अध्याय 4विचारक, विश्वास और इमारतें

रिवीजन नोट्स25 मिनट

सांस्कृतिक विकास (ईसा पूर्व 600 – ईसा संवत् 600) | परीक्षा-केंद्रित संक्षिप्त नोट्स


0. प्रस्तावना★

  • एक हज़ार साल लंबी यात्रा — दार्शनिक, उनके विचार, मौखिक व लिखित परंपराएँ, स्थापत्य व मूर्तिकला में अभिव्यक्ति।
  • ★केंद्रीय सावधानी: “बौद्ध परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई। दूसरी कई परंपराएँ थीं जो एक-दूसरे के साथ लगातार वाद-विवाद और संवाद चला रही थीं।”
  • स्रोत: बौद्ध, जैन व ब्राह्मण ग्रंथ + इमारतें और अभिलेख।
  • ★साँची का स्तूप = अध्याय का प्रमुख केंद्र-बिंदु — “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित”।

1. साँची की एक झलक★★

  • शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901), भोपाल की नवाब; आत्मकथा ताज-उल-इक़बाल तारीख़ भोपाल; 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने अनुवाद किया।
  • साँची भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व; मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने कई हफ़्ते रुककर चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबद के बीचोंबीच खुदाई की।
  • ★यूरोप ले जाने के प्रयास: फ़्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार माँगा; अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की → दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए → मूल कृति भोपाल में ही रही।
  • ★बेगमों की भूमिका (NCERT प्र. 3):
    • शाहजहाँ बेगम व सुल्तानजहाँ बेगम — स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान
    • जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे ग्रंथ सुल्तानजहाँ को समर्पित किए
    • सुल्तानजहाँ ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए अनुदान दिया; वहीं रहते हुए मार्शल ने पुस्तकें लिखीं
    • पुस्तक के खंडों के प्रकाशन में भी अनुदान
  • साँची क्यों बचा: किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी; यूरोप ले जाने वालों से बचा।
  • आज यह ASI के सफल मरम्मत और संरक्षण का जीता जागता उदाहरण है।

2. पृष्ठभूमि : यज्ञ और विवाद★★

विश्व-संदर्भ

  • ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि = विश्व इतिहास का महत्त्वपूर्ण मोड़
    क्षेत्रचिंतक
    ईरानज़रथुस्त्र
    चीनखुंगत्सी
    यूनानसुकरात, प्लेटो, अरस्तु
    भारतमहावीर, बुद्ध
  • यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे (अध्याय 2 व 3)।

2.1 यज्ञों की परंपरा

  • ऋग्वेद — 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित; अग्नि, इंद्र, सोम की स्तुति का संग्रह।
  • प्रार्थनाएँ: मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु।
  • ★परिवर्तन: शुरू में सामूहिक → बाद में (1000-500 ई.पू.) घरों के मालिकों द्वारा → राजसूय व अश्वमेध सरदार व राजा द्वारा, ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भरता।
  • स्रोत 1: छंद वैदिक संस्कृत में; पुरोहित परिवारों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे।

2.2 नए प्रश्न

  • उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से): जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म।
  • “क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता था?” — पुरज़ोर बहस।
  • ★वैदिक परंपरा से बाहर के दार्शनिक: “सत्य एक होता है या अनेक?”
  • स्रोत 2 — छांदोग्य उपनिषद (लगभग छठी सदी ई.पू., संस्कृत):
    • आत्मा की प्रकृति: “बीज की गिरी से भी छोटी… पृथ्वी से भी विशाल, क्षितिज से भी विस्तृत, स्वर्ग से भी बड़ी”
    • सच्चा यज्ञ: “यह (पवन) जो बह रहा है… बहते-बहते यह सबको पवित्र करता है” → यज्ञ की पुनर्परिभाषा

2.3 वाद-विवाद और चर्चाएँ★

  • बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख।
  • कुटागारशाला = नुकीली छत वाली झोपड़ी — यहाँ या उपवनों में चर्चाएँ होती थीं।
  • ★“यदि एक शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने तर्कों से समझा लेता था तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था” → समर्थन बढ़ता-घटता रहता था।
  • महावीर व बुद्ध सहित कई शिक्षक वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे; माना कि मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
  • ! यह ब्राह्मणवाद से भिन्न था — जो मानता था कि अस्तित्व जाति और लिंग से निर्धारित होता है।

