कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 1 से 12
यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।
किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब; 2024-25 वाली किताब में भी यही पृष्ठ हैं)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और तथ्यों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।
किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना
पृष्ठ 1–2 — पिछली कक्षा से जोड़ और एक ग़लत समीकरण
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत
किताब कहाँ से शुरू करती है। पृष्ठ 1 पिछली कक्षा की याद दिलाता है: “पिछले साल हमने देखा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सारी ताकत किसी एक अंग तक सीमित नहीं होती। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच पूरी समझ के साथ सत्ता को विकेंद्रित कर देना लोकतंत्र के कामकाज के लिए बहुत ज़रूरी है।” (पृष्ठ 1) फिर कहता है: “पहले तीन अध्यायों में हम सत्ता के बँटवारे पर सोच-विचार को आगे बढ़ाएँगे।” (पृष्ठ 1)
किताब यहाँ अगले अध्यायों के नाम नहीं गिनाती। दोनों कथाओं का परिचय देकर इतना ही कहती है: “इससे हम सत्ता के बँटवारे के उन रूपों पर बातचीत कर सकेंगे जिनकी चर्चा अगले दो अध्यायों में की गई है।” (पृष्ठ 1) अगले अध्यायों से जोड़ संदर्शिका के पिछली कक्षा और अगले अध्यायों से जोड़ में है।
पूरे अध्याय का सवाल। पृष्ठ 2 पर किताब यह सवाल रखती है:
“मेरे दिमाग में सीधा सा समीकरण यह है कि सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना। हम इस बात से शुरुआत क्यों कर रहे हैं?” (पृष्ठ 2)
अध्याय की दोनों कहानियाँ और दोनों तर्क इसी समीकरण की जाँच हैं।
हमारी ओर से — समीकरण चार्ट पेपर पर। पहले दिन यह समीकरण चार्ट पेपर पर लिखकर दीवार पर लगा दीजिए, और बच्चे इसे कॉपी के पहले पन्ने पर उतार लें। कक्षा में दूसरे शिक्षक भी पढ़ाते हैं, इसलिए बोर्ड पर लिखा अगले दिन तक नहीं बचेगा। हर कालांश के अंत में एक सवाल पूछिए: आज जो पढ़ा, उससे यह समीकरण सही लगा या ग़लत? कालांश 8 में इसे पृष्ठ 6 के शब्दों से उलटकर लिखवाइए; उलटा समीकरण संदर्शिका के अध्याय का तर्क में है।
पृष्ठ 2–3 — दो देश, दो समाज
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: दो देश, दो समाज
बेल्जियम। यूरोप का छोटा-सा देश, “क्षेत्रफल में हमारे हरियाणा राज्य से भी छोटा” (पृष्ठ 2)। आबादी एक करोड़ से थोड़ी अधिक। किताब कहती है: “इस छोटे से देश के समाज की जातीय बुनावट बहुत जटिल है।” (पृष्ठ 2)
| बेल्जियम में कौन | कितने फ़ीसदी | भाषा |
|---|---|---|
| फ्लेमिश इलाक़ा | 59 | डच |
| वेलोनिया क्षेत्र | 40 | फ़्रेंच |
| बाक़ी | 1 | जर्मन |
| राजधानी ब्रूसेल्स | 80 फ़्रेंच, 20 डच | — |
असली उलझन ब्रूसेल्स की है। किताब के शब्द:
“अल्पसंख्यक फ़्रेंच-भाषी लोग तुलनात्मक रूप से ज़्यादा समृद्ध और ताकतवर रहे हैं। बहुत बाद में जाकर आर्थिक विकास और शिक्षा का लाभ पाने वाले डच-भाषी लोगों को इस स्थिति से नाराज़गी थी।” (पृष्ठ 2)
“इन दोनों समुदायों के टकराव का सबसे तीखा रूप ब्रूसेल्स में दिखा। यह एक विशेष तरह की समस्या थी। डच बोलने वाले लोग संख्या के हिसाब से अपेक्षाकृत ज़्यादा थे लेकिन धन और समृद्धि के मामले में कमज़ोर और अल्पमत में थे।” (पृष्ठ 2)
