यह दस्तावेज़ केवल शिक्षक के लिए है। इसमें पढ़ाने का क्रम, कठिन बिंदु, अपेक्षित भ्रांतियाँ, बोर्ड-कार्य और संवेदनशील विषयों को सँभालने के सुझाव हैं। ★यह पुस्तक 1 का अंतिम अध्याय है — अंत में पूरी पुस्तक की समेकित पुनरावृत्ति भी दी गई है।
1 · इस अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी
★★यह अध्याय कोई निष्कर्ष नहीं देता — वह जान-बूझकर हर खंड में दोनों पक्ष रखता है। राजनीतिक प्रभाव में तीन पहलू; आर्थिक में तीन पक्ष; सांस्कृतिक में समरूपता और वैभिन्नीकरण दोनों।
कक्षा को पहले दिन ही यह बता दीजिए — “इस अध्याय में कोई ‘सही जवाब’ नहीं मिलेगा। यहाँ आपको तर्क रखना सीखना है, पक्ष चुनना नहीं। और उत्तर-पत्र में भी सबसे ज़्यादा अंक उसी को मिलेंगे जो दोनों पक्ष रख सके।”
2 · अध्याय का तर्क-प्रवाह — सात पड़ावों में
| पड़ाव | क्या स्थापित होता है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. अवधारणा | प्रवाह + विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव; बहुआयामी; प्रभाव विषम | 100–102 |
| 2. कारण | प्रौद्योगिकी अपरिहार्य, पर अकेली काफी नहीं — ‘जुड़ाव की चेतना’ भी चाहिए | 102–103 |
| 3. राजनीतिक प्रभाव | तीन पहलू, तीन अलग दिशाओं में | 103–104 |
| 4. आर्थिक प्रभाव | किसे फायदा, किसे नुकसान — और लोगों का प्रवाह क्यों नहीं बढ़ा | 104–106 |
| 5. सांस्कृतिक प्रभाव | समरूपता और वैभिन्नीकरण — दोनों | 106–108 |
| 6. भारत | औपनिवेशिक → संरक्षणवाद → 1991; और वह कसौटी | 108–109 |
| 7. प्रतिरोध | वामपंथी और दक्षिणपंथी; और विरोध भी एकजुट नहीं है | 109–111 |
3 · पहले ही दिन — अनाथ-संदर्भ की चेतावनी और भरपाईध्यान
3.1 समस्या
पृ. 107 पर मुद्रित है —
“हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।”
!! वह अध्याय — ‘समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व’ — पाठ्यक्रम-युक्तिकरण में पूरी तरह हटा दिया गया है। वह पुस्तक में है ही नहीं।
यह पिछले सभी अनाथ-संदर्भों से गंभीर है। अध्याय 1, 2, 3 और 6 में अध्याय खिसका था — विद्यार्थी उसे नये क्रमांक पर पा जाते थे। यहाँ अध्याय गायब है। विद्यार्थी कहीं भी ‘वर्चस्व का सांस्कृतिक अर्थ’ नहीं ढूँढ पाएँगे।
3.2 ✓ भरपाई — यह कालांश 4 में ज़रूर पढ़ाइए(5 मिनट)
बोर्ड पर तीन पंक्तियाँ लिखिए:
| प्रकार | अर्थ | कैसे काम करता है |
|---|---|---|
| सैन्य वर्चस्व | बल का असंतुलन | डर से |
| संरचनात्मक वर्चस्व | वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम बनाने की ताकत | संस्थाओं और नियमों से |
| ★★सांस्कृतिक वर्चस्व | जब किसी शक्ति के विचार और जीवन-शैली इतने सामान्य लगने लगें कि उनका विकल्प ही सोचा न जा सके | ★आकर्षण से — सहमति से, बल से नहीं |
फिर कहिए: “अब पाठ्यपुस्तक की यह पंक्ति पढ़िए — ‘संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है।’ यही सांस्कृतिक वर्चस्व है। और ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ उसी का लोकप्रिय नाम है।”
★और यह कड़ी भी जोड़िए: वर्चस्व से बचने की तीसरी रणनीति — ‘राज्येतर प्रतिरोध’ — यानी सामाजिक आंदोलन और नागरिक समाज। इसी से अध्याय का अंतिम खंड (वैश्वीकरण का प्रतिरोध, WSF, ‘नीम’) जुड़ जाता है।
4 · बोर्ड-कार्य — चार ढाँचे
ढाँचा 1 — ‘प्रवाह’ का चित्र(कालांश 1)
बीच में लिखिए ‘प्रवाह’ और उससे चार तीर निकालिए — विचार → पूँजी → वस्तु → लोग और नीचे बड़े अक्षरों में — “विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव”
