Chapter 2एक दल के प्रभुत्व का दौर

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NCERT — स्वतंत्र भारत में राजनीति (पुस्तक 2), पृ. 26–43.

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कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • स्वतंत्र भारत में राजनीति • अध्याय 2 — एक दल के प्रभुत्व का दौर

कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति) · पृष्ठ — 26 से 43

1952 में एक संपादक ने भारत के पहले चुनाव को “इतिहास का सबसे बड़ा जुआ” कहा था। वह गलत क्यों निकला?

17 करोड़ मतदाता, जिनमें सिर्फ़ 15 फीसदी साक्षर — और उस वक्त तक लोकतंत्र केवल धनी देशों में टिका था। इस अध्याय के तीन हिस्से • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव-प्रणाली की स्थापना • कांग्रेस का दबदबा • विपक्षी दलों का उद्भव

1 | लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती | दूसरा रास्ता; भारत का चुनाव; संविधान और चुनाव आयोग

अधिकतर देशों ने क्या चुना

उपनिवेश के बाद

  • कई देशों के नेताओं ने तय किया कि अभी लोकतंत्र नहीं अपनाया जा सकता।
  • उनका तर्क था — “राष्ट्रीय एकता हमारी पहली प्राथमिकता है और लोकतंत्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा।”
  • अलोकतांत्रिक शासन के तीन रूप सामने आए।
    • कहीं थोड़ा-बहुत लोकतंत्र, पर प्रभावी नियंत्रण एक नेता के हाथ।
    • कहीं एक दल का शासन कायम हुआ।
    • कहीं सीधे-सीधे सेना ने सत्ता की बागडोर सँभाली।
  • इनकी शुरुआत इस वायदे से हुई कि जल्दी ही लोकतंत्र कायम कर दिया जाएगा।

लेकिन एक बार अलोकतांत्रिक शासन के पाँव जम गए तो उसे बदल पाना मुश्किल होता गया।

भारत ने कहीं ज्यादा कठिन रास्ता चुना

  • हमारे स्वतंत्रता-संग्राम की गहरी प्रतिबद्धता लोकतंत्र से थी — कोई और रास्ता चुना जाता तो आश्चर्य होता।
  • नेता लोकतंत्र में राजनीति की निर्णायक भूमिका को लेकर सचेत थे।
  • ★वे राजनीति को समस्या के रूप में नहीं देखते थे; वे राजनीति को समस्या के समाधान का उपाय मानते थे।
  • हर समाज को यह तय करना होता है कि उसका शासन कैसे चलेगा — और विभिन्न समूहों के हितों के टकराव से कैसे निपटा जाए।

इसी सवाल का जवाब है — लोकतांत्रिक राजनीति।

संविधान से चुनाव तक

  1. 194926 नवम्बर — संविधान अंगीकृत
  2. 195024 जनवरी — संविधान पर हस्ताक्षर
  3. 195026 जनवरी — संविधान अमल में आया
  4. 1950जनवरी — चुनाव आयोग का गठन; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त
  5. 1951पहला आम चुनाव 1950 में अपेक्षित था — परदो बार स्थगित करना पड़ा

अंबेडकर की चेतावनी

राजनीति में नायक-पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और यह रास्ता तानाशाही की तरफ़ जाता है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान सभा में भाषण, 25 नवंबर 1949

2 | पहला आम चुनाव | पैमाना; आलोचना; परिणाम

चुनाव आयोग के सामने क्या था

“हिमालय की चढ़ाई जैसा दुष्कर काम”

  • चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन करना था और मतदाता-सूची बनानी थी — दोनों में बहुत समय लगा।
  • ★मतदाता-सूची के पहले प्रारूप में पता चला कि 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए हैं।
    • उन्हें ‘अलां की बेटी’, ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज किया गया था।
    • चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया।
  • इतने बड़े पैमाने का ऐसा काम दुनिया में अब तक नहीं हुआ था।

उस वक्त तक लोकतंत्र सिर्फ धनी देशों में कायम था — यूरोप के बहुतेरे देशों में महिलाओं को मताधिकार तक नहीं मिला था।

17 करोड़

17 करोड़

कुल मतदाता — जिनमें महज 15 फीसदी साक्षर थे

पहले आम चुनाव का पैमाना

मात्रासंख्या
कुल मतदाता17 करोड़
चुने जाने थे — विधायक3,200
चुने जाने थे — लोकसभा सांसद489
साक्षर मतदाता15 फीसदी
प्रशिक्षित अधिकारी और चुनावकर्मी3 लाख से ज्यादा
स्टील की मतपेटियाँतकरीबन 20 लाख