कक्षा में ऐसे खोलिए (हमारी ओर से)। पूरे देश में डच बोलने वाले ज़्यादा थे; धन और समृद्धि फ़्रेंच बोलने वालों के पास ज़्यादा थी; और राजधानी में डच बोलने वाले गिनती में भी कम थे, सिर्फ़ 20 फ़ीसदी। फिर पूछिए: ऐसे देश में फ़ैसले किसकी मर्ज़ी से हों: जिनकी गिनती ज़्यादा है, या जिनके पास धन ज़्यादा है? कोई उत्तर सही-ग़लत मत ठहराइए। यही सवाल आगे पूरे अध्याय में खुलता है।
श्रीलंका। “एक द्वीपीय देश है जो तमिलनाडु के दक्षिणी तट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।” (पृष्ठ 2) आबादी क़रीब दो करोड़, यानी हरियाणा के बराबर।
| श्रीलंका में कौन | कितने फ़ीसदी | और क्या |
|---|---|---|
| सिंहली | 74 | सबसे बड़ा समुदाय; अधिकतर बौद्ध |
| तमिल | 18 | इनमें श्रीलंकाई मूल के तमिल 13 फ़ीसदी; बाक़ी हिंदुस्तानी तमिल |
| ईसाई | 7 | सिंहली और तमिल, दोनों भाषाएँ बोलते हैं |
ईसाइयों वाली पंक्ति धर्म की है, भाषा की नहीं; बच्चे तीनों संख्याएँ जोड़कर 99 बनाने लगें तो यह फ़र्क़ बता दीजिए। हिंदुस्तानी तमिल वे हैं “जो औपनिवेशिक शासनकाल में बागानों में काम करने के लिए भारत से लाए गए लोगों की संतान हैं।” (पृष्ठ 3) तमिल-भाषियों में कुछ हिंदू हैं और कुछ मुसलमान।
यहीं रुकिए। पृष्ठ 3 का सवाल पढ़वाइए: “अब ज़रा सोचिए कि ऐसी स्थिति में क्या हो सकता था?” (पृष्ठ 3) उसी पैरा में सवाल के ठीक बाद किताब उसका जवाब देने लगती है, इसलिए पैरा का बाक़ी हिस्सा आज मत पढ़वाइए। बच्चे अपना अनुमान निकास-पर्ची पर लिखें (पाठ योजना के कालांश 1 में यह पर्ची समझाई गई है)।
कालांश 2 की शुरुआत में पैरा का बाक़ी हिस्सा। अनुमान सुन लेने के बाद यह हिस्सा पढ़वाइए:
“बेल्जियम में डच-भाषी लोग अपनी बड़ी संख्या के बल पर फ़्रेंच-भाषी और जर्मन-भाषी लोगों पर अपनी इच्छाएँ थोप सकते थे। इससे उनके बीच की लड़ाई और बढ़ जाती। संभव था इससे देश बँट जाता और ब्रूसेल्स पर दोनों पक्ष अपना-अपना दावा ठोकते। श्रीलंका में सिंहली आबादी का बहुमत और ज़्यादा था और वे लोग मुल्क में अपनी मनमानी चला सकते थे।” (पृष्ठ 3)
ध्यान दिलाइए कि यह सब हो सकता था; हुआ क्या, यह अगले पन्ने बताते हैं। प्रश्नावली का प्रश्न 7 इसी फ़र्क़ पर टिका है; संदर्शिका की आठ आम भूलें में तीसरी भूल यही है।
पृष्ठ 3–4 — श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद
कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: श्रीलंका
परिभाषा पहले। बहुसंख्यकवाद — “यह मान्यता कि अगर कोई समुदाय बहुसंख्यक है तो वह अपने मनचाहे ढंग से देश का शासन कर सकता है और इसके लिए वह अल्पसंख्यक समुदाय की ज़रूरत या इच्छाओं की अवहेलना कर सकता है।” (पृष्ठ 3)
जो हुआ। 1948 में श्रीलंका आज़ाद हुआ। फिर “सिंहली समुदाय के नेताओं ने अपनी बहुसंख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व जमाना चाहा।” (पृष्ठ 3) किताब तीन सरकारी कदम गिनाती है:
- 1956 में “एक कानून बनाया गया जिसके तहत तमिल को दरकिनार करके सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया गया।” (पृष्ठ 3)
- “विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता देने की नीति भी चली।” (पृष्ठ 3)
- “नए संविधान में यह प्रावधान भी किया गया कि सरकार बौद्ध मत को संरक्षण और बढ़ावा देगी।” (पृष्ठ 3)