ढाँचा 2 — तीन राजनीतिक पहलू(कालांश 2)
| पहलू | दिशा |
|---|---|
| 1. क्षमता में कमी | ⬇️ |
| 2. प्रधानता बरकरार | ➡️ |
| 3. ताकत में इजाफा | ⬆️ |
★★तीन तीर तीन अलग दिशाओं में — यही चित्र पूरा उत्तर याद करा देता है।
ढाँचा 3 — चार प्रवाहों की असली स्थिति(कालांश 3)
| प्रवाह | बढ़ा? |
|---|---|
| वस्तु | ✓ |
| पूँजी | ✓ |
| विचार | ✓ |
| ! लोग | ❌ — वीजा-नीति |
★यह असमानता आर्थिक खंड की सबसे बड़ी बात है।
ढाँचा 4 — दो सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ(कालांश 4)
| समरूपता | वैभिन्नीकरण |
|---|---|
| मैक्डोनॉल्डीकरण | “हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट” |
| “पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है” | “जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता” |
दोनों एक साथ चलती हैं — यही अध्याय का संतुलन है।
5 · कठिन बिंदु और उन्हें कैसे सँभालें
5.1 “प्रभाव विषम है” — इसे शुरुआत में ही स्थापित कीजिए★★
यह वाक्य पूरे अध्याय की चेतावनी है — “विशिष्ट संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना हम वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज करें।”
कक्षा में यह प्रयोग कीजिए: पूछिए — “वैश्वीकरण अच्छा है या बुरा?” जब कक्षा बँट जाए, तब कहिए — “आप दोनों सही हैं, और यही इस अध्याय का पहला पाठ है।”
5.2 तीन राजनीतिक पहलू — तीसरा सबसे ज़्यादा छूटता है★★
विद्यार्थी “वैश्वीकरण से राज्य कमज़ोर हुआ” तक रुक जाते हैं। तीसरा पहलू — “राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं” — प्रश्न 8 के पूरे अंक इसी पर मिलते हैं।
याद कराने का तरीका: तीन तीर — नीचे, सीधा, ऊपर।
5.3 “लोगों का प्रवाह क्यों नहीं बढ़ा” — यह उत्तर में ज़रूर आना चाहिएध्यान
पाठ का कारण बहुत स्पष्ट और बहुत तीखा है — “विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक… उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।”
कक्षा में यह विरोधाभास उठाइए: “पूँजी के लिए सीमाएँ खुल गईं, लोगों के लिए नहीं। क्या यह ‘मुक्त बाज़ार’ है?”
5.4 प्रश्न 5 का जाल — यह सबसे बड़ी भूल हैध्यान
‘सांस्कृतिक समरूपता’ का तर्क आलोचकों का है, पैरोकारों का नहीं। कक्षा में सूत्र दीजिए: ★“समरूपता का डर आलोचक दिखाते हैं, पैरोकार नहीं।” हर साल इसी विकल्प पर विद्यार्थी फिसलते हैं।
5.5 ‘बर्गर’ और ‘जीन्स पर कुर्ता’ — दो उदाहरण, दो अलग बातें★★
| उदाहरण | क्या सिद्ध करता है |
|---|---|
| “बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है” | विकल्प घटे नहीं, बढ़े — नुकसान नहीं हुआ |
| ★★“जीन्स के ऊपर कुर्ता… उसी देश को निर्यात” | प्रभाव एकतरफा नहीं होता — भारत भी भेज रहा है |
★दूसरा उदाहरण प्रश्न 10 और 11 — दोनों में काम आता है। इसे रेखांकित करवाइए।
5.6 “1991 = वैश्वीकरण की शुरुआत” — यह भ्रम पहले दिन तोड़िएध्यान
1991 भारत के आर्थिक सुधारों का वर्ष है। पाठ स्पष्ट कहता है कि वैश्वीकरण “मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है” और भारत का अपना वैश्वीकरण-इतिहास “कई सदियों का है।”
5.7 ‘विरोध किसका’ — यह बारीकी उत्तर को ऊपर उठा देती है★
“वैश्वीकरण-विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।”
कक्षा में कहिए: “विरोध ‘वैश्वीकरण’ का नहीं, ‘नव-उदारवादी वैश्वीकरण’ का है। और मज़े की बात यह है कि विरोधी भी विश्वव्यापी नेटवर्क बनाते हैं — यानी वे भी वैश्वीकृत हैं!”