आलोचकों ने क्या कहा

“इतिहास का सबसे बड़ा जुआ”

  • एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे “इतिहास का सबसे बड़ा जुआ” करार दिया।
  • ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका ने लिखा कि नेहरू “अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।”
  • इंडियन सिविल सर्विस के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे का दावा था कि आने वाला दौर “लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी” बड़े विस्मय से देखेगा।

यह अपने आप में बड़ा जोखिम भरा प्रयोग था — और सबकी निगाहें इसी पर थीं।

और वास्तव में क्या हुआ

  • चुनाव दो बार स्थगित करने पड़े; आखिरकार 1951 के अक्तूबर से 1952 के फरवरी तक हुए।
  • इसे ‘1952 का चुनाव’ ही कहा जाता है, क्योंकि अधिकांश हिस्सों में मतदान 1952 में हुआ।
  • अभियान, मतदान और मतगणना में कुल छह महीने लगे; औसतन हर सीट पर चार उम्मीदवार।
  • कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने वोट डाला।
  • ★हारने वाले उम्मीदवारों ने भी इन परिणामों को निष्पक्ष बताया।

हिंदुस्तान टाइम्स — “भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया।”

अध्याय का सबसे बड़ा वाक्य

1952 का आम चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। अब यह दलील दे पाना संभव नहीं रहा कि लोकतांत्रिक चुनाव गरीबी अथवा अशिक्षा के माहौल में नहीं कराए जा सकते।

NCERT, अध्याय 2, पृ. 30

मतदान के बदलते तरीके

दौरतरीका
पहला आम चुनावहर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी, उस पर उसका चुनाव-चिह्न; मतदाता को खाली मतपत्र
शुरुआती दो चुनावों के बादमतपत्र पर सब उम्मीदवारों के नाम और चिह्न; मतदाता मुहर लगाता — यह चालीस साल चला
1990 के दशक का अंतचुनाव आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल शुरू किया
2004पूरे देश में ईवीएम

3 | कांग्रेस का प्रभुत्व | परिणाम; कारण; चुनाव-प्रणाली; केरल

पहले तीन चुनावों के परिणाम

चुनाववर्षकुल सीटेंकांग्रेस
पहला आम चुनाव1952489364
दूसरा आम चुनाव1957494371
तीसरा आम चुनाव1962494361

प्रभुत्व कितना गहरा था

  • 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही — कुल 16 सीट।
  • विधानसभा चुनावों में भी बड़ी जीत — त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा को छोड़कर हर राज्य में।
    • और आखिरकार इन तीन राज्यों में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी।
  • जवाहरलाल नेहरू पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने।
  • ★कांग्रेस ने जितनी सीटें जीतीं उसका दशांश भी कोई विपक्षी पार्टी नहीं जीत सकी।

इस तरह राष्ट्रीय और प्रांतीय, दोनों स्तरों पर कांग्रेस पार्टी का शासन कायम हुआ।

कांग्रेस इतनी आगे क्यों रही

चार कारण

  • स्वाधीनता-संग्राम की विरासत — कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन के वारिस के रूप में देखा गया।
  • यही एकमात्र पार्टी थी जिसका संगठन पूरे देश में था, और नेटवर्क स्थानीय स्तर तक पहुँच चुका था।
  • जवाहरलाल नेहरू — भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता; उन्होंने पूरे देश का दौरा किया।
  • ★‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा — अनेक पार्टियों का गठन तो स्वतंत्रता के आस-पास या बाद में हुआ।

“बाकी दल अभी अपनी रणनीति सोच ही रहे होते थे कि कांग्रेस अपना अभियान शुरू कर देती थी।”

चुनाव-प्रणाली ने जीत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया

दलवोट (1952)सीट (1952)
कांग्रेस45 प्रतिशत74 फीसदी
सोशलिस्ट पार्टी10 प्रतिशत3 प्रतिशत भी नहीं

इसका कारण क्या है

सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत

  • हमारी चुनाव-प्रणाली में ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ का तरीका अपनाया गया है।
  • ऐसे में जो पार्टी बाकियों से थोड़े ज्यादा वोट पाती है, उसे वोटों के अनुपात से कहीं ज्यादा सीटें मिलती हैं।
  • ★सभी गैर-कांग्रेसी वोट जोड़ दें तो वे कांग्रेस के कुल वोट से कहीं ज्यादा होते।
  • लेकिन गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बँट गए।

इसी तरह कांग्रेस बाकी पार्टियों की तुलना में आगे रही और उसने ज्यादा सीटें जीतीं।

केरल, 1957 — एक अपवाद जो बहुत कुछ कहता है

दुनिया में पहली बार

  • 1957 के मार्च के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को कुल 126 में से 60 सीटें मिलीं।
  • पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन प्राप्त था; राज्यपाल ने ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को न्यौता दिया।
  • ★दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी।
  • कांग्रेस ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ़ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया।
  • ★1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत यह सरकार बर्खास्त कर दी।