किताब साल सिर्फ़ पहले कदम का देती है। बाक़ी दो को 1956 का बताकर मत लिखवाइए।
श्रीलंका: एक कदम से दूसरा
नतीजा, किताब के शब्दों में। “एक-एक करके आए इन सरकारी फ़ैसलों ने श्रीलंकाई तमिलों की नाराज़गी और शासन को लेकर उनमें बेगानापन बढ़ाया।” (पृष्ठ 3)
माँगें तीन हैं, चार नहीं। “श्रीलंकाई तमिलों ने अपनी राजनीतिक पार्टियाँ बनाईं और तमिल को राजभाषा बनाने, क्षेत्रीय स्वायत्तता हासिल करने तथा शिक्षा और रोज़गार में समान अवसरों की माँग को लेकर संघर्ष किया।” (पृष्ठ 4) शिक्षा और रोज़गार किताब में एक ही माँग है। फिर: “लेकिन तमिलों की आबादी वाले इलाके की स्वायत्तता की उनकी माँगों को लगातार नकारा गया।” (पृष्ठ 4)
गृहयुद्ध। परिभाषा: “किसी मुल्क में सरकार विरोधी समूहों की हिंसक लड़ाई ऐसा रूप ले ले कि वह युद्ध सा लगे तो उसे गृहयुद्ध कहते हैं।” (पृष्ठ 4) नतीजे: “दोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं।” (पृष्ठ 4) “अनेक परिवार अपने मुल्क से भागकर शरणार्थी बन गए हैं। इससे भी कई गुना ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी चौपट हो गई है।” (पृष्ठ 4)
इस पन्ने का सबसे ज़रूरी सवाल। किताब कहती है कि ये कदम “लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार” ने उठाए (पृष्ठ 3)। बच्चों से पूछिए: सरकार चुनाव जीतकर आई थी। फिर उसके ये फ़ैसले ग़लत क्यों माने गए? उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): बहुमत मिलने से अल्पसंख्यकों की “ज़रूरत या इच्छाओं की अवहेलना” का हक़ नहीं मिल जाता; किताब इसी सोच को बहुसंख्यकवाद कहती है।
पृष्ठ 4–5 — बेल्जियम की समझदारी
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: बेल्जियम
“बेल्जियम के नेताओं ने श्रीलंका से अलग रास्ता अपनाने का फ़ैसला किया। उन्होंने क्षेत्रीय अंतरों और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार किया।” (पृष्ठ 4) “1970 और 1993 के बीच उन्होंने अपने संविधान में चार संशोधन सिर्फ़ इस बात के लिए किए कि देश में रहने वाले किसी भी आदमी को बेगानेपन का अहसास न हो और सभी मिल-जुलकर रह सकें।” (पृष्ठ 4) और: “उन्होंने इसके लिए जो व्यवस्था की वह बहुत ही कल्पनाशील है तथा कोई और देश ऐसा नहीं कर पाया।” (पृष्ठ 4)
बेल्जियम मॉडल की चार बातें (पृष्ठ 4–5)।
| व्यवस्था | किताब के शब्द | |
|---|---|---|
| 1 | केंद्र में बराबरी | “केंद्रीय सरकार में डच और फ़्रेंच-भाषी मंत्रियों की संख्या समान रहेगी। कुछ विशेष कानून तभी बन सकते हैं जब दोनों भाषायी समूह के सांसदों का बहुमत उसके पक्ष में हो।” |
| 2 | राज्यों को शक्तियाँ | “केंद्र सरकार की अनेक शक्तियाँ देश के दो इलाकों की क्षेत्रीय सरकारों को सुपुर्द कर दी गई हैं यानी राज्य सरकारें केंद्रीय सरकार के अधीन नहीं हैं।” |
| 3 | ब्रूसेल्स में बराबरी | “ब्रूसेल्स में अलग सरकार है और इसमें दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व है।” |
| 4 | सामुदायिक सरकार | “इस सरकार का चुनाव एक ही भाषा बोलने वाले लोग करते हैं।” इसे “संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मसलों पर फ़ैसले लेने का अधिकार है।” |
