आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ (लगभग 600 ई.पू. – 600 ई.) | परीक्षा-केंद्रित संक्षिप्त नोट्स
0. पृष्ठभूमि★
- हड़प्पा के बाद डेढ़ हज़ार वर्ष का अंतराल; इसी काल में ऋग्वेद का लेखन।
- महापाषाण (Megalith) शवाधान — पहली सहस्राब्दि ई.पू., मध्य व दक्षिण भारत; शवों के साथ लोहे के उपकरण व हथियार।
- छठी शताब्दी ई.पू. से परिवर्तन: आरंभिक राज्य-साम्राज्य-रजवाड़े + कृषि-संगठन में बदलाव + नए नगरों का उदय।
- स्रोत: अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के, चित्र। चेतावनी: इनसे पूरी कहानी नहीं मिलती।
1. प्रिंसेप और पियदस्सी★
- 1830 का दशक — जेम्स प्रिंसेप (ईस्ट इंडिया कंपनी अधिकारी) ने ब्राह्मी व खरोष्ठी का अर्थ निकाला।
- पियदस्सी = ‘मनोहर मुखाकृति वाला’; कुछ अभिलेखों में नाम असोक।
- अभिलेख: पत्थर/धातु/मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे; स्थायी प्रमाण।
- तिथि न हो तो पुरालिपि (Palaeography) से काल-निर्धारण (250 ई.पू. का ‘अ’ ≠ 500 ई. का ‘अ’)।
- प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में = जनसामान्य की भाषाएँ। अभिलेखशास्त्र = Epigraphy।
2. प्रारंभिक राज्य★
2.1 सोलह महाजनपद
- छठी श. ई.पू. से जुड़े: आरंभिक राज्य • नगर • लोहे का बढ़ता प्रयोग • सिक्के; बौद्ध व जैन का विकास।
- सूची एकसमान नहीं; बार-बार आने वाले: वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार, अवन्ति।
- जनपद = वह भूखंड जहाँ कोई जन बस जाता है (प्राकृत व संस्कृत दोनों में)।
- दो शासन-प्रकार: (1) राजतंत्र (2) गण/संघ — समूह शासन; प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता; महावीर व बुद्ध इन्हीं से; वज्जि संघ — आर्थिक स्रोतों पर सामूहिक नियंत्रण।
- ओलीगार्की/समूहशासन = सत्ता पुरुषों के एक समूह के हाथ में।
- राजधानियाँ किलेबंद; धर्मशास्त्र (छठी श. ई.पू. से, संस्कृत, ब्राह्मणों द्वारा) — शासक क्षत्रिय वर्ण से हों।
- शासक का काम — किसानों/व्यापारियों/शिल्पकारों से कर व भेंट; पड़ोसी पर आक्रमण भी ‘वैध’ उपाय।
- स्थायी सेना बनाम सहायक-सेना (कृषक वर्ग से नियुक्त)।
- गण-राज्य लगभग एक हज़ार साल तक बने रहे।
2.2 मगध★★
- छठी–चौथी श. ई.पू. में सबसे शक्तिशाली महाजनपद (आधुनिक बिहार)।
- आधुनिक इतिहासकार — 4 भौतिक कारण: (1) खेती की अच्छी उपज (2) लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड) (3) हाथी (सेना का अंग) (4) गंगा व उपनदियाँ — सस्ता आवागमन।
- आरंभिक जैन-बौद्ध लेखक — भिन्न व्याख्या: शासकों की नीतियाँ — बिंबिसार, अजातसत्तु, महापद्मनंद; मंत्री नीतियाँ लागू करते।
- राजधानी: राजगाह (= ‘राजाओं का घर’; आधुनिक राजगीर का प्राकृत नाम; पहाड़ियों के बीच किलेबंद) → चौथी श. ई.पू. में पाटलिपुत्र (गंगा-मार्ग पर)।
3. मौर्य साम्राज्य★★
- संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) — अफ़ग़ानिस्तान-बलूचिस्तान तक; पौत्र असोक — कलिंग विजय।
- 5 स्रोत: पुरातत्त्व/मूर्तिकला • मेगस्थनीज़ (यूनानी राजदूत; केवल कुछ अंश उपलब्ध) • अर्थशास्त्र (कौटिल्य/चाणक्य) • परवर्ती जैन-बौद्ध-पौराणिक ग्रंथ • असोक के अभिलेख (सबसे मूल्यवान)।