स्रोत 3 — नियतिवादी और भौतिकवादी (सुत्त पिटक; अजातसत्तु-बुद्ध संवाद)★

पक्षउपदेशकपरंपरामुख्य विचार
नियतिवादमक्खलि गोसालआजीविकसब कुछ पूर्व निर्धारित; “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं”; धागे के गोले की उपमा
भौतिकवादअजित केसकंबलिन्लोकायत“दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती”; मनुष्य चार तत्वों से बना; “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता”
  • ! अत्यंत महत्त्वपूर्ण: “इन दार्शनिक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है।”

बॉक्स — बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार व संरक्षित हुए★

  • बुद्ध ने मौखिक शिक्षा दी; उनके किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया।
  • मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) शिष्यों ने वेसली (वैशाली का पालि रूप) में ‘ज्येष्ठों’ की सभा बुलाई → शिक्षाओं का संकलन।
  • ★त्रिपिटक = ‘तीन टोकरियाँ’:
    पिटकविषय-वस्तु
    विनय पिटकसंघ/बौद्ध मठों के नियम
    सुत्त पिटकबुद्ध की शिक्षाएँ
    अभिधम्म पिटकदर्शन से जुड़े विषय
  • दीपवंश (द्वीप का इतिहास) व महावंश (महान इतिहास) — श्रीलंका के बौद्ध इतिहास।
  • ज़्यादातर पुराने ग्रंथ पालि में; बाद के युगों में संस्कृत में।
  • ★फ़ा-शिएन और श्वैन त्सांग बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए; भारतीय शिक्षक भी दूर देशों में गए। पांडुलिपियाँ पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती में संरक्षित।

3. जैन धर्म★★

  • जैनों के मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे।
  • 23 तीर्थंकर महावीर से पहले; तीर्थंकर = “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं”।
  • ★केंद्रीय अवधारणाएँ:
    1. संपूर्ण विश्व प्राणवान है — पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन
    2. अहिंसा = जैन दर्शन का केंद्र बिंदु; “जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है”
    3. कर्म से जन्म-पुनर्जन्म का चक्र निर्धारित
    4. मुक्ति हेतु त्याग और तपस्या; संसार के त्याग से ही संभव → विहारों में निवास अनिवार्य नियम
  • ★पाँच व्रत: हत्या न करना • चोरी नहीं करना • झूठ न बोलना • ब्रह्मचर्य (अमृषा) • धन संग्रह न करना।
  • स्रोत 4 — उत्तराध्ययन सूत्र: महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास के लिए समझा रही हैं; “सिर्फ़ धर्म ही… तुम्हारी रक्षा करेगा”।
  • 3.1 विस्तार: प्राकृत, संस्कृत, तमिल में साहित्य; पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में; जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ = धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में।

4. बुद्ध और ज्ञान की खोज★

  • विस्तार: उपमहाद्वीप → मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया, जापान; श्रीलंका से समुद्र पार म्याँमार, थाइलैंड, इंडोनेशिया।
  • ! स्रोत की सीमा: चरित ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों बाद लिखे गए।
  • ★संतचरित: “संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही नहीं होते। ये इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि ये हमें उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वासों के बारे में बताते हैं।”
  • जीवन-कथा: सिद्धार्थ, शाक्य कबीले के सरदार के बेटे; महल में सुखों के बीच पले।
    • चार दृश्य: वृद्ध व्यक्ति • बीमार • लाश → गहरा सदमा; गृहत्याग किया संन्यासी → शांति प्राप्त।
    • “उसी क्षण उन्हें यह अनुभूति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है”
    • शरीर को कष्ट देने से मरते-मरते बचे → अतिवादी तरीकों को त्यागकर, ध्यान करते हुए ज्ञान प्राप्त किया → बुद्ध = ज्ञानी व्यक्ति।