6 · संवेदनशील विषय — कैसे सँभालेंध्यान
| विषय | पाठ्यपुस्तक का रुख | शिक्षक के लिए सुझाव |
|---|---|---|
| !! वैलेन्टाईन-डे और पश्चिमी पोशाकों का विरोध (पृ. 111) | पाठ इन्हें तथ्य के रूप में दर्ज़ करता है — “वैश्वीकरण का विरोध राजनीति के दक्षिणपंथी खेमों से भी हुआ है” | ★★उसी लहजे में रहिए — विवरण दीजिए, राय नहीं। यदि कक्षा में बहस उठे तो उसे “सांस्कृतिक प्रभाव पर दो नज़रिए” के ढाँचे में लौटा दीजिए। किसी राजनीतिक दल या संगठन का नाम मत लीजिए। |
| ! “पश्चिमी परिधान पहनने वाली छात्राओं को धमकी” (पृ. 101) | पाठ इसे वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव के उदाहरण के रूप में देता है | उदाहरण को उसी संदर्भ में रखिए — यह ‘वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक नहीं’ का उदाहरण है। व्यापक टिप्पणी से बचिए। |
| ! ‘एन.जी.ओ. साम्राज्यवाद के दलाल हैं’ (पोस्टर, पृ. 99) | यह पोस्टर में उद्धृत एक पक्ष का कथन है, पाठ्यपुस्तक की राय नहीं | ★यह स्पष्ट कीजिए — “यह मुंबई प्रतिरोध 2004 का आरोप है, पाठ्यपुस्तक का कथन नहीं।” और इसे “विरोध भी एकजुट नहीं है” के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कीजिए। |
| ! कॉल-सेंटर वाला बॉक्स (“आह री किस्मत! फिर एक हिन्दुस्तानी!”) | पाठ एक कर्मचारी का अनुभव दर्ज़ करता है | ★इसे ‘भावनात्मक’ नहीं, ‘विश्लेषणात्मक’ बनाइए — पूछिए: “यह अनुभव वैश्वीकरण के किस पहलू को दिखाता है?” उत्तर: प्रभाव विषम है — और कीमत हमेशा आर्थिक नहीं होती। |
| ! आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन | पाठ तटस्थ है — “यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है” | ★★वही तटस्थता रखिए। पाठ की कसौटी दीजिए — “फायदों में सबका साझा हो” — और कक्षा से पूछिए कि उस कसौटी पर हम कहाँ खड़े हैं। अपनी राय मत थोपिए। |
★★एक सामान्य नियम: इस अध्याय में हर संवेदनशील उदाहरण पाठ्यपुस्तक में मौजूद है — इसलिए उन्हें छोड़िए मत। पर हर बार यह जोड़िए कि “पाठ्यपुस्तक यह कहती है” — और फिर दूसरा पक्ष भी दीजिए।
7 · पाठ में ध्यान देने योग्य बातें
| # | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| 1 | पृ. 107 | !! अनाथ-संदर्भ — ‘अध्याय तीन’ जो हटा दिया गया है (ऊपर खंड 3 देखिए) |
| 2 | पृ. 99 | पोस्टर का लाल पैनल — यह WSF की आलोचना है, WSF का कथन नहीं। विद्यार्थी इसे उलट देते हैं। |
| 3 | पृ. 111 | “इसकी बैठक नेपाल में फरवरी 2024 में हुई थी” — ★यह संशोधित संस्करण में जोड़ा गया अद्यतन है, इसे ‘पुराना’ मत कहिए |
| 4 | पृ. 101 और 105 आदि | ★19 क्रमांकित चित्रों की एक ‘फिल्म-पट्टी’ पूरे अध्याय में चलती है — हर चित्र का विवरण नीले बॉक्स में दिया गया है। ! इन्हें छोड़िए मत; ये अध्याय का हिस्सा हैं और कुछ बहुत सटीक हैं (जैसे चित्र 19 — “ग्लोबल बाजार का लोकल चेहरा”) |
| 5 | प्रश्न 1 का विकल्प (ख) | ! “वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई” — यह गलत है, पर विद्यार्थी इसे चुन लेते हैं |
| 6 | प्रश्न 5 | !! यहाँ ‘ग़लत कथन’ पूछा गया है, ‘सही’ नहीं — विद्यार्थी प्रश्न ही उलटा पढ़ लेते हैं। इसे पहले ही बता दीजिए। |
| 7 | पृ. 108 का बॉक्स | स्रोत ज़रूर बताइए — 10 जनवरी 2005 का ‘द हिंदू’, रंजीता उर्स की रिपोर्ट |
8 · मूल्यांकन-सुझाव
8.1 कक्षा में मौखिक जाँच(हर कालांश के अंत में 2 मिनट)