- असोक पहला सम्राट जिसने संदेश पत्थरों व पॉलिश किए स्तंभों पर लिखवाए।
- धम्म के 4 तत्व: बड़ों के प्रति आदर • संन्यासियों-ब्राह्मणों के प्रति उदारता • सेवकों-दासों से उदार व्यवहार • दूसरे के धर्मों व परंपराओं का आदर।
- भाषा-लिपि: अधिकांश प्राकृत/ब्राह्मी; पश्चिमोत्तर — अरामेइक व यूनानी; कुछ खरोष्ठी; यूनानी-अरामेइक लिपियाँ अफ़ग़ानिस्तान में।
3.2 प्रशासन★
- 5 राजनीतिक केंद्र: राजधानी पाटलिपुत्र + तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि, सुवर्णगिरि।
- चयन का तर्क: तक्षशिला व उज्जयिनी — व्यापार मार्ग; सुवर्णगिरि (=‘सोने के पहाड़’) — कर्नाटक में सोने की खदान।
- संदेश एक जैसे — पर प्रशासन एकसमान नहीं रहा होगा; सबसे प्रबल नियंत्रण राजधानी व प्रांतीय केंद्रों पर।
- मेगस्थनीज़: एक समिति + छह उपसमितियाँ — (1) नौसेना (2) यातायात व खान-पान (3) पैदल (4) अश्वारोही (5) रथारोही (6) हाथी।
- धम्म महामात्त — धम्म-प्रचार हेतु विशेष अधिकारी।
- यूनानी विवरण: 6 लाख पैदल • 30 हज़ार घुड़सवार • 9 हज़ार हाथी — कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
3.3 मौर्य कितना महत्त्वपूर्ण?★
- महिमामंडन: 19वीं सदी — भारत ब्रिटिश अधीन; प्राचीन साम्राज्य की संभावना उत्साहवर्धक; प्रस्तर मूर्तियाँ; असोक शक्तिशाली, परिश्रमी व विनीत; 20वीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं की प्रेरणा।
- आलोचना (4 बिंदु): मात्र डेढ़ सौ साल • सभी क्षेत्रों में नहीं फैला • नियंत्रण एकसमान नहीं • दूसरी श. ई.पू. से नए रजवाड़े।
4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत★
सरदार बनाम राजा (परीक्षा-प्रिय)
| सरदार | राजा |
|---|---|
| पद वंशानुगत हो भी सकता है, नहीं भी | प्रायः वंशानुगत |
| समर्थक = खानदान के लोग | प्रजा |
| भेंट लेता व वितरित करता है | कर वसूलते हैं |
| कोई स्थायी सेना/अधिकारी नहीं | स्थायी सेना व नौकरशाही |
| कार्य: अनुष्ठान, युद्ध-नेतृत्व, मध्यस्थता | शासन, कर, न्याय |
- तमिलकम = तमिलनाडु + आंध्र व केरल के कुछ हिस्से → चोल, चेर, पाण्ड्य सरदारियाँ; समृद्ध व स्थायी।
- स्रोत: तमिल संगम ग्रंथ।
- सातवाहन — मध्य-पश्चिम भारत (लगभग द्वितीय श. ई.पू. – द्वितीय श. ई.); शक — पश्चिमोत्तर व पश्चिम, मध्य एशियाई मूल।
4.2 दैविक राजा★
- कुषाण (लगभग प्रथम श. ई.पू. – प्रथम श. ई.): माट (मथुरा के पास) व अफ़ग़ानिस्तान के देवस्थानों पर विशालकाय मूर्तियाँ → स्वयं को देवतुल्य।
- उपाधि ‘देवपुत्र’ — संभवतः चीनी शासकों (स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते) से प्रेरित।
- प्रमाण: कुषाण — सिक्के व मूर्तियाँ; गुप्त — साहित्य, सिक्के, अभिलेख, प्रशस्तियाँ।
- गुप्त काल: साम्राज्य सामंतों पर निर्भर; सामंत स्थानीय संसाधनों से निर्वाह + सैनिक सहायता; शक्तिशाली सामंत राजा बन जाते, दुर्बल राजा अधीन हो जाते।
- प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) — रचयिता हरिषेण, समुद्रगुप्त के राजकवि, संस्कृत में। समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र, यम के तुल्य बताया।
- ! इतिहासकार की सावधानी: रचयिता इन्हें तथ्यात्मक नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे।
5. बदलता हुआ देहात★★