तीसरी बात पर रुकिए: यहाँ दोनों ने कुछ छोड़ा। किताब कारण भी देती है: “फ़्रेंच-भाषी लोगों ने ब्रूसेल्स में समान प्रतिनिधित्व के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया क्योंकि डच-भाषी लोगों ने केंद्रीय सरकार में बराबरी का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया था।” (पृष्ठ 4)
बेल्जियम: दोनों ने कुछ छोड़ा
चौथी बात भी खोलिए। सामुदायिक सरकार किसी इलाक़े की नहीं, एक भाषा बोलने वालों की सरकार है: “डच, फ़्रेंच और जर्मन बोलने वाले समुदायों के लोग चाहे वे जहाँ भी रहते हों, इस सामुदायिक सरकार को चुनते हैं।” (पृष्ठ 5) बच्चों से पूछिए कि ऐसी सरकार बाक़ी तीन से कैसे अलग है।
क्या यह चला? “आपको बेल्जियम का मॉडल कुछ जटिल लग सकता है। निश्चित रूप से यह जटिल है — ख़ुद बेल्जियम में रहने वालों के लिए भी। पर यह व्यवस्था बेहद सफल रही है।” (पृष्ठ 5) “इससे मुल्क में गृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम लग गया है वरना गृहयुद्ध की स्थिति में बेल्जियम भाषा के आधार पर दो टुकड़ों में बँट गया होता।” (पृष्ठ 5) “जब अनेक यूरोपीय देशों ने साथ मिलकर यूरोपीय संघ बनाने का फैसला किया तो ब्रूसेल्स को उसका मुख्यालय चुना गया।” (पृष्ठ 5)
यह सवाल पूछिए (हमारी ओर से)। पृष्ठ 2 पर दोनों समुदायों के टकराव का सबसे तीखा रूप ब्रूसेल्स में दिखा था। पृष्ठ 5 पर वही ब्रूसेल्स यूरोपीय संघ का मुख्यालय चुना गया। बीच में क्या बदला? उत्तर ऊपर की चार बातों में है। ध्यान रहे, किताब बेल्जियम में गृहयुद्ध नहीं बताती। वह तनाव और टकराव बताती है (पृष्ठ 2), और गृहयुद्ध की आशंका की बात करती है (पृष्ठ 5)।
पृष्ठ 5 — दोनों कहानियों का सबक़
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश
“बेल्जियम और श्रीलंका की इन कथाओं से हमें क्या शिक्षा मिलती है? दोनों ही देश लोकतांत्रिक हैं। फिर भी सत्ता में साझेदारी के सवाल को उन्होंने अलग-अलग ढंग से निपटाने की कोशिश की।” (पृष्ठ 5)
| बेल्जियम | श्रीलंका |
|---|---|
| “बेल्जियम के नेताओं को लगा कि विभिन्न समुदाय और क्षेत्रों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है।” (पृष्ठ 5) | “श्रीलंका में ठीक उलटा रास्ता अपनाया गया।” (पृष्ठ 5) |
किताब का निष्कर्ष, बच्चे कॉपी में लिखें:
“अगर बहुसंख्यक समुदाय दूसरों पर प्रभुत्व कायम करने और सत्ता में उनको हिस्सेदार न बनाने का फैसला करता है तो इससे देश की एकता ही संकट में पड़ सकती है।” (पृष्ठ 5)
हमारी ओर से — चार्ट पेपर वाले समीकरण के नीचे। यह पंक्ति पृष्ठ 2 के समीकरण के ठीक नीचे जोड़ दीजिए। फिर पूछिए: अब बताइए, सत्ता बाँटने से देश कमज़ोर हुआ, या न बाँटने से? किताब का शब्द “संकट में पड़ सकती है” (पृष्ठ 5) है; बच्चे इसे देश टूट गया न लिखें, क्योंकि बेल्जियम टूटा नहीं और श्रीलंका के बारे में भी किताब देश टूटने की बात नहीं कहती।
यह कालांश पृष्ठ 6 की गतिविधि (एनिते और सेलवी) पर ख़त्म होता है; वह नीचे कक्षा की गतिविधियों वाले हिस्से में है।
पृष्ठ 6 — साझेदारी क्यों: दो तर्क
कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: साझेदारी क्यों
“इस प्रकार सत्ता के बँटवारे के पक्ष में दो तरह के तर्क दिए जा सकते हैं।” (पृष्ठ 6)