5. बुद्ध की शिक्षाएँ★★

  • ★अलौकिक शक्तियों की बजाय विवेक और तर्क — मरे बच्चे की माँ को मृत्यु के अवश्यभावी होने की बात समझायी।
  • कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गईं।
  • मूल सिद्धांत:
    • विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है
    • आत्माविहीन (अनात्मा) — “यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है”
    • इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है
    • घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग
    • ★“बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।”
  • ★सामाजिक दृष्टिकोण: “बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था न कि ईश्वर ने” → राजाओं व गृहपतियों को दयावान व आचारवान होने की सलाह; “व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था”।
  • निर्वाण = अहं और इच्छा का ख़त्म हो जाना।
  • ★अंतिम निर्देश: “तुम सब अपने लिए ख़ुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें ख़ुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
  • स्रोत 5: बुद्ध की सिगल (अमीर गृहपति) को सलाह — मालिक को नौकरों की पाँच तरह से देखभाल; श्रमणों और ब्राह्मणों की पाँच तरह से देखभाल।

6. बुद्ध के अनुयायी★★

  • संघ = धम्म के शिक्षक बने भिक्षुओं की संस्था; सादा जीवन; एक कटोरा।
  • ★भिक्खु — “चूँकि वे दान पर निर्भर थे इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था।”
  • ★महिलाओं का प्रवेश: शुरू में सिर्फ़ पुरुष → आनंद ने बुद्ध को समझाया → महाप्रजापति गोतमी (बुद्ध की उपमाता) पहली भिक्खुनी।
    • कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ; थेरी = “ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो”।
  • सामाजिक विस्तार: राजा, धनवान, गृहपति, कर्मकार, दास, शिल्पी — सभी।
  • ★“एक बार संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि… उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था।”
  • संचालन पद्धति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित — बातचीत से एकमत; अन्यथा मतदान।
  • ★स्रोत 6 — थेरीगाथा (सुत्त पिटक का हिस्सा): भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन; “इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है”।
    • दासी पुन्ना व ब्राह्मण का संवाद; पुन्ना जल में उतरती थी सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से।
    • तर्क: “वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे, साथ में पानी के साँप और मगरमच्छ भी!”
  • स्रोत 7 — विनय पिटक के नियम: कंबल/गलीचा छ: वर्ष तक प्रयोग; दो-तीन कटोरे ही स्वीकार, फिर अन्य भिक्खुओं के साथ बाँटना; प्रस्थान से पहले बिस्तर समेटना।
  • ★बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला — चार कारण: (1) समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतोष (2) तेज़ सामाजिक बदलावों की उलझनें (3) जन्म की बजाय अच्छे आचरण व मूल्यों को महत्त्व (4) मित्रता और करुणा के आदर्श।

7. स्तूप★★

  • पवित्र स्थल: ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानें, विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य → कभी-कभी चैत्य।
  • चैत्य = “शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।”
  • बुद्ध से जुड़े चार स्थल: लुम्बिनी (जन्म) • बोधगया (ज्ञान) • सारनाथ (प्रथम उपदेश) • कुशीनगर (निब्बान)।
  • असोक ने बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद लुम्बिनी की यात्रा की याद में स्तंभ बनवाया।

7.1 स्तूप क्यों बनाए जाते थे?

  • बुद्ध से जुड़े अवशेष — अस्थियाँ या प्रयुक्त सामान — गाड़ दिए गए; इन टीलों को स्तूप कहते थे।
  • ★“स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई।”
  • समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
  • ★असोकावदान: असोक ने अवशेषों के हिस्से हर महत्त्वपूर्ण शहर में बाँटकर स्तूप बनाने का आदेश दिया।
  • ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे।
  • स्रोत 8 — महापरिनिब्बान सुत्त: आनंद का प्रश्न; बुद्ध: “धर्मोत्साही बनो, अपनी भलाई के लिए प्रयास करो”; विशेष आग्रह पर — चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप)।

7.2 स्तूपों का निर्माण कैसे हुआ?★

  • वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से दान का पता चलता है।
  • दान देने वाले: राजा (सातवाहन वंश) • शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ • हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकार (साँची का एक तोरणद्वार)।
  • ★सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने नाम बताया — कभी गाँव/शहर, कभी पेशा और रिश्तेदारों के नाम।
  • ★भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।