5.1 राजा की छवि
- जातक कथाएँ — पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य, पालि भाषा; स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ। साथ ही पंचतंत्र।
- गंदतिन्दु जातक: कुटिल राजा की प्रजा दुखी; राजा पहचान बदलकर गया → सबने भला-बुरा कहा।
- शिकायत: रात में डकैत, दिन में कर-अधिकारी → लोग गाँव छोड़कर जंगल में बस गए।
- निष्कर्ष: राजा-प्रजा के संबंध तनावपूर्ण; करों की माँग ने किसानों को उपज बढ़ाने पर विवश किया।
5.2 उपज बढ़ाने के तरीके★
- हल का प्रचलन — छठी श. ई.पू. से गंगा व कावेरी की उर्वर घाटियों में; भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल।
- धान की रोपाई — गंगा घाटी में भारी उपज-वृद्धि; पर कमरतोड़ मेहनत।
- विधि: बीज अंकुरित कर पानी भरे खेतों में रोपाई → अधिक पौध बचती है।
- ! सीमाएँ: लोहे का हल कुछ ही हिस्सों तक; पंजाब-राजस्थान में बीसवीं सदी में शुरू; पूर्वोत्तर व पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल।
- सिंचाई: कुएँ, तालाब, कहीं-कहीं नहरें; बनाने वाले प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग → अभिलेखों में उल्लेख करवाया।
- ★सुदर्शन झील (गुजरात): कृत्रिम जलाशय; मौर्य काल में स्थानीय राज्यपाल द्वारा निर्माण → तूफ़ान से तटबंध टूटे → शक शासक रुद्रदमन ने अपने खर्चे से मरम्मत, प्रजा से कर नहीं लिया → लगभग 5वीं सदी में गुप्त शासक ने पुनः मरम्मत। (अभिलेख: लगभग दूसरी श. ई., संस्कृत; मानचित्र 2 में गिरनार)
5.3 ग्रामीण विभिन्नताएँ★
- उपज बढ़ी पर लाभ समान नहीं; खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद।
- भूमिहीन खेतिहर श्रमिक • छोटे किसान • बड़े ज़मींदार।
- गहपति (पालि) — छोटे किसानों व ज़मींदारों के लिए; घर का मुखिया, महिलाओं-बच्चों-नौकरों-दासों पर नियंत्रण, भूमि-जानवर का मालिक; कभी-कभी नगरों के संभ्रांत व्यापारियों के लिए भी।
- ग्राम प्रधान — पद प्रायः वंशानुगत।
- तमिल संगम शब्द: वेल्लालर = बड़े ज़मींदार • उणवर = हलवाहा • अणिमई = दास।
- आधार: भूमि का स्वामित्व, श्रम, नयी प्रौद्योगिकी → भूमि-स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया।
- मनुस्मृति — सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ; संस्कृत; दूसरी श. ई.पू. – दूसरी श. ई. के बीच। सीमा-चिह्न: पत्थर, हड्डियाँ, गाय के बाल, भूसी, राख, खपटे, गोबर, ईंट, कोयला, कंकड़, रेत।
5.4 भूमिदान★★
- ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से प्रमाण; कुछ पत्थरों पर, अधिकांश ताम्र पत्रों पर (प्रमाण रूप में दिए जाते)।
- प्राप्तकर्ता: धार्मिक संस्थाएँ या ब्राह्मण; भाषा संस्कृत (सातवीं श. के बाद तमिल व तेलुगु भी)।
- अग्रहार = ब्राह्मणों को दान किया भूभाग; भूमिकर/अन्य कर नहीं; ब्राह्मणों को स्वयं स्थानीय लोगों से कर वसूलने का अधिकार।
- ★प्रभावती गुप्त: चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री; विवाह दक्कन के वाकाटक परिवार में।
- विरोधाभास: धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं — पर अभिलेख कहता है वह भूमि की स्वामी थी और उसने दान किया।
- दो व्याख्याएँ: (1) वह रानी थी → विरला उदाहरण (2) धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किए जाते थे।
