्ठा
  4. पाँचवीं रिपोर्ट 1813 — 1002 पृष्ठ • प्रवर समिति • पतन-चित्र अतिरंजित
  5. पहाड़िया — झूम-कुदाल-पोटाश • ख़िराज-पथकर • 1770s संहार बनाम 1780s क्लीवलैंड-भत्ता
  6. संथाल — 1832 दामिन-इ-कोह • 1/10 दस वर्षों में • 40→1473 • दिकू • 1855-56 • संथाल परगना (5,500 वर्ग मील)
  7. बुकानन — कंपनी-कर्मचारी • हिदायतें • खनिज-खोज • “वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा”
  8. रैयतवाड़ी — रिकार्डो • औसत लगान-किरायाजीवी • सीधे रैयत से • 30-वर्षीय पुनर्सर्वेक्षण
  9. दक्कन — 1818/1820s बंदोबस्त • 1832-34 अकाल • 1861 तेज़ी (100 रु./एकड़; 90%) • 1865 पतन • 50-100% वृद्धि
  10. 1875 सूपा — बही-खाते जले • रूढ़ि-उल्लंघन (100 पर 2,000 ब्याज) • 1859 परिसीमन-क़ानून का उलटा असर • भाड़ा-पत्र • आयोग 1878 — दोष साहूकारों पर, सरकार पर नहीं