7.3 स्तूप की संरचना (निश्चित प्रश्न)★★

भागविवरण
अंडगोलार्ध लिए हुए मिट्टी का टीला (स्तूप = संस्कृत में ‘टीला’)
हर्मिकाअंड के ऊपर; छज्जे जैसा ढाँचा — देवताओं के घर का प्रतीक
यष्टिहर्मिका से निकलने वाला मस्तूल; अक्सर छत्री लगी
वेदिकारेलिंग जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी
तोरणद्वारचारों दिशाओं में प्रवेश-द्वार, ख़ूब नक्काशी वाले
  • साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के — सिवाए पत्थर की वेदिकाओं और तोरणद्वारों के।
  • ★प्रदक्षिणा: पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश → टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा — मानो आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण।
  • अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी — ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के उदाहरण।

8. स्तूपों की ‘खोज’★★

वर्षघटना
1796स्थानीय राजा को मंदिर बनाते समय अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले; पत्थरों के इस्तेमाल का निश्चय
कुछ वर्ष बादकॉलिन मेकेंज़ी — मूर्तियाँ पाईं व चित्रांकन किया, किंतु रिपोर्ट कभी छपी नहीं
1854गुंटूर के कमिश्नर ने मूर्तियाँ मद्रास भेजीं (एलियट संगमरमर); पश्चिमी तोरणद्वार खोजा; निष्कर्ष — अमरावती बौद्धों का सबसे विशाल स्तूप
1850 का दशकपत्थर कलकत्ता (एशियाटिक सोसायटी), मद्रास (इंडिया ऑफिस), लंदन तक पहुँचे
  • ! “हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।”
  • ★एच.एच. कोल: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।”
    • मत: संग्रहालयों में प्लास्टर प्रतिकृतियाँ; असली कृतियाँ खोज की जगह पर।
    • ! वे अमरावती पर अधिकारियों को राज़ी नहीं कर पाए — लेकिन साँची के लिए यह बात मान ली गई।
  • ★साँची क्यों बचा, अमरावती क्यों नष्ट हुआ?
    • अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी — तब विद्वान खोज की जगह पर संरक्षण के महत्त्व को नहीं समझ पाए थे
    • 1818 में साँची की खोज — तीन तोरणद्वार खड़े, चौथा वहीं गिरा, टीला अच्छी हालत में
    • तब भी सुझाव आया कि तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेजे जाएँ
    • अंततः साँची का स्तूप वहीं बना रहा; अमरावती का महाचैत्य अब सिर्फ़ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।

9. मूर्तिकला★★

9.1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ

  • चारणचित्र = घुमक्कड़ कथावाचकों के कपड़ों/काग़ज़ पर बने चित्र।
  • चित्र 4.13: पहली नज़र में ग्रामीण दृश्य → वस्तुतः वेसान्तर जातक का दृश्य।
    • कथा: दानी राजकुमार जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और पत्नी-बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया।
  • ★“अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।”

9.2 उपासना के प्रतीक★

  • ★“कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया।” | प्रतीक | अर्थ | |---|---| | रिक्त स्थान | बुद्ध के ध्यान की दशा | | स्तूप | महापरिनिब्बान | | चक्र | सारनाथ में पहला उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) |
  • ★“पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन् वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था।”
  • इतिहासकार को कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानना ज़रूरी है।

9.3 लोक परंपराएँ★

  • शालभंजिका: तोरणद्वार के किनारे पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री।
    • शुरू में विद्वान असमंजस में — “इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था”
    • साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से पता चला — संस्कृत में वर्णित शालभंजिका
    • लोक परंपरा: “इस स्त्री द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे” → शुभ प्रतीक
    • ★निष्कर्ष: “जो लोग बौद्ध धर्म में आए उन्होंने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया”
  • जानवर: हाथी, घोड़े, बंदर, गाय-बैल; मनुष्यों के गुणों के प्रतीक — हाथी = शक्ति और ज्ञान।
  • गजलक्ष्मी: कमल दल और हाथियों के बीच महिला; हाथी जल छिड़क रहे हैं (अभिषेक)।
    • कुछ इतिहासकार — बुद्ध की माँ माया; दूसरे — लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी (सौभाग्य लाने वाली)
    • “यह भी संभव है कि उपासक इसे दोनों से जोड़ते थे”
  • सर्प: “ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था”।
  • ! जेम्स फ़र्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना — क्योंकि वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे; तब तक ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था।
  • बॉक्स — अजंता (महाराष्ट्र): जातकों की कथाएँ; राजदरबार, शोभा यात्राएँ, त्यौहार; आभाभेद तकनीक से त्रिविम रूप।