- दंगुन गाँव को दान; 13वें राज्य वर्ष में लिखा; उत्कीर्णक चक्रदास।
- भूमिदान पर दो मत: (1) कृषि को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की रणनीति (2) दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत — राजा ने समर्थक जुटाने हेतु दान किए।
- ! नियंत्रण से बाहर के लोग: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार, घुमक्कड़, जगह-जगह घूमकर खेती करने वाले — अपने जीवन व आदान-प्रदान के विवरण नहीं रखते थे।
- हर्षचरित — बाणभट्ट (लगभग सातवीं श. ई.), हर्षवर्धन के राजकवि; विंध्य क्षेत्र के गाँव का चित्रण — कुदाल, वन-उपज (छाल, फूल, अलसी, सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी, घास)।
6. नगर एवं व्यापार★★
6.1 नए नगर
- छठी श. ई.पू. से; अधिकांश महाजनपदों की राजधानियाँ; प्रायः संचार मार्गों के किनारे।
- नदीमार्ग — पाटलिपुत्र | भूतल मार्ग — उज्जयिनी | समुद्रतट — पुहार | बहुविध केंद्र — मथुरा।
- पाटलिपुत्र: पाटलिग्राम गाँव → 5वीं श. ई.पू. में मगध की राजधानी बनी (राजगाह से स्थानांतरण) → 4थी श. ई.पू. तक एशिया के सबसे बड़े नगरों में → श्वैन त्सांग (7वीं सदी ई.) के समय खंडहर, जनसंख्या कम।
6.2 नगरीय जनसंख्या★
- उत्खनन की सीमा: व्यापक खुदाई संभव नहीं — आज भी लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न)।
- उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (NBPW) — चमकदार कलई चढ़े कटोरे-थालियाँ; संभवतः अमीर लोग प्रयोग करते।
- सोना, चाँदी, कांस्य, ताँबा, हाथी दाँत, शीशा — गहने, उपकरण, हथियार, बर्तन, सीप, पक्की मिट्टी।
- दानात्मक अभिलेख (द्वितीय श. ई.पू. से): दाता के नाम के साथ व्यवसाय भी — धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी, राजा।
- ★श्रेणी (Guild): उत्पादकों व व्यापारियों का संघ; पहले कच्चा माल खरीदती → सामान तैयार कर बाज़ार में बेचती।
- चित्र 2.6: मथुरा — स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने मूर्ति स्थापित की (प्राकृत अभिलेख)।
6.3 व्यापार★
- छठी श. ई.पू. से नदी-मार्ग व भूमार्गों का जाल।
- जलमार्ग: अरब सागर → उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया | बंगाल की खाड़ी → चीन, दक्षिणपूर्व एशिया।
- शासकों ने मार्गों पर नियंत्रण; सुरक्षा के बदले धन लेते थे।
- सफल व्यापारी: तमिल — मसत्तुवन; प्राकृत — सत्थवाह व सेट्ठी।
- रोमन माँग: काली मिर्च जैसे मसाले, कपड़े, जड़ी-बूटियाँ → अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्र।
- पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी — यूनानी समुद्र यात्री, लगभग प्रथम श. ई.; पेरिप्लस = समुद्री यात्रा, एरीथ्रियन = लाल सागर।
- मालाबार तट: काली मिर्च व दालचीनी का निर्यात; आयात — सिक्के, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबा, टिन, सीसा।
- कोडुमनाल (तमिलनाडु) — मूँगों के उद्योग के पुरातात्त्विक साक्ष्य।
6.4 सिक्के★★
| सिक्का | काल/जारीकर्ता | विशेष |
|---|---|---|
| आहत सिक्के | छठी श. ई.पू.; चाँदी-ताँबा | सबसे पहले; प्रतीकों को आहत कर बनाए; राजाओं ने जारी किए (संभवतः व्यापारी-धनपति-नागरिक भी) |