पहला तर्क। “पहला, सत्ता का बँटवारा ठीक है क्योंकि इससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव का अंदेशा कम हो जाता है। चूँकि सामाजिक टकराव आगे बढ़कर अकसर हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का रूप ले लेता है इसलिए सत्ता में हिस्सा दे देना राजनीतिक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए अच्छा है।” (पृष्ठ 6) आगे: “बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को बाकी सभी पर थोपना तात्कालिक तौर पर लाभकारी लग सकता है पर आगे चलकर यह देश की अखंडता के लिए घातक हो सकता है। बहुसंख्यकों का अत्याचार सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए ही परेशानी पैदा नहीं करता अकसर यह बहुसंख्यकों के लिए भी हानिकारक होता है।” (पृष्ठ 6)
आख़िरी वाक्य पर रुकिए और पूछिए: श्रीलंका के गृहयुद्ध में सिर्फ़ तमिल मारे गए या सिंहली भी? किताब पृष्ठ 4 पर ही बता चुकी है: “दोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं।” (पृष्ठ 4)
दूसरा तर्क। “सत्ता का बँटवारा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए ठीक है – इसके पक्ष में एक और बात कही जा सकती है और वह बात कहीं ज़्यादा गहरी है। सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र का मतलब ही होता है कि जो लोग इस शासन-व्यवस्था के अंतर्गत हैं उनके बीच सत्ता को बाँटा जाए और ये लोग इसी ढर्रे से रहें। इसलिए, वैध सरकार वही है जिसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से सभी समूह शासन व्यवस्था से जुड़ते हैं।” (पृष्ठ 6)
दोनों के नाम। “इन दो तर्कों में से एक को हम युक्तिपरक और दूसरे को नैतिक तर्क कह सकते हैं। युक्तिपरक या समझदारी का तर्क लाभकर परिणामों पर जोर देता है जबकि नैतिक तर्क सत्ता के बँटवारे के अंतर्भूत महत्व को बताता है।” (पृष्ठ 6) हाशिये में युक्तिपरक का अर्थ भी दिया है: “हानि-लाभ का सावधानीपूर्वक हिसाब लगाकर लिया गया फ़ैसला। पूरी तरह से नैतिकता पर आधारित फ़ैसला अकसर इसके उलट होता है।” (पृष्ठ 6)
दो तर्क, किताब के शब्दों में
हमारी ओर से — कक्षा का एक उदाहरण। कक्षा को पिकनिक की जगह तय करनी है। एक बच्चा कहता है: सबसे पूछ लो, वरना जो नाराज़ होंगे वे आएँगे नहीं और पिकनिक बिगड़ेगी। यह हानि-लाभ का हिसाब है, यानी युक्तिपरक तर्क। दूसरा कहता है: पिकनिक सबकी है, तो राय भी सबकी होनी चाहिए। यह नैतिक तर्क है। फिर बच्चों से कहिए कि दोनों तर्क पृष्ठ 6 की पंक्तियों से मिलाएँ।
हाशिये का कार्टून। पृष्ठ 6 का कार्टून जर्मनी का है। वहाँ “सन् 2005 के चुनावों में इन दोनों में से किसी को अपने बूते सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला इसलिए इन्हें गठबंधन-सरकार बनानी पड़ी।” (पृष्ठ 6) यह उदाहरण पृष्ठ 9 के चौथे रूप में फिर काम आएगा।
पृष्ठ 7 — खलील की उलझन
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: खलील
यह लेबनान की कहानी है, विक्रम और बेताल के ढंग से कही गई। खलील बेरूत में रहता था। “उसके माँ-बाप अलग-अलग समुदाय के थे। उसके पिता आर्थोडॉक्स ईसाई थे तो माँ सुन्नी मुसलमान।” (पृष्ठ 7) लेबनान के लोग “साथ रहते थे, मेल-जोल होता था पर गृहयुद्ध में वे एक-दूसरे से लड़ते भी थे। खलील का एक चाचा ऐसी ही लड़ाई में मारा गया था।” (पृष्ठ 7)
गृहयुद्ध के बाद का समझौता। “गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद लेबनान के सारे नेता साथ मिलकर बैठे और विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता के बँटवारे के कुछ बुनियादी नियमों पर सहमत हुए।” (पृष्ठ 7)