10. नयी धार्मिक परंपराएँ★★

10.1 महायान

  • ईसा की प्रथम सदी के बाद बदलाव; प्रारंभिक बौद्ध मत में व्यक्तिगत प्रयास, बुद्ध को एक मनुष्य समझा जाता था।
  • ★मुक्तिदाता की कल्पना उभरी — “यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे”।
  • ★बोधिसत्त: परम करुणामय जीव जो सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे — “लेकिन वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया के दुखों में छोड़ देने के लिए और निब्बान प्राप्ति के लिए नहीं करते थे। बल्कि वे इससे दूसरों की सहायता करते थे।”
  • बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा महत्त्वपूर्ण अंग बनी।
  • ★हीनयान या थेरवाद? महायान के अनुयायी दूसरी परंपराओं को हीनयान कहते थे। लेकिन पुरातन परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे — ‘वे लोग जिन्होंने पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के बताए रास्ते पर चलने वाले’।

10.2 पौराणिक हिंदू धर्म★

  • “मुक्तिदाता की कल्पना सिर्फ़ बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं थी।”
  • वैष्णव (विष्णु सबसे महत्त्वपूर्ण) व शैव (शिव परमेश्वर)।
  • ★भक्ति: “उपासना और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का रिश्ता माना जाता था”।
  • दस अवतार: “पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे”।
  • ★“इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका था।”
  • शिव — लिंग के रूप में; कभी मनुष्य रूप में। पहचान — शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध (हथियार व शुभ अस्त्र), बैठने की शैली से।
  • ★पुराण: प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित; संस्कृत श्लोकों में; ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे।
    • ★“महिलाएँ और शूद्र जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराणों को सुन सकते थे।”
    • “पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुईं”
    • उदाहरण: वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्त्वपूर्ण देवता; पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैली।

10.3 मंदिरों का बनाया जाना★

  • गर्भगृह = चौकोर कमरा, एक दरवाज़ा → ऊपर शिखर → भित्ति चित्र → बाद में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण; जल आपूर्ति का इंतज़ाम।
  • ★कृत्रिम गुफाएँ: “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।”
    • विकसित रूप: आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा) — पूरी पहाड़ी काटकर।
    • ★ताम्रपत्र अभिलेख: एलोरा के प्रमुख तक्षक का आश्चर्य — “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”

11. क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं?★★

11.1 अनजाने को समझने की कोशिश

  • यूरोपीय विद्वान उन्नीसवीं सदी में मूर्तियों की पृष्ठभूमि और महत्त्व नहीं समझ पाए।
  • ! “कई सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं और कई बार वे घृणा से भर जाते थे।”
  • उन्होंने तुलना प्राचीन यूनान की कला परंपरा से की।
  • गांधार की मूर्तियाँ — तक्षशिला और पेशावर में मिलीं; भारतीय-यूनानी शासकों के क्षेत्र; यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित → विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।
  • ★“परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना तैयार करना” — यह वह तरीका है “जो हम सब अक्सर अपनाते हैं”।

11.2 यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो…

  • महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान (चित्र 4.30) — कला इतिहासकारों में मतभेद:
    1. गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण — चट्टान की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखा रही है
    2. अर्जुन की तपस्या (दिव्यास्त्र प्राप्ति हेतु) — वे केंद्र में साधु को महत्त्व देते हैं

अध्याय का निष्कर्ष★

“बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए… कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई हो… हमने इस अध्याय में जिन शानदार उदाहरणों को चुना है वे एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”

कालरेखा 1 — महत्त्वपूर्ण धार्मिक बदलाव★★

कालबदलाव
1500-1000 ई.पू.प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ
1000-500 ई.पू.उत्तर वैदिक परंपराएँ
छठी सदी ई.पू.प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
तीसरी सदी ई.पू.आरंभिक स्तूप
दूसरी सदी ई.पू. से आगेमहायान बौद्ध मत, वैष्णववाद, शैववाद, देवी पूजन परंपराएँ
तीसरी सदी ईसवीसबसे पुराने मंदिर