इस फ़ैसले को आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में बार-बार याद किया जाता है।

4 | प्रभुत्व की प्रकृति | दूसरों से फ़र्क; दो गठबंधन; गुट; कांग्रेस-प्रणाली

एक पार्टी का प्रभुत्व — कहाँ कैसा

बाकी मुल्कों में — लोकतंत्र की कीमत पर

  • चीन, क्यूबा और सीरिया — संविधान में ही सिर्फ एक पार्टी को शासन की अनुमति
  • म्यांमार, बेलारूस और इरीट्रिया — कानूनी और सैन्य उपायों के चलते
  • मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताईवान — कुछ साल पहले तक ऐसे ही देश थे

भारत में — लोकतांत्रिक स्थितियों में

  • अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में एक-दूसरे से होड़ की
  • और तब भी कांग्रेस एक के बाद एक चुनाव जीतती गई
  • सबसे मिलता-जुलता उदाहरण — दक्षिण अफ्रीका, जहाँ रंगभेद की समाप्ति के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का दबदबा रहा

कांग्रेस एक सामाजिक गठबंधन के रूप में

1885 से आज़ादी तक

  • जन्म 1885 में — तब यह नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का एक हित-समूह भर थी।
  • 20वीं सदी में इसने जनआंदोलन का रूप ले लिया।
  • शुरू में अँग्रेज़ीदाँ, अगड़ी जाति और शहरी अभिजन का बोलबाला था — सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से सामाजिक आधार बढ़ा।
  • इसमें किसान और उद्योगपति, शहर और गाँव, मज़दूर और मालिक — सबको जगह मिली।
  • ★आज़ादी के समय तक कांग्रेस एक सतरंगे सामाजिक गठबंधन की शक्ल अख़्तियार कर चुकी थी।

इस सामाजिक गठबंधन से भारत की विविधता की नुमाइंदगी हो रही थी।

और एक विचारधारात्मक गठबंधन भी

  • कांग्रेस ने अपने अंदर क्रांतिकारी और शांतिवादी को समाहित किया।
  • कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी — सब इसी में थे।
  • दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गी — सबकी जगह थी।
  • ★“कांग्रेस एक मंच की तरह थी, जिस पर अनेक समूह, हित और राजनीतिक दल तक आ जुटते थे।”

किसी नीति पर मतभेद सुलझा भले न पाए, कांग्रेस उन्हें अपने आप में मिलाए रखती थी और एक आम सहमति बना लेती थी।

गुट — कमज़ोरी नहीं, ताकत

faction

  • पार्टी के अंदर मौजूद विभिन्न समूह ‘गुट’ कहे जाते हैं।
  • कुछ गुट विचारधारात्मक सरोकारों से बने, पर अकसर पीछे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा थी।
  • चूँकि पार्टी के भीतर होड़ की गुंजाइश थी, इसलिए विभिन्न हित और विचारधाराओं के नेता कांग्रेस के भीतर ही बने रहे।
  • नाखुश समूह भी पार्टी छोड़ने की जगह भीतर के किसी दूसरे गुट से लड़ना बेहतर समझता था।
  • ★“अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी बनने की बजाय उसकी ताकत साबित हुई।”

गुटों की यह प्रणाली शासक-दल के भीतर संतुलन साधने के एक औजार की तरह काम करती थी।

इसी को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहते हैं

चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका निभायी और विपक्ष की भी। इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।

NCERT, अध्याय 2, पृ. 40

5 | विपक्षी दल | तीन दल; उनकी भूमिका; प्रभुत्व का अंत

1950 के दशक के तीन प्रमुख विपक्षी दल

सोशलिस्ट पार्टीभारतीय कम्युनिस्ट पार्टीभारतीय जनसंघ
जड़ेंकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, 19341920 का दशक; बोल्शेविक क्रांतिRSS और हिंदू महासभा
अलग / गठन1948 — दोहरी सदस्यता समाप्त1941 दिसंबर1951
विचारधारालोकतांत्रिक समाजवाद1947 की आज़ादी सच्ची नहींएक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र
1952 का प्रदर्शन10% वोट, 3% सीट भी नहीं16 सीट — दूसरा स्थान3 सीट
आगे क्या बनासमाजवादी पार्टी, RJD, JD(U), JD(S)1964 में टूट → CPI(M)भारतीय जनता पार्टी