| पद | किसके लिए तय (पृष्ठ 7) |
|---|---|
| राष्ट्रपति | मैरोनाइट पंथ का कोई कैथोलिक |
| प्रधानमंत्री | सिर्फ़ सुन्नी मुसलमान |
| उपप्रधानमंत्री | आर्थोडॉक्स ईसाई |
| संसद के अध्यक्ष | शिया मुसलमान |
साथ में दो वादे: “आगे से ईसाई फ्रांस से संरक्षण की माँग नहीं करेंगे और मुसलमान भी पड़ोसी सीरिया के साथ एकीकरण की माँग छोड़ने पर सहमत हुए।” (पृष्ठ 7) किताब आगे बताती है: “जब ईसाइयों और मुसलमानों के बीच यह समझौता हुआ था तब दोनों की आबादी लगभग बराबर थी। बाद में मुसलमान स्पष्ट रूप से बहुमत में आ गए पर दोनों पक्ष अभी भी उस समझौते का आदर करते हुए उसे मान रहे हैं।” (पृष्ठ 7)
खलील की आपत्ति। “वह राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा वाला लोकप्रिय व्यक्ति है लेकिन मौजूदा व्यवस्था के रहते वह सबसे बड़े पद पर पहुँच ही नहीं सकता। वह न तो माँ के धर्म को मानता है और न ही पिता के।” (पृष्ठ 7) उसका कहना है: “सिर्फ़ चुनाव कराइए, हर किसी को चुनाव लड़ने की आज़ादी दीजिए और जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलें वह राष्ट्रपति बन जाए; भले ही वह किसी समुदाय का हो?” (पृष्ठ 7) दूसरी ओर, “उसके जिन बड़े-बुज़ुर्गों ने गृहयुद्ध देखा है उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था ही शांति की सबसे अच्छी गारंटी है।” (पृष्ठ 7)
बेताल का सवाल। “अगर आपको लेबनान का कानून फिर से लिखने का अधिकार होता तो आप क्या करते? क्या आप पुरानी व्यवस्था ही चलने देते या आप कुछ नया करते?” (पृष्ठ 7)
हमारी ओर से — चर्चा कैसे चलाएँ। किताब इस सवाल का उत्तर नहीं देती; वह बच्चों से विक्रम की मदद करने को कहती है। इसलिए आप भी कोई एक उत्तर सही मत ठहराइए। कक्षा को दो हिस्सों में बाँटिए और दोनों पक्षों के कारण किताब की पंक्तियों से निकलवाइए:
| खलील के पक्ष में | बड़े-बुज़ुर्गों के पक्ष में |
|---|---|
| सबसे बड़े पद तक हर नागरिक नहीं पहुँच सकता | वहाँ गृहयुद्ध हो चुका है; लोग एक-दूसरे से लड़ चुके हैं |
| जो किसी धर्म से अपनी पहचान नहीं जोड़ता, वह सबसे बड़े पद तक नहीं पहुँच सकता | आबादी बदलने के बाद भी दोनों पक्ष समझौते को मान रहे हैं |
बच्चा जो भी पक्ष ले, उसका कारण लिखे। आख़िर में पूछिए: यह समझौता पृष्ठ 8–9 के किस रूप की साझेदारी है? (उत्तर अगले कालांश में मिलेगा: सामाजिक समूहों के बीच बँटवारा।)
पृष्ठ 8–9 — साझेदारी के चार रूप
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: चार रूप
पुरानी मान्यता से शुरू कीजिए। “राजनीतिक सत्ता का बँटवारा नहीं किया जा सकता – इसी धारणा के विरूद्ध सत्ता की साझेदारी का विचार सामने आया था।” (पृष्ठ 8) पुरानी मान्यता यह थी कि “सरकार की सारी शक्तियाँ एक व्यक्ति या किसी खास स्थान पर रहने वाले व्यक्ति-समूह के हाथ में रहनी चाहिए।” (पृष्ठ 8) इसके सामने किताब रखती है: “लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि जनता ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत है।” (पृष्ठ 8)
चार रूप, हर एक का किताब वाला उदाहरण