कालरेखा 2 — खोज और संरक्षण★★

वर्षघटना
1814इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना
1834रामराजा — एसेज़ ऑन द आर्किटेक्चर ऑफ़ द हिंदूज़; कनिंघम — सारनाथ के स्तूप की छानबीन
1835-1842जेम्स फ़र्गुसन — पुरातात्त्विक स्थलों का सर्वेक्षण
1851गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना
1854अलेक्ज़ैंडर कनिंघम — भिलसा टोप्स (साँची पर सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक)
1878राजेंद्र लाल मित्र — बुद्ध गया : द हेरिटेज ऑफ़ शाक्य मुनि
1880एच.एच. कोल — प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाए गए
1888ट्रेज़र-ट्रोव एक्ट — सरकार पुरातात्त्विक महत्त्व की चीज़ हस्तगत कर सकती थी
1914जॉन मार्शल व अल्फ़्रेड फूसे — द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची
1923जॉन मार्शल — कंज़र्वेशन मैनुअल
1955जवाहरलाल नेहरू — राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव
1989साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया

📋 आठ स्रोतों की त्वरित तालिका★

स्रोतशीर्षकग्रंथ/भाषा
1अग्नि की प्रार्थनाऋग्वेद (वैदिक संस्कृत)
2उपनिषद की कुछ पंक्तियाँछांदोग्य उपनिषद (संस्कृत, लगभग छठी सदी ई.पू.)
3नियतिवादी और भौतिकवादीसुत्त पिटक (पालि)
4महल के बाहर की दुनियाउत्तराध्ययन सूत्र (जैन)
5व्यवहार में बौद्ध धर्मसुत्त पिटक
6थेरीगाथासुत्त पिटक का हिस्सा (पालि)
7भिक्षुओं-भिक्खुनियों के लिए नियमविनय पिटक
8स्तूप क्यों बनाए जाते थे?महापरिनिब्बान सुत्त (सुत्त पिटक)

स्मरण-सूत्र (Mnemonics)

  • स्तूप के 5 भाग: “अं-ह-य-वे-तो” — अंड • हर्मिका • यष्टि • वेदिका • तोरणद्वार
  • त्रिपिटक: “वि-सु-अ” — विनय (नियम) • सुत्त (शिक्षाएँ) • अभिधम्म (दर्शन)
  • जैन के 5 व्रत: “ह-चो-झू-ब्र-ध” — हत्या • चोरी • झूठ • ब्रह्मचर्य • धन-संग्रह (सब नहीं)
  • बुद्ध के 4 स्थल: “लु-बो-सा-कु” — लुम्बिनी (जन्म) • बोधगया (ज्ञान) • सारनाथ (उपदेश) • कुशीनगर (निब्बान)
  • 3 प्रतीक: “रिक्त-स्तूप-चक्र” = ध्यान • महापरिनिब्बान • प्रथम उपदेश
  • विश्व के 4 चिंतक-क्षेत्र: “ई-ची-यू-भा” — ईरान (ज़रथुस्त्र) • चीन (खुंगत्सी) • यूनान (सुकरात) • भारत (महावीर-बुद्ध)

चारों अध्यायों का संश्लेषण★

पहलूअध्याय 1अध्याय 2अध्याय 3अध्याय 4
मुख्य साक्ष्यभौतिकअभिलेखीयसाहित्यिकदृश्य (स्थापत्य, मूर्ति, चित्र)
मुख्य समस्यासाक्ष्य मौन हैसाक्ष्य पक्षपाती हैग्रंथ आदर्श बताता हैदृश्य प्रतीकात्मक है — अक्षरशः नहीं पढ़ा जा सकता
व्याख्या की कुंजीसंदर्भस्रोत का उद्देश्यआदर्श बनाम व्यवहारनिर्माताओं की परंपरा का ज्ञान
नामकरण-जाल‘पुरोहित-राजा’‘साम्राज्य’‘राक्षस’, ‘म्लेच्छ’‘हीनयान’
साझा सीखनिष्कर्ष अस्थायीनिष्कर्ष अस्थायीनिष्कर्ष अस्थायीनिष्कर्ष अस्थायी