| कालांश | पूछिए |
|---|---|
| 1 | “चार प्रवाह? और ‘सबसे ज़रूरी बात’?” |
| 2 | “प्रौद्योगिकी ‘अपरिहार्य’ है या ‘पर्याप्त’? और तीन राजनीतिक पहलू?” |
| 3 | “कौन-सा प्रवाह नहीं बढ़ा और क्यों?” |
| 4 | “समरूपता और वैभिन्नीकरण में अंतर? और ‘जीन्स पर कुर्ता’ क्या सिद्ध करता है?” |
| 5 | “भारत के तीन चरण? और ‘अंतिम कसौटी’ क्या है?” |
8.2 लिखित मूल्यांकन का ढाँचा
| प्रकार | अंक | अनुशंसित प्रश्न |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ | 1×5 | NCERT के प्रश्न 1–5 (ये स्वयं बहुविकल्पीय हैं और बहुत अच्छे हैं) |
| लघु | 2×4 | चार प्रवाह · प्रौद्योगिकी की सीमा · सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण · WSF |
| दीर्घ | 4×3 | NCERT प्रश्न 6, 7 और 10 |
| निबंधात्मक | 6×2 | NCERT प्रश्न 8 और 9 (या 11) |
| स्रोत-आधारित | 5×1 | 05-Question-Bank का खंड छ |
8.3 परियोजना-कार्य के चार सुझाव★
- ★★‘आओ मिलजुल कर करें’ को परियोजना बनाइए (पृ. 110) — दस उत्पाद, उनके निर्माता, और तीन वर्गों में वर्गीकरण (पूर्णतया विदेशी / पूर्णतया भारतीय / साझेदारी)। निष्कर्ष विद्यार्थी स्वयं खोज लेते हैं।
- ★‘मेरे दिन में वैश्वीकरण’ — विद्यार्थी सुबह से रात तक अपने दिन का ब्योरा लिखें और हर चीज़ के आगे लिखें कि वह कहाँ बनी, किसने बनाई, कहाँ से आयी। यह ‘हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं’ को जीवंत कर देता है।
- एक सप्ताह के अख़बार से वैश्वीकरण से जुड़ी खबरें काटकर तीन स्तंभों में लगाइए — राजनीतिक · आर्थिक · सांस्कृतिक। ★इससे ‘बहुआयामी’ शब्द अपने-आप सिद्ध हो जाता है।
- ★बोलियों की सूची (पृ. 107 की गतिविधि) — “अपनी भाषा की सभी जानी-पहचानी बोलियों की सूची बनाएँ। अपने दादा की पीढ़ी के लोगों से सलाह लीजिए। कितने लोग आज इन बोलियों को बोलते हैं?” यह ‘सांस्कृतिक समरूपता’ की बहस को घर तक ले आती है।
9 · ‘आओ मिलजुल कर करें’ — संसाधन-वर्गीकरण(पृ. 110)
| चरण | विवरण |
|---|---|
| 1 | हर विद्यार्थी रोज़मर्रा के उत्पादों की सूची — खाद्य-उत्पाद, बिजली के उपकरण, सुख-सुविधा के सामान |
| 2 | अपने पसंदीदा टी.वी. कार्यक्रमों के नाम |
| 3 | अध्यापक सूची एकत्र करें; कक्षा को छोटे समूहों में बाँटें |
| 4 | हर समूह निर्माताओं और प्रायोजकों के नाम बताए |
| 5 | ★★तीन वर्गों में सूचीबद्ध कीजिए — (1) पूर्णतया विदेशी (2) पूर्णतया भारतीय (3) साझेदारी वाली |
★अपेक्षित निष्कर्ष (पाठ्यपुस्तक के शब्दों में): “अधिकांश उत्पादों की बिनिर्माता कंपनियाँ विदेशी हैं जो स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर इन वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। शेष दो कोटियों के अंतर्गत आनेवाले उत्पाद अपेक्षतया कम हैं।”
! और दूसरा पहलू भी उठाइए (अध्यापकों के लिए दिए निर्देश में है): “विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ा है वैसे-वैसे हमारे छोटे स्वदेशी उद्योगों के ग्राहक कम हुए हैं और ये उद्योग बंद हो रहे हैं।”
★★समापन में यह ज़रूर कहिए: “आपने अभी-अभी ‘साझेदारी’ वाला खाना सबसे बड़ा पाया। यही पाठ्यपुस्तक की बात है — वैश्वीकरण न पूरी तरह ‘बाहर से आना’ है, न पूरी तरह ‘हमारा’ रहना। वह मिश्रण है — ठीक वैसे जैसे जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता।”
10 · समय की तंगी हो तो — क्या छोड़ें, क्या नहीं