पहला रूप। “शासन के विभिन्न अंग, जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का बँटवारा रहता है। इसे हम सत्ता का क्षैतिज वितरण कहेंगे क्योंकि इसमें सरकार के विभिन्न अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी-अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं।” (पृष्ठ 8) भारत का उदाहरण किताब ख़ुद देती है: “न्यायपालिका की नियुक्ति कार्यपालिका करती है पर न्यायपालिका ही कार्यपालिका पर और विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर अंकुश रखती है।” (पृष्ठ 8) इसी का नाम है नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था (पृष्ठ 8)।
दूसरा रूप। केंद्र और राज्य के बीच बँटवारा, और “नगरपालिका और पंचायतें ऐसी ही इकाइयाँ हैं। उच्चतर और निम्नतर स्तर की सरकारों के बीच सत्ता के ऐसे बँटवारे को उर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है।” (पृष्ठ 9) यहाँ पहले दोनों देश लौटते हैं: “बेल्जियम में तो यह काम हुआ है पर श्रीलंका में नहीं हुआ है।” (पृष्ठ 9) किताब कहती है: “हम अगले अध्याय में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।” (पृष्ठ 9) क्षैतिज और उर्ध्वाधर का फ़र्क़ चित्र में संदर्शिका की आठ आम भूलें में है।
तीसरा रूप। “सत्ता का बँटवारा विभिन्न सामाजिक समूहों, मसलन, भाषायी और धार्मिक समूहों के बीच भी हो सकता है। बेल्जियम में ‘सामुदायिक सरकार’ इस व्यवस्था का एक अच्छा उदाहरण है।” (पृष्ठ 9) भारत का उदाहरण: “पिछले साल हमने अपने देश में प्रचलित आरक्षित चुनाव क्षेत्र वाली ऐसी ही व्यवस्था के बारे में पढ़ा था।” (पृष्ठ 9) मक़सद: “ताकि लोग खुद को शासन से अलग न समझने लगें।” (पृष्ठ 9)
चौथा रूप। “पार्टियों की यह आपसी प्रतिद्वंद्विता ही इस बात को सुनिश्चित कर देती है कि सत्ता एक व्यक्ति या समूह के हाथ में न रहे।” (पृष्ठ 9) कभी यह भागीदारी सीधी दिखती है, “क्योंकि दो या अधिक पार्टियाँ मिलकर चुनाव लड़ती हैं या सरकार का गठन करती हैं।” (पृष्ठ 9) पृष्ठ 6 का जर्मनी वाला कार्टून यहीं याद दिलाइए। साथ में “व्यापारी, उद्योगपति, किसान और औद्योगिक मज़दूर जैसे कई संगठित हित-समूहों” (पृष्ठ 9) की बात भी है।
हमारी ओर से — बच्चे यहाँ उलझते हैं। बेल्जियम दो रूपों में आता है: केंद्र-राज्य वाले बँटवारे (दूसरा रूप) में भी और सामुदायिक सरकार (तीसरा रूप) में भी। बच्चों से पृष्ठ 4–5 की चार बातें फिर खुलवाइए और पूछिए कि कौन-सी बात किस रूप की है।
पृष्ठ 8–9 के कार्टून। पृष्ठ 8 का कार्टून 2005 के रूस का है; किताब पूछती है: “लोकतंत्र और सत्ता के केंद्रीकरण में क्या संबंध है?” (पृष्ठ 8) पृष्ठ 9 पर एक विद्यार्थी पूछता है: “मेरे स्कूल में हर महीने क्लास मॉनीटर बदल जाता है। क्या आप इसे ही सत्ता की भागीदारी बता रहे हैं?” (पृष्ठ 9) इस पर चर्चा की दिशा संदर्शिका के किताब के अपने सवाल में है।
कक्षा की गतिविधियाँ
पृष्ठ 5 की गतिविधि — अख़बार की कतरनें
कालांश 5 में गृहकार्य · पाठ योजना
किताब कहती है: “कोई एक अखबार पूरे हफ़्ते भर पढ़ें और फिर युद्धों और लड़ाइयों की खबरों की कतरनें जमा करें।” (पृष्ठ 5) फिर बच्चे तीन काम करें (पृष्ठ 5):
- “सारे झगड़ों को उनके स्थान (अपने प्रदेश, देश, देश से बाहर) के हिसाब से वर्गीकृत करें।”
- “इन टकरावों के कारण जानने की कोशिश करें। इनमें से कितने विवाद सत्ता के बँटवारे को लेकर हैं?”
- “इनमें से किस-किस विवाद को सत्ता में साझेदारी तय करके सुलझाया जा सकता है?”