सोशलिस्ट पार्टी

1934 → 1948

  • कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन खुद कांग्रेस के भीतर 1934 में युवा नेताओं की एक टोली ने किया।
  • ★1948 में कांग्रेस ने संविधान बदलकर दोहरी सदस्यता समाप्त कर दी — तब समाजवादियों को मजबूरन अलग होना पड़ा।
  • वे लोकतांत्रिक समाजवाद में विश्वास करते थे — इसी से वे कांग्रेस और कम्युनिस्ट, दोनों से अलग थे।
  • आरोप था कि कांग्रेस पूँजीपतियों और जमींदारों का पक्ष ले रही है और मज़दूरों-किसानों की उपेक्षा कर रही है।
  • ★1955 में कांग्रेस ने ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ का लक्ष्य घोषित कर दिया — और विकल्प बनना मुश्किल हो गया।

नेता — जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, एस.एम. जोशी, अच्युत पटवर्धन।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

1920 का दशक → 1964

  • 1920 के दशक के शुरुआती सालों में साम्यवादी-समूह उभरे, रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित।
  • 1935 से उन्होंने मुख्यतः कांग्रेस के दायरे में रहकर काम किया; 1941 के दिसंबर में अलग हुए।
  • उनका विचार था कि 1947 का सत्ता-हस्तांतरण सच्ची आज़ादी नहीं थी — इसी से तेलंगाना में हिंसक विद्रोह को बढ़ावा मिला।
  • ★1951 में पार्टी ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ दिया और चुनावों में भाग लेने का फ़ैसला किया।
  • समर्थन मिला आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में।

1964 में चीन और सोवियत संघ के वैचारिक अंतर के बाद पार्टी टूटी — और CPI(M) बनी।

भारतीय जनसंघ

1951

  • गठन 1951 में; श्यामा प्रसाद मुखर्जी संस्थापक-अध्यक्ष; जड़ें आरएसएस और हिंदू महासभा में।
  • केंद्रीय विचार — ★‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’।
  • भारत और पाकिस्तान को एक करके ‘अखंड भारत’ बनाने की बात कही।
  • अंग्रेजी हटाकर हिंदी को राजभाषा बनाने के आंदोलन में सबसे आगे; अल्पसंख्यकों को रियायत का विरोध।
  • चीन के 1964 के आण्विक-परीक्षण के बाद लगातार पैरोकारी कि भारत भी आण्विक हथियार तैयार करे।

1952 में 3 और 1957 में 4 सीटें — पर भारतीय जनता पार्टी की जड़ें इसी जनसंघ में हैं।

विपक्ष कमज़ोर था, पर बेकार नहीं

  • इन दलों को लोकसभा और विधानसभा में कहने भर को प्रतिनिधित्व मिला।
  • फिर भी इन्होंने सुचिन्तित आलोचना की — “इस आलोचना में सिद्धांतों का बल होता था।”
  • इन्होंने शासक-दल पर अंकुश रखा; बहुधा इनके कारण कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन बदला।
  • ★इन्होंने लोकतांत्रिक विकल्प की संभावना जीवित रखी — और इस तरह व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका।
  • इन्होंने ऐसे नेता तैयार किए जिन्होंने आगे के समय में देश की तस्वीर संवारी।

आज की लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी न किसी विपक्षी पार्टी में हैं।

पारस्परिक सम्मान का वह दौर

  • अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे।
  • नेहरू अकसर सोशलिस्ट पार्टी के प्रति अपने प्यार का इजहार करते थे।
  • उन्होंने जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सरकार में शामिल होने का न्यौता दिया।

यह भाव दलगत प्रतिस्पर्धा के तेज होने के बाद लगातार कम होता गया।

6 | निचोड़ | प्रभुत्व क्यों, और वह क्यों टिका नहीं

पूरा अध्याय एक स्लाइड में

  • चुनौती — उपनिवेश-मुक्त देशों ने “पहले एकता” चुनकर लोकतंत्र खोया; भारत ने कठिन रास्ता चुना।
  • प्रयोग — 17 करोड़ मतदाता, 15% साक्षर → 1952 का चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर।
  • परिणाम — कांग्रेस को तीनों चुनावों में तीन-चौथाई सीटें: 364 · 371 · 361।
  • कारण — विरासत, संगठन, नेहरू, ‘अव्वल और एकलौता’, और FPTP (45% वोट → 74% सीट)।
  • प्रकृति — प्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में; कांग्रेस स्वयं दो गठबंधन थी → ‘कांग्रेस-प्रणाली’।
  • अंत — हर हित-समूह को समाहित करने की क्षमता घटी, और दूसरे दलों को महत्त्व मिलना शुरू हुआ।

“इस तरह कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा।”