| प्रतिमा वाले | द्वितीय श. ई.पू.; हिंद-यूनानी | शासकों की प्रतिमा व नाम वाले सबसे पहले सिक्के |
| सोने के | प्रथम श. ई.; कुषाण | आकार-वजन रोमन व पार्थियन सिक्कों के समान |
| रोमन सिक्के | दक्षिण भारत | व्यापारिक तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था |
| यौधेय | प्रथम श. ई.; कबायली गणराज्य (पंजाब-हरियाणा) | ताँबे के हज़ारों सिक्के → व्यापार में रुचि |
| गुप्त सोने के | गुप्त काल | सबसे भव्य; आरंभिक सिक्कों का सोना अति उत्तम |
- मुद्राशास्त्र (Numismatics) = सिक्कों + उन पर के चित्र-लिपि + धातु-विश्लेषण + प्राप्ति-संदर्भ का अध्ययन।
- छठी श. ई. से सोने के सिक्के कम — दो मत: (1) रोमन साम्राज्य के पतन से दूरवर्ती व्यापार में कमी (2) नए नगर व नवीन तंत्र का उदय; सिक्के प्रचलन में थे, संग्रह नहीं हुए इसलिए कम मिलते हैं।
7. लिपियों का पढ़ा जाना★★
- ब्राह्मी — आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल।
- 18वीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली-देवनागरी पांडुलिपियों के अक्षरों की प्राचीन नमूनों से तुलना की।
- भूल: विद्वानों ने अनुमान लगाया अभिलेख संस्कृत में हैं — वस्तुतः प्राकृत में थे।
- 1838 ई. — जेम्स प्रिंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाला।
- खरोष्ठी: हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय-प्रथम श. ई.पू.) के सिक्कों पर नाम यूनानी + खरोष्ठी दोनों में → अक्षरों का मेल (उदा. अपोलोडोटस में ‘अ’)।
- भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में → लंबे अभिलेख पढ़ना सरल।
- ★अध्याय 1 से तुलना: हड़प्पाई लिपि नहीं पढ़ी जा सकी क्योंकि कोई द्विभाषिक अभिलेख नहीं मिला।
7.3 अभिलेखों का परीक्षण
- असोक का नाम नहीं, केवल उपाधियाँ: देवानांपिय = ‘देवताओं का प्रिय’; पियदस्सी = ‘देखने में सुन्दर’।
- अभिलेखशास्त्रियों का आधार: विषय, शैली, भाषा, पुरालिपिविज्ञान में समानता → एक ही शासक।
- परीक्षण के प्रश्न: असोक का दावा (पहले रिपोर्ट-व्यवस्था नहीं थी) क्या सही है? कोष्ठक में शब्द जोड़ते समय मूल अर्थ न बदले; अधिकांश लोग पढ़े-लिखे नहीं थे।
- पतिवेदक = संवाददाता — “चाहे मैं कहीं भी हूँ… हर स्थल पर निराकरण करूँगा”।
- ★कलिंग (स्रोत 11): शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर विजय; डेढ़ लाख निष्कासित, एक लाख मारे गए, और इससे भी ज्यादा की मृत्यु।
- सूक्ष्म तथ्य: असोक के अभिलेख उड़ीसा से मिले हैं — पर वेदना वाला अभिलेख वहाँ नहीं मिला।
8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा (सबसे महत्त्वपूर्ण)★★
- तकनीकी: अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण — पढ़ना मुश्किल; अभिलेख नष्ट हो सकते हैं।
- अर्थ-संबंधी: शब्दों का वास्तविक अर्थ जानना कठिन — कुछ अर्थ विशेष स्थान/समय से संबंधित; विद्वान वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं।
- मात्रात्मक: हज़ारों मिले, पर सभी के अर्थ नहीं निकले, सभी प्रकाशित/अनूदित नहीं; अनेक सुरक्षित नहीं बचे → उपलब्ध अभिलेख कुल का अंश मात्र।