| ✓ कभी मत छोड़िए | ! संक्षेप में कर सकते हैं |
|---|---|
| चार प्रवाह + ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ | तीनों कहानियों का पूरा विवरण (पर जनार्दन ज़रूर) |
| “बहुआयामी” और “प्रभाव विषम” | पाँच उलटे उदाहरणों में से दो-तीन पर्याप्त |
| प्रौद्योगिकी — ‘अपरिहार्य’ और छपाई का उदाहरण | 19 चित्रों का पूरा विवरण |
| ★★तीनों राजनीतिक पहलू (विशेषकर तीसरा) | पोस्टर के सारे बुलबुले (लाल पैनल ज़रूर) |
| ★चार प्रवाहों की स्थिति — विशेषकर ‘लोग’ और वीजा-नीति | कॉल-सेंटर बॉक्स का पूरा पाठ (पर अंतिम पंक्ति ज़रूर) |
| ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ और ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ | समर्थकों के तर्कों का विस्तार |
| ★★सांस्कृतिक समरूपता + वैभिन्नीकरण, और दोनों उदाहरण | — |
| !! ‘वर्चस्व’ की भरपाई (खंड 3) | — |
| भारत के तीन चरण और ‘अंतिम कसौटी’ | 1991 के सुधारों का विस्तृत ब्योरा |
| वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी विरोध; WSF की तीन तिथियाँ; ‘नीम’ | सिएट्ल का विस्तृत विवरण |
11 · अंतिम 10 मिनट — पूरी पुस्तक की समेकित पुनरावृत्ति★
यह पुस्तक 1 का अंतिम अध्याय है। कक्षा को सातों अध्याय एक साथ दिखाइए —
| अध्याय | एक पंक्ति में | कुंजी-वाक्य |
|---|---|---|
| 1. दो ध्रुवीयता का अंत | सोवियत संघ का विघटन | एक-ध्रुवीय विश्व का उदय |
| 2. सत्ता के समकालीन केन्द्र | यूरोपीय संघ, आसियान, चीन | नये शक्ति-केंद्र |
| 3. समकालीन दक्षिण एशिया | पड़ोस की राजनीति | सार्क और भारत |
| 4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन | संयुक्त राष्ट्रसंघ | “इसके बिना दुनिया और बदहाल होगी” |
| 5. समकालीन विश्व में सुरक्षा | पारंपरिक बनाम अपारंपरिक | “सुरक्षित राज्य ≠ सुरक्षित जनता” |
| 6. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | साझी संपदा और CBDR | “जवाब ताकत से तय होते हैं” |
| 7. वैश्वीकरण | प्रवाह और जुड़ाव | “प्रभाव बड़ा विषम रहा है” |
★★समापन-वाक्य कक्षा से कहिए: “पूरी पुस्तक एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है — शीतयुद्ध के बाद दुनिया में ताकत कहाँ चली गई? पहले चार अध्याय बताते हैं ‘कहाँ’ — रूस से अमरीका की ओर, फिर यूरोप, आसियान और चीन की ओर, और फिर संस्थाओं की ओर। अगले तीन बताते हैं कि ‘उसका असर आम आदमी पर क्या पड़ा’ — उसकी सुरक्षा पर, उसके पर्यावरण पर, और उसकी रोज़ी-रोटी तथा संस्कृति पर। और तीनों का जवाब एक ही है — असर सब पर बराबर नहीं पड़ा।”
12 · एक पंक्ति में — यदि केवल पाँच मिनट हों
वैश्वीकरण की बुनियादी बात है ‘प्रवाह’ — विचार, पूँजी, वस्तु और लोग — और उससे बना ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’। यह बहुआयामी है और इसका प्रभाव विषम है। प्रौद्योगिकी इसका अपरिहार्य कारण है, पर अकेली काफी नहीं। राज्य कमज़ोर भी हुआ, बना भी रहा, और मज़बूत भी हुआ। वस्तु, पूँजी और विचार बहे — लोग नहीं, क्योंकि वीजा-नीति ने रोका। संस्कृति में समरूपता भी है और वैभिन्नीकरण भी — बर्गर से खतरा नहीं, और जीन्स पर कुर्ता वापस भी जाता है। भारत ने संरक्षणवाद से 1991 तक का सफ़र तय किया — और अंतिम कसौटी वृद्धि-दर नहीं, “फायदों में सबका साझा” है। और विरोध — वामपंथी भी है, दक्षिणपंथी भी; और वह स्वयं भी एकजुट नहीं है।