हमारी ओर से। कतरनें चार्ट पेपर पर तीन खानों में चिपकवाइए: अपना प्रदेश, देश, देश से बाहर। हर कतरन के नीचे बच्चे एक पंक्ति में कारण लिखें। जिस घर में अख़बार नहीं आता, वह बच्चा स्कूल के पुस्तकालय का अख़बार ले सकता है, या समूह के साथी की कतरन पर काम कर सकता है। किसी धर्म या समुदाय पर टिप्पणी वाली कतरनें चार्ट पर न लगें; संदर्शिका की सावधानी देख लीजिए।
पृष्ठ 6 की गतिविधि — एनिते और सेलवी
कालांश 4, आख़िरी आठ मिनट · पाठ योजना में यह कालांश
किताब का बॉक्स:
“एनिते बेल्जियम के उत्तरी इलाके के एक डच माध्यम के स्कूल में पढ़ती है। फ़्रेंच बोलने वाले उसके अनेक स्कूली साथी चाहते हैं कि पढ़ाई फ़्रेंच में ही हो। सेलवी श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के एक स्कूल में पढ़ती है। वह और उसके स्कूल के बहुत से दोस्त तमिल-भाषी हैं और इनके माता-पिता पढ़ाई का माध्यम तमिल ही रखना चाहते हैं।” (पृष्ठ 6)
“कौन-सी सरकार एनिते और सेलवी के माता-पिता की इच्छा पूरी कर सकती है? किसे सफलता मिलने की संभावना अधिक है और क्यों?” (पृष्ठ 6)
ध्यान से पढ़वाइए। सेलवी ख़ुद भी तमिल-भाषी है; बॉक्स कहता है “वह और उसके स्कूल के बहुत से दोस्त”। एनिते के घर की इच्छा बॉक्स नहीं बताता; वहाँ इच्छा उसके फ़्रेंच बोलने वाले साथियों की है। बच्चे यह पूछें तो यही बताइए।
हमारी ओर से — उत्तर की दिशा, किताब के आधार पर।
- बेल्जियम में एक भाषा बोलने वालों की सामुदायिक सरकार है, जिसे लोग “चाहे वे जहाँ भी रहते हों” चुनते हैं, और जिसे “संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मसलों पर फैसले लेने का अधिकार है।” (पृष्ठ 5) हमारा अनुमान है कि फ़्रेंच बोलने वाले परिवार ऐसी सरकार के पास जा सकते हैं। पर किताब यह नहीं बताती कि स्कूल का माध्यम यही सरकार तय करती है, और पृष्ठ 10 के प्रश्न 4 में एक फ्लेमिश शहर के मेयर ने “अपने यहाँ के स्कूलों में फ़्रेंच बोलने पर लगी रोक को सही बताया है।” (पृष्ठ 10) कोई बच्चा यह बात उठाए तो उसकी बात सुनिए; किताब इसका पक्का उत्तर नहीं देती।
- श्रीलंका में किताब ऐसी किसी व्यवस्था का ज़िक्र नहीं करती। वहाँ सिंहली को एकमात्र राजभाषा बनाया गया (पृष्ठ 3), और तमिलों ने तमिल को राजभाषा बनाने और क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग की, पर “तमिलों की आबादी वाले इलाके की स्वायत्तता की उनकी माँगों को लगातार नकारा गया।” (पृष्ठ 4)
- किताब इस सवाल का उत्तर नहीं देती। उसके तथ्यों से हमारा निष्कर्ष: एनिते वाली माँग के पूरे होने की संभावना अधिक है। कारण बच्चों की योग्यता नहीं, दोनों देशों की व्यवस्था है।
पृष्ठ 10–12 — गतिविधि और प्रश्नावली
कालांश 7 और 8 · कालांश 8 का कार्ड
इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:
- पृष्ठ 10 के चार उदाहरण (बंबई उच्च न्यायालय, ओंटेरियो, रूस की दो पार्टियाँ, नाइजीरिया): चार उदाहरण, कौन किसके साथ
- प्रश्न 1 से 5: उत्तर के मुख्य बिंदु
- प्रश्न 6 से 9: कुंजी और कारण
- मुख्य शब्दों की परिभाषाएँ: किताब की परिभाषाएँ
- दोनों देशों के तथ्य: तथ्य एक नज़र में
अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड दीजिए।