- ★विषय-वस्तु का चयन: ज़रूरी नहीं कि जिसे हम आज महत्त्वपूर्ण मानते हैं वह अंकित हुआ हो; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ व रोज़मर्रा के सुख-दुख नहीं मिलते — अभिलेख बड़े व विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं।
- ★सबसे महत्त्वपूर्ण: अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे → समीक्षा अन्य विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी।
- निष्कर्ष: राजनीतिक व आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से नहीं मिलता।
- इतिहास-लेखन की बदलती रुचि: 19वीं सदी के अंत–20वीं सदी का आरंभ — राजाओं का इतिहास → 20वीं सदी का मध्य — आर्थिक परिवर्तन व सामाजिक समुदाय → हाल के दशक — सामाजिक हाशिए के समुदाय।
काल रेखा 1 (रटने योग्य)★★
| काल | घटना |
|---|---|
| 600-500 ई.पू. | धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के |
| 500-400 ई.पू. | मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़ |
| 327-325 ई.पू. | सिकंदर का आक्रमण |
| 321 ई.पू. | चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण |
| 272/268-231 ई.पू. | असोक का शासन |
| 185 ई.पू. | मौर्य साम्राज्य का अंत |
| 200-100 ई.पू. | पश्चिमोत्तर में शक; दक्षिण में चोल, चेर, पांड्य; दक्कन में सातवाहन |
| 100 ई.पू.-200 ई. | शक शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के |
| 78 ई. | कनिष्क का राज्यारोहण (तिथि निश्चित नहीं) |
| 100-200 ई. | सातवाहन व शक द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण |
| 320 ई. | गुप्त शासन का आरंभ |
| 335-375 ई. | समुद्रगुप्त |
| 375-415 ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक |
| 500-600 ई. | कर्नाटक में चालुक्य; तमिलनाडु में पल्लव |
| 606-647 ई. | हर्षवर्धन; श्वैन त्सांग की यात्रा |
| 712 ई. | अरबों की सिंध पर विजय |
काल रेखा 2 — अभिलेखशास्त्र★
1784 बंगाल एशियाटिक सोसाइटी | 1810 का दशक कोलिन मैकेंज़ी — 8,000 अभिलेख | 1838 प्रिंसेप — ब्राह्मी का अर्थ | 1877 कनिंघम — अंश प्रकाशित | 1886 एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका | 1888 एपिग्राफ़िआ इंडिका | 1965-66 डी.सी. सरकार — इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी
स्मरण-सूत्र (Mnemonics)
- मगध के 4 कारण: “उ-लो-हा-गं” — उपज, लोहा, हाथी, गंगा
- मौर्य के 5 केंद्र: “पा-त-उ-तो-सु” — पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि, सुवर्णगिरि
- सरदार बनाम राजा: “भेंट बनाम कर; सेना नहीं बनाम सेना है”
- तमिल त्रयी: वे-उ-अ — वेल्लालर (ज़मींदार), उणवर (हलवाहा), अणिमई (दास)
- धम्म के 4 तत्व: “बड़े-संन्यासी-सेवक-दूसरा धर्म”
- दक्षिण की सरदारियाँ: “चो-चे-पा” — चोल, चेर, पाण्ड्य
अध्याय 1 से जोड़ (तुलनात्मक बिंदु)
| पहलू | अध्याय 1 (हड़प्पा) | अध्याय 2 (600 ई.पू.–600 ई.) |
|---|---|---|
| लिपि | अपठित | पढ़ी जा चुकी (प्रिंसेप, 1838) |
| मुख्य साक्ष्य | भौतिक | भौतिक + लिखित (अभिलेख) |
| नगर | हड़प्पा के नगर | द्वितीय नगरीकरण — गंगा घाटी |
| उत्खनन | पूर्ण संभव (परित्यक्त स्थल) | सीमित — आज भी लोग रहते हैं |
| निष्कर्ष | निष्कर्ष अस्थायी | निष्कर्ष फिर भी अस्थायी